1971 की जंग में पकड़े गए तीन भारतीय पायलटों की पाकिस्तान की जेल से साहसिक भागने की कहानी।
Key Takeaways
- साहस और धैर्य से बड़ी से बड़ी मुश्किलों को पार किया जा सकता है।
- जानकारी और रणनीति से असंभव को संभव बनाया जा सकता है।
- इंसान की उम्मीद और जज्बा सबसे मजबूत हथियार होते हैं।
- युद्ध के बीच भी मानवीय संघर्ष और कहानियां होती हैं जो प्रेरणा देती हैं।
What the video covers
- 1971 की भारत-पाकिस्तान युद्ध में तीन भारतीय पायलट पकड़े गए और पाकिस्तान की फैसलाबाद जेल में बंद हुए।
- फ्लाइट लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह भाटिया, विक्रम राणे और देवेंद्र चौहान की बहादुरी और संघर्ष की कहानी।
- तीनों पायलटों ने जेल की 20 इंच मोटी दीवार और कड़ी सुरक्षा के बीच भागने का साहसिक प्लान बनाया।
- जेल के कमांडर मेजर इकरामुल्लाह का भरोसा जीतकर उन्होंने जेल का नक्शा और जानकारी हासिल की।
- पायलटों ने अफगानिस्तान की तरफ भागने का रास्ता चुना क्योंकि वहां कम पुलिस और चेक पोस्ट थे।
- भागने के दौरान उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा जैसे गार्ड्स, करंट तार, और मौसम की बाधाएं।
- यह कहानी केवल भागने की नहीं, बल्कि इंसान की उम्मीद, धैर्य और जज्बे की भी है।
- 1971 के युद्ध के संदर्भ में पाकिस्तान और ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) की स्थिति का भी वर्णन।
- तीनों पायलटों ने जेल में यातनाएं झेली लेकिन कभी हार नहीं मानी।
- अंत में उनकी आज़ादी और घर वापसी की उम्मीद दर्शाई गई है।
Chapters
- 00:00परिचय: 13 अगस्त 1972 और फैसलाबाद की जेल
- 01:201971 का युद्ध और भारत-पाकिस्तान की स्थिति
- 02:34फ्लाइट लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह भाटिया का मिशन
- 03:54फ्लाइट लेफ्टिनेंट विक्रम राणे की कहानी
- 05:12फ्लाइट लेफ्टिनेंट देवेंद्र चौहान का मिशन
- 06:32पीओडब्ल्यू कैंप की सुरक्षा और जेल की स्थिति
- 07:49भागने का निर्णय और योजना बनाना
- 09:08जेल से भागने की तैयारी और रास्ता तय करना
- 10:47भागने की रात और चुनौतियां
- 16:41आज़ादी की ओर अंतिम कदम और प्रेरणा
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Speaker A
13 अगस्त 1972। [संगीत] रात के 2:00 बजे थे। पाकिस्तान के लायलपुर शहर जिसे आज फैसलाबाद [संगीत] कहते हैं। फैसलाबाद की सबसे खतरनाक जेल में एक अजीब [संगीत] सी हलचल थी। तीन कमरों में तीन भारतीय पायलट थे। तीनों की
Speaker A
आंखें [संगीत] खुली थीं। तीनों के दिल तेज धड़क रहे थे। क्योंकि आज वो रात थी जिसके लिए उन्होंने [संगीत] 9 महीने इंतजार किया था। 9 महीने, 270 रातें, हर रात एक ही सपना भागना। [संगीत] फ्लाइट लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह भाटिया ने धीरे से अपने बेड के नीचे
Speaker A
हाथ डाला। उनकी उंगलियां एक पतले लोहे के टुकड़े [संगीत] से टकराईं। यही उनका हथियार था। यही उनकी उम्मीद थी। जेल की दीवार 20 इंच मोटी थी। बाहर तीन टावर थे जिन पर हर वक्त पाकिस्तानी [संगीत] गार्ड्स तैनात रहते थे। बाहर की दीवार पर करंट वाले तार
Speaker A
थे। और उन तारों के पार एक अनजान मुल्क था, दुश्मन का मुल्क। लेकिन इन तीनों ने तय कर लिया था मरना मंजूर है [संगीत] रुकना नहीं। तो क्या वो उस रात भाग पाए? क्या वो कभी घर वापस पहुंचे? यह [संगीत] कहानी
Speaker A
सुनने के बाद आपकी रूह कांप जाएगी क्योंकि यह सिर्फ भागने की कहानी नहीं है। यह उस इंसान [संगीत] की कहानी है जो टूट कर भी नहीं झुका। साल था 1971। पूरा देश एक बड़े बदलाव की कगार पर खड़ा था। पाकिस्तान के
