1947 की आजादी और विभाजन की कहानी, ब्रिटिश राज से मुक्ति की लड़ाई और उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव।
Key Takeaways
- भारत की आजादी भारी बलिदान और संघर्ष के बाद मिली।
- ब्रिटिश राज ने भारत को आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर करने के लिए कई नीतियां लागू कीं।
- 1857 की बगावत स्वतंत्रता संग्राम की पहली बड़ी चिंगारी थी।
- शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता ने स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी।
- विभाजन ने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में गहरा सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव डाला।
What the video covers
- 1947 में भारत-पाकिस्तान को आजादी मिली लेकिन भारी बलिदान और हिंसा के साथ।
- कहानी 1857 की सिपाही बगावत से शुरू होती है जिसने ब्रिटिश राज को चुनौती दी।
- ब्राउन पॉलिसी और ब्रिटिश के अन्य शासकीय कदमों ने भारत को आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर किया।
- ब्रिटिश ने भारतीय समाज में विभाजन की नीति अपनाई, जिससे हिंदू-मुस्लिम अलगाव बढ़ा।
- सर सैयद अहमद खान जैसे रिफॉर्मर्स ने मुसलमानों के लिए शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई।
- 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी।
- गांधी, भगत सिंह जैसे नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को तेज किया।
- ब्रिटिश ने विभाजन की नीति को लागू कर भारत को दो हिस्सों में बांटा, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए।
- स्वतंत्रता संग्राम में कई महत्वपूर्ण घटनाएं और समझौते हुए, जैसे लखनऊ पैक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड।
- विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने की प्रक्रिया पूरी हुई।
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Speaker A
1947 में हमें आजादी तो मिली, लेकिन इस आजादी की कीमत बहुत भारी थी। इस आजादी की राह में बहुत सारा खून बहा। ट्रेनों से लाशें भी मिली। बहुत सारे लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े और तकरीबन 10 लाख लोग
Speaker A
कुर्बान हो गए। मगर यह सिर्फ पार्टीशन की कहानी नहीं है। कहानी शुरुआत होती है 1857 की बगावत से। वो छोटी सी चिंगारी जिसने ब्रिटिश राज को हिला दिया था। फिर उसके बाद अंग्रेजों की ब्राउन पॉलिसी, बंगाल के दो टुकड़े करना, जिन्ना के 14 पॉइंट्स,
Speaker A
गांधी का साल्ट मार्च, भगत सिंह की कुर्बानी और आखिरकार पाकिस्तान और भारत का अलग होना। दोस्तों, यह सिर्फ कोई तारीखी कहानी नहीं है। यह 90 साल की वो जंग है जिसमें लाखों जानें गई हैं। इस आजादी की कीमत अगर तुम
Speaker A
वाकई जानना चाहते हो, तो इस वीडियो को पूरा जरूर देखना। [संगीत] [संगीत] [संगीत] हां, आजाद है। वैसे तो अंग्रेजों की हुकूमत ने जो जुल्म ढाए वो कहानी बहुत लंबी है। लेकिन हम इसको 1857 से शुरू करते हैं। इस बगावत से इस
Speaker A
कहानी को शुरू करते हैं जिसको सिपोय म्यूटनी भी कहते हैं। तो आपको पता होगा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जो फौज थी उसमें हिंदुस्तान के सिपाही भी थे। 1857 तक तो हिंदुस्तानी सिपाहियों की तादाद 3 लाख तक हो चुकी थी। अब इसमें जो उनकी
Speaker A
बंगाल आर्मी प्रेसिडेंसी थी उसमें जो भी हिंदुस्तानी थे ज्यादातर तो वह हाई कास्ट ब्राह्मणस थे या फिर मुसलमान थे, वो अपने मजहब से बहुत जुड़े हुए थे। बहुत रिलिजियस लोग थे। अब हुआ यह कि जनवरी 1857 में ब्रिटिश ने एक नई राइफल इंट्रोड्यूस कराई
Speaker A
जिसका नाम था एनफील्ड राइफल। इस राइफल को चलाने का जो तरीका था वो बहुत यूनिक था। इसके कार्ट्रिज को पहले तो दांतों से तोड़ना पड़ता था। फिर उसके अंदर जो गन पाउडर और गोलियां हैं, वह गन के बैरल में
Speaker A
डालनी होती थी। उसके बाद आप उसे शूट कर सकते थे। एक महीने बाद ही यह अफवाह फैल गई कि इस गन के जो कार्ट्रिज हैं उनमें गाय की और सूअर की चर्बी लगी हुई है। अब यह चीज सिपाहियों के लिए तो बहुत ऑफेंसिव थी
Speaker A
क्योंकि हिंदू सिपाही के लिए गाय जो है वो पवित्र है और जो मुसलमान सिपाही है उसके लिए सूअर निजस है। फौजियों ने खुले तौर पर उस बंदूक को चलाने से इंकार कर दिया। लेकिन ये जो था ना दोस्तों ये एक प्रेशर
Speaker A
कुकर की आखिरी सीटी थी। प्रेशर तो कब से बिल्ड अप हो रहा था क्योंकि ब्रिटिश के जो जुल्म हैं वो तो उनकी दास्तान बहुत लंबी है। 10 में ये वो पॉइंट आ गया जब मेरठ में हिंदुस्तानी फौजियों ने टोटल बगावत का
