अमिताभ बच्चन और गांधी परिवार के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत रिश्तों की जटिल कहानी का विश्लेषण।
Key Takeaways
- अमिताभ बच्चन और गांधी परिवार के रिश्ते राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर जटिल थे।
- बुफोर्स स्कैम ने अमिताभ की राजनीतिक यात्रा को प्रभावित किया।
- राजनीतिक दबावों और आर्थिक संकट के कारण अमिताभ ने राजनीति छोड़ दी।
- अमिताभ ने बाद में टीवी के जरिए अपनी लोकप्रियता वापस हासिल की।
- गांधी परिवार और बच्चन परिवार के बीच विवादों ने दोनों पक्षों को प्रभावित किया।
What the video covers
- गांधी परिवार और अमिताभ बच्चन के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत रिश्तों की शुरुआत और विकास।
- अमिताभ बच्चन का कांग्रेस से जुड़ना और इलाहाबाद सीट से चुनाव लड़ना।
- राजीव गांधी, वीपी सिंह और धीरूभाई अंबानी के बीच राजनीतिक जटिलताएं।
- बुफोर्स घोटाले में अमिताभ बच्चन के नाम आने के बाद उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत मुश्किलें।
- अमिताभ का राजनीति छोड़ना और लंदन में मानहानि मुकदमा लड़ना।
- अमिताभ बच्चन के आर्थिक संकट और एबीसीएल कंपनी की समस्याएं।
- गांधी परिवार और बच्चन परिवार के बीच विवाद और तनाव।
- अमिताभ बच्चन का टीवी शो 'कौन बनेगा करोड़पति' के माध्यम से वापसी।
- अमर सिंह और बच्चन परिवार के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव।
- राजनीतिक और फिल्मी दुनिया के बीच अमिताभ बच्चन की जटिल भूमिका।
Chapters
- 00:00गांधी परिवार और अमिताभ बच्चन के रिश्तों की शुरुआत
- 01:43अमिताभ का कांग्रेस से जुड़ना और चुनावी सफर
- 05:08राजनीतिक जटिलताएं: वीपी सिंह, धीरूभाई अंबानी और अमिताभ
- 06:46बुफोर्स स्कैम और अमिताभ की राजनीतिक मुश्किलें
- 08:20अमिताभ का राजनीति छोड़ना और लंदन में मुकदमा
- 11:30अमिताभ की आर्थिक समस्याएं और एबीसीएल की कहानी
- 14:40गांधी परिवार और बच्चन परिवार के बीच विवाद
- 16:59अमिताभ की वापसी: टीवी और केबीसी
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Speaker A
गांधी परिवार, नेहरू परिवार ने भारतवर्ष के ऊपर सदियों से राज किया है। वो राजा हैं। हम रंक हैं। राजा निर्धारित करेगा कि किसके साथ उसको संबंध बनाना है। किसके साथ उसको दोस्ती निभानी है। रंक नहीं निर्धारित कर सकते।
Speaker A
गांधी परिवार 40 साल से राजनीति में है। भारत के लोग जानते हैं कौन किसको धोखा देता है। किसने कौन काम किया है, कौन धोखा देता है। हमें बोलने की जरूरत नहीं है। राजीव गांधी ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद रजुल्लाह से खुद कॉल करके पर्सनल
Speaker A
गारंटी ली कि जब तक अफगानिस्तान में शूटिंग हो रही है, अमिताभ को कुछ भी नहीं होना चाहिए। स्कैम में जिन अकाउंट्स में पैसे आए थे, उनमें से एक अकाउंट अमिताभ बच्चन के भाई अमिताभ बच्चन का था। लेकिन बाद में जब जांच हुई तो पता चला कि यह खबर
Speaker A
किसी ने। अमिताभ ने एप्लीकेशन डाला कि वे कर्ज नहीं चुका पा रहे। इसलिए उनकी कंपनी अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी एबीसीएल कंपनी को सिख कंपनी घोषित कर दिया जाए। संकट की इस घड़ी में अमर सिंह ने अमिताभ बच्चन को सुब्रत रॉय और अनिल
Speaker A
अंबानी से मिलवाया। अमर सिंह के इस एहसान के कारण ही जया बच्चन अमर सिंह को देवर कहने लगी। एक दिन सोनिया गांधी ने अमिताभ बच्चन से कहा कि उन्हें राहुल की फीस की बहुत चिंता है। क्या वे राहुल के सिर्फ
Speaker A
फीस का इंतजाम कर सकते हैं? इधर जया बच्चन गांधी परिवार पर टिप्पणियां करने लगी। उधर राहुल गांधी भी अब बच्चन परिवार को टारगेट करने लगे। 18 फरवरी 1997 के दिन प्रियंका गांधी की शादी होने वाली थी और अमिताभ
Speaker A
बच्चन ने इससे ठीक 1 दिन पहले की डेट पर अपनी बेटी श्वेता की शादी रख दी। लोग कहने लगे कि कांग्रेस सरकार आने के बाद केवल 3 साल में ही अमिताभ बच्चन को इनकम टैक्स के 37 नोटिस भेज दिए गए। जहां तक कि एक रे
Speaker A
बैन के चश्मे के लिए भी उन्हें नोटिस भेज दिया गया। इस पर दुखी होकर अमर सिंह ने कहा कि अमिताभ ने अपने जन्मदिन में सबको बुलाया। अपने स्पॉट बॉयज तक को भी बुलाया लेकिन मुझे नहीं बुलाया। आदमी से अच्छा तो कुत्ता होता है। अगर
Speaker A
उसको खिलाओ तो याद रखता है। आदमी भूल जाता है। क्योंकि आदमी का चरित्र यह है कि माल जिसका खाता है, प्यार जिससे पाता है, उसके ही सीने में भुगता घटार।
Speaker A
नमस्कार, मैं श्याम मीरा सिंह। अमिताभ बच्चन पर यह हमारा दूसरा एपिसोड है। इससे
Speaker A
