Speaker A
साल 1983 में इंडियन टीम ने वेस्ट इंडीज को हराकर पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत लिया। इस जीत के बाद कप्तान कपिल देव देश के नए हीरो बन जाते हैं। लेकिन एक और आदमी था जो कपिल देव का दोस्त था, जो कपिल की तरह ही चंडीगढ़ में उनके साथ प्रैक्टिस करता था। कपिल देव की तरह ही तगड़ा ऑलराउंडर था और फास्ट बॉल फेंकता था। यह वो खिलाड़ी था जिसे 6 साल पहले 1977 में इंडिया की अंडर 22 टीम में कपिल देव की जगह सेलेक्ट किया गया था। लेकिन आज एक तरफ कपिल देव वर्ल्ड कप उठा रहे थे तो दूसरी तरफ यह लड़का गुमनामी में जीवन काट रहा था। इस लड़के का नाम था योगराज सिंह। फर्स्ट द [संगीत] डोमेस्टिक क्रिकेट में युवराज सिंह के नाम को बड़े-बड़े क्रिकेटर जानने लगे थे। इसलिए उन्हें इंडियन टीम में खेलने का मौका मिल जाता है। लेकिन युवराज सिंह को सिर्फ एक ही टेस्ट मैच खेलने दिया गया। इसके अलावा उन्होंने छह वनडे मैच खेले लेकिन चोटों और खराब फॉर्म के कारण युवराज सिंह इन मौकों पर ज्यादा अच्छा ना कर सके। युवराज सिंह का करियर यहीं पर खत्म हो जाता है। [हंसी] कुछ बड़े खिलाड़ी जैसे इंडियन टीम के पूर्व कैप्टन हेमु अधिकारी युवराज सिंह को कपिल देव से एक पायदान ऊपर मानते थे। लेकिन योगराज की किस्मत में कुछ और लिखा था। योगराज सिंह की मानें तो सुनील गावस्कर योगराज को और मौके देने के पक्ष में थे। लेकिन BCCI के चीफ सिलेक्टर बने बसंत सिंह बेदी ने यह बात नहीं मानी। इन्हीं दिनों योगराज सिंह के पिता की कैंसर से डेथ हो जाती है। योगराज परिवार में इकलौते बेटे थे। अब जब भी योगराज बाहर मैच खेलने के लिए जाते तो उनका पूरा ध्यान घर पर रहने वाली उनकी अकेली मां, पत्नी और एक साल के बच्चे पर रहता। [संगीत] एक तरफ योगराज इंडियन टीम से निकाले जाने के कारण फ्रस्ट्रेशन से जूझ रहे थे। दूसरी तरफ परिवार को संभालना मुश्किल था। इन दोनों के बीच योगराज अच्छे से प्रैक्टिस नहीं कर पाए और चीजें बिगड़ती चली जाती हैं। एक महान क्रिकेटर का सितारा बिना कुछ किए ही बुझ जाता है। इस बात का मलाल और फ्रस्ट्रेशन युवराज सिंह के अंदर बैठ गया कि इतनी प्रतिभा होने के बाद भी वे घर पर ही रह गए। इन्हीं दिनों योगराज ने अपने ढाई साल के बेटे के लिए एक प्लास्टिक का बल्ला खरीदा जिससे उसने योगराज के सामने ही एक तगड़ा शॉट मार दिया। योगराज को उनके सपने पूरे करने वाला मिल चुका था। युवराज ने अपनी क्रिकेट प्रैक्टिस छोड़ दी और अपना एक नया लक्ष्य बनाया और वह लक्ष्य था युवराज को एक महान क्रिकेटर बनाने का। अपना क्रिकेट करियर छोड़ते समय युवराज सिंह ने एक पब्लिक स्टेटमेंट दिया कि मैं अपने बेटे को सर गारफील्ड सोबर्स और विवियन रिचर्ड्स के लेवल का क्रिकेटर बनाऊंगा। जब मैंने यूवी का स्टेटमेंट दिया कि आई विल [संगीत] मेक माय सनवी लेवल ऑफ सर गार्फिल्ड सोबर्स एंड विन रिचर्ड। इस पर इंडियन एक्सप्रेस के खेल पत्रकार प्रदीप मैगजीन ने लिखा कि मुझे लगता है कि योगराज सिंह पागल हो चुके हैं। उन दिनों अखबारों में योगराज सिंह के लिए जो भी लिखा जा रहा था उन अखबारों और मैगजीन की कतरनों को योगराज ने कटिंग करके अपने पास रखना शुरू कर दिया। योगराज के अनुसार अक्सर लोग उन पर हंसते थे। इसलिए