Speaker A
दो [संगीत] हिस्से थे उस वक्त वेस्ट पाकिस्तान और ईस्ट पाकिस्तान। लेकिन ईस्ट पाकिस्तान में जो आज बांग्लादेश [संगीत] है, पाकिस्तानी फौज ने जो जुल्म किए उसे याद करके आज भी [संगीत] इंसानियत शर्मिंदा होती है। वहां के आम लोगों को उनके ही देश
Speaker A
की सेना मार रही थी। औरतें, बच्चे, बूढ़े कोई नहीं बचा। लाखों लोग जान बचाने के लिए भारत की तरफ भागे। भारत ने जब उन बेघर लोगों की मदद करने का फैसला किया तो पाकिस्तान को इतना गुस्सा आया [संगीत] कि
Speaker A
3 दिसंबर 1971 की शाम को उसने बिना किसी चेतावनी के भारत के 11 एयरबेस पर बम गिरा दिए। बस उसी पल भारत ने भी ऐलान कर दिया अब जंग होगी। और उस जंग में भारतीय वायुसेना के पायलटों ने आसमान में ऐसे कहर
Speaker A
बरसाया [संगीत] कि पाकिस्तान की नींद उड़ गई। लेकिन आसमान में हर लड़ाई एकतरफा नहीं होती। कभी-कभी दुश्मन की गोली [संगीत] भी निशाने पर लग जाती है और जब कोई पायलट दुश्मन की जमीन पर गिरता है तो उसकी असली
Speaker A
परीक्षा शुरू होती है। ऐसे ही तीन पायलटों [संगीत] की कहानी है यह। पहले पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह भाटिया। अर्जुन सिंह भाटिया को सब अर्जी कहते थे। लंबे कद के तीखे नैन नक्श वाले। हंसी उनके चेहरे पर हमेशा रहती थी। लेकिन जब वो
Speaker A
कॉकपिट में बैठते थे तो वो हंसी एक खतरनाक [संगीत] सन्नाटे में बदल जाती थी। 5 दिसंबर 1971 भाटिया अपना मिग 21 लेकर निकले थे। [संगीत] मिशन था पाकिस्तान के सरगोधा के पास एक रडार स्टेशन को तबाह करना। यह रडार
Speaker A
स्टेशन भारतीय विमानों को ट्रैक करता था और उन पर मिसाइल दागता था। इसे खत्म करना जरूरी था। भाटिया ने जैसे ही रडार स्टेशन पर हमला किया, नीचे से एंटी एयरक्राफ्ट गनों ने फायरिंग [संगीत] शुरू कर दी। एक गोला सीधे उनके इंजन से जा टकराया। जेठ
Speaker A
धुएं में लपट गया। भाटिया के पास वक्त नहीं था। उन्होंने इजेक्ट [संगीत] का बटन दबाया और पैराशूट के साथ आसमान से नीचे आने लगे। लेकिन जैसे ही उनके [संगीत] पैर जमीन पर पड़े उन्होंने देखा चारों तरफ से भीड़ आ रही है। भाटिया ने भागने की कोशिश
Speaker A
की लेकिन पैराशूट [संगीत] के तार उनके पैरों में उलझ गए। गिर गए। भीड़ ने उन्हें घेर लिया। मारपीट हुई। कपड़े फटे लेकिन पाकिस्तानी फौज समय पर पहुंच गई। इसे मत [संगीत] मारो। यह जिंदा काम का है। उन्हें उठाकर एक अंधेरे कमरे में ले जाया गया।
Speaker A
वहां शुरू हुई पूछताछ। [संगीत] पूछताछ नहीं, असल में टॉर्चर। तीन दिन तक भाटिया को सोने नहीं दिया गया। तीन दिन तक उन्हें खाना नहीं दिया गया। [संगीत] लेकिन उन्होंने मुंह नहीं खोला। दूसरे पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट विक्रम राणे, विक्रम
Speaker A
राणे मुंबई के थे। समंदर किनारे पले बढ़े। इसीलिए उनकी आंखों में एक दूर तक देखने [संगीत] वाली चमक थी। 7 दिसंबर 1971 को राणे अपना सुखोई लेकर निकले थे। मिशन था पाकिस्तान की एक [संगीत] सप्लाई लाइन काटना। वो एक पुल था जिससे पाकिस्तानी फौज
Speaker A
को गोला बारूद और खाना पहुंचता था। राणे ने पुल पर हमला किया। पुल तबाह [संगीत] हो गया। लेकिन वापसी में दुश्मन के दो एफ 86 सेबर जेठ उनका [संगीत] पीछा करने लगे। राणे तेज थे। तेज और चालाक। उन्होंने एक
Speaker A
तीखा मोड़ [संगीत] लिया। एक सेबर उनका पीछा नहीं कर पाया। लेकिन दूसरे सेबर ने मिसाइल दाग दी। मिसाइल ने उनके जेट की पूंछ पकड़ ली। [संगीत] राणे ने इजेक्ट किया। वो गिरे एक गांव के पास। गांव वालों ने उन्हें पकड़ा और पाकिस्तानी फौज को
