पप्पू यादव के जीवन और राजनीति की काली सच्चाई, उनके अपराधी अतीत और बिहार की मंडल राजनीति की कहानी।
Key Takeaways
- पप्पू यादव का राजनीतिक सफर अपराध और बाहुबली राजनीति से शुरू होकर समाज सेवा तक पहुंचा।
- मंडल आयोग के बाद बिहार में जातीय संघर्ष और बाहुबली राजनीति ने क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित किया।
- पप्पू यादव की लोकप्रियता यादव जाति और पिछड़े वर्ग के बीच उनकी भूमिका से जुड़ी है।
- उनके चुनावी करियर में कई विवाद और चुनाव रद्द होने की घटनाएं शामिल हैं।
- राजनीति में बाहुबली तत्वों की उपस्थिति ने बिहार की राजनीति को जटिल और हिंसक बनाया।
What the video covers
- पप्पू यादव का जन्म 24 दिसंबर 1967 को मधेपुरा, बिहार में हुआ था, उनका असली नाम राजेश रंजन था।
- उनका परिवार जमींदार था और वे बचपन से ही संघर्ष और झगड़ों में लिप्त रहे।
- कॉलेज के दौरान पप्पू यादव ने हथियार रखना शुरू किया और जेल में लोकल हिस्ट्री सीटर अर्जुन यादव से जुड़े।
- 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
- मंडल आयोग के लागू होने के बाद बिहार में जातीय संघर्ष बढ़ा, जिसमें पप्पू यादव यादव जाति के नेता के रूप में उभरे।
- पप्पू यादव और आनंद मोहन सिंह के बीच कोसी-सीमांचल क्षेत्र में सिविल वॉर जैसी स्थिति बनी।
- पप्पू यादव की राजनीतिक छवि बाहुबली नेता की रही, जिन पर हत्या और चुनावी धांधली के आरोप लगे।
- उनका पहला लोकसभा चुनाव रद्द हो गया था, और बाद में मधेपुरा में उपचुनाव हुआ जिसमें जनता दल के शरद यादव ने भाग लिया।
- पप्पू यादव ने अपने आपराधिक अतीत से दूरी बनाते हुए समाज सेवा में भी सक्रियता दिखाई।
- हाल के वर्षों में वे सुरक्षा बढ़ाने की मांग करते रहे और बाहुबली राजनीति से अलग होने की कोशिश की।
Chapters
- 00:00पप्पू यादव का जन्म और प्रारंभिक जीवन
- 02:10पप्पू यादव और सियासी संघर्ष: कॉलेज से जेल तक
- 04:541990 के बिहार विधानसभा चुनाव और मंडल आयोग का प्रभाव
- 09:51जातीय संघर्ष और बाहुबली राजनीति का उदय
- 12:08पप्पू यादव का लोकसभा चुनाव और चुनावी विवाद
- 14:32मधेपुरा उपचुनाव और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
- 18:28आपराधिक पृष्ठभूमि से समाज सेवा तक का सफर
- 22:11आधुनिक दौर में पप्पू यादव की राजनीतिक स्थिति
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Speaker A
24 दिसंबर 1967 के दिन बिहार के मधेपुरा में पप्पू यादव का जन्म होता है। पप्पू का असली नाम था राजेश रंजन, लेकिन बचपन से ही उनके दादा लक्ष्मी मंडल उन्हें प्यार से पप्पू कहते थे और यहीं से उनका नाम पड़ जाता है पप्पू यादव। पप्पू यादव के दादा गांव के सरपंच थे और बड़े जमींदार थे, जिनके पास सैकड़ों एकड़ जमीन थी और हाथी-घोड़े थे। पप्पू यादव अपने परिवार की फिएट कार या एंबेसडर कार से स्कूल जाते थे।
Speaker A
लेकिन पप्पू का ध्यान था कॉलेज के लड़ाई और झगड़ों में। कौन सा युवा इस हिंदुस्तान को महाशक्ति बनाएगा?
Speaker A
सातवीं क्लास से दारू शुरू करता है युवा। कॉलेज के टाइम में ही पप्पू ने चाकू और बाकी हथियार कॉलेज ले जाने शुरू कर दिए और अपनी मां के जेवर बेचकर एक बंदूक खरीद ली। एक दिन कॉलेज में पप्पू यादव का झगड़ा हो जाता है और पप्पू यादव को जेल हो जाती है। यहीं जेल में ही पप्पू यादव की मुलाकात होती है एक लोकल हिस्ट्री सीटर अर्जुन यादव से, जो पप्पू यादव का रिश्तेदार भी लगता था। उन दिनों पूर्णिया में अर्जुन यादव की एक पैरेलल सरकार चलती थी।
Speaker A
इन्हीं अर्जुन यादव के गैंग से पप्पू यादव जुड़ जाते हैं। कॉलेज के झगड़े वाले केस से पप्पू यादव बाहर आए ही थे कि एक मर्डर केस में भी पप्पू यादव का नाम आ जाता है और उन्हें दोबारा से जेल हो जाती है और यहीं जेल से ही 12वीं की एग्जाम देते हैं। मेरा बस चले तो सब पॉलिटिशियन मिले और शूट एंड साइड कर दे। नाग मिले छोड़ दीजिए। पॉलिटिशियन मिले लात कंठ पर दे। जेल से बाहर आने के बाद पप्पू यादव ने अर्जुन यादव गैंग में भर्ती होने के लिए लड़कों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया।
Speaker A
अर्जुन यादव की हत्या के बाद अर्जुन यादव गैंग का सारा काम पप्पू यादव के हाथों में आ जाता है। अब मधेपुरा और आसपास के इलाकों में पप्पू यादव का दबदबा बढ़ने लगा। लोग पप्पू यादव को उनके नाम से जानने लगे। इधर 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव शुरू हो जाते हैं। पप्पू यादव ने उस समय की जनता दल पार्टी से टिकट पाने की कोशिशें शुरू कर दी।
Speaker A
इस समय तक लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल यानी कि राजद पार्टी नहीं बनाई थी। वे वीपी सिंह और चंद्रशेखर वाली जनता दल से जुड़े हुए थे। इसी जनता दल से पप्पू यादव ने विधानसभा की टिकट मांगी, लेकिन उन्हें नहीं मिलती। इसलिए पप्पू यादव ने निर्दलीय ही मधेपुरा जिले की सिंघेश्वर सीट से पर्चा भर दिया। इस वक्त पप्पू यादव की उम्र मात्र 23 साल थी और चुनाव लड़ने के लिए चाहिए थे 25 साल। लेकिन पप्पू यादव गलत हलफनामा देकर मैदान में उतर जाते हैं।
Speaker A
पप्पू यादव का माहौल ऐसा बनता है कि बड़े अंतर से निर्दलीय ही चुनाव जीत जाते हैं और एमएलए बन जाते हैं। अब पप्पू यादव को मधेपुरा से सटे इलाकों पूर्णिया, सहरसा, सुपौल और कटिहार जैसे जिलों में भी लोग जानने लगते हैं। पप्पू यादव जिंदाबाद। जिंदाबाद। इधर 1990 के बिहार विधानसभा चुनावों के साथ ही कांग्रेस बिहार की सत्ता से बाहर हो जाती है। जनता दल के नेता लालू यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बन जाते हैं।
Speaker A
जनता जनार्दन जिस गरीब जनता ने मुझे जिताने का काम किया उसके कोर्ट तक हम इधर अगस्त 1990 में केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने देश भर में मंडल आयोग लागू कर दिया। जिसमें ओबीसी आरक्षण का रास्ता खुल जाता है। एक फैसला हाल में सरकार ने लिया [संगीत] कि पिछड़े वर्ग को हम सरकारी नौकरियों में और पब्लिक सेक्टर में स्थान दें। देश भर में अपर कास्ट से आने [संगीत] वाले लोगों ने मंडल आयोग का भारी विरोध करना शुरू कर दिया।
