रतन खत्री की कहानी, जो एक रिफ्यूजी से मुंबई के मटका किंग बने, और ₹500 करोड़ के अंडरग्राउंड साम्राज्य का निर्माण किया।
Key Takeaways
- रतन खत्री ने एक साधारण रिफ्यूजी से मुंबई के सबसे बड़े मटका किंग तक का सफर तय किया।
- सट्टा बाजार में पारदर्शिता और नया सिस्टम लागू कर उन्होंने बाजार को नियंत्रित किया।
- मुंबई के अंडरग्राउंड सट्टा खेल का बड़ा हिस्सा मटका था, जो लाखों लोगों की उम्मीदों से जुड़ा था।
- व्यापार में सफलता के साथ-साथ खतरनाक राजनीतिक और अपराधी साजिशें भी जुड़ी थीं।
- रतन खत्री की कहानी में संघर्ष, नवाचार, और सत्ता की जटिलताएं शामिल हैं।
What the video covers
- रतन खत्री कराची से एक रिफ्यूजी के रूप में मुंबई आए।
- मुंबई में आर्थिक संघर्ष के बाद उन्होंने मटका सट्टा खेल की शुरुआत की।
- न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज के नंबरों पर निर्भरता खत्म होने पर रतन ने अपना सिस्टम बनाया।
- मिट्टी के मटके और ताश के पत्तों के जरिए मटका खेल का नया रूप दिया।
- मटका खेल मुंबई के हर तबके में लोकप्रिय हुआ और ₹500 करोड़ का कारोबार खड़ा किया।
- रतन ने पारदर्शिता और भरोसे के साथ खेल को संचालित किया।
- उन्होंने कल्याण जी भगत के साथ काम किया, बाद में अपना सिंडिकेट शुरू किया।
- मटका खेल मुंबई की अंडरग्राउंड दुनिया में बड़ा नाम बन गया।
- रतन की कहानी में सफलता के साथ-साथ खतरनाक साजिश और मौत की घटनाएं भी शामिल हैं।
- यह वीडियो रतन खत्री के जीवन और मटका साम्राज्य के उदय और पतन की कहानी बताता है।
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Speaker A
रात के ठीक 12:00 बजे मुंबई की एक तंग अंधेरी गली। वहां रखा है एक मामूली सा मिट्टी का मटका। उसके अंदर सिर्फ कुछ कागज के पुर्जे। मगर उन पुर्जों के पीछे टंगी है 50 लाख लोगों की रातों की नींद। कोई आज की रात लखपति बन जाएगा। कोई आज की रात अपना घर बिकवा देगा। और एक आदमी सिर्फ एक आदमी तय करेगा कि किस्मत किसके दरवाजे पर दस्तक देगी। उसका नाम था रतन खत्री। एक रिफ्यूजी जो कराची से खाली हाथ भागा था, ना घर, ना नौकरी, ना नाम और उसी आदमी ने खड़ा कर दिया एक ऐसा साम्राज्य जिसका हर महीने का कारोबार था ₹500 करोड़, बिना फैक्ट्री, बिना दुकान, बिना एक भी कागज पर दस्तखत। बॉलीवुड के सुपरस्टार उसके दरबार में हाजिरी देते थे। पुलिस कमिश्नर उसे सलाम करते थे और मुंबई का सबसे खौफनाक डॉन भी उससे आंख मिलाने से बचता था। लेकिन जिस दिन यह साम्राज्य अपनी सबसे ऊंची चोटी पर खड़ा था, उसी दिन उसके खत्मे की कहानी लिखी जा रही थी। जो आदमी कभी पुलिस की गोली से नहीं डरा, वो आखिर में किस चीज के आगे घुटने टेक गया? और उसके सबसे करीबी पार्टनर के बेटे की जो मौत हुई, क्या वो हादसा था? या एक ठंडे दिमाग से रची गई साजिश। यह है मटका किंग रतन खत्री की वो कहानी जो ना कभी पूरी बताई गई, ना कभी पूरी सुनी गई। साल था 1941। कराची समंदर के किनारे बसा एक जिंदा जागता शहर। यहीं एक सिंधी हिंदू परिवार में एक लड़का बड़ा हो रहा था। घर मामूली था, ना अमीरी, ना गरीबी। मगर इस लड़के के अंदर एक चीज बाकी बच्चों से अलग थी। जो हिसाब बड़े-बड़े सेठ घंटों में करते थे, यह लड़का मिनटों में निकाल देता था। पड़ोसी मजाक में कहते, यह लड़का बड़ा होकर सेठ बनेगा। किसी को अंदाजा नहीं था यह भविष्यवाणी सच होगी, मगर सबसे खतरनाक रास्ते से। फिर आया 1947। भारत आजाद हुआ और बंट गया एक नया देश पाकिस्तान। जो धरती कल तक अपनी थी, आज पराई हो गई। सिंध में हिंदू परिवारों के लिए हर सुबह एक नई दहशत लेकर आती। कहीं दुकानें जल रही थीं, कहीं पूरा परिवार रातोंरात गायब हो जाता। डर हवा में घुल गया था। एक रात रतन के पिता ने फैसला कर लिया। सामान बांधो। हम बॉम्बे जा रहे हैं। एक पोटली में कुछ कपड़े, कुछ बर्तन और जो रुपए हाथ आए बस उतने। पूरा परिवार समंदर के रास्ते निकल पड़ा। उस शहर की तरफ जिसने उन्हें कभी बुलाया नहीं था। बॉम्बे पहुंचते ही पहला झटका लगा। रहने को छत नहीं थी। पहले रिफ्यूजी कैंप, फिर वर्ली के एक तंग कमरे में पूरा परिवार सिमट गया। पिता ने दुकान खोलने की कोशिश की। मगर बॉम्बे का बाजार सिंध जैसा नहीं था। कुछ महीनों में दुकान बंद। घर में अनाज खत्म होने लगा और यहीं से मुड़ती है यह कहानी। रतन ने स्कूल का बैग एक तरफ रख दिया। एक भूखा गुमनाम रिफ्यूजी लड़का निकल पड़ा काम की तलाश में। यह जानते हुए भी नहीं कि कुछ ही सालों में पूरा बॉम्बे शहर उसका नाम सुनकर कांपेगा। रोज सुबह काम की तलाश, शाम को थक हार कर वापसी। कभी सेल्समैन, कभी वेटर, कभी मिल में मजदूरी, कोई काम कुछ हफ्तों से ज्यादा नहीं टिकता। मगर इन्हीं गलियों में रतन ने एक अजीब चीज