अजीत डोभाल की पाकिस्तान में गुप्त जासूसी और उनके साहसिक मिशन की कहानी।
Key Takeaways
- अजीत डोभाल ने पाकिस्तानी धरती पर गुप्त जासूसी कर भारत के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी जुटाई।
- उनकी सूझ-बूझ और धैर्य ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को 15 साल पीछे धकेल दिया।
- डोभाल की कहानी देशभक्ति और खुफिया सेवा की मिसाल है।
- मिशन की सफलता के लिए पहचान छुपाना और स्थानीय संस्कृति में घुलना जरूरी था।
- शांति स्थापना और सूचनाओं के आदान-प्रदान में संवाद की अहमियत।
What the video covers
- 1979 में लाहौर में आईएसआई के बीच भारतीय जासूस अजीत डोभाल की गुप्त पहचान।
- अजीत डोभाल का उत्तराखंड के एक अनुशासित परिवार में जन्म और उनकी शिक्षा।
- 1971 केरल के दंगों में डोभाल की शांति स्थापित करने की भूमिका।
- डोभाल का इंटेलिजेंस ब्यूरो में शामिल होना और खुफिया कार्यों की शुरुआत।
- पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की गुप्त जानकारी जुटाने के लिए डोभाल का भिखारी का भेष।
- काहूता रिसर्च सेंटर के बाहर बालों के नमूने लेकर परमाणु सामग्री की पुष्टि।
- डोभाल की पाकिस्तानी संस्कृति, भाषा और रीति-रिवाजों में गहरी पकड़।
- मौलाना से मुलाकात और डोभाल की पहचान का खुलना, लेकिन मिशन की सफलता।
- डोभाल के कई खुफिया अभियानों और भारत की सुरक्षा में उनके योगदान।
- उनकी जिंदगी का समर्पण और पहचान छुपाकर देश सेवा करने की प्रेरक कहानी।
Chapters
- 00:00आईएसआई में भारतीय जासूस की खोज
- 01:03अजीत डोभाल का बचपन और शिक्षा
- 02:12दंगों में शांति स्थापित करना
- 03:20पाकिस्तान में गुप्त मिशन की शुरुआत
- 04:27काहूता रिसर्च सेंटर के बाहर भिखारी का भेष
- 06:28परमाणु सामग्री की पुष्टि और भारत की प्रतिक्रिया
- 07:41मौलाना से मुलाकात और पहचान का खुलना
- 09:48डोभाल का खुफिया कार्य और देशभक्ति
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Speaker A
1979। लाहौर, पाकिस्तान, आईएसआई का एक सीनियर अफसर अपनी कुर्सी पर बैठा था। सामने एक फाइल थी। उस फाइल में लिखा था, हमारे बीच एक भारतीय जासूस है। वो पिछले कई महीनों से लाहौर में है। उसकी पहचान अभी तक नहीं हुई।
Speaker A
आईएसआई अफसर ने वो फाइल बंद की, मेज पर मुक्का मारा। उसे ढूंढो, चाहे कुछ भी हो जाए। उस दिन से पूरी आईएसआई लाहौर की एक-एक गली छान रही थी। हर चेहरे पर नजर, हर आवाज पर कान, हर
Speaker A
अजनबी पर शक। लेकिन जिसे वो ढूंढ रहे थे, वो उन्हीं के बीच बैठकर चाय पी रहा था। सात साल दुश्मन की जमीन पर नकली पहचान के साथ, जहां हर सांस आखिरी हो सकती थी। जहां एक गलत शब्द कब्र
Speaker A
तक पहुंचा सकता था। उस आदमी का नाम था अजीत डोभाल। और यह कहानी शुरू होती है उससे भी बहुत पहले। एक पहाड़ी गांव में एक बच्चे से, जो एक दिन पूरे पाकिस्तान पर भारी पड़ेगा। 20 जनवरी 1945।
Speaker A
उत्तराखंड, पौड़ी गढ़वाल, एक छोटा सा गांव घिरी बनेल सैंड, जहां सूरज देर से आता था। जहां बिजली नहीं थी। लेकिन उस गांव के घर में एक चीज थी, अनुशासन। वो अनुशासन जो आर्मी से आता है, जो हड्डियों
Speaker A
में उतर जाता है। उस घर के मालिक थे मेजर गुणनंद डोभाल। भारतीय सेना बंगाल सैपर्स, 36 साल की सर्विस। उनके घर में एक बच्चा पैदा हुआ, नाम रखा अजीत। बचपन से तबादले, राजस्थान, दिल्ली, हर बार नया स्कूल।
Speaker A
लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली, वो खामोश नजरें जो हर चीज को देखती थीं, जो किसी कमरे में जाते पहले दरवाजे गिनते, फिर लोग, फिर बाहर निकलने के रास्ते। अजमेर मिलिट्री स्कूल, आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में परास्नातक,
Speaker A
प्रथम प्रथम श्रेणी, और 1968 में यूपीएससी पहले ही प्रयास में, 22 साल की उम्र में भारतीय पुलिस सेवा। लेकिन पुलिस से भी बड़ी दुनिया उनका इंतजार कर रही थी। दिसंबर 1971, केरल का तलसेरी, रात के 2:00 बजे, सड़कों पर आग, हिंदू मुस्लिम दंगा।
Speaker A
पुलिस लाचार, प्रशासन गायब। एक युवा अफसर को भेजा गया। वो गया, लेकिन बंदूक लेकर नहीं, सुनने के लिए। पहले हिंदू मोहल्ले में बैठा, चाय पी, सुना। फिर मुस्लिम मोहल्ले में बैठा, चाय पी, सुना। दोनों तरफ का दर्द उठाया,
Speaker A
दोनों तरफ की बात पहुंचाई। बिना एक गोली के दंगा खत्म। दिल्ली में किसी ने पूछा, यह कौन है? खुफिया विभाग के एक अफसर ने कहा, यही वो आदमी है जिसकी हमें तलाश थी। जनवरी 1972, अजीत डोभाल, इंटेलिजेंस ब्यूरो, और
Speaker A
शुरू हुआ वो सफर जो भारत की तारीख बदल देगा। 1979, पाकिस्तान, जियाउल हक का दौर। आईएसआई दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी बन रही थी, और उसी आईएसआई की नाक के नीचे एक भारतीय अपनी जगह बना रहा था। उर्दू ऐसे
Speaker A
सीखी जैसे लाहौर में पैदा हुए हो। पाकिस्तान की तारीख, संस्कृति, सियासत, मुस्लिम रीति रिवाज, सब इतनी गहराई से कि कोई शक ना कर सके। पड़ोसी उन्हें भाई साहब बुलाते थे, मस्जिद में लोग उनके साथ नमाज पढ़ते थे। कोई नहीं जानता था
Speaker A
कि यह इंसान दरअसल भारत का सबसे खतरनाक हथियार है। काहूता, पाकिस्तान का सबसे गुप्त ठिकाना, जहां एक यू खान देश का परमाणु बम बना रहा था। चारों तरफ कंटीले तार, सशस्त्र पहरेदार, कैमरे। लेकिन उस दरवाजे के बाहर एक चीज थी जिसे कोई नहीं
Speaker A
देखता था। एक भिखारी, फटा हुआ कुर्ता, उलझे हुए बाल, पैरों में टूटी चप्पल, हाथ में एक टूटा कटोरा। वो बैठा था। काहूता रिसर्च सेंटर के मुख्य दरवाजे से कुछ दूरी पर। सुबह 8:00 बजे
Speaker A
पहली गाड़ी आई। काले शीशे, सफेद नंबर प्लेट, गाड़ी रुकी। एक आदमी उतरा। सफेद कोट, आईडी कार्ड गले में, वैज्ञानिक। उसने भिखारी को देखा। जेब से कुछ पैसे निकाले, कटोरे में डाले और अंदर चला गया। उस भिखारी की आंखें झुकी हुई थीं। लेकिन
Speaker A
दिमाग हर चीज रिकॉर्ड कर रहा था। गाड़ी का नंबर, आदमी की उम्र, उसके हाथ, उसके जूते, उसके कोट पर लगा बैच। दिन गुजरते गए। हफ्ते, वो भिखारी रोज वहां होता। कभी दरवाजे के बाईं तरफ, कभी दाईं तरफ, कभी
Speaker A
थोड़ा आगे, कभी थोड़ा पीछे, ताकि किसी को आदत ना पड़े। ताकि कोई उसे याद ना रखे। एक जासूस की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि लोग उसे भूल जाएं, और वो अपनी इस ताकत में माहिर था। लेकिन एक दिन एक आईएसआई
Speaker A
का जवान जो चेक पोस्ट पर तैनात था, उस भिखारी के पास आया। खड़ा रहा, ऊपर से नीचे देखा। फिर बोला, तू रोज यहां होता है। भिखारी ने सिर उठाया। थकी हुई आंखें, टूटा हुआ चेहरा। साहब, बस दो
Speaker A
रोटी के लिए। जवान ने उसे घूरा। यहां से हट जा। दोबारा दिखा तो अंदर कर दूंगा। भिखारी धीरे-धीरे उठा। लड़खड़ाते कदमों से चला गया। उस दिन शाम को वो भिखारी रावलपिंडी की एक पुरानी मस्जिद में था। नमाज पढ़ी और
Speaker A
चुपचाप बैठ गया। मिशन खतरे में था। अगले दिन वो भिखारी नहीं आया। ना उसके, अगले दिन, एक हफ्ते बाद काहूता से 1 कि.मी.