पहले के एपिसोड में हमने बच्चन परिवार और गांधी परिवार के रिश्ते की शुरुआत के बारे में, अमिताभ की बॉलीवुड जर्नी के बारे में और अमिताभ को फिल्म दिलाने में, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के रोल और रेखा, जया
Speaker A
और अमिताभ के लव ट्रायंगल के बारे में और सिख दंगों में अमिताभ पर लगे आरोपों के बारे में बात की थी। उसके आगे की कहानी इस फाइनल एपिसोड में डिस्कस करेंगे। 31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा गांधी की
Speaker A
हत्या कर दी जाती है। इसी शाम राजीव गांधी को देश का प्रधानमंत्री बना दिया गया। इंदिरा गांधी का कार्यकाल पूरा होने ही वाला था। इसलिए 1985 के जनवरी महीने में सामान्य तौर पर देश में चुनाव होने जा रहे
Speaker A
थे। लेकिन इंदिरा की मौत के बाद अब चुनावों को टालकर दिसंबर 1984 में ही कराने का फैसला ले लिया गया। इस वक्त राजीव गांधी कुछ ऐसे जॉइंट किलर्स को ढूंढ रहे थे जो अटल बिहारी वाजपेयी और हेमवती नंदन बहुगड़ा जैसे बड़े अपोजिशन लीडर्स को
Speaker A
टक्कर दे सकें। इसके लिए राजीव के कजिन अरुण नेहरू ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया। अमिताभ को मनाने के लिए एक टेलीफोन कॉल की गई और इस कॉल के बाद अमिताभ बच्चन कांग्रेस की तरफ से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। हालांकि
Speaker A
अरुण नेहरू का यह भी मानना है कि अमिताभ खुद भी राजनीति में आना चाहते थे। इस तरह अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद सीट से हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ चुनाव में लड़ाया जाता है। जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे और इस पूरे इलाके को अच्छी तरह
Speaker A
से जानते थे। हेमवती नंदन बहुगड़ा ने कहा कि कांग्रेस ने एक नचनिया को टिकट देकर इस हाई प्रोफाइल सीट के लोगों की पॉलिटिकल इंटेलिजेंस का अपमान किया है। शुरुआत में अमिताभ की चुनावी रैलियों में भी हजारों लोग अमिताभ को देखने के लिए आते लेकिन लग
Speaker A
नहीं रहा था कि वे जीत पाएंगे। लेकिन जब जया बच्चन भी अमिताभ के सपोर्ट में प्रचार करने के लिए इलाहाबाद पहुंच गई तो माहौल बदल जाता है। जया बच्चन ने एक मजे हुए राजनेता की तरह प्रचार किया। जया बच्चन ने
Speaker A
घर-घर जाकर वोटर्स से इमोशनल अपील की कि मैं बहू होने के नाते आपके पास आई हूं। मुझे इलाहाबाद से मेरी मुंह दिखाई चाहिए और रुपयों में नहीं बल्कि वोटों में। जया बच्चन की मेहनत का असर भी दिखा और अमिताभ
Speaker A
ने हेमवती नंदन बहुा को वोट्स से हरा दिया। इधर राजनीति में आने के बाद अमिताभ के फिल्मी करियर पर बुरा असर पड़ने लगा। 1984 में आई फिल्म शराबी के बाद साल 1985 में मर्द और 1986 में आखिरी रास्ता जैसी फिल्में आई जो
Speaker A
ज्यादा नहीं चली। इलाहाबाद से सांसद बनने के बाद अमिताभ का राजनीतिक प्रभाव काफी अधिक बढ़ चुका था। अब वे मिनिस्टर से लेकर ऑफिसर्स के ट्रांसफर और पोस्टिंग्स में दखल देने लगे। इस कारण कांग्रेस के सीनियर लीडर्स खुश नहीं थे और इन्हीं में से एक
Speaker A
थे। राजीव गांधी की सरकार के फाइनेंस मिनिस्टर वीपी सिंह। वीपी सिंह भी इलाहाबाद से आते थे और अमिताभ से पहले इलाहाबाद की सीट से सांसद भी रह चुके थे। इस तरह इलाहाबाद क्षेत्र और यूपी अमिताभ बच्चन और वीपी सिंह दोनों के लिए एक कॉमन
Speaker A
ग्राउंड था। अमिताभ की राजीव गांधी से नजदीकी थी जिसे वीपी सिंह खुद के लिए एक राजनीतिक खतरे की तरह देखते थे। इन्हीं दिनों वीपी सिंह का बिजनेसमैन धीरूभाई अंबानी से झगड़ा चल रहा था। फाइनेंस मिनिस्टर वीपी सिंह भ्रष्टाचार और बड़े
Speaker A
उद्योगपतियों की मोनोपोली के खिलाफ थे। इसलिए वे धीरूभाई अंबानी की पुरानी फाइलें खुलवा रहे थे। वी सिंह के करीबी अधिकारी दबे छुपे यह आरोप लगा रहे थे कि अमिताभ और उनके भाई अमिताभ बच्चन ने स्विस बैंक अकाउंट्स में बहुत पैसा छुपा रखा है। वीपी
Speaker A
सिंह के इशारे पर ही अमेरिका की प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी द फेयरफक्स ग्रुप से भी अजताब की स्विस प्रॉपर्टीज की जांच कराई जा रही थी। अफवाहें उड़ने लगीं कि फेयरफक्स जांच एजेंसी को मैगने एडोल ब्रदर्स नाम की एक कंपनी के स्विस बैंक
Speaker A
अकाउंट्स में ₹650 करोड़ मिले हैं जो बच्चन परिवार और इंडियन लिंक वाले इटालियंस की कंपनी है। हालांकि तब ऐसी कोई भी कंपनी होने का कोई सबूत नहीं मिला लेकिन इन अफवाहों से अमिताभ की मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। एक तरह से वित्त मंत्री
Speaker A
वीपी सिंह की पॉलिसीज की वजह से अमिताभ बच्चन और धीरूभाई अंबानी दोनों की दिक्कतें बढ़ रही थीं। राजीव गांधी भी धीरूभाई अंबानी को खास पसंद नहीं करते थे। अब इस कारण भी धीरूभाई मुश्किल में थे। अब धंधा जिंदा रखना है तो धीरूभाई के लिए