देखी। हर शाम मिल के बाहर मजदूरों की भीड़, हाथ में कागज के टुकड़े, मुंह में एक ही सवाल, आज नंबर क्या आएगा? यह खेल था अंकड़ा जुगाड़। हर रोज अमेरिका के न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज से कपास के भाव का एक नंबर मुंबई पहुंचता है। लोग उस नंबर पर दांव लगाते। सही निकला तो रकम कई गुना होकर वापस। गलत निकला तो सब डूब गया। एक मजदूर जिसकी पूरे दिन की कमाई मुश्किल से कुछ रुपए, वो आधी दिहाड़ी इस उम्मीद में लगा देता कि आज किस्मत पलट जाए। यह सिर्फ जुआ नहीं था। यह एक नशा था। एक सपना था। एक उम्मीद जो हर शाम नए सिरे से जिंदा हो जाती। रतन यह तमाशा बहुत बारीकी से देख रहा था। उसने भी छोटी रकम लगानी शुरू की। कभी जीता, कभी हारा। मगर उसकी नजर ने जो असली बात पकड़ी वो यह थी। इस खेल में सबसे ज्यादा पैसा खिलाड़ी नहीं कमाता। सबसे ज्यादा पैसा वह कमाता है जो यह खेल चलाता है। उस वक्त मुंबई के अंडरग्राउंड सट्टा बाजार का सबसे बड़ा नाम था कल्याण जी भगत। गुजरात से आया व्यापारी जिसका दफ्तर वर्ली में था और नाम पूरे शहर में गूंजता था। रतन के मन में एक ही ख्याल, किसी तरह इस आदमी तक पहुंचना है। और एक दिन एक दोस्त की मदद से वो मौका मिल गया। कल्याण जी का दफ्तर भीड़ से भरा रहता। रोज दर्जनों लड़के आते बिना कुछ हासिल किए लौट जाते। रतन भी उस कतार का हिस्सा था। मगर जब कल्याण जी ने हिसाब किताब के कुछ सवाल पूछे, रतन के जवाब इतनी तेजी से आए कि कल्याण जी एक पल को चौंक गया। सिर हिलाया, बोला, कल से तुम मेरे साथ काम करोगे? शुरुआत मामूली थी। रोज शाम न्यूयॉर्क से आया नंबर नोट करना। हर खिलाड़ी का हिसाब रखना, जीतने वालों को पैसा बांटना। मगर रतन ने इस छोटे से काम को भी ऐसे संभाला जैसे कोई इंजीनियर किसी मशीन का हर पुर्जा समझने की कोशिश करता है। रात-रात भर बैठकर वह पैटर्न पढ़ता, कौन सा नंबर कितनी बार आता है? कौन कब जीतता, कौन कब हारता। फिर एक दिन उसने कल्याण जी के सामने एक बात रखी जिसने पहले उसे हंसी का पात्र बना दिया। मगर आगे चलकर पूरे बाजार की तस्वीर बदल दी। रतन ने कहा, सर, हम न्यूयॉर्क के नंबर पर इतना क्यों निर्भर हैं? कल वहां से नंबर आना बंद हो गया तो? कल्याण जी हंस पड़ा। पूरी मुंबई इसी नंबर पर टिकी है। हम अलग सिस्टम कैसे बनाएं? रतन खामोश रह गया। सिर झुका कर वापस काम में लग गया। मगर उसके दिमाग में एक बीज पड़ चुका था। ऐसा बीज जो आगे चलकर मुंबई के अंडरग्राउंड का सबसे बड़ा पेड़ बनने वाला था। किसी को अंदाजा नहीं था। यह मामूली सी बात बहुत जल्द सच साबित होने वाली थी। 1961 से 64 के बीच वो भविष्यवाणी सच होने लगी। न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज ने अचानक भारत भेजे जाने वाले रेट्स पर रोक लगा दी। एक झटके में पूरा सट्टा बाजार ठप। जो नंबर रोज शाम मुंबई पहुंचता था, अब आना बंद हो गया। हजारों बुकी, लाखों खिलाड़ी, सबके मन में एक ही सवाल, अब क्या होगा? कल्याण जी के दफ्तर में मातम जैसा माहौल, कमाई बंद, कारोबार बंद और सामने कोई रास्ता नहीं। यही वह पल था जब रतन खत्री ने हिम्मत जुटाई। सर, मुझे एक मिट्टी का मटका दे दीजिए। कुछ ताश के पत्ते और एक छोटा कमरा। बाकी मैं देख लूंगा। कल्याण जी हैरान। मटका, ताश, यह सब क्या है? रतन ने अपना आईडिया खोला। हम न्यूयॉर्क पर निर्भर नहीं रहेंगे। हम अपना सिस्टम बनाएंगे। एक मटके में शून्य से नौ तक के नंबर लिखे कागज डालेंगे। रोज एक तय वक्त पर सबके सामने मटके में हाथ डालकर कुछ टुकड़े निकालेंगे। जो नंबर निकलेगा वही उस दिन का नतीजा होगा। ना न्यूयॉर्क की जरूरत, ना किसी बाहरी भाव की। पूरा खेल हमारे हाथ में, हमारी निगरानी में। कल्याण जी कुछ देर खामोश रहा। फिर धीरे से सिर हिलाया। ठीक है। कोशिश करके देखते हैं। किसी को नहीं पता था। उस मामूली बातचीत में मुंबई के सबसे बड़े अंडरग्राउंड साम्राज्य की नींव रखी जा रही थी। पहला ड्रॉ एक छोटे से कमरे में हुआ। मुश्किल से 10-12 लोगों के सामने मिट्टी का मटका रखा गया। उसमें ताश के पत्ते डाले गए। रतन ने आंखें बंद कर हाथ डाला। एक के बाद एक पत्ते निकाले। एक नंबर बना और उसी पल मुंबई के इतिहास का सबसे लंबा खेला जाने वाला अध्याय शुरू हो गया। नाम रखा गया मटका। रतन का दिमाग बहुत आगे की सोच रहा था। हर मोहल्ले में एक एजेंट, हर एजेंट के नीचे कई बुकी, हर बुकी के पास सैकड़ों खिलाड़ी। पैसा एक चैन की तरह बहने लगा। खिलाड़ी से बुकी, बुकी से एजेंट और एजेंट से सीधा रतन खत्री तक। कुछ ही महीनों में मटका मुंबई की हर गली, हर मिल, हर मोहल्ले तक पहुंच गया। मिल मजदूर, टैक्सी ड्राइवर, छोटे दुकानदार, घरों में काम करने वाले नौकर, हर तबका इस खेल का हिस्सा बन चुका था। रोज दो बार