योगी आदित्यनाथ के जीवन और गोरखनाथ मठ की राजनीति की कहानी, उनके राजनीतिक सफर और गोरखपुर की पृष्ठभूमि।
Key Takeaways
- योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक और धार्मिक सफर गोरखनाथ मठ से गहराई से जुड़ा है।
- गोरखनाथ मठ की परंपरा और इतिहास ने पूर्वांचल की राजनीति को प्रभावित किया है।
- राम मंदिर आंदोलन में गोरखनाथ पीठ और महंतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
- जाति और धर्म के आधार पर गोरखपुर की राजनीति में गहरा विभाजन और टकराव है।
- योगी आदित्यनाथ ने हिंदूवादी राजनीति को मजबूती से आगे बढ़ाया और व्यापक जनसमर्थन पाया।
What the video covers
- योगी आदित्यनाथ का जन्म 5 जून 1972 को उत्तराखंड में हुआ था, उनका असली नाम अजय सिंह बिष्ट था।
- उन्होंने आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी से राजनीति शुरू की और बाद में गोरखनाथ मठ से जुड़कर सन्यास लिया।
- गोरखनाथ मठ की स्थापना और नाथ संप्रदाय की परंपराओं का विस्तार, जो योगी आदित्यनाथ के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- महंत दिग्विजयनाथ का गोरखनाथ मठ और राम मंदिर आंदोलन में योगदान, साथ ही गांधी हत्या से जुड़ी विवादित घटनाएं।
- महंत अवैद्यनाथ का गोरखनाथ मठ के नेतृत्व में आना और उनकी राजनीतिक भूमिका।
- योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर में हिंदूवादी राजनीति को तेज करना और सामाजिक-धार्मिक विवादों में उनकी भूमिका।
- गोरखनाथ मठ और गोरखपुर की राजनीति में जातिगत और धार्मिक समीकरणों का प्रभाव।
- योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक संघर्ष, चुनावी जीत और बीजेपी के साथ उनके संबंध।
- गोरखनाथ मठ की सेकुलर परंपरा और नाथ संप्रदाय के मुस्लिम अनुयायियों का उल्लेख।
- राम मंदिर आंदोलन का इतिहास और गोरखनाथ पीठ का इसमें योगदान।
Chapters
- 00:00योगी आदित्यनाथ का जन्म और प्रारंभिक जीवन
- 02:15गोरखनाथ मठ से जुड़ाव और सन्यास ग्रहण
- 04:22नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ मठ का इतिहास
- 06:47महंत दिग्विजयनाथ और राम मंदिर आंदोलन
- 09:00महंत अवैद्यनाथ का नेतृत्व और राजनीतिक सफर
- 11:19योगी आदित्यनाथ की राजनीति और गोरखपुर में प्रभाव
- 17:55जाति, धर्म और सामाजिक विवाद
- 24:48योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक संघर्ष और बीजेपी के साथ संबंध
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Speaker A
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में एक फॉरेस्ट रेंजर आनंद मोहन बिष्ट तैनात थे। 5 जून 1972 के दिन आनंद की पत्नी सावित्री देवी को एक बेटा होता है, जिसका नाम रखा जाता है अजय। [संगीत] सरकारी नौकरी के कारण आनंद का इधर-उधर के
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जिलों में ट्रांसफर होता रहता था। इसलिए सावित्री अपने बेटे अजय और बाकी बच्चों को लेकर पौड़ी गढ़वाल जिले के पंचूर गांव में चली जाती हैं। जो उनका पैतृक गांव था। यहां 12वीं की पढ़ाई के बाद अजय ने कोर्टद्वार के पीजी गवर्नमेंट कॉलेज में
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ग्रेजुएशन करने के लिए एडमिशन ले लिया। यहां पहले से ही अजय की बहन कौशल्या का देवर जयप्रकाश पढ़ रहा था और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्क्सिस्ट के छात्र संगठन एसएफआई का मेंबर था। जयप्रकाश ने अजय को एसएफआई में शामिल करने के लिए एकदम
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मना लिया था। लेकिन प्रमोद रावत नाम के एक स्टूडेंट के कहने पर अजय ने आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी को जॉइन कर लिया। साल 1992 में अजय ने कॉलेज स्टूडेंट यूनियन के सेक्रेटरी पद पर चुनाव लड़ने की इच्छा
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जताई, लेकिन एबीवीपी ने अजय को टिकट नहीं दी। अजय को चुनाव लड़ने का इतना मन था कि निर्दलीय ही चुनाव में खड़े हो जाते हैं। लेकिन इस चुनाव में अजय की बुरी तरह से हार होती है और वह छठवें नंबर पर आते हैं।
Speaker A
इसके बाद अजय ने ऋषिकेश के ही पंडित ललित मोहन शर्मा कॉलेज में एमएससी मैथमेटिक्स में एडमिशन ले लिया। एमएससी फर्स्ट ईयर के दौरान ही अजय का गोरखपुर की गोरखनाथ मठ के महंत अवैद्यनाथ से मिलनाजुलना शुरू हो जाता है। महंत अवैद्यनाथ अजय के दूर के
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चाचा लगते थे और इस समय गोरखपुर से लोकसभा सांसद बन चुके थे। कि आपने अभी केरला में जहां कांग्रेस सरकार है। अभी वहां पर इतवार को छुट्टी होती थी। आपने शुक्रवार को छुट्टी दे। कॉलेज खत्म होने के बाद 1993 में अजय
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नौकरी के लिए दिल्ली चला आता है। हालांकि अजय को नौकरी नहीं मिलती। इत्तेफाक से इन्हीं दिनों महंत अवैद्यनाथ भी इलाज के लिए एम्स दिल्ली में भर्ती थे। क्योंकि अजय के पास कोई नौकरी नहीं थी, इसलिए वह महंत अवैद्यनाथ की देखभाल करने के काम में
Speaker A
लग जाता है। इसी दौरान महंत अवैद्यनाथ ने अजय से गोरखनाथ मठ से जुड़ने के लिए कहा और अजय भी नवंबर 1993 में अपने घर वालों को बिना बताए ही गोरखपुर पहुंच जाता है। यहां 15 फरवरी 1994 के दिन महंत अवैद्यनाथ
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ने अजय बिष्ट को नाथपंत की दीक्षा दी और अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस तरह 21 साल के अजय सिंह बिष्ट बन जाते हैं योगी आदित्यनाथ। योगी आदित्यनाथ के परिवार को कुछ महीने बाद अखबार के माध्यम से पता चलता है कि
