सोफीस वर्ल्ड के माध्यम से पश्चिमी दर्शनशास्त्र की यात्रा, जीवन के अर्थ, ईश्वर और ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर गहन विचार।
Key Takeaways
- जीवन और अस्तित्व के गहरे सवालों का जवाब खोजने के लिए दर्शनशास्त्र महत्वपूर्ण है।
- प्राचीन मिथकों से लेकर आधुनिक विज्ञान तक मानव सोच का विकास हुआ है।
- सोक्रेटीस की प्रश्न विधि आज भी ज्ञान प्राप्ति का प्रभावी तरीका है।
- प्लेटो और अरिस्टोटल के विचार दर्शन के दो प्रमुख दृष्टिकोण दर्शाते हैं।
- धार्मिक और दार्शनिक विचारधाराओं के बीच संबंध और उनका समाज पर प्रभाव।
What the video covers
- सोफी नाम की 14 साल की लड़की के सवालों के माध्यम से जीवन, अस्तित्व और ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर चर्चा।
- प्राचीन मिथकों से लेकर ग्रीक दार्शनिकों जैसे थेल्स, हिरेकलिटस, सोक्रेटीस, प्लेटो और अरिस्टोटल तक का दर्शनशास्त्र।
- सोक्रेटीस की प्रश्न पूछने की विधि और उसकी मृत्यु का कारण।
- प्लेटो का आइडिया ऑफ वर्ल्ड और अरिस्टोटल का अनुभववादी दृष्टिकोण।
- ग्रीक दर्शन से हिलेनिस्टिक युग और फिर क्रिश्चियनिटी के उदय तक का इतिहास।
- जीसस की शिक्षाओं का दर्शन और समाज पर प्रभाव।
- रैनेसां और वैज्ञानिक क्रांति के दौर में दर्शन और विज्ञान का विकास।
- स्पिनोजा का ईश्वर और प्रकृति का एकत्व।
- सोफी और उसके शिक्षक अल्बर्टो नोक्स की कहानी और अस्तित्व की गूढ़ता।
- इमैनुएल कांट के नैतिक दर्शन और जीवन के तीन स्तरों की व्याख्या।
Chapters
- 00:00जीवन और अस्तित्व के मूल प्रश्न
- 02:57प्राचीन मिथक और प्राकृतिक दर्शन
- 04:14ग्रीक दार्शनिक और दर्शन की शुरुआत
- 05:29सोक्रेटीस और प्लेटो का दर्शन
- 06:54अरिस्टोटल का अनुभववादी दृष्टिकोण
- 08:15हिलेनिस्टिक युग और क्रिश्चियनिटी का उदय
- 09:43रैनेसां और वैज्ञानिक क्रांति
- 10:57स्पिनोजा, कांट और आधुनिक नैतिकता
- 14:44सोफी की कहानी और अस्तित्व की गूढ़ता
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Speaker A
जिंदगी का असल मतलब क्या है? क्या हम किसी गॉड की क्रिएशन हैं या सिर्फ एक कॉस्मिक एक्सीडेंट हैं? और अगर गॉड है तो फिर यह दुख क्यों एक्सिस्ट करता है? तुम कौन हो?
Speaker A
सिर्फ एक नाम हो, एक बॉडी हो या सोल हो? और अगर तुम्हारी यादें डिलीट कर दी जाएं, तो फिर क्या तुम तुम रहोगे? दोस्तों, आज हम वेस्टर्न फिलॉसफी की हिस्ट्री को देखेंगे थ्रू द हेल्प ऑफ दिस बुक कॉल्ड
Speaker A
सोफीस वर्ल्ड बाय जोस्टीन गार्डनर। सोफीस वर्ल्ड असल में एक बहुत यूनिक कहानी है। यह सिर्फ नावेल नहीं है बल्कि फिलॉसफी का कंप्लीट सफर है। बिल्कुल स्टोरी के फॉर्म में। इस कहानी में जो मेन कैरेक्टर है वह 14 साल की लड़की है जिसका नाम सोफी
Speaker A
है। वह एक बिल्कुल नॉर्मल सी स्कूल गोइंग लड़की है। उसकी जिंदगी बिल्कुल चेंज हो जाती है। जब एक दिन उसके घर के मेल बॉक्स में उसे एक एनवेलप मिलता है। उस एनवेलप में कोई स्टैंप नहीं होता, कोई एड्रेस
Speaker A
नहीं होता। सिर्फ उसका नाम लिखा होता है सोफी। जब सोफी एनवेलप खोलती है, अंदर एक छोटा सा पेपर होता है जिसमें सिर्फ तीन लफ्ज लिखे होते हैं। हु आर यू? यानी तुम कौन हो? अब सोचो एक 14 साल की लड़की जो
Speaker A
