D-Mart की बढ़ती बिक्री के बावजूद शेयर गिरावट का कारण और राधाकिशन दमानी की सफलता की कहानी।
Key Takeaways
- बिक्री और मुनाफा बढ़ने के बावजूद शेयर गिरावट का कारण सेम स्टोर सेल्स ग्रोथ में कमी है।
- राधाकिशन दमानी की गहरी वित्तीय समझ और धैर्य ने उन्हें सफल बनाया।
- D-Mart का मॉडल लागत नियंत्रण और लगातार कम कीमत पर आधारित है।
- ऑनलाइन और क्विक कॉमर्स से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, जिससे चुनौतियां सामने आई हैं।
- शेयर बाजार में निवेश और खुद का व्यवसाय चलाने के बीच फर्क समझना जरूरी है।
What the video covers
- D-Mart के 500वें स्टोर के खुलने और बढ़ती बिक्री के बावजूद शेयर गिरावट का विश्लेषण।
- राधाकिशन दमानी का बीकानेर से मुंबई तक का संघर्ष और शेयर बाजार में उनकी समझ।
- 1992 के हर्षद मेहता संकट में दमानी का विपरीत दांव और उसकी सफलता।
- शेयर बाजार से दूर होकर खुद का व्यवसाय शुरू करने का दमानी का निर्णय।
- D-Mart की स्थापना और किराना रिटेल मॉडल की खासियतें।
- कम कीमत पर लगातार बिक्री और लागत नियंत्रण D-Mart की ताकत।
- बिग बाजार जैसे प्रतिस्पर्धियों के बीच D-Mart की स्थिति।
- ऑनलाइन किराना और क्विक कॉमर्स के बढ़ते प्रभाव के बीच D-Mart की रणनीति।
- सेम स्टोर सेल्स ग्रोथ में गिरावट और शेयर गिरावट का संबंध।
- ग्राहक की सुविधा, कीमत और रिटेल मॉडल की चुनौतियां।
Chapters
- 00:00D-Mart की बिक्री के बावजूद शेयर गिरावट का रहस्य
- 02:21राधाकिशन दमानी का शुरुआती जीवन और शेयर बाजार की समझ
- 04:341992 का शेयर बाजार संकट और दमानी का विपरीत दांव
- 06:59शेयर बाजार से दूर होकर खुद का व्यवसाय शुरू करना
- 09:19D-Mart की स्थापना और किराना रिटेल का मॉडल
- 11:19D-Mart का लागत नियंत्रण और ग्राहक केंद्रित रणनीति
- 13:39प्रतिस्पर्धा, ऑनलाइन किराना और क्विक कॉमर्स की चुनौती
- 18:13सेम स्टोर सेल्स ग्रोथ में गिरावट और भविष्य की चुनौतियां
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Speaker A
रविवार की शाम DMA की पार्किंग फुल है। अंदर ट्रॉली खत्म हो चुकी है। बिलिंग की लाइन मुड़कर पीछे तक चली गई है। बाहर से देखो तो यह कंपनी अजय लगती है। उसी शाम दलाल स्ट्रीट की स्क्रीन पर उसका नाम लाल है। शेयर गिर रहा है। एक दिन से नहीं, महीनों से। बिक्री बढ़ी है। मुनाफा बढ़ा है। 500वां स्टोर खुल चुका है। फिर पैसा डर क्यों रहा है?
Speaker A
पर उसका नाम लाल है। शेयर गिर रहा है। एक दिन से नहीं [संगीत] महीनों से। बिक्री बढ़ी है। मुनाफा बढ़ा है। 500वां स्टोर खुल चुका है। फिर पैसा डर क्यों रहा है?
Speaker A
जवाब पूरी रिपोर्ट में नहीं था। जवाब उसमें छुपे एक छोटे से नंबर में था। ज्यादातर लोगों ने उसे पढ़ा तक नहीं। जिन्होंने पढ़ा उन्होंने अगली सुबह बेचना शुरू कर दिया। उस एक नंबर ने बता दिया कि DMA के सबसे पुराने और सबसे मजबूत स्टोर अब पहले जैसी रफ्तार से नहीं बढ़ रहे हैं। जहां कंपनी खुद को सबसे सुरक्षित समझती थी, सेंध ठीक वहीं लगी थी। और यह कंपनी उस आदमी की है जिसने कभी पूरे बाजार के खिलाफ अकेले दाम लगाया था और जीता था। तो सवाल सिर्फ शेयर का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि भारत का सबसे मजबूत रिटेल मॉडल हार रहा है या यह सिर्फ एक झटका है। इसका जवाब समझने के लिए हमें उसी आदमी तक लौटना होगा।
Speaker A
मजबूत स्टोर अब पहले जैसी रफ्तार से नहीं बढ़ रहे हैं। जहां कंपनी खुद को सबसे [संगीत] सुरक्षित समझती थी। सेंध ठीक वहीं लगी थी। और यह कंपनी उस आदमी की है जिसने कभी पूरे बाजार के खिलाफ अकेले दाम लगाया
Speaker A
कहानी राजस्थान के बीकानेर से शुरू होती है। एक साधारण मारवाड़ी परिवार, सीमित कमाई और हर खर्च का साफ हिसाब। इसी घर में राधाकिशन दमानी पैदा हुए। कुछ साल बाद परिवार मुंबई आ गया। मुंबई का घर कोई बड़ा फ्लैट नहीं था। एक कमरा और उसी कमरे में पूरा परिवार। पिता की एक छोटी सी बॉल बेयरिंग की दुकान थी। लोहे के छोटे पुरजे बेचकर इतना निकल आता कि घर चल जाए। इससे ज्यादा कुछ नहीं। राधाकिशन कॉलेज में थे। जिंदगी ने दिशा तय भी नहीं की थी कि पिता का अचानक निधन हो गया। वह उस वक्त सिर्फ 20 साल के थे। जिस उम्र में लड़के परीक्षा की चिंता करते हैं, उस उम्र में उनके सामने पूरे घर का खर्च खड़ा था। कॉलेज छूट गया और दुकान की चाबी हाथ में आ गई। लेकिन दुकान पर बैठे-बैठे उनकी नजर बार-बार एक दूसरी दुनिया की तरफ जाती थी। शेयर बाजार। उस वक्त का बाजार आज जैसा नहीं था। कोई स्क्रीन नहीं, कोई ऐप नहीं। एक बड़ा हॉल जहां लोग चिल्लाकर सौदे करते, हाथ के इशारों से भाव तय होते और कागज की पर्चियों पर कीमत लिखी जाती। शोर इतना कि आदमी को अपनी आवाज सुनाई ना दे। दमानी उस भीड़ में पहुंचे, लेकिन उन्होंने चिल्लाना नहीं सीखा। उन्होंने चुप रहकर पढ़ना सीखा। बाकी लोग टिप के पीछे भागते थे। किसी ने कहा यह शेयर चढ़ेगा। किसी ने कहा कल दोगुना होगा। दमानी कंपनी की सालाना रिपोर्ट खोल कर बैठ जाते। कंपनी बेचती क्या है? कमाती कितना है? कर्ज कितना है? और उसे चलाने वाला आदमी कैसा है? और सबसे आखिर में एक सवाल क्या यह कंपनी 10 साल बाद भी जिंदा रहेगी?