Speaker A
उनके बेटे ने सन्यास ले लिया है। अभी तक वे यह सोच कर बैठे थे कि वह नौकरी के लिए गोरखपुर गया है। इस खबर के बाद आदित्यनाथ के माता-पिता मठ पहुंच जाते हैं और यहां अपने बेटे को एक सन्यासी के कपड़ों में
Speaker A
देखकर हैरान रह जाते हैं। उन्होंने अजय के बाबा बनने का विरोध किया, लेकिन अंत में वे मान जाते हैं। इसके कुछ महीने बाद योगी आदित्यनाथ अपने पैतृक गांव पंचूर वापस जाते हैं और सन्यास की परंपरा के मुताबिक अपनी मां से भिक्षा मांगते हैं। इस रिवाज
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के बाद से ही उनका अपने परिवार से कोई संबंध नहीं रहता। उनके परिवार के लोग भी अब उन्हें महाराज जी बोलने लगे। यहां गोरखनाथ मठ के बारे में थोड़ा डिटेल में जानना जरूरी है ताकि आप मेकिंग ऑफ योगी
Speaker A
आदित्यनाथ और पॉलिटिक्स ऑफ गोरखपुर पीठ को समझ सकें, जो योगी आदित्यनाथ के जीवन का सबसे इंपॉर्टेंट चैप्टर है। गोरखनाथ मठ का नाम नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ से आता है। नाथ संप्रदाय की मान्यताओं के अनुसार आदिनाथ यानी कि भगवान शिव स्वयं इस परंपरा
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के संस्थापक थे। उनके बाद मत्सेंद्रनाथ एक प्रमुख गुरु हुए और इन्हीं के शिष्य हुए गुरु गोरखनाथ। गोरखनाथ ने नाथ संप्रदाय को संगठित किया और सारी योग विद्याओं को एक साथ लेकर आए। नाथ संप्रदाय के प्रचार के लिए गोरखनाथ पूरे देश में यात्राएं करते
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हैं। इसी कड़ी में उन्होंने गोरखपुर में तपस्या की थी। यहीं उनके अनुयायियों ने बाद में एक मठ की स्थापना कर दी, जो आगे चलकर गोरखनाथ पीठ बना। इन्हीं गोरखनाथ के नाम पर गोरखपुर जिले का नाम पड़ता है। गोरखनाथ मठ की परंपरा निर्गुणधारा की थी।
Speaker A
जहां सिर्फ एक अखंड ध्वनि जलती थी और कोई मूर्ति पूजा नहीं होती थी। यह वो मठ था जिसकी दीवारों पर गोरखवाणी के साथ-साथ कबीर वाणी भी खुदी हुई थी। गोरखनाथ मठ एक सेकुलर मठ था जहां पर हर जाति धर्म और
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वर्ग के लोग आ जा सकते थे। नाथ संप्रदाय में दीक्षा लेने के बाद व्यक्ति केवल नाथ रह जाता था। उसकी पुरानी पहचान मिट जाती है। काला और भगवा चोला उड़े पूर्वांचल और बिहार की गली-गली में घूमकर आटा मांगने
Speaker A
वाले जोगी इसी मठ से जुड़े हुए थे। इनमें से एक बड़ी संख्या नाती मुसलमानों की थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज भी मुस्लिम नाथ जोगियों के कई गांव हैं जो गेरुआ वस्त्र पहनकर नाथ परंपरा के अनुसार भजन गाते हैं। गोरखनाथ के बाद उनके शिष्य
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वरदनाथ और उसके बाद रामचंद्रनाथ, बालकनाथ, संतोषनाथ, गंभीरनाथ जैसे संतों ने इस मठ को संभाला। लेकिन 1940 के दशक में इस मठ का हिंदीकरण शुरू हो जाता है। तो यह जो गोरखनाथ मंदिर की जमीन है, ये लोग कहते हैं कि आसिफ उद्दौला की दी हुई है।
Speaker A
अब ये कि इस बीच में लोग कहते हैं कि इस मंदिर में एक प्रॉब्लम ये हुई कि इसकी ओनरशिप का मान झगड़ा चला। इसका मुकदमा चला और तकरीबन सन 2930 192930 आते-आते एक फैसला हो गया, एक साहब
Speaker A
के फेवर में जो ठाकुर थे, राजपूत थे और उन्होंने यहां पर जिसको अपना वो बनाया वो [संगीत] दिग्विजय नाथ जी थे। योगी दिग्विजय नाथ साल 1937 में दिग्विजयनाथ गोरखनाथ मठ के मुख्य महंत बन जाते हैं। उदयपुर के
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रहने वाले दिग्विजयनाथ जाति से राजपूत थे और अनाथ थे। 8 साल की उम्र में ही इनकी मां की डेथ हो जाती है। इसके बाद इन्हें नाथ पंत योगी फूलनाथ अपने साथ गोरखपुर ले आते हैं। इस तरह दिग्विजयनाथ गोरखपुर में
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ही बड़े होते हैं। दिग्विजयनाथ शुरू में कांग्रेस में हुआ करते थे और 1920 के मूवमेंट में गांधी के साथ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में शामिल हुए। लेकिन आगे चलकर दिग्विजयनाथ का गांधी और कांग्रेस से मोह भंग हो जाता है। 1940 के समय
Speaker A
दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा में शामिल हो जाते हैं, जो गांधी और कांग्रेस की कट्टर विरोधी थी, जिसमें सावरकर एक बड़े नेता थे। दिग्विजयनाथ के प्रभाव को देखते हुए उन्हें संयुक्त प्रांत यानी कि आज के उत्तर प्रदेश का हिंदू महासभा का अध्यक्ष
Speaker A
बना दिया जाता है। हिंदू महासभा से जुड़े गोडसे ने 30 जनवरी 1948 के दिन गांधी की हत्या कर दी। गांधी हत्या की साजिश में सावरकर का नाम भी आया। साथ ही महंत दिग्विजयनाथ पर भी गांधी हत्या के लिए
Speaker A
उकसाने का आरोप लगा। दिग्विजयनाथ राणा तांडा से कम नहीं थे। गांधी वध दिग्विजय नाथ जी की पिस्तौल से हुआ है। गांधी जी की हत्या से 3 दिन पहले ही दिग्विजयनाथ ने एक सभा में कथित तौर पर हिंदुओं को महात्मा को मार देने के लिए
Speaker A
उकसाया था। इस कारण दिग्विजयनाथ को 9 महीने जेल में रहना पड़ा। हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में दिग्विजयनाथ को बाइज़त रिहा कर दिया जाता है। यह गोरखनाथ पीठ के महंत दिग्विजयनाथ ही थे, जिन्होंने राम मंदिर के मामले को सबसे पहले बड़े लेवल पर
Speaker A
एक राजनीतिक मामला बनाया। साल 1949 में दिग्विजयनाथ ने अयोध्या की बाबरी मस्जिद के सामने 9 दिन का रामचरितमानस का पाठ आयोजित किया। इसके नौवें दिन ही बाबरी मस्जिद में चुपके से राम मूर्ति स्थापित कर दी जाती है और कह दिया जाता है कि