ड्रॉ, एक शाम को ओपन, एक रात को क्लोज। मुंबई के लाखों लोग इन्हीं दो वक्तों के इंतजार में अपना पूरा दिन गुजारते। कुछ रातों-रात अमीर बन जाते, कुछ सब कुछ हार बैठते। मगर हर हार के बाद भी लोग वापस आते। क्योंकि उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। और यही उम्मीद वो असली ताकत थी जिसे रतन खत्री ने बहुत अच्छे से पढ़ लिया था। जैसे-जैसे मटका बड़ा होता गया, रतन की भूमिका भी बढ़ती गई। मैनेजर से शुरू हुआ सफर अब बराबरी की हिस्सेदारी मांगने तक पहुंच गया। मगर कल्याण जी का नजरिया अलग था। मुनाफे के बंटवारे पर, ताकत पर, फैसलों पर मतभेद गहराते गए और आखिर में दोनों के रास्ते अलग हो गए। रतन गुस्से में घर लौटा। दोस्तों ने सलाह दी, अब खुद का सिंडिकेट खड़ा करो। किसी और के साए में काम करने की क्या जरूरत? और यहीं से शुरू हुई इस कहानी की सबसे बड़ी क्रांति। रतन खत्री ने अपना खुद का खेल शुरू किया। मगर पुराना सिस्टम कॉपी नहीं किया। उसे पूरी तरह नया रूप दे दिया। खेल अब सिर्फ हफ्ते के पांच कामकाजी दिनों तक चलता। ठीक वैसे जैसे असली शेयर बाजार चलता है। सिर्फ नंबरों की जगह अब ताश के पत्तों का इस्तेमाल होने लगा। हर ड्रॉ के बाद पूरी गड्डी सबके सामने खत्म कर दी जाती। अगले दिन एक नई गड्डी। कोई भी आम आदमी आकर मटके में से पत्ते निकाल सकता था। पारदर्शिता अपने उच्चतम स्तर पर थी और यही
Speaker A
नींद। कोई आज की रात लखपति बन जाएगा। कोई आज की रात अपना घर बिकवा देगा। और एक आदमी सिर्फ एक [संगीत] आदमी तय करेगा कि किस्मत किसके दरवाजे पर दस्तक देगी। उसका नाम था रतन खत्री। एक रिफ्यूजी जो कराची [संगीत]
Speaker A
से खाली हाथ भागा था ना घर ना नौकरी ना नाम और उसी आदमी ने खड़ा कर दिया एक ऐसा साम्राज्य [संगीत] जिसका हर महीने का कारोबार था ₹500 करोड़ बिना फैक्ट्री बिना दुकान बिना एक भी कागज [संगीत] पर दस्तखत
Speaker A
बॉलीवुड के सुपरस्टार उसके दरबार में हाजिरी देते थे पुलिस कमिश्नर उसे सलाम करते थे [संगीत] और मुंबई का सबसे खौफनाक डॉन भी उससे आंख मिलाने से बचता था लेकिन जिस दिन यह [संगीत] साम्राज्य अपनी सबसे ऊंची चोटी पर खड़ा था। उसी दिन उसके
Speaker A
खात्मे [संगीत] की कहानी लिखी जा रही थी। जो आदमी कभी पुलिस की गोली से नहीं डरा, वो आखिर में किस चीज के [संगीत] आगे घुटने टेक गया? और उसके सबसे करीबी पार्टनर के बेटे की जो मौत हुई, [संगीत] क्या वो
Speaker A
हादसा थी? या एक ठंडे दिमाग से रची गई साजिश। यह है मटका किंग रतन [संगीत] खत्री की वो कहानी जो ना कभी पूरी बताई गई, ना कभी पूरी सुनी गई। साल था 1941। कराची समंदर के किनारे बसा एक जिंदा जागता
Speaker A
शहर। यहीं एक सिंधी हिंदू [संगीत] परिवार में एक लड़का बड़ा हो रहा था। घर मामूली था ना अमीरी, ना गरीबी। मगर इस लड़के के अंदर एक चीज [संगीत] बाकी बच्चों से अलग थी। जो हिसाब बड़े-बड़े सेठ घंटों में
Speaker A
करते थे। यह लड़का मिनटों में निकाल देता था। पड़ोसी मजाक में कहते, यह लड़का बड़ा होकर सेठ बनेगा। किसी को अंदाजा नहीं था। [संगीत] यह भविष्यवाणी सच होगी। मगर सबसे खतरनाक रास्ते से। फिर आया 1947। भारत आजाद हुआ और बंट गया एक नया [संगीत]
Speaker A
देश पाकिस्तान। जो धरती कल तक अपनी थी आज पराई हो गई। सिंध में हिंदू परिवारों के लिए हर सुबह एक नई दहशत लेकर आती। कहीं दुकानें जल रही थी, कहीं पूरा परिवार रातोंरात गायब हो जाता। डर हवा [संगीत]
Speaker A
में घुल गया था। एक रात रतन के पिता ने फैसला कर लिया। सामान बांधो। हम बॉम्बे जा रहे हैं। एक पोटली में कुछ कपड़े, कुछ बर्तन और जो रुपए हाथ आए बस उतने। पूरा परिवार समंदर के रास्ते निकल पड़ा। उस शहर
Speaker A
की तरफ जिसने उन्हें [संगीत] कभी बुलाया नहीं था। बॉम्बे पहुंचते ही पहला झटका लगा। रहने को छत नहीं थी। पहले रिफ्यूजी [संगीत] कैंप फिर वर्ली के एक तंग कमरे में पूरा परिवार सिमट गया। पिता ने दुकान खोलने [संगीत] की कोशिश की। मगर बॉम्बे का
Speaker A
बाजार सिंध जैसा नहीं था। कुछ महीनों में दुकान बंद। घर में अनाज खत्म होने लगा और यहीं से मुड़ती है यह कहानी। रतन ने स्कूल का बैग एक तरफ रख दिया। एक भूखा गुमनाम रिफ्यूजी लड़का निकल पड़ा काम की तलाश
Speaker A
में। यह जानते हुए भी नहीं कि कुछ ही सालों में पूरा बॉम्बे शहर उसका [संगीत] नाम सुनकर कांपेगा। रोज सुबह काम की तलाश, शाम को थक हार कर वापसी। कभी सेल्समैन, कभी वेटर, कभी मिल में मजदूरी, कोई काम
Speaker A
कुछ हफ्तों [संगीत] से ज्यादा नहीं टिकता। मगर इन्हीं गलियों में रतन ने एक अजीब चीज देखी। हर शाम मिल के बाहर मजदूरों की भीड़, हाथ में कागज [संगीत] के टुकड़े, मुंह में एक ही सवाल आज नंबर क्या आएगा?