Speaker A
लाखों लोग सड़कों पर उतर आते हैं। इसी तरह के प्रदर्शन अब बिहार में भी होने लगते हैं। इससे बिहार के गांव-गांव में अगड़े और पिछड़ों के बीच टकराव की घटनाएं सामने आने लगती हैं। जनता दल पार्टी से सीएम लालू यादव ने पटना में प्रधानमंत्री वीपी सिंह की रैली आयोजित करवाने का ऐलान कर दिया। इसके विरोध में ऊंची जातियों के लोगों ने जनता कर्फ्यू का ऐलान कर दिया।
Speaker A
जिससे ओबीसी आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधियों में तनाव का माहौल पैदा हो जाता है। रैली वाले दिन एमएलए पप्पू यादव मधेपुरा से दर्जनों बसें [संगीत] भरकर निकलते हैं। पप्पू का यह काफिला जब बेगूसराय और मोकामा के भूमिहार [संगीत] बाहुल्य क्षेत्रों से निकला तो मामला बिगड़ जाता है। लोकल लोगों में अफवाहें उड़ जाती हैं कि पप्पू के समर्थकों को इनर, हर-हर महादेव चौक, बेहट, बेगूसराय और मोकामा शहर के पास एक भूमिहार गांव, सियनार जैसी जगहों पर रोक लिया गया है।
Speaker A
सियनार गांव के लड़कों ने एक रात पहले ही कर्फ्यू लगा दिया था। दूसरी तरफ पप्पू यादव फुल फोर्स के साथ पहुंच जाते हैं अपनी बसें लेकर। आरोप लगे कि दोनों तरफ से गालियां दी जाती हैं और बाद में पत्थरबाजी और गोलीबाजी शुरू हो जाती है। इस झड़प में पप्पू यादव के समर्थकों की पिटाई की जाती है। खुद पप्पू यादव को एक थाने में घुसकर अपनी जान बचानी पड़ती है।
Speaker A
पटना रैली से मधेपुरा लौटने के बाद पप्पू यादव के समर्थकों ने बदला लेने का प्लान बनाया और मधेपुरा में रहने वाले ब्राह्मण और भूमिहारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। मधेपुरा में अगले 2 दिन तक लूटपाट और दंगे होते रहते हैं। इस वक्त तक पप्पू यादव की छवि एक ऐसे यादव नेता की बन चुकी थी जो अपर कास्ट से दबता नहीं था और आंख में आंखें मिलाकर देखता था।
Speaker A
मंडल आयोग के बाद अपर कास्ट वर्सेस ओबीसी जातियों खासकर यादव जाति के झगड़ों से पप्पू यादव की लोकप्रियता और बढ़ती है और पप्पू यादव कोसी और सीमांचल इलाके में मंडल पॉलिटिक्स का फेस बन जाते हैं। दूसरी तरफ कोसी सीमांचल इलाके के एक दूसरे बाहुबली नेता और एमएलए आनंद मोहन सिंह ने मंडल आयोग लागू करने के विरोध में अपने ही पार्टी जनता दल से इस्तीफा दे दिया, जिसने ओबीसी आरक्षण लागू किया था।
Speaker A
आनंद मोहन एक राजपूत नेता थे जो पप्पू यादव की तरह ही आपराधिक बैकग्राउंड से आते थे और इन पर भी हत्या और मारपीट समेत कई तरह के केस चल रहे थे। बिहार में चल रही इस कास्ट वॉर में पप्पू यादव और आनंद मोहन सिंह दो धड़ों को लीड करने [संगीत] वाले नेता बन जाते हैं। आगे चलकर इन दोनों बाहुबलियों की लड़ाई ने बिहार के कोसी सीमांचल इलाके में सिविल वॉर जैसी कंडीशंस पैदा कर दी, जिसमें दर्जनों लोगों की हत्याएं होती हैं।
Speaker A
आरोप तो यह भी लगते हैं कि इनमें 100 से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुईं, जिसकी कहानी आगे इसी वीडियो में मिलने जा रही है। आनंद मोहन [संगीत] और पप्पू यादव ही नहीं, बिहार में एक फैशन था, क्रेज था। बाहुबली की राजनीति में आवश्यकता [संगीत] उस समय में महसूस की गई क्योंकि लॉ एंड फेलोर था। इधर केंद्र में पूर्ण बहुमत ना होने के कारण वीपी सिंह और बाद में चंद्रशेखर की सरकार गिर जाती है।
Speaker A
एक बार फिर देश में चुनावी घोषणा होती है। आप सभी का कीमती वोट भाजपा के उम्मीदवार और भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल कमल निशान पर लगेगा। इस वक्त तक पप्पू यादव लालू यादव के भी खास हो चुके थे। लालू यादव को पहली बार सीएम बनने के वक्त जब जनता दल के भीतर विधायकों की वोटिंग हुई, तब भी पप्पू यादव ने लालू की मदद की थी और कथित तौर पर 11 विधायकों का सपोर्ट लालू के पक्ष में जुटाया था।
Speaker A
मंडल की राजनीति ने भी उन्हें फेमस कर दिया था। पप्पू यादव को उम्मीद थी कि कम से कम इस बार तो लोकसभा चुनाव में उन्हें लालू की जनता दल से टिकट मिल जाएगी। लेकिन इस बार भी पप्पू यादव को जनता दल से टिकट नहीं मिलती। इसके पीछे पप्पू यादव कारण बताते हैं कि लालू नहीं चाहते थे कि कोई दूसरा यादव नेता बने। [हंसी]
Speaker A
अंत में पप्पू यादव मधेपुरा के बगल की यादव बाहुल सीट पूर्णिया सीट से निर्दलीय खड़े हो जाते हैं। आरोप लगे कि पप्पू यादव के प्रचार में हथियारबंद लोग चलते थे और पुलिस प्रशासन भी पप्पू यादव के इन 40-50 वाहनों के काफिलों को रोकने की हिम्मत तक नहीं करती थी। पप्पू यादव के सामने कांग्रेस से उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह, भाजपा से जनार्दन प्रसाद यादव, सीपीआईएम से अजीत सरकार जैसे बड़े नेता खड़े थे।
Speaker A
लेकिन वोटिंग वाले दिन पूर्णिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ी की खबरें आने लगती हैं। दोपहर 12:00 बजे तक चारों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों के कैंडिडेट्स डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर के ऑफिस के बाहर धरने पर बैठ जाते हैं और शिकायत करने लगे कि पप्पू यादव के लोगों ने लगभग 300 बूथों को लूट लिया है और कई तरह की धांधली की है।
Speaker A
पप्पू यादव पर लग रहे इन आरोपों की खबर जब चीफ इलेक्शन कमिश्नर टीएन सेशन तक पहुंची तो उन्होंने वोटिंग वाले दिन ही पूर्णिया लोकसभा [संगीत] का चुनाव रद्द कर दिया। इस तरह पोलिंग बूथ लूट लेने के चार्जेस के साथ पप्पू यादव का पहला लोकसभा इलेक्शन रद्द कर दिया जाता है। यहां से पप्पू यादव की लड़ाई सीपीआईएम के उम्मीदवार अजीत सरकार से भी शुरू हो जाती है।
Speaker A
जिनकी वजह से पप्पू यादव का इलेक्शन रद्द हो गया था। दूसरी तरफ मधेपुरा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी राजकुमारी देवी की भी हत्या हो जाती है। इसलिए यहां अगले 6 महीनों के लिए चुनावों को कैंसिल कर दिया जाता है। इसलिए मधेपुरा सीट पर दोबारा से उपचुनाव होने का रास्ता खुल जाता है।
Speaker A