स्कूल होमवर्क और नॉर्मल लाइफ में बिजी होती है उसे अचानक यह सवाल मिल जाए। पहला रिएक्शन उसका क्या होगा? सोफी कंफ्यूज हो जाती है। थोड़ा सोचती है लेकिन इस सवाल का जवाब देना इतना आसान नहीं होता। तुम भी
Speaker A
अगर अपने आप को सही से पूछो ये सवाल कि मैं कौन हूं? तो आप क्या कहोगे? आप अपना नाम बताओगे, मेरी ऐज बताओगे, फैमिली का नाम बताओगे। लेकिन यह सब काफी नहीं है। इससे बढ़कर आपसे पूछा जाए आप कौन हो? यह
Speaker A
सब चीजें हटाई जाएं तो आप क्या कहेंगे? फिर कुछ दिन बाद सोफी के पास एक और एनवेलप आता है इस दफा एक और सवाल के साथ। और वो सवाल होता है वेयर डस द वर्ल्ड कम फ्रॉम? यानी ये दुनिया कहां से आई है? अब ये सवाल और
Speaker A
भी हैवी हो जाता है। सोफी ये सोचना शुरू करती है कि हम सब कहां से आए हैं? ये यूनिवर्स कैसे बनी है? और हम आए ही क्यों हैं? ये वो सवालात हैं जो आमतौर पर हम बचपन में थोड़ा बहुत पूछते हैं लेकिन फिर
Speaker A
लाइफ की रेस में इतना हम घुलमिल जाते हैं कि ये सवालों को हम भूल जाते हैं। कुछ दिन बाद सोफी को एक और एनवेलप मिलता है और इस लिफाफे में लिखा होता है व्हाट इज फिलॉसोफी? यहीं से सोफी का असल सफर शुरू
Speaker A
होता है फलसफे का। इस लेटर में लिखने वाला बंदा सोफी को बताता है कि फिलॉसफी असल में होती क्या है? फिलॉसफी का मतलब सिर्फ पुरानी किताबें या मुश्किल लफ्ज नहीं होते। फिलॉसफी का मतलब है सवाल पूछना, यह जानना कि हम कौन हैं? हम यहां क्यों हैं?
Speaker A
सच क्या है? और गलत क्या है? सोफी को धीरे-धीरे समझ आता है कि कोई एक मिस्टीरियस बंदा है जो उसे फिलॉसफी सिखा रहा है और वो बंदा उसे बताता है कि इंसान ने शुरू से ही दुनिया को समझने की कोशिश
Speaker A
की है। लेकिन शुरू में लोग साइंस या लॉजिक यूज़ नहीं करते थे। वो मिथ्स और कहानियों पर यकीन रखते थे। जैसे नॉर्थ और ग्रीक मेथोलॉजी की बात करें तो उस जमाने में लोग जब थंडर, लाइटनिंग, बारिश या ऐसे सूखा
Speaker A
ड्राउट जो है उसको देखते थे तो बजाय कि उसकी साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन वो बनाए जो कि होती ही नहीं थी तो उन्होंने गॉड्स की कहानियां बना ली। जैसे ग्रीक मेथोलॉजी में थॉर का कांसेप्ट है जिसके पास हैमर हो, एक
Speaker A
ऐसा गॉड जो आसमान में गरज बरस ये सारी चीजें करता हो। लोग यह समझते थे कि जब बिजली चमकती है तो थॉर को गुस्सा आ जाता है, वो अपना पावर दिखाता है। यह मिथ्स लोगों के लिए बहुत इंपॉर्टेंट थे क्योंकि यह
Speaker A
उन्हें कंफर्ट देते थे। कम से कम लोगों को यह लगता था कि दुनिया रैंडम नहीं है। कोई पावर है जो सब कंट्रोल कर रही है। यह कहानियां जनरेशन से पास होती आ रही थीं। फिर लगभग 600 बीसी के आसपास ग्रीस में एक
Speaker A
बहुत बड़ा इंटेलेक्चुअल चेंज आया। कुछ थिंकर्स उठे जिन्होंने कहा कि यार दुनिया में हर कोई कह रहा है कि ये चीज उनका गॉड कर रहा है। वो चीज उनका गॉड कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके पीछे कुछ और वजह
Speaker A
हो। कोई नेचुरल लॉज़ हो। इन सारी चीजों के पीछे। यहीं से फिलॉसफी और साइंस की बुनियाद पड़ती है। इस सोच के पीछे तीन बहुत बड़े नाम हैं। थेल्स, एनेक्समेंडर और हिरेकलिटस। यह जो तीन लोग हैं दोस्तों, इनको सबसे पहला नेचुरल फिलॉसफर कहा जाता
Speaker A