Speaker A
ऐलान कर दिया। यहां पर यह बात जानना बहुत जरूरी है कि इस बगावत को म्यूटनी को बहुत सारे लोग वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस भी कहते हैं। पहली वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस जिससे कुछ हिस्टोरियंस जैसे के के अजीज बिल्कुल भी एग्री नहीं करते। उन्होंने अपनी बुक द
Speaker A
मर्डर ऑफ हिस्ट्री में लिखा है कि ये पहली जंग नहीं थी। क्योंकि ऐसा नहीं था कि पूरे हिंदुस्तान के लोग जुड़ गए हो, मिल गए हो और उन्होंने सोचा हो कि अब अंग्रेजों को भगा के रहना है और बहुत बड़ी जंग हुई हो।
Speaker A
हिंदुस्तान तो बहुत बड़ा था। यह सिर्फ बंगाल प्रेसिडेंसी और बहुत सारी छोटी-छोटी जगहों पे बगावत शुरू हो गई थी। अब जैसे जंग को लीड करने के लिए किसी लीडर की जरूरत होती है तो यहां किसी का कोई लीडर
Speaker A
भी नहीं था। दिल्ली से जो सिपाही उठ रहे थे उनका कहना यह था कि ब्रिटिश को हरा के हम बहादुर शाह जफर को दोबारा से किंग बनाएंगे। यानी मुगल रूल जो है उसको कंटिन्यू करेंगे। फिर कानपुर में जो
Speaker A
सिपाही थे वो पेशवा बाजीराव टू के जो अडॉप्टेड सन थे नाना साहब उनके पीछे खड़े हुए थे। फिर झांसी में जो सिपाही थे उनका यह कहना था कि हम रानी लक्ष्मीबाई जो कि झांसी की रानी है उनको क्वीन बनाना चाहते
Speaker A
हैं। यानी कोई एक यूनाइटेड लीडरशिप नहीं थी। कोई स्ट्रेटजी नहीं थी। अब स्ट्रेटजी ना होने की वजह से यह जो बगावत थी इसको क्रश करना भी ब्रिटिश के लिए आसान था। साल के मिड में ही उन्होंने बहुत बुरे तरीके
Speaker A
से इस बगावत को क्रश कर दिया। बहादुर शाह जफर को उन्होंने जलावतन कर दिया रंगून। जिसके साथ ही जो सदियों से चलता हुआ मुगल रूल था उसका दी एंड हो गया। फिर अगले साल ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी जो है वह अबॉलिश कर दी गई। अब आ गया
Speaker A
ब्रिटिश क्राउन का रूल यानी इंडिया पर पूरा कंट्रोल अब हासिल कर लिया था ब्रिटिश ने। अब इंडिया की जो भी फॉरेन पॉलिसी है, जो भी कुछ है उसके जितने भी बड़े फैसले हैं वो लंदन पार्लियामेंट में बैठ के हो
Speaker A
रहे थे। ऑफिशियली अब इंडिया जो है वो ब्रिटिश की कॉलोनी बन गया था। बाय द वे इस सारी बगावत को अगर किसी फिल्म में आप देखना चाहते हैं तो आप आमिर खान की मंगल पांडे भी देख सकते हैं। अब 1857 के बाद जब
Speaker A
ब्रिटिश क्राउन रूल आ गया डायरेक्ट तो उन्होंने अपने इस राज को मजबूत करने के लिए कदम उठाना शुरू कर दिए। पहले तो उन्होंने रेलवे लाइंस बिछाना शुरू कर दी। पूरे इंडिया में डेवलपमेंट भी शुरू कर दी। कैनाल्स बनानी शुरू कर दिए। लेकिन यह सब
Speaker A
उन्होंने अपने फायदे के लिए किया था। यह उन्होंने हिंदुस्तान के आम आवाम के लिए नहीं किया था। लोकल इंडस्ट्री का हाल तो उन्होंने बहुत ही बुरा कर दिया था। उनकी सारी कोशिश ये थी कि अगर वो चले भी जाएं तो
Speaker A
इंडिया इस पोजीशन पर ना खड़ा होकर दोबारा से तरक्की कर सके। टेक्सटाइल की इंडस्ट्री बहुत ग्रो कर रही थी। इंडिया में हाथ से कपड़ा बनाया जाता था। उन्होंने उस इंडस्ट्री को बहुत नुकसान पहुंचाया। उन्होंने बल्कि हिंदुस्तान को एक केप्टिव
Speaker A
मार्केट बना दिया था। हिंदुस्तान से ही कपास उठाते थे, कॉटन उठाते थे, इंग्लैंड उस कॉटन को भेजते थे। वहां से मशीनों पर कपड़ा बनके आता था। वो वापस इंडिया आता था और गरीब जो इंडियंस थे उनको महंगे दामों
Speaker A
में बेचा जाता था। उन्हीं की कपास से बना हुआ कपड़ा। उस पे इंपोर्ट की जो ड्यूटी थी वो भी लगभग जीरो होती थी क्योंकि भाई जाहिर है अपनी बदमाशी है। फिर आया ब्यूरोक्रेसी का टाइम। ब्रिटिश ने इंडियन सिविल सर्विज को इंट्रोड्यूस कर दिया।
Speaker A
जैसे आपका सीएसएस एग्जाम है। बिल्कुल इसी तरह ही। कोई भी बंदा इन एग्जाम्स को पास करे तो वो ब्यूरोक्रेट लग सकता है। यह उन्होंने इसलिए किया क्योंकि मुल्क को चलाने में आसानी हो। लेकिन इसमें भी हर लेवल की डिस्क्रिमिनेशन थी। 1922 तक तो यह
Speaker A
जो एग्जाम है यह होता ही लंदन में था। अब आप बताएं गरीब हिंदुस्तानी पहले वह लंदन जाए वहां से वह एग्जाम दे और फिर जो है वो कहीं अफसर बने। तो इसी वजह से जो टॉप की अफसर थी क्योंकि हिंदुस्तानी अफोर्ड ही
Speaker A
नहीं कर सकते थे बाहर जाना तो वो जाती ही फिर से ब्रिटिश के पास ही थी। आर्मी में भी उन्होंने चेंजेस करना शुरू कर दिए। जो हिंदुस्तानी सिपाही थे, जो सोल्जर्स थे, उनकी तादाद घटाना शुरू कर दी और अपने जो