इधर 1991 के लोकसभा चुनाव में जनता दल के सीनियर नेता शरद यादव बदायूं लोकसभा चुनाव हार चुके थे। जब मधेपुरा में उपचुनावों की घोषणा हुई तो जनता दल ने शरद यादव को मधेपुरा चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया। क्योंकि यह सीट यादव कैंडिडेट के लिए सबसे सेफ सीटों में से एक मानी जाती थी।
Speaker A
जाना है हिंदुस्तान के बाजार में झुग्गी और झोपड़ी में वही है आपका आदमी। वही है इस देश का मालिक। मालिक को सड़क पर उतारने का काम करना है। शरद यादव के सामने झारखंड पार्टी की टिकट पर आनंद मोहन सिंह मैदान।
Speaker A
अपने ही पार्टी जनता दल से इस्तीफा दे दिया जिसने ओबीसी आरक्षण लागू किया था। आनंद मोहन एक राजपूत नेता थे जो पप्पू यादव की तरह ही आपराधिक बैकग्राउंड से आते थे और इन पर भी हत्या और मारपीट समेत कई
Speaker A
तरह के केस चल रहे थे। बिहार में चल रही इस कास्ट वॉर में पप्पू यादव और आनंद मोहन सिंह दो धड़ों को लीड करने [संगीत] वाले नेता बन जाते हैं। आगे चलकर इन दोनों बाहुबलियों की लड़ाई ने बिहार के कोसी
Speaker A
सीमांचल इलाके में सिविल वॉर जैसी कंडीशंस पैदा कर दी जिसमें दर्जनों लोगों की हत्याएं होती हैं। आरोप तो यह भी लगते हैं कि इनमें 100 से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुई। जिसकी कहानी आगे इसी वीडियो में मिलने जा रही है।
Speaker A
आनंद मोहन [संगीत] और पप्पू यादव ही नहीं बिहार में एक फैशन था, क्रेज था। बाहुबली की राजनीति में आवश्यकता [संगीत] उस समय में महसूस की गई क्योंकि लॉ एंड फेलोर था। इधर केंद्र में पूर्ण बहुमत ना होने के
Speaker A
कारण वीपी सिंह और बाद में चंद्रशेखर की सरकार गिर जाती है। एक बार फिर देश में चुनावी घोषणा होती है। आप सभी का कीमती वोट भाजपा के उम्मीदवार और भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल कमल निशान पर लगेगा। इस वक्त तक पप्पू यादव लालू यादव की भी
Speaker A
खास हो चुके थे। लालू यादव को पहली बार सीएम बनने के वक्त जब जनता दल के भीतर विधायकों की वोटिंग हुई तब भी पप्पू यादव ने लालू की मदद की थी और कथित तौर पर 11 विधायकों का सपोर्ट लालू के पक्ष में
Speaker A
जुटाया था। मंडल की राजनीति ने भी उन्हें फेमस कर दिया था। पप्पू यादव को उम्मीद थी कि कम से कम इस बार तो लोकसभा चुनाव में उन्हें लालू की जनता दल से टिकट मिल जाएगी। लेकिन इस बार भी पप्पू यादव को
Speaker A
जनता दल से टिकट नहीं मिलती। इसके पीछे पप्पू यादव कारण बताते हैं कि लालू नहीं चाहते थे कि कोई दूसरा यादव नेता बने। [हंसी] अंत में पप्पू यादव मधेपुरा के बगल की यादव बाहुल सीट पूर्णिया सीट से निर्दलीय
Speaker A
खड़े हो जाते हैं। आरोप लगे कि पप्पू यादव के प्रचार में हथियारबंद लोग चलते थे और पुलिस प्रशासन भी पप्पू यादव के इन 40-50 वाहनों के काफिलों को रोकने की हिम्मत तक नहीं करती थी। पप्पू यादव के सामने
Speaker A
कांग्रेस से उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह, भाजपा से जनार्दन प्रसाद यादव, सीपीआईएम से अजीत सरकार जैसे बड़े नेता खड़े थे। लेकिन वोटिंग वाले दिन पूर्णिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ी की खबरें आने लगती हैं। दोपहर 12:00 बजे तक चारों प्रमुख
Speaker A
राष्ट्रीय पार्टियों के कैंडिडेट्स डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर के ऑफिस के बाहर धरने पर बैठ जाते हैं और शिकायत करने लगे कि पप्पू यादव के लोगों ने लगभग 300 बूथों को लूट लिया है और कई तरह की धांधली की है। पप्पू यादव पर लग रहे इन आरोपों की
Speaker A
खबर जब चीफ इलेक्शन कमिश्नर टीएन सेशन तक पहुंची तो उन्होंने वोटिंग वाले दिन ही पूर्णिया लोकसभा [संगीत] का चुनाव रद्द कर दिया। इस तरह पोलिंग बूथ लूट लेने के चार्जेस के साथ पप्पू यादव का पहला लोकसभा इलेक्शन रद्द कर दिया जाता है। यहां से
Speaker A
पप्पू यादव की लड़ाई सीपीआईएम के उम्मीदवार अजीत सरकार से भी शुरू हो जाती है। जिनकी वजह से पप्पू यादव का इलेक्शन रद्द हो गया था। दूसरी तरफ मधेपुरा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी राजकुमारी देवी की भी हत्या हो जाती है। इसलिए यहां अगले 6
Speaker A
महीनों के लिए चुनावों को कैंसिल कर दिया जाता है। इसलिए मधेपुरा सीट पर दोबारा से उपचुनाव होने का रास्ता खुल जाता है। इधर 1991 के लोकसभा चुनाव में जनता दल के सीनियर नेता शरद यादव बदायूं लोकसभा चुनाव हार चुके थे। जब मधेपुरा में उपचुनावों की
Speaker A
घोषणा हुई तो जनता दल ने शरद यादव को मधेपुरा चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया। क्योंकि यह सीट यादव कैंडिडेट के लिए सबसे सेफ सीटों में से एक मानी जाती थी। जाना है हिंदुस्तान के बाजार में झुग्गी और झोपड़ी
Speaker A
में वही है आपका आदमी। वही है इस देश का मालिक। मालिक को सड़क पर उतारने का काम करना है। शरद यादव के सामने झारखंड पार्टी की टिकट पर आनंद मोहन सिंह मैदान में खड़े हुए थे। हालांकि मधेपुरा सीट पर 1967 से लेकर अब
Speaker A
तक केवल यादव जाति से आने वाले नेता ही सांसद बन सके थे। इंटरेस्टिंगली लास्ट के दो इलेक्शंस में विजेता और उपविजेता दोनों ही यादव जाति से थे। टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार मधेपुरा में करीब 3435% यादव हैं। 2011 के सेंसस
Speaker A
के अनुसार करीब 12% पॉपुलेशन मुस्लिम्स की है। इसलिए मधेपुरा को लेकर कहा जाता है कि रोम पोप का और मधेपुरा गोप का। गोप यानी कि यादवों का। लेकिन इस बार मधेपुरा चुनाव में लोकल बाहुबली आनंद मोहन सिंह भी लड़
Speaker A
रहे थे। जिससे इस उपचुनाव में पप्पू यादव की एंट्री होती है। कास्ट वॉर के बाद आनंद मोहन को अपर कास्ट खासकर राजपूतों का फुल सपोर्ट मिल रहा था। आनंद मोहन की इमेज एक ऐसी बाहुबली के रूप में बनी थी जो लालू
Speaker A
राज में भी अपर कास्ट के साथ खुलकर खड़ा था। इसलिए एंटी लालू वोटर्स भी अब आनंद मोहन को पसंद कर रहे थे और उनके साथ खड़े थे। इधर शरद यादव मूलत मध्य प्रदेश से आते थे। इसलिए पप्पू यादव यहां पर शरद यादव की
Speaker A
मदद करना चाहते थे। लेकिन लालू यादव नहीं चाहते थे कि शरद यादव मधेपुरा से चुनाव लड़े। उन दिनों लालू जनता दल के बिहार में बड़े नेता थे। लेकिन शरद यादव जनता दल के अंदर पहले से ही लालू से बड़े नेता थे और