Speaker A
सौंप दिया। राणे के साथ सबसे पहले जो हुआ वो था अकेलापन। उन्हें तीन हफ्ते एक ऐसी कोठरी में रखा गया जिसमें कोई खिड़की नहीं थी। दिन रात का पता नहीं। बाहर की दुनिया का पता नहीं। सिर्फ अंधेरा और दीवारें।
Speaker A
लेकिन राणे टूटे नहीं। उन्होंने दीवारों पर [संगीत] उंगली से दिन गिनने लगे। हर दिन एक खरौंच जैसे कह रहे हो मैं हूं [संगीत] मैं यहां हूं। तीसरे पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट देवेंद्र चौहान। [संगीत] देवेंद्र चौहान राजस्थान के थे। रेगिस्तान
Speaker A
में पले होने की वजह से उनके अंदर एक अजीब सा धैर्य था। जहां दूसरे घबरा जाते वहां चौहान [संगीत] शांत रहते। 12 दिसंबर 1971 चौहान का मिशन था एक खास पाकिस्तानी बंकर को तबाह करना। वो बंकर जमीन के अंदर था।
Speaker A
बहुत गहरा। चौहान को बिल्कुल [संगीत] सही समय पर बिल्कुल सही कोण से बम गिराना था। उन्होंने दो बार चक्कर लगाया। तीसरी बार वो नीचे आए और बम गिराया। बंकर उड़ गया। लेकिन उसी वक्त एंटी एयरक्राफ्ट गन [संगीत] से निकला एक टुकड़ा उनके कॉकपिट
Speaker A
के शीशे से घुसा और उनके बाएं कंधे में जा हंसा। दर्द इतना तेज था कि आंखें धुंधला गईं। लेकिन चौहान ने हाथ नहीं हटाया। [संगीत] उन्होंने जेठ को वापस मोड़ने की कोशिश की। लेकिन इंजन ने साथ नहीं दिया।
Speaker A
इजेक्ट चौहान एक नहर के पास गिरे। [संगीत] कंधे में चोट थी। चलना मुश्किल था। पाकिस्तानी सैनिकों [संगीत] ने उन्हें आधे घंटे में ढूंढ निकाला। उन्हें जब अस्पताल ले गए तो पाकिस्तानी [संगीत] डॉक्टर को आदेश था चोट का इलाज करो। लेकिन इतना ही
Speaker A
करो कि मर ना जाए। इससे ज्यादा नहीं। चौहान का कंधा [संगीत] ठीक से नहीं जुड़ा। महीनों तक दर्द रहा। लेकिन चौहान ने एक आंसू नहीं बहाया। एक आह नहीं निकाली। धीरे-धीरे तीनों एक जगह पहुंचे। लायलपुर का पीओडब्ल्यू कैंप। यह कोई आम
Speaker A
जेल नहीं थी। यह जेल खासतौर पर पीओडब्ल्यू यानी प्रिजनर ऑफ वॉर के लिए बनी थी। यहां की दीवारें 20 इंच मोटी थीं। हर सेल में एक बल्ब था जो 24 घंटे जलता रहता था। ताकि कैदी अंधेरे में कुछ कर ना पाएं। हर दो
Speaker A
घंटे पर गार्ड्स राउंड लेते थे। बाहर की तरफ एक और दीवार थी 15 [संगीत] फीट ऊंची और उस दीवार पर करंट वाले तार। कुल मिलाकर यह एक ऐसी जगह [संगीत] थी जहां से भागना नामुमकिन था। लेकिन जब 25 दिसंबर [संगीत]
Speaker A
1971 को खबर आई कि पाकिस्तान ने सरेंडर कर दिया है और भारत जंग जीत गया है तो सभी कैदियों की आंखों में चमक [संगीत] आ गई। अब तो जल्दी घर जाएंगे लेकिन दिन बीतते गए, हफ्ते बीत गए, महीने बीत गए, कोई नहीं
Speaker A
आया। राजनीति के पेच में उनकी रिहाई अटकी पड़ी थी। एक रात अर्जुन सिंह भाटिया ने धीरे से कहा, "यार, अगर हम खुद नहीं निकले, तो शायद सालों लग जाएंगे।" राणे ने पूछा, "क्या मतलब?" भाटिया ने एक लंबी सांस ली और कहा, "मत [संगीत] साफ है। हम
Speaker A
भागेंगे।" कमरे में सन्नाटा छा गया। चौहान ने खिड़की से बाहर देखा। गार्ड का साया [संगीत] दिख रहा था। फिर उन्होंने भाटिया की तरफ देखा और धीरे से कहा, "बताओ क्या सोचा है?" उस रात वो तीनों सुबह तक बात
Speaker A
करते रहे और सुबह तक एक बात तय हो गई थी। यह तीनों भागेंगे या मरेंगे। बीच का कोई रास्ता नहीं। सबसे पहली जरूरत थी जानकारी। जेल का नक्शा, बाहर के रास्ते, बॉर्डर कहां है? अफगानिस्तान कितनी दूर है?
