Speaker A
26 दिसंबर 1955 के दिन एक कंकड़ी मुस्लिम परिवार में दाऊद इब्राहिम का जन्म होता है। दाऊद के पिता इब्राहिम कास्कर मूल रूप से महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के मुमका गांव के रहने वाले थे। इब्राहिम कास्कर के तीन भाई अभी भी रत्नागिरी के खेड़ इलाके में रहते थे। लेकिन इब्राहिम के पिता यानी दाऊद के दादा हसन कास्कर मुंबई के डोंगरी में एक हेयर कटिंग सेलून चलाते थे। इसलिए इब्राहिम ने भी बॉम्बे के डोंगरी में मौजूद टेमकर मोहल्ले में अपना घर बना लिया। यहां 10/10 स्क्वायर फीट के घर में इब्राहिम अपनी बीवी अमीना और 2 साल के बेटे साबिर के साथ रहा करते थे। और इसी घर में दाऊद का जन्म होता है। अंडरवर्ड डॉन दाऊद इब्राहिम 1993 [संगीत] बॉम्बे सिर ब्लास्ट मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम दाऊद इब्राहिम दाऊद इब्राहिम मेरे को कोई कोर्टों में नहीं जाना है। मेरे पास खुद कोर्ट लगी हुई होती है। अनजस्टिस मैं किसी के साथ करता नहीं हूं और ना अपने साथ होने दूंगा। दाऊद के पिता इब्राहिम कासकर मुंबई पुलिस में हेड कास्टेबल थे। लेकिन पुलिस में होते हुए भी मुंबई के उस समय के डॉन करीम लाला के साथ उनका उठना बैठना था। जो दाऊद भाई के बाप थे इब्राहिम भाई और बाबा की बहुत दोस्ती थी। और इसी वजह दाऊद भाई भी बाबा का काफी इज्जत करता था वो। जब दाऊद का जन्म हुआ तो करीम लाला ने ही दाऊद के जन्म की दावत स्पॉन्सर की। इसलिए दाऊद के अंडरवर्ड डॉन बनने की कहानी को उसके जन्म के बाद की कहानी से नहीं समझा जा सकता क्योंकि असली कहानी उसके जन्म से पहले की कहानी में छुपी हुई है। 50 के दशक आते-आते मुंबई देश की आर्थिक राजधानी बन चुकी थी। जहां यूपी और एमपी जैसे राज्यों से बहुत सारे लोग रोजी रोटी कमाने के लिए मुंबई पहुंचने लग जाते हैं। इसलिए मुंबई में नॉर्थ इंडियंस लोगों की काफी जनसंख्या बढ़ चुकी थी। इनमें से ज्यादातर लोग इलाहाबाद, कानपुर, रामपुर और जौनपुर से आए थे और इन्हीं लोगों की संख्या ज्यादा थी जो मुंबई में जगह-जगह अपने हिसाब से बस्तियां बसाकर रहने लगे थे। लेकिन मुंबई में हर किसी को काम मिलना आसान नहीं था। इसलिए इनमें से बहुत से लोग क्राइम से जुड़ने लग जाते हैं। ऐसे ही नॉर्थ से आए लड़कों में से एक था नन्हे खान जो इलाहाबाद से मुंबई आया हुआ था। नन्हे खान आने जाने वाले लोगों को चाकू दिखाकर डराता और उन्हें लूट लिया करता था। मुंबई के भाईखला पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड के हिसाब से नन्हे खान साउथ बॉम्बे का सबसे पहला हिस्ट्री सीटर था। जल्द ही इलाहाबाद से आए हुए और भी लड़के नन्हे खान के गैंग से जुड़ जाते हैं। धीरे-धीरे यह गैंग इलाहाबादी गैंग के नाम से फेमस होने लगता है। मैं 1947 के फौरन बाद की बातें कर रहा हूं कि जॉनी गैंग और नन्हे खान का इलाहाबादी गैंग ये दोनों का आपस में टकराव हो रहा था। धीरे-धीरे भयकला इलाका मुंबई के क्राइम का सेंटर बन जाता है। जहां इलाहाबाद गैंग के अलावा रामपुरी गैंग, कानपुरी गैंग्स और जॉनी गैंग का भी राइज हो रहा था। इस तरह धीरे-धीरे मुंबई में एक से एक क्रिमिनल गैंग्स का जन्म होता है। लेकिन बॉम्बे पर हुकूमत करने वालों में तीन लोग सबसे ज्यादा खास माने जाते हैं। एक हाजी मस्तान, दूसरा वरद राजन, मुदिलियार