Speaker A
राष्ट्रीय कद के नेता हुआ करते थे। इसलिए लालू नहीं चाहते थे कि कोई दूसरा बड़ा यादव नेता बिहार में पैर पसारे। खासकर मधेपुरा में। इसलिए सीएम लालू यादव ने पप्पू यादव को झारखंड की एक दूसरी सीट पर हो रहे उपचुनाव का प्रचार करने के लिए भेज
Speaker A
दिया। लेकिन पप्पू यादव लालू की बात काटकर दो-तीन दिन के अंदर ही झारखंड से वापस मधुपुरा लौट आते हैं और शरद यादव का प्रचार करने लगते हैं। इससे आनंद मोहन और पप्पू यादव के बीच की तकरार और बढ़ जाती
Speaker A
है जिसने हिंसक रूप ले लिया। राजपूत डोमिनेटेड गांव में आनंद मोहन के समर्थकों ने पोलिंग बूथों पर कब्जा कर लिया। वहीं यादव बाहुल्य इलाकों में भी शरद यादव और पप्पू यादव के समर्थकों ने पोलिंग बूथ पर कब्जा कर लिया। चुनाव मैनेजमेंट की लड़ाई
Speaker A
गैंगवार में बदल जाती है। कहीं अपहरण हो रहे थे तो कहीं गोलियां चल रही थी। 7 नवंबर 1991 के दिन आनंद मोहन एक चुनावी सभा करके मुरलीगंज की तरफ लौट रहे थे। तभी जानकी नगर के पास उनके काफिले पर अंधाधुंध
Speaker A
फायरिंग शुरू हो जाती है। इस फायरिंग में आनंद मोहन के तीन समर्थकों को गोली लगती है। जिनमें से दो लोगों की मौके पर ही मौत हो जाती है। जिंदा बचे तीसरे आदमी शंभू सिंह ने पुलिस को बयान दिया कि पप्पू यादव
Speaker A
और उनके साथियों ने उन पर हमला किया था। इस फायरिंग के बाद पप्पू के खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज कर ली जाती है। ऐसे ही एक दिन आनंद मोहन Maruti 800 कार से पटना लौट रहे थे। इस बार उनके साथ कोई काफिला नहीं था।
Speaker A
तभी संयोग से रास्ते में ही खगड़िया जिला की सीमा के पास उन्हें पप्पू यादव का काफिला मिल जाता है। यहां पर भी आरोप लगाया जाता है कि पप्पू यादव के काफिले की तरफ से दनादन गोलियां चलने लगती हैं। आनंद
Speaker A
मोहन जाकर एक थाने में घुस जाते हैं और जैसे-तैसे अपनी जान बचाते हैं। अब आनंद मोहन पप्पू यादव से बदला लेने के लिए तिलमिला रहे थे। एक दिन पप्पू यादव मधेपुरा के पामा गांव में थे। तभी आनंद मोहन के लोग पहुंच जाते हैं और पप्पू यादव
Speaker A
पर हमला कर देते हैं। इस घटना को लेकर पप्पू यादव कहते हैं कि उन पर करीब 10,000 गोलियां चलाई गई थी और 8 घंटे तक गोलियां चलती रही। उनके साथ के तीन लोग मारे जाते हैं जिसमें उनकी गाड़ी का ड्राइवर भी
Speaker A
शामिल था। पप्पू यादव कहते हैं कि अगर उस दिन एसपी और डीएम समय पर नहीं पहुंचते तो वह भी मारे जाते। तो हम पर लगभग 10,000 राउंड गोली चली लगी चली 8 घंटे तक हम पर बोली मधेपुरा सीट के इस उपचुनाव में शरद यादव
Speaker A
की बड़ी जीत होती है। शरद यादव 66.4% वोटों से जीतते हैं। वहीं आनंद मोहन को मात्र 23.1% वोट मिलती हैं। मधुपुरा में एक गैर यादव कैंडिडेट को इतने परसेंट वोट मिलना भी दिखाता था कि आनंद मोहन को अपर कास्ट का
Speaker A
कंसोलिडेट वोट मिला था। मधुपुरा की जीत ने शरद यादव की बिहार में तो एंट्री कराई ही लेकिन पप्पू यादव को भी पिछड़ों के नायक के रूप में खड़ा कर दिया। पप्पू यादव जिंदाबाद जिंदाबाद जिंदाबाद पप्पू यादव जिंदाबाद जिंदाबाद जिंदाबाद
Speaker A
मधेपुरा और आसपास के इलाकों में पप्पू यादव का दबदबा बढ़ता जा रहा था। लालू प्रसाद यादव से नजदीकी के कारण पुलिस प्रशासन में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि पप्पू यादव को हाथ लगा सके। आउटलुक मैगजीन की 1996 की एक रिपोर्ट के अनुसार 1991 में
Speaker A
पप्पू यादव के खिलाफ हत्या के तीन मामले दर्ज हुए। पप्पू यादव के काम करने का एक तरीका था। पहले पीड़ित का अपहरण होता था और फिर उसकी हत्या कर दी जाती थी। इधर लालू यादव को यह स्पष्ट हो चला था कि
Speaker A
पप्पू यादव कंट्रोल से बाहर होते जा रहे हैं। बिहार पुलिस ने पप्पू यादव पर गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा करने के लिए एनए एक्ट लगा दिया। मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने पप्पू यादव की गिरफ्तारी की घोषणा कर दी। इस वक्त भी पप्पू यादव खुलेआम पटना
Speaker A
की सड़कों पर घूम रहे थे और कह रहे थे कि पुलिस में उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं है। आउटलुक मैगजीन की 1996 की रिपोर्ट की मानें तो सीएम लालू को पर्सनल अपील करनी पड़ी तब जाकर पप्पू ने सरेंडर
Speaker A
किया और उसके बाद ही उन्हें अरेस्ट किया जा सका। हालांकि इस पर पप्पू यादव दावा करते हैं कि लालू उनके बिहार के दौरों पर आपत्ति करते थे और ऐसे ही एक दौरे के बाद उन्होंने पप्पू यादव से कहा था कि वह
Speaker A
यादवों का नेता बनने की कोशिश ना करें। पप्पू के मुताबिक इसी कारण उन पर एक नहीं दो जिलों में एनएससी लगाया गया था। मधेपुरे से भी पूर्णिया से हाईकोर्ट ने मधेपुरा में नेशनल सेक्रेटरी एक्ट खत्म कर दिया तो पूर्णिया के डीएमएसपी को बुलाकर
Speaker A
लगवा दिया। इन्हीं दिनों पप्पू यादव की एक इंटरेस्टिंग लव स्टोरी शुरू होती है। पप्पू यादव अपनी आत्मकथा द्रोहकाल का पथिक में बताते हैं कि 1991 में जब वह पटना की जेल में बंद थे तब वे अक्सर जेल से सटे
Speaker A
मैदान में लड़कों को खेलते देखा करते थे। इन लड़कों में विक्की नाम का एक लड़का भी शामिल था। पप्पू की विक्की से जान पहचान और दोस्ती शुरू हो जाती है। एक दिन विक्की ने पप्पू को अपनी फैमिली एल्बम दिखाई
Speaker A
जिसमें उसकी बहन रंजीत की टेनिस खेलते हुए एक तस्वीर दिखती है। रंजीत टेनिस की एक अच्छी खिलाड़ी थी और इंटरनेशनल लेवल पर भी खेल चुकी थी। रंजीत की तस्वीर देखते ही पप्पू यादव को उनसे प्यार हो जाता है। जब
Speaker A
पप्पू यादव जमानत पर जेल से बाहर आए तो पटना के उस टेनिस क्लब में जाने लगे जहां रंजीत खेलती थी। जब रंजीत ने पंजाब की यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया तो पप्पू यादव उनके पीछे वहां पर भी पहुंच जाते
Speaker A
हैं। लेकिन रंजीत को पप्पू की यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी और उन्होंने पप्पू से साफ मना कर दिया। रंजीत ने कहा कि वह एक सिख हैं और उनका परिवार कभी भी उनकी शादी एक बिहारी यादव से नहीं करने