Speaker A
भगवान राम स्वयं बाबरी मस्जिद में प्रकट हुए हैं। जबकि असलियत यह थी कि हिंदूवादी नेताओं ने रात में चुपके से बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियां रख दी थी। राम मंदिर को लेकर मैंने डिटेल्ड वीडियो बनाई हैं, जिन्हें आप मेरे चैनल पर भी सर्च
Speaker A
करके देख सकते हैं। बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियां रखे जाने से ही यह मामला देश में सांप्रदायिकता फैलाने का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है। उस समय इस विवाद से बचने के लिए नेहरू सरकार ने बाबरी मस्जिद की सरकारी तालाबंदी करवा दी।
Speaker A
इस मामले से दिग्विजयनाथ की हिंदू महासभा में और प्रतिष्ठा बढ़ती है। उन्हें हिंदू महासभा का महामंत्री बना दिया जाता है। गोरखनाथ पीठ के महंत दिग्विजयनाथ राम मंदिर आंदोलन के शुरुआती दौर से जुड़े रहे हैं। 1967 तक दिग्विजयनाथ का दबदबा इतना बढ़
Speaker A
चुका था कि वे सांसदीय के लिए निर्दलीय खड़े हो जाते हैं और कांग्रेस नेता एसएल सक्सेना को 42,700 वोटों से हरा देते हैं। इससे पहले 1962 में ही महंत दिग्विजयनाथ के शिष्य महंत अवैद्यनाथ गोरखपुर की मणिराम विधानसभा से एमएलए बन चुके थे।
Speaker A
यहां से गोरखनाथ पीठ का राजनीतीरण शुरू हो जाता है। साल 1969 में दिग्विजयनाथ की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी महंत अवैद्यनाथ गोरखपुर मठ के हेड बन जाते हैं। महंत अवैद्यनाथ का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कांदी गांव में हुआ था। यह
Speaker A
वही जिला है जो योगी आदित्यनाथ का भी गृह जिला था। महंत अवैद्यनाथ भी राजपूत जाति से आते थे और अवैद्यनाथ ने भी बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया था और किस्मत ने उन्हें दिग्विजयनाथ के पास पहुंचा दिया,
Speaker A
जिन्होंने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया। महंत दिग्विजयनाथ की मौत के बाद 1970 में गोरखपुर में उपचुनाव होते हैं। इन चुनावों में अवैद्यनाथ निर्दलीय खड़े होते हैं और आराम से जीत जाते हैं। अपने गुरु की तरह ही महंत अवैद्यनाथ ने भी राम
Speaker A
मंदिर की राजनीति शुरू कर दी। इस देश में यदि हिंदू मुस्लिम एकता स्थापित करनी है, भाईचारा स्थापित करना है, तो उसके लिए निश्चित रूप से आपको जो है यह आज कितने भी गुलामी के चिन्
Speaker A
हिंदुओं को दे देना चाहिए। 21 जुलाई 1984 के दिन अयोध्या के वाल्मीकि भवन में देश भर के साधु संतों की बैठक में श्री राम जन्मभूमि यज्ञ समिति का गठन किया जाता है। जिसमें महंत वैद्यनाथ को सर्वस्मति से इस समिति का अध्यक्ष चुन
Speaker A
लिया जाता है। महंत वैद्यनाथ ने 1 नवंबर 1985 के दिन आयोजित एक धर्म संसद में सरकार को अल्टीमेटम दे दिया कि या तो सरकार 8 मार्च 1986 को श्री राम जन्मभूमि के ताले खुलवा दे या सरकार साधु संतों के
Speaker A
एक बड़े आंदोलन को झेलने के लिए तैयार रहे। आज इस देश में आज हिंदू कहना अपराध हो गया है। आज हिंदू राष्ट्र की बात करना अपराध हो गया है। अंततः कोर्ट ने आर्डर दे दिया कि 1 फरवरी 1986 को राम जन्मभूमि के ताले खोल दिए
Speaker A
जाए। 1989 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित धर्म संसद में अवैद्यनाथ ने भाषण दिया कि कुरान मुसलमानों को दूसरे धर्मों के पवित्र स्थानों पर मस्जिद बनाने से मना करती है। इसलिए बाबरी मस्जिद को हटाना जायज है। यह
Speaker A
भाषण राम जन्मभूमि आंदोलन में एक टर्निंग पॉइंट था। 1989 में महंत अवैद्यनाथ दोबारा हिंदू महासभा की सीट पर चुनाव में खड़े होते हैं और एक बार फिर सांसद बन जाते हैं। 1990 में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। अवैद्यनाथ इसके सबसे प्रमुख
Speaker A
चेहरों में से एक बन चुके थे। 1991 में जब दोबारा लोकसभा चुनाव हुए तो अवैद्यनाथ भाजपा के टिकट पर गोरखपुर में लोकसभा सांसद चुन लिए गए। फिर आता है 1992 जब 6 दिसंबर के दिन बाबरी मस्जिद को ढा दिया
Speaker A
जाता है। इस वक्त महंत अवैद्यनाथ भी यहां पर मौजूद थे। [प्रशंसा] बाबरी मामले की जांच करने वाले लिबरहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अवैद्यनाथ का नाम उन लोगों की सूची में शामिल किया जिन्होंने देश को सांप्रदायिकता की कगार
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पर ले जाने का काम किया। लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आती बल्कि उनकी साख और अधिक बढ़ जाती है। हिंदू को गाली दो कहो ये कम्युनल है। सांप्रदाय का हिंदू फिरकाप्रस्थ फंडामेंटलिस्ट करमपंथी यह झगड़ा लगाता है।
Speaker A
1996 के लोकसभा चुनावों में महंत अवैद्यनाथ दोबारा से सांसद बन जाते हैं। एक हिस्सा मुस्लिम स्टेट बनी। दूसरा हिस्सा ऑटोमेटिकली हिंदू राष्ट्र बन गया। इसको कोई चुनौती नहीं दे सकता है। आप नहीं जो है अपने हिंदू धाक है।
Speaker A
यहां एक बात और बताना जरूरी है। जब महंत दिग्विजयनाथ गोरखनाथ मठ को हिंदुत्व राजनीति का अड्डा बना रहे थे। उसी समय गोरखपुर में एक और महत्वपूर्ण घटना घट रही थी। जिसने पूर्वांचल की राजनीति को ठाकुर बनाम ब्राह्मण खेमों में बांट दिया। साल
Speaker A
1956 में यूपी सरकार ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी बनाने की पहल की। इस यूनिवर्सिटी को बनाने के लिए महंत दिग्विजयनाथ ने अपने बनाए दो कॉलेज महाराणा प्रताप कॉलेज और महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय दे दिए जिन्हें दिग्विजयनाथ ने बनवाया था। इसलिए गोरखपुर