है। क्योंकि ये लोग यह सोचते थे कि यूनिवर्स किस चीज से बनी हुई है। कोई कहता था पानी सबका सोर्स है। कोई कहता था हवा सबका सोर्स है। कोई कहता था ये आग और तब्दीली ही सबका सोर्स है। ये सब लोग मिच
Speaker A
से बाहर निकल कर लॉजिक और रीज़ तलाश करने की कोशिश करते थे। लेकिन फिर एक ऐसा बंदा है जिसने फिलॉसफी का पूरा अंदाज ही बदल दिया। उसका नाम था सोक्रेटीस। सोक्रेटीस का सबसे इंटरेस्टिंग पॉइंट ही यही था कि
Speaker A
जिस सोक्रेटीस को लोग बड़ा इंटेलिजेंट समझते हैं वो खुद को कुछ भी नहीं समझता था। बल्कि उसने यह तो कहा था कि मुझे सिर्फ यही पता है कि मुझे कुछ नहीं पता। अब यह सुनके शायद अजीब लगे लेकिन यह बात
Speaker A
बहुत पावरफुल है। सोक्रेटीस का तरीका यह नहीं था कि वो लेक्चर दे या लोगों को यह बताएं कि सच क्या है। वो लोगों से सवाल पूछता था। वो डिस्कशन करता था। वो लोगों को उनकी बातों में फंसा देता ताकि वो
Speaker A
खुद रियलाइज करें कि उन्हें एक्चुअली कुछ भी नहीं पता। इस तरह के सवाल करने के तरीके को आज के दौर में सोक्रेटिक मेथड कहते हैं। दोस्तों सोक्रेटीस के जमाने में एथेंस जो ग्रीस की एक स्टेट थी वो एक
Speaker A
डेमोक्रेटिक सोसाइटी बन रही थी। इसलिए एथिक्स और मोरलिटी पर बात भी होने लगी। कुछ लोग कहते थे कि सही और गलत हर सोसाइटी के अपने-अपने रूल्स होते हैं। लेकिन सोक्रेटीस इस बात से एग्री नहीं करता था। उसका कहना यह था कि कुछ चीजें तो ऐसी
Speaker A
यूनिवर्सल होंगी जैसे झूठ बोलना, चोरी करना, धोखा देना। ये चीजें हर जगह हर इंसान को अंदर से खराब करती हैं और खुशी के रास्ते में रुकावट बन जाती हैं। लेकिन सोक्रेटीस का यही प्रॉब्लम बन गया। वो ज्यादा सवाल करने लग गया। लोगों को
Speaker A
अनकंफर्टेबल करने लग गया और आखिरकार उसे 399 बीसी में सजा-ए मौत दी गई। सबसे अजीब बात यह है कि सोक्रेटीस ने अपनी जिंदगी में कुछ लिखा ही नहीं। जो कुछ हम आज उसके बारे में जानते हैं वो उसके स्टूडेंट
Speaker A
प्लेटो की वजह से जानते हैं। प्लेटो ने सोक्रेटीस के डायलॉग्स को लिखा भी और फिलॉसफी को एक नई डायरेक्शन भी दी। प्लेटो रैशनलिज्म का सपोर्टर था। उसका यह कहना था कि कुछ सच ऐसे होते हैं जो हमेशा सच ही
Speaker A
रहते हैं। जैसे मैथ्स के रूल्स 2 + 2 = 4 और यह फोर हमेशा फोर ही रहेगा। चाहे कुछ भी हो जाए, दुनिया बदल जाए। प्लेटो को लगता था कि जो चीजें हम अपनी सेंसेस में महसूस करते हैं, वह अनरिलायबल हैं। आंखें तो धोखा
Speaker A
दे सकती हैं। इमोशंस कंफ्यूज कर सकती हैं। इसलिए उसने वर्ल्ड ऑफ आइडियाज का एक कांसेप्ट दिया। उसके मुताबिक एक परफेक्ट और एटरनल एक दुनिया होती है जो हम सिर्फ अपने दिमाग से ही समझ सकते हैं। जो हम फिजिकल दुनिया में देख रहे हैं वो उस
Speaker A
परफेक्ट वर्ल्ड का सिर्फ शैडो है। फिर प्लेटो का एक स्टूडेंट था एरिस्टोटल जो बिल्कुल ऑजिट डायरेक्शन में चला गया। एरिस्टोटल कहता है कि रियलिटी वही है जो हम देख रहे हैं, सुनते हैं, जो महसूस करते हैं, यही है और वो बायोलॉजी और नेचर साइंस
Speaker A
का बहुत बड़ा फैन था। उसको चीजों को कैटेगराइज करना बड़ा पसंद था। सबको क्लासिफाई करता था। एरिस्टोटल के मुताबिक खुशी का राज यही है कि इंसान अपनी कैपेबिलिटीज को पूरी तरह से यूज़ करे। जिंदगी सिर्फ सोचने का नाम नहीं है बल्कि