Speaker A
राजीव से दूरियां खत्म करना जरूरी हो गया। जो सिर्फ एक आदमी करवा सकता था और वह थे अमिताभ बच्चन। इस तरह वीपी सिंह के कारण धीरूभाई और अमिताभ दोनों साथ आ जाते हैं। अक्टूबर 1986 में अमिताभ ने धीरूभाई और
Speaker A
राजीव के बीच एक मीटिंग अरेंज करवाई। इस मीटिंग में धीरूभाई ने राजीव के मन में यह शक पैदा करने की कोशिश की कि उनके दुश्मन यानी वीपी सिंह राजीव के साथ भी गद्दारी कर रहे हैं। क्योंकि अमिताभ की मुश्किलें
Speaker A
बढ़ने का मतलब था राजीव के लिए भी मुश्किलें बढ़ना। क्योंकि अमिताभ राजीव के क्लोज फ्रेंड थे। इससे राजीव को लगने लगा कि वीपी सिंह उनके पुराने दोस्त अमिताभ बच्चन के जरिए उन्हें निशाना बनाने की साजिश रच रहे हैं। अब धीरे-धीरे राजीव ने
Speaker A
अपनी ही सरकार के पावरफुल मिनिस्टर वीपी सिंह की पावर कम करनी शुरू कर दी। दोनों के बीच ऐसी सिचुएशन बनी कि कुछ ही समय के भीतर यानी 1987 में वीपी सिंह को अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। वीपी
Speaker A
सिंह के इस्तीफा देने के 4 दिन बाद ही साल 1987 में बुफोर्स स्कैम सामने आ गया। जिसमें आरोप लगा कि स्वीडन की एक हथियार कंपनी बोफोर्स ने $1.3 अरब डॉलर का तोप खरीद कर इंडियन आर्मी का कॉन्ट्रैक्ट पाने
Speaker A
के लिए इंडियन एजेंट्स और इंडियन पॉलिटिशियंस को बड़ी रिश्वत दी थी। स्वीडिश न्यूज़पेपर डोंगस नेटर ने आरोप लगाया कि बुफोर्स स्कैम में जिन अकाउंट्स में रिश्वत के पैसे लिए गए थे, उनमें से एक अकाउंट किसी और का नहीं बल्कि अमिताभ
Speaker A
बच्चन के भाई अमिताभ बच्चन का था। बुफोर्स स्कैम में नाम आने के बाद अमिताभ बच्चन को बुफोर्स का दलाल भी कहा जाने लगा। वह फ़ स्कैम अमिताभ के जीवन के सबसे मुश्किल समय में से एक था। अंततः परेशान होकर अमिताभ बच्चन
Speaker A
ने साल 1987 में ही सांसदी से इस्तीफा दे दिया और राजनीति छोड़ दी। यहां दो थ्योरीज हैं। एक यह कि अमिताभ ने राजीव और सोनिया की मर्जी के खिलाफ जाकर राजनीति छोड़ी थी। वहीं राजीव के पॉलिटिकल सेक्रेटरी रहे
Speaker A
माखन लाल फोतेदार अपनी किताब में बताते हैं कि एक दिन राजीव ने अमिताभ से कहा कि फोतेदार चाहते हैं कि तुम रिजाइन कर दो। जिससे फोतेदार हैरान रह गए क्योंकि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं था। वहीं अमिताभ भी इससे हैरान हो गए थे। अमिताभ ने
Speaker A
कहा कि अगर फोतेदार जी चाहते हैं कि मैं रिजाइन करूं तो मैं रिजाइन कर दूंगा। बताइए कहां साइन करना है? इसके बाद अमिताभ ने लोकसभा सांसदी से इस्तीफा दे दिया। यह एक दूसरी थ्योरी है। बुफोर्स स्कैम में नाम
Speaker A
आने के बाद अमिताभ बच्चन को भी स्विट्जरलैंड छोड़ना पड़ा और वे लंदन जाकर बस गए। यहां उन्होंने लंदन हाईकोर्ट में स्वीडिश न्यूज़पेपर डोंगिस नेटर के खिलाफ डेफेमेशन यानी मानहानि का केस कर दिया। 3 साल बाद इस डेफेमेशन मामले का फैसला आता है
Speaker A
जिसमें अमिताभ की जीत होती है यानी बच्चन परिवार की ज
Speaker A
वजह से ये स्कैम बाहर आया था उनके द्वारा लीक किए गए 350 से ज्यादा डॉक्यूमेंट्स के दम पर किया था। चित्रा सुब्रमण्यम ने कहा कि उनकी रिपोर्ट्स में केवल पांच स्विस बैंक अकाउंट्स के बारे में बताया गया था।
Speaker A
लेकिन जांच के लिए स्वीडन गई इंडियन टीम ने सिक्स्थ यानी छठवें बैंक अकाउंट को जोड़कर न्यूज़ पेपर डोंगस नेतर में राजीव के दोस्त अमिताभ बच्चन का नाम प्लांट किया। अमिताभ को झूठा फंसाने वाले यह लोग कौन थे यह सामने नहीं आया। चित्रा
Speaker A
सुब्रमण्यम ने यह भी कहा कि बच्चन परिवार को स्कैम में फंसाने के लिए उन पर भारी दबाव डाला गया था। अमिताभ इस स्कैम में शामिल थे या नहीं मालूम लेकिन वोफुल स्कैम के कारण राजीव गांधी की सरकार चली गई और
Speaker A
वे 1989 का चुनाव हार गए। इंटरेस्टिंगली जिन वीपी सिंह ने राजीव गांधी से मनमुटाव के कारण कांग्रेस से इस्तीफा दिया था वे जनता दल की मिलीजुली सरकार में अब देश के नए प्राइम मिनिस्टर बन गए। अब वीपी सिंह
Speaker A
की सरकार में अमिताभ को खूब परेशान किया जाने लगा। उनके पुराने केस खोल दिए गए। स्विट्जरलैंड में ₹45 लाख का फ्लैट खरीदने पर अमिताभ के खिलाफ फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट यानी फेरा का केस कर दिया गया। इधर अमिताभ ने राजनीति छोड़कर
Speaker A
फिल्मों पर फोकस करना शुरू कर दिया था। लेकिन बुफोर्स स्कैम में नाम आने के कारण यानी नेगेटिव पब्लिसिटी के कारण उनकी रेपुटेशन को बड़ा धक्का लगा था। अब अमिताभ की फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूटर्स उनकी फिल्में खरीदने से मना करने लगे। वहीं कई