Speaker A
यह खेल था अंकड़ा जुगाड़। हर रोज अमेरिका के न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज से कपास के भाव का एक नंबर [संगीत] मुंबई पहुंचता है। लोग उस नंबर पर दांव लगाते। सही निकला तो रकम कई गुना होकर वापस। गलत निकला तो सब
Speaker A
डूब गया। एक मजदूर जिसकी पूरे दिन [संगीत] की कमाई मुश्किल से कुछ रुपए वो आधी दिहाड़ी इस उम्मीद में लगा देता कि आज किस्मत पलट जाए। यह सिर्फ जुआ नहीं था। यह [संगीत] एक नशा था। एक सपना था। एक उम्मीद
Speaker A
जो हर शाम नए सिरे से जिंदा हो जाती। रतन यह तमाशा बहुत बारीकी से देख रहा था। उसने भी छोटी रकम लगानी शुरू की। कभी जीता [संगीत] कभी हारा। मगर उसकी नजर ने जो असली बात पकड़ी वो यह थी। इस खेल में सबसे
Speaker A
[संगीत] ज्यादा पैसा खिलाड़ी नहीं कमाता। सबसे ज्यादा पैसा वह कमाता है [संगीत] जो यह खेल चलाता है। उस [नाक से की जाने वाली आवाज़] वक्त मुंबई के अंडरग्राउंड सट्टा बाजार का सबसे बड़ा नाम था कल्याण जी भगत। [संगीत] गुजरात से
Speaker A
आया व्यापारी जिसका दफ्तर वर्ली में था और नाम पूरे शहर में गूंजता [संगीत] था। रतन के मन में एक ही ख्याल किसी तरह इस आदमी तक पहुंचना है। और एक दिन एक दोस्त की मदद से [संगीत] वो मौका मिल गया। कल्याण जी का
Speaker A
दफ्तर भीड़ से भरा रहता। रोज दर्जनों लड़के आते बिना कुछ हासिल किए लौट जाते। रतन भी उस कतार का हिस्सा था। [संगीत] मगर जब कल्याण जी ने हिसाब किताब के कुछ सवाल पूछे। रतन के जवाब इतनी तेजी से आए कि
Speaker A
कल्याण जी [संगीत] एक पल को चौंक गया। सिर हिलाया बोला कल से तुम मेरे साथ काम करोगे? शुरुआत मामूली थी। रोज शाम न्यूयॉर्क से आया नंबर नोट करना। हर खिलाड़ी का हिसाब रखना, जीतने वालों को पैसा बांटना। मगर रतन ने इस छोटे से काम
Speaker A
को भी ऐसे संभाला जैसे कोई इंजीनियर किसी मशीन का हर पुर्जा समझने की कोशिश करता है। रात-रात भर बैठकर वह पैटर्न पढ़ता कौन सा नंबर कितनी बार आता है? कौन कब जीतता, कौन कब हारता। फिर एक दिन उसने कल्याण जी
Speaker A
के सामने एक बात रखी [संगीत] जिसने पहले उसे हंसी का पात्र बना दिया। मगर आगे चलकर पूरे बाजार की तस्वीर बदल दी। रतन ने कहा सर हम न्यूयॉर्क के नंबर पर इतना क्यों निर्भर हैं? कल वहां से नंबर आना बंद हो
Speaker A
गया तो कल्याण जी हंस पड़ा। पूरी मुंबई इसी [संगीत] नंबर पर टिकी है। हम अलग सिस्टम कैसे बनाएं? रतन खामोश रह गया। सिर झुका कर वापस काम में लग गया। मगर उसके दिमाग में एक बीज पड़ चुका था। ऐसा बीज जो
Speaker A
आगे चलकर मुंबई के अंडरग्राउंड का सबसे बड़ा पेड़ बनने वाला था। किसी को अंदाजा नहीं था। यह मामूली सी बात बहुत जल्द सच साबित होने वाली थी। 1961 से 64 के [संगीत] बीच वो भविष्यवाणी सच होने लगी। न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज ने अचानक भारत
Speaker A
भेजे जाने वाले रेट्स पर रोक लगा दी। एक झटके में पूरा सट्टा बाजार ठप। जो नंबर रोज शाम मुंबई पहुंचता था अब आना बंद हो गया। हजारों बुकी, लाखों खिलाड़ी, सबके मन में एक ही सवाल। [संगीत] अब क्या होगा? कल्याण जी के दफ्तर में
Speaker A
मातम जैसा माहौल, कमाई बंद, कारोबार बंद और सामने कोई रास्ता नहीं। यही वह पल [संगीत] था जब रतन खत्री ने हिम्मत जुटाई। सर मुझे एक मिट्टी का मटका दे दीजिए। कुछ ताश के पत्ते और एक छोटा कमरा। बाकी मैं
Speaker A
देख लूंगा। कल्याण जी [संगीत] हैरान। मटका ताश यह सब क्या है? रतन ने अपना आईडिया खोला। हम न्यूयॉर्क पर निर्भर नहीं रहेंगे। हम अपना सिस्टम बनाएंगे। एक मटके में शून्य से नौ तक के नंबर लिखे कागज डालेंगे। रोज एक तय वक्त पर सबके सामने
Speaker A
मटके में हाथ डालकर कुछ टुकड़े निकालेंगे। जो नंबर निकलेगा वही उस दिन का नतीजा होगा। ना न्यूयॉर्क की जरूरत ना किसी बाहरी भाव की। पूरा खेल हमारे हाथ में हमारी निगरानी में। कल्याण जी कुछ देर खामोश रहा। [संगीत] फिर धीरे से सिर
Speaker A
हिलाया। ठीक है। कोशिश करके देखते हैं। किसी को नहीं पता [संगीत] था। उस मामूली बातचीत में मुंबई के सबसे बड़े अंडरग्राउंड साम्राज्य [संगीत] की नींव रखी जा रही थी। पहला ड्रॉ एक छोटे से कमरे में हुआ। मुश्किल से [संगीत] 10-12 लोगों
Speaker A
के सामने मिट्टी का मटका रखा गया। उसमें ताश के पत्ते डाले गए। रतन ने आंखें बंद कर हाथ [संगीत] डाला। एक के बाद एक पत्ते निकाले। एक नंबर बना और उसी पल मुंबई के इतिहास का सबसे लंबा खेला जाने वाला
Speaker A
अध्याय शुरू हो गया। नाम रखा [संगीत] गया मटका। रतन का दिमाग बहुत आगे की सोच रहा था। हर मोहल्ले में एक एजेंट, हर एजेंट के नीचे कई बुकी, हर बुकी के पास सैकड़ों खिलाड़ी। पैसा एक चैन की तरह बहने लगा।
Speaker A
खिलाड़ी से बुकी, बुकी से एजेंट और एजेंट से सीधा रतन खत्री तक। कुछ ही महीनों में मटका मुंबई की हर गली, हर मिल, हर मोहल्ले तक पहुंच गया। मिल मजदूर, टैक्सी ड्राइवर, छोटे दुकानदार, घरों में काम करने वाले
Speaker A
