अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेषों और पुरातात्विक खोजों की सच्चाई पर आधारित विस्तृत चर्चा।
Key Takeaways
- अलेक्जेंडर कनिंघम की खोजों का बाबरी मस्जिद विवाद से सीधा संबंध नहीं था।
- पुरातात्विक खोजों में मंदिर के अवशेषों के दावे विवादित और पक्षपाती रूप से उपयोग किए गए।
- फ्यूरिक ने बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने का पहला पुरातात्विक दावा किया।
- अयोध्या के इतिहास में बौद्ध और हिंदू दोनों संस्कृतियों के प्रभाव के प्रमाण मिले।
- सुप्रीम कोर्ट ने पुरातात्विक साक्ष्यों को अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना।
What the video covers
- अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे पुराने मंदिर या बौद्ध मंदिरों के अवशेषों की खोज का इतिहास।
- सर अलेक्जेंडर कनिंघम की 1844 की यात्रा और उनके द्वारा चीनी यात्रियों फाहियान और हिं सांग के विवरणों की जांच।
- कनिंघम ने अयोध्या के मंदिरों का निरीक्षण किया, लेकिन विक्रमादित्य के समय के पुराने मंदिर नहीं पाए।
- कनिंघम ने राम जन्मभूमि या बाबरी मस्जिद के बारे में सीधे तौर पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं दिया।
- कनिंघम की रिपोर्ट को दोनों पक्षों ने अपने-अपने दावों के समर्थन में इस्तेमाल किया।
- 1889-1911 के बीच एएसआई के एलोइस एंटोन फ्यूरिक ने बाबरी मस्जिद के नीचे एक विशाल मंदिर के अवशेष होने का दावा किया।
- फ्यूरिक ने कसौटी पत्थर के खंभों को मंदिर के अवशेष बताया और स्थानीय कथाओं का हवाला दिया।
- पुरातात्विक अवशेषों और ऐतिहासिक यात्रियों के विवरणों के आधार पर अयोध्या के इतिहास की समीक्षा।
- बाबर या उसके सेनापतियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने के ऐतिहासिक साक्ष्यों की जांच।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले में आर्कियोलॉजिकल एविडेंस की भूमिका और विवादित तथ्यों की व्याख्या।
Chapters
- 00:00बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर और बौद्ध अवशेषों की चर्चा
- 03:30सर अलेक्जेंडर कनिंघम की भारत यात्रा और पुरातात्विक खोज
- 11:00कनिंघम की अयोध्या यात्रा और चीनी यात्रियों के विवरण की जांच
- 17:00कनिंघम की रिपोर्ट और मंदिरों की स्थिति
- 18:30अयोध्या के प्रमुख स्थलों का पुरातात्विक महत्व
- 19:00कनिंघम की रिपोर्ट का विवादित उपयोग
Full Transcript — Download SRT & Markdown
Speaker A
क्या सच में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे ही कोई पुराना मंदिर था या वहां सच में बौद्ध मंदिरों के अवशेष मिले?
Speaker A
क्या बाबर या उसके किसी सेनापति ने सच में राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई?
Speaker A
क्या मंदिर को तोड़े जाने के बारे में कोई ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं?
Speaker A
सदियों पहले भारत की यात्रा करने वाले विदेशी यात्रियों ने अयोध्या और राम मंदिर के बारे में क्या लिखा?
Speaker A
अयोध्या से मिले विष्णु हरि शिलालेख की असलियत क्या है, जिसके ऊपर दोनों पक्ष अलग-अलग दावे करते हैं?
Speaker A
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आर्कियोलॉजिकल एविडेंस के बारे में क्या कहा?