Speaker A
कहानी राजस्थान के बीकानेर से शुरू होती है। एक साधारण मारवाड़ी परिवार सीमित कमाई और हर खर्च का साफ हिसाब इसी घर में राधाकिशन दमानी पैदा हुए। कुछ साल बाद परिवार मुंबई आ गया। मुंबई का घर कोई बड़ा फ्लैट नहीं था। एक कमरा और उसी कमरे में
Speaker A
बाजार की चमक के बीच सफेद कमीज और सफेद पैंट पहना एक शांत आदमी। ना इंटरव्यू, ना दावा। लोग उन्हें मजाक में मिस्टर वाइट एंड वाइट कहने लगे। बाहर से वह धीमे लगते थे। अंदर हिसाब कई कदम आगे तक चलता था। और फिर आया 1992। उस वक्त एक ही नाम पूरे देश की जुबान पर था, हर्षद मेहता। वह जिस शेयर को छू लेते भाव भागने लगता। अखबार में तस्वीर, टीवी पर चर्चा और हर आदमी को लगता कि शेयर बाजार दुनिया का सबसे आसान धंधा है। सब्जी बेचने वाला भी पूछ रहा था कि कौन सा शेयर लूं?
Speaker A
का अचानक निधन हो गया। वह उस वक्त सिर्फ 20 साल के थे। जिस उम्र में लड़के परीक्षा की चिंता करते हैं, उस उम्र में उनके सामने पूरे घर का खर्च खड़ा था। कॉलेज छूट गया और दुकान की चाबी हाथ में आ गई। लेकिन
Speaker A
लोग घर गिरवी रखकर पैसा लगा रहे थे। हर सुबह नया रिकॉर्ड बनता। हर शाम कोई नया करोड़पति बनता। बाजार में एक ही भरोसा था। भाव अब कभी नीचे नहीं आएगा। इसी भीड़ के बीच दमानी को कुछ और दिखा। जिन कंपनियों के शेयर आसमान छू रहे थे, उनकी असली कमाई उस कीमत के आसपास भी नहीं थी। कारोबार मामूली, हालत मामूली फिर भाव असाधारण क्यों? हिसाब कहीं मेल नहीं खा रहा था। और यहां उन्होंने वह फैसला लिया जो उस वक्त आत्महत्या जैसा दिखता था। उन्होंने बाजार गिरने पर दांव लगा दिया। सीधी भाषा में पूरा देश ऊपर जाने की शर्त लगा रहा था और वह अकेले नीचे आने की। शुरुआत में भीड़ सही निकली। शेयर और चढ़े, नुकसान हुआ। अगले दिन बाजार फिर चढ़ा, नुकसान गहरा हुआ। फिर अगला हफ्ता, फिर अगला महीना। हर सुबह वही सवाल सामने खड़ा होता। हिसाब गलत है या सच सामने आने में अभी देर है। आसपास के लोग हंसने लगे। कोई कहता यह आदमी बर्बाद हो जाएगा। कोई कहता यह समझदारी नहीं जिद है। नुकसान अब उस जगह पहुंच चुका था जहां बाजार थोड़ा और ऊपर टिक जाता तो बरसों की कमाई खत्म हो जाती। जिस आदमी ने 20 साल की उम्र में पिता खोकर घर संभाला था, वह अब उसी घर की सुरक्षा दांव पर लगाकर खड़ा था। भरोसा अपनी गिनती पर था और बाजार हर दिन उसे गलत साबित कर रहा था। यही वह जगह है जहां ज्यादातर लोग टूट जाते हैं। फिर एक खबर ने पूरा खेल पलट दिया। सामने आया कि बाजार में घूम रहा बहुत सारा पैसा असली निवेश का था ही नहीं। बैंकिंग के रास्तों का गलत इस्तेमाल करके शेयर ऊपर धकेले जा रहे थे। खबर फैलते ही खरीदने वालों की भीड़ बेचने पर उतर आई। जो भाव रुकने का नाम नहीं ले रहे थे वे नीचे लुढ़कने लगे। पहले हल्की गिरावट, फिर तेज फिसलन और फिर ऐसा धड़ाम कि बाजार का सबसे चमकदार साम्राज्य मलबे में बदल गया। उधार लेकर पैसा लगाने वालों के घर बिक गए। बड़े नाम गायब हो गए और उसी मलबे के बीच दमानी का महीनों पुराना दांव सही साबित हुआ। जमा हुआ नुकसान कुछ ही दिनों में बड़े मुनाफे में बदल गया। उस एक फैसले ने उन्हें बाजार के सबसे तेज दिमागों में शामिल कर दिया। लेकिन उस जीत की असली कमाई पैसा नहीं थी। बाजार में शेयर खरीदना मुश्किल नहीं होता। मुश्किल यह होता है कि आपके पास वजह हो और फिर भी महीनों तक सबके सामने गलत दिखते रहे। दमानी वह परीक्षा पार कर चुके थे। लोगों को लगा अब वह और बड़े सट्टे लगाएंगे। उन्होंने ठीक उल्टा किया। वह धीरे-धीरे ट्रेडिंग से दूर होने लगे। जिस जगह से इतना पैसा बना उसे छोड़ने का फैसला किसी को समझ नहीं आया। दमानी की वजह सीधी थी। शेयर बाजार में आप किसी और की कंपनी पर दांव लगाते हैं। कंपनी आपकी नहीं होती, फैसले आपके नहीं होते। मालिक एक गलत कदम उठा दे और आपका पूरा हिसाब बिखर जाए। उन्हें ऐसा कारोबार चाहिए था, जिसमें माल उनका हो, जमीन उनकी हो, और आखिरी फैसला भी उनका हो। अब सवाल था, कारोबार कौन सा? फैक्ट्री उनका मैदान नहीं था। टेक्नोलॉजी उनसे कोसों दूर थी।
Speaker A
पर्चियों पर कीमत लिखी जाती। शोर इतना कि आदमी को अपनी आवाज सुनाई ना दे। दमानी उस भीड़ में पहुंचे, लेकिन उन्होंने चिल्लाना नहीं सीखा। उन्होंने चुप रहकर पढ़ना सीखा। बाकी लोग टिप के पीछे भागते थे। किसी ने कहा यह शेर [संगीत] चढ़ेगा। किसी ने कहा
Speaker A
तभी उनकी नजर उस चीज पर गई जो हर घर में हर महीने पहुंचती है। आटा, चावल, तेल, साबुन। सरकार बदले, बाजार गिरे, मंदी आ जाए। कोई परिवार राशन खरीदना बंद नहीं करता। लेकिन किराना आसान धंधा नहीं था। एक पैकेट पर मुनाफा बहुत कम, माल की गिनती बहुत ज्यादा और थोड़ी सी लापरवाही पूरी कमाई खा जाए। बड़ी-बड़ी कंपनियां इसमें उतर कर पिट चुकी थीं। तो दमानी ने अपनी दुकान खोलने की जल्दी नहीं की। 1999 के आसपास उन्होंने नवी मुंबई के नेरुल में अपना बाजार की एक फ्रेंचाइजी ले ली। यानी शेयर बाजार का बड़ा खिलाड़ी अब किसी और के नाम की किराना दुकान चला रहा था। वह देखना चाहते थे कि माल किस रास्ते से आता है। कौन सा सामान तेज बिकता है। कौन सा पैकेट महीनों शेल्फ पर पड़ा रहता है। बिलिंग कहां अटकती है और नुकसान कहां से रिचता है। दो-तीन साल में उन्हें रिटेल का असली नियम मिल गया। यह धंधा दुकान की सजावट का नहीं है। यह धंधा लागत और घूमते हुए माल का है। लागत पकड़ ली तो सस्ता बेचकर भी बचा जा सकता है। लागत हाथ से निकल गई तो भीड़ के बावजूद डूबना तय है। 2002 में मुंबई के पवई में पहला डीमार्ट खुला। उस स्टोर में चमकता संगमरमर नहीं था। महंगी रोशनी नहीं थी। ग्राहक को लुभाने वाला संगीत नहीं था। एक बड़ा सादा हॉल, लोहे के रैक, ऊपर तक भरा सामान और हर तरफ कीमत के बोर्ड। पहली नजर में वह सुपर मार्केट कम, गोदाम ज्यादा लगता था। लोग सजावट ढूंढ रहे थे और दमानी हर उस चीज पर पैसा बचा रहे थे जिसका ग्राहक के राशन से कोई लेना देना नहीं था। उन्हें पता था कि मध्यम वर्ग दुकान की छत देखने नहीं आता, अपना बिल घटाने आता है। पहली ताकत थी हर दिन कम दाम। बाकी स्टोर त्यौहार पर सेल लगाते, कुछ दिन कीमत गिराते और फिर ऊपर ले जाते। दमानी ने ग्राहक को सेल का इंतजार ही नहीं कराया। वादा यह था कि जिस दिन आओगे उस दिन सस्ता मिलेगा।