Speaker A
एक्टर्स, डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स भी उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे। इस बीच 1988 में अमिताभ के दोस्त टिन्नू आनंद ने उन्हें शहंशाह फिल्म में कास्ट कर लिया। शहंशाह फिल्म के खिलाफ पॉलिटिकल प्रोटेस्ट हुए, लेकिन यह फिल्म काफी हिट रही।
Speaker A
हालांकि 1989 में आई अमिताभ की फिल्में गंगा, जमुना, सरस्वती, तूफान और जादूगर तीनों ही फ्लॉप रहीं। कहा जाने लगा कि अमिताभ के दिन लद गए हैं। द इलस्ट्रेटेड वीकली नाम की मैगज़ीन ने अमिताभ पर एक कवर स्टोरी छापी जिसकी हेडलाइन थी फिनिश्ड।
Speaker A
जिन दिनों अमिताभ को फिनिश बताया जा रहा था तभी 1990 में उनकी फिल्म अग्निपथ आई जिसमें विजय दीनाना चौहान के रोल के लिए अमिताभ को बेस्ट एक्टर का नेशनल अवार्ड मिलता है। इसी तरह 1991 में हम फिल्म आई
Speaker A
जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसका गाना जुम्मा चुम्मा दे दे बहुत ज्यादा हिट साबित हुआ। चुम्मा चुम्मा दे दे। इसी साल अमिताभ बच्चन लंदन में स्वीडिश न्यूज़पेपर से रिलेटेड डेफेमेशन के केस की हियरिंग के लिए गए हुए थे। तभी उनके पास
Speaker A
खबर पहुंची कि उनके दोस्त राजीव गांधी की हत्या कर दी गई है। अमिताभ जल्दी से वापस आए और प्रियंका के साथ मिलकर अंतिम संस्कार का इंतजाम अपने हाथ में ले लेते हैं ताकि राहुल घर पर अपनी मां सोनिया के
Speaker A
साथ रह सकें। अमिताभ बच्चन ने सोनिया गांधी को राजनीति में ना आने की सलाह दी और वह खुद भी राजनीति में नहीं आना चाहती थी। इस कारण सोनिया गांधी ने राजनीति की जगह अपने पति की विरासत को संभालने में
Speaker A
अपना ध्यान लगाया और राजीव गांधी फाउंडेशन बनाया जिसमें शुरू में अमिताभ बच्चन भी एक ट्रस्टी थे। साल 1992 में अमिताभ की खुदा गवाह फिल्म आई जो इस साल की दूसरी सबसे बड़ी हिट साबित हुई। इस मौके पर अपने
Speaker A
दोस्त राजीव को याद करते हुए अमिताभ ने बताया कि कैसे राजीव ने अफगानिस्तान में उनकी फिल्म की शूटिंग में मदद की थी। राजीव ने अफगानिस्तान के प्रेसिडेंट रहे मोहम्मद नजीबुल्लाह से पर्सनली फोन करके इस बात की गारंटी ली थी कि अमिताभ बच्चन
Speaker A
को अफगानिस्तान में हो रही शूटिंग के दौरान कोई भी परेशानी ना आए वो सेफ रहें। खुदा गवाह फिल्म के बाद अमिताभ ने फिल्मों से 5 साल का लंबा ब्रेक ले लिया और अमेरिका में जाकर रहने लगे। कहा जाता है
Speaker A
कि अमिताभ यहां पर न्यूयॉर्क के आइकॉनिक ट्रंप टावर में रहे। जब अमिताभ अमेरिका में थे तभी उन्होंने अपने सबसे एंबिशियस प्रोजेक्ट के बारे में प्लान किया। वो ₹1000 करोड़ की एक ऐसी कंपनी बनाना चाहते थे जो फिल्म प्रोडक्शन से लेकर
Speaker A
डिस्ट्रीब्यूशन तक सारा काम खुद करें और डिसऑर्गेनाइज्ड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में कुछ प्रोफेशनलिज्म आए। इस तरह जन्म हुआ अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी एबीसीएल कंपनी का। अमिताभ ने अपने फेस पर इन्वेस्टर्स से ठीक-ठाक पैसे इकट्ठे कर लिए जिससे कंपनी शुरू हुई। अमिताभ की
Speaker A
कंपनी ने पहले साल बहुत अच्छा परफॉर्म किया और ₹15 करोड़ का प्रॉफिट कमाया। लेकिन इसके बाद मिसमनेजमेंट और कई फ्लॉप्स के कारण एबीसीएल कंपनी घाटे में चली जाती है। साल 1997 में अमिताभ ने दोबारा से मृत्युदाता फिल्म के थ्रू बॉलीवुड में
Speaker A
वापसी की जिसे एबीसीएल कंपनी के तहत ही बनाया गया। लेकिन मृत्युदाता फिल्म पहले दिन ही डूब गई। इस पर इंडिया टुडे मैगज़ीन ने लिखा बॉलीवुड का आखिरी आइकॉन भी खत्म हुआ। अमिताभ की एबीसीएल कंपनी को सबसे ज्यादा घाटा मिस वर्ल्ड कंपटीशन ऑर्गेनाइज
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करने से हुआ। साल 1996 में एबीसीएल पहली बार मिस वर्ल्ड कंपटीशन को इंडिया लेकर आई जो बोर में हुआ। यह वैसे तो सक्सेसफुल रहा। इसकी काफी चर्चा हुई लेकिन इसमें एबीसीएल का बहुत ज्यादा पैसा डूब जाता है। कंपनी को एक रात में ही ₹7 करोड़ का
Speaker A
नुकसान हो गया। 1999 आते-आते एबीसीएल कंपनी 70.82 करोड़ के घाटे में थी। जबकि कंपनी की टोटल नेटवर्थ ही 60.52 करोड़ थी। जब एबीसीएल को कर्ज देने वाली बैंक अपना पैसा वापस मांगने लगी तो अमिताभ ब्यूरो फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंसियल
Speaker A
रिकंस्ट्रक्शन यानी बीआई अफेयर के पास पहुंच जाते हैं और एबीसीएल को सिख कंपनी घोषित करने की रिक्वेस्ट करते हैं ताकि कर्जदारों से राहत मिल सके। लेकिन इससे अमिताभ के जोहू स्थित घर प्रतीक्षा पर खतरा आ जाता है। क्योंकि वह एबीसीएल कंपनी
Speaker A
