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Real Story of Veerappan | SMS Documentaries

वीरप्पन की जिंदगी और अपराधों की कहानी, जिसने 20 साल तक पुलिस को चकमा दिया।

Key Takeaways

  • वीरप्पन भारत के सबसे खतरनाक डकैतों में से एक था जिसने लंबे समय तक पुलिस को चकमा दिया।
  • उसकी तस्करी और हत्या की घटनाओं ने दो राज्यों की सरकारों को भारी खर्चा कराया।
  • परिवार और निजी जीवन में भी वीरप्पन की जटिलताएं थीं, जैसे अपनी बेटी की मौत।
  • एसटीएफ और पुलिस की संयुक्त कोशिशों से अंततः वीरप्पन को खत्म किया गया।

What the video covers

  • वीरप्पन का जन्म 1952 में कर्नाटक के जंगलों में हुआ और वह एक खतरनाक डकैत बन गया।
  • उसने 184 से अधिक लोगों की हत्या की, जिनमें मंत्री, पुलिस अधिकारी और फॉरेस्ट गार्ड शामिल थे।
  • वीरप्पन ने हाथी के दांतों और चंदन की लकड़ी की तस्करी की और जंगल में आतंक फैलाया।
  • 1986 में पहली बार गिरफ्तार होने के बाद भी वह पुलिस की गिरफ्त से भाग गया।
  • उसकी पहली बड़ी मास किलिंग 1989 में हुई, जब उसने पांच राइवल शिकारी गैंग के सदस्यों को मार डाला।
  • वीरप्पन ने मुथुलक्ष्मी से शादी की और जंगल में तीन बेटियां हुईं, जिनमें से एक की मौत भी हुई।
  • 1993 में एसटीएफ ने वीरप्पन को घेर लिया था, लेकिन वह बच निकला।
  • वीरप्पन ने शराब और औरतों से दूर रहने की कसम खाई थी, लेकिन मुथुलक्ष्मी के प्यार में पड़ गया।
  • दो राज्यों की सरकारों ने उसे पकड़ने के लिए ₹100 करोड़ से अधिक खर्च किया और ₹5 करोड़ का इनाम रखा।
  • 2004 में एसटीएफ ने वीरप्पन को मार गिराया, जिससे उसका 20 साल का आतंक खत्म हुआ।

Answers

Questions about this video

वीरप्पन कौन था और उसने क्या अपराध किए?

वीरप्पन भारत का एक कुख्यात डकैत था जिसने 184 से अधिक लोगों की हत्या की और हाथी के दांतों व चंदन की लकड़ी की तस्करी की।

वीरप्पन को पकड़ने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए?

दो राज्यों की सरकारों ने ₹100 करोड़ से अधिक खर्च कर विशेष टास्क फोर्स बनाई और पैरामिलिट्री फोर्सेज को बुलाया, लेकिन 20 साल तक उसे पकड़ना मुश्किल रहा।

वीरप्पन की मौत कैसे हुई?

2004 में एसटीएफ ने एक जाल बिछाकर वीरप्पन को घेर लिया और फायरिंग में उसे और उसके साथियों को मार गिराया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
1993 की एक रोज कर्नाटक तमिलनाडु बॉर्डर पर मौजूद सत्यमंगलम फॉरेस्ट में छुपे वीरप्पन को एसटीएफ घेर लेती है। हालांकि अभी भी वीरप्पन एसटीएफ की पहुंच से बाहर था, लेकिन तभी अचानक वीरप्पन की सबसे छोटी न्यूबर्न बेबी रोना शुरू कर देती है।
00:15
Speaker A
घबराए गैंग के लोग इस बच्ची के पिता वीरप्पन की तरफ देखते हैं। वीरप्पन चिना पुल्लई नाम की अपनी एक दाई की तरफ देखता है और एक इशारा करता है। वीरप्पन के इशारे को चिना पुल्लई ने समझ लिया और उस न्यूबोर्न बेबी की आवाज को हमेशा के लिए शांत कर दिया।
00:26
Speaker A
ये कहानी है भारतीय इतिहास के सबसे खतरनाक डकैत वीरप्पन की, जिसने करीब 184 लोगों की हत्याएं की जिनमें [संगीत] शामिल थे मंत्री, एसपी और बहुत से पुलिस के जवान।
00:47
Speaker A
जिसे पकड़ने के लिए पैरामिलिट्री फोर्सेज, एसटीएफ और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने 20 साल तक अपना पसीना बहाया, जिस पर दो राज्यों की सरकारों ने ₹100 करोड़ से ज्यादा खर्च कर दिए, जिसके सर पर ₹5 करोड़ का इनाम रखा गया।
01:00
Speaker A
लेकिन उसके बावजूद 20 सालों तक वीरप्पन को जिंदा नहीं पकड़ा जा सका। कौन था वीरप्पन और क्यों उसे आजाद भारत का सबसे खतरनाक डकैत कहा जाता है? इसी वीरप्पन की पूरी कहानी को जानेंगे आज के इस एपिसोड में।
01:23
Speaker A
वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को कर्नाटक के चामराज नगर जिले के गोपीनाथम गांव में होता है, जो तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर मौजूद था। वीरप्पन एक तमिल परिवार से आता था, लेकिन 1956 के बाद उनका इलाका मद्रास यानी तमिलनाडु की जगह कर्नाटक राज्य में आने लगा।
01:36
Speaker A
गोपीनाथम गांव का इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था। इसलिए यहां के लोग अपनी गुजर-बसर के लिए पशुपालन और जंगल पर निर्भर थे। इन्हीं जंगलों के जंगली जानवरों से बचने के लिए गोपीनाथम गांव के लोग बिना लाइसेंस की बंदूकें रखा करते थे।
01:49
Speaker A
इसलिए वीरप्पन को भी बचपन से ही बंदूकें चलाने का मौका मिलता है। इसलिए बचपन से ही वीरप्पन एक ऐसा निशानेबाज बन जाता है जिसे बड़े-बड़े शिकारी अपने साथ शिकार के लिए ले जाने लगते हैं।
02:03
Speaker A
का चाचा सलवाई गोंडर एक बड़ा शिकारी था और जंगल से मिलने वाली चंदन की लकड़ी का बड़ा तस्कर था। इसी जंगल से एक और चीज की तस्करी की जाती थी और वह चीज थी हाथियों के दांत। वीरप्पन ने 14 साल की उम्र में ही बड़े-बड़े हाथियों का शिकार शुरू कर दिया।
02:22
Speaker A