Speaker A
देगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही जब बात परिवार तक पहुंची तो पप्पू के माता-पिता तो मान गए लेकिन रंजीत के माता-पिता ने शादी से साफ इंकार कर दिया। इसके बाद पप्पू यादव रंजीत की बहन और जीजा को मनाने के लिए चंडीगढ़
Speaker A
जाते हैं। लेकिन इन दोनों ने भी पप्पू के ऑफर को रिजेक्ट कर दिया। निराश होकर पप्पू यादव ने नींद की बहुत सारी गोलियां खा ली जिससे उनकी हालत बिगड़ने लगती है और उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराना
Speaker A
पड़ता है। इसके बाद रंजीत और उनके परिवार का पप्पू के प्रति व्यवहार थोड़ा नरम हो जाता है। लेकिन वह शादी के लिए अभी भी तैयार नहीं हो रहे थे। इसी दौरान पप्पू यादव को पता चलता है कि रंजीत के परिवार
Speaker A
के कांग्रेस नेता एस एस अहलवालिया से अच्छे संबंध हैं और वह उन्हें बहुत मानता है। इसी उम्मीद में पप्पू यादव अब एस एस अहलवालिया से मिलने के लिए दिल्ली पहुंच जाते हैं और उनसे मदद मांगते हैं। अंत में
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अहलवालिया ने रंजीत के घर वालों से बात की और रंजीत के घर वाले शादी के लिए तैयार हो जाते हैं। साल 1994 में पप्पू यादव और रंजीत दोनों की शादी हो जाती है। निजी जिंदगी में चल रही इस उथल-पुथल के
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बीच पप्पू यादव का आनंद मोहन से गैंगवार भी जारी था जो 1994 तक चलता है। कहा जाता है कि इस गैंगवार में 100 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। इस बीच साल 1994 में आनंद मोहन का नाम गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया
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की हत्या में आ जाता है और आनंद मोहन को जेल हो जाती है। इस तरह पप्पू यादव और आनंद मोहन सिंह का गैंग वार यहीं पर खत्म हो जाता है। इधर 1996 में देश में फिर से लोकसभा चुनाव होते हैं। इस बार पप्पू यादव
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समाजवादी पार्टी की टिकट पर पूर्णिया सीट से चुनाव लड़ते हैं और बीजेपी के उम्मीदवार राजेश प्रसाद गुप्ता को लगभग 36,000 से ज्यादा वोटों से हरा दिया। हालांकि 1996 के लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। इसलिए 2 साल
Speaker A
में ही तीन प्रधानमंत्री बदल दिए जाते हैं। पहले अटल बिहारी वाजपेयी पीएम बनते हैं। मैं मैं अटल बिहारी वाजपेई ईश्वर की शपथ लेता हूं। फिर जनता दल के एचडी देवगोड़ा बनते हैं। आई एचडी देवगोड़ा डूस वे इन द नेम ऑफ गॉड। और फिर इंद्र
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कुमार गुजराल पीएम बनते हैं। आई आई के गुजराल डू सॉल्व मी फिल्म दैट आई विल नॉट डायरेक्टली और इनडायरेक्ट। इसके बाद साल 1998 में देश में दोबारा से चुनाव होते हैं। 1998 लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव एक बार फिर से समाजवादी पार्टी
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के टिकट पर पूर्णिया से मैदान में उतर जाते हैं। इस बार पप्पू यादव के सामने सीपीआईएम के विधायक अजीत सरकार भी थे। जिनकी पप्पू यादव से एकदम नहीं बनती थी। अजीत सरकार सीपीआईएम के एक बड़े नेता थे और पूर्णिया विधानसभा से चार बार विधायक
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बन चुके थे। वो मसीहा थे भगवान समझिए भगवान का तरह था। सब का दुख को वह सुनते थे। किसी कोई बीमार है तो उसको इलाज जाके करवा देते थे। अजीत सरकार को मजदूरों और भूमिों का नेता माना जाता था।
Speaker A
अजीत सरकार ने लाके यहां बसाया हम लोग को क्योंकि हम लोग बेघर थे। अजीत सरकार के जैसा खोजेंगे तो सातों जन्म में नहीं मिलेगा। अजय सरकार इतने ईमानदार थे कि चार बार विधायक रहने के बाद भी उनका अपना खुद का घर नहीं था और वह कई साल तक
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किराए के घर में रहे। 15 साल इलेक्शन जीतने के बाद वो खुद अपना घर नहीं खरीद पाए। हम लोग भाड़ा के घर पर रहते थे जिसका किराया था ₹600। अपनी निजी जिंदगी [संगीत] उसी सादगी और अभाव में गुजारते थे जिस तरह वो जनता
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जिसका वह प्रतिनिधित्व करते थे। अजीत सरकार का चुनाव लड़ने का तरीका भी एकदम अनोखा था। वो हर चौराहे पर लाल गमछा बिछा देते थे और लोगों से कहते थे कि चुनाव लड़ने के लिए उनके पास पैसे ही नहीं
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है। इसलिए जो भी उन्हें वोट देगा वह इस गमछे में ₹1 का सिक्का डाल दें। एक व्यक्ति से सिर्फ एक ही सिक्का लिया जाता था। और लाल गमछा खरीद के वो हर चौक [संगीत] चौराहे पे लगा देते थे। रख देते थे कि
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चुनाव लड़ना है। पैसा नहीं [संगीत] है। जो मुझे एक वोट देगा वो मुझे नोट का एक सिक्का वहां रख दो। ₹1 का एक सिक्का रख दो। वो गमशेम में गमशेम में ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि चुनाव से
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पहले ही सिक्कों को गिनकर पता किया जा सके कि उन्हें कितने वोट मिलने जा रहे हैं। तो एक-एक सिक्का जमा करके वो अपना चुनाव लड़ते थे। जब सारे नेता घूमते थे तो वह घर पे बैठते थे। तो उनका कहना था सर प्रचार
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के लिए तो हम इतना 5 साल तक प्रचार ही करते रहे हैं। जो काम किए उसी से प्रचार होता है। अजीत सरकार पप्पू यादव के इतने विरोधी थे कि एक बार उन्होंने पप्पू के साथ स्टेज शेयर करने से भी इंकार कर दिया। वे लगातार
Speaker A
पप्पू यादव के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। खासकर ठेका पट्टा और अवैध खनन और सरकारी जमीन पर कब्जे के मामलों को लेकर साल 1995 के विधानसभा चुनाव में अजीत सरकार पूर्णिया से दोबारा एमएलए बनते हैं। इस चुनाव में अजीत सरकार ने खुद पप्पू यादव