Speaker A
दूर एक छोटी सी दुकान के सामने एक नया भिखारी दिखा। अलग कपड़े, अलग बैठने का तरीका। लेकिन वही आंखें, वही खामोश नजर जो हर चीज को देखती थी। और फिर वो नाई की दुकान का रिसर्च सेंटर से थोड़ी दूर
Speaker A
एक छोटी सी नाई की दुकान थी। नाम था गुलाम नाई, एक बूढ़ा नाई। पुरानी कुर्सी, टूटा हुआ आईना। लेकिन उसके ग्राहक साधारण नहीं थे। काहूता के वैज्ञानिक दोपहर की छुट्टी में वहां आते थे। बाल कटवाते, दाढ़ी बनवाते और जाते वक्त जमीन
Speaker A
पर बाल बिखरे छोड़ जाते, जिन्हें कोई नहीं उठाता था सिवाय उस भिखारी के। वो दुकान के बाहर बैठता। जब नाई अंदर होता, जब ग्राहक आता जाता, वो भिखारी आम दरवाजे के पास से गुजरता और बड़ी सफाई
Speaker A
से कुछ बाल अपनी मुट्ठी में बंद कर लेता। इतनी सफाई से कि खुद नाई को भी पता नहीं चलता। वो बाल एक छोटी सी पुड़िया में बंद होते और किसी अनजान रास्ते से भारत पहुंचते। दिल्ली, रॉ की प्रयोगशाला,
Speaker A
सफेद कोट, माइक्रोस्कोप, परीक्षण। वैज्ञानिकों ने उन बालों को देखा और जो मिला वो देखकर कमरे में सन्नाटा छा गया। यूरेनियम 235 के अंश, भारी विकिरण के निशान। वो वैज्ञानिक जो उन बालों के मालिक थे, वो रोज यूरेनियम के संपर्क में थे।
Speaker A
मतलब पाकिस्तान गुप्त रूप से परमाणु बम बना रहा था। इस जानकारी की वजह से भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया। अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया। परमाणु सामग्री की आपूर्ति बंद की। यूरोपीय देशों को रोका। पाकिस्तान का
Speaker A
परमाणु कार्यक्रम जो 1984 से 85 तक पूरा होने वाला था, 15 साल पीछे हो गया। और पाकिस्तान को आज तक नहीं पता कि वो राज एक भिखारी के कटोरे से निकला था। वो भिखारी था अजीत डोभाल। मौलाना,
Speaker A
वो मुलाकात जो कभी नहीं भूली। 1980 का दशक, लाहौर, एक मशहूर दरगाह, हजारों की भीड़। डोभाल उसी भीड़ का हिस्सा थे। कुर्ता, टोपी, दाढ़ी, बिल्कुल लाहौर का आम मुसलमान। वो दरगाह की सीढ़ियों पर बैठा था। आंखें झुकी हुई, होंठ हिल रहे थे, जैसे दुआ पढ़
Speaker A
रहा हो। लेकिन उसका दिमाग दुआ नहीं पढ़ रहा था। वो ऑब्जर्व कर रहा था कौन आया, कितने बजे, किसने किससे बात की, कौन सा चेहरा बार-बार दिख रहा है? यह उसका काम था। उसका नाम था अजीत डोभाल। तभी भीड़ के
Speaker A
एक कोने में एक बूढ़े मौलाना की नजर उन पर पड़ी। लंबी सफेद दाढ़ी, झुकी हुई कमर। चेहरे पर तजुर्ब की गहरी झुर्रियां, लेकिन आंखें जवान थीं, तेज, पैनी, बेरने वाली। वो आंखें डोभाल पर टिक गईं।
Speaker A
डोभाल ने भांपा, उन्होंने नजर फेर ली, लेकिन मौलाना ने नजर नहीं फेरी। वो उठे, धीरे-धीरे चले और डोभाल के पास आकर बैठ गए। खामोशी, फिर बेहद धीमी आवाज में बोले, क्या तुम हिंदू हो? उस एक सवाल ने
Speaker A
डोभाल के पूरे जिस्म में बिजली दौड़ा दी। पाकिस्तान की जमीन, हजारों लोगों की भीड़, सालों की मेहनत से बनाई गई पहचान, और एक बूढ़े की आंखों ने एक पल में सब देख लिया। लेकिन डोभाल का चेहरा नहीं
Speaker A