Speaker A
जिंदगी जीने का नाम है। सोसाइटी का हिस्सा बनने का नाम है और सीखते रहने का नाम है। ये सब सोफी के लिए बहुत ओवरवेल्मिंग था और बहुत एक्साइटिंग भी था। धीरे-धीरे वो ये सब डिस्कवर करती गई। जो बंदा उसे लेटर्स
Speaker A
भेज रहा था वो असल में एक फिलॉसोफर ही था जिसका नाम था अल्बर्टेटो नोक्स। वो एक पुरानी कॉटेज में रहता था जंगल के पास। लेकिन धीरे-धीरे इस कहानी में यह भी सवाल आता है कि जो यह टीचर है अल्बर्टेटो नोक्स वो
Speaker A
असल है या वो भी खयाली ही है। यहीं पर सोफी की कहानी और ज्यादा मिस्टीरियस होने लग जाती है। जब सोफी और अल्बर्टेटो नोक्स ग्रीक फिलॉसफी का सफर कंप्लीट कर लेते हैं तो कहानी एक नए दौर में एंटर होने लग जाती
Speaker A
है। यह दौर सिर्फ फिलॉसफी का नहीं होता बल्कि रिलीजन, पॉलिटिक्स और पूरी सोसाइटी का माइंडसेट चेंज करने वाला दौर होता है। इस वक्त यूरोप में एक बहुत बड़ी फोर्स उभर के आती है। क्रिश्चियनिटी ग्रीक फिलॉसफर्स के बाद जो टाइम आता है उसे हिलनिस्टिक एरा
Speaker A
कहते हैं। दोस्तों इस दौर में एलेग्जेंडर द ग्रेट की वजह से ग्रीक कल्चर दूर-दूर तक फैला। फिलॉसफी का असल फोकस जो था वो थोड़ा चेंज होता है। अब लोग यह पूछने लग जाते हैं कि अच्छी जिंदगी क्या होती है? और
Speaker A
अंदरूनी सुकून कैसे मिलता है? यहीं पर फिलॉसफी और रिलीजन के दरमियान लाइन थोड़ी ब्लर होने लग जाती है। फिर एक बहुत इंपॉर्टेंट शख्स दुनिया की स्टेज पर आता है जीसस। जी हां, हजरत ईसा अल सलाम। लेकिन उनकी टीचिंग्स ने पूरे ग्रीको रोमन दुनिया
Speaker A
को हिला के रख दिया। उसने लोगों को सिर्फ लॉस और रूल्स की बात नहीं सिखाई बल्कि फॉरगिवनेस सिखाई, माफ करना सिखाया, मर्सी सिखाई और प्यार की बात सिखाई। उसने गॉड को फादर कह के पुकारा जो उस वक्त के लिए बहुत
Speaker A
शॉकिंग था। दोस्तों, मैं यहां पे आपको डिस्क्लेमर देता चलूं कि ऑफ कोर्स इस्लामिक नजरिए से तो हजरत ईसा अल सलाम एक मैसेंजर थे। लेकिन अभी हम चीजों को इस्लामिक नजरिए से नहीं देख रहे। हम क्रिश्चियनिटी के नजरिए से देख रहे हैं तो
Speaker A
प्लीज अपने दिमाग का जरा होराइजन खुला करके पढ़ने और समझने की कोशिश करें। इससे आपका अप
Speaker A
क्रिश्चियनिटी को दूर-दूर तक फैला देता है। धीरे-धीरे क्रिश्चियनिटी रोमन एंपायर का हिस्सा बन जाती है। और फिर ऑलमोस्ट पूरी यूरोप पर डोमिनेंट बिलीफ सिस्टम बन जाता है क्रिश्चियनिटी का जो कि अगला लगभग 1500 साल का टाइम है जिसको मिडिल एजेस भी
Speaker A
कहते हैं। इस दौर में फिलॉसफी ऑलमोस्ट रुक सी गई थी। लोग सवाल पूछने से डरते थे। जो कुछ चर्च कह देता था उसे ही सच माना जाता था। गॉड, हेवन, हेल सब चीजें अनक्वेशनेबल थी। रीजन और लॉजिक पीछे चले जाते थे। फेथ
Speaker A
सबसे ऊपर आ जाता था। लेकिन फिर दुनिया में कुछ चीजें बदलना शुरू होती हैं। प्रिंटिंग प्रेस जैसी इन्वेंशन आ जाती है। बुक्स ईली मिलने लग जाते हैं। लोग पढ़ने लग जाते हैं। और यहीं से शुरू होता है रेनोसों्स
Speaker A
का टाइम। रेनोसों्स का मतलब है दोस्तों दोबारा जन्म लेना। ये एक इंटेलेक्चुअल रिवाइवल था यूरोप का। लोग दोबारा से साइंस, आर्ट, फिलॉसफी की तरफ लौटने लग गए। इस दौर का एक खास आईडिया यही था कि इंसान खुद भी तो इंपॉर्टेंट है। सिर्फ गॉड पर
Speaker A