Speaker A
और उसे चलाने वाला आदमी कैसा है? और सबसे आखिर में एक सवाल क्या यह कंपनी 10 साल बाद भी जिंदा रहेगी? बाजार [संगीत] की चमक के बीच सफेद कमीज और सफेद पैंट पहना एक शांत आदमी। ना इंटरव्यू [संगीत] ना दावा।
Speaker A
इसका असर सिर्फ एक दिन की बिक्री पर नहीं पड़ा। धीरे-धीरे ग्राहक के दिमाग में डीमार्ट का मतलब ही सस्ता राशन हो गया। भाव पूछने के लिए दूसरी दुकान जाने की जरूरत खत्म हो गई। लेकिन कम दाम का बोर्ड लगाना आसान है। कम दाम पर बचना मुश्किल है। इसके लिए खरीद का तरीका बदलना पड़ा। उस वक्त सामान कंपनी से बड़े डिस्ट्रीब्यूटर, फिर छोटे डिस्ट्रीब्यूटर, फिर होलसेलर और आखिर में दुकान तक पहुंचता था। हर हाथ अपना हिस्सा जोड़ता जाता। DMA ने जहां हो सका बीच की परतें हटाकर कंपनियों से सीधी खरीद शुरू की। ब्रांड कम रखे लेकिन चुने हुए ब्रांड का माल बहुत ज्यादा उठाया। असली बढ़त पेमेंट में मिली। रिटेल की दुकानें 30, 60 या 90 दिन के उधार पर माल लेती थीं। सामान बिक जाता और बनाने वाली कंपनी अपने पैसे का इंतजार करती रहती। DMA ने नियम बनाया कि सप्लायर को बहुत जल्दी भुगतान होगा। अब कंपनी के सामने दो ग्राहक थे। एक 3 महीने बाद पैसा देगा, दूसरा कुछ ही दिनों में। बेहतर भाव किसे मिलेगा यह बताने की जरूरत नहीं। यह फायदा कागज पर एक-दो प्रतिशत का दिखता है। लेकिन करोड़ों के कारोबार में वही छोटा फर्क पूरे मुनाफे की नींव बन गया। तीसरा फैसला उस वक्त सबसे महंगा और सबसे धीमा दिखता था। दमानी ने क...
Speaker A
जिस शेयर को छू लेते भाव भागने [संगीत] लगता। अखबार में तस्वीर, टीवी पर चर्चा और हर आदमी को लगता कि शेयर बाजार दुनिया का सबसे आसान [संगीत] धंधा है। सब्जी बेचने वाला भी पूछ रहा था कि कौन सा शेयर लूं?
Speaker A
लोग घर गिरवी रखकर पैसा लगा रहे थे। हर [नाक से की जाने वाली आवाज़] सुबह नया रिकॉर्ड बनता। हर शाम कोई नया करोड़पति बनता। बाजार में एक ही भरोसा था। भाव अब कभी नीचे नहीं आएगा। इसी भीड़ के बीच
Speaker A
दमानी को [संगीत] कुछ और दिखा। जिन कंपनियों के शेयर आसमान छू रहे थे, उनकी असली कमाई उस कीमत के आसपास भी नहीं थी। कारोबार मामूली, हालत मामूली फिर भाव असाधारण क्यों? हिसाब कहीं मेल नहीं खा रहा था। और यहां उन्होंने वह फैसला लिया
Speaker A
जो उस वक्त आत्महत्या जैसा दिखता था। उन्होंने बाजार गिरने पर दांव लगा दिया। सीधी भाषा में पूरा देश ऊपर जाने की शर्त लगा रहा था और वह अकेले नीचे आने की। शुरुआत में भीड़ सही निकली। शेयर और चढ़े
Speaker A
नुकसान हुआ। अगले दिन बाजार फिर चढ़ा नुकसान गहरा हुआ। फिर अगला हफ्ता फिर अगला महीना। हर सुबह वही सवाल सामने खड़ा होता। हिसाब गलत है या सच सामने आने में अभी देर है। आसपास के लोग हंसने लगे। कोई कहता यह
Speaker A
आदमी बर्बाद हो जाएगा। कोई कहता यह समझदारी नहीं जिद है। नुकसान अब उस जगह पहुंच चुका था जहां बाजार थोड़ा और ऊपर टिक जाता तो बरसों की कमाई खत्म हो जाती। जिस आदमी ने 20 साल की उम्र में पिता खोकर
Speaker A
घर संभाला था। वह अब उसी घर की सुरक्षा दाम पर लगाकर [संगीत] खड़ा था। भरोसा अपनी गिनती पर था और बाजार हर दिन उसे गलत साबित कर रहा था। यही वह जगह है जहां ज्यादातर लोग टूट जाते हैं। फिर एक खबर ने
Speaker A
[संगीत] पूरा खेल पलट दिया। सामने आया कि बाजार में घूम रहा बहुत सारा पैसा असली निवेश का [संगीत] था ही नहीं। बैंकिंग के रास्तों का गलत इस्तेमाल करके शेयर ऊपर धकेले जा रहे थे। खबर फैलते ही खरीदने वालों की भीड़ बेचने पर उत्तर आई। जो भाव
Speaker A
रुकने का नाम नहीं ले रहे थे वे नीचे लुढ़कने लगे। पहले हल्की गिरावट, फिर तेज फिसलन और फिर ऐसा धड़ाम कि बाजार का सबसे चमकदार साम्राज्य मलबे में बदल गया। उधार लेकर पैसा लगाने वालों के घर बिक गए। बड़े
Speaker A
नाम गायब हो गए और उसी मलबे के बीच दमानी का महीनों पुराना दांव सही साबित हुआ। जमा हुआ नुकसान कुछ ही दिनों में बड़े मुनाफे में बदल गया। उस एक फैसले ने उन्हें बाजार के सबसे तेज दिमागों [संगीत] में शामिल कर
Speaker A
दिया। लेकिन उस जीत की असली कमाई पैसा नहीं थी। बाजार में शेयर खरीदना मुश्किल नहीं होता। मुश्किल यह होता है कि आपके पास वजह हो और फिर भी महीनों तक सबके सामने गलत [संगीत] दिखते रहे। दमानी वह परीक्षा पार कर चुके थे। लोगों को लगा अब
Speaker A
वह और बड़े सट्टे लगाएंगे। उन्होंने ठीक उल्टा किया। वह धीरे-धीरे ट्रेडिंग से दूर [संगीत] होने लगे। जिस जगह से इतना पैसा बना उसे छोड़ने का फैसला किसी को समझ नहीं आया। दमानी की वजह सीधी थी। शेयर बाजार में आप किसी और की कंपनी पर दांव लगाते
Speaker A
हैं। कंपनी आपकी नहीं होती फैसले आपके नहीं होते। मालिक एक गलत कदम उठा दे और आपका पूरा हिसाब बिखर जाए। उन्हें ऐसा कारोबार चाहिए था, जिसमें माल उनका हो, जमीन उनकी हो, और आखिरी फैसला भी उनका हो। अब सवाल था, कारोबार कौन सा? फैक्ट्री
Speaker A