जिनके दांतों को ब्लैक मार्केट में बेचा जाता था, जिनकी उन्हें बड़ी कीमत मिलती थी। वीरप्पन ने इतने हाथी मारे कि जंगल हाथियों से ही खाली हो गया। अपनी निशानेबाजी और डेरिंग के कारण कम उम्र में ही वीरप्पन का खौफ बढ़ने लगता है और वह धीरे-धीरे अपने चाचा की तरह ही चंदन की लकड़ियों की भी अवैध तस्करी करने लगता है।
02:36
Speaker A
वीरप्पन की उम्र करीब 17-18 साल ही हुई थी कि वीरप्पन का सामना एक फॉरेस्ट गार्ड से हो जाता है। गुस्साए वीरप्पन ने वहीं फॉरेस्ट गार्ड को मौत के घाट उतार दिया। यह वीरप्पन की पहली हत्या थी और यहां से शुरू होता है एक ऐसा सिलसिला जिससे वीरप्पन बनता है भारत का सबसे खतरनाक डाकू।
02:48
Speaker A
वीरप्पन एंड हिज गैंग मेंबर्स हैव किल्ड 119% सो फार। 27 अगस्त 1983 के दिन वीरप्पन और पुलिस प्रशासन के बीच पहला बड़ा आमना-सामना होता है। उस समय वीरप्पन की गैंग एक हाथी को फंसाने की कोशिश कर रही थी। तभी कर्नाटक पुलिस वीरप्पन को घेर लेती है। लेकिन
03:03
Speaker A
वीरप्पन ने कर्नाटक पुलिस को चकमा दे दिया और भाग निकला। इस घटना में 25 साल के फॉरेस्ट गार्ड के एम पृथ्वी मारे जाते हैं। हालांकि इसके 3 साल बाद 1986 में कर्नाटक पुलिस ने वीरप्पन को अरेस्ट कर लिया। यह वीरप्पन की पहली गिरफ्तारी थी।
03:19
Speaker A
लेकिन यहां भी वीरप्पन ने चाल खेली और पुलिस की गिरफ्त से बाहर निकला। वीरप्पन को अरेस्ट करने में फॉरेस्ट ऑफिसर पी श्रीनिवास का भी हाथ था। इसलिए पी श्रीनिवास अब वीरप्पन के निशाने पर आ जाते हैं। इधर जनवरी 1989 में वीरप्पन ने एक
03:34
Speaker A
राइवल शिकारी गैंग के पांच लोगों को अगवा कर लिया। जिन्हें वीरप्पन ने कई दिनों तक जंगल में रखा और बाद में उन पांचों की बेरहमी से हत्या कर दी। यह वीरप्पन की पहली बड़ी मास किलिंग थी। इस घटना के बाद
03:49
Speaker A
जंगल के दूसरे अपराधी भी अब वीरप्पन के आगे झुकने लगते हैं। अपना खौफ फैलाने के लिए वीरप्पन ने अगस्त 1989 में तमिलनाडु के बेगुर फॉरेस्ट रेंज से तीन फॉरेस्ट गार्ड्स को उठा लिया। करीब 15 दिन तक उन्हें जंगल में रखने के बाद तीनों को ही
04:01
Speaker A
मौत के घाट उतार दिया। लेकिन यह वीरप्पन की अभी शुरुआत बढ़ती है। अप्रैल 1990 में वीरप्पन ने कर्नाटक पुलिस की एक टीम पर भी घात लगाकर हमला किया। इस हमले में तीन सब इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल मौके पर ही मारे जाते हैं।
04:15
Speaker A
चारों तरफ वीरप्पन की दहशत फैल जाती है। वीरप्पन को रोकने के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु की पुलिस ने मिलकर जॉइंट ऑपरेशन शुरू कर दिए। ऐसे लगने लगा कि अब वीरप्पन ज्यादा दिन नहीं बचेगा, लेकिन सब के सब गलत साबित होते हैं। दोनों राज्यों की
04:35
Speaker A
पुलिस वीरप्पन को छू भी ना सकी। दरअसल 1986 में पुलिस कस्टडी से भागने के बाद ऐसा माना जाता है कि वीरप्पन ने शराब और औरतों से दूर रहने का फैसला ले लिया था। क्योंकि वीरप्पन दोनों को ही खतरनाक
04:50
Speaker A
डिस्ट्रक्शन मानता था। उसने कसम खाई थी कि वह फिर से पुलिस को उसे पकड़ने का कोई चांस नहीं देगा। लेकिन अपनी इस कसम के बावजूद वह नैरपुर गांव की एक सुंदर टीनएजर लड़की मुथु लक्ष्मी की तरफ आकर्षित होने
05:02
Speaker A
से खुद को रोक नहीं सका। तुम मुझे बहुत पसंद आई। मैं तुम्हें पसंद आया?
05:13
Speaker A
वीरप्पन मुथुल लक्ष्मी के गांव के रेगुलर चक्कर लगाने लगा। वीरप्पन की घनी मूछें, पैनी नजर और एक मसल अथॉरिटी के साथ ही विलेजर्स में पैदा होने वाला वीरप्पन के प्रति सम्मान और डर ने मुथुल लक्ष्मी को भी काफी इंप्रेस किया। मुथु लक्ष्मी भी
05:21
Speaker A
वीरप्पन की अटेंशन का पॉजिटिव रिस्पांस देने लगती हैं। हालांकि मुथुल लक्ष्मी के पेरेंट्स उसके इस बर्ताव से बिल्कुल खुश नहीं होते। मुथुल लक्ष्मी के पिता ने तो वीरप्पन को यह तक कह दिया कि मुलक्ष्मी की शादी उसके एक कजिन से फिक्स की जा चुकी
05:34
Speaker A
है। लेकिन वीरप्पन ने हार नहीं मानी। वीरप्पन के शादी के प्रपोजल के रिजेक्ट होने के कुछ महीने बाद ही वह मुत लक्ष्मी को भगा कर ले जाता है और दोनों जंगल के एक मंदिर में शादी कर लेते हैं। जल्दी ही
05:48
Speaker A
मुलक्ष्मी प्रेग्नेंट हो जाती हैं और 8 महीने तक जंगल में रहने में कामयाब रहती हैं। लेकिन आखिरकार डिलीवरी के लिए उन्हें वापस अपने पेरेंट्स के घर पर लौटना पड़ता है। अरेस्ट होने के डर से मुतुलक्ष्मी के पिता उसे चेन्नई ले जाते हैं। जहां
05:58
Speaker A
उन्होंने मुथुलक्ष्मी को पुलिस के सामने सरेंडर करवा दिया। पुलिस ने मुल लक्ष्मी को वुमन्स हॉस्टल में रखा। बाद में यहीं पर मुतुलक्ष्मी ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम एसटीएफ ऑफिसर शलेंद्र बाबू ने विद्या रानी रखा। कुछ समय बाद पुलिस ने
06:12
Speaker A
मुलक्ष्मी को फिर से अपने पेरेंट्स के घर वापस जाने की परमिशन दे दी। हालांकि उसकी मूवमेंट्स पर क्लोज मॉनिटरिंग रखी जाने लगी। मुल लक्ष्मी के घर पहुंचने के कुछ दिन बाद ही वीरप्पन का एक आदमी रिलेटिव बनकर मुत लक्ष्मी के घर पर पहुंचता है। घर
06:25
Speaker A
में घुसते ही उसने फुसफुसाकर कहा कि वीरप्पन ने मैसेज भिजवाया है कि वह बच्ची को पेरेंट्स के पास छोड़कर वापस उसके पास जंगल लौट आए क्योंकि वह उसे बहुत मिस कर रहा है। कोई मां अपने बच्चे से आसानी से