डिपेंड करना काफी तो नहीं है। इंसान के पास अपनी भी तो एक इंटेलिजेंस है और क्रिएटिविटी है। दोस्तों ये फिर से आपको समझने की जरूरत है कि हम अभी यूरोप की हिस्ट्री की बात कर रहे हैं। ये जो हम बात
Speaker A
कर रहे हैं इस दौर में चर्च की इतनी ज्यादा पावर होती थी कि चर्च के सामने कोई चू भी नहीं कर सकता था। तो ये रेनोसों्स के टाइम पे लोग तंग आ गए थे। चर्च उन पे जुल्म भी करता था। तो ये आम लोगों में एक
Speaker A
किस्म की बगावत उठी। इस टाइम का एक बहुत फेमस नाम है कॉपरनिकस। उसने कहा कि अर्थ यूनिवर्स का सेंटर नहीं है भाइयों बल्कि अर्थ खुद सन के गिर्द घूम रही है। यह बात उस वक्त के लिए इतनी डेंजरस थी कि चर्च को
Speaker A
इस आईडिया पे बहुत गुस्सा आया। लेकिन साइंस ने पहली बार लोगों को दिखाया कि हम जो देख रहे हैं शायद वो वैसा है ही नहीं। इसके बाद मटेरियलिज्म की एक वेव बढ़ने लग जाती है। लोग ये कहना शुरू कर देते हैं कि
Speaker A
दुनिया को समझने के लिए सिर्फ स्पिरिचुअल एक्सप्लेनेशंस काफी नहीं है। नेचर के रूल्स होते हैं। यूनिवर्स मैथ और साइंस फॉलो करती है। कोई जादू टोना फॉलो नहीं करती। फिर हम एंटर करते हैं 17th सेंचुरी में जिसे ब्रॉक एरा भी कहा जाता है। यह एक
Speaker A
बहुत इंटेंस दौर होता है जहां एक तरफ साइंस और मटेरियलिज्म होता है और दूसरी तरफ माइंड और स्पिरिट कीेंस पर जोर दिया जाता है। थॉमस हॉब्स कहते हैं कि हर चीज मटेरियल ही है। इंसान का सोल कोई मैजिकल
Speaker A
चीज नहीं है बल्कि ब्रेन के अंदर पार्टिकल्स की मूवमेंट का रिजल्ट है। उसके लिए इमोशंस, थॉट्स, सब कुछ फिजिकल प्रोसेससेस ही हैं। फिर आता है रेने डिककार। वह बिल्कुल ऑोजिट डायरेक्शन में चला जाता है। वह कहता है कि सब चीजों पर
Speaker A
डाउट किया जा सकता है। तुम अपनी आंखों पर भी भरोसा नहीं कर सकते। लेकिन एक चीज है जो डाउट से बच जाती है। वो है तुम्हारा सोचना। इसलिए वो यह कहता है कि मैं सोचता हूं इसलिए मैं हूं आई थिंक देयर फॉर आई
Speaker A
एम। इसका मतलब यह कि तुम्हारा माइंड सबसे पहले एक्सिस्ट करता है। दुनिया बाद में आती है। फिर आता है जॉन लॉक जो कहता है कि इंसान पैदा होते वक्त ब्लैंक होता है। जैसे खाली स्लेट होती है। जो कुछ भी हम
Speaker A
बनते हैं वो एक्सपीरियंस की वजह से ही बनते हैं। हम जो देखते हैं हम जो सुनते हैं जो महसूस करते हैं वो हमारी पर्सनालिटी और सोच का हिस्सा बन जाता है। और फिर आता है बहुत ही कमाल फलसफी
Speaker A
स्पिनोजा जिसको समझना सोफी के लिए सबसे मुश्किल होता है। क्योंकि स्पिनोजा के मुताबिक गॉड कोई अलग एंटिटी नहीं है जो ऊपर बैठ के दुनिया को कंट्रोल कर रहा है। गॉड और नेचर एक ही चीज है। जो कुछ भी होता
Speaker A
है वह गॉड का हिस्सा ही है। तुम्हारा सोचना, तुम्हारा सांस लेना, पत्तों का हिलना सब कुछ गॉड का एक्सप्रेशन ही है। सोफी को यह आईडिया बहुत हैवी लगता है। आपको भी लग रहा होगा। लेकिन फिर असली दिमाग हिलाने वाली बात यह आती है जब जॉर्ज
Speaker A
बर्कली कहता है कि मटेरियल वर्ल्ड का कोई एक्जिस्टेंस है ही नहीं। जब तक उसे पर्सव नहीं किया जाता। मतलब अगर तुम किसी चीज को नहीं देख रहे तो क्या वह चीज वाकई में एक्सिस्ट करती है? बर्कली के मुताबिक हम
Speaker A