Speaker A
यूनिवर्सिटी की गवर्निंग बॉडी में महंत दिग्विजयनाथ को वाइस प्रेसिडेंट बना दिया जाता है। वहीं गोरखपुर के कलेक्टर एसएनएम त्रिपाठी गोरखपुर यूनिवर्सिटी की गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष बना दिए जाते हैं। जहां दिग्विजयनाथ ठाकुर थे, वहीं एसएनएम त्रिपाठी ब्राह्मण थे। दोनों चाहते थे कि
Speaker A
यूनिवर्सिटी पर उनके लोगों का कंट्रोल रहे। ठाकुर गुट ठाकुरों को नौकरी देता तो ब्राह्मण गुट ब्राह्मणों को नौकरी देता। गोरखपुर यूनिवर्सिटी पर कंट्रोल का मतलब था यूपी के पूर्वांचल एरिया पर कंट्रोल करना। क्योंकि आने वाले छात्र नेताओं का
Speaker A
जन्म इसी यूनिवर्सिटी से होना था। लेकिन कलेक्टर एसएनएम त्रिपाठी दिग्विजयनाथ के आगे कमजोर पड़ रहे थे। इसलिए उन्होंने हरिशंकर तिवारी नाम के एक स्टूडेंट को सपोर्ट करना शुरू कर दिया। इसके जवाब में ठाकुर गुट ने भी अपने चेहरे खड़े कर दिए।
Speaker A
एक बलवंत सिंह और दूसरे रविंद्र सिंह। आगे गोरखपुर में राजनीति के दो केंद्र बन जाते हैं। एक हरिशंकर तिवारी का हाथा जो पंडितों की ताकत का प्रतीक था। दूसरा गोरखपुर मठ जिस पर ठाकुरों का कंट्रोल था। ठाकुर बाहुबलियों और पंडित बाहुबलियों की
Speaker A
इसी लड़ाई से ही गोरखपुर में गैंग वार की शुरुआत होती है। पूर्वांचल के जितने भी बड़े-बड़े गैंगस्टर और बाहुबली थे जैसे वीरेंद्र प्रताप साही, श्री प्रकाश शुक्ला, मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, रामकिकर सिंह, अमरमणि त्रिपाठी, अखिलेश सिंह और भी बहुत सारे नाम जिनमें से बहुत
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से विधायक और एमएलसी भी बने। वे सब इसी लड़ाई की अलग-अलग शाखाओं से निकले। 80 के दशक में गोरखपुर दो गुटों में बंट चुका था। एक हरिशंकर तिवारी और दूसरे ठाकुर वीरेंद्र प्रताप साही। लेकिन साल 1997 में श्री प्रकाश शुक्ला नाम से एक नया माफिया
Speaker A
उभरता है। श्री प्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में सरेआम वीरेंद्र प्रताप शाही को AK-47 से भून दिया। वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या ठाकुर गुट के लिए एक बड़ा झटका थी। उनकी हत्या के बाद ठाकुरों को कोई बड़ा नाम चाहिए था। ठीक इसी समय गोरखपुर पीठ के
Speaker A
महंत अवैद्यनाथ ने योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। महंत अवैद्यनाथ और योगी आदित्यनाथ के परिवार में रिशेदारी थी। अजय के पिता आनंद सिंह बिष्ट महंत अवैद्यनाथ के मामा के लड़के थे। 1996 की गर्मियों में गोरखनाथ मठ के
Speaker A
महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज के कुछ छात्रों का गोलघर बाजार में दुकानदारों से झगड़ा हो जाता है। छोटी सी बात पर शुरू हुआ यह झगड़ा जल्द ही बड़ा मामला बन जाता है। जिसके बाद पुलिस ने छात्रों का हॉस्टल तक
Speaker A
पीछा किया। इस मामले में योगी आदित्यनाथ छात्रों की तरफ से समर्थन में उतर आते हैं और उनके सपोर्ट में हॉस्टल पहुंचाते हैं। योगी की मौजूदगी से छात्रों में जोश आ जाता है और वे उनके पीछे इकट्ठा हो जाते
Speaker A
हैं। अंत में पुलिस को पीछे हटना पड़ता है। इस घटना से गोरखपुर के छात्रों को योगी आदित्यनाथ में एक आदर्श नेता मिल चुका था। योगी के उदय ने ठाकुरों के लीडरशिप में आए शून्य को भी भरना शुरू कर
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दिया। साल 1996 में महंत अवैद्यनाथ ने योगी आदित्यनाथ को अपने प्रचार प्रबंधन का प्रभारी बना दिया। साल 1998 में देश में एक बार फिर से लोकसभा चुनाव होते हैं। लेकिन महंत अवैद्यनाथ ने अपनी उम्र को देखते हुए राजनीति से सन्यास ले लिया और
Speaker A
अपनी राजनीतिक विरासत आदित्यनाथ को सौंप दी। इस तरह साल 1998 के लोकसभा चुनावों में महंत आदित्यनाथ की जगह योगी आदित्यनाथ खड़े होते हैं। जिसमें योगी आदित्यनाथ की अच्छी खासी जीत होती है। इस चुनाव में जीत के साथ ही योगी आदित्यनाथ लोकसभा के सबसे
Speaker A
कम उम्र के सांसद बन जाते हैं। इस वक्त योगी की उम्र मात्र 26 साल थी। अहम आदित्यनाथ लोकसभाया सदस्य निर्वाचिता निश्चते परमेश्वरस नाम। हालांकि योगी आदित्यनाथ जीत तो जाते हैं लेकिन उनकी जीत का अंतर उनके गुरु के अंतर के मुकाबले आधे से भी
Speaker A
कम हो जाता है। जहां 1996 में महंत अवैदित्यनाथ लगभग 5680 वोट से जीते थे वहीं आदित्यनाथ केवल 26,000 वोटों से जीत सके। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जमुना प्रसाद निषाद ने योगी आदित्यनाथ को कड़ी टक्कर दी थी। इस वक्त तक समाजवादी पार्टी
Speaker A
गोरखपुर में भाजपा के लिए एक चैलेंज बन चुकी थी। सपा के साथ मुस्लिम और ओबीसी की कई जातियों का वोट बैंक सीधे-सीधे जुड़ चुका था। इधर गोरखपुर क्षेत्र में खुद को रेलेवेंट रखने के लिए योगी ने हिंदूवादी राजनीति को और तेज कर दिया। गोरखपुर में
Speaker A
अब कोई भी छोटी-मोटी बात होती तो आदित्यनाथ अपने लोगों के साथ मौके पर पहुंच जाते और प्रशासन को उनकी बात माननी पड़ती। देश के अंदर इस प्रकार की स्थितियां पैदा करिए क्योंकि हिंदुओं का संगठन कर सके। हिंदू समाज को एक सूत्र में जोड़ सके।
Speaker A
आक्रामकता के साथ अपनी कारवाई को अंजाम दे सके। साल 1999 में पंचुरुखिया में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कब्रिस्तान की जमीन का विस्तार करने के लिए एक पुराने पीपल के पेड़ को हटा दिया। हटाने वालों ने आर्गुममेंट दिया कि यह जगह मुस्लिम