Speaker A
ब्रिटिश सोल्जर्स हैं, उनकी तादाद बढ़ानी शुरू कर दी। फिर उसके साथ-साथ वह एक और पॉलिसी लेके आए जिसका नाम था ब्राउन साहिब पॉलिसी। इस पॉलिसी का पीछे जो छुपा हुआ मकसद था वह यह था कि हम हिंदुस्तानियों को
Speaker A
पढ़ाएंगे तो सही, उनको एजुकेट करेंगे लेकिन उनको अपने गोरों के रंग में रंगेंगे। तो उनका गोल था कि हिंदुस्तानियों में जो टॉप इट लोग हैं उनको पकड़ो। उनको अपने रंग में रंगो। शक्ल से तो वो ब्राउन होंगे लेकिन
Speaker A
उनका जो टेस्ट होगा, जो वैल्यूस होंगी वो सारी ब्रिटिश होंगी। तो उन्होंने बहुत सारे स्कूल और यूनिवर्सिटीज बनाने शुरू कर दिए। लेकिन वहां पर पढ़ाई इतनी महंगी थी कि सिर्फ रिच इलीट जो लोग थे हिंदुस्तान के वही पढ़ पाते थे। और वही जो उनका मकसद
Speaker A
था। सिलेबस भी पूरा जो है वो ब्रिटिश होता था। ब्रिटिश हिस्ट्री पढ़ाई जाती थी। लिटरेचर पढ़ाया जाता था। मकसद यही था कि एक हिंदुस्तानियों की एक ऐसी इलीट क्लास बनाई जाए जो एक बफर क्लास बने। यानी एक गरीब हिंदुस्तानी। उसके बाद फिर ये रिच
Speaker A
इलिट जिसके वैल्यू सारे ब्रिटिश हैं वो वाला हिंदुस्तानी और उसके ऊपर खुद ब्रिटिश। लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि इस ट्रैप में सारे जो इंडियन रिच लोग हैं वो आ गए। बल्कि इसके साथ-साथ कुछ ऐसे रिफॉर्मर्स भी आए जिन्होंने मुआशरे को वाकई बदला। जैसे
Speaker A
बंगाल में ईश्वर चंद्र विद्यासागर। उन्होंने विडो रीमैरिज का बिल पास करवाया। होता यह था कि जो हिंदू बेवा औरत होती थी उससे कोई शादी नहीं करता था। उन्होंने यह कानून पास करवाया कि जिसके हिसाब से जो हिंदू बेवा औरत है उसकी शादी दोबारा हो
Speaker A
सकती है। फिर उनकी बहुत बड़ी लड़ाई रही चाइल्ड मैरिज के खिलाफ और अगर मुसलमानों के रिफॉर्मर्स की बात करें तो सबसे बड़ा नाम आता है सर सैयद अहमद खान का। उनका यह मानना था कि मुसलमानों को अंग्रेजी भी
Speaker A
सीखनी पड़ेगी। मॉडर्न साइंस भी सीखनी पड़ेगी। वरना वो हमेशा ब्रिटिश के पीछे ही रहेंगे। सोशियोइकोनॉमिकली हमें स्ट्रांग होने की जरूरत है। उनका यह मानना था कि हमें ये सारी साइंस और मॉडर्न नॉलेज लेनी पड़ेगी। लेकिन साथ में हमने जो अपनी
Speaker A
मुस्लिम आइडेंटिटी है उसको भी लूज नहीं करना। 1864 में उन्होंने एक साइंटिफिक सोसाइटी बनाई जिसका काम यह था कि जो वेस्टर्न नॉलेज है उसको उर्दू में ट्रांसलेट करना। फिर 1875 में उन्होंने मोहम्मदन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज भी बनाया जो कि आगे जाके अलीगढ़ मुस्लिम
Speaker A
यूनिवर्सिटी बन गई। ये एक ऐसी जगह थी जो मुसलमानों के लिए एजुकेशन और पॉलिटिकल अवेकनिंग का एक मरकज बन गई। 19वीं सदी के एंड में जो हिंदुस्तानी थे उनके अंदर एक सोच ने जन्म लिया कि हमारी एक कलेक्टिव
Speaker A
पॉलिटिकल आवाज होनी चाहिए। 1885 तक कुछ मशहूर शख्सियतें जो सामने आईं दादा भाई नौरोजी, सुरेंद्र बनर्जी, जस्टिस महादेवन, गोविंद रनाडे और आनंद चार्लू इन सबका एक ख्वाब बन गया कि क्यों ना एक पॉलिटिकल पार्टी बनाई जाए जो आम
Speaker A
आवाज बने। जब भी हमें ब्रिटिश से कोई डिमांड्स करनी हो तो वह पार्टी रिप्रेजेंट करे एक आम हिंदुस्तानी को। एलन ऑक्टवियन ह्यूम की नेटवर्किंग की वजह से उसके कॉन्टेक्स्ट की मदद की वजह से आखिरकार इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी बन गई।
Speaker A
आईएसी का जन्म हो गया। एक ऐसी पार्टी बन गई जो आम हिंदुस्तानी जो है उसकी डिमांड्स ब्रिटिश के सामने रख सकती थी। उनकी पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन एक शेप में आ गई थी। अब लेकिन ये जो नया सेटअप बना ऐसा
Speaker A
नहीं कि बहुत आसानी से सब इसके साथ जुड़ गए। खासतौर पर सर सैयद अहमद खान जो थे उनका विज़ बिल्कुल ही अलग था। वह यह कहते थे कि यह जो इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी है यह बहुत इमच्योर है और अभी मुसलमानों
Speaker A
को तो खासतौर पर पॉलिटिक्स में घुसना ही नहीं चाहिए। उनका पूरा फोकस होना चाहिए एजुकेशन पे। सर सैयद अहमद खान का मानना यह था कि पहले तालीम होनी चाहिए मुसलमानों के लिए। अभी उनको पॉलिटिक्स में नहीं घुसना चाहिए ताकि वो अपनी सोशियोइकोनॉमिक पोजीशन
Speaker A
जो है वो स्ट्रांग कर सकें। वरना उनकी आवाज जो है वो इतनी मजबूत नहीं होगी और वो दबे ही रहेंगे। उनको ये भी एक फियर था कि जो कांग्रेस है उसमें हिंदू डोमिनेशन है और वो हिंदू डोमिनेशन रहेगी और यही
Speaker A