जो कुछ महसूस करते हैं वो सब आइडियाज हैं जो गॉड हमारे दिमाग में डाल रहा है। रियलिटी शायद सिर्फ एक इल्लुजन है। शायद यह सब एक ख्वाब है। मतलब अगर तुम इस कंप्यूटर को पर्सीव नहीं कर सकते तो यह
Speaker A
कंप्यूटर है ही नहीं। किसी भी चीज का वजूद तभी है जब उसको पर्सव किया जा सकता हो। लेकिन फिर आप उसको बोलेंगे कि यह क्या बात हुई? अगर मैं नहीं देख पा रहा कंप्यूटर को तो इसका मतलब यह थोड़ी है कंप्यूटर नहीं
Speaker A
है। कंप्यूटर तो है तो वो यह कहेगा हां इसलिए है कंप्यूटर क्योंकि इसको गॉड पर्सव कर रहा है और गॉड सब चीजों को पर्सव कर रहा है। मुझे पता है दोस्तों ये जॉर्ज बर्कली ने मेरे दिमाग के अभी सारी तारें
Speaker A
हिला दी थी। लेकिन बात इसने सिर्फ दिमाग की दही बनाने के लिए की है। इसमें मुझे पर्सनली कोई बड़ा फलसफा नजर नहीं आया। लेकिन यह क्योंकि हम हिस्ट्री देख रहे हैं तो बताना तो जरूरी है। सोफी की दुनिया
Speaker A
हिलने लग जाती है। मतलब लिटरली हिलने लग जाती है क्योंकि उसकी जिंदगी में चीजें अजीब बिहेव करने लग जाती हैं। सोफी और अल्बर्टो को यह रियलाइज होता है कि शायद वो असल में एकिस्ट ही नहीं करते। वो रियल
Speaker A
लोग हैं ही नहीं। उनको आगे जाके पता चलता है कहानी में कि वह एक स्टोरी के कररेक्टर्स हैं। यह सारी जो कहानी उनके साथ हो रही है बेसिकली यह एक किताब का हिस्सा है। यह किताब एक बाप ने अपनी बेटी
Speaker A
के लिए लिखा है और उस किताब के अंदर ये अल्बर्टो नोक्सो सोफी का कैरेक्टर है। मतलब किताब के अंदर के कैरेक्टर्स को यह समझ आ रही है कि हम इस किताब के कैरेक्टर्स हैं तो हम असल नहीं है। क्या
Speaker A
कमाल खेला है राइटर ने? क्योंकि जो बर्कली ने दिमाग कंफ्यूज करने वाली बात कही थी वह अब इन कररेक्टर्स के साथ हो रही है कि हां वाकई यह दुनिया जो है यह तो असल नहीं है। तो राइटर हियर इज नॉट जस्ट राइटिंग
Speaker A
फिलॉसफी ही इज डूइंग फिलॉसफी। यह रियलाइजेशन खैर जैसे ही कररेक्टर्स को होती है तो यह सोफी के लिए बहुत शॉकिंग होती है। लेकिन साथ ही यह बकली के उन आइडियाज को बिल्कुल रियल बना देती है कि अगर रियलिटी सिर्फ परसेप्शन है तो फिर
Speaker A
सोफी का एक्सिस्ट करना भी किसी और के दिमाग का हिस्सा हो सकता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब सोफी और अल्बर्टो नोक्स को यह एहसास हो जाता है कि वह असल में एक कहानी के किरदार हैं तो कोई यह भी
Speaker A
सोच सकता है कि अब तो सब कुछ बेमायना सा है लेकिन ऐसा नहीं होता बल्कि इस अवेयरनेस के बाद उनका सफर और ज्यादा सीरियस और मैच्योर हो जाता है। अब वो सिर्फ इस दुनिया को नहीं समझ रहे बल्कि अपनी
Speaker A
एकिस्टेंस को भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसी माइंडसेट के साथ वो एंटर करते हैं 18 सेंचुरी में जिसे एज ऑफ एनलाइटनमेंट भी कहा जाता है। एज ऑफ एनलाइटनमेंट दोस्तों जिसको एज ऑफ रीजन भी कहते हैं। इस दौर में लोगों का स्ट्रांग
Speaker A
यकीन बन जाता है कि इंसान अपनी अकल और अपने रीजन के जरिए दुनिया को बेहतर समझ सकता है। सुपरस्टिशन, ब्लाइंड फेथ और बिना सोचे समझे मान लेना इन सब चीजों को चैलेंज किया जाता है। फ्रांस और यूरोप के बहुत
Speaker A