Speaker A
क्या है अयोध्या में हुई पुरातात्विक खुदाई की असली सच्चाई? जानेंगे आज के इस एपिसोड में।
Speaker A
नमस्कार, मैं श्याम मीरा सिंह।
Speaker A
साल मेजर जनरल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
Speaker A
ताकि ढाई दशक भारत में काम करने के बाद वह अपने मुल्क लौट सके।
Speaker A
लेकिन इंग्लैंड पहुंचने पर उसे पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार ने उसकी 20 साल पुरानी मांग को मान लिया है।
Speaker A
लिहाजा उसे दोबारा भारत लौटना पड़ता है।
Speaker A
इस ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर का नाम था सर अलेक्जेंडर कनिंघम।
Speaker A
एक स्कॉटिश शायर के घर पैदा हुआ कनिंघम पैसे से ब्रिटिश इंडियन आर्मी में इंजीनियर थे।
Speaker A
साल 1844 में कनिंघम की पोस्टिंग बनारस में होती है।
Speaker A
अक्सर कनिंघम सैर करने के लिए सारनाथ की तरफ निकल जाया करते थे।
Speaker A
इसी दौरान कनिंघम की नजर सारनाथ में मौजूद 145 फीट ऊंचे टीले पर पड़ती है।
Speaker A
स्थानीय लोगों के अनुसार यह टीला किसी पुराने महाजन से जुड़ा हुआ था।
Speaker A
लेकिन 21 साल के नौजवान कनिंघम का इंजीनियरिंग दिमाग इसे पचा नहीं पा रहा था।
Speaker A
कनिंघम को लगता है कि यह कुछ और चीज है।
Speaker A
यह कोई साधारण टीला भर नहीं है, बल्कि इसमें कुछ गुण इतिहास छुपा हुआ है।
Speaker A
अपनी इस जिज्ञासा की खोज में कनिंघम ने सारनाथ के इस टीले की पड़ताल करनी शुरू कर दी।
Speaker A
इसी दौरान कनिंघम को यहां एक ईंट पर एक छोटा सा शिलालेख लिखा मिलता है।
Speaker A
लेकिन कनिंघम के लिए इस शिलालेख की लिपि को समझना मुश्किल था।
Speaker A
इसलिए कनिंघम ने इस शिलालेख को एशियाटिक सोसाइटी के अपने पुराने मित्र जेम्स प्रिंसेप को भेज दिया।
Speaker A
प्रिंसेप ने कनिंघम को बताया कि ईंट से इस बात की तस्दीक होती है कि यही वो जगह है जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था।
Speaker A
यह वो मौका था जब कनिंघम की दिलचस्पी भारत के पुरातात्विक इतिहास की तरफ जागती है।
Speaker A
साल आर्कियोलॉजिकल सर्वेयर नियुक्त कर दिया जाता है।
Speaker A
यह सपना था जिसका इंतजार कनिंघम हम वर्षों से कर रहे थे।
Speaker A
और अपने इस सपने के पूरे होने पर कनिंघम इंग्लैंड से भारत लौट आते हैं।
Speaker A
आर्कियोलॉजिकल सर्वेयर नियुक्त होने के बाद कनिंघम ने भारत के पुरातात्विक इतिहास की खोज शुरू कर दी।
Speaker A
लेकिन उससे पहले दो-तीन लाइन में यह जान लेते हैं कि पुरातात्विक इतिहास किसे कहते हैं।
Speaker A
दरअसल इंसानों का इतिहास हजारों लाखों साल पीछे जाता है।
Speaker A
इंसानी सभ्यता के विकास के दौरान बहुत से अवशेष बचते गए।
Speaker A
पुराने शहर, मकानों की दीवारें, सड़कें, गलियां, नालियां, सिक्के, मूर्तियां, बर्तन और लोहे, कांसे या पत्थरों के अथर आदि आदि।
Speaker A
इन सबको सामूहिक तौर पर पुरातात्विक अवशेष कहा जाता है।
Speaker A
और इन पुरातात्विक अवशेषों के अध्ययन को ही पुरातात्विक इतिहास कहा जाता है।