Speaker A
कब्रिस्तान का हिस्सा है। लेकिन जैसे ही यह खबर आदित्यनाथ तक पहुंचती है तो उन्होंने तुरंत घोषणा कर दी कि वे सीधे पंचरुखिया जाएंगे और उसी जगह पर फिर से पीपल का पेड़ लगाएंगे। लेकिन जैसे ही योगी गांव पहुंचते हैं और वह अपना काम शुरू कर
Speaker A
पाते उससे पहले ही पुलिस आ जाती है। इस वक्त तक समाजवादी पार्टी के नेता तलत अजीज ने गांव में एक सभा बुला ली। योगी और तलत अजीज के कारण गांव का माहौल खराब हो जाता है। योगी आदित्यनाथ का काफिला गांव से
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वापस निकल ही रहा था कि तभी तलत अजीज के कार्यकर्ताओं की एक भीड़ ने योगी आदित्यनाथ के काफिले की आखिरी गाड़ी पर पथराव कर दिया। जब योगी को इस बात की सूचना मिलती है तो वे वापस लौटने लगते
Speaker A
हैं। इससे माहौल इतना बिगड़ जाता है कि दोनों तरफ से पहले गुस्से में नारेबाजी की जाती है और फिर गोलियां चलने लगती हैं। इस गोलीबाजी में तलत अजीज के सिक्योरिटी गार्ड हेड कास्टेबल सत्य प्रकाश यादव की मौत हो जाती है।
Speaker A
गोली चलाई मेरे पर और उस गोली के उसमें मेरा जो अंगरक्षक था उस वक्त हेड कास्टेबल सत्य प्रकाश यादव 26 साल का नौजवान लड़का वो मारा गया। हेड इंजरी इन्होंने मुंह पर गोली लगाई उसके चलाई। डरकर तलत अजीज और उनके बाकी कार्यकर्ता
Speaker A
खेतों में भाग जाते हैं और योगी आदित्यनाथ और उनके साथी भी मौके से निकल जाते हैं। इस घटना की एफआईआर में योगी आदित्यनाथ को भी आरोपी बनाया गया और उन पर हत्या का प्रयास, दंगा करने और पूजा स्थल का अपमान
Speaker A
करने और मुस्लिम कब्रिस्तान पर अतिक्रमण करने जैसी धाराएं लगाई गई। हिंदू अलग संस्कृति है, मुस्लिम अलग संस्कृति है। दोनों एक साथ नहीं रह सकती। दो संस्कृतियां कभी एक साथ नहीं रह सकती हैं। यह टकराव होगा जरूर होगा। और जब दो
Speaker A
संस्कृतियां एक साथ नहीं रह सकती इसलिए इसका विभाजन असंभवी है। अवश्य होना चाहिए। एक चेतावनी है। साल 1999 के वक्त उत्तर प्रदेश में बीजेपी सत्ता में थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। इस सरकार में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर
Speaker A
और पूर्वांचल के दबंग नेता हरिशंकर तिवारी और शिव प्रताप शुक्ला लखनऊ में मंत्री बनकर बैठे थे। लेकिन योगी के आने के साथ ही हरिशंकर तिवारी और शिव प्रताप शुक्ला जैसे नेताओं के दिन लदने शुरू हो चुके थे। पंच रुखिया केस में हरिशंकर तिवारी और शिव
Speaker A
प्रताप शुक्ला ने पूरा जोर लगा दिया कि कैसे भी करके योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार कर लिया जाए। लेकिन महंत आदित्यनाथ के इंटरफेयर के कारण कोई भी योगी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका। उस समय केंद्र में भी वाजपेयी की सरकार थी। इसलिए होम मिनिस्टर
Speaker A
एल के आडवाणी और सीएम कल्याण सिंह ने यह मामला आपस में ही सुलझा लिया। मामला से जपने से काम नहीं चलेगा। कुछ लोग थाला चलाने वाले साल 1999 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव होते हैं। सपा की तरफ से गोरखपुर में एक
Speaker A
बार फिर से जमुना प्रसाद निषाद को खड़ा किया जाता है। जमुना प्रसाद निषाद ने योगी को कड़ी टक्कर दी। इस चुनाव में योगी केवल 7339 वोटों से ही जीत सके। योगी आदित्यनाथ की जीत का अंतर और कम हो गया। दूसरी तरफ़ साल
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2002 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उत्तर प्रदेश का चुनाव हार जाती है। यूपी स्टेट में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि मायावती और भाजपा ने मिलकर गठबंधन कर लिया और मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री बन जाती हैं। इन तमाम
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कारणों से योगी को अपने लिए एक अलग संगठन की जरूरत महसूस होने लगी। इसलिए साल 2002 में योगी ने अपना खुद का एक अलग संगठन हिंदू युवा वाहिनी बना लिया जो भाजपा और आरएसएस से अलग था। मेंनी इसके जरिए योगी ने गोरखपुर और इसके आसपास
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के इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। बस्ती, देवरिया, आजमगढ़, कुशीनगर और गाजीपुर आदि जिलों में भी हिंदू युवा वाहिनी की शाखाएं खोली जाती हैं। हिंदू युवा वाहिनी में भी ठाकुर कार्यकर्ताओं की संख्या ज्यादा थी। इस कारण कई लोग इसे
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ठाकुर युवा वाहिनी भी कहते थे। लेकिन ऐसा नहीं था कि योगी को सिर्फ उनकी ही जाति का समर्थन मिल रहा था। बल्कि उन्हें अपनी जाति के साथ ही गोरखपुर मठ से जुड़ी हुई जातियों का भी लाभ मिल रहा था। कई पिछड़ी
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और दलित जातियां गोरखपुर मठ से जुड़ी हुई थी जिसके कारण वे भी योगी को वोट देती थी। खासकर दलित जाति निषाद। इसके अलावा योगी हर दिन अपना जनता दरबार लगाते थे। इसने भी योगी को जनता से सीधे कनेक्ट किया।
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वो सुबह जो है जनता की अदालत में बैठते हैं तो उन्होंने मुझसे बोला कि आप इस पर कॉल करके उनका अपॉइंटमेंट ले लें। योगी की प्रतिष्ठा अपने इलाके में एक ऐसे आदमी की बन चुकी थी जिसके यहां गरीब से गरीब और
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कमजोर से कमजोर आदमी को मदद मिल सकती थी। कहां जा रहे हैं बाबा? आपसे मिलने। अच्छा कहां से आए हैं आप?