द्वारा लिए गए लोंस के पर्सनल गारंटर थे। जब अमिताभ बच्चन की प्रतिष्ठा दाव पर थी तब अमर सिंह उनकी मदद के लिए सामने आते हैं और उन्हें सहारा ग्रुप के मालिक सुब्रत रॉय और Reliance कंपनी के मालिक अनिल अंबानी से कनेक्ट किया। अमिताभ भी
Speaker A
मानते हैं कि इस मुश्किल समय में अमर सिंह ने ही उनका साथ दिया। अमिताभ अपने पड़ोसी यश चोपड़ा के पास पहुंचे और उनसे कहा कि वे बैंककरप्ट हो चुके हैं और उन्हें काम चाहिए। यश चोपड़ा ने उन्हें अपने बेटे
Speaker A
आदित्य चोपड़ा की फिल्म मोहब्बतें में रोल दिलवाया। अब पैसों के लिए अमिताभ ने टीवी पर काम करना भी शुरू कर दिया और स्टार टीवी के क्विज शो कौन बनेगा करोड़पति यानी केबीसी को होस्ट करने लगे। 2 जुलाई 2000
Speaker A
के दिन केबीसी का पहला एपिसोड आता है जिसकी व्यूअरशिप ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस तरह कुछ साल में ही अमिताभ ने अपना पूरा कर्ज उतार दिया। 1999 में बीबीसी ने एक पोल किया जिसमें अमिताभ बच्चन को सदी का ग्रेटेस्ट स्टार चुना गया
Speaker A
और यहीं से उन्हें सदी के महानायक का टैग मिला। एबीसीएल की बैंककरप्सी के दौरान अमर सिंह ने जो मदद की उससे वे बच्चन परिवार के बेहद खास बन गए और उन्हें परिवार का हिस्सा माना जाने लगा। अमिताभ उन्हें अपना
Speaker A
छोटा भाई कहने लगे। वहीं जया बच्चन अमर सिंह को देवर मानने लगी। 2004 में अमर सिंह के सपोर्ट से ही जया बच्चन ने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरुआत की और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद बनी। अमिताभ नहीं चाहते थे कि जया राजनीति में आए।
Speaker A
लेकिन अमर सिंह ने अमिताभ बच्चन को राजी कर लिया। जहां एक तरफ अमर सिंह बच्चन परिवार के खास बन गए थे। वहीं दशकों तक उनके सबसे खास रहे नेहरू गांधी परिवार से उनकी दूरियां बढ़ती जा रही थी। कहा जाता
Speaker A
है कि 1996 और 98 में जब एबीसीएल और अमिताभ मुसीबत में थे तभी बच्चन और नेहरू गांधी परिवार के बीच संबंध खराब हो गए। दोनों परिवार के संबंध खराब क्यों हुए इसको लेकर कई थ्योरीज हैं। जहां सोनिया गांधी को लगा कि राजीव की हत्या के बाद
Speaker A
बच्चन परिवार ने उनका साथ नहीं दिया। वहीं बच्चन परिवार इस चीज से नाराज था कि वह जब फाइनेंसियल क्राइसिस में फंसे हुए थे तब नेहरू गांधी परिवार ने उनकी कोई मदद नहीं की। इसके पीछे एक दूसरा कारण यह भी माना
Speaker A
जाता है जिसे लेकर पूर्व सांसद और पत्रकार रहे संतोष भारतीय अपनी किताब वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं में जिक्र करते हैं। दरअसल राजीव की मौत के समय राहुल गांधी हार्व में पढ़ रहे थे और सोनिया को उनकी फीस की चिंता होती थी। इस
Speaker A
पर संतोष भारती अपनी किताब में लिखते हैं कि एक दिन सोनिया गांधी ने अमिताभ बच्चन से कहा कि उन्हें राहुल गांधी की फीस की बहुत चिंता है और क्या वे सिर्फ फीस का इंतजाम कर सकते हैं? इस पर अमिताभ बच्चन
Speaker A
ने जवाब दिया पैसे तो ललित सूरी और सतीश शर्मा ने गड़बड़ कर दिए। कुछ है ही नहीं लेकिन मैं कुछ करूंगा। इसके 2 दिन बाद अमिताभ ने $1000 का चेक भिजवा दिया। इससे सोनिया को बहुत बुरा लगता है और उन्होंने
Speaker A
यह चेक वापस लौटा दिया और इसे अपना अपमान मानते हुए अमिताभ को अपनी जिंदगी से बाहर निकाल दिया। यह भी कहा जाता है कि नेहरू गांधी परिवार ने भी एबीसीएल में इन्वेस्ट किया था जिस पर उन्हें बड़ा घाटा उठाना
Speaker A
पड़ा था और पैसे के लेनदेन के कारण ही बच्चन परिवार और गांधी परिवार के बीच में अनबन हुई। साल 1997 में सबके सामने आ गया कि दोनों परिवारों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। 18 फरवरी 1997 को प्रियंका गांधी की
Speaker A
शादी होने वाली थी। तभी अमिताभ बच्चन ने इससे केवल एक दिन पहले अपनी बेटी श्वेता की शादी रख दी। कहा जाता है कि बच्चन परिवार ने 17 फरवरी को श्वेता की शादी इसलिए रखी थी ताकि प्रियंका गांधी की शादी
Speaker A
को ओवर शैडो किया जा सके। गांधी परिवार से कोई भी श्वेता की शादी में नहीं आया। लेकिन अमिताभ अपनी बेटी की शादी करने के बाद सुबह ही मुंबई से दिल्ली पहुंचते हैं और प्रियंका की शादी में शामिल होते हैं।
Speaker A
कहा जाता है कि इस घटना से सोनिया गांधी बहुत हर्ट हुई और उन्हें बहुत अकेला महसूस हुआ। आगे साल 1999 में अमिताभ ने अपने बेटे अभिषेक की पहली फिल्म रिफ्यूजी के प्रीमियर के लिए सोनिया गांधी को इनविटेशन भेजा तो वे इसमें नहीं आई। इस तरह इंडिया
Speaker A
की सबसे हाई प्रोफाइल और चर्चित फ्रेंडशिप का अंत हो गया। वहीं जया बच्चन के समाजवादी पार्टी में जाने और 2004 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में नेहरू गांधी परिवार पर अटैक ने चीजों को और अधिक बिगाड़ दिया। एक रैली में जया बच्चन ने