06:39
Speaker A
अलग नहीं हो सकती थी। इसलिए कुछ महीनों तक मुथुल लक्ष्मी ने अपने हस्बैंड के ऑर्डर को इग्नोर कर दिया क्योंकि उसे समझ आ गया था कि जंगल की तुलना में गांव में बच्ची का फ्यूचर बेहतर होगा। लेकिन एक रात
06:50
Speaker A
मुलक्ष्मी नैरपुर से चुपके से निकल जाती हैं और फिर से वीरप्पन के पास चली जाती हैं। 1992 में वीरप्पन और मुलक्ष्मी को एक और बेटी होती है, जिसका नाम रखा जाता है प्रभा। एक साल बाद उन्हें एक और बेटी होती
07:01
Speaker A
है। लेकिन खुशी मनाने के बजाय यह न्यू बोर्न बेबी वीरप्पन के लिए चिंता का सबब बन जाती है। उस वक्त तक वीरप्पन का गैंग 100 से ज्यादा मेंबर्स का हो चुका था, जिसमें कई औरतें और बुजुर्ग भी शामिल थे।
07:13
Speaker A
इससे उनकी मूवमेंट स्लो हो रही थी। एसटीएफ अब उसके पुराने ठिकानों पर कब्जा कर चुकी थी और तीन तरफ से उसकी तरफ आगे बढ़ रही थी। जंगल में पुलिस का अलर्ट पेट्रोल दूर से ही हल्की सी भी आवाज को डिटेक्ट कर
07:24
Speaker A
लेता था। ऊपर से बच्चे का रोना भी पूरी तरह से अनप्रिडिक्टबल था। वह कभी भी रो सकती थी और वीरप्पन के गैंग को मुश्किल में डाल सकती थी। इसलिए वीरप्पन के लिए अपनी तीसरी बेटी एक बड़ी प्रॉब्लम बन रही
07:35
Speaker A
थी। एक दिन बच्ची ने एकदम बिल्कुल गलत टाइम पर रोना शुरू कर दिया। एसटीएफ टीम का हिस्सा रहे एसपी करप्पू स्वामी बताते हैं कि इस बार वीरप्पन ने चिना पुल्लई नाम की दाई, जिसने वीरप्पन के बच्चों की डिलीवरी
07:45
Speaker A
करवाई थी, उसे उस बच्ची को एरर कंपो का जूस पिलाने के लिए कहा। यह जूस वैसे तो भगवान गणेश का फेवरेट माना जाता है। इसका आयुर्वेद में भी रेगुलर मेडिसिनल यूज़ होता है। लेकिन बच्चे को देने पर यह जूस
07:57
Speaker A
उसका गला चौंक कर देता है। इस तरह चिना पुलई ने बिना कुछ कहे उस बच्ची को जूस पिलाकर मार डाला। यह घटना 1993 के आसपास की बताई जाती है। उसने अपनी बेटी को इसलिए मारा क्योंकि उसे लगा कि कहीं उसकी बेटी रोना शुरू कर देगी
08:09
Speaker A
और उसकी रोने की आवाज एसटीएफ वाले सुन लेंगे। वीरप्पन द्वारा अपनी बेटी के मारे जाने की इस अफवाह का जिक्र विजय कुमार की किताब वीरप्पन में भी मिलता है। दरअसल, यह विजय कुमार ही थे जिन्होंने लास्ट में वीरप्पन
08:23
Speaker A
को मारा था। हालांकि यह अफवाह कितनी सच है या यह झूठ है, शायद ही यह पूरा सच कभी बाहर आ पाए। इसलिए हम अपनी तरफ से इस घटना की कोई पुष्टि नहीं करते। इधर वीरप्पन की नजर पी श्रीनिवास
08:34
Speaker A
पर आ जाती है।
08:48
Speaker A
जिन्होंने वीरप्पन को पहली बार अरेस्ट किया था। श्रीनिवास का तरीका बाकी फॉरेस्ट ऑफिसर्स से थोड़ा अलग था। श्रीनिवास ने इललीगल चंदन तस्करी की 80 से ज्यादा लकड़ी की नावें जप्त की थी। साथ ही श्रीनिवास ने गांव वालों को काम देने के लिए
09:02
Speaker A
कोऑपरेटिव्स ऑर्गेनाइज किए थे ताकि गांव में रहने वाले लोग जिनका गुजर बसर ही जंगल से मिलने वाली वस्तुओं, लकड़ी, फल, सब्जी, हैंडीक्राफ्ट से होता है उनको एक प्रॉपर मार्केट मिल सके। इसके अलावा श्रीनिवास ने कई फॉरेस्ट नर्सरीज और दूसरे डेवलपमेंटल
09:17
Speaker A
वर्क्स को शुरू किया ताकि लोगों को एंप्लॉयमेंट मिल सके और वाइल्ड लाइफ को डिस्ट्रॉय होने से बचाया जा सके। इसके अलावा गांव के एलिजिबल लोगों को आइडेंटिफाई करके फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में वॉचर्स और गार्ड्स के तौर पर अपॉइंट किया
09:30
Speaker A
गया। श्रीनिवास ने वीरप्पन के गैंग के मेंबर्स को भी इन एंप्लॉयमेंट अपॉर्चुनिटीज का फायदा उठाने के लिए इनकरेज किया। श्रीनिवास के इन एफर्ट्स की वजह से गांव वालों में श्रीनिवास का इन्फ्लुएंस बढ़ने लगता है। श्रीनिवास ने वीरप्पन के गैंग मेंबर्स को एक रिहबिलेशन
09:44
Speaker A
पैकेज ऑफर किए जिसमें अगर वह सरेंडर कर दें तब श्रीनिवास ना केवल उनको लीगल जस्टिस प्रोवाइड करवाएंगे बल्कि उनके लिए एंप्लॉयमेंट के रास्ते भी ढूंढेंगे। श्रीनिवास के एफर्ट से साल 1990 में वीरप्पन के कई हार्ड कोर गैंग मेंबर्स ने
09:58
Speaker A
सरेंडर कर दिया। इस तरह वीरप्पन की गैंग जो उस समय 40 से ज्यादा मेंबर्स की थी वो घटकर सिर्फ 810 मेंबर्स की गैंग रह जाती है। जिन्होंने सरेंडर किया उनमें से एक अर्जुना भी था यानी वीरप्पन का छोटा भाई।
10:11
Speaker A
जब वीरप्पन की गैंग के लोगों को जेल में डाला गया तो श्रीनिवास ने पर्सनली उनके लिए एडवोकेट्स अरेंज किए और उन्हें बेल पर रिलीज करवा दिया। 9 नवंबर 1991 के दिन वीरप्पन ने भी श्रीनिवास को एक वायरलेस मैसेज भिजवाया। जिसमें वीरप्पन ने कहा कि
10:25
Speaker A
वह भी सरेंडर करने के लिए तैयार है। बशर्ते श्रीनिवास अकेले और अनआर्म होकर उससे मिलने आए। यानी बिना हथियारों के उनसे मिलने के लिए आए। इस बात से श्रीनिवास बहुत खुश होते हैं। श्रीनिवास बिना किसी हिचकिचाहट के ही उसी रात अकेले
10:39
Speaker A
ही वीरप्पन से मिलने के लिए निकल पड़ते हैं। श्रीनिवास गोपीनाथम गांव से 6 कि.मी.