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बिलौर। बिलौर। योगी के दरबार की खास बात यह थी कि यहां पर अगर कोई मुसलमान भी अपनी फरियाद लेकर जाता तो उसकी भी मदद की कोशिश की जाती। क्या समस्या आ रही है उनको?
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लड़की भिजवाई जाए वहां। अच्छा दे दिया है। तीन तलाक दे दिया है क्या? जी। इन चीजों से योगी गोरखपुर और पूर्वांचल इलाके में एक बड़ा नाम बन जाते हैं। हिंदू युवा वाहिनी की सांप्रदायिक राजनीति का भी योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक
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तौर पर बड़ा फायदा हुआ। 2004 लोकसभा चुनाव के समय जब बीजेपी पूरे देश भर में हार जाती है तब भी योगी आदित्यनाथ अपनी गोरखपुर सीट जीतने में कामयाब रहते हैं। उनकी जीत का अंतर भी अब कई कई गुना बढ़कर
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1.42 लाख वोट हो जाता है। योगी और हिंदू युवा वाहिनी के राइज के कारण गोरखपुर और आसपास के जिलों में अब सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या और बढ़ जाती है। तहलका मैगजीन की एक रिपोर्ट के अनुसार एक अनुमान के
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मुताबिक 2007 तक गोरखपुर और आसपास के जिलों में 30-40 सांप्रदायिक घटनाएं घटी। ऐसी ही एक घटना अक्टूबर 2005 में मऊ जिले में घटती है। इत्तेफाकन इस साल रमजान और दशहरा एक साथ पड़े थे। 13 अक्टूबर के दिन मऊ में कुछ मुस्लिमों ने शिकायत की कि
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लाउडस्कर पर हिंदू भजन बजाए जाने से उनकी नमाज में व्यवधान पड़ रहा है। इसके बाद प्रशासन और बीजेपी नेताओं के बीच बैठक होती है। जिसमें तनाव को कम करने के लिए एक हिंदू कार्यक्रम को 29 अक्टूबर तक टाल
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दिया जाता है। लेकिन अगले ही दिन 14 अक्टूबर को हिंदू युवा वाहिनी के लोग इस फैसले के खिलाफ सड़क पर उतर आते हैं और उनकी मुस्लिमों के साथ झड़प हो जाती है। जिसमें युवा वाहिनी के कुछ लोगों ने
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गोलियां चला दी। इस हिंसा में आठ लोग मारे जाते हैं और 37 लोग घायल होते हैं। जांच में सामने आया कि यह हिंसा हिंदू युवा वाहिनी और इसके नेता योगी आदित्यनाथ ने भड़काई थी। वहीं भाजपा ने आरोप लगाया कि
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समाजवादी पार्टी के विधायक मुख्तार अंसारी ने हिंसा भड़काई है। इस वक्त यूपी में सपा के मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे और सपा की सरकार थी। तस्वीरों में दिख रहा यह कोई और नहीं बल्कि बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी हैं। कैमरे में कई साल पहले कैद हुई यह
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तस्वीरें मुख्तार की दबंगई को बताने के लिए काफी हैं। ऐसे ही जनवरी 2007 में गोरखपुर में भी मुहर्रम के जुलूस के दौरान सांप्रदायिक झड़प हो गई जिसमें एक हिंदू लड़का राजकुमार अग्रहरी घायल हो जाता है। धीरे-धीरे हिंदुओं में इस मामले के खिलाफ
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माहौल बनने लग जाता है। इस बीच राजकुमार अग्रहरी की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो जाती है। जिससे यह मामला और ज्यादा भड़क जाता है। 27 जनवरी 2007 के दिन योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर रेलवे स्टेशन के पास
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एक भड़काऊ भाषण दिया। योगी ने कहा कि एक हिंदू के खून के बदले आने वाले समय में हम प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं करवाएंगे बल्कि हम कम से कम 10 ऐसे लोगों की हत्या करवाएंगे। कि अगर एक हिंदू का खून बहेगा
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तो एक हिंदू के खून के बदले आने वाले समय में हम प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं करवाएंगे बल्कि कम से कम 10 ऐसे लोगों की हत्या उससे करवाएंगे जो लोग योगी का यह भाषण इतना भड़काऊ रहा कि भाषण
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खत्म होने से पहले ही भीड़ ने सामने के एक होटल पर हमला कर दिया जिसका मालिक एक मुस्लिम था। इसी के साथ गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों में दंगे शुरू हो जाते हैं। जिसमें दो लोगों की मौत होती है।
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वहीं सैकड़ों मकान और दुकानों को आग लगा दी जाती है। जिसमें करोड़ों रुपए की संपत्ति जलकर खाक हो जाती है। अगले दिन डीएम हरि ओम के कड़े आदेश के बावजूद योगी आदित्यनाथ और उनके समर्थकों ने सबसे संवेदनशील इलाकों की तरफ मार्च करने की
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कोशिश की। जिसके बाद पुलिस ने उन्हें अरेस्ट कर लिया। जब पुलिस की गाड़ी योगी को ले जाने लगी तो लोग सड़क पर लेट जाते हैं। सिर्फ 2 कि.मी. की दूरी तय करने में ही पुलिस को करीब 8 घंटे का टाइम लग जाता
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है। और महाराज जी की गिरफ्तारी की भी निंदा करते हैं और हिंदू वाहिनी हिंदू वाहिनी महानगर गोरखपुर यहां से अयोध्या कुछ करने का है। सपा सरकार ने योगी आदित्यनाथ को दी सुरक्षा भी अब वापस ले ली। इस मामले को
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ढंग से हैंडल ना करने के कारण सीएम मुलायम सिंह यादव ने डीएम और एसपी का ट्रांसफर कर दिया और जगमोहन सिंह यादव को गोरखपुर मंडल का डीआईजी बनाकर भेज दिया। जिन्होंने आते ही योगी आदित्यनाथ के पर कुतरने शुरू कर
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दिए। डीआईजी जगमोहन सिंह यादव ने गांव-गांव पुलिस भेजकर हिंदू युवा वाहिनी के लोगों को उठवा लिया और उन पर मुकदमे दर्ज करवाने शुरू कर दिए जिसके कारण यह संगठन बिखरता चला जाता है। इस दौरान योगी आदित्यनाथ कुल 11 दिन गोरखपुर जेल में
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रहते हैं और उन्हें 7 फरवरी को जमानत मिल जाती है। 12 मार्च 2007 के दिन आदित्यनाथ अपनी गिरफ्तारी और सुरक्षा वापस लिए जाने के मुद्दे को उठाने के लिए लोकसभा में खड़े होते हैं। लेकिन पहले तो वो काफी देर
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तक कुछ बोल नहीं सके और फिर अचानक से थपकपक कर रोने लगे। बोलिए बोलिए डोंट बी योगी ने लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी से कहा कि उनकी सुरक्षा वापस ले ली गई है और उनकी जान को खतरा है और यही हालात रहे तो