उनका मैदान नहीं था। टेक्नोलॉजी उनसे कोसों दूर थी। [संगीत] तभी उनकी नजर उस चीज पर गई जो हर घर में हर महीने पहुंचती है। [संगीत] आटा, चावल, तेल, साबुन। सरकार बदले, बाजार गिरे, मंदी आ जाए। कोई परिवार राशन खरीदना बंद नहीं करता लेकिन किराना
Speaker A
आसान धंधा नहीं था। एक पैकेट पर मुनाफा बहुत कम, माल की गिनती बहुत ज्यादा और थोड़ी सी लापरवाही पूरी कमाई खा जाए। बड़ी-बड़ी कंपनियां इसमें उतर कर पिट चुकी थी। तो दमानी ने अपनी दुकान खोलने की जल्दी नहीं की। 1999 के आसपास उन्होंने
Speaker A
नवी मुंबई के नेरुल में अपना बाजार की एक फ्रेंचाइजी ले ली। यानी शेयर बाजार का बड़ा खिलाड़ी अब किसी और के नाम की किराना दुकान चला रहा था। वह देखना चाहते थे कि माल किस रास्ते से आता है। कौन सा सामान
Speaker A
तेज बिकता है। कौन सा पैकेट महीनों शेलफ पर पड़ा रहता है। बिलिंग कहां अटकती है और नुकसान कहां से रिचता है। दो-ती साल में उन्हें रिटेल का असली नियम मिल गया। यह धंधा दुकान की सजावट का नहीं है। यह धंधा
Speaker A
लागत और घूमते हुए माल का है। लागत पकड़ ली तो सस्ता बेचकर भी बचा जा सकता है। लागत हाथ से निकल गई तो भीड़ के बावजूद डूबना तय है। 2002 में मुंबई के पवई में पहला डीमार्ट खुला। उस स्टोर में चमकता संगमरमर नहीं
Speaker A
था। महंगी रोशनी नहीं थी। ग्राहक को लुभाने वाला संगीत नहीं था। एक बड़ा सादा हॉल, लोहे के रैक, ऊपर तक भरा सामान और हर तरफ कीमत के बोर्ड। पहली नजर में वह सुपर मार्केट कम, गोदाम ज्यादा लगता था। लोग
Speaker A
सजावट ढूंढ रहे थे [संगीत] और दमानी हर उस चीज पर पैसा बचा रहे थे जिसका ग्राहक के राशन से कोई लेना देना नहीं था। उन्हें पता था कि मध्यम वर्ग दुकान की छत देखने नहीं आता अपना बिल घटाने आता है। पहली
Speaker A
ताकत थी हर दिन कम दाम। बाकी स्टोर त्यौहार पर सेल लगाते कुछ दिन कीमत गिराते और फिर ऊपर ले जाते। दमानी ने ग्राहक को सेल का इंतजार ही नहीं कराया। वादा यह था कि जिस दिन आओगे उस दिन सस्ता मिलेगा।
Speaker A
इसका असर सिर्फ एक दिन की बिक्री पर नहीं पड़ा। धीरे-धीरे ग्राहक के दिमाग में डीमार्ट का मतलब ही सस्ता राशन हो गया। भाव पूछने के लिए दूसरी दुकान जाने की जरूरत खत्म हो गई। लेकिन कम दाम का बोर्ड
Speaker A
लगाना आसान है। कम दाम पर बचना मुश्किल है। इसके लिए खरीद का तरीका बदलना पड़ा। उस वक्त सामान कंपनी से बड़े डिस्ट्रीब्यूटर, फिर छोटे डिस्ट्रीब्यूटर, फिर होलसेलर और आखिर में दुकान तक पहुंचता था। हर हाथ अपना हिस्सा जोड़ता [संगीत]
Speaker A
जाता। dमar ने जहां हो सका बीच की परतें हटाकर कंपनियों से सीधी खरीद शुरू की। ब्रांड कम रखे लेकिन चुने हुए ब्रांड का माल बहुत ज्यादा उठाया। असली बढ़त पेमेंट में मिली। रिटेल की दुकानें 30, 60 या 90
Speaker A
दिन के उधार पर माल लेती थी। सामान बिक जाता और बनाने वाली कंपनी अपने पैसे का इंतजार करती रहती। dमar ने नियम बनाया कि सप्लायर को बहुत जल्दी [संगीत] भुगतान होगा। अब कंपनी के सामने दो ग्राहक थे। एक
Speaker A
3 महीने बाद पैसा देगा दूसरा कुछ ही दिनों में। बेहतर भाव किसे मिलेगा यह बताने की जरूरत नहीं। यह फायदा कागज पर एक दो% का दिखता है। लेकिन करोड़ों के कारोबार में वही छोटा फर्क पूरे मुनाफे की नींव बन
Speaker A
गया। तीसरा फैसला उस वक्त सबसे महंगा और सबसे धीमा दिखता था। दमानी ने कहा जहां तक हो [संगीत] सके स्टोर की जमीन खरीदो किराए पर मत लो। दूसरे कारोबारी उतने ही पैसे में चारप किराए के स्टोर खोल रहे थे और
Speaker A
डीमार्ट का पैसा ईंट में फंसा दिखता था। लेकिन उनका हिसाब एक तिमाही का नहीं था। किराया हर साल बढ़ता है। मालिक शर्तें बदल सकता है और अच्छी चलती दुकान को जगह छोड़ने पर मजबूर कर सकता है। अपनी जमीन पर
Speaker A
यह खतरा है ही नहीं। साल गुजरते गए और जिन इलाकों में dमar ने जमीन खरीदी थी, उनकी कीमत कई गुना हो गई। किराए पर चलने वाले स्टोर की कमाई का बड़ा हिस्सा हर महीने मकान मालिक के पास जाता रहा। dमar के लिए
Speaker A
वही इमारत एक स्थाई संपत्ति बन गई। बाहर से वह राशन बेच रही थी। अंदर चुपचाप ऐसी जमीन जमा कर रही थी जिसकी असली कीमत उसके पुराने खातों में पूरी दिखती भी नहीं थी। चौथा फैसला रफ्तार का था। 2002 में पहला
Speaker A
स्टोर खुला और अगले 9 साल में कुल 25 स्टोर हुए। पैसा था, पहचान थी। बैंक कर्ज देने को तैयार थे। फिर भी कंपनी दौड़ी नहीं। नियम था एक स्टोर को मुनाफे में लाओ फिर अगला खोलो। जगह भी वहीं चुनी जाती
Speaker A
जहां घनी बस्ती हो और ऐसे परिवार हो जो महीने का सामान एक [संगीत] साथ खरीदते हैं। dमar को महंगी सड़क पर चमकता पता नहीं [संगीत] चाहिए था। उसे ऐसी बस्ती चाहिए थी जो बार-बार लौटे। अंदर भी विकल्प सीमित रखे गए। दूसरे सुपर मार्केट एक ही
Speaker A
साबुन के 20 विकल्प रखते थे। dमar सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्रांड और पैक चुनता था। कम विकल्प मतलब हर चीज की बड़ी खरीद। बड़ी खरीद मतलब कम कीमत। कम कीमत मतलब ज्यादा ग्राहक ज्यादा ग्राहक मतलब माल तेजी से खत्म। और तेजी से खत्म होने वाले
Speaker A
माल का मतलब है शेलफ पर फंसा हुआ पैसा कम। यह चक्र जितना घूमता कंपनी उतनी मजबूत होती जाती। इसीलिए बाकी लोग नकल करके भी वही नतीजा नहीं ला पाए। उन्होंने रैक वैसे ही लगाए और कीमत के बड़े बोर्ड भी [संगीत]
Speaker A
टांग दिए। लेकिन जगह किराए पर ली, सजावट पर खर्च किया। जरूरत से ज्यादा ब्रांड रखे और सप्लायर को देर से पैसा दिया। फिर हैरान होते रहे कि dमar जितना सस्ता क्यों नहीं बेच पा रहे? रिटेल में ग्राहक को
Speaker A
दिखने वाला दाम आखिरी [संगीत] खड़ी होता है। उसकी शुरुआत जमीन के सौदे और गोदाम में रखे पैकेट से होती है। दमानी का तरीका छुपा हुआ नहीं था। दिक्कत यह थी कि उसे अपनाने के लिए कई साल तक धीमा और मामूली