Speaker A
कहा जिन लोगों ने हमको राजनीति में आगे बढ़ाया उन्होंने बीच में ही हमारा साथ छोड़ दिया। साथ तब छोड़ा जब हम तकलीफ में थी। यह लोग हमेशा धोखा देते हैं। वहीं राहुल गांधी ने जवाब में जया बच्चन पर झूठ
Speaker A
बोलने का आरोप लगाया और कहा कि उनकी लॉयलिटीज बदल गई हैं। इस बीच अमिताभ की मां तेजी बच्चन ने अमिताभ से इस मामले को शांत करने के लिए कहा जिसके बाद उन्होंने कहा वो राजा हैं और हम रंक हैं। संबंधों
Speaker A
का जारी रहना राजा के मूड पर डिपेंड करता है। सोनिया गांधी तेजी बच्चन को अपनी तीसरी मां मानती थी। ऐसे में जब तक तेजी बच्चन जीवित थी, दोनों परिवारों का रिश्ते सुधरने की उम्मीद थी, संभावना थी। लेकिन 21 दिसंबर 2007 को तेजी बच्चन की मौत हो
Speaker A
जाती है। उनके साथ ही चार पीढ़ियों तक दोनों परिवारों का जो संबंध चल रहा था, वह पूरी तरह टूट जाता है। साल 2004 में देश में कांग्रेस के गठबंधन की सरकार आने के बाद अमिताभ बच्चन को कई टैक्स नोटिस भेजे
Speaker A
गए। साल 2005 में जब अमिताभ बच्चन एक सीरियस इंटेस्टाइनल यानी कि आंत की गंभीर बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती थे तब भी उन्हें 4.5 करोड़ का नोटिस मिला जिसे उन्होंने अपने हॉस्पिटल के बिस्तर से ही भर दिया। इसके बाद अमिताभ को कभी उनके 2.7
Speaker A
लाख के चश्मे के लिए नोटिस आया तो कभी अभिषेक को गिफ्ट की गई एक कार के लिए नोटिस आया। साल 2006 तक बच्चन परिवार को करीब 37 इनकम टैक्स नोटिस मिल चुके थे। इस दौरान अमिताभ एग्रीकल्चर लैंड खरीदने को
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लेकर भी मुसीबत में फंस गए। दरअसल अमिताभ ने साल 2000 में पुणे के लोनावाला में 24 एकड़ एग्रीकल्चर लैंड खरीदी थी। लेकिन महाराष्ट्र में नियम है कि एग्रीकल्चर लैंड खरीदने के लिए किसान होना जरूरी है। इसलिए 2005 में पुणे डिस्ट्रिक्ट अथॉरिटीज
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ने अमिताभ बच्चन को एक नोटिस भेजकर खुद को किसान साबित करने के लिए कहा। अमिताभ ने खुद को उत्तर प्रदेश का किसान बताया और बाराबंकी के दौलतपुर गांव में फार्म लैंड होने के डॉक्यूमेंट्स पेश किए। उन्होंने बाराबंकी के डीएम का लेटर भी दिया जिसमें
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उन्होंने कहा कि गांव में साल 1982 से ही अमिताभ के पास जमीन है इसलिए वह किसान है। लेकिन 2007 में अमिताभ को बड़ा झटका लगा। उत्तर प्रदेश की फैजाबाद कोर्ट ने कहा कि बाराबंकी में अमिताभ को लैंड ट्रांसफर
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इललीगल था और अमिताभ ने फर्जी डॉक्यूमेंट्स के सहारे यह जमीन अपने नाम करवाई थी। यह जमीन पंचायत की थी जिसे भूमिहीन गरीबों को दिया जाना था। लेकिन मुलायम सिंह सरकार ने इसे अमिताभ को दे दिया। इस तरह अमिताभ को कोर्ट के और अधिक
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चक्कर काटने पड़े। इस पर समाजवादी पार्टी ने कहा कि अमर सिंह और मुलायम सिंह से नजदीकी के कारण बच्चन परिवार को परेशान किया जा रहा है। पॉलिटिकल सर्किल्स में यह भी कहा जाता है कि अमर सिंह के कारण नेहरू
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गांधी परिवार और बच्चन परिवार का रिश्ता टूटा जो जया बच्चन को गांधियों के खिलाफ उकसाते थे। हालांकि अमर सिंह हमेशा इन आरोपों से इंकार करते रहे हैं। साल 2009 और 10 में अमर सिंह और बच्चन परिवार की दोस्ती भी उस समय टूट गई जब अमर सिंह
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न्यूक्लियर डील से संबंधित कैश फॉर वोट्स वाले मामले में फंस गए थे। जब इस मामले में अमर सिंह जेल में थे तब बच्चन परिवार से कोई भी उनसे मिलने जेल नहीं गया। इस कारण भी बच्चन परिवार और अमर सिंह के बीच
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में रिश्ते खराब हो जाते हैं। साल 2012 में अमिताभ के 70वें जन्मदिन की पार्टी में मुलायम सिंह यादव को बुलाया गया। लेकिन अमर सिंह गेस्ट लिस्ट से गायब थे। इस पर अमर सिंह ने कहा कि अमिताभ के स्पॉट
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बॉयज तक को बुलाया गया लेकिन उन्हें नहीं। कहा जाता है कि अमर सिंह और बच्चन परिवार के बीच जया बच्चन की राज्यसभा सीट के कारण भी दूरियां आई। दरअसल जब साल 2010 में अमर सिंह को समाजवादी पार्टी से निकाल दिया
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गया तो उनके कहने पर जया प्रदा संजय दत्त और मनोज तिवारी जैसे एक्टर्स ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी। लेकिन जया बच्चन ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनके राज्यसभा टर्म में सिर्फ 6 महीने