10:44
Speaker A
दूर एक क्रीक क्रॉस कर ही रहे थे कि तभी उन्हें पीछे से गोली मार दी जाती है। दरअसल सरेंडर का मैसेज वीरप्पन का एक ट्रैप था। वीरप्पन श्रीनिवास से इतना खुन्नस खाया हुआ था कि उसने श्रीनिवास के सर को धड़ से अलग करके श्रीनिवास की बॉडी
10:59
Speaker A
को जंगल में फेंक दिया। 10 नवंबर 1991 के दिन पुलिस को श्रीनिवास का शव बिना सर के मिलता है। कहा यह भी जाता है कि वीरप्पन श्रीनिवास के सिर से 3 साल तक फुटबॉल खेलता रहा। श्रीनिवास की मौत के बाद
11:12
Speaker A
वीरप्पन का खौफ और ज्यादा बढ़ जाता है। टोटल मर्डर इट वास। द विटनेसेस वेर सेइंग दैट दे वर प्लेइंग लाइक फुटबॉल की तरफ। दे वर टेकिंग इट अराउंड। उसने अपने गैंग को और ज्यादा मजबूत कर लिया। वीरप्पन के गैंग में एक बार फिर से
11:24
Speaker A
करीब 40 से 50 लोग शामिल हो जाते हैं। मई 1992 में वीरप्पन ने एक बार फिर कर्नाटक के रामपुरा पुलिस स्टेशन पर सीधे हमला बोल दिया और पांच पुलिसकर्मियों को गोली मार दी। इस पुलिस स्टेशन से वीरप्पन के गैंग
11:37
Speaker A
ने बड़ी संख्या में राइफलें, पिस्तौल और गोला बारूद लूट लिया। पुलिसकर्मियों की मौत और थाने की लूट के बाद पुलिस वीरप्पन को पकड़ने के लिए डेस्पिरेट होने लगती है। कोलार के एसपी हरिकृष्णा, सब इंस्पेक्टर शकील अहमद और दूसरे पुलिस अधिकारी वीरप्पन की तलाश में
11:57
Speaker A
लग जाते हैं। वीरप्पन से संपर्क के लिए पुलिस ने हाथी दांत के खरीदार होने का नाटक किया और हाथी के हत्यारों के एक गुर्गे के थ्रू वीरप्पन के गिरोह से संपर्क किया। इसी बीच हरिक कृष्णा की टीम को एक हाथी दांत के तस्कर से टिप मिलती है
12:09
Speaker A
और वे मलई माधेश्वर हिल्स के लिए निकल जाते हैं। लेकिन असल में यह टिप वीरप्पन का ही एक जाल थी। इसलिए जैसे ही पुलिस टीम मौके पर पहुंचती है वीरप्पन की गैंग ने हमला बोल दिया। इस हमले में वीरप्पन की
12:21
Speaker A
गैंग ने ग्रेनेड, देसी बम और AK-47 जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया। यह हमला इतना खतरनाक था कि एसपी हरिकृष्णा समेत सब इंस्पेक्टर शकील अहमद और चार अन्य पुलिसकर्मी मौके पर ही मारे जाते हैं। जिले के एसपी हरिक कृष्णा की मौत से यह
12:35
Speaker A
मामला देश भर में फैल जाता है। वीरप्पन को पकड़ने के लिए कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंगारप्पा ने पैरामिलिट्री फोर्सेज को बुला लिया। इसी दौरान कर्नाटक और तमिलनाडु की सरकार ने वीरप्पन को पकड़ने के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स
12:48
Speaker A
बनाई। लेकिन यह टास्क फोर्स भी वीरप्पन का कुछ भी ना कर सकी। वीरप्पन का अपना खबरियों का एक बड़ा स्ट्रांग नेटवर्क था। वीरप्पन ने 9 अप्रैल 1993 को मिटूर इलाके में मौजूद गोविंद पदी गांव में एक आदमी को
13:02
Speaker A
मार डाला। सिर्फ इसलिए कि वीरप्पन को शक था कि वह पुलिस का इनफॉर्मर है। इस आदमी को मारने के बाद वीरप्पन ने खुलेआम पुलिस फ़ को चैलेंज दिया कि अगर पुलिस में दम है तो उसकी गैंग को ट्रैक करके और उसे अरेस्ट
13:13
Speaker A
करके दिखाएं। वीरप्पन ने आईपीएस ऑफिसर गोपाल कृष्णन को भी चैलेंज करते हुए कई पोस्टर्स लगाए। इंटरेस्टिंगली आईपीएस ऑफिसर के गोपालकृष्णन ने वीरप्पन का यह चैलेंज एक्सेप्ट कर लिया और स्पेशल टास्क फ़ोर्स जिसमें दोनों स्टेट्स के पुलिस फॉरेस्ट ऑफिशियल्स, फॉरेस्ट वॉचर्स और
13:29
Speaker A
इनफॉर्मर्स को मिलाकर कुल करीब 41 लोग शामिल थे। उन सबको लेकर वीरप्पन के ठिकानों की तरफ बढ़ने लगते हैं। लेकिन गोपाल कृष्णन को नहीं मालूम था कि वे एक ट्रैप में फंसकर जा रहे हैं। गोपाल कृष्णन की टीम दो व्हीकल्स में निकलती है। जिसमें
13:43
Speaker A
से एक बस थी और ज्यादातर टीम मेंबर्स इसी बस में ही थे और एक जीप थी जिसमें के गोपाल कृष्णन बैठे थे। लेकिन इनके आने से पहले ही वीरप्पन की गैंग ने रोड पर 14 से ज्यादा जगहों पर आईईडी लैंडमाइंस प्लांट
13:56
Speaker A
कर रखे थे। इस दौरान जब बस लैंडमाइंस के ऊपर से गुजर रही थी तभी वीरप्पन की गैंग ने ब्लास्ट कर दिया। यह ब्लास्ट इतना भयंकर था कि एसटीएफ की बस कई फीट हवा में उड़कर दूर जाकर गिरती है।
14:15
Speaker A
इस धमाके में कुल 22 लोग मारे जाते हैं। यह ब्लास्ट कर्नाटक के आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा ब्लास्ट था। हालांकि जीप में चल रहे गोपाल कृष्णन इस हमले से बच जाते हैं, लेकिन उन्हें हेड और लेग्स में सीवियर
14:28
Speaker A
इंजरीज आती हैं। इस ब्लास्ट ने पूरे देश को हिला दिया। पूरा पुलिस डिपार्टमेंट वीरप्पन को पकड़ने के लिए लगा दिया जाता है। लेकिन वीरप्पन दोनों राज्यों के पुलिस के हाथ नहीं लगता। लेकिन इधर जब 27 दिसंबर 1995 को वीरप्पन के छोटे भाई अर्जुन और दो
14:43
Speaker A
और गैंग मेंबर्स को मैसूर से एमएम हिल्स इंटेरोगेशन के लिए शिफ्ट कर दिया जा रहा था। तब हार्स इंट्रोगेशन के डर से और वे कहीं वीरप्पन का पता ना बता दें इसके डर से इन तीनों ने साइनाइड खाकर अपनी जान दे
14:56
Speaker A