Speaker A
प्राचीन भारत में अलग-अलग समय पर अलग-अलग देशों से यात्री आए।
Speaker A
इन यात्रियों ने भारत के बारे में अपने ब्योरे या कहें कि यात्रा वृतांत लिखे कि भारत में उन्हें क्या मिला, क्या नहीं मिला।
Speaker A
भारत के बारे में इन यात्रियों के लिखे लेख आगे चलकर भारत के इतिहास को लिखने के काम आते हैं।
Speaker A
ऐसे ही चीन से चौथी शताब्दी में फाहियान नाम का एक यात्री आता है।
Speaker A
और सातवीं शताब्दी में हिं सांग नाम का यात्री आता है।
Speaker A
अब कनिंघम ने फाहियान और हिं सांग के द्वारा भारत के बारे में दिए गए उनके ब्यौरे की परख करनी शुरू कर दी।
Speaker A
फाहियान और हिं सांग ने अपने ब्यौरे में उन रास्तों का जिक्र किया जिन- जिन रास्तों से वे गुजरे थे।
Speaker A
अब कनिंघम ने भी उन रास्तों की यात्रा शुरू कर दी जिन रास्तों से यह दोनों यात्री कभी गुजरे थे।
Speaker A
अपनी तफ्तीश को कनिंघम ने फोर रिपोर्ट्स ड्यू द इयर्स 1862, 63, 64 और 65 के नाम से प्रकाशित करवाया।
Speaker A
कनिंघम अपनी खोजी यात्रा के दौरान अयोध्या भी पहुंचते हैं।
Speaker A
अयोध्या पर उनकी जांच का मुख्य विषय था चीनी तीर्थ यात्रियों के ब्यौरे की जांच करना।
Speaker A
कनिंघम ने पाया कि फाहियान के द्वारा दर्ज किया गया शहर साची और हिं सांग के द्वारा दर्ज किया गया शहर साकेत दरअसल कोई और शहर नहीं बल्कि अयोध्या है।
Speaker A
और अयोध्या को ही श्रीलंका के बौद्ध ग्रंथों में साकेत के नाम से दर्ज किया गया है।
Speaker A
कनिंघम की सबसे ज्यादा दिलचस्पी दोनों चीनी यात्रियों द्वारा दिए गए एक वट वृक्ष पर थी।
Speaker A
फाहियान और हिं सांग ने लिखा था कि शहर के पूर्वी किनारे पर एक वट वृक्ष था।
Speaker A
और जिसके बारे में कहा जाता था कि भगवान बुद्ध ने एक बार दातून करने के बाद उसे जमीन पर रूप दिया था।
Speaker A
दातून ने कुछ दिन में जड़ें पकड़ लीं और पेड़ की शक्ल ले ली।
Speaker A
इस वट वृक्ष के बारे में प्रसिद्ध था कि यह 7 फीट से ज्यादा ऊंचा नहीं बढ़ता।
Speaker A
कनिंघम ने उस जगह की पहचान की जहां वट वृक्ष के होने की बात कही गई थी।
Speaker A
लेकिन कनिंघम को वट वृक्ष नहीं मिला।
Speaker A
कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में अयोध्या के इतिहास के बारे में भी संक्षिप्त टिप्पणी दर्ज की।
Speaker A
कनिंघम का मानना था कि रामायण में दिए गए अयोध्या के ब्यौरे बहुत पुराने हैं।
Speaker A
धर्म ग्रंथों की परंपरा के अनुसार अयोध्या महाभारत के युद्ध के समय नष्ट हो गई थी।
Speaker A
बाद में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने अयोध्या को फिर से बसाया।
Speaker A
परंपरा के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने यहां पर 360 मंदिर भी बनवाए थे।
Speaker A
लेकिन कमाल की बात यह रही कि जब कनिंघम अपनी खोज पर निकले तो उन्हें इनमें से एक भी मंदिर नहीं मिला।
Speaker A
कनिंघम ने अयोध्या के कई मंदिरों का मुआयना किया।
Speaker A