नौकर, हर तबका इस खेल का हिस्सा बन चुका था। रोज दो बार ड्रॉ, एक शाम [संगीत] को ओपन, एक रात को क्लोज। मुंबई के लाखों लोग इन्हीं दो वक्तों के इंतजार में अपना पूरा दिन गुजारते। कुछ रातों-रात अमीर बन जाते,
Speaker A
कुछ सब कुछ हार बैठते। मगर हर हार के बाद भी लोग वापस आते। क्योंकि उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। और यही उम्मीद वो असली ताकत थी जिसे रतन खत्री ने बहुत अच्छे से पढ़ लिया था। [संगीत] जैसे-जैसे मटका बड़ा होता गया
Speaker A
रतन की भूमिका भी बढ़ती गई। मैनेजर से शुरू हुआ सफर अब बराबरी की [संगीत] हिस्सेदारी मांगने तक पहुंच गया। मगर कल्याण जी का नजरिया अलग था। मुनाफे के बंटवारे पर, ताकत पर, फैसलों पर मतभेद गहराते गए और आखिर [संगीत] में दोनों के
Speaker A
रास्ते अलग हो गए। रतन गुस्से में घर लौटा। दोस्तों ने सलाह दी। अब खुद का सिंडिकेट खड़ा करो। किसी और के साए में काम करने की क्या जरूरत? और यहीं से शुरू हुई इस कहानी की सबसे बड़ी क्रांति। रतन
Speaker A
खत्री ने अपना खुद का खेल शुरू किया। मगर पुराना सिस्टम कॉपी नहीं किया। उसे पूरी तरह नया रूप दे दिया। खेल अब सिर्फ हफ्ते के पांच कामकाज ही दिनों [संगीत] तक चलता। ठीक वैसे जैसे असली शेयर बाजार चलता है।
Speaker A
सिर्फ नंबरों की जगह अब ताश के पत्तों का इस्तेमाल होने लगा। हर ड्रॉ के बाद पूरी गड्डी सबके सामने खत्म [संगीत] कर दी जाती। अगले दिन एक नई गड्डी। कोई भी आम आदमी आकर मटके में से पत्ते निकाल सकता
Speaker A
था। पारदर्शिता अपने उच्चतम स्तर पर थी और यही पारदर्शिता लोगों का भरोसा [संगीत] जीतने की सबसे बड़ी वजह बनी। लोगों की जुबान पर धीरे-धीरे यह खेल एक नए नाम से मशहूर [संगीत] होने लगा। रतन मटका। और इस नाम के साथ ही एक मामूली रिफ्यूजी लड़का
Speaker A
धीरे-धीरे [संगीत] एक ऐसी हस्ती में बदलने लगा जिसे पूरा शहर एक अलग नजर से देखने वाला था। दोस्तों जरा सोचिए एक पूरा शहर सांस [संगीत] रोक कर एक मटके का इंतजार करता है। रोज शाम ठीक 9:00 बजे मुंबई के
Speaker A
अलग-अलग कोनों में कुछ अजीब होता था। मजदूर दिहाड़ी थामे दौड़ते दुकानदार [संगीत] शटर खींचते। टैक्सी ड्राइवर आखिरी सवारी बीच रास्ते छोड़ते और सब एक ही दिशा में [संगीत] खींचे चले जाते। एक छोटे से कमरे में मिट्टी का मटका रखा होता। चारों
Speaker A
तरफ भीड़ और हर तरफ एक ही चीज [संगीत] खामोशी। ठीक तय वक्त पर किसी आम आदमी को बुलाया जाता। मटके में हाथ डलवाया जाता। तीन पत्ते निकलवाए जाते। नंबर पढ़ा जाता, एक पल की मौत जैसी चुप्पी, और फिर या तो
Speaker A
खुशी की चीख या मायूसी की आह। यह सिर्फ एक खेल नहीं था। यह हर रोज का एक त्यौहार था और इस त्यौहार के भगवान थे रतन खत्री। लेकिन रतन की असली [संगीत] ताकत नंबरों में नहीं थी। भरोसे में थी। शुरुआती दिनों
Speaker A
में जब किसी छोटे खिलाड़ी का नंबर लग जाता और रकम भारी होती तो कई बुकी पैसा डालने की कोशिश करते। रतन का एक ही नियम था जो जीता है उसे उसी रात पैसा मिलेगा। रकम चाहे जितनी बड़ी हो। बस यही एक नियम था
Speaker A
जिसने उसे [संगीत] बाकी सबसे अलग खड़ा कर दिया। लोग जानते थे रतन के मटके में जीत का पैसा कभी नहीं डूबता और इसी भरोसे ने एक छोटे कमरे के खेल [संगीत] को शहर के सबसे बड़े कारोबार में बदल दिया। 70 के
Speaker A
दशक की शुरुआत तक मटका सिर्फ खेल नहीं एक पूरा उद्योग था। परेल, लालबाग, [संगीत] धारावी, कुर्ला, माहिम हर मिल इलाके में बुकियों के दफ्तर। ₹1 लगाओ सही नंबर निकले तो कई वापस। एक मजदूर जिसकी दिहाड़ी मुश्किल से कुछ रुपए उसके लिए यह किसी
Speaker A
जादू से कम नहीं था। मगर इस जादू के पीछे एक काला सच भी था। घर बर्बाद हुए परिवार कर्ज में डूबे। पैसा ना मिले तो मारपीट, धमकी, कभी-कभी हत्या तक। मगर रतन का साम्राज्य [संगीत] इन सबसे बेअसर लगातार
Speaker A
ऊंचाई की तरफ बढ़ता रहा। 1970 तक रोज का टर्नओवर करोड़ों में था और अगले डेढ़ दशक में इतना बड़ा कि मुंबई के बड़े उद्योगपतियों की सालाना कमाई भी इसके सामने बौने लगने लगी। अब सवाल यह है इतना बड़ा पैसा, इतनी बड़ी ताकत बिना किसी की
Speaker A
पकड़ में आए कैसे चलता था? जवाब एक शब्द में सिस्टम। हर एजेंट को सिर्फ उतनी [संगीत] ही जानकारी होती जितनी उसके काम के लिए जरूरी थी। पैसा कभी एक जगह जमा नहीं होता। छोटे-छोटे हिस्सों में, अलग-अलग हाथों में, बुकी कोड वर्ड में बात
Speaker A
करते छापे की खबर के लिए अलग इशारा और सबसे बड़ी बात थाने के अंदर से खबर बाहर आती, नेटवर्क में पहुंचती और जैसे ही [संगीत] छापे की भनक लगती, मटका, पर्चियां सब मिनटों में गायब। अगली सुबह वही दफ्तर,
Speaker A
वही कुर्सी, [संगीत] वही आदमी। सबूत का कोई नामोनिशान नहीं। यह एक ऐसा जाल था जिसमें एक [संगीत] धागा टूटने पर भी पूरा जाल सलामत रहता। गलियों में उसे भाई नहीं सेठ कहा जाता था और यह फर्क सिर्फ शब्दों
Speaker A
का नहीं एक पूरी सोच का था। जो पैसा आता उसका हिस्सा वापस लोगों में जाता। किसी बेटी की शादी, किसी मरीज का [संगीत] इलाज, किसी गरीब बच्चे की फीस, एक फोन कॉल। इसी वजह से उसके खिलाफ कार्रवाई से पहले पुलिस