दी। यह घटना वीरप्पन के लिए बहुत दर्दनाक थी। वीरप्पन का कहना था कि एसटीएफ ने जबरदस्ती उसके भाई को साइनाइड खाने के लिए मजबूर किया था ताकि इस डेथ को वे सुसाइड में बदल सकें। अपने भाई की मौत के बाद
15:08
Speaker A
वीरप्पन अधिकारियों से और नफरत करने लगा और पहले से भी ज्यादा उग्र हो जाता है। अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए वीरप्पन ने अप्रैल 1996 में एक पुलिस इनफॉर्मर की हत्या कर दी। इसके 3 महीने
15:20
Speaker A
बाद जुलाई 1996 में वीरप्पन ने 10 और लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी। इसके कुछ दिन बाद वीरप्पन ने तमिलनाडु के एसपी तमिल सेलवन और उनकी पार्टी पर हमला कर दिया। इस हमले में एक पुलिस कांस्टेबल मारा जाता है
15:33
Speaker A
और एसपी तमिल सेमन भी गंभीर रूप से घायल होते हैं। इसके बाद 1997 में ही वीरप्पन ने वेली तिरुपुर पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और यहां से नौ बंदूकें और ढेर सारा गोला बारूद लूट लिया। हालांकि इसके कुछ
15:47
Speaker A
बाद कुछ समय तक वीरप्पन शांत रहता है क्योंकि इस टाइम तक आते-आते वीरप्पन की गैंग की संख्या घटकर सिर्फ छह रह गई थी। अब वीरप्पन भी उतना ताकतवर नहीं रह गया था जितना वह पहले था। अब वीरप्पन की उम्र भी
15:58
Speaker A
बढ़ रही थी। इसलिए वीरप्पन कुछ शर्तों पर सरेंडर करने के लिए सोचने लगता है। इसके लिए 28 अप्रैल 1999 के दिन वीरप्पन ने धर्मपुरी जिले के होने के पास तीन फॉरेस्ट ऑफिसर्स को अगवा कर लिया। इसके बाद वीरप्पन ने डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को लेटर
16:12
Speaker A
और ऑडियो कैसेट्स भेजे। इस बार वीरप्पन ने कोई फिरौती नहीं मांगी। वीरप्पन ने बदले में सिर्फ एमनेस्टी यानी कि आत्मसमर्पण और अपनी गैंग के लिए सुरक्षित रास्ता मांगा। यह किडनैपिंग करीब 20 दिन तक चलती है, लेकिन कोई बात नहीं बन सकी। अंत में
16:26
Speaker A
वीरप्पन ने इन तीनों ऑफिसर्स को बिना कोई शर्त किए रिहा कर दिया। इस तरह साल 2000 तक आते-आते वीरप्पन तमिलनाडु सरकार से नेगोशिएशन करने लगा। उसने कई बार ऑडियो कैसेट्स भेजी जिनमें वह कहता कि वह सरेंडर करने के लिए तैयार है। बसशर्ते उसे और
16:41
Speaker A
उसके साथियों को कोई सजा नहीं दी जाए। इधर एसटीएफ और पुलिस को पूरा अंदेशा था कि वीरप्पन जल्द ही कोई हाई प्रोफाइल किडनैपिंग कर सकता है। लेकिन कब और कहां यह कोई नहीं जानता था। 30 जुलाई 2000 की
16:53
Speaker A
रात वीरप्पन ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरे दक्षिण भारत को हिला कर रख दिया। रात करीब 9:30 बजे वीरप्पन ने 10-12 हथियारबंद लोगों के साथ कन्नड़ सुपरस्टार डॉक्टर राजकुमार को तमिलनाडु के इरोड जिले के गांजनूर गांव में मौजूद उनके फार्म हाउस
17:09
Speaker A
से अगवा कर लिया। यह इलाका कर्नाटक बॉर्डर से सिर्फ 4 कि.मी. दूर था। इस घटना ने पूरे कर्नाटक में तहलका मचा दिया। बेंगलुरु से जगह-जगह हिंसा की खबरें आने लगती हैं। राजकुमार फैंस एसोसिएशन ने शाम तक उन्हें छुड़ाने की मांग तेज कर दी। उसी
17:24
Speaker A
दिन स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए जाते हैं। चार तमिल अखबारों के दफ्तरों पर हमले होते हैं। ट्रेनें रोक दी जाती हैं और बसें जला दी जाती हैं। कर्नाटक फिल्म चेंबर्स ऑफ कॉमर्स ने भी सभी फिल्मों की शूटिंग्स को
17:36
Speaker A
रोक दिया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और यूनियन होम मिनिस्टर एल के आडवाणी को इसकी जानकारी दी। इसके बाद कर्नाटक के होम मिनिस्टर मल्लिकार्जुन खड़गे भी एक्टर पॉलिटिशियन अमरीश और टॉप अधिकारियों के साथ चेन्नई पहुंचते हैं और तमिलनाडु के
17:52
Speaker A
मुख्यमंत्री एम करुणानिधि से मिलते हैं। एक्टर राजकुमार की किडनैपिंग कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य के बीच विवाद का कारण बन जाती है। लेकिन 3 महीने बीत जाने के बाद भी दोनों राज्यों की पुलिस एसटीएफ अपने महान एक्टर को रेस्क्यू नहीं कर सकी। अंत
18:07
Speaker A
में करीब 108 दिन बाद 15 नवंबर 2000 के दिन वीरप्पन ने राजकुमार को रिहा कर दिया। सरकार की तरफ से वीरप्पन से नेगोशिएट करने वालों में नकी किरण के एडिटर आरआर गोपाल और पी नीदुमरण जैसे नेता भी शामिल थे। इस
18:21
Speaker A
मामले में पुलिस अधिकारियों ने बाद में दावा किया कि राजकुमार को छुड़ाने के लिए करीब ₹30 करोड़ की फिरौती दी गई थी। हालांकि राजकुमार के परिवार ने इस दावे को खारिज कर दिया। राजकुमार की किडनैपिंग ने साफ कर दिया कि लगभग एक दशक से चल रहे
18:34
Speaker A
एसटीएफ ऑपरेशन के बाद भी वीरप्पन पूरी तरह से काबू में नहीं आया है। लोग वीरप्पन के डर में अभी भी जी रहे थे। हालात संभालने के लिए सीआरपीएफ की छह कंपनियां तैनात कर दी जाती हैं। करीब 10,000 पुलिसकर्मी
18:47
Speaker A
मैदान में उतार दिए जाते हैं। इसमें 28 प्लाटून कर्नाटक स्टेट रिजर्व पुलिस और 30 प्लाटून बेंगलुरु सिटी पुलिस के शामिल थे। इतना सब होने के बाद भी एसटीएफ वीरप्पन को पकड़ नहीं सकी। पकड़ना तो दूर उसे छू भी