सारे थिंकर्स कहते हैं कि अगर इंसान लॉजिकली सोचे तो वो खुद अपनी जिंदगी और सोसाइटी को इंप्रूव कर सकता है। लेकिन जहां पर सब फिलॉसोफर्स एक जैसे नहीं थे डेविड ह्यूम एक ऐसा थिंकर होता है जो चीजों को थोड़ा अलग एंगल से देखता है।
Speaker A
ह्यूम के मुताबिक हम जो कुछ भी जानते हैं वो हमारे एक्सपीरियंसेस की वजह से होता है। वो कहता है कि हमारे पास दो चीजें होती हैं। इंपेशंस और आइडियाज। इंपेशंस वो होते हैं जो हम फौरन महसूस करते हैं। जैसे
Speaker A
दर्द, रोशनी, आवाज। आइडियाज वो होते हैं जो बाद में उन इंपेशंस की याद बनकर रह जाते हैं। यू बहुत एक कंट्रोवरर्शियल बात कहते हैं। वो कहते हैं कि जो हम सेल्फ कहते हैं जिस चीज को यानी मैं वो असल में
Speaker A
कोई परमानेंट चीज नहीं है। वो हर वक्त चेंज हो रही है वो सेल्फ जो है। नए एक्सप्रेशनंस आते जा रहे हैं। पुरानी यादें फेड होती जा रही है। हमारी पर्सनालिटी इवॉल्व होती जा रही है। तो फिर यह कहना कि मैं एक ही हूं और हमेशा से ऐसे
Speaker A
ही था। यह गलत बात हो जाएगी। ह्यूम गॉड और सोल के बारे में भी बहुत कॉशियस है। वो कहता है कि अगर कोई चीज प्रूफ के बगैर है तो उस पर ज्यादा फिलोसोफिकल वेट नहीं डालना चाहिए। इसलिए डेविड जम एक
Speaker A
इग्नोस्टिक ही है। उसका फोकस ये है कि हम स्पेकुलेशन में ना फंसे और सुपरस्टिशन से दूर ही रहें। फिर एक और बहुत इंपॉर्टेंट फिलॉसफर आता है स्टेज पे बड़ी ग्रैंड एंट्री के साथ। वन ऑफ़ माय फेवरेट इमैनुअल कांट। कांट ने कहा कि यूम ने उसे
Speaker A
डॉग्मैटिक स्लीप से जगा दिया। इसने मुझे नींद से उठाया है। कांट समझता है कि सिर्फ एक्सपीरियंस पर डिपेंड करना भी काफी नहीं होगा और सिर्फ रीजन पर भरोसा करना भी खतरनाक साबित हो सकता है। कांट के मुताबिक हम दुनिया को वैसे नहीं देखते जैसे वो असल
Speaker A
में है। बल्कि वैसे देखते हैं जैसे हमारा दिमाग उसे प्रोसेस करना चाहता है। टाइम और स्पेस जैसे हैं। हमारी अंडरस्टैंडिंग का कोई हिस्सा नहीं है। ये दो चीजें। हर इंसान चीजों को डिफरेंट तरह से एक्सपीरियंस करता है। इसलिए कांट यह कहता
Speaker A
है कि हमें एथिक्स के लिए यूनिवर्सल रूल्स चाहिए। यहीं पर कांट अपना फेमस आईडिया देता है जिसे कैटेगोरिकल इंपैरेटिव कहते हैं। इसका सिंपल मतलब यह है कि तुम जो भी काम करो पहले ये सोचो कि अगर हर कोई वही
Speaker A
काम करे तो क्या दुनिया ठीक चल सकती है? अगर जवाब है हां तो वो काम एथिकल हो सकता है। अगर आपका जवाब है नहीं तो फिर शायद वो गलत काम है। इसके बाद फलसफा एक नया टर्न लेता है। 19 सेंचुरी में रोमांटिसिज्म का
Speaker A
दौर आता है। इस दौर में लोग कहते हैं कि भाई सिर्फ रीजन और रूल्स से जिंदगी को नहीं समझा जा सकता। आपने तो इमोशंस ही खत्म कर दिए। फीलिंग्स, कल्चर, हिस्ट्री ये भी चीजें तो इंपॉर्टेंट है। इस माइंडसेट का एक बहुत बड़ा नाम है हेगल।
Speaker A
हेगल के मुताबिक ट्रुथ कोई फिक्स चीज नहीं है। ट्रुथ टाइम के साथ इवॉल्व होता रहता है। जो चीज एक दौर में सच होती है, जरूरी नहीं है कि दूसरे दौर में भी सच हो। सोसाइटी, फैमिली, स्टेट जैसी इंस्टीटशंस
Speaker A
इंसान की सोच को शेप करती हैं। इंडिविजुअल इतना इंपॉर्टेंट नहीं है जितनी कलेक्टिव रियलिटी इंपॉर्टेंट है। लेकिन फिर सोरेन करके गार्ड आता है जो हैगल को बिल्कुल ऑोजिट लाके खड़ा कर देता है। करके गार्ड कहता है कि मुझे सिस्टम्स और ग्रैंड