दोस्तों ये जो कंसर्न था और जो कॉशन था जो सर सैयद अहमद खान ने दिया था ये फाउंडेशन बन गया। इसी ने ही इंस्पायर किया मुसलमानों को अपनी पार्टी बनाने के लिए। ऑल इंडिया मुस्लिम लीग 1906 में बन गई।
Speaker A
1857 के बाद खासतौर पे जो ब्रिटिश थे उन्हें यह समझ आई थी कि इनको डिवाइड करके रूल करना है। डिवाइड एंड रूल की पॉलिसी तो उनके दिमाग में थी ही। लेकिन यह फार्मूला जो है ना सॉलिड शेप में तब आई जब 1905 में
Speaker A
उस वक्त के जो वायसराय थे लॉर्ड कर्ज़न उन्होंने बंगाल के दो टुकड़े कर दिए। वेस्ट बंगाल जिसमें बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे। ईस्ट बंगाल जिसमें आसाम भी शामिल था। वेस्ट में हिंदू मेजॉरिटी थी। ईस्ट में मुसलमानों की मेजॉरिटी थी। कर्जन
Speaker A
का तो कहना यह था कि हम इसको दो टुकड़े इसलिए कर रहे हैं क्योंकि एडमिनिस्ट्रेटिव कन्वीनियंस होगी। लेकिन हमें पता है बल्कि सबको पता है कि इसके दो हिस्से करने की वजह सिर्फ यही थी कि हिंदू और मुसलमान अलग
Speaker A
हो जाएं। इनके बीच में यूनिटी ना हो। हेंस डिवाइड एंड रूल। बंगाल के ये दो टुकड़े होने के बाद जो हिंदू मेजॉरिटी थी वहां से एक नई मूवमेंट शुरू हुई। स्वदेशी मूवमेंट। उन्होंने समझा कि यह हमें पॉलिटिकली कमजोर
Speaker A
करने की साजिश है। फिर उन्होंने सारे जो इंपोर्टेड गुड्स थे, ब्रिटिश इंपोर्टेड गुड्स उनका बॉयकॉट करना शुरू कर दिया। उनके मशीन से बने हुए कपड़े को जलाना शुरू कर दिया, प्रोटेस्ट करने शुरू कर दिए, रैलीज़ निकाली, लोकल इंडस्ट्री को फुल
Speaker A
सपोर्ट करना शुरू कर दिया। यह जो रेजिस्टेंस था, यह इकोनॉमिकल और कल्चरल तो था ही, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत को सीधा-सीधा चैलेंज भी था। मगर मुसलमानों में इसका रिएक्शन बिल्कुल अलग था। उनकी यह सोच थी कि जब एक बंगाल इकट्ठे था, तो मुसलमानों
Speaker A
को इतनी ओपोरर्चुनिटीज़ नहीं मिलती थी। जो अच्छी गवर्नमेंट जॉब्स थी, वहां तक मुसलमानों की एक्सेस नहीं होती थी। अब जब इसके दो टुकड़े हुए हैं तो मुसलमानों को एक तो अपनी एक आइडेंटिटी मिली है। फिर ढाका जो है क्योंकि ईस्ट बंगाल का कैपिटल
Speaker A
था। एक पावर सेंटर भी वहां पे था। तो ये मुसलमानों के लिए बड़ी फायदे की चीज थी। तो ज्यादातर मुसलमानों ने इस पार्टीशन को अपने लिए एक पॉजिटिव डेवलपमेंट समझा। अब यहीं से ही हिंदुओं और मुसलमानों की जो
Speaker A
सोच थी उसमें फर्क आना शुरू हो गया। इसी वजह से 1906 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग बनी जिसका मेन गोल था मुसलमानों के राइट्स की हिफाजत करना। अब यहां पे ब्रिटिश का जो असल मकसद था दोस्तों वह पूरा हो चुका था।
Speaker A
सियासी सोच का फर्क जो उन्होंने डालना था हिंदू और मुसलमानों में वह डल चुका था। इनके बीच में जो दीवार थी बेतमादी की वो उन्होंने लगा दी थी। हालांकि 1911 में यह पार्टीशन जो है रिवर्स हो गया। दोबारा से
Speaker A
बंगाल एक यूनाइटेड प्रोविंस बन गया। लेकिन वो जो दरार पड़ चुकी थी डिवाइड एंड रूल की पॉलिसी की वजह से वो बहुत गहरी हो चुकी थी। इतनी गहरी हो चुकी थी कि आने वाले सालों में यह हिंदुस्तान की पॉलिटिक्स को
Speaker A
टोटली बदलने वाली थी। अब इन दोनों पार्टियों के जो रास्ते हैं वह अलग-अलग होना शुरू हो गए थे। कांग्रेस जो 1885 में बनी थी और जब वो बनी थी तो उसकी डिमांड्स छोटे-मोटे सोशल रिफॉर्म्स थे। अब उसकी डिमांड्स भी बढ़ गई थी। वो ब्रिटिश से
Speaker A
हिंदुस्तान के लिए सेल्फ गवर्नमेंट की डिमांड करने लगे थे कि हमें एक अपनी हुकूमत बनाने दी जाए। बेशक वो ब्रिटिश एंपायर के अंदर हो। यानी वह डोमिनियन स्टेटस मांग रहे थे। बिल्कुल उसी तरह जो उस दौर में ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के पास
Speaker A
था। कांग्रेस का जोर इस बात पे था कि लेजिसलेटिव काउंसिल में इंडियंस की पार्टिसिपेशन ज्यादा होनी चाहिए ताकि चंद गोरे ही पूरे हिंदुस्तानियों की जिंदगियों का फैसला ना ले। यानी इस गवर्नेंस में इंडियन पार्टिसिपेशन भी होनी चाहिए। मगर
Speaker A
ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का जो नजरिया था वो कांग्रेस से बिल्कुल ही अलग था। तब के लीडर्स का मानना यह था कि अगर ऐसा हो जाता है और इंडिया को सेल्फ गवर्नमेंट की इजाजत मिल जाती है ब्रिटिश से तो यह तो मेजॉरिटी
Speaker A
सिस्टम होगा और उस सिस्टम के हिसाब से तो हिंदू डोमिनेशन होगी और मुसलमान तो वैसे ही 20 से 25% है माइनॉरिटी है तो उनको तो मार्जिनलाइज किया जाएगा। सो ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का जो मेन फोकस था वो यह था