बदला। ना एक झुर्री, ना एक पल की झिंझक। उन्होंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा, नहीं। मौलाना ने उन्हें देखा। लंबे वक्त तक। फिर बोले, चलो लाहौर की तंग गलियां। एक मोड़, दूसरा मोड़। डोभाल के दिमाग में एक
Speaker A
साथ हजार बातें चल रही थीं। यह कौन है? आईएसआई का आदमी है? कोई जाल है? भागना चाहिए? लेकिन भागना सबसे बड़ी गलती होती है। भागने वाला दोषी होता है। डोभाल चलते रहे उसी चाल से। जैसे कोई फिक्र ही नहीं।
Speaker A
एक पुरानी हवेली का दरवाजा। अंदर एक छोटा सा कमरा। मौलाना ने अंदर आते ही दरवाजा बंद किया। कुंडी चढ़ाई और मुड़े। कमरे में सिर्फ वो दोनों थे। एक छोटा सा बल्ब, पुरानी दीवारें, हवा में नमी और एक
Speaker A
ऐसा सन्नाटा जिसे सिर्फ डोभाल के दिल की धड़कनें तोड़ रही थीं। मौलाना ने उनकी आंखों में देखा और फिर उसी शांत आवाज में वही बात दोहराई। तुम हिंदू हो? इस बार सवाल नहीं था। बयान था। डोभाल के ज़हन
Speaker A
में एक ही सवाल था, इसे कैसे पता चला? मौलाना ने उनके कान की तरफ इशारा किया। तुम्हारे कान छिदे हुए हैं। डोभाल ने महसूस किया। उनके कानों में बचपन से छेद था। कर्णबेधन। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में एक पुरानी परंपरा। छोटे
Speaker A
लड़कों के कान छेदे जाते थे। वो एक बचपन की छोटी सी रस्म आज उनके लिए काल बनने वाली थी। मौलाना बोलते रहे, पाकिस्तान में मुस्लिम मर्द कान नहीं छिदवाते। यह तुमने नहीं सोचा। डोभाल के अंदर तूफान था। लेकिन बाहर मुकम्मल खामोशी।
Speaker A
उन्होंने सीधी आंखें मिलाई और बोले, बचपन में हिंदू था, बाद में इस्लाम कबूल किया। यह निशान पुराना है। मौलाना ने उन्हें देखा। फिर आ से कुछ नहीं बोले। कमरे की उस पुरानी अलमार...
Speaker A
लगी कुंडी। उन्होंने धीरे से खोला। अंधेरे में अडोभाल की आंखें फटी रह गई। मां दुर्गा की मूर्ति भगवान शिव एक छोटा सा दिया जो शायद रोज जलाया जाता था और बुझाया जाता था किसी के आने से पहले मौलाना की
Speaker A
आंखें भर आई वो बोले मैं भी हिंदू हूं 1947 में मेरे पूरे परिवार को मार दिया गया बचने के लिए मुसलमान बन गया [संगीत] दशकों से यहां हूं फिर [गला साफ़ करने की आवाज़] उन्होंने कहा प्लास्टिक सर्जरी करा लो वरना एक दिन कोई
Speaker A
और पकड़ लेगा और वो मेरी तरह दयालु नहीं होगा। डोभाल उस [संगीत] कमरे से निकले उसी चाल से, उसी सुकून से लेकिन अंदर से कुछ टूट गया था। वो [संगीत] मौलाना जो 1947 से अपनी पहचान छुपा कर जी रहा था। रोज मस्जिद
Speaker A
जाता था। लोगों को उपदेश [संगीत] देता था। लेकिन रात को बंद कमरे में अपने भगवान से मिलता था। वर्षों बाद एनएसए बनने के बाद डोभाल ने यह किस्सा सांझा किया और कहा, "मैं उस मौलाना को कभी नहीं भूल पाया। काश
Speaker A
मैं उसे वापस ला सकता। लेकिन जासूसी की दुनिया में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं। मिशन पहले हमेशा कौवाली की रात जब दाढ़ी उठने लगी दों की रोशनी। कौवाली की आवाज हजारों की भीड़ डोभाल उसी भीड़ में एक और
Speaker A
मिशन पर अचानक एक आदमी की नजर पड़ी। डोभाल की नकली दाढ़ी एक तरफ से उठ रही थी। वो आदमी घूर रहा था। [संगीत] आंखें संकरी सोच रहा था। एक जासूस जो पकड़ा जाने वाला हो [संगीत] वो करता है भागना। डोभाल ने क्या