Speaker A
थ्योरीज में कोई इंटरेस्ट नहीं है भाई। मेरे लिए सिर्फ एक चीज मैटर करती है। इंडिविजुअल इंसान तुम्हारी अपनी जिंदगी, तुम्हारी चॉइससेस, तुम्हारी स्ट्रगल यह सब सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट है। यह जो करके गार्ड है, इसकी असल प्रंसिएशन बड़ी मुश्किल है। कीर्क गो डेनिश नाम है ये। तो
Speaker A
वहीं कीर के गौ के मुताबिक इंसान जिंदगी को तीन स्टेजेस में जीता है। पहला स्टेज प्लेजर का होता है। जहां इंसान सिर्फ एंजॉयमेंट और सरफेस लेवल खुशी के पीछे भागता है। दूसरा स्टेज एथिकल होता है। जहां इंसान रिस्पांसिबिलिटी और मोरालिटी
Speaker A
को समझने की कोशिश करता है। तीसरा स्टेज रिलीजियस होता है। जहां इंसान लॉजिक से आगे जाकर फेथ का लीप लेता है। यह बात ह्यूम के आईडिया से बिल्कुल अगेंस्ट। लेकिन इसी ने ही एकिस्टेंशियलिज्म की फाउंडेशन रख दी। इस सबके बीच एक और बहुत
Speaker A
बड़ा नाम आता है डार्विन का। डार्विन ने एववोल्यूशन का कांसेप्ट देखकर इंसान की हिस्ट्री को ही चेंज कर दिया। भाई पहले जो लोग समझते थे कि दुनिया सिर्फ कुछ हजार साल पुरानी है। डार्विन ने बताया कि दुनिया बिलियंस साल पुरानी है और इंसान भी
Speaker A
एक नेचुरल प्रोसेस का रिजल्ट है। हम कोई अलग मखलूक नहीं है बल्कि बाकी लाइफ फॉर्म्स की तरह एक कंटीन्यूएशन है। दोस्तों फिर से बता रहा हूं। हम पढ़ने की समझने की कोशिश करते हैं। आपकी मर्जी आप जरूरी नहीं है आप डार्विन की बात पे यकीन
Speaker A
रखो लेकिन दिमाग खुला रखना। गालियां मत देना। हम फिलसफा पढ़ रहे हैं। ठीक है? फिर आता है 20थ सेंचुरी और उसका सबसे पावरफुल फिलॉसोफिकल मूवमेंट होता है एकिस्टेंशियलिज्म का। इस फिलॉसफी के मुताबिक जिंदगी का कोई पहले से लिखा हुआ
Speaker A
मतलब नहीं है। इंसान पहले एक्सिस्ट करता है। फिर अपनी जिंदगी का मतलब खुद क्रिएट करता है। रिस्पांसिबिलिटी भी उसकी खुद की ही है। अगर कोई गॉड नहीं है, कोई फिक्स पर्पस नहीं है, तो फिर तुम्हारी चॉइससेस, तुम्हारे एक्शंस तुम्हें खुद ही डिफाइन
Speaker A
करने हैं। यह सोच बहुत हैवी होती है। लेकिन साथ ही बहुत लिबरेटिंग भी होती है। तुम विक्टिम नहीं हो, तुम फ्री हो। लेकिन साथ ही तुम पर जिम्मेदारी भी है। सोफीस वर्ल्ड यहीं पर अपना सर्कल कंप्लीट करती है। कहानी यह दिखाती है कि चाहे हम कितना
Speaker A
भी साइंस और फिलॉसफी सीख लें सवाल कभी खत्म नहीं होंगे। इंसान का काम जवाब देना नहीं है बल्कि बेहतर सवाल पूछना है। बिल्कुल सॉक्रेटीज की तरह। फिलॉसफी का असल मकसद यह नहीं है दोस्तों कि तुम्हें फाइनल आंसर मिल जाए सारे। बल्कि यह है कि तुम
Speaker A
दुनिया को फ्रेश नजरिए से देखो। एजम्पशनंस को चैलेंज करो। जिंदगी को बिना प्रजिससेसिस के समझने की कोशिश करो और शायद इसलिए ही सोफी की कहानी हमारी अपनी कहानी भी बन जाती है। इट्स अ वेरी इंटरेस्टिंग बुक दोस्तों और जो भी शुरू
Speaker A
करना चाहते हैं वेस्टर्न फिलॉसफी समझना बिगिनर्स के लिए बहुत जबरदस्त किताब है एक दरवाजा है फिलॉसफी पढ़ने का और समझने का। तो आई हाईली रेकमेंड दिस बुक। मिलते हैं आपसे किसी और वीडियो में। किसी और बात पे करेंगे तब्सला। तब तक के लिए मुझे दें
Speaker A
इजाजत। मैं चला गुड बाय।
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