लेकिन यह सब मंदिर इतने पुराने नहीं थे कि इन्हें विक्रमादित्य के जमाने का कहा जा सके।
Speaker A
कनिंघम को औरंगजेब के दौर से पुराने मंदिर नहीं मिलते।
Speaker A
कनिंघम ने लिखा कि अगर मंदिर रहे भी होंगे तो शायद उन्हें बाद में मुसलमानों ने तोड़ दिया होगा।
Speaker A
हालांकि यह पूरी तरह से कनिंघम का तुक्का था।
Speaker A
इसके पीछे कोई तथ्य नहीं दिया गया।
Speaker A
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कनिंघम ने अयोध्या में तीन जगहों को प्रात महत्व का माना।
Speaker A
एक सुग्रीव पर्वत, दूसरा मणि पर्वत और तीसरा कुबेर पर्वत।
Speaker A
लेकिन फाहियान और हिं सांग ने इन तीनों जगहों की पहचान बौद्ध स्मारकों के तौर पर दर्ज की थी।
Speaker A
कनिंघम ने ना तो राम जन्मभूमि के बारे में कुछ लिखा और ना ही बाबरी मस्जिद के बारे में लिखा।
Speaker A
सिवाय इस बात के कि लक्ष्मण घाट से पाव मील की दूरी पर शहर के बीचोंबीच जन्म स्थान है।
Speaker A
कनिंघम अयोध्या ना तो राम मंदिर की पड़ताल करने के लिए गए थे और ना ही बाबरी मस्जिद की।
Speaker A
उनका पूरा जोर फाहियान और हिं सांग के रों की जांच करना था।
Speaker A
लेकिन उनकी रिपोर्ट को हिंदू और मुस्लिम पक्ष की तरफ से अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल किया गया।
Speaker A
एक पक्ष शहर के बीच में जन्मस्थान होने की बात कहता, तो दूसरा कहता कि कनिंघम को अयोध्या में कोई मंदिर ही नहीं मिला था।
Speaker A
इस तरह कनिंघम की यात्रा, जिसका मंदिर और मस्जिद से कोई लेना देना नहीं था, उसकी तुरपाई दोनों पक्षों के द्वारा अपने-अपने तरीके से बिछाई जाने लगती है।
Speaker A
अयोध्या के इतिहास को जानने का दूसरा पुरातात्विक प्रयास साल 1889 और 1911 के बीच हुआ।
Speaker A
इस साल एएसआई के सर्वेयर अधिकारी एलोइस एंटोन फ्यूरिक का सर्वे किया।
Speaker A
जर्मन मूल के इस आर्कियोलॉजिस्ट ने पहली बार इस बात का दावा किया कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक पुराना विशाल मंदिर है।
Speaker A
एलोइस एंटोन फ्यूरिक ने लगे कसौटी पत्थर के आठ पिलर को मंदिर के अवशेषों से लिया हुआ बताया।
Speaker A
फ्यूरिक ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि स्थानीय लोगों के मुताबिक मुसलमानों की जीत से पहले अयोध्या में तीन महत्त्वपूर्ण मंदिर थे।
Speaker A
जन्मस्थान, स्वर्ग द्वार और त्रेता के ठाकुर।
Speaker A
इनमें से पहले मंदिर यानी जन्मस्थान पर मीर खान ने बाबर के शासन के वक्त मस्जिद कायम की, जो कि अब भी उसके नाम से जानी जाती है।
Speaker A
पुराना मंदिर काफी अच्छा रहा होगा, उसके कुछ खंभों को मुसलमानों ने मस्जिद बनाने के लिए काम में ले लिया।
Speaker A
मजबूत काले पत्थरों से बने यह खंभे, जिन्हें स्थानीय लोग कसौटी पत्थर कहते हैं, 7 से 8 फीट लंबे हैं।
Speaker A
ऐसा फ्यूरिक ने अपनी रिपोर्ट में लिखा।
Topics:बाबरी मस्जिदअयोध्याराम मंदिरसर अलेक्जेंडर कनिंघमपुरातत्वफाहियानहिं सांगएलोइस एंटोन फ्यूरिकआर्कियोलॉजिकल सर्वेसुप्रीम कोर्ट