Speaker A
कि मुसलमानों की पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन रहे। अब इन दोनों पार्टीज की जो पॉलिटिकल प्रायोरिटीज थी वह तो अलग हो चुकी थी लेकिन यह 1909 मोरली मिंटो रिफॉर्म्स में बिल्कुल क्लियरली सामने आ गई। इन रिफॉर्म्स के बाद लेजिसलेटिव काउंसिल्स में इंडियन की रिप्रेजेंटेशन तो बढ़ा दी
Speaker A
गई जो कि एक अच्छा स्टेप था। लेकिन कांग्रेस के लिए जो इस रिफॉर्म का कंट्रोवर्शियल पार्ट था वो यह था कि मुसलमानों को सेपरेट इलेक्टोरेट दिया गया। मतलब अब मुसलमान सिर्फ मुसलमान कैंडिडेट को वोट कर सकता था। कांग्रेस को यह बात
Speaker A
बिल्कुल ही कबूल नहीं थी। वह इसको डिवाइड एंड रूल ही मान रहे थे। अलबत्ता मुसलमान जो हैं वो इसको अपनी पॉलिटिकल आइडेंटिटी का सेफगार्ड मान रहे थे कि चलो भाई अब हमारी ऑफिशियली एक से होगी। यहां से हिंदू
Speaker A
और मुसलमानों की जो दरार थी वो और गहरी होती गई। वो 1857 का जो जज्बा था जिसमें हिंदू मुसलमान मिलके गोरों के खिलाफ लड़ रहे थे वो साथ-साथ कहीं ब्लरी हो गया। और टू नेशन थ्योरी का जो बीज है वह यहीं पे
Speaker A
ही फॉर्मल तरीके से बोया गया। और टाइमिंग भी बहुत इंटरेस्टिंग थी। वर्ल्ड वॉर वन चल रही थी। ब्रिटिश को एक्सप्लइट करना था भाई। रिसोर्सेज चाहिए थे। उनको इंडिया से मैन पावर चाहिए था। लोग चाहिए थे, सोल्जर्स चाहिए थे। तो इसलिए वहां की
Speaker A
पार्टीज की सपोर्ट होना तो उनके लिए बहुत जरूरी बात थी। यहां पे लीडर्स को लगा कि अब उनके पास बारगेनिंग चिप है। अगर वह इस टाइम ब्रिटिश की मदद करें तो उनसे वो कुछ कंसेशन ले सकते। इसी बैकग्राउंड में होता
Speaker A
है एक बहुत इंपॉर्टेंट पैक्ट जिसको कहते हैं लखनऊ पैक्ट 1916. लखनऊ पैक्ट के मोमेंट में दोनों जो पार्टीज थी कांग्रेस और लीग वो टेंपरेरी टाइम के लिए लेकिन यूनिटी में आ गई। उधर कांग्रेस ने भी बहुत कोशिश की सेल्फ गवर्नमेंट मिल जाए मिल
Speaker A
जाए। लेकिन कोई बड़ी कामयाबी उनको हासिल नहीं हुई। यहां पे मुसलमान भी अपने राइट्स को प्रोटेक्ट करना चाह रहे थे। लेकिन उनको भी समझ आ गया कि जब तक कॉन्स्टिट्यूशनल लेवल पर रिफॉर्म्स नहीं आएंगे तो कुछ होगा नहीं। तो बेहतर यह होगा कि मिलके डिमांड्स
Speaker A
करने लग जाए तो शायद उसकी आवाज ज्यादा हो, उसका असर ज्यादा हो। इस फैक्ट के जो दो मेजर एग्रीमेंट्स थे उनमें पहला यह था कि सिर्फ लेजिसलेटिव काउंसिल में ही नहीं बल्कि एग्जीक्यूटिव काउंसिल में भी इंडियंस की पार्टिसिपेशन को बढ़ाया जाए।
Speaker A
ताकि जो इंपॉर्टेंट डिसीजंस हैं वहां पर भी इंडियंस की रिप्रेजेंटेशन हो। वरना तो कोई फैसला नीचे से ऊपर आता ही नहीं था। दूसरी जो एग्रीमेंट थी वो एक किस्म का कॉम्प्रोमाइज था फॉर कांग्रेस। वो तो शुरू से खिलाफ थे कि मुसलमानों के लिए सेपरेट
Speaker A
इलेक्टोरेट नहीं होना चाहिए। लेकिन इस एग्रीमेंट के हिसाब से उनको इस पे मानना पड़ा। सेपरेट इलेक्टोरेट फॉर मुस्लिम्स उनको कबूल करना पड़ा। क्योंकि उन्हें पता था जब तक मुस्लिम लीग साथ नहीं होगी तो ये जो डिमांड हमारी बड़ी डिमांड्स है वो पूरी
Speaker A
नहीं हो सकेंगी। अब ऐसा नहीं कि ये पैक्ट जैसे हुआ तो ब्रिटिश ने कहा कि ठीक है भाई कल से जो आपको हुकूमत दे देते बल्कि उन्होंने वेग किस्म के प्रॉमिससेस किए कि सेल्फ गवर्नमेंट आपको देंगे लेकिन धीरे-धीरे आहिस्ता-आहिस्ता। 1919 जब आया
Speaker A
तो ब्रिटिश ने मुंटागो शेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स के जरिए थोड़ा सा वादा अपना पूरा किया कि उन्होंने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 के हिसाब से कुछ मिनिस्ट्रीज इंडियंस को दे दी जैसे हेल्थ, कॉमर्स, एजुकेशन। लेकिन अब भी जो इंपॉर्टेंट मिनिस्ट्रीज थी जैसे फाइनेंस,
Speaker A
डिफेंस, लॉ एंड ऑर्डर वो उन्होंने अपने पास ही रखी। मतलब ये जो छोटे-मोटे डिपार्टमेंट्स थे वो उन्होंने दिए लेकिन जो पावरफुल थे वो उन्होंने अपने पास ही रखे। इसी साल हिंदुस्तान की आम आवाम के लिए एक बहुत बड़ा शौक आ गया और वो था
Speaker A
रोलेक्ट एक्ट जो कि जुल्म की इंतहा की एक मिसाल थी। उस कानून के हिसाब से जो ब्रिटिश पुलिस थी उनको पूरा हक था कि वो किसी को भी बिना सबूत के बिना ट्रायल के उठा के जेल में डाल सकते थे। यानी फुल
Speaker A