Speaker A
किया? उस आदमी की आंखों में देखा और हल्के से मुस्कुराए। वो आदमी अचंभे में पड़ गया। सोचा जो पकड़ा गया हो वो इतने आराम से नहीं मुस्कुराता। शायद मैंने गलत देखा। जब तक वो कुछ [संगीत] सोच पाता डोभाल भीड़
Speaker A
में खो गए। 1970 का दशक। पूर्वोत्तर का मिजोरम जल रहा था। मिजो नेशनल फ्रंट के विद्रोही जंगल में छुपे थे। सेना की गोलियां उन तक नहीं पहुंच रही थी। खुफिया विभाग ने डोभाल को भेजा बिना बंदूक, बिना सुरक्षा। विद्रोहियों के नेता लालडेंगा से
Speaker A
मिले। उनकी बात सुनी, दर्द [संगीत] समझा, मांगे जानी और धीरे-धीरे लालडेंगा को बातचीत की मेज पर लाए। मिजोरम की विद्रोह बिना बड़े रक्तपात के शांत। इसके बाद सिक्किम 1975 सिक्किम को भारत में मिलाना था। चीन की नजर आईएसआई सक्रिय हालात नाजुक डोभाल ने
Speaker A
जमीन तैयार की खुफिया जानकारी इकट्ठा की जब भारतीय सेना ने प्रवेश किया [संगीत] रास्ता साफ था सिक्किम भारत का 22वां राज्य [संगीत] इन दो अभियानों के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक आमतौर पर यह 14 [संगीत] साल की सेवा के बाद मिलता है
Speaker A
डोबाल को मिला सिर्फ 7 साल में स्वर्ण मंदिर वो रिक्शे वाला जो आईएसआई का एजेंट [संगीत] बन गया 1988 88 पंजाब खालिस्तान आंदोलन चरम पर भिडरा वाले के मरने के बाद भी उसके अनुयाई स्वर्ण मंदिर में बंद थे।
Speaker A
A के 47 [संगीत] ग्रेनेड गोला बारूद सेना बाहर खड़ी थी। अंदर जाना मतलब मौत एक छोटा सा आदमी मैला कुर्ता पसीने में भीगा। रिक्शा खींचते हुए दरवाजे के पास आया। उग्रवादी से बोला मैं आईएसआई का आदमी हूं। पाकिस्तान से
Speaker A
तुम्हारी मदद करने आया हूं। उग्रवादियों ने उसे अंदर आने दिया। वो कई दिन अंदर रहा, हथियार देखे, ठिकाने नोट किए और वो सारी जानकारी एनएसजी तक पहुंचाता रहा। लेकिन एक रात एक उग्रवादी ने उसे अकेले पकड़ा। तुम्हें पाकिस्तान का लहजा नहीं
Speaker A
है। तुम कौन हो? डोबाल ने आंखों में देखा और धीरे से कहा, "मैं कराची का हूं। तुमने कभी कराची के लोग नहीं देखे। हम ऐसे ही बोलते हैं। वो उग्रवादी शर्मिंदा होकर चला गया। ऑपरेशन ब्लैक थंडर शुरू हुआ। एनएसजी
Speaker A
ने ठीक वहां हमला किया जहां हथियार थे। [संगीत] हानि न्यूनतम। स्वर्ण मंदिर की दीवारें सुरक्षित। 1989 कीर्ति चक्र। पहले कभी किसी पुलिस अफसर को नहीं मिला था। यह सिर्फ सेना [संगीत] को मिलता था। उनके लिए अपवाद फिर बना। कंधार वो सात रातें
Speaker A
[संगीत] जिन्होंने भारत बदल दी। 24 दिसंबर 1999 क्रिसमस की [संगीत] पूर्व संध्या इंडियन एयरलाइंस उड़ान आईसी 814 काठमांडू से दिल्ली अपहरण 171 [संगीत] यात्री आतंकवादी विमान को पाकिस्तान यूएई होते हुए तालीबान नियंत्रित कंधार ले गए। भारत ने बातचीत की
Speaker A
टीम भेजी। उस टीम में थे अजीत डोभाल। [संगीत] कोई सहयोग नहीं, कोई बैकअप नहीं, कोई गारंटी नहीं। आतंकवादियों की मांगे $20 करोड़ डॉलर [संगीत] 100 कैदी डोभाल ने सात दिन बातचीत की मांगे कम करवाई नकद मांग हटवाई लेकिन तीन आतंकवादियों को रिहा करना