Speaker A
और नेता भी रुक जाते [संगीत] क्योंकि वह जानते थे इस आदमी की पीठ पर एक पूरा मोहल्ला खड़ा है। बॉलीवुड भी उससे जुड़ा था। उस दौर की कई बड़ी फिल्मों का काला पैसा इसी [संगीत] कारोबार से आता। 1975
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में आई फिल्म धर्मात्मा का मुख्य किरदार रतन [नाक से की जाने वाली आवाज़] खत्री से प्रेरित बताया गया। रहम दिल भी बेरहम भी। उसी फिल्म के बाद पूरे देश ने उसे एक नया [संगीत] नाम दिया। मटका किंग मगर जितना
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बड़ा राजा उतनी बड़ी निगाहें और इस बार निगाहें सिर्फ पुलिस की नहीं थी। 70 का दशक डोंगरी की गलियों में एक नाम उभर [संगीत] रहा था दाऊद इब्राहिम। एक पुलिस कांस्टेबल का बेटा जो कानून के घर में पैदा हुआ और अपनी पूरी जिंदगी कानून
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तोड़ने में लगाने वाला था। उस वक्त मुंबई का अंडरवर हाजी मस्तान करीम लाला और यूसुफ पटेल के बीच बंटा हुआ था। हर गिरोह का अपना इलाका ताकि बेवजह खून खराबा ना हो। मगर मटका इस पूरे बंटवारे के बाहर खड़ा
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था। यह किसी एक गैंग का नहीं पूरे [संगीत] शहर का कारोबार था और इसे चला रहा था एक हिसाबी दिमाग वाला कारोबारी। [संगीत] दाऊद की नजरें उसी पर थी। पहले उसके लोगों ने रतन के छोटे एजेंटों तक पहुंचने की कोशिश
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की। सुरक्षा के नाम पर हिस्सेदारी मांगी गई। मुंबई की पुरानी जुबान में जिसे हफ्ता कहते हैं। मगर रतन खत्री वह आदमी नहीं था जो झुक जाए। उसने अपना साम्राज्य अपनी शर्तों पर खड़ा किया था। और यहीं से शुरू
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हुआ वह तनाव जो सालों तक मुंबई की अंधेरी गलियों [संगीत] में सुलगता रहा। आज भी कोई नहीं जानता कि रतन और दाऊद के बीच असल में क्या हुआ। कोई कागज [संगीत] नहीं, कोई गवाह नहीं। कुछ कहते हैं एक खामोश डील हुई
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जो कभी किसी कागज पर नहीं आई। कुछ कहते हैं रतन ने कभी किसी को अपने साम्राज्य [संगीत] में घुसने नहीं दिया। मगर एक बात तयम इतना बड़ा कारोबार इतने लंबे [संगीत] वक्त तक बिना अंडरवर की जानकारी के चलना
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नामुमकिन था और रतन खत्री ने यह नामुमकिन कर दिखाया। वो राज [संगीत] आज भी दफन है। पुराने मुंबई कर आज भी एक किस्सा सुनाते हैं। कोई तारीख नहीं कोई गवाह नहीं। बस एक कहानी जो शहर की जुबान पर सालों तक घूमती
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रही। कहा जाता है कि एक रात किसी [संगीत] तीसरे आदमी के जरिए रतन खत्री और डोंगरी के उस उभरते नौजवान के बीच एक [संगीत] मुलाकात हुई। ना कोई गोली ना कोई धमकी। बस दो आदमी आमने-सामने और एक लंबी खामोश
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[संगीत] बातचीत और उस पूरी बातचीत में सिर्फ एक लाइन कही गई। मेरा धंधा मेरे तरीके [संगीत] से चलेगा। तुम्हारी ताकत का सम्मान है। मगर यहां दखल नहीं चलेगा। यह सच में हुआ था या नहीं कोई नहीं जानता। मगर एक बात पक्की है। इसके बाद दाऊद
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इब्राहिम का नेटवर्क सोना, चांदी, हथियार हर तरफ फैलता गया। लेकिन मटके के कारोबार को उसने कभी सीधे हाथ नहीं लगाया। शायद सम्मान था। शायद सौदा या शायद बस एक चतुर सोच। जिस मुर्गी से रोज सोने का [संगीत] अंडा मिले उसे मारने से ज्यादा फायदा उसे
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जिंदा रखने में है। जो भी हो इस खामोश समझ ने रतन खत्री को वह जगह दी [संगीत] जो मुंबई में किसी को नसीब नहीं हुई थी। ताकत के बीचोंबीच खड़े रहना और फिर भी ताकत से अलग दिखना। मगर यह सुकून ज्यादा [संगीत]
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दिन नहीं टिकने वाला था। 25 जून 1975 भारत के इतिहास का सबसे काला दिन। इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी [संगीत] लगा दी। प्रेस पर ताला, विरोध की हर आवाज पर ताला और पुलिस को असीमित [संगीत] अधिकार। सरकार ने एक ही ऐलान किया। अंडरग्राउंड
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कारोबार खत्म होगा और उस लिस्ट में सबसे ऊपर एक ही नाम [संगीत] था। रतन खत्री एक रात आधी रात के बाद वर्ली की उस इमारत के बाहर पुलिस की दर्जनों गाड़ियां सायरन बजाते हुए रुकी। दरवाजा तोड़ा गया। हिसाब
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के रजिस्टर, नकद के थैले, दीवार पर टंगे चाट सब जब्त होने लगा। अंदर रतन खत्री अपने उसी पुराने सफेद कुर्ते में बैठा था। जैसे उसे पहले से ही पता था। पुलिस अफसरों की तरफ देखकर उसने बस इतना कहा, "मैं