Speaker A
दिखने का साहस चाहिए था। और ठीक उसी वक्त देश में एक दूसरी कहानी बहुत तेज रफ्तार से बन रही थी। ₹3000 करोड़ का विशाल समूह 2000 से ज्यादा आउटलेट हर शहर में चमकता लाल बोर्ड फ्यूचर ग्रुप और उसका चेहरा था
Speaker A
किशोर बयानी। दोनों ने भारत के बदलते ग्राहक को सबसे पहले पहचाना [संगीत] था। लेकिन रास्ता बिल्कुल उलटा चुना। किशोर बयानी का बिग बाजार त्यौहार जैसा था। बड़े मॉल, चमकती रोशनी, ऊंचे स्पीकर, भारी छूट के दिन और हर कुछ महीने में नया शहर।
Speaker A
डीमार्ट राशन की दुकान जैसा था। सफेद ट्यूबलाइट, [संगीत] साधारण फर्श, सीमित सामान और कई बार शहर के किनारे की जगह। बयानी का तरीका रफ्तार मांगता था। नए स्टोर, [संगीत] नए ब्रांड, नई कंपनियां। पहले पैंटालूंस फिर बिग बाजार फूड बाजार
Speaker A
सेंट्रल और बाकी नाम उनका मानना था कि जो जगह पहले घेर लेगा वही भारत की रिटेल पर राज करेगा। किशोर बियानी का बिग बाजार अखबारों और टीवी पर छाया हुआ था। चमकीले पीले लाल बोर्ड, ऊंची आवाज में ऑफर और एक
Speaker A
ही छत के नीचे राशन से लेकर कपड़े, बर्तन और इलेक्ट्रॉनिक्स तक सब कुछ। खास सेल के दिन लोग सुबह 4:00 बजे से लाइन में लग जाते। कई जगह भीड़ संभालने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती। गेट खुलते ही ग्राहक अंदर
Speaker A
दौड़ते और अगले दिन अखबार में तस्वीर छपती। वह नजारा देखकर लगता था कि भारत का रिटेल भविष्य बिग बा ने पकड़ लिया है और डीमार्ट कहीं बहुत पीछे रह गया है। बिग बा एक शहर के बाद दूसरे शहर में फैलता जा रहा
Speaker A
था। हर नया स्टोर कंपनी को बड़ा दिखाता था। लेकिन उसके पीछे एक बोझ भी बढ़ रहा था जो बाहर से किसी को नहीं दिखता था। किराया, सजावट, [संगीत] कर्मचारी, विज्ञापन और स्टॉक यह सब कमाई से नहीं हो सकता था। इसलिए बैंक का कर्ज साथ-साथ चलता
Speaker A
गया। जब बिक्री तेज हो, [संगीत] कर्ज बोझ नहीं लगता, हथियार लगता है। नया कर्ज, नया स्टोर [संगीत] खोलता है। नया स्टोर नई बिक्री दिखाता है और वही बिक्री अगले कर्ज का भरोसा बन जाती है। दिक्कत तब आती है जब
Speaker A
यह पहिया [संगीत] एक बार भी रुक जाए। इसी बीच डीमार्ट के अंदर एक जरूरी बदलाव हुआ। 2004 में कंपनी ने नेविल नोरोनहा को नौकरी पर रखा। वह हिंदुस्तान यूनilver में सेल्स देखते थे और उसी लेनदेन के दौरान दमानी ने
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उन्हें परख लिया था। 2007 में उन्हें कंपनी चलाने [संगीत] की जिम्मेदारी मिल गई। दमानी मालिक रहे। लेकिन रोज के फैसलों में परिवार के किसी आदमी को बैठाने के बजाय एक पेशेवर पर भरोसा किया। नोन्हा ने कंपनी की सोच बदले बिना उसके फैलाव की
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मशीन तैयार कर दी। अब धीरे चलने वाली कंपनी ने संभलकर रफ्तार पकड़ी। 25 स्टोर 100 हुए फिर 200 फिर 300 [संगीत] के पार और 2017 में डीमार्ट शेयर बाजार में उतरी। पहले ही दिन शेयर का भाव दो [संगीत] गुने
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से ज्यादा हो गया। सफेद कपड़ों वाला चुप आदमी अचानक भारत के सबसे अमीर लोगों [संगीत] की सूची में बहुत ऊपर पहुंच गया। निवेशकों को इसमें वह सब [संगीत] दिख रहा था जो किसी रिटेल कंपनी में मुश्किल से मिलता है। लगभग शून्य कर्ज, अपनी जमीन,
Speaker A
लगातार बढ़ती बिक्री और दिखावे से दूर रहने वाला मालिक। शेयर जितना चढ़ता भरोसा उतना बढ़ता। किसी ने कहा कि शेयर महंगा है तो जवाब मिलता कि अच्छी कंपनी सस्ती नहीं मिलती। लेकिन इसी उत्साह में एक खतरा छुपा हुआ था। जब किसी शेयर की कीमत बहुत ऊंची
Speaker A
हो जाती है तो बाजार उस कंपनी से सामान्य बढ़त नहीं मांगता। वह लगभग बेदाग भविष्य मांगता है। आने वाले कई सालों का मुनाफा आज की कीमत में पहले ही जोड़ दिया जाता है। ऐसी हालत में अच्छी रिपोर्ट सिर्फ
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[संगीत] उम्मीद पूरी करती है और हल्की सी कमजोरी पूरी कीमत हिला देती है। यानी dमar जितना मजबूत [संगीत] होता जा रहा था, गलती की गुंजाइश उतनी ही कम होती जा रही थी। उस वक्त यह डर बहुत दूर की बात लगती थी।
Speaker A
बिक्री बढ़ रही थी और सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी भीड़ से भरा हुआ था। फिर 2020 आया और उसने दोनों मॉडलों की असली ताकत एक ही झटके में सामने रख दी। देश में तालाबंदी लग गई। मॉल बंद, सड़कें [संगीत] खाली, लोग घरों में कैद। रिटेल की पूरी
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कमाई इस एक बात पर टिकी थी कि ग्राहक स्टोर तक आए और अब ग्राहक निकल ही नहीं सकता था। dमar के कई स्टोर बंद रहे। कई जगह सिर्फ जरूरी सामान बेचने की इजाजत मिली। बिक्री गिरी, मुनाफा गिरा। लेकिन
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उसके पास एक ढाल थी। बड़ी जगहें उसकी अपनी थी और सिर पर भारी कर्ज नहीं था। कमाई रुकी तो तकलीफ हुई। मगर हर महीने का किराया और बैंक की मोटी किश्त [संगीत] उसका गला नहीं दबा रही थी। बिग बाजार के
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लिए यही रुकावट जानलेवा बन गई। स्टोर बंद थे। किराया बंद नहीं हुआ। बिक्री नहीं थी। कर्ज की तारीख आगे नहीं खिसकी। पहले कुछ महीने कंपनी ने किसी तरह कांटे फिर बकाया चढ़ने लगा। सप्लायर को समय पर पैसा नहीं
Speaker A
मिला तो नया माल आना कम हो गया। शेलफ खाली दिखने लगे। जो ग्राहक खाली हाथ लौटा वह अगली बार आया ही नहीं। जिस कंपनी के गेट पर कभी [संगीत] भीड़ संभालने के लिए पुलिस आती थी, उसके पास स्टोर भरने के लिए नकदी