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उन्हें भी झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता सुनील महतो की तरह मार दिया जाएगा। मैंने मैंने अपने जीवन से सन्यास लिया है अपने समाज के लिए। मैंने अपने परिवार को छोड़ा है। मैंने अपने मां-बाप को छोड़ा है। लेकिन आज मुझे
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अपराधी बनाया जा रहा है। कई बार तो कोई मामला काफी छोटा या गली मोहल्ले के लेवल का होता तब भी हिंदू युवा वाहिनी के लोग और योगी आदित्यनाथ की एंट्री से ऐसे मामले बड़े मुद्दे बन जाते हैं। एक हिंदू बालिका को ले जाएंगे तो कम से कम
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100 मुस्लिम बालिकाओं को। इससे योगी आदित्यनाथ को आम हिंदुओं में अक्रॉस द कास्ट सपोर्ट मिलने लग जाता है। माना यह भी जाता है कि योगी की हिंदू युवा वाहिनी को आरएसएस कोई खास पसंद नहीं करता था क्योंकि आरएसएस सिर्फ खुद को ही
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हिंदुओं के रिप्रेजेंटेटिव संगठन की तरह देखती है और ऐसे किसी दूसरे संगठन को पनपने नहीं देना चाहती जिस पर उसका कंट्रोल ना हो। यही कारण है कि योगी और भाजपा संगठन के रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले रहे। कभी योगी भाजपा संगठन से दूरी बनाते तो कभी भाजपा
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योगी के कामों से अपने आप को अलग कर लेती। साल 2007 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने अपने उम्मीदवारों के लिए पूर्वांचल में 35 सीटें मांगी। लेकिन बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं होती। इस पर योगी ने बगावत कर दी और अखिल भारतीय हिंदू
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महासभा पार्टी की टिकट पर हिंदू युवा वाहिनी के उम्मीदवार उतार दिए। हालांकि आगे भाजपा को योगी की जरूरत रहती है और योगी को भाजपा की। इसलिए इस झगड़े के बावजूद योगी आदित्यनाथ 2009 का लोकसभा चुनाव गोरखपुर से बीजेपी की टिकट पर ही
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लड़े। वहीं योगी के खिलाफ समाजवादी पार्टी की तरफ से भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी को उतारा गया। इस चुनाव में योगी आदित्यनाथ की ना केवल जीत हुई बल्कि उनकी जीत का अंतर भी अब बढ़कर 2.20 लाख वोट हो जाता है।
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शिक्षा [संगीत] किसी भी राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है। 2011 में भाजपा ने बसपा के चार नेताओं को शामिल कर लिया। जिन्हें भ्रष्टाचार के कारण बसपा से निकाला गया था। बाबू सिंह कुशवाहा बनेंगे भाजपा के हथियार। बहन मायावती की मुसीबत बढ़ी। इससे
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योगी आदित्यनाथ अपनी ही पार्टी भाजपा से नाराज हो जाते हैं। खासकर पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा में शामिल किए जाने से जिन्हें बीजेपी ने 2012 विधानसभा चुनाव के लिए टिकट भी दे दी थी। इस पर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पार्टी में कुछ
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लोग भ्रष्टाचारियों के प्रति सहानुभूति जता रहे हैं जो सरासर असहनीय है। अगर पार्टी में घोटालेबाजों को जगह दी गई तो ईमानदार लोगों का टिकना मुश्किल हो जाएगा। योगी ने धमकी दी कि अगर बीजेपी ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो वह पार्टी छोड़
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देंगे और अपनी अलग पार्टी बनाकर इन सारे उम्मीदवारों के खिलाफ प्रचार करेंगे। जहां भाजपा एनआरएचएम घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को अपनी पार्टी में शामिल किए जाने का बचाव कर रही थी, वहीं योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे पर अपनी ही पार्टी
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के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अंत में योगी की जीत होती है और बीजेपी ने बाबू सिंह कुशवाहा की टिकट वापस ले ली। बाबू सिंह कुशवाहा जी की सदस्यता अब स्थगित है। योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के संबंधों में सुधार 2012 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की
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बड़ी हार होने के बाद आया। उत्तर प्रदेश में हम बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं। इसीलिए मैंने कहा कि एक रली मिली अनुभूति है जिसे कहते हैं कहीं खुशी कहीं गम। अब योगी आदित्यनाथ बीजेपी के कार्यक्रमों में आने जाने लगते हैं और पार्टी भी
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उन्हें आगे बढ़ाना शुरू कर देती है। इधर नेशनल लेवल फ्रंट पर आडवाणी की जगह अब नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था और देश भर में बीजेपी का भी माहौल बनने लगा था। मैंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि
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आप नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की मीटिंग बुलाइए। मुख्यंत्रियों को इस विषय में डिबेट कीजिए, चर्चा कीजिए। ऐसे समय में बीजेपी भी योगी की कट्टर हिंदुत्ववादी नेता वाली छवि का फायदा उठाना चाहती थी। योगी राजनाथ और मोदी जैसे बड़े नेताओं की तरह उन चुनिंदा नेताओं में
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से एक थे जिन्होंने बाकी उम्मीदवारों के लिए भी प्रचार किया। 2014 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ की 3 लाख से ज्यादा वोटों से जीत होती है। 2013 और 14 में जैसे-जैसे हिंदुत्व की राजनीति का उदय हो रहा था,
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वैसे-वैसे योगी का भी नेशनल लेवल पर उदय होता जा रहा था। बीजेपी ने 2014 के लास्ट में उत्तर प्रदेश की 11 विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर होने वाले बाय इलेक्शन के लिए योगी आदित्यनाथ को प्रचार प्रमुख बना
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दिया। इसके दो कारण माने जाते हैं। एक तो मोदी और शाह किसी ऐसे ठाकुर नेता को आगे करना चाहते थे ताकि ठाकुर समाज से आने वाले राजनाथ सिंह को कमजोर किया जा सके। दूसरा बीजेपी अपने वोटरों को यह भी संदेश