योगराज अब हर हाल में अपने बेटे को टीम इंडिया के लिए खेलते हुए देखना चाहते थे। सारा कुछ यूवी पे ही निकल गया। तेरे को ये करना पड़ेगा। करना होगा। मेरे लिए खेलना पड़ेगा। उसके स्केट्स फेंक दिए। लेकिन अपने जिस बेटे को युवराज सिंह विवियन रिचर्ड के लेवल का महान क्रिकेटर बनाना चाहते थे, उसकी क्रिकेट में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी। युवराज को क्रिकेटर नहीं बनना था। उन्हें पसंद था स्केटिंग और टेनिस। एक टेनिस मैच हारने के बाद युवराज ने ₹2100 का एक महंगा रैकेट तोड़ दिया। इसके बाद युवराज के पिता ने उनका टेनिस खेलना बंद करा दिया। अब युवराज हफ्ते में छ दिन स्केटिंग खेलते और सिर्फ रविवार के दिन क्रिकेट खेलते। युवराज अभी मात्र 11-12 साल के थे कि उन्होंने अंडर 14 स्टे टूर्नामेंट के स्पीड स्केटिंग गेम में गोल्ड मेडल जीत लिया। लेकिन अपने बेटे को शाबाशी देने की जगह युवराज सिंह आग बबूला हो जाते हैं। युवराज ने युवराज से उनका मेडल छीन लिया और स्केट्स [संगीत] छीनकर फेंक दिए और कहा कि लड़कियों का खेल खेलना बंद करो। आज के बाद तो सिर्फ क्रिकेट खेलेगा और सिर्फ क्रिकेट। युवराज चाहते थे कि युवराज क्रिकेटर बने जबकि उनके बेटे को अगर सबसे ज्यादा प्यारी कोई चीज थी तो वो थी स्केटिंग। घर आकर युवराज फूट-फूट कर रोते हैं। युवराज की मां युवराज सिंह से खूब लड़ी। दादी ने भी योगराज को खूब डांटा लेकिन युवराज का मानना था कि अगर किसी चीज को एक्सीलेंट करना है तो एक ही चीज पर फोकस करना होगा 10 पर नहीं। उस शाम जब युवराज जी भरकर रोने के बाद थक जाते हैं तो युवराज ने भी उन्हें गले लगाया और खुद भी फूट-फूट कर रोए। युवराज की मां शबनम हर सुबह युवराज के कमरे में उनके लिए चाय लेकर जाती थी। लेकिन स्केटिंग की घटना के अगले दिन युवराज चाय लेकर आते हैं। युवराज ने अपने पिता से पूछा, क्या आप मेरे साथ क्रिकेट किट खरीदने के लिए चलेंगे या मुझे मॉम के साथ जाना चाहिए? इस बात से युवराज बहुत खुश होते हैं। आखिर उनका बेटा क्रिकेटर खेलने के लिए तैयार हो गया था। युवराज सिंह ने युवराज का पटियाला के फेमस यदविंदर पब्लिक स्कूल में एडमिशन करवा दिया। जहां पास में ही था महारानी क्लब जिसमें क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू प्रैक्टिस करने के लिए आते थे। एक दिन युवराज सिंह युवराज को लेकर महारानी क्लब गए और सिद्धू से युवराज की बैटिंग देखने के लिए कहा। युवराज के कुछ शॉट देखकर सिद्धू ने कहा कि युवराज क्रिकेट के लिए नहीं बना है। यह सुनकर युवराज सिंह युवराज को हॉस्टल लेकर गए और कहा, अपना बस्ता उठा और घर चल। मैं देखता हूं कि तू क्रिकेट कैसे नहीं खेलता। युवराज ने अपने घर के पीछे का खूबसूरत बगीचा उजाड़ दिया और फ्लड लाइट्स के साथ एक मार्बल की पिच बना दी। यहां युवराज सिंह टेनिस बॉल्स को पानी में भिगोकर युवराज की बॉडी पर बॉलिंग करते ताकि उन्हें शॉर्ट बॉल्स खेलना आ जाए। युवराज युवराज को स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की पेस बॉलिंग एकेडमी में भी ले गए। जहां वो युवराज से बिना हेलमेट के बल्लेबाजी करवाते और तेज बॉलर्स से उन्हें बाउंसर डालने के लिए कहते। युवराज अपने बेटे को इतनी ब्रूटल ट्रेनिंग देने