19:01
Speaker A
नहीं सकी। एसटीएफ के रिकॉर्ड के मुताबिक साल 1989 से वीरप्पन ने 138 लोगों की हत्याएं की थी। इनमें 32 पुलिसकर्मी और 10 फॉरेस्ट ऑफिसर्स शामिल थे। उसने 500 से ज्यादा हाथी मारे थे। हाथियों की संख्या को कई जगहों पर 1000 और 2000 भी बताया
19:18
Speaker A
जाता है। राजकुमार की रिहाई के बाद वीरप्पन कुछ समय के लिए शांत हो जाता है। लेकिन उसका खेल खत्म नहीं हुआ था। 25 अगस्त 2002 की रात वीरप्पन ने कर्नाटक के पूर्व मंत्री एच नागप्पा को भी उनके घर से
19:30
Speaker A
अगवा कर लिया। मंत्री नागप्पा चामराज नगर जिले के एक गांव में रहते थे। इस किडनैपिंग के बाद वीरप्पन ने सरकार को कई ऑडियो कैसेट भेजी। पांचवी कैसेट में उसने साफ तौर पर एक डेडलाइन दी और डिमांड रखी कि कोलातुर मणि को जेल से रिहा कर दिया
19:43
Speaker A
जाए। उनके बदले ही वीरप्पन नागप्पा को छोड़ेगा। कोलातूर मणि एक एक्टिविस्ट थे जिन पर आरोप था कि इनकी वीरप्पन के क्राइम्स में साझेदारी होती है। इसके जुर्म में यह जेल में बंद थे। इन पर 1993 में पाल ब्लास्ट में भी इनवॉल्वमेंट के
19:55
Speaker A
आरोप लगे थे। जिसमें 22 लोगों की मौत हुई थी। अंत में 23 नवंबर 2002 के दिन कर्नाटक की कैबिनेट वीरप्पन की डिमांड मानने का फैसला कर लेती है। इसके बाद हाईकोर्ट भी 28 नवंबर 2002 को कोलामणि को बेल दे देती
20:09
Speaker A
है। लेकिन इस सबके बावजूद 8 दिसंबर 2002 के दिन नागप्पा की लाश जंगल में मिलती है। मंत्री नागप्पा की बॉडी पर गोलियों के निशान थे। माना गया कि नागप्पा को किसी और ने नहीं बल्कि वीरप्पन ने मारा है। लेकिन
20:22
Speaker A
वीरप्पन ने खुद एक ऑडियो कैसेट भेजा जिसमें उसने बार-बार कहा कि मैंने नागप्पा को नहीं मारा। तमिलनाडु की एसटीएफ ने मारा है। वीरप्पन का क्लेम था कि तमिलनाडु एसटीएफ ने उन पर अटैक किया था। इसे एनकाउंटर में ही एक गोली नागप्पा को लगी
20:35
Speaker A
थी जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी और हमें वहां से निकलना पड़ा। वीरप्पन ने कहा कि मैं भला नागप्पा को क्यों मारूंगा?
20:42
Speaker A
क्योंकि कोलातुरम मणि तो यहां आने ही वाले थे। हालांकि तमिलनाडु गवर्नमेंट और उनकी एसटीएफ ने इस ऑपरेशन में अपनी इनवॉल्वमेंट से पूरी तरह डिनाई कर दिया और कहा कि नागप्पा को वीरप्पन ने ही मारा है। करोड़ों रुपए फूंक दिए जाने के बाद और 100
20:55
Speaker A
से ज्यादा लोगों की मौत के बाद भी वीरप्पन को पकड़ा नहीं जा सका। इसके कई कारण थे जिनमें से एक कारण था वीरप्पन की रोबिनहुड छवि। वीरप्पन की सबसे बड़ी ताकत उसका वनियार यानी पयाची समुदाय था। गोपीनाथम और
21:07
Speaker A
आसपास के इलाकों में ज्यादातर लोग इसी पिछड़ी जाति से आते थे। इन गांव में लोग वीरप्पन को एक डाकू नहीं मानते थे। वे उसे एक तरह से रॉबिन हुड समझते थे जो गरीबों को पैसे देता था और उनकी मदद करता था।
21:18
Speaker A
वनियार समुदाय में वीरप्पन की छवि अपने लोगों के एक रक्षक जैसी थी। इसी वजह से पुलिस को गांव वालों से कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाती थी। वीरप्पन को पकड़ने में कितना पैसा खर्च हुआ इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार ने कभी जारी नहीं किया।
21:31
Speaker A
लेकिन तमिलनाडु और कर्नाटक के सीनियर पुलिस ऑफिसर्स का मानना है कि कुल खर्च ₹100 करोड़ से भी ज्यादा का था। इसलिए इसे भारत के इतिहास का सबसे लंबा और सबसे महंगा मेन हंट माना जाता है। वीरप्पन का आतंक सरकार के काबू से बाहर हो चुका था।
21:46
Speaker A
हालात पूरी तरह से बिगड़ चुके थे। इधर साल 2002 में जय ललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनती हैं। जय ललिता के कार्यकाल में ही तमिलनाडु और कर्नाटक ने मिलकर एक नई स्पेशल टास्क फ़ोर्स बनाई। इस एसटीएफ की कमान दो अफसरों को दी जाती है।
21:59
Speaker A
एक थे विजय कुमार और दूसरे थे मोहन कन्नन। इन दोनों ही अफसरों को उस समय देश के सबसे चर्चित और भरोसेमंद आईपीएस अफसर माना जाता था और एसटीएफ संभालने से पहले दोनों ही अफसरों ने कश्मीर में काम किया था। एसटीएफ
22:11
Speaker A
का प्रमुख बनते ही विजय कुमार ने पूरा फोकस वीरप्पन पर लगाया। उन्होंने उसकी पूरी दुनिया को समझना शुरू कर दिया। जंगल, गांव, मददगार और उसका नेटवर्क हर कड़ी को ध्यान से जोड़ा गया। विजय कुमार का पहला कदम था पुलिस के पुराने इनफॉर्मर्स को
22:24
Speaker A
दोबारा एक्टिव करना। इस काम के लिए एसटीएफ की टीमें कोयंबटूर, बेंगलुरु, कोल लीगल, चेन्नई, सलेम और कुडालूर की जेलों में गई और वहां के दर्जनों कैदियों से पूछताछ करती हैं। कई युवा कांस्टेबल और सब इंस्पेक्टरों को अंडर कवर जेलों में भेजा
22:37
Speaker A
जाता है। वे छोटे अपराधी बनकर अंदर गए जहां उन्होंने जेल में रह रहे तमिल एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप्स के कैदियों से दोस्तियां बढ़ाई। एसटीएफ ने 25 से 30 लोकल लोगों और कुछ कट्टर तमिल ग्रुप्स में भी संपर्क बढ़ाया। आखिर में चार से पांच लोग