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देना चाहती थी कि सत्ता में आने के बाद भी उसने हिंदुत्व की राजनीति करना नहीं छोड़ा है। इस समय यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी। इन बाय इलेक्शंस के चुनाव प्रचार के दौरान योगी ने जमकर मुस्लिम विरोधी बयान
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दिए। दंगों के लिए हम लोग तो नहीं जिम्मेदार हैं। ढाई वर्ष में 450 से अधिक दंगे और दंगों के पीछे जो कारण है इस सरकार के सांप्रदायिक एजेंडे को प्रदर्शित करता है। इधर सितंबर 2014 में योगी आदित्यनाथ के
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गुरु महंत अवैद्यनाथ का निधन हो जाता है। जिसके बाद योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मठ के मुख्य महंत बन जाते हैं। योगी के हिंदू मुस्लिम को लड़ाने वाले बयानों की संख्या कम नहीं हो रही थी। उल्टा बढ़ती जा रही थी। फरवरी 2015 में
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विश्व हिंदू परिषद के विराट हिंदू सम्मेलन में बोलते हुए योगी ने कहा कि अगर उन्हें मौका मिले तो वो हर मस्जिद में गौरी गणेश की प्रतिमा लगवा देंगे। देखिए जब काशी विश्वनाथ जी के दर्शन करने जाते हैं तो ज्ञानवापी हम सबको चिढ़ाती
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है। हम सबको चिढ़ाती है। क्या दुनिया के अंदर कहीं हुआ है कि कहीं पर किसी मस्जिद के अंदर नंदी और गौरी गणेश विराजमान हो। अगर ये हो तो भारत के अंदर सभी मंदिरों में हमें अनुमति दीजिए। हम हर जगह
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और मंत्री को विराजमान देंगे। इसी तरह जुलाई 2016 में योगी ने कहा कि मदर टेरेसा ने भारत का ईसाईकरण करने की साजिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि ईसाइयों ने भारत में खतरनाक स्थिति पैदा कर दी है। ईसाई बन करके आ जाता है तब उसको आप फादर
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और मदर कह कर के कभी वो मदर टेरेसा के नाम पर भारत का ईसाईकरण करने की साजिश करती है और कभी फादर के नाम पर जगह-जगह हिंदुओं को दफनाने की उस साजिश का हिस्सा बनता है। इन बयानों से योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता
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दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। 2017 में यूपी में विधानसभा चुनाव भी आने वाले थे। अब हिंदू युवा वाहिनी ने बीजेपी पर दबाव बनाने के लिए अभियान चलाया कि भाजपा योगी आदित्यनाथ को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करें। हालांकि ऐसा नहीं किया जाता
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है। बीजेपी बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के ही चुनाव में उतर जाती है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही वोट मांगे जाते हैं। जब रिजल्ट आए तो भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाता है और सपा सत्ता से बाहर
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हो जाती है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी को लगभग लगभग 3/4 बहुमत अप्रत्याशित बहुमत मिला है। भाजपा समर्थकों में योगी को सीएम बनाए जाने की चौतरफा मांग उठने लगती है। लेकिन भाजपा ने कुछ भी क्लियर नहीं किया। शुरुआत
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में भाजपा के मनु सिन्हा मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे थे। कहा जाता है कि उनका नाम फाइनल होने जा रहा था और उन्हें शपथ के लिए लखनऊ भेजा जा रहा था। वे वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए
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भी गए थे। जिसे शपथ से पहले भगवान का आशीर्वाद लेने के तौर पर देखा जा रहा था। न्यूज़ चैनलों पर मनोज सिन्हा का नाम चलने लगा था। लेकिन तभी यूपी बीजेपी के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य नाराज हो जाते हैं जो
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खुद मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे। केशव प्रसाद मौर्य ने अमित शाह के सामने अपना विरोध जताया और कहा कि विधायक दल की बैठक में गड़बड़ हो सकती है। इसके बाद मौर्य ने योगी आदित्यनाथ के साथ हाथ
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मिलाया जो खुद मुख्यमंत्री के लिए कंसीडर ना किए जाने से नाराज चल रहे थे। योगी आदित्यनाथ ने आरएसएस से संपर्क किया जिसने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया। इस दबाव के बीच अमित शाह का भी मन बदल जाता है और
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उन्हें लगा कि योगी आदित्यनाथ ही मुख्यमंत्री पद के लिए सही हैं क्योंकि वह 2019 लोकसभा चुनाव तक हिंदुत्व के मुद्दे को बनाकर रखेंगे। 17 मार्च की शाम 6:45 पर अमित शाह ने योगी आदित्यनाथ को एक सीक्रेट कॉल की और उनसे दिल्ली आने के लिए कहा।
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योगी आदित्यनाथ अगली सुबह ही दिल्ली पहुंच जाते हैं। यहां उन्हें बताया गया कि उन्हें लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री बनना है। इस तरह योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य यूपी के मुख्यमंत्री बन जाते हैं। मैं आदित्यनाथ योगी ईश्वर की शपथ लेता हूं कि
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मुख्यमंत्री बनने के बाद भी योगी आदित्यनाथ के भाषणों में बार-बार औरंगजेब, अकबर, मुगल, मुसलमान लव जिहाद जैसे मुद्दे ही रहे। जिनसे बार-बार हिंदू और मुसलमान दो समुदायों में तनाव बढ़ता रहा। कि महान अकबर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय गिरोह काम कर रहा है। लव
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जिहाद के नाम पर। 17स मुस्लिम आबादी है यूपी के अंदर। कोई सभ्य मुसलमान भी अपने पुत्र का नाम औरंगजेब नहीं रखता। अगर कोई तोड़फोड़ करेगा, आगजनी करेगा तो क्या हम आरती उतारेंगे? कानून। योगी आदित्यनाथ को सांप्रदायिकता भड़काकर राजनीतिक फायदा
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उठाने वाली राजनीति विरासत में मिली थी। जिसके तापमान को उन्होंने बार-बार बढ़ाया और रेलेवेंट बने रहे। योगी आदित्यनाथ पर हमारी यह वीडियो फिलहाल यहीं तक। अगर आपको हमारी वीडियो पसंद आई है तो वीडियो को लाइक करें और चैनल को सब्सक्राइब करते हुए
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जरूर जाएं। इस वीडियो को देखने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
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