Speaker A
[संगीत] इसके लिए उन्हें जेल के कमांडर मेजर इकरामुल्लाह का भरोसा जीतना था। मेजर इकरामुल्लाह पढ़ा लिखा आदमी था। उसे इतिहास और भूगोल का बहुत शौक था। भाटिया ने यह कमजोरी पकड़ी। वो रोज उससे बातें करने [संगीत] लगे। मुगल इतिहास पर,
Speaker A
भारत-पाक के बंटवारे पर, सिंधु सभ्यता पर। धीरे-धीरे मेजर को लगा कि यह पायलट बहुत शरीफ [संगीत] और पढ़ा लिखा है। यह कभी भागने की कोशिश नहीं करेगा। इसी भरोसे का फायदा उठाकर [संगीत] एक दिन भाटिया ने कहा, "मेजर साहब, क्या हमें पढ़ने के लिए
Speaker A
कुछ किताबें मिल सकती हैं? और एक नक्शा। हम यहां बैठे-बैठे इतिहास [संगीत] पढ़ना चाहते हैं। मेजर मुस्कुराया। उसने कहा, ठीक है। अगले दिन एक पुराना [संगीत] एटलस और तीन किताबें आ गईं। मेजर को जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह अपने [संगीत]
Speaker A
कैदियों को जेल की चाबी दे रहा है। तीनों ने रात भर नक्शा देखा। भाटिया ने समझाया [संगीत] देखो भारत का बॉर्डर नजदीक है लेकिन वहां दोनों देशों की फौजें आमने-सामने हैं। [संगीत] बारूदी सुरंगे हैं। वो रास्ता मौत का रास्ता है। राणे ने
Speaker A
पूछा तो फिर भाटिया ने उंगली पश्चिम की तरफ रखी। अफगानिस्तान। चौहान ने कहा लेकिन वो बहुत दूर है। भाटिया बोले [संगीत] दूर जरूर है। लेकिन वहां के पहाड़ी रास्तों में ना पुलिस है ना चेक पोस्ट। वहां कबीले रहते हैं जो पाकिस्तान सरकार को ज्यादा
Speaker A
नहीं मानते। हम वहां से छिपते-छिपाते निकल सकते हैं। प्लान तय हुआ। रास्ता अफगानिस्तान। अब असली चुनौती थी जेल की 20 इंच मोटी दीवार तोड़ना। बिना किसी औजार के, बिना किसी शोर के और बिना किसी [संगीत] को पता चले। औजार जुटाना एक दिन
Speaker A
जेल में।
Speaker A
एक गार्ड अपना टिफिन छोड़कर किसी काम से चला [संगीत] गया। रानी ने चुपचाप टिफिन से एक मोटा चम्मच निकाल लिया। अब उनके पास थी एक [संगीत] छेनी और एक चम्मच। दुनिया के सबसे पतले हथियार। लेकिन यही उनकी जिंदगी
Speaker A
थी। सही सेल चुनना [संगीत] उन्हें ऐसी सेल चाहिए थी जो जेल की बाहरी दीवार के सबसे पास हो। भाटिया ने एक चाल चली। उन्होंने गार्ड से कहा, "यार, हमारे कमरे में चूहे बहुत हैं। रात को नींद [संगीत] नहीं आती।
Speaker A
क्या हम उस कोने वाली सेल में जा सकते हैं?" गार्ड हंसा। चूहों से डरते [संगीत] हो पायलट साहब। भाटिया ने भी हंसकर कहा, नहीं यार, लेकिन नींद तो चाहिए ना। गार्ड ने सोचा, "यह तो बस आराम मांग रहे हैं।"
Speaker A
उसने हां कर दी। तीनों उस कोने वाली सेल में शिफ्ट हो गए जो जेल की बाहरी दीवार के ठीक पास थी। पहली रात [संगीत] रात के 12:00 बजे भाटिया बेड के नीचे घुसे। छेनी उठाई और दीवार पर पहली बार छेनी [संगीत]
Speaker A
चलाई। खटाक बाहर गार्ड के कदमों की आवाज आई। भाटिया रुक गए। दिल की धड़कन तेज हो गई। ऊपर राणे ने खांसना [संगीत] शुरू किया। जोर से लंबी खांसी। गार्ड रुका। फिर आगे चला गया। भाटिया ने राहत की सांस ली
Speaker A