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को पूर्णिया से हरा दिया। यह पप्पू यादव के लिए एक बड़ा खतरा था कि एक आम नेता ने उन्हें उनकी ही जमीन पर हरा दिया। लेकिन पप्पू यादव और अजीत सरकार के बीच असली लड़ाई शुरू होती है। 1998 के लोकसभा
Speaker A
चुनावों के दौरान। अजीत सरकार की पार्टी सीपीआईएम ने अजीत सरकार से पप्पू का समर्थन करने को कहा। लेकिन अजीत ने अपनी पार्टी का आदेश नहीं माना और पप्पू यादव की जगह कांग्रेस उम्मीदवार पप्पू सिंह का समर्थन कर दिया। अजीत सरकार की इस बगावत
Speaker A
के लिए उन्हें पार्टी से बाहर निकाल दिया जाता है। लेकिन तब तक वे पप्पू यादव का काफी नुकसान कर चुके थे। इस चुनाव में पप्पू यादव भाजपा के उम्मीदवार जय कृष्ण मंडल से करीब 35,000 वोटों से चुनाव हार
Speaker A
जाते हैं। यह पप्पू यादव की पहली हार थी। इसके कुछ महीने बाद ही 14 जून 1998 के दिन अजीत सरकार की सरेआम हत्या कर दी जाती है। किसी ने घर में आके बोला कि अजीत दा को मार दिया।
Speaker A
घटना वाले दिन अजीत सरकार एक गांव में पंचायत करके अपनी ऑफिशियल एंबेसडर कार से वापस लौट रहे थे। उनके साथ कार में ड्राइवर हरेंद्र शर्मा पार्टी कार्यकर्ता और उनके दोस्त अशफाक आलम और बॉडीगार्ड रमेश ओराव भी सवार थे। शाम 4:30 बजे के
Speaker A
आसपास जैसे ही अजीत सरकार की कार सुभाष नगर के बाजार में पहुंची अंकुर होटल के पास दो मोटरसाइकिल पर सवार लोगों ने अजीत सरकार की गाड़ी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी। यह लोग कई मिनट तक गोली चलाते रहते
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हैं। इस हमले में अजीत सरकार, हरेंद्र शर्मा और अशफाक आलम की मौके पर ही मौत हो जाती है। वहीं अजीत सरकार का बॉडीगार्ड रमेश ओराव गंभीर रूप से घायल हो जाता है। वहां रास्ते में गाड़ी लेफ्ट साइड में जो थी वह
Speaker A
खड़ी [संगीत] थी। साइड से शीशा सब टूटा हुआ था। तो मैंने देखा वो इधर बैठे हुए हैं और इस तरह से झुक के नीचे हैं। जब इस हत्याकांड की जांच हुई तो पता चला कि यह हमला हरीश चौधरी, रंजन तिवारी, अमर
Speaker A
यादव और अनिल यादव नाम के लोगों ने की है। वह भी कथित तौर पर पप्पू यादव के इशारे पर। रंजन तिवारी के पास AK-47 थी। वहीं हरीश चौधरी और अमर यादव ने रिवॉल्वर से गोलियां चलाई। [संगीत] अजीत सरकार को कुल
Speaker A
107 गोलियां मारी जाती हैं। जो दिखाता था कि हमलावर यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि अजीत सरकार किसी भी तरह से जिंदा ना बचें। तो जब उनको मैं पकड़ने गया तो मैं पकड़ नहीं पाया। उनका हाथ जो था इधर से नाला
Speaker A
टाइप का बन गया था। तो मेरा हाथ जो था उसके अंदर चला गया और उनको अपने तरफ खींचा और नीचे देखा तो देखा माथा का पूरा सब गिरा हुआ है। इस घटना की जांच के बाद सीबीआई ने कहा कि
Speaker A
पप्पू यादव ने 12 जून को सिलीगुड़ी में हरीश चौधरी और बाकी आरोपियों के साथ एक कथित बैठक की थी। जिसमें अजीत सरकार की हत्या की साजिश रची गई थी। पप्पू यादव ने आरोपियों से कथित तौर पर कुछ झूठे रिकॉर्ड
Speaker A
बनाने के लिए भी कहा था ताकि हत्या वाले दिन उन्हें और हरीश चौधरी को घटना स्थल से दूर दिखाया जा सके। यह साजिश रचने के बाद पप्पू खुद दिल्ली वाले घर निकल आते हैं। सीबीआई के मुताबिक यहां पहुंचकर पप्पू ने
Speaker A
रंजन तिवारी को फोन पर निर्देश दिया कि उन्हें किसी भी कीमत पर अजीत सरकार की हत्या करनी है। पप्पू यादव ने हरीश चौधरी के जरिए इसके लिए हथियार उपलब्ध कराने की बात भी कही। दूसरी तरफ पप्पू यादव अजीत
Speaker A
सरकार की हत्या में अपना कोई हाथ होने से इंकार करते रहे हैं। पप्पू यादव का कहना है कि इस केस में उन्हें लालू यादव ने फंसाया था और अजीत सरकार की हत्या बड़े-बड़े जमींदारों ने करवाई थी। सर वो 9 साल के बाद हमें उसमें फंसाया गया
Speaker A
था। सर लालू यादव जी पप्पू यादव के लालू यादव पर लगाए गए इस आरोप के बीच एक तथ्य यह भी है कि अजीत सरकार की हत्या में नाम आने के बावजूद पप्पू यादव की उस समय गिरफ्तारी नहीं हुई
Speaker A
और पूर्णिया और उसके आसपास के इलाकों में उनका राज चलता रहा। जबकि इस वक्त भी बिहार में लालू का ही राज था। करीब 11 महीने बाद जाकर 24 मई 1999 के दिन पप्पू यादव को अजीत सरकार की हत्या के मामले में
Speaker A
गिरफ्तार किया गया। इधर अप्रैल 1999 में केंद्र में वाजपेयी की सरकार गिर चुकी थी और देश में नए लोकसभा चुनाव होने जा रहे थे। इस वक्त पप्पू यादव अजीत सरकार हत्या मामले में जेल में थे। पप्पू यादव ने जेल
Speaker A
से ही पूर्णिया सीट पर निर्दलीय ही पर्चा भर दिया। कमाल की बात यह रही कि पप्पू यादव इस चुनाव में 62.4% वोट के साथ दोबारा से सांसद बन जाते हैं। सांसद बनने के बाद पप्पू को कई बार जमानत
Speaker A
मिलती है और कई बार सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर दी जिसके कारण वे जेल के अंदर बाहर होते रहे। लेकिन इससे पप्पू यादव के दबदबे में कोई कमी नहीं आती। पटना की बूढ़ जेल में रहते हुए ही पप्पू
Speaker A
यादव पूर्णिया में अपना पूरा साम्राज्य चला रहे थे। जेल में रहते हुए ही पप्पू यादव ने 2001 में लालू की राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी के बागी विधायकों और कुछ निर्दलीयों के साथ मिलकर इंडियन फेडरल डेमोक्रेटिक पार्टी यानी आईएफडीपी बनाई
Speaker A
जिसके संयोजक पप्पू यादव बने। कुछ समय बाद ही आईएफडीपी ने केंद्र की सत्ता पर काबिज अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार को समर्थन दे दिया और इन समर्थन देने वाले पांच सांसदों में खुद पप्पू यादव भी शामिल थे। लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले
Speaker A
पप्पू यादव ने इंडियन फेडरल डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी यानी एलजेपी में शामिल हो जाते हैं और एलजेपी के टिकट पर पूर्णिया से चुनाव लड़ते हैं। लेकिन इस चुनाव में पप्पू यादव को बड़ा झटका लगता है और
Speaker A
उन्हें पप्पू सिंह से 12,883 वोटों से हार मिलती है जो इस बार भाजपा से उम्मीदवार बने थे। इस चुनाव में सीपीआई एमएल की टिकट पर अजीत सरकार की पत्नी माधवी सरकार भी पप्पू के खिलाफ चुनाव लड़ी, लेकिन उन्हें