उर्फ वर्दा भाई और तीसरा करीम लाला पठान। जल्द ही दक्षिण मुंबई में [संगीत] घर-घर में करीम लाला का नाम जाना जाने लगा। हाजी मस्तान का पूरा नाम मस्तान हैदर मिर्जा था जिसका जन्म 1926 में तमिलनाडु के एक छोटे से गांव पन्नाम में हुआ था। बॉम्बे के शुरुआती दिनों में हाजी अपने पिता के साथ मैकेनिक का काम करता था। फिर 18 साल की उम्र में बॉम्बे डॉग्स पर कुली का काम करने लग जाता है। यहां उसने देखा कि कैसे डॉग्स पर आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी लगती है। हाजी ने सोचा कि अगर यह कस्टम ड्यूटी ना देनी पड़े तो कितना मुनाफा कमाया जा सकता है। इसी इललीगल काम में हाजी मस्तान आगे चलकर एक बड़ा आदमी बन जाता है। लेकिन मस्तान को अपने इललीगल कामों के लिए गुंडों वाली मसल पावर भी चाहिए थी। इसलिए उसकी नजर अब थी वरद राजजन डॉन पर। जिस वक्त हाजी मस्तान बॉम्बे डाकयार्ड्स पर काम किया करता था। लगभग उसी दौर में वरद राजन मुदलियार विक्टोरिया टर्मिनस पर कुली का काम करता था। वरद राजन उर्फ वर्दा भाई भी तमिलनाडु के वेलोर कस्बे से बॉम्बे आया था। लेकिन जल्द पैसे कमाने के लिए उसकी दोस्ती चोरों से हो जाती है। 1952 में जब शराब पर बैन लगा तो वर्धा भाई को पैसे कमाने का एक बड़ा मौका मिल जाता है। उन दिनों बॉम्बे का एंटॉप हिल एरिया और धारावी गरीबों की बस्ती हुआ करती थी। यहीं वरद राजन उर्फ़ वर्दा भाई ने अपने अवैध शराब का प्रोडक्शन शुरू कर दिया। उसके काम में पुलिस दखल ना दे इसलिए वो पुलिस की जेब गर्म भी अब करने लगा और इस तरह से वर्दा की शोहरत जो है तमिलनाडु में फैल गई। लोग आके बंबई में जमा होने लगे। लाखों लोगों ने यानी धारावी की बस्ती बाकायदा बहुत से लोग जो हैं ये वर्दा को अपना लीडर कहते थे और ये सब के सब वर्दा की तरफ बहुत ही शुक्रगुजार थे। इस कदर ज्यादा ये लोग वर्दा के वदार हो गए थे कि अब कितने सारे जवान अपनी जाने इस पे कुर्बान करने को तैयार हो गए धीरे-धीरे इसी धंधे से वरद राजजन सेंटर बॉम्बे का डॉन बन जाता है। इस तरह तमिलनाडु से आए हुए दो डॉन्स यानी कि हाजी मस्तान और वरद राजजन की आपस में दोस्ती हो जाती है। जहां हाजी मस्तान का साउथ बॉम्बे और वेस्ट बॉम्बे पर राज था तो वर्दा भाई सेंट्रल बॉम्बे का डॉन था। लेकिन इस तगड़ी में अब एक और नाम जुड़ने वाला था और उसका नाम था करीम लाला पठान। कोई पुख्ता तौर पर नहीं जानता कि अब्दुल करीम खान उर्फ़ करीम लाला बॉम्बे कब आया। माना जाता है कि करीम लाला अपने 30ज में पेशावर से बॉम्बे आया होगा। जहां वह साउथ बॉम्बे की बैदा गली में किराए पर रहने लग जाता है। यहां करीम खान गैंबलिंग यानी कि जुए का अड्डा सेट करता है। जुआ खेलने वाले लोग उससे पैसे भी उधार लेते थे। मुनाफा कमाने के लिए उसने एक नियम बनाया कि उधार लेने वाले लोग महीने की 10 तारीख को उसे ब्याज का पैसा जरूर देंगे। ऐसे में हर महीने की 10 तारीख को उसका गल्ला पैसों से बढ़ जाता। इससे मोटिवेट होकर उसने पैसे उधार देने को ही अपना बिजनेस बना लिया और इस तरह करीम खान से वह करीम लाला बन जाता है। इस तरह पठान कम्युनिटी के लोग बॉम्बे में सेट हो जाते हैं और धीरे-धीरे साउथ बॉम्बे में करीम लाला का रुतबा बढ़ने लग जाता है। करीम लाला का नाम इतना बड़ा हो जाता है कि सिर्फ उसके नाम से ही लोगों को