Speaker A
नहीं बची। सौदों और कानूनी लड़ाईयों के बाद [संगीत] वह नाम बाजार से गायब हो गया और उसके कई स्टोर Reliance के पास चले गए। बिग बाजार खराब आईडिया की वजह से नहीं हारा। ग्राहक उसके पास थे। पहचान [संगीत]
Speaker A
भी मजबूत थी। वह सिर्फ इसलिए गिरा क्योंकि उसका पूरा फैलाव ऐसे कर्ज और किराए पर खड़ा था जो कारोबार रुकने पर भी चुकाना [संगीत] ही था। और दमानी का बरसों पुराना धीमा फैसला उसी संकट में ढाल बन गया।
Speaker A
तालाबंदी खुली तो डीमार्ट का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मैदान से बाहर था। स्टोर फिर भरे बिक्री लौटी और लगा कि कम दाम अपनी जमीन और बिना कर्ज वाला मॉडल भारत के रिटेल की आखिरी जीत है। लेकिन ठीक उसी तालाबंदी में [संगीत] कुछ नई कंपनियां
Speaker A
ग्राहक के फोन के अंदर अपनी जगह बना रही थी। ऑनलाइन किराना पहले से था। मगर अचानक करोड़ों लोगों ने पहली बार फोन से राशन मंगाना शुरू किया। जो आदत मजबूरी में बनी वह सुविधा बनकर रह गई और यहीं से डीमार्ट
Speaker A
की आज की सबसे बड़ी लड़ाई शुरू होती है। उसके सामने अब बिग बाजार जैसा एक प्रतिद्वंद भी नहीं था। सामने तीन अलग तरह के दुश्मन थे और हर एक उसकी पुरानी ताकत पर अलग जगह से हमला कर रहा था। पहला हमला
Speaker A
आया क्विक कॉमर्स से। ब्लिंकिट जेप्टो और sविg instाam ने कहा ग्राहक दुकान तक क्यों आए? दुकान उसके घर जाएगी 10 या 15 मिनट में। dमar का सबसे मजबूत ग्राहक [संगीत] वह परिवार था जो महीने में एक बार आता ट्रॉली भरता और चला जाता। क्विक
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कॉमर्स ने उसी ट्रॉली को छोटे-छोटे आर्डर में तोड़ दिया। दूध खत्म हुआ फोन उठाओ। बिस्किट चाहिए फोन उठाओ। साबुन याद आया फोन उठाओ। अब महीने की बड़ी खरीद का एक हिस्सा रोज के मोबाइल आर्डर में जाने लगा। यहीं डीमार्ट की पुरानी जगह भी कमजोरी बन
Speaker A
गई। शहर के किनारे का बड़ा स्टोर कार से महीने भर का सामान लेने के लिए सही था। लेकिन 2 किलो चीनी के लिए कोई 8 कि.मी.
Speaker A
क्यों जाए? क्विक कॉमर्स ने शहर के बीच में छोटे डार्क स्टोर बनाए जहां ग्राहक [संगीत] आता ही नहीं। सिर्फ डिलीवरी वाले आते हैं और 10 मिनट में सामान घर पहुंचता है। दूसरा हमला ई-कॉमर्स से था। Amazon, Flipkart और Jio के पास लगभग अनंत विकल्प
Speaker A
थे। DMR जानबूझकर सीमित [संगीत] ब्रांड रखता था। पहले यही ताकत थी। अब ग्राहक फोन पर कीमत मिलाता, [संगीत] रिव्यू पढ़ता और उसी सामान का दूसरा ब्रांड चुन लेता। भौतिक स्टोर की शेलफ की सीमा थी इंटरनेट की नहीं। तीसरा हमला छोटे लोकल स्टोर से
Speaker A
आया जो WhatsApp पर आर्डर लेने लगे। जिस किराना दुकान को डीमार्ट ने 20 साल पहले हराया था। वह अब बाइक पर सामान घर भेज रही थी। उसके पास ग्राहक का नाम था, घर का पता था और उधार का पुराना रिश्ता भी। उसने
Speaker A
तकनीक सीख ली लेकिन dमar की तरह बड़ी इमारत का खर्च नहीं उठाया। तीनों तरफ से हमला एक साथ हुआ। dमar ने जवाब में अपनी ऑनलाइन [संगीत] सेवा dमar रेडी शुरू की। कहीं घर पहुंचाना, कहीं पिकअप [संगीत] पॉइंट। लेकिन समस्या वहीं थी जो उसके
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स्वभाव में थी। वह गलती करने से डरती थी और ऑनलाइन की दुनिया गलती करते हुए सीखने वालों की थी। क्विक कॉमर्स कंपनियां हर हफ्ते कुछ नया आजमा रही थी। dमar हर बदलाव को नाप कर आगे बढ़ रही थी। उनके पास घूमने
Speaker A
लायक [संगीत] बड़े स्टोर नहीं थे। महंगा फर्श नहीं था। लंबी बिलिंग लाइन नहीं [संगीत] थी। पार्किंग नहीं थी। उनका पूरा वादा दो शब्दों में था। 10 मिनट। दूध खत्म हो गया। फोन उठाइए। मेहमान आ गए। फोन उठाइए। ब्लिंकिट जेप्टो और स्विमार्ट जैसे
Speaker A
नाम तेजी से शहरों [संगीत] में फैलने लगे। पहला ऑन ऑर्डर जादू जैसा लगता है। दूसरा सुविधा लगता है और तीसरे तक पहुंचते-पहुंचते वही सुविधा आदत बन जाती है। इस रफ्तार के पीछे डार्क स्टोर का जाल था। डार्क स्टोर यानी एक छोटी सी गोदाम
Speaker A
नुमा जगह जहां ग्राहक कभी नहीं आता। मोहल्ले के बीच गली के पीछे किसी बेसमेंट में। अंदर सिर्फ तेज बिकने वाला सामान, उसे उठाने वाले कर्मचारी और बाहर तैयार खड़ी बाइक। ऑन ऑर्डर आते ही सामान बैग में जाता है और सवार सबसे छोटे रास्ते से निकल
Speaker A
जाता है। एक बड़े सुपर मार्केट जितने पैसे में शहर के अलग-अलग हिस्सों में कई डार्क स्टोर बन जाते थे। जितने ज्यादा डार्क स्टोर ग्राहक से उतनी कम दूरी। दूरी घटी तो डिलीवरी तेज हुई। तेजी ने ज्यादा ऑर्डर खींचे और ज्यादा ऑर्डर ने उसी छोटी जगह से
Speaker A
ज्यादा [संगीत] बिक्री निकाल दी। dमar ने अपना चक्र कीमत पर बनाया था। यह चक्र समय [संगीत] पर बन रहा था। फर्क सिर्फ इतना था कि इस चक्र को घुमाने के लिए निवेशकों का पैसा जलाया जा रहा था। ग्राहक को छूट,
Speaker A
मुफ्त डिलीवरी, पैकिंग, बाइक वाले का भुगतान, [संगीत] डार्क स्टोर का किराया और ऐप पर विज्ञापन। सब जोड़ने पर एक ऑर्डर का हिसाब अक्सर घाटे में बैठता था। फिर भी कोई पीछे नहीं हटा क्योंकि उस वक्त उनका लक्ष्य मुनाफा था ही नहीं। लक्ष्य आदत थी।
Speaker A
एक ऐप ने 15 मिनट कहा तो दूसरे ने 10। एक ने छूट दी तो दूसरे ने ज्यादा दी। और यहां dमar के सामने ऐसी लड़ाई खड़ी हो गई जो बिग बाजार से बिल्कुल अलग थी। बिग बाजार उसी मैदान में लड़ रहा था। बड़े स्टोर,
Speaker A