और फिर से शुरू किया। धीरे-धीरे बहुत धीरे। हर रात बस थोड़ा सा काम होता था। रात 12:00 से 1:00 बजे तक सिर्फ एक घंटा उससे ज्यादा जोखिम था। दीवार से जो धूल और मिट्टी निकलती थी उसे वह अपने कपड़ों में
Speaker A
छिपाकर सुबह टॉयलेट में बहा देते थे। जो बड़े टुकड़े निकलते थे उन्हें तकिए [संगीत] के खोल में भर कर रखते थे। दिन में उस छेद को एक पुराने कपड़े से ढक देते थे। फिर उसके आगे अपनी लोहे की अलमारी
Speaker A
खिसका [संगीत] देते थे। बाहर से देखने पर सब नॉर्मल लगता था। लेकिन अंदर आजादी का रास्ता बन रहा था। एक रात जब सब खत्म होते-होते बचा [संगीत] एक रात शायद तीसरे महीने की बात थी। राणे बेड के नीचे थे और
Speaker A
दीवार खोद रहे थे। तभी सेल का दरवाजा खुला। रात के 12:30 [संगीत] बज रहे थे। एक गार्ड अचानक अंदर घुस आया। भाटिया और चौहान बेड पर लेटे हुए थे। गार्ड ने टॉर्च [संगीत] जलाई। यहां तीन है या दो? भाटिया
Speaker A
ने सोने का नाटक किया। आंखें [संगीत] बंद। चौहान ने भी। गार्ड की टॉर्च घूमी। बेड पर दो। उसने बेड के नीचे टॉर्च मारी। एक पल के लिए सब रुक गया। [संगीत] राणे ने सांस रोक ली। टॉर्च की रोशनी उनके चेहरे के ठीक
Speaker A
1 इंच पास से गुजरी। गार्ड को धूल दिखी लेकिन राणे [संगीत] नहीं दिखे। वो थोड़ा और अंदर घुसे हुए थे। गार्ड ने टॉर्च बंद की। [संगीत] बड़बड़ाया और चला गया। सेल का दरवाजा बंद हुआ। फिर एक लंबी चुप्पी। राणे
Speaker A
धीरे-धीरे बाहर निकले। तीनों [संगीत] की आंखें मिली। कोई कुछ नहीं बोला। कोई जरूरत नहीं थी। कंपास बनाना एक महीने बाद उन्हें एहसास हुआ [संगीत] कि जेल से निकलने के बाद दिशा नहीं पता होगी। रात का अंधेरा होगा। अनजान जमीन होगी। बिना कंपास के वो
Speaker A
[संगीत] रेगिस्तान में भटक जाएंगे। चौहान ज्योति पानश जो सबसे शांत दिमाग [संगीत] के थे ने एक तरकीब सोची। उन्होंने एक सुई ढूंढी। जेल की सिलाई किट से फिर एक छोटा सा चुंबक चाहिए था। उन्होंने जेल में मिले [संगीत] एक पुराने ट्रांजिस्टर रेडियो के
Speaker A
अंदर से जिसे गार्ड ने उन्हें सुनने के लिए दिया था। एक छोटा मैग्नेट निकाला। उस मैग्नेट पर सुई [संगीत] को 200 बार रगड़ा। फिर उस सुई को एक कागज की नाव पर रखा और पानी के [संगीत] कटोरे में तैराया। सुई
Speaker A
उत्तर की तरफ मुड़ गई। बस कंपास तैयार जेल के अंदर भेष बदलना। जेल में हर महीने कुछ पैसे मिलते [संगीत] थे। इन्हीं पैसों से उन्होंने टुकड़ों में सामान इकट्ठा किया। सूखे मेवे, बिस्कुट, [संगीत] एक छोटी टॉर्च और सबसे जरूरी पठानी सूट। जेल के
Speaker A
दर्जी को [संगीत] कहा गया कि तीन पठानी सूट सिलो। दर्जी ने पूछा क्यों? भाटिया ने कहा, यहां ठंड बहुत है। ऊपर से कुछ [संगीत] पहनना है। दर्जी ने सिल दिए। उसे नहीं पता था कि वो तीन भारतीय पायलटों के
Speaker A
लिए पाकिस्तानी भेष तैयार कर रहा है। [संगीत] 9 महीने बाद सितंबर 1972 एक रात बादल घेर आए। तेज हवा चली और फिर बारिश शुरू हुई। मूसलाधार [संगीत] बारिश। भाटिया ने राणे को देखा। राणे ने चौहान को देखा। तीनों की आंखों में एक ही बात थी। आज रात
Speaker A