लगे कि कई बार युवराज की मां शबनम युवराज से कहती कि तुम मेरे बेटे को मार डालोगे क्या? एक दिन कड़ाके की ठंड में युवराज सुबह-सुबह अपने गर्म बिस्तर को छोड़ना नहीं चाहते थे। इससे युवराज सिंह इतने नाराज हुए कि एक बाल्टी में ठंडा पानी भरकर लाए और युवराज सिंह के ऊपर उड़ेल दिया। एक बार जब युवराज ने एक खराब शॉट खेल दिया तो युवराज सिंह ने गुस्से में नॉन स्ट्राइककर का एक स्टंप उखाड़ा और युवराज की तरफ फेंक मारा। ऐसे ही एक मैच में जब युवराज खराब शॉट खेलकर आउट हुए तो घर आकर युवराज सिंह ने दूध का एक गिलास उठाकर सीधा युवराज की तरफ फेंक कर दे मारा और कहा अगर तुम मेरे बेटे नहीं होते तो मैं आज तुम्हें गोली मार देता। तुमने मेरी रेपुटेशन को बर्बाद कर दिया है और इतनी हार्ड ट्रेनिंग का कोई फायदा नहीं हुआ। जैसे-जैसे युवराज बड़े हो रहे थे, घर में तनाव का माहौल बढ़ता जा रहा था। युवराज के पेरेंट्स भी लगातार आपस में लड़ते रहते। इस माहौल से बचने के लिए युवराज क्रिकेट खेलने के लिए चंडीगढ़ से पटियाला, अमृतसर और दिल्ली निकल जाते। सिर्फ इसलिए कि उन्हें घर पर ना रहना पड़े। आई हेट दिस स्पोर्ट बिकॉज़ बीन वै टफ फॉर मी टफ ऑन मी मेंटली। लेकिन इन सब में अच्छा यह हुआ कि युवराज सिंह की कड़ी ट्रेनिंग युवराज को निखारती जा रही थी। युवराज ने जूनियर क्रिकेट में इतने रन बना दिए कि केवल 15 साल की उम्र में उन्होंने पंजाब की तरफ से रणजी ट्रॉफी में डेब्यू कर दिया। इंटरेस्टिंगली इतनी कम उम्र में मिले मौके पर युवराज ओपनिंग पर आए लेकिन जीरो पर आउट हो जाते हैं और इस मैच में एक कैच भी छोड़ दिया। आगे युवराज को कोई भी मैच नहीं खिलाया गया। इस तरह युवराज का करियर शुरू होने से पहले ही एंड हो गया। युवराज का मजाक उड़ाया जाने लगा। इससे युवराज और उनके पिता दोनों हर्ट हुए। लेकिन युवराज की कहानी अभी बाकी थी। युवराज को पंजाब की तरफ से रणजी मैच खेलने का दूसरा मौका मिला। 2 साल बाद यानी फरवरी 1999 में। सामने हैदराबाद की टीम थी। इस मैच में युवराज ने दो कैच लिए और एक रन आउट भी किया। लेकिन रन मात्र 20 और 18 ही बना सके। एक बार फिर से सवाल उठने लगे कि युवराज इस लेवल पर खेलने लायक हैं भी या नहीं। लेकिन पंजाब के कप्तान विक्रम राठौड़ ने युवराज का साथ दिया और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। नवंबर 1999 में युवराज ने हरियाणा के खिलाफ रणजी का अपना पहला शतक लगा दिया और 149 रन पर आउट हुए। मैच के बाद युवराज ने अपने पिता को फोन किया और खुशी-खुशी बताया कि उन्होंने शतक लगाया है। लेकिन उधर से युवराज ने नाराज होकर कहा कि दो क्यों नहीं बनाए? हालांकि 2 घंटे बाद ही युवराज का फोन वापस आया और उन्होंने अपने बेटे युवराज को Honda City कार गिफ्ट में दी। रणजी में पहले शतक को एक महीना भी नहीं बीता था कि युवराज ने एक और तगड़ी पारी खेल डाली। दिसंबर 1999 में पंजाब और बिहार के बीच कच बिहार ट्रॉफी अंडर 19 का फाइनल मैच खेला जा रहा था। इस मैच की फर्स्ट इनिंग में बिहार की टीम 357 रन पर ऑल आउट हो जाती है। वहीं पंजाब की टीम ने पांच विकेट पर 839 रन पर पारी की घोषणा कर दी। इस इनिंग में अकेले युवराज सिंह ने 358 रन बना डाले। यानी बिहार की पूरी टीम से।