महीने की खरीद, कीमत की होड़, क्विक कॉमर्स ने मैदान ही बदल दिया। अब पार्किंग ढूंढने, ट्रॉली लेने, रैक के बीच चलने और लाइन में खड़े होने की जरूरत नहीं थी। dमar में सामान थोड़ा सस्ता मिलता था, लेकिन उसके लिए 2 घंटे देने पड़ते थे। फोन
Speaker A
पर दाम थोड़ा ऊपर था, लेकिन सामान 10 मिनट में सामने था। शहर के ग्राहक ने पहली बार पैसे और समय को एक ही तराजू में रखना शुरू कर दिया। पहले माना गया कि यह सेवा सिर्फ छोटी-मोटी जरूरत के लिए है। फिर डार्क
Speaker A
स्टोर में बड़े पैकेट आने लगे। तेल का डिब्बा, आटे की बोरी, साबुन का पूरा सेट। ऐप ग्राहक की पिछली खरीद याद रखता और एक बटन पर वही [संगीत] पूरी सूची सामने रख देता। जो काम कभी परिवार का पूरा रविवार
Speaker A
लेता था, वह कुछ मिनट में निपटने लगा। ग्राहक का रूप भी बदल रहा था। DMart का पुराना ग्राहक बड़ा परिवार था। घर में सामान रखने की जगह थी और महीने की पहली तारीख [संगीत] को गाड़ी लेकर स्टोर जाना
Speaker A
एक तय काम था। नई शहरी पीढ़ी की जिंदगी अलग है। छोटा फ्लैट पति-पत्नी दोनों नौकरी पर रसोई में कम जगह और वीकेंड में बहुत कम वक्त। अकेले रहने वाले युवा को 10 किलो आटा रखने का कोई फायदा नहीं। उसे जितनी
Speaker A
[संगीत] जरूरत है उतना उसी दिन मंगाना ज्यादा सीधा लगता है और यही वह ग्राहक है जो आने वाले सालों में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला है। लेकिन असली चोट यहां नहीं थी। असली चोट बीच की छोटी यात्राओं पर
Speaker A
पड़ी। पहले परिवार महीने की बड़ी खरीद डीमार्ट से करता था और बीच में तेल या बिस्किट खत्म होने पर फिर स्टोर चला जाता था। वह एक चीज [संगीत] लेने जाता। लेकिन रैक के बीच घूमते हुए पांच और चीजें
Speaker A
[संगीत] ट्रॉली में डाल देता। ₹100 की जरूरत 800 के बिल में बदल जाती। रिटेल की सबसे बड़ी कमाई अक्सर इसी बिना योजना वाली खरीद से आती है। अब वह छोटी जरूरत फोन से पूरी [संगीत] होने लगी। इसलिए ग्राहक का
Speaker A
दूसरा और तीसरा चक्कर गायब होने लगा। यही वजह है कि स्टोर के बाहर भीड़ रहते हुए भी अंदर का आंकड़ा कमजोर पड़ सकता था। महीने का बड़ा राशन अब भी डीमार्ट से आ रहा था। इसलिए पार्किंग और लाइन भरी दिखती थी।
Speaker A
लेकिन वही ग्राहक पहले जितनी बार लौट नहीं रहा था, हमला सामने से नहीं आया था, उसने भीड़ नहीं हटाई। उसने भीड़ के [संगीत] लौटने की गिनती घटा दी। कंपनी ने कोशिश नहीं की ऐसा नहीं है। dमar रेडी के जरिए
Speaker A
ग्राहक ऑर्डर करके अगले दिन सामान पा सकता था या पास के पिकअप पॉइंट से उठा सकता था। लेकिन वह सेवा भी उसी पुरानी सोच पर बनी थी। पहले कम [संगीत] दाम रफ्तार बाद में और बाजार अगले दिन से 10 मिनट तक पहुंच
Speaker A
चुका था। 2025 में नेविल नोरोनहा से सीधा पूछा गया कि क्या क्विक कॉमर्स खतरा है?
Speaker A
जवाब शांत था। dमar अपना रास्ता नहीं बदलेगा और ग्राहक को बेहतरीन कीमत देता रहेगा। इसमें कंपनी का आत्मविश्वास था। लेकिन निवेशकों ने इसका एक दूसरा मतलब भी सुना। अगर दुनिया कीमत से समय की तरफ जा रही है और कंपनी अपना रास्ता नहीं बदलेगी
Speaker A
तो क्या उसका सबसे मजबूत नियम ही उसकी सबसे बड़ी सीमा बन जाएगा। उधर बिग बाजार की खाली की हुई जगह भी खाली नहीं रही। Reliance ने उसके कई पुराने स्टोर लेकर उन्हें स्मार्ट बाजार के नाम से मैदान में
Speaker A
उतार दिया। पहले डीमार्ट का मुकाबला कर्ज में दबी कंपनी से था। अब सामने वह समूह था जिसके पास हजारों दुकानों का जाल, [संगीत] विशाल पूंजी और Jio के जरिए करोड़ों फोन तक पहुंच थी और ठीक इसी नाजुक मोड़ पर
Speaker A
कंपनी के अंदर नेतृत्व बदल गया। नरोहा ने करीब दो दशक डीमार्ट की मशीन चलाई थी और कुछ स्टोरों वाली कंपनी को 380 से ज्यादा स्टोर [संगीत] तक पहुंचाया था। उन्होंने अपना कॉन्ट्रैक्ट आगे ना बढ़ाने का फैसला किया और 31 जनवरी [संगीत] 2026 को उनका
Speaker A
कार्यकाल खत्म हो गया। उनकी जगह आए अंशुल असावा जो करीब 30 साल यूनilver में काम कर चुके थे। नया मुखिया [संगीत] नई टीम और एक बिल्कुल नई लड़ाई। अब पूरा बाजार एक ही चीज का इंतजार कर रहा था। उनकी पहली बड़ी
Speaker A
रिपोर्ट। इसी बीच 2026 में dमar ने अपना 500वां स्टोर खोल दिया। करीब एक साल में 85 नए स्टोर जुड़े थे। बाजार कीमत ₹3 लाख करोड़ के पार, कर्ज लगभग शून्य और बिक्री लगातार ऊपर। ऊपर से तस्वीर पहले से भी
Speaker A
मजबूत थी। फिर 11 जुलाई 2026 को नतीजे आए। पहली नजर में रिपोर्ट बुरी नहीं थी। बिक्री 18,000 करोड़ के पार और पिछले साल से करीब 15% ज्यादा। मुनाफा भी बढ़ा हुआ। किसी भी आम कंपनी के लिए यह शानदार आंकड़ा
Speaker A
होता। लेकिन dमar आम कंपनी नहीं थी। वह खुद 18 से 25% बढ़त की बात करती आई थी। 15% उसके अपने लक्ष्य की सबसे नीची सीढ़ी [संगीत] से भी नीचे था। और फिर रिपोर्ट के भीतर वह नंबर आया। सेम स्टोर सेल्स ग्रोथ
Speaker A
मतलब नए खुले स्टोर हटा दो और सिर्फ पुराने स्टोर की बिक्री देखो। नई दुकान तो कुल बिक्री बढ़ा ही देगी। असली सेहत [संगीत] पुराने स्टोर से पता चलती है। पिछली बार यह बढ़त करीब 11% थी। इस बार गिरकर लगभग 5.5% रह गई। करीब आधी और बड़े
Speaker A
शहरों में तस्वीर उससे भी खराब थी। मुंबई, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे इलाकों में यानी ठीक वहां-जहां dमar सबसे पुराना और क्विक कॉमर्स सबसे घना है। बढ़त लगभग सपाट थी। किले की बाहरी दीवार नहीं टूटी [संगीत] थी। उसका सबसे मजबूत हिस्सा धीमा
Speaker A
पड़ रहा था। दूसरा संकेत नए स्टोरों का था। 85 स्टोर वाले साल के ठीक बाद पूरी [संगीत] तिमाही में सिर्फ तीन नए स्टोर खुले। पिछली 12 तिमाहियों में सबसे कम पैसा भी था और जमीन खरीदने की ताकत भी।
Speaker A