उन्होंने पठानी सूट पहने, सामान समेटा, कंपास उठाया। भाटिया ने आखिरी बार उस शैल को देखा जहां 9 महीने गुजारे थे। [संगीत] दीवार पर खरोचें थी जो राणे ने दिन गिनने के लिए की थी। 270 खरोचे, 270 रातें। भाटिया ने धीरे से कहा, चलो। बेड हटाया,
Speaker A
अलमारी खिसकाई, कपड़ा हटाया और वो [संगीत] सुरंग सामने थी। 20 इंच मोटी दीवार में बना एक इंसान के गुजरने जितना छेद 9 महीने की मेहनत 270 रातों का पसीना [संगीत] भाटिया ने आखिरी ईंट धीरे से बाहर धकेली बारिश की आवाज में ईंट के गिरने [संगीत]
Speaker A
की आवाज डूब गई बाहर ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया पहले राणे निकले रेंगते हुए फिर चौहान उनके कंधे में अभी भी दर्द था लेकिन वो बाहर आ गए आखिर [संगीत] में भाटिया जैसे ही भाटिया बाहर निकले उन्होंने देखा
Speaker A
दीवार के ठीक बगल में एक गार्ड चारपाई [संगीत] पर था। बारिश में उसने अपने ऊपर एक कंबल ओढ़ा हुआ था। वो सो रहा था या सोने का नाटक [संगीत] कर रहा था। तीनों ने एक पल एक दूसरे को देखा और भागे [संगीत]
Speaker A
तेज जितनी तेजी से भाग सकते थे। पीछे जेल की दीवार थी। सामने [संगीत] पाकिस्तान का अंधेरा। पहला पड़ाव खेत। जेल के पीछे सरसों और गेहूं के खेत थे। तीनों खेतों में घुस गए। कपड़े भीग [संगीत] चुके थे। कीचड़ जूतों में भर गया था। लेकिन रुकना
Speaker A
मौत था। पीछे से सायरन बजा। जेल में भगदड़ [संगीत] मच गई थी। कोई चिल्लाया। कैदी भाग गए। टॉर्चें जल गई। गोलियां हवा में चली। लेकिन बारिश ने उन्हें ढाल दी। बारिश ने उनके पैरों के निशान मिटा दिए। आवाजें दबा
Speaker A
[संगीत] दी और अंधेरे ने उन्हें छिपा लिया। करीब 1 घंटे तक वे भागते रहे। फिर एक नाले के पास [संगीत] रुके। भाटिया ने कंपास निकाला। सुई हिल रही थी। बारिश की बूंदों से पानी कांप रहा था। लेकिन उत्तर
Speaker A
दिख रहा था। उन्हें पश्चिम की तरफ जाना था। अफगानिस्तान [संगीत] की तरफ। वे फिर चल पड़े। अब भागना नहीं था। भागने वाला आदमी जल्दी पकड़ा जाता है। चलने वाला आदमी भीड़ में खो जाता है। सुबह होने लगी। दूर
Speaker A
एक छोटा सा गांव दिखा। [संगीत] तीनों ने फैसला किया। गांव में सीधे नहीं घुसेंगे। पहले देखेंगे फिर रास्ता चुनेंगे। गांव के बाहर एक बूढ़ा आदमी [संगीत] बैठा था। उसके पास एक बैलगाड़ी थी। भाटिया ने धीरे से कहा, "उसे रास्ता पूछते हैं।" राणे ने
Speaker A
कहा, ज्यादा मत [संगीत] बोलना, लहजा पकड़ लेंगे। भाटिया अकेले आगे बढ़े। बाकी दोनों पीछे [संगीत] रुक गए। बूढ़े ने ऊपर देखा। भाटिया ने सिर झुका कर सलाम किया। कहा, चाचा, शहर का रास्ता किधर है? बूढ़े ने घूर [संगीत] कर देखा। फिर बोला, "कौन से
Speaker A
शहर? भाटिया अटक गए। शहर का नाम उन्हें पता नहीं था। पीछे झाड़ियों में राणे ने हाथ उठाया। पश्चिम की तरफ इशारा किया। भाटिया ने तुरंत कहा, पश्चिम वाला शहर। बूढ़ा कुछ सेकंड तक देखता रहा। [संगीत] फिर उसने हाथ से रास्ता दिखाया। उस तरफ
Speaker A
जाओ सड़क मिलेगी। भाटिया ने शुक्रिया कहा। ज्यादा कुछ नहीं बोला। वो वापस झाड़ियों में आए। राणे ने पूछा। शक तो नहीं हुआ?