टोटल पुलिस की बदमाशी जस्टिस जो है वो एक तमाशा बन गया। पूरे हिंदुस्तान की आवाम में गुस्सा जाहिर है बढ़ने लगा और प्रोटेस्ट शुरू हो गए और फिर आया हिंदुस्तान की तारीख का सबसे काला दिन जलियांवाला बाग मैसकर 1919 जब अमृतसर में
Speaker A
अनआर्म्ड सिविलियन लोग प्रोटेस्ट कर रहे थे रोलेक्ट एक्ट के खिलाफ तो जनरल डायर जो थे वो अपने सिपाहियों के साथ आ गए और बिना किसी वार्निंग के गोलियां चलाना शुरू कर दी। अनआर्म सिविलियंस पर इतनी गोलियां चलाई कि 1000 से ज्यादा लोगों की डेथ हो
Speaker A
गई। जिसमें बच्चे भी थे, बूढ़े भी थे, औरतें भी थी, जवान भी थे। आज भी जलियांवाला बाग की दीवारें जो हैं उन पे जो गोलियां लगी हैं वो इस बात की गवाही देती हैं कि ब्रिटिश ने कितना ज्यादा
Speaker A
जुल्म ढाया था। यह वो मोमेंट था जहां पर हिंदू हो, मुसलमान हो या सिख हो जो भी हिंदुस्तानी हो उसके दिल में ब्रिटिश के लिए एक आग भड़क रही थी। अब उनको ब्रिटिश के झूठे वादों पर कोई यकीन ही नहीं था।
Speaker A
असल में इस वाक्य के बाद एक नया चैप्टर शुरू हो गया। वर्ल्ड वॉर वन यहां पर खत्म हुई थी। एलाइड पावर्स जीत चुके थे और ऑटोमन एंपायर जो थी वो शदीद खतरे में थी। अब उस्मानिया खिलाफत जो है इस्लाम में
Speaker A
खलीफा होना एक बहुत बड़ी चीज है। तो यहां के जो सब्टिनेंट के मुसलमान थे उनके लिए यह खिलाफत कोई सिर्फ रिलीजियस इंस्टीट्यूशन नहीं थी बल्कि एक इमोशनल सिंबल भी था। इसलिए उन्होंने भी प्रोटेस्ट करना शुरू कर दिया और इस प्रोटेस्ट को जो
Speaker A
लीड कर रहे थे वह मौलाना मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली थे। उनका गोल था कि ब्रिटिश पर प्रेशर डाला जाए ताकि खिलाफत खत्म ना हो। अब इस फज़ में गांधी भी मुसलमानों के साथ खड़े हो गए। यह एक और टाइम आ गया
Speaker A
जिसमें हिंदू मुस्लिम की थोड़ी सी यूनिटी दिखी। लेकिन ब्रिटिश तुर्की में खिलाफत खत्म क्या ही करती। ब्रिटिश तो तुर्की पर पूरी तरह से कंट्रोल हासिल कर ही नहीं पाई। मुस्तफा कमाल अता तुर्की लीडरशिप में उन्होंने वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस लड़ी।
Speaker A
ब्रिटिश को भगाया और उन्होंने खुद ही खिलाफत को अबॉलिश कर दिया और सेकुलर रिपब्लिक बना दिया तुर्की को। यहां पे जो मुसलमान प्रोटेस्ट कर रहे थे कि खिलाफत किसी तरह बच जाए। उनके लिए ये बहुत ही अजीब सी बात थी। एक किस्म का धोखा था कि
Speaker A
यार हम तो लड़ रहे थे खिलाफत के लिए। एक तुर्क लीडर ने खुद ही खिलाफत खत्म कर दी। तो वो खिलाफत मूवमेंट भी पूरी की पूरी खत्म हो गई। उसके पैरेलल गांधी की अपनी नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट भी चल रही थी।
Speaker A
जिसमें उन्होंने टोटल बॉयकॉट किया था कि ब्रिटिश का कोई सामान नहीं लेना। उनके कोई गुड्स हमने नहीं लेने। उनके स्कूल्स में नहीं जाना। उनकी कोर्ट्स में हमें नहीं जाना। लेकिन ये सारी जो प्रोटेस्ट हैं ये नॉन वायलेंट होनी चाहिए। अहिंसा पसंद थे
Speaker A
वो। उनका मानना यह था कि सिर्फ पीसफुल रेजिस्टेंस से ही इंडिया को आजादी मिलेगी। लेकिन ग्राउंड रियलिटी बिल्कुल ही कुछ और थी। 4 फरवरी को होता है चौरीचौरा इंसिडेंट। उत्तर प्रदेश में चौरीचौरा एक छोटा सा टाउन है जहां पर यह प्रोटेस्ट चल
Speaker A
रहा था। वहां पर पुलिस वालों ने जो प्रोटेस्टर्स थे आम लोग उन पर फायर खोल दी। जब पुलिस ने गोलियां चलाना शुरू की तो प्रोटेस्टर्स ने भी रिटेलिएट किया। पुलिस वालों को उन्होंने काबू करने की कोशिश की और पुलिस वाले भाग के पुलिस स्टेशन में
Speaker A
छुप गए। जज्बात में आके उन प्रोटेस्टर्स ने पूरे के पूरे पुलिस स्टेशन को ही आग लगा दी। 22 पुलिस ऑफिसर्स मारे गए। तो जो गांधी की नॉन वायलेंस की पॉलिसी थी, लोग उसको कंप्लीटली भूल गए। यह इंसिडेंट गांधी
Speaker A
के लिए बहुत बड़ा शौक था। उन्होंने यह नॉन कोऑपरेशन की मूवमेंट को ही बंद कर दिया। उन्हें समझ आ गई कि इंडियंस आर नॉट रेडी फॉर दिस। उनको समझ आ गई कि आवाम का गुस्सा इतना ज्यादा है कि वो ये प्रिंसिपल्स नहीं
Speaker A
देखेंगे। अब कॉन्स्टिट्यूशनल रिफॉर्म्स इतने धीमे-धीमे चल रहे थे कि हिंदुस्तानियों को समझ आ गई कि यह और कुछ नहीं है। सिर्फ ब्रिटिश के झूठे वादे हैं। हिंदुस्तान के नौजवानों में गुस्सा और बढ़ने लगा और उन्होंने फैसला ले लिया कि
Speaker A
अब आजादी हाथ पर हाथ रख के बैठने से नहीं मिलने वाली हथियार उठाने पड़ेंगे। इसी जज्बे से जन्म लिया एक बागी ग्रुप ने एच एसआरए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन और इसके सबसे अहम मेंबर्स में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु सुखदेव