फिर रफ्तार क्यों रुकी? अच्छी जगह नहीं मिल रही थी या नए निवेश से पहले कंपनी खुद रुक कर बदलता बाजार पढ़ना चाहती थी? तीसरा आंकड़ा सबसे गहरा था। हर स्टोर के हिसाब से औसत बिक्री की बढ़त लगातार दूसरी
Speaker A
[संगीत] तिमाही माइनस में थी। कुल कारोबार ऊपर था लेकिन हर दुकान की कमाने की ताकत नीचे जा रही थी। मुनाफे का मार्जिन भी करीब 8% पर अटका था। जबकि कंपनी की अपनी उम्मीद इससे काफी ऊपर की थी और ऑनलाइन
Speaker A
मोर्चे पर डीमार्ट रेडी को उसी तिमाही में करीब 91 करोड़ का नुकसान हुआ। कंपनी ने उसे सात शहरों से पूरी तरह समेट लिया। एक तरफ प्रतिद्वंदवी नए शहरों और नए डार्क स्टोरों में घुस रहे थे। दूसरी तरफ DMart
Speaker A
[संगीत] सात शहरों से पीछे हट रहा था और नए मुखिया की पहली ही रिपोर्ट में सबसे कमजोर हिस्सा वही निकला जो कंपनी की सबसे बड़ी ताकत [संगीत] माना जाता था। अगली सुबह बाजार ने अपना जवाब दे दिया। महंगे
Speaker A
शेयर की यही सजा होती है। और उसी दिन से बाजार दो हिस्सों में बंट गया। एक तरफ वे लोग जो कह रहे थे कि यह सिर्फ एक झटका है और नए मुखिया को वक्त [संगीत] मिलना चाहिए। दूसरी तरफ वे जो कह रहे थे कि यह
Speaker A
झटका नहीं ढलान की शुरुआत [संगीत] है। एक ही कंपनी, एक ही रिपोर्ट और दो बिल्कुल अलग कहानियां। हालांकि पूरा दोष 10 मिनट वाली कंपनियों पर डाल देना भी जल्दबाजी होगी। फरवरी और मार्च में कीमत बढ़ने के डर से कई परिवारों ने जरूरत से ज्यादा
Speaker A
सामान पहले ही खरीद लिया था। अप्रैल से जून तक उनके घर भरे हुए थे। इसलिए नई खरीद कम हुई। उसी दौर में दूसरे बड़े रिटेल कारोबारों में भी सुस्ती दिखी। यानी कुछ हिस्सा तिमाही की टाइमिंग और पूरे बाजार
Speaker A
की कमजोरी का था। लेकिन यह सफाई एक चीज नहीं मिटा [संगीत] पाई। सुस्ती सबसे ज्यादा ठीक उन्हीं शहरों में थी जहां 10 मिनट वाली डिलीवरी सबसे मजबूत है। अब कंपनी के [संगीत] सामने दो ही रास्ते बचे थे और दोनों कठिन थे। पहला बड़े शहरों
Speaker A
[संगीत] में सीधे लड़ो। इसके लिए तेज डिलीवरी चाहिए। पासपास गोदाम चाहिए और हर ऑर्डर पर अतिरिक्त खर्च चाहिए। लेकिन खर्च जलाकर डिलीवरी करना उसी कम लागत वाले ढांचे को घायल कर देता जिसने dमar को खड़ा किया था। दूसरा छोटे शहरों में तेजी से
Speaker A
फैलो। वहां परिवार बड़े हैं। सामान रखने की जगह है और ग्राहक आज भी [संगीत] समय से पहले कीमत देखता है। फिलहाल कंपनी इसी रास्ते पर ज्यादा दाम लगा रही है। मगर छोटे शहर का स्टोर [संगीत] मुंबई जितना नहीं कमाता। कम बिक्री की भरपाई ज्यादा
Speaker A
स्टोर खोलकर करनी होगी और हर स्टोर के लिए जमीन, इमारत, गोदाम और स्टॉक पर पैसा पहले लगेगा। कमाई बाद में आएगी। इसी फैलाव के बीच कंपनी का फ्री कैश फ्लो पहली बार माइनस में चला गया। मतलब कारोबार से आया
Speaker A
पैसा निवेश के बाद हाथ में बचने के बजाय कम पड़ गया। नकदी भी थी और जमीन भी। इसलिए तुरंत कोई संकट नहीं था। लेकिन उस मॉडल में पहली दरार दिख गई जिसे हमेशा अपने ही मुनाफे से [संगीत] बढ़ने पर गर्व था। और
Speaker A
एक सवाल अब भी खुला है। मान लीजिए dमar किसी छोटे शहर में करोड़ों लगाकर स्टोर खड़ा करता है और दो-ती साल बाद वहीं क्विक कॉमर्स पहुंच जाता है। तब क्या होगा? ईंट में लगा पैसा शहर नहीं बदल सकता। बाइक और
Speaker A
डार्क स्टोर बदल सकते हैं। दूसरी तरफ dमar को खत्म मान लेना भी उतनी ही बड़ी गलती होगी। उसके पास बरसों पहले [संगीत] खरीदी हुई जमीन है। सप्लायर का भरोसा है। 500 स्टोर हैं और करोड़ों घरों के दिमाग में
Speaker A
बैठी सस्ते दाम की पहचान है। और 10 मिनट वाली कंपनियों को भी एक दिन छूट घटाकर हर ऑर्डर से असली मुनाफा निकालना ही होगा। उस दिन ग्राहक सुविधा की कीमत दोबारा गिनेगा। पूरी लड़ाई इसी एक सवाल पर आकर टिकी है।
Speaker A
जिस दिन तेज डिलीवरी महंगी हुई क्या ग्राहक वापस लौटेगा या सुविधा की आदत इतनी गहरी हो चुकी है कि वह पैसा देकर भी लाइन में खड़ा होना कबूल नहीं करेगा? इस पूरे शोर के बीच राधाकिशन दमानी अब भी चुप हैं।
Speaker A
वही सफेद कपड़े ना इंटरव्यू, ना सफाई, ना जल्दबाजी। यह वही आदमी [संगीत] है जिसने 1992 में महीनों नुकसान सहकर भी अपना हिसाब नहीं छोड़ा था। और जिसने 9 [संगीत] साल में सिर्फ 25 स्टोर खोले थे। हो सकता है वह फिर किसी लंबी चाल का इंतजार कर रहे
Speaker A
हो और यह भी हो सकता है कि इस बार बाजार इतनी तेजी से बदला हो कि पुराने [संगीत] जवाब काम ना आए। अगले रविवार डिमar की पार्किंग फिर भरेगी। ट्रॉली फिर खत्म होंगी। बिलिंग की लाइन फिर लंबी होगी और
Speaker A
उसी लाइन में खड़े किसी आदमी को अचानक याद आएगा कि दूध लेना रह गया। वह लाइन छोड़कर वापस रैक तक नहीं जाएगा। वह फोन निकालेगा, ऑर्डर करेगा और उसके घर पहुंचने से पहले दूध [संगीत] दरवाजे पर होगा। एक ही शाम
Speaker A
में वह डीमार्ट का ग्राहक भी है और उसके सबसे बड़े दुश्मन का भी। अब लड़ाई इस बात की नहीं है कि स्टोर में भीड़ है या नहीं। लड़ाई इस बात की है कि उस आदमी की [संगीत] अगली जरूरत किसे मिलेगी? अब आप बताइए नीचे
Speaker A
कमेंट में। DMA अगले 10 साल की कहानी बनेगा या भारत के रिटेल इतिहास का एक शानदार [संगीत] चैप्टर बनकर रह जाएगा। और अगली बार जब आप उस लाइन में खड़े हो तो एक बार आसपास देख लीजिएगा कितने लोग सामान
Speaker A
गिन रहे हैं और कितने लोग फोन। दोस्तों, अगर यह कहानी पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक और शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। मिलते हैं अगली कहानी [संगीत]
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