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बचे हैं और वे इसे पूरा करना चाहती हैं। लेकिन इसके बाद भी जया बच्चन ने समाजवादी पार्टी नहीं छोड़ी और वे आगे भी पांच बार से समाजवादी पार्टी की तरफ से राज्यसभा सांसद बनती रही। इस पर अमर सिंह का कहना
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था कि उनके लिए ब्रेकिंग पॉइंट वह था जब अमिताभ ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने बच्चन परिवार को सहारा के बोर्ड से निकलने पर मजबूर किया। मई 2015 में दिल्ली में मिले सरकारी बंगले को खाली करते समय एक
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इंटरव्यू में अमर सिंह ने कहा कि मुझे बंगला जाने का बुरा नहीं लग रहा। मुझे ज्यादा बुरा इस बात का लग रहा है कि एक समय पर जिन लोगों को मैंने अपना परिवार कहा था उन्होंने मुझे अकेला छोड़ दिया। घर
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बेजान होते हैं, लेकिन ह्यूमन रिलेशंस उनके लिए आप सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। मैंने जीवन से सीखा है कि हमें दूसरों के लिए लड़ने के बजाय प्रगमेटिक और प्रैक्टिकल होना चाहिए। अमर सिंह के इस बयान को बच्चन परिवार के खिलाफ एक बयान के
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तौर पर देखा गया। अमर सिंह कहते हैं कि वे अमिताभ बच्चन को अपना बड़ा भाई मानते थे, लेकिन अमिताभ बागवान नहीं है जो रोल उन्होंने फिल्म में किया था बल्कि बाघ उजाड़ हैं कम से कम इमोशनली। अमर सिंह से
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अलग होने के बाद साल 2010 में अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्रांड एंबेसडर बने जिससे कांग्रेस नाराज हो गई। अमिताभ बच्चन के इस स्टेप को कांग्रेस नरेंद्र मोदी के सपोर्ट के तौर पर देख रही थी। साल 2014 में अमिताभ बच्चन गुजरात सरकार के एक ऐड में
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भी आए और उन्हें नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाने लगा। जब सवाल उठे तो अमिताभ बच्चन ने नरेंद्र मोदी को सेकुलर बताया। इस बीच अमिताभ ने कई बार ट्वीट करके महंगाई, रुपए की गिरती कीमत और पेट्रोल डीजल के इश्यूज पर कांग्रेस की गठबंधन
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सरकार को टारगेट किया। साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आ जाती है और कांग्रेस पूरी तरह से सत्ता से बाहर हो जाती है। इसी बीच साल 2016 में अमिताभ बच्चन पर एक बार फिर से सीरियस एलगेशंस
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लगते हैं। कई देशों के जर्नलिस्ट द्वारा की गई पनामा पेपर्स इन्वेस्टिगेशन में दावा किया गया कि अमिताभ बच्चन और उनकी बहू ऐश्वर्या राय बच्चन टैक्स हेवन कंट्रीज यानी टैक्स हेवन प्लेसेस जैसे ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड और बहामास में कंपनियों के डायरेक्टर थे। टैक्स हेवन
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कंट्रीज उन्हें कहा जाता है जहां पर बहुत कम टैक्स होता है या होता ही नहीं है जिसके कारण अमीर लोग अक्सर अपने देशों से टैक्स बचाने के लिए फर्जी कंपनियां बनाकर अपना पैसा इन टैक्स सेवन कंट्रीज में छुपा
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देते हैं। पनामा की लॉ फर्म मौसेक फसेका अमीरों के लिए ऐसी ही फर्जी कंपनियां बनाती थी। इसके 1.1 करोड़ लीक्ड डॉक्यूमेंट्स की जांच में सामने आया कि एबीसीएल कंपनी शुरू करने से 2 साल पहले यानी 1993 में अमिताभ को टैक्स एवंस में
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चार ऑफसोर शिपिंग कंपनीज़ का डायरेक्टर बनाया गया था। इनमें से एक कंपनी ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड और तीन कंपनियां बहामास में थी। चारों कंपनियों के मैनेजिंग डायरेक्टर कोई और नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन ही थे। $5000 से लेकर $00 की ऑथराइज्ड कैपिटल
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वाली इन कंपनियों ने लाखों डॉलर्स के जहाज खरीदे और बेचे थे। पनामा पेपर में लगे इन आरोपों पर अमिताभ बच्चन ने कहा कि इन चारों कंपनियों के बारे में वे कुछ नहीं जानते। हो सकता है कि उनके नाम का मिसयूज
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किया गया हो। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि वे झूठ बोल रहे हैं और वे 1994 में टेलीफोन कॉन्फ्रेंस के जरिए दो कंपनियों की बोर्ड मीटिंग्स में शामिल हुए थे। यही नहीं बहामास की ट्रंप शिपिंग लिमिटेड जिसके अमिताभ डायरेक्टर थे