Speaker A
भाटिया ने कहा। पता नहीं लेकिन रुकना नहीं है। [संगीत] तीनों खेतों के किनारे-किनारे सड़क की तरफ चल पड़े। करीब आधे घंटे बाद वे एक कच्ची सड़क पर पहुंचे। सड़क पर थोड़ी दूर एक ट्रक खड़ा [संगीत] था। ड्राइवर बोनट खोलकर कुछ देख रहा था।
Speaker A
भाटिया ने कहा, यही मौका है। ट्रक में छिप जाते हैं। वे धीरे-धीरे ट्रक के पीछे पहुंचे। पीछे [संगीत] त्रिपाल पड़ा था। तीनों उसके अंदर घुस गए। सांस रोक कर लेट गए। कुछ मिनट बाद ड्राइवर वापस आया। बोनट बंद किया और ट्रक चल पड़ा। अंदर तीनों चुप
Speaker A
थे। अगर ड्राइवर ने पीछे देखा तो सब खत्म। अगर किसी चेक पोस्ट पर रुक गया तो सब खत्म। लेकिन किस्मत ने [संगीत] साथ दिया। ट्रक बिना रुके चलता रहा। करीब 2 घंटे बाद ट्रक एक कस्बे के बाहर रुका। [संगीत]
Speaker A
ड्राइवर उतरा और ढाबे की तरफ चला गया। भांटिया ने धीरे से त्रिपाल [संगीत] उठाया। बाहर देखा। रास्ता साफ था। तीनों चुपचाप नीचे उतरे। फिर सड़क [संगीत] के किनारे-किनारे आगे बढ़े। अब उन्हें बस अफगानिस्तान की तरफ बढ़ते रहना था। लेकिन
Speaker A
किस्मत [संगीत] हमेशा साथ नहीं देती। दोपहर तक वे एक बड़े चौराहे पर पहुंचे। वहां पुलिस की जीप खड़ी थी। दो पुलिस [संगीत] वाले चाय पी रहे थे और उनके हाथ में अखबार था। उस अखबार के पहले पन्ने पर
Speaker A
लिखा था भारतीय युद्ध बंदी फरार। तीनों के चेहरे पीले पड़ गए। अब पूरा पाकिस्तान उन्हें ढूंढ रहा था। भाटिया ने तुरंत सिर नीचे किया। तीनों सड़क किनारे बैठ गए। [संगीत] जैसे आम मुसाफिर बैठते हैं। राणे ने धीरे से कहा। अब क्या? [संगीत] भाटिया
Speaker A
ने कहा। अभी मत चलो। चलोगे तो देखोगे। बैठे रहो। करीब 15 मिनट वे वहीं बैठे रहे। पुलिस वाले चाय पीकर जीप में बैठे और चले गए। भाटिया ने कहा अब पुलिस जीप दूर निकल चुकी थी। तीनों धीरे से उठे और दूसरी सड़क
Speaker A
पकड़ ली। अब रास्ता और मुश्किल [संगीत] था। सामने सफर लंबा और खतरनाक था। ना खाने का भरोसा, ना पानी का भरोसा, ना रास्ते का भरोसा। 3 दिन [संगीत] तक वे छोटे-छोटे गांवों से बचते हुए चलते रहे। दिन में
Speaker A
छिपते, रात में चलते। [संगीत] यही उनका नया नियम बन गया था। एक रात उन्हें दूर से गाड़ियों की आवाज सुनाई दी। सड़क पर सेना की गाड़ियां जा रही थी। वे तीनों झाड़ियों में दब गए। एक जवान ने टॉर्च झाड़ियों की तरफ मारी। रोशनी उनके
Speaker A
चेहरों के पास से [संगीत] गुजरी। लेकिन इस बार भी किस्मत ने साथ दिया। गाड़ियां आगे निकल गई। रात का अंधेरा उनका सबसे बड़ा दोस्त था। जीटी रोड पर पहुंचकर उन्होंने एक ट्रक रोका। ड्राइवर ने पूछा, कहां जाना है? भाटिया ने पश्चिमी [संगीत] पंजाबी
Speaker A
लहजे में कहा पेशावर ड्राइवर ने गौर से देखा फिर सिर हिलाया बैठो सुबह वो पेशावर पहुंचे वहां से लंडी कोतल खैबर दर्रे के पास अफगानिस्तान की सरहद बस कुछ किलोमीटर दूर थी आजादी आंखों के सामने थी लेकिन तभी
Speaker A