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तैयार हूं। चलो। ना हंगामा ना [संगीत] धमकी एक खामोश सरेंडर जैसे यह भी उसके खेल का एक हिस्सा हो। उसे [संगीत] 19 महीने जेल में रखा गया और यहीं से आता है इस कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा। रतन
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जेल के अंदर था। मगर उसका कारोबार बाहर बिना किसी रुकावट के चलता रहा। मुंबई से गुजरात [संगीत] राजस्थान तक हर जगह बैटिंग जारी रही। यह सिर्फ एक आदमी का साम्राज्य [संगीत] नहीं था। यह इतना मजबूत नेटवर्क था कि एक आदमी के जेल जाने से उसकी जड़े
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नहीं हिलती थी। 19 महीने बाद जब रतन बाहर आया तो मुंबई बदल चुकी थी। नए बुकी उभर आए थे। राजनीतिक समीकरण बदल गए थे। बाहर से देखने पर लग रहा था वो वापस सिंहासन पर है। मगर अंदर से दरारें पड़ना शुरू हो
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चुकी थी। इमरजेंसी खत्म हुई। नई सरकार आई और 19 महीनों [संगीत] की जेल ने रतन को डराया नहीं बल्कि उसकी छवि को और बड़ा कर दिया। लोग कहते यह वो आदमी है जो सरकार के सामने भी नहीं झुका। 80 का दशक। मुंबई की
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मिलें एक-एक करके बंद होने लगी। हजारों मजदूर बेरोजगार और जब रोजगार का कोई रास्ता [संगीत] नहीं बचा तो लोगों ने एक लगाकर सब कुछ बदलने के सपने को [संगीत] और कसकर पकड़ लिया। इसी बेचैनी ने मटके की जड़ों को और गहरा कर दिया। रतन का नेटवर्क
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अब माहिम से बांद्रा तक धारावी से अंधेरी तक था। ग्राहकों में मजदूर भी, मिल मालिक भी, टैक्सी ड्राइवर भी, फिल्म निर्माता भी। 1985 से 90 के बीच का वक्त। यह इस साम्राज्य का सबसे सुनहरा दौर था। मंथली टर्नओवर [संगीत] 500 करोड़। पुलिस की जेब
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में पैसा, नेताओं के चुनावी चंदे में पैसा। हर तरफ एक अनकाहा [संगीत] समझौता इस आदमी को छेड़ा नहीं जाएगा। उस दौर में रतन की एक सामान्य सुबह ऐसे शुरू होती। पहले रात भर का पूरा हिसाब किस इलाके में कितना
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आया कहां गड़बड़ी की आशंका है फिर मुलाकातों की बारी कोई फिल्म निर्माता पैसों की जरूरत लेकर कोई नेता चुनावी चंदे की उम्मीद में कोई जरूरतमंद परिवार दरवाजे पर दोपहर तक नए इलाकों में फैलाव की योजनाएं [संगीत] और शाम होते-होते सबसे अहम पल ओपन ड्रॉ
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फिर क्लोज ड्रॉ उन दो वक्तों के बीच पूरा शहर जैसे सांस [संगीत] रोक कर बैठा रहता यह कोई आम कारोबार नहीं था। यह एक ऐसी मशीन थी जो कभी रुकती नहीं थी। मगर कोई भी मशीन हमेशा नहीं चलती। 90 का दशक आते-आते
Speaker A
मुंबई बहुत [संगीत] तेजी से बदल रही थी। 1993 के बम धमाकों ने शहर की रूह हिला दी। दाऊद अब सिर्फ एक डॉन नहीं था। उसका नाम आतंकवाद से जुड़ चुका था। वो पाकिस्तान में [संगीत] बैठकर खेल खेल रहा था। जहां
Speaker A
कभी मटके की पर्चियां उड़ती थी, वहां अब बारूद की गंध थी। और इसी माहौल में रतन खत्री ने एक खामोश मगर बहुत बड़ा फैसला किया। [संगीत] एक फैमिली ट्रिप के दौरान उसका नाम नो फ्लाई लिस्ट में डाल दिया गया
Speaker A
था। यही वो पल था जब उसे एहसास हुआ कि हालात पहले जैसे नहीं रहे। 1993 में उसने सक्रिय वेटिंग से रिटायर होने का मन बना लिया। मगर सरकार उसका इंतजार नहीं करने वाली थी। 1995 महाराष्ट्र में नई सरकार एजेंडे में एक ही
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काम सबसे ऊपर। मटके को हमेशा के लिए खत्म करना। महाराष्ट्र के जुआ विरोधी कानून के तहत मटका पूरी तरह अवैध। मुंबई पुलिस [संगीत] ने मैसिव क्रैकडाउन शुरू किया। दफ्तर सील बोकी गिरफ्तार कई डीलर डर के मारे [संगीत] गुजरात राजस्थान भाग गए। इस
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बार पुलिस का तरीका भी पहले जैसा नहीं था। क्राइम ब्रांच की एक खास टुकड़ी बनाई गई। जिसका इकलौता मकसद था मटके की हर कड़ी तोड़ना। फोन टैप हुए, मुखबिरों का जाल बिछा और [संगीत] इस बार कुछ ऐसे अवसर आगे
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आए जो पुराने रुपयों के दबाव में झुकने को तैयार नहीं थे। हफ्तों के अंदर [संगीत] दर्जनों दफ्तरों पर एक साथ छापे पड़े ताकि किसी को खबर लीक करने का मौका ना मिले। जो नेटवर्क कभी अभैेद्य समझा जाता था, उसकी
Speaker A
कड़ियां एक-एक करके [संगीत] टूट रही थी। रतन खत्री उस वक्त 60 साल से ऊपर था। उसके पुराने एजेंट बिखर रहे थे। और जो नेता कभी उसकी छाया में खड़े रहते थे, वह अब धीरे-धीरे किनारा कर रहे थे। राजनीति का
Speaker A
यही दस्तूर है। जब तक ताकत है सब साथ। जब ताकत ढले सब गायब। [संगीत] 1997 मुंबई की एक अदालत में रतन खत्री पहली बार एक आरोपी की तरह खड़ा हुआ। वो आदमी जिसने तीन दशकों तक पूरे सिस्टम [संगीत] को अपनी