डराया जा सकता था और कामों को चुटकियों में करवाया जा सकता था। जैसे ही मकान मालिक कहता अब तो लाला को बुलाना पड़ेगा। किराएदार घर छोड़ देते। करीम के काम में मुंबई पुलिस के भी बहुत से पुलिस वाले इनवॉल्व थे। करीम लाला की इस पावर की हाजी मस्तान को भी खबर थी। इसलिए मस्तान ने लाला को एक डील ऑफर की। इस डील के मुताबिक करीम लाला के गैंग के लड़के यानी कि पठान गैंग के लड़कों को हाजी मस्तान और डॉग पर आने वाले सामान को प्रोटेक्ट करना होगा। बदले में करीम लाला को कंसाइनमेंट की मार्केट वैल्यू के हिसाब से कट दिया जाएगा। यह डील बॉम्बे अंडरवर की सबसे खतरनाक डील साबित होती है। क्योंकि हाजी मस्तान का दिमाग और करीम लाला की मसल पावर दोनों अब अलायंस में आ चुकी इललीगल काम धंधे होने की वजह से मुंबई अंडरवर को पुलिस को भी मैनेज करना होता था। इसलिए बहुत से पुलिस वाले इनडायरेक्टली मुंबई अंडरवर की मदद भी किया करते थे। इधर दाऊद के पिता इब्राहिम कासकर मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच में हेड कॉन्स्टेबल थे। उन दिनों मुंबई पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल की इज्जत बड़े अफसरों से भी ज्यादा होती थी क्योंकि ग्राउंड पर इन्हीं लोगों का काम रहता था। इसलिए गैंगस्टर हाजी मस्तान और करीम लाला का भी दाऊद के पिता इब्राहिम कास्कर के साथ उठना बैठना था। जहां दूसरे पुलिस वाले करीम लाला के घर से जेबें भरकर जाते थे। वहीं इब्राहिम कासकर करीम लाला से पैसे का लालच नहीं करते थे और अपनी ₹75 की सरकारी तनख्वाह से ही काम चलाते थे। इसलिए इब्राहिम कासकर एक अकेले पुलिस वाले थे जिनकी करीम लाला इज्जत करता था और उम्र में बड़ा होने के बाद भी करीम लाला इब्राहिम को भाई कहकर बुलाता था। इसलिए जब दाऊद का जन्म हुआ तो करीम लाला ने ही दाऊद के जन्म की दावत स्पॉन्सर की। दाऊद के बाद इब्राहिम के 10 बच्चे और होते हैं। लेकिन एक सैलरी में इतने बच्चों को पालना इब्राहिम के लिए काफी चैलेंजिंग हो रहा था। कई बार तो बच्चों को खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल पाता था। लेकिन इब्राहिम ने दाऊद को अपने बाकी बच्चों से ज्यादा प्रायोरिटी दी। जहां दाऊद के दूसरे भाई म्युनिसिपालिटी स्कूल में पढ़ने के लिए जाते थे और बहन उर्दू स्कूल में पढ़ने के लिए जाती थी। तब दाऊद का एडमिशन नागपाड़ा के अहमद सेलर हाई स्कूल में करवाया गया। दाऊद पर इब्राहिम की मेहरबानी के पीछे निराले शाह बाबा की भविष्यवाणी थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि इब्राहिम का दूसरा बेटा यानी कि दाऊद आगे चलकर काफी पावरफुल, फेमस और पैसे वाला बनेगा। इब्राहिम को निराले शाह बाबा पर पूरा भरोसा था, विश्वास था। इसलिए बाकी बच्चों के मुकाबले इब्राहिम ने दाऊद को अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा। दाऊद के सिक्स्थ क्लास में पहुंचने तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन 1966 में इब्राहिम कासकर पुलिस से सस्पेंड हो जाते हैं। यह साफ नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ था। पर माना जाता है कि एक हाई प्रोफाइल मर्डर केस को सॉल्व करने में फेल होने की वजह से उन पर यह एक्शन लिया गया था। इब्राहिम कासकर के सस्पेंड होने के बाद घर के हालात