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उसने 1994 में बहामास की ही एक दूसरी कंपनी नाइल शिपिंग लिमिटेड से एक जहाज खरीदा था और यह कंपनी अमिताभ के भाई अमिताभ बच्चन की थी। यह कंपनियां 1993 में बनाई गई थी। 2003 तक आरबीआई के रूल्स के
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मुताबिक कोई भी भारतीय नागरिक विदेश में कंपनी नहीं बना सकता था। इसी तरह पनामा पेपर्स में ब्रिटिश वर्जन आइलैंड की एमिक पार्टनर्स लिमिटेड नाम की एक कंपनी भी मिली जिसके डायरेक्टर्स कोई और नहीं ऐश्वर्या राय बच्चन उनके पेरेंट्स और भाई
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थे। यह कंपनी मई 2005 में बनी थी और जून 2005 में दुबई में चारों डायरेक्टर्स की एक मीटिंग भी हुई थी जिसमें ऐश्वर्या और उनकी मां को शेयर होल्डर्स बनाया गया था। आगे ऐश्वर्या राय बच्चन ने डॉक्यूमेंट्स में अपना नाम मिसेज ए राय करने को कहा
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ताकि उनकी पहचान छिपी रहे। कॉन्फिडेंशियल रहे। आगे साल 2008 में इस कंपनी को बंद कर दिया गया। इससे 1 साल पहले 20 अप्रैल 2007 में ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन की शादी हुई थी। इस मामले में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट
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ने अमिताभ बच्चन को नोटिस भेजकर सवाल पूछे। वहीं ईडी ने ऐश्वर्या राय बच्चन को अपने ऑफिस बुलाकर पूछताछ की। हालांकि आगे इस मामले में कुछ नहीं हुआ और पनामा मामले की जांच दबकर रह गई। हालांकि पनामा पेपर्स के कारण पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज
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शरीफ को जेल जाना पड़ा। माल्टा के प्रधानमंत्री जोसेफ मस्कट को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिंह मंडोर को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन भारत में पनामा पीपर्स की कोई ढंग की जांच नहीं की गई और
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इसके लिए नरेंद्र मोदी सरकार से कोई भी सवाल पूछा भी नहीं गया मीडिया के द्वारा। अमिताभ की शानदार फिल्मों के कारण उन्हें करोड़ों दर्शकों का प्यार और सम्मान मिला। लेकिन उनकी पब्लिक लाइफ में दो बड़े आरोप लगते रहे। पहला यह कि वे पॉलिटिशियन से
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अपने नजदीकी का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते रहे और काम निकलने पर उनका साथ छोड़ देते हैं। पहले नेहरू गांधी परिवार था और फिर अमर सिंह और मुलायम सिंह जैसे नेता दूसरा आरोप यह भी लगता है कि वे जनता
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से रिलेटेड मुद्दों पर कुछ नहीं बोलते और बिना रीड वाले स्टार हैं। कांग्रेस के समय रुपए की कीमत, महंगाई, पेट्रोल, डीजल आदि की कीमतों पर सवाल उठाने वाले अमिताभ बच्चन आज इन चीजों की दोगुनी कीमतें हो जाने पर भी खामोश हैं। बीते 10 सालों में
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उन्होंने एक ट्वीट नहीं किया जो महंगाई, पेट्रोल और रुपए की कीमत से जुड़ा हो। हालांकि सवाल यहां पर यह भी उठता है कि यह हमारी गलती है या अमिताभ बच्चन की है। अमिताभ बच्चन हमेशा से एक एक्टर रहे हैं
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और उससे ज्यादा कुछ नहीं। कांग्रेस सरकार ने उन्हें टारगेट किया तो उन्होंने भी कांग्रेस को टारगेट किया। इससे ज्यादा क्रांति ना अमिताभ ने की थी और ना शायद हमें उम्मीद करनी चाहिए। यह हमारी गलती है कि हम पत्रकारों, एक्टिविस्टों और सामाजिक
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कार्यकर्ताओं को टारगेट करते हैं और एक्टर और खिलाड़ियों को नेशनल हीरो मानते हैं और उनसे उम्मीद करते हैं और सोचते हैं कि वे जनता की आवाज उठाएंगी। आपको क्या लगता है कि अमिताभ या उनके जैसे जितने भी स्टार्स
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हैं क्या इन्हें लोगों के इंपॉर्टेंट इश्यूज रेज करने चाहिए? क्योंकि इन्हें जो भी शोहरत मिलती है वो जनता से ही मिलती है। जनता ही इन्हें नायक बनाती है या फिर यह बात सही है कि इन स्टार्स का काम सोशल
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या पॉलिटिकल इश्यूज उठाना नहीं है बल्कि अपने काम पर ध्यान देना है। अपनी फिल्मों पर ध्यान देना है। आपका क्या मत है? कमेंट करके हमें जरूर बताएं। नमस्कार।
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