Speaker A
24 दिसंबर 1999, काठमांडू का त्रिभुवन एयरपोर्ट, शाम के 4:05। एक आदमी बोर्डिंग गेट से गुजरा, साधारण कपड़े, चेहरे पर कोई हड़बड़ाहट नहीं। आईसी 814 दिल्ली जाने वाली फ्लाइट। उसके पीछे चार और लोग थे, अलग-अलग गेट से, अलग-अलग सीटें, लेकिन एक ही मिशन। किसी ने किसी की तरफ देखा तक नहीं। 176 लोग सवार हुए, किसी को नहीं पता था कि एक बैग में जिंदा ग्रेनेड है। एक जेब में चाकू है। एक कमर पर पिस्तौल बंधी है। आतंकियों को पता था बिना खून के भारत नहीं झुकेगा। इसलिए उन्होंने वो आदमी चुना जो सबसे पहले हाथ आया। 25 साल, नया-नया शादीशुदा, हनीमून से लौट रहा था। रूपण कात्याल। उसकी पत्नी कुछ सीट आगे बैठी थी। उसे नहीं पता था कि उसका पति आखिरी सांसें गिन रहा है।