Speaker A
शामिल थे। इस ग्रुप का मकसद एक ही था कि ब्रिटिश को नुकसान पहुंचाना और हिंदुस्तान के आम लोगों की आवाज पूरी दुनिया तक पहुंचाना। एचएसआरए ने जो एकशंस लिए वो बहुत बोल्ड थे। 1925 में उन्होंने काकुरी में एक ट्रेन लूटी। यह ब्रिटिश ट्रेन थी
Speaker A
जहां पर ब्रिटिश के लिए सामान जा रहा था। उस सारे सामान को बेच के उन्होंने उससे हथियार भी ले लिए। फिर दूसरा बागी एक्शन जो है वो लाहौर कास्परेसी के नाम से मशहूर है। जब भगत सिंह और उसके साथियों ने
Speaker A
असेंबली में स्मोक बॉम्ब्स फेंक दिए और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाना शुरू कर दिए। उनका यह कहना था कि यह बॉम्ब किसी की जान लेने के लिए नहीं थे बल्कि हिंदुस्तान की आवाम को उठाने के लिए, जगाने के लिए
Speaker A
थे। लेकिन इन सारे एकशंस का रिएक्शन तो होना ही था। भगत सिंह को जब गिरफ्तार किया गया तो ही वाज़ जस्ट 23 इयर्स ओल्ड। 1931 में उसको फांसी आई। अफसोस की बात यह है कि बहुत सारे लोग भगत सिंह के बारे में जानते
Speaker A
ही नहीं है। खासतौर पर पाकिस्तान में। 1927 में ब्रिटिश ने यह फैसला लिया कि एक कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क बनाते हैं और उसकी जिम्मेदारी उन्होंने दी सर जॉन साइमन को। अब मसला यह था कि जो साइमन कमीशन हुआ उसमें कोई भी हिंदुस्तानी शामिल था ही
Speaker A
नहीं। सोचो एक मुल्क है जहां पे करोड़ों लोग रहते हैं। उनके मुस्तकबिल का फैसला हो रहा है। कॉन्स्टिट्यूशन बन रहा है उनके लिए। लेकिन उनकी रिप्रेजेंटेशन जीरो है। आवाम का गुस्सा और बढ़ने लगा और यह कमीशन जहां भी जाता लोग प्रोटेस्ट करते और नारे
Speaker A
लगाते साइमन गो बैक। पूरे हिंदुस्तान में यह नारा गूंज रहा था। साइमन गो बैक। इसी बैकड्रॉप में कांग्रेस ने यह सोचा कि बजाय कि हम ब्रिटिश के पीछे पड़े रहें कि हमें कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क बना के दें। क्यों ना यह काम हम खुद करें और कांग्रेस
Speaker A
ने इसकी जिम्मेदारी डाली मोतीलाल नेहरू पर। इस तरह बनी मशहूर जमाना नेहरू रिपोर्ट। नेहरू रिपोर्ट में जो सबसे मेन इंपॉर्टेंट डिमांड थी वो यही थी कि इंडियंस को सेल्फ गवर्नमेंट का हक दिया जाए। अंडर द ब्रिटिश कॉमनव्थ। अगेन
Speaker A
बिल्कुल उसी तरह एक डोमिनियन स्टेटस मांग रहे थे जैसे ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के पास था। और इस रिपोर्ट में यह भी था कि एक सेंट्रल गवर्नमेंट चाहिए जो स्ट्रांग होनी चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा मसला इस रिपोर्ट का यह था मुस्लिम्स के लिए कि इस रिपोर्ट
Speaker A
के हिसाब से मुस्लिम्स का जो सेपरेट इलेक्टोरेट था नेहरू ये कह रहे थे कि उसको खत्म कर दो। यह मुसलमान मुसलमान के लिए जो वोट कर दे सिर्फ इसको खत्म करो और एक जॉइंट इलेक्टेट होना चाहिए। अब यह बात
Speaker A
मुस्लिम लीग के लीडर्स को बिल्कुल भी कबूल नहीं थी। उनका वही फियर था, वही कंसर्न था कि हिंदू मेजॉरिटी है और मुसलमान जो है वो मार्जिनलाइज हो जाएंगे। और उसी के रिएक्शन में ही कायदे आजम मोहम्मद अली जना ने अपने
Speaker A
मशहूर 14 पॉइंट्स सामने रखे। अब यहीं पे कायदे आजम और नेहरू का जो डिफरेंस ऑफ़ ओपिनियन था वो सामने आ चुका था। जिन्ना साहब का मानना यह था कि अगर सेल्फ गवर्नमेंट का मिल जाता है हक तो फिर इस
Speaker A
गवर्नमेंट को फेडरेशन सिस्टम होना चाहिए। और जो प्रोविंसेस हैं उनके पास अपनी ऑटोनोमी होनी चाहिए ताकि वो अपना कल्चर वो अपना रिलीजन खुद ही से प्रैक्टिस करें। किसी सेंट्रल हिंदू डोमिनेटेड गवर्नमेंट का उन पर कोई दबाव ना आ सके और वह इस बात
Speaker A
पे कायम थे कि मुसलमानों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट हो। मगर नेहरू का जो मानना था वो बिल्कुल ही अलग था। उसका यह कहना था कि इस वक्त सबसे बड़ा जो थ्रेट है वो है ब्रिटिश। तो अभी हमें सेंट्रल गवर्नमेंट
Speaker A
की जरूरत है जो स्ट्रांग हो। अगर फेडरेशन वाले सिस्टम पे गए तो हिंदुस्तान बिखर जाएगा। यूनिटी कमजोर हो जाएगी। यानी एक तरफ थे जिन्ना जो मुस्लिम आइडेंटिटी को सेफगार्ड करना चाहते थे और दूसरी तरफ थे नेहरू जो एक यूनाइटेड स्ट्रांग इंडिया का
Speaker A
ख्वाब देख रहे थे और यह दो चीजें एक साथ तो हो नहीं सकती थी। उसके बाद अंग्रेजों ने एक और नाजायजी यह की कि नमक जैसी रोजमर्रा में काम आने वाली चीज पर भारी भरकम टैक्स लगा दिया। अब सोचिए नमक मतलब
Speaker A