Speaker A
केवल 1% वोट ही मिलता है। जेल में रहते हुए ही 20 सितंबर के दिन पप्पू यादव ने एलजेपी से इस्तीफा दे दिया। इसके अगले ही दिन पप्पू यादव को पटना हाईकोर्ट से जमानत मिल जाती है। जेल से बाहर आते ही पप्पू
Speaker A
यादव आरजेडी में शामिल हो जाते हैं और मधेपुरा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव के लिए आरजेडी से पर्चा भर देते हैं। दरअसल 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू यादव दो सीटों एक मधेपुरा और दूसरी छपरा से चुनाव
Speaker A
लड़े थे और दोनों ही सीटों से वे जीत जाते हैं। बाद में उन्होंने छपरा सीट अपने पास रख ली और मधेपुरा को पप्पू यादव को दे दिया। लेकिन यहां पप्पू यादव से एक गलती होती है। जमानत मिलने की पप्पू यादव को
Speaker A
इतनी ज्यादा खुशी थी कि उन्होंने अपने साथी कैदियों को जेल में एक बड़ी पार्टी दे दी। जेल में पार्टी मनाने का मामला इतना बढ़ जाता है कि 1 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने पप्पू यादव की जमानत रद्द कर दी और उन्हें एक बार फिर जेल जाना
Speaker A
पड़ जाता है। जिस समय मधेपुरा में उपचुनाव के लिए वोटिंग हुई उस समय पप्पू यादव जेल में थे। एक बार फिर पप्पू यादव 2 लाख से ज्यादा वोटों से विजय होते हैं और हत्या के आरोप में जेल में रहते हुए ही सांसद बन
Speaker A
जाते हैं। पूरी दुनिया में आपने हाईटेक [हंसी] बना दी लेकिन आपने पर हाई नहीं बनाया। पटना की बेड़ जेल से ही पप्पू यादव का साम्राज्य चल रहा था। दिसंबर 2004 में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर बेड़ सेंट्रल जेल पर जब छापा मारा गया तो पप्पू यादव के
Speaker A
पास एक फोन भी मिलता है जो जेल नियमों का खुला उल्लंघन था। हत्या के आरोप में जेल में बंद पप्पू यादव को मिल रही सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि पप्पू यादव को एक हफ्ते के अंदर दिल्ली की
Speaker A
तिहाड़ जेल में शिफ्ट कर दिया जाए। साल 2005 में बिहार से आरजेडी की सरकार चली जाती है और जदयू के नीतीश कुमार सीएम बन जाते हैं। इससे पप्पू यादव का प्रभाव कम होने लगता है। फरवरी 2008 में अजीत सरकार मामले में
Speaker A
फैसले का दिन भी आ जाता है। स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने पप्पू यादव को अजीत सरकार की हत्या का दोषी पाया और उन्हें उम्र कैद की सजा सुना दी। एंड अ स्पेशल सीबीआई कोर्ट इन पटना हैज़ फाउंड आरजेडी एमपी पप्पू यादव
Speaker A
एंड फॉर्मर एमएलए राजन तिवारी गिल्टी ऑफ़ द मर्डर ऑफ सीपीआईएम लीडर अजीत सरकार। द मर्डर टूक [संगीत] प्लेस ऑन द 14th ऑफ़ जून इन 1998 इन पूर्णिया। फैसला सुनते ही पप्पू यादव कोर्ट में ही रोने लगते हैं और जज से उन पर रहम दिखाने
Speaker A
की अपील करने लगते हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव ने पूर्णिया सीट से अपनी मां शांतिप्रिया को निर्दलीय ही मैदान में उतार दिया। वहीं उनकी पत्नी रंजीत रंजन सुपोल सीट से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ी। 2009 के लोकसभा चुनावों का
Speaker A
प्रचार चल ही रहा था कि 18 फरवरी 2009 के दिन पटना हाईकोर्ट ने पप्पू यादव को जमानत दे दी। जेल से बाहर आने के बाद पप्पू यादव ने पूर्णिया में अपनी मां के लिए प्रचार करना शुरू कर दिया। लेकिन पप्पू यादव की
Speaker A
मां को इस बार भाजपा के उदय सिंह उर्फ़ पप्पू सिंह ने एक बड़े अंतर से हरा दिया। इसके पीछे कारण था गैर यादवों का एकजुट हो जाना। इस वक्त तक भाजपा और जदयू ने गैर यादव ओबीसी को अपनी तरफ कर लिया था। ऊपर
Speaker A
से भाजपा को अपर कास्ट वोटरों का एक मुस्त वोट पड़ रहा था। इधर सुपोल में भी नीतीश कुमार की जेडीयू के विश्व मोहन कुमार ने पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को सुपुल से बुरी तरह से हरा दिया। मई 2010 में
Speaker A
सुप्रीम कोर्ट ने पप्पू यादव की जमानत भी रद्द कर दी और उन्हें जमानत देने के लिए पटना हाईकोर्ट को फटका लगाई। इसलिए एकवार को लगा कि अब पप्पू यादव का चैप्टर हमेशा के लिए खत्म हो गया है। लेकिन इस कहानी
Speaker A
में अभी बहुत कुछ बाकी था। मई 2013 में पटना हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में पप्पू यादव को बेनिफिट ऑफ डाउट देते हुए बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने पप्पू यादव के साथ ही दूसरे आरोपी अनिल कुमार यादव और
Speaker A
रंजन तिवारी को भी सबूतों के अभाव में अजीत सरकार हत्याकांड से [संगीत] बरी कर दिया। कि बेर जेल में बंद थे पप्पू यादव। पटना हाईकोर्ट का फैसला आया जिसके तहत सीबीआईएम नेता अजीत सरकार की हत्या में उनको बरी कर
Speaker A
दिया गया। पटना हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जो आज तक लंबित है। इस तरह पप्पू यादव अजीत सरकार हत्याकांड के आरोपों से बरी हो जाते हैं। जेल से बाहर आने के बाद पप्पू यादव
Speaker A
ने आपराधिक गतिविधियों से दूरी बना ली। 2014 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव आरजेडी के टिकट पर मधेपुरा से खड़े होते हैं और सामने जेडीयू के नेता शरद यादव इस चुनाव में पप्पू यादव ने शरद यादव को 56,000 से ज्यादा वोटों से हरा दिया और
Speaker A
बिहार के उन चुनिंदा सांसदों में शामिल हुए जो मोदी लहर के बावजूद जीतने में कामयाब रहे। 2014 के लोकसभा चुनावों में पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन भी कांग्रेस के टिकट पर सुपुल सीट से जीत जाती हैं। यह आजाद भारत के इतिहास में
Speaker A
पहली बार था जब पति-पत्नी दो अलग-अलग पार्टियों के टिकट पर चुनकर एक साथ संसद में पहुंचे हो। इंटरेस्टिंगली 2015 में पप्पू यादव को सर्वश्रेष्ठ सांसद का खिताब भी मिलता है। हमारे देश में दुनिया का सबसे अत्यधिक मीठा पानी है और उस मीठे पानी को हम पीने
Speaker A
के तो छोड़ दीजिए। वह मीठा पानी समुद्र में चला जाता है। क्या सरकार उस मीठे पानी को पहाड़ों पर या ऐसे जगहों पर रोकने की कोई ऐसी व्यवस्था करेगी?