गलती हुई चौहान को बहुत प्यास लगी थी एक चाय की दुकान पर रुके एक आदमी ने उन्हें ध्यान से देखा [संगीत] उनके जूते पुराने थे जेल के उनकी भाषा में एक अजीब सा मेल उस आदमी [संगीत] ने पास आकर पंजाबी में
Speaker A
पूछा कहां से आ रहे हो भाई? भाटिया ने कहा पेशावर एयरबेस से तो आईडी दिखाओ। घर पर छूट गई। एयरफोर्स के आदमी का आईडी घर पर नहीं छूटता। पास में खड़े एक और आदमी ने चिल्लाया। पकड़ो इन्हें। भीड़ जमा हो गई।
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पाकिस्तानी पुलिस आ गई। [संगीत] तीनों के हाथ पकड़ लिए गए और आजादी से बस 7 कि.मी.
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पहले उन्हें दोबारा जेल ले जाया गया। जब तीनों को वापस लाया गया तो जेल में सन्नाटा था। मेजर इकरामुल्लाह उन्हें देख रहा था। वो कुछ नहीं बोला। सिर्फ एक लंबी नजर डाली [संगीत] और चला गया। तीनों को 30
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दिन की सॉलिटरी कनफिनमेंट दी गई। अलग-अलग अकेले। लेकिन एक बात हुई उनकी इस [संगीत] कोशिश की खबर दुनिया में फैल गई। अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस ने पाकिस्तान [संगीत] से सवाल पूछे। भारत सरकार पर भी दबाव बढ़ा और आखिरकार [संगीत] दिसंबर 1972
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में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने ऐलान किया सभी भारतीय युद्ध [संगीत] बंदियों को रिहा किया जाएगा। जिस दिन तीनों वाघा बॉर्डर से भारत की तरफ आए, उस दिन उनके पैरों के [संगीत] नीचे की जमीन कांप रही थी। इमोशंस से। हजारों लोग
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तिरंगे लेकर खड़े थे। रानी की आंखों में आंसू आ गए। वो रोए नहीं। लेकिन उनकी आंखें बोल रही थी जो जुबान नहीं कह [संगीत] सकती थी। चौहान ने जमीन को हाथ से छुआ। भाटिया ने आसमान की तरफ देखा और ऊपर [संगीत] नीला
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आसमान था। वही आसमान जिसमें उन्होंने उड़ना सीखा था। वही आसमान [संगीत] जो उनका घर था। दोस्तों, यह कहानी सिर्फ तीन पायलटों की नहीं है। यह कहानी [संगीत] उस जज्बे की है जो कहता है, दीवार कितनी भी मोटी हो, उम्मीद उससे [संगीत] भी मोटी
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होती है। 9 महीने, 270 रातें, एक छेनी, एक चम्मच और तीन इंसान। इन्होंने साबित [संगीत] किया कि अगर इरादा पक्का हो तो 20 इंच की दीवार कुछ नहीं होती। वो बॉर्डर [संगीत] पार नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की सबसे सुरक्षित जेल को तोड़
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दिया। दुनिया को बता दिया कि एक भारतीय सैनिक [संगीत] को कैद तो किया जा सकता है लेकिन उसका हौसला कभी कैद नहीं होता। अगर यह कहानी आपके दिल तक पहुंची हो तो वीडियो को एक लाइक जरूर दें और चैनल को
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