22:49
Speaker A
ऐसे मिलते हैं जो वीरप्पन के बेहद करीब पहुंच चुके थे। एसटीएफ ने वीरप्पन के भाई मथयन और वीरप्पन की पत्नी मुलक्ष्मी पर भी कड़ी नजर रखना शुरू कर दिया। आईपीएस विजय कुमार ने वीरप्पन की सारी पुरानी वीडियो टेप्स देखी ताकि कुछ सुराग मिल जाए। ऐसे
23:04
Speaker A
ही एक दिन विजय वीरप्पन की टेप्स देख रहे थे। तभी विजय कुमार ने देखा कि वीरप्पन हाथ में लिए एक कागज को पढ़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन वह पढ़ नहीं पा रहा था। विजय कुमार समझ गए कि वीरप्पन को आंखों की कोई
23:15
Speaker A
गंभीर समस्या है। इसका मतलब वह इलाज करवाने के लिए बाहर जरूर निकलेगा। बस यहीं से वीरप्पन को ट्रैप में लेने का प्लान शुरू हो जाता है। एसटीएफ ने एक एंबुलेंस तैयार करवाई। इसमें एसटीएफ के दो जवानों को रखा गया। इन्हें ऑर्डर दिए गए कि कुछ
23:28
Speaker A
टाइम के लिए वीरप्पन के एरिया में जाकर लोगों की सेवा करो ताकि लोकल लोगों और वीरप्पन के लोगों को लगे कि यह एक आम एंबुलेंस है। अब आप यह सोच रहे होंगे कि इसकी क्या गारंटी थी कि वीरप्पन अपनी आंख
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Speaker A
का इलाज करवाने के लिए इसी एंबुलेंस में जाएगा। इसके पीछे एक इंटरेस्टिंग कहानी है। विजय कुमार अपनी बुक वीरप्पन में लिखते हैं कि एक दिन ट्रेडर नाम का पुलिस का एक मुखबिर जो वीरप्पन की गैंग का हिस्सा था और वीरप्पन की ही कास्ट का था।
23:51
Speaker A
वह विजय कुमार को आकर बताता है कि वीरप्पन ने उसे कहा है कि मिस्टर एक्स नाम के धर्मपुरी के एक बिजनेसमैन से मिले और उससे मदद मांगे कि गैंग के लिए लिट्टे से संपर्क करके हथियार दिलवाए जाए और उसकी
24:02
Speaker A
आंख की बीमारी का इलाज करवाया जाए। लिट्टे श्रीलंका का तमिलों के लिए लड़ने वाला एक ग्रुप था जो श्रीलंका और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में काम करता था। जिसका एम था श्रीलंका और तमिलनाडु के तमिल बाहुल्य इलाकों को मिलाकर एक अलग देश तमिल इलम
24:16
Speaker A
बनाना। क्योंकि वीरप्पन भी तमिल एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप्स से जुड़ा हुआ था इसलिए उसका कांटेक्ट भी लिट्टी से जुड़ा हुआ था। जब पुलिसिया मुखवीर ट्रेडर ने कोड नेम मिस्टर एक्स वाले व्यापारी का नाम लिया तब विजय कुमार चौंक जाते हैं क्योंकि विजय
24:36
Speaker A
कुमार इस बिजनेसमैन को जानते थे और उसकी रेपुटेशन बाहर बहुत अच्छी थी। अब विजय कुमार ने मुखबिर ट्रेडर को कुछ रिकॉर्डिंग डिवाइस लगाकर मिस्टर एक्स से मिलने के लिए भेज दिया और मुखबिर से बोला कि वह मिस्टर एक्स से वीरप्पन के श्रीलंका जाने के
24:49
Speaker A
प्लान के बारे में बात करें। पुलिस मुखबिर ट्रेडर ने ऐसा ही किया और सारी बातचीत रिकॉर्ड हो जाती है। इस रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल एसटीएफ की टीम ने मिस्टर एक्स को ब्लैकमेल करने के लिए किया और दबाव बनाया कि वह वीरप्पन तक यह मैसेज पहुंचाए कि
25:02
Speaker A
श्रीलंका में उसके दोस्तों से संपर्क हो गया है और एक आदमी भेजा जाएगा जो वीरप्पन की आंख के ऑपरेशन के लिए तिरछी या मदुरई ले जाएगा और बाद में उसे श्रीलंका हथियार डील के लिए भी ले जाएगा। एसटीएफ ने पुलिस
25:13
Speaker A
अफसर बिल्ला दोराई जिसे वीरप्पन नहीं जानता था उसे श्रीलंका से आने वाले हथियार डीलर का रोल दिया। अक्टूबर 2004 में एसटीएफ को बिजनेसमैन मिस्टर एक्स से और एक दूसरे मुखबिर ब्लैंकेट से पता चलता है कि वीरप्पन ने संदेश भेजा है कि उसका आदमी
25:27
Speaker A
धर्मपुरी में एक चाय की दुकान पर बिजनेसमैन मिस्टर एक्स से मिलने के लिए आएगा। वीरप्पन की तरफ से एक आदमी मिस्टर एक्स से मिलने के लिए आता है। जिसका कोड नेम विजय कुमार ने अपनी किताब में रेड लिखा है। वीरप्पन के आदमी रेड ने
25:39
Speaker A
बिजनेसमैन मिस्टर एक्स से कहा कि अन्ना 18 अक्टूबर को बाहर आएगा। तुम्हारा आदमी पपरा पट्टी पुलिस स्टेशन के पास जंक्शन पर रात 10:00 बजे इंतजार करें और अगर उस दिन हमसे कोई खबर नहीं मिलती है तो 20 अक्टूबर को
25:51
Speaker A
फिर आए और अगर तब भी नहीं मिले तो 22 अक्टूबर को मिलने के लिए आए। वीरप्पन के आदमी रेड ने मिस्टर एक्स को एक लॉटरी टिकट का आधा हिस्सा दिया जिसका नंबर 07710 था और मिस्टर एक्स से कहा कि बिजनेसमैन की
26:03
Speaker A
तरफ से जो भी आदमी आएगा उसके पास यह आधा टिकट सबूत के तौर पर होना चाहिए। वीरप्पन के दूत रेड से मिलने के बाद बिजनेसमैन मिस्टर एक्स ने यह सारी जानकारी एसटीएफ को शेयर कर दी। इस तरह वीरप्पन का जंगल से
26:15
Speaker A
बाहर आने का प्लान बन चुका था और यहीं से एसटीएफ ने ऑपरेशन कोकून की योजना बनाई इसमें कुकून नाम था एंबुलेंस [संगीत] का। आईपीएस विजय कुमार और मोहन कन्नन ने एसटीएफ टीम के साथ उस रास्ते का मैप निकाला जहां से वीरप्पन की एंबुलेंस को
26:28
Speaker A
गुजरना था। प्लान के मुताबिक वीरप्पन धर्मपुर से अपने साथियों के साथ एंबुलेंस में बैठने वाला था। धर्मपुर से 12 कि.मी.