Speaker A
जेल से आने के बाद पप्पू यादव खुद को आरजेडी के लालू यादव के उत्तराधिकारी के तौर पर देखते थे। लेकिन जब तेजस्वी यादव राजनीति में आए और उन्हें लालू के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाने लगा तो पप्पू यादव ने विरोध करना शुरू कर दिया।
Speaker A
पप्पू यादव की बगावत के कारण लालू यादव ने उन्हें आरजेडी से निकाल दिया। आरजेडी से बाहर आने के बाद पप्पू यादव ने खुद की जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक बना ली और 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में 109 सीटों
Speaker A
पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। लेकिन जन अधिकार पार्टी की एक भी सीट नहीं आती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव अपनी जन अधिकार पार्टी के टिकट पर मधेपुरा सीट से चुनाव लड़ रहे थे जिसे वह 2004 और 2014
Speaker A
में जीत चुके थे लेकिन इस बार पप्पू यादव तीसरे नंबर पर आते हैं और उन्हें 1 लाख वोट भी नहीं मिले। दूसरी तरफ उनकी पत्नी रंजीत रंजन भी सुपुल से चुनाव हार जाती हैं। हालांकि कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा
Speaker A
भेज दिया। इधर मई 2021 में पप्पू यादव को मधेपुरा पुलिस ने अरेस्ट कर लिया। पप्पू यादव की यह गिरफ्तारी 1989 के एक अपहरण केस में की गई। जिसमें पप्पू पर आरोप था कि उन्होंने उमा यादव और रामकुमार यादव
Speaker A
नाम के दो लोगों का अपहरण किया था। लेकिन बाद में इन लोगों ने मामले में समझौता कर लिया था। यह है मधेपुरा जिले के मुरलीगंज थाना क्षेत्र का मिडिल चौक। जहां [संगीत] से ठीक 32 साल पहले दो छात्रों का अपहरण हुआ
Speaker A
था। इस मामले में पप्पू यादव को लगभग 5 महीने की जेल होती है और वे अक्टूबर 2021 में जेल से दोबारा से बाहर आते हैं। एक ऐसे केस में मुझे 5 महीना रखा गया जिसमें आम आदमी को [संगीत] एक दिन नहीं
Speaker A
रखा जा सकता। अब तक पप्पू यादव ने अपने आपराधिक बैकग्राउंड से दूरी बना ली थी और वे समाज सेवा के काम में लग चुके थे। कोविड से लेकर बाढ़ तक पप्पू यादव हर जगह मदद के लिए पहुंचने लगे। नवंबर 2022 में जब आनंद
Speaker A
मोहन सिंह की बेटी की सगाई हुई तो इस सगाई में भी पप्पू यादव भी पहुंच जाते हैं। यहां पर दोनों पुराने दुश्मन गली मिलते हैं और बहुत देर तक बात करते हैं जैसे दो बिछड़े हुए भाई आपस में मिल रहे हो। इसके
Speaker A
बाद 15 फरवरी 2023 को जब आनंद मोहन की बेटी की शादी हुई तो पप्पू यादव इसमें भी पहुंच जाते हैं और एक बार फिर गले मिलते हैं। पप्पू यादव ने कई मौकों पर आनंद मोहन सिंह के पक्ष में बयान दिए। 2024 लोकसभा
Speaker A
चुनाव से ठीक पहले पप्पू यादव दोबारा से आरजेडी के चक्कर लगाने लगे, लेकिन तेजस्वी युग के बाद आरजेडी में बात नहीं बनी। इसलिए पप्पू यादव अपनी पार्टी समेत कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं। पप्पू यादव का कांग्रेस में आना आरजेडी को पसंद
Speaker A
नहीं आ रहा था। आरजेडी ने पप्पू यादव को इंडिया गठबंधन का उम्मीदवार नहीं बनने दिया और पूर्णिया, सुपोल और मधेपुरा जैसी तीनों सीटों को अपने खाते में रख लिया। कांग्रेस से सपोर्ट ना मिलते हुए देख पप्पू यादव ने निर्दलीय ही पूर्णिया सीट
Speaker A
पर पर्चा भर दिया। इस चुनाव में पप्पू यादव की 24,000 से ज्यादा वोटों से जीत होती है। पप्पू यादव की गरीबों की मदद करने वाली छवि ने उनके पुराने आपराधिक बैकग्राउंड को कहीं ना कहीं धुंधला करने में मदद की है। लेकिन उनकी एक गलती ने
Speaker A
उनकी दोबारा फजीहत करवाई और गलती थी लॉरेंस बिश्नोई गैंग से पंगा लेने की। 12 अक्टूबर 204 के दिन मुंबई में पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की हत्या कर दी गई। इस पर पप्पू यादव ने लॉरेंस गैंग को चुनौती देते हुए ट्वीट किया कि कानून
Speaker A
अनुमति दे तो 24 घंटे [संगीत] में इस लॉरेंस बिश्नोई जैसे दो टके के अपराधी के पूरे नेटवर्क को खत्म कर दूंगा। इस ट्वीट के बाद बारी थी लॉरेंस बिश्नोई गैंग की। इस ट्वीट के बाद पप्पू यादव को लॉरेंस
Speaker A
बिश्नोई गैंग की तरफ से जान से मारने की धमकियां मिलने लगती हैं। अब पप्पू यादव कहने लगे कि उन्होंने जो भी कहा है वो केवल राजनीतिक बयानबाजी थी और कोई लॉरेंस बिश्नोई के रास्ते में वे नहीं आ रहे हैं।
Speaker A
वो ट्वीट जब कोई घटना घटती है तो एज ए पॉलिटिकल ट्वीट होता है। लेकिन इसके बाद भी पप्पू का पीछा नहीं छूटा। पप्पू यादव को लगातार लॉरेंस बिश्नोई गैंग की तरफ से धमकियां मिल रही थी। अंत में पप्पू यादव ने केंद्रीय गृह
Speaker A
मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा बढ़ाने की मांग की। अब जब भी मीडिया लॉरेंस बिश्नोई से जुड़ा कोई भी सवाल पूछता तो पप्पू यादव बचने की कोशिश करते। अंत में पप्पू यादव ने कहा कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग को जिसको मारना है
Speaker A
सलमान खान को या किसी और को मारे उनका कोई लेना देना नहीं है। या आप जिसको जिसको मारे मेरा कोई लेना देना नहीं। आप मारिए सलमान को या किसी को हमें क्या लेना देना भाई? पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन ने भी खुद को पप्पू के
Speaker A
बयान से दूर कर लिया और कहा कि उनके और पप्पू के बीच बहुत मतभेद हैं जिसके कारण वो डेढ़ दो साल से अलग रह रहे हैं और लॉरेंस बिश्नोई पर पप्पू के बयान से उनका और उनके बच्चों का कोई लेना देना नहीं है।
Speaker A
काफी मतभेद भी है हम दोनों के बीच में और अभी पिछले डेढ़ दो सालों से तो हम अलग-अलग ही रह रहे हैं। और जो भी उनका बयान है उससे मेरा या हमारे बच्चों का कोई भी उससे [संगीत] कोई लेना देना नहीं है। फिलहाल
Speaker A
पप्पू यादव कांग्रेस में हैं और अपने आपराधिक बैकग्राउंड से लगभग दूरी बना चुके हैं। लेकिन एक सवाल जो मन में आता है वह यह है कि अगर कॉमरेड अजीत सरकार के आरोपी [संगीत] रिहा हो गए तो उनकी हत्या किसने
Speaker A
की? इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
Topics:पप्पू यादवमधेपुराबिहार राजनीतिबाहुबली राजनीतिमंडल आयोगजातीय संघर्षअपराधी नेताअर्जुन यादवआनंद मोहन सिंहलोकसभा चुनाव