Speaker A
पड़ा उनमें [संगीत] से एक था मसूद अजहर जो बाद में जैश मोहम्मद बनाएगा जो पुलवामा करेगा जो 40 सीआरपीएफ [संगीत] जवानों की जान लेगा। डोभाल ने उस रात को कभी नहीं भुलाया। उस दिन मैंने तय किया भारत कभी
Speaker A
इतना बेबस नहीं होगा। हमें आक्रामक होना होगा। प्रतिक्रियाशील नहीं। यह एक लाइन [संगीत] भारत की सुरक्षा नीति बदल देगी। एनएसए डोभाल जब भारत ने आक्रामक होना सीखा। 2014 नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री [संगीत] उनकी पहली बड़ी नियुक्तियों में से एक
Speaker A
अजीत डोभाल। [संगीत] भारत का पांचवा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार 2016 उरी हमला। 18 जवान शहीद। पहले भारत क्या करता? निंदा प्रेस कांफ्रेंस यूएन में शिकायत इस बार सर्जिकल स्ट्राइक पहली बार भारत ने एलओसी पार की आधिकारिक [संगीत] रूप से 2019
Speaker A
पुलवामा 40 जवान शहीद बालाकोट हवाई हमला सिर्फ सात लोगों को पता था पीएम तीनों सेना प्रमुख और डोभाल 2019 अनुच्छेद 370 कश्मीर का [संगीत] विशेष दर्जा खत्म सेना तैनाती जमीनी आकलन कानूनी ढांचा सब डोभा भाल की योजना 2020 गलवान चीन के साथ
Speaker A
संघर्ष डोभाल ने चीनी एनएसए [संगीत] से सीधी बात की डोकलाम की तरह बिना युद्ध के सुलझाया 2025 पहलगाम हमला ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सटीक प्रहार कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस [संगीत] नहीं कोई बयान नहीं वो सवाल जो इतिहास नहीं
Speaker A
पूछता वो मौलाना जो 1947 से पाकिस्तान में अपनी पहचान छुपा कर जी रहा था उसका क्या हुआ? इतिहास सिर्फ उन्हें याद रखता है जो बड़े नामों में होते हैं। नेता, सेनापति, पुरस्कार विजेता लेकिन वो लोग जो दुश्मन के देश में दशकों [संगीत] से अपनी पहचान
Speaker A
छुपा कर जी रहे हैं। उनकी कहानी कोई नहीं लिखता। अजीत डोभाल ने एक बार कहा था। एक जासूस की सबसे बड़ी जीत वो होती [संगीत] है जब दुश्मन को पता भी नहीं होता कि उसे हार हो गई। पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम
Speaker A
15 साल पीछे हुआ। मेजो विद्रोह खत्म सिक्किम भारत का हिस्सा [संगीत] उरी के बाद पहली बार एलओसी पार इन सबके पीछे एक आदमी बिना बंदूक बिना वर्दी बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस उस मौलाना ने उस बंद कमरे में कहा था भारत से आने वाले लोगों को देखकर
Speaker A
मुझे बहुत खुशी होती है सरहद मजहब सियासत सबके बीच एक इंसान जो अपनी पहचान भूल गया लेकिन अपनी माटी को नहीं भूला देश के लिए जान देने का मतलब सिर्फ गोली खाना नहीं। अपनी पूरी जिंदगी किसी और के नाम से जीना
Speaker A
भी होता है। ऐसे वीर लोगों के लिए कमेंट में जय हिंद जरूर लिखें। दोस्तों, यह कहानी आपका दिल छू गई हो, तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और वीडियो शेयर जरूर करें। भारत माता की जय।
Topics:अजीत डोभालपाकिस्तान जासूसीआईएसआईखुफिया मिशनकाहूता रिसर्च सेंटरपरमाणु बमभारतीय पुलिस सेवाइंटेलिजेंस ब्यूरोसिक्योरिटी ऑपरेशनभारत-पाकिस्तान