26:34
Speaker A
दूर रास्ते में एक खंडर स्कूल पढ़ने वाला था। प्लान बना कि वीरप्पन को इस खंडर स्कूल के पास पहुंचते ही मौत के घाट उतार दिया जाएगा। 18 अक्टूबर 2004 की सुबह आईपीएस विजय और एसटीएफ के छह जवान AK-47
26:47
Speaker A
के साथ स्कूल की छत पर छिप जाते हैं। प्लान के तहत पहले ही स्कूल के बाहर सड़क किनारे पर एक गन्ने से लदा ट्रक खड़ा करवा दिया गया था। इस ट्रक का काम वीरप्पन की एंबुलेंस को ब्लॉक करना था। वहीं दूसरी
26:58
Speaker A
तरफ एसटीएफ की एक टीम को धर्मपुर के पास तैनात कर दिया गया ताकि वहां के ट्रैफिक को डायवर्ट किया जा सके। रात 10:00 बजे वीरप्पन और उसके तीन साथी एंबुलेंस को रोक कर ड्राइवर से उसको हॉस्पिटल की तरफ ले
27:10
Speaker A
जाने के लिए कहते हैं। ऐसा से पहले वह ड्राइवर से वह हाफ टिकट भी मांगते हैं जो रेड ने चाय की दुकान पर मिस्टर एक्स को दिया था। एंबुलेंस के निकलने से पहले ही वीरप्पन ने अपनी मूछे कटवा ली थी ताकि कोई
27:21
Speaker A
उसको पहचान ना सके। अब जैसे ही एंबुलेंस चला रहे एसटीएफ के जवान सर्वन तय लोकेशन पर पहुंचते हैं, वह तेजी से ब्रेक दबा देते हैं। सडन ब्रेक के कारण पीछे बैठे वीरप्पन और उसके गैंग के लोग एक दूसरे के
27:33
Speaker A
ऊपर गिरने लग जाते हैं। एंबुलेंस ठीक स्कूल से पहले उसी स्पॉट पर आकर रुकती है जहां एसटीएफ चाहती थी। एंबुलेंस के रुकते ही ड्राइवर सर्वन और उसके साथ की सीट पर बैठे दूसरे जवान तेजी से भागकर एंबुलेंस से उतर कर भाग जाते हैं। तभी विजय कुमार
27:48
Speaker A
लाउडस्कर से वीरप्पन को चेतावनी देते हैं कि तुम चारों तरफ से गिर चुके हो और तुम्हारे पास सरेंडर करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। लेकिन वीरप्पन ने कोई जवाब नहीं दिया। तभी अचानक से वीरप्पन की
27:59
Speaker A
तरफ से गोलियां चलाई जानी शुरू हो जाती हैं। इधर एसटीएफ की टीम ने भी अब एंबुलेंस पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया। इस तरह चंद मिनटों में ही 338 राउंड फायर कर दिए जाते हैं। कुछ देर बाद एंबुलेंस से
28:10
Speaker A
फायरिंग आना बंद हो जाता है। एसटीएफ के दो जवानों ने एंबुलेंस का दरवाजा खोला तो पता चला कि वीरप्पन और उसके तीनों साथी मारे जा चुके थे। सरप्राइजिंगली 140 गोली बरसाने के बाद भी वीरप्पन को सिर्फ दो-तीन गोलियां ही लगती हैं और वह अभी भी अपनी
28:25
Speaker A
आखिरी सांसे गिन रहा था। एसटीएफ की एक गोली वीरप्पन की आंख को पार कर चुकी थी। हालांकि विजय कुमार वीरप्पन को हॉस्पिटल के लिए रेफर कर देते हैं। लेकिन रास्ते में ही वीरप्पन की मौत हो जाती है। वीरप्पन के मरने पर एसटीएफ के जवानों को
28:39
Speaker A
यकीन नहीं हो रहा था कि वीरप्पन मारा जा चुका है। वीरप्पन सैंडली स्मगलर वीरप्पन हैज़ रिपोर्टेडली बीन शॉट डेड ही हैज़ इनफ रिपोर्टेडली बीन उनके सिर में गोली के दो जख्म थे। दोनों ही AK-47 से लगे थे। जहां एक गोली बाहर
28:53
Speaker A
निकल गई थी। वहीं दूसरी गोली अंदर फंसी रह गई थी। इस वक्त वीरप्पन की उम्र करीब 55 साल थी। वीरप्पन की बाई आंख में पूरी तरह पका मोतियाबिंद पाया गया। वीरप्पन जब तक जिंदा रहा उसे पकड़ा नहीं जा सका। सरकार
29:05
Speaker A
के करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी उसे कोई छू नहीं सका। उसे जंगल की समझ उतनी ही थी जितनी जंगली जानवरों को अपने जंगल की होती है। वह पत्तों के हिलने से ही बता दिया करता था कि आने वाला जानवर है या
29:16
Speaker A
इंसान। वीरप्पन की आंखें बूढ़ी ना होती तो शायद वह कभी पुलिस के हाथ नहीं लगता। इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
Topics:वीरप्पनडकैततस्करीएसटीएफकर्नाटकतमिलनाडुहाथी का शिकारपुलिस मुठभेड़मुथुलक्ष्मीभारतीय अपराध

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