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मुट्ठी में रखा था। आज उसी सिस्टम के सामने जवाब दे रहा था। जुआ अधिनियम के तहत मुकदमा, गवाहियां, तारीखें और आखिरकार सजा। मगर वह सजा उस साम्राज्य के मुकाबले बहुत छोटी थी जो उसने खड़ा किया था। जेल में बिताए उन दिनों में शायद पहली बार रतन
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खत्री ने पीछे मुड़कर देखा। एक कराची [संगीत] का गरीब लड़का जो खाली हाथ मुंबई आया था। जिसने इस शहर को अपनी शर्तों पर जिया। ना डरा ना झुका। जेल से निकलने के बाद रतन खत्री ने तारदेव की एक सोसाइटी
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में बिल्कुल सीधी साधी [संगीत] जिंदगी जीनी शुरू कर दी। 500 करोड़ मंथली वाला साम्राज्य अब एक इतिहास था। मटके का धंधा उसके बिना भी चलता रहा। मगर उस तरह नहीं जैसे रतन के द्वार में चलता था। नए ऑनपरेटर सिर्फ पैसा देखते थे। इंसान नहीं।
Speaker A
जो नैतिकता रतन इस खेल में लाया था। हारने वाले की भी इज्जत बने रहे। एजेंट के साथ धोखा ना हो वो अब कहीं नजर नहीं आती थी। पर्दे के पीछे रतन असल में कैसा था? जो लोग उसे करीब से जानते थे वो बताते हैं
Speaker A
बाहर जितना सख्त घर के अंदर उतना ही सीधा-साधा। ना भारी गहने ना विदेशी गाड़ियों का काफिला। हर रोज मदद मांगने वालों की एक लंबी लाइन, अस्पताल का बिल, बेटी की शादी, किराया। रतन किसी को खाली हाथ नहीं भेजता था। मगर यही सिक्के का एक
Speaker A
पहलू था। दूसरा पहलू यह भी था यही पैसा यही मदद हजारों घरों की तबाही [संगीत] से निकल कर आती थी। एक तरफ कोई बच्चा रतन की मदद से डॉक्टर बन रहा था। दूसरी तरफ कोई बच्चा अपने बाप की मटके की लत की वजह से
Speaker A
स्कूल छोड़ [संगीत] रहा था। यही वह विरोधाभास था जिसने रतन खत्री को इतना जटिल, इतना दिलचस्प और इतना विवादित किरदार बनाया। अब एक और कहानी जो शायद इससे भी ज्यादा अंधेरी है। कल्याण जी भगत वह आदमी जिसने सबसे पहले इस सट्टा बाजार
Speaker A
को खड़ा किया था। जिसकी छाया में रतन ने अपना पहला सबक सीखा। रतन की तरह कल्याण जी कभी सुर्खियों में नहीं आया। उसका कारोबार छोटा होता गया। [संगीत] नाम मटका किंग के साए में दबता गया और बढ़ती उम्र के साथ
Speaker A
उसकी मौत हुई। मगर जो शांति कल्याण जी को नसीब हुई वो उसके परिवार को नहीं मिली। कल्याण जी की मौत के बाद उसका कारोबार बेटे सुरेश भगत के हाथ आया। मगर परिवार के अंदर ही अनबन शुरू हो गई। संपत्ति को
Speaker A
लेकर, हिस्सेदारी को लेकर, कारोबार पर कब्जे को लेकर 13 जून 2008 सुरेश भगत और उनके साथ पांच और लोग अलीबाग से पेन की तरफ जा रहे थे। रास्ते में एक ट्रक ने उनकी गाड़ी [संगीत] को इतनी जोरदार टक्कर
Speaker A
मारी कि गाड़ी में सवार सभी छह लोगों की मौके [संगीत] पर मौत हो गई। पहली नजर में एक सामान्य सड़क हादसा। मगर जब मुंबई क्राइम ब्रांच ने गहराई से जांच शुरू की तो जो सच सामने आया उसने सबको चौंका दिया।
Speaker A
टक्कर मारने वाला ट्रक हादसे के बाद रुका नहीं [संगीत] गायब हो गया। ना ड्राइवर का सुराग ना मालिक सामने आया। जैसे पूरी घटना बहुत सफाई से रची गई हो। दूसरा सवाल सुरेश के हाथ में जो विरासत थी उसकी कीमत
Speaker A
करोड़ों में थी। परिवार के भीतर ही कुछ लोग बंटवारे से नाख थे और तीसरा गाड़ी में सवार सभी छह लोगों की एक साथ [संगीत] मौत। कोई गवाह नहीं बचा। संपत्ति विवाद, पुराने दुश्मन, कारोबार पर कब्जे की लड़ाई यह सब
Speaker A
इस घटना के [संगीत] पीछे की वजह गिनी जाती है। आज तक इस केस की पूरी सच्चाई सामने नहीं आई। और यही वजह है कि यह मुंबई के अंडरग्राउंड इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में शुमार होता है। एक तरफ मटका किंग रतन
Speaker A
खत्री जेल काटी मुकदमा लड़ा मगर अपनी प्राकृतिक मौत मरा। दूसरी तरफ इस खेल की नींव रखने वाले परिवार का वारिस [संगीत] जिसकी मौत आज भी सवालों के घेरे में है। यही फर्क इस पूरी कहानी को [संगीत] इतना खतरनाक बनाता है। 9 मई 2020 पूरी दुनिया
Speaker A
[संगीत] एक महामारी से जूझ रही थी और ठीक इसी दौर में एक खबर आई जिसने पुराने मुंबई को याद करने वाले हर इंसान को एक [संगीत] पल के लिए रोक दिया। रतन खत्री नहीं रहे। 88 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट खबर
Speaker A
अखबार के एक छोटे [संगीत] से कोने में छपी। मगर मुंबई की उन गलियों में जहां कभी मटके की पर्चियां उड़ती थी, एक खामोशी उतर आई। रतन खत्री का जाना सिर्फ एक इंसान का जाना नहीं था। यह एक पूरे युग का अंत था।
Speaker A
दोस्तों, अगर यह कहानी अच्छी लगी तो लाइक जरूर करिए, शेयर करिए और कमेंट में बताइए, आप यह डॉक्यूमेंट्री कहां से देख रहे हैं, और आपका नाम क्या है? और दोस्तों, सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा। ऐसी ही और खतरनाक, सच्ची डॉक्यूमेंट्री आने वाली है।
Speaker A
धन्यवाद। जय हिंद।
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