हर घर की बुनियादी जरूरत है उस पर इतना टैक्स लगा दिया कि वैसे ही जो जिंदगी मुश्किल थी हिंदुस्तानियों की वो और मुश्किल हो गई। इस जुल्म के जवाब में गांधी ने साल्ट मार्च शुरू की। यह एक सिविल डिसओबिडियंस की मूवमेंट थी। सबमती
Speaker A
आश्रम से गांधी ने पैदल चलना शुरू किया। 390 कि.मी. का सफर उन्होंने किया। 24 दिन लगे रास्ते में बहुत सारी जगहों पर गए। जो भी उनको मिला उनको इनकरेज किया कि वो उनके साथ जुड़ जाए और लोग भी उनके साथ जुड़ते
Speaker A
गए। बहुत सारे लोगों के साथ 309 कि.मी. पार करने के बाद वो पहुंचे गुजरात के शहर दांडी। वहां जाके समंदर के किनारे पे वह खड़े हो गए और उन्होंने अपने हाथ से नमक उठाया। अब यह जो एक्ट था, यह बहुत
Speaker A
सिंबॉलिक था क्योंकि किसी भी हिंदुस्तानी को खुद से नमक बनाने की या कलेक्ट करने की इजाजत नहीं थी ब्रिटिश से। अंग्रेज घबरा गए और उन्होंने कांग्रेस के बाकी लीडर्स के साथ-साथ गांधी को भी अरेस्ट कर लिया। अब इस अनरेस्ट के दौरान लंदन में पहली
Speaker A
राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस होती है। जिसमें ब्रिटिशर्स ने सोचा कि अब हम एक कॉन्स्टिट्यूशन फ्रेमवर्क बना के दे ही देते हैं भाई। लेकिन इस कॉन्फ्रेंस का कांग्रेस ने खुला बॉयकॉट कर दिया। क्योंकि उनके सारे लीडर्स जेल में थे। उनकी
Speaker A
रिप्रेजेंटेशन थी ही नहीं। तो उस कॉन्फ्रेंस में कुछ माइनॉरिटी ग्रुप्स थे और प्रिंसली स्टेट्स थी। इतनी बड़ी पार्टी कांग्रेस थी ही नहीं तो उसका रिजल्ट भी कोई निकला ही नहीं। गांधी के जेल से रिलीज होने के बाद गांधी की लॉर्ड अरविंद से
Speaker A
मुलाकात हुई और यहां पे एक पैक्ट साइन हुआ गांधी अरविंद पैक्ट 1931 इस फैक्ट के हिसाब से जो अंग्रेजों की मोनोपोली थी सॉल्ट पर वो उनको तोड़नी पड़ी। अब आम जो हिंदुस्तानी था वो नमक कलेक्ट कर सकता था
Speaker A
और नमक बना सकता था। आखिरकार उनको गांधी की बात माननी पड़ी और वो इस बात पर भी एग्री कर गए कि अगर कोई पीसफुल तरीके से बॉयकॉट हो रहा है तो उसको हम होने देंगे। इसके बाद फिर जो सेकंड राउंड टेबल
Speaker A
कॉन्फ्रेंस हुई उसमें कांग्रेस मौजूद थी लेकिन उसका भी आउटकम कुछ खास निकला नहीं। फिर थर्ड राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस हुई उसका भी कोई खास फायदा नहीं हुआ। मसला यह था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग किसी एक पेज पर आ
Speaker A
ही नहीं रहे थे। इन दोनों के पॉलिटिकल गोल्स भी डिफरेंट थे और उनके जो फियर्स थे उन्होंने भी रास्ते अलग-अलग कर दिए थे। आखिर में ब्रिटिश ने खुद से एक कॉन्स्टिट्यूशन फ्रेमवर्क दिया गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935। अब इसके हिसाब से जो
Speaker A
प्रोविंसेस थे उनको ऑटोनोमी भी मिली और उनको नई मिनिस्ट्रीज बनाने की इजाजत भी मिली और इस कॉन्स्टिट्यूशन ने फेडरल सिस्टम जो है वो प्रपोज किया कि जो प्रिंसली स्टेट्स हैं और जो सूबे हैं प्रोविंसेस ये मिलके फेडरेशन बनाएंगे।
Speaker A
लेकिन ये जो फेडरेशन वाली स्कीम थी ये पूरी तरह से इंप्लीमेंट हुई ही नहीं कभी क्योंकि जो प्रिंसली स्टेट्स थे वो फेडरेशन को ज्वाइन करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन फिर भी यह एक अच्छा खासा माइलस्टोन तो था क्योंकि पहली दफा
Speaker A
अंग्रेजों ने सेल्फ गवर्नमेंट की एक सब्सटैंशियल पावर जो है वो हिंदुस्तानियों को दे दी थी। पूरा अख्तियार अभी भी उनके पास ही था। मेन डिपार्टमेंट्स अभी भी वो अपने ही कंट्रोल में रखे हुए थे। 1937 के जो इलेक्शंस थे वो हिंदुस्तान के लिए एक
Speaker A
टर्निंग पॉइंट साबित हुए। क्योंकि अब जो सूबे थे उनको ऑटोनोमी मिल चुकी थी। वो अपनी-अपनी गवर्नमेंट बना सकते थे। इस इलेक्शन में कांग्रेस ने बहुत बड़ी सक्सेस हासिल की। ज्यादातर प्रोविंसेस में कांग्रेस ने मेजॉरिटी हासिल करके अपनी गवर्नमेंट्स बना ली और अपने आप को एक
Speaker A
नेशनल लेवल की पार्टी जो है उसने प्रूव कर दिया। कांग्रेस का ये क्लेम जो वो प्रूव करना चाह रहे थे कि वो सिर्फ हिंदुओं की पार्टी नहीं है बल्कि मुसलमानों की भी है। इस बात को वो प्रूफ करने में टेक्निकली
Speaker A
सक्सेसफुल साबित हुए। लेकिन दूसरी तरफ जो मुस्लिम लीग थी उसका हाल बिल्कुल ही अलग था। सिर्फ 4.4% वो वोट्स हासिल कर सकी थी। इवन जो अपने मुस्लिम मेजॉरिटी प्रोविंसेस हैं उनमें भी लोगों ने मुस्लिम लीग को वोट नहीं किए थे। या तो रीजनल मुस्लिम पार्टीज
Speaker A
को वोट किए या फिर इंडिपेंडेंट कैंडिडेट्स को वोट किए। यानी मुस्लिम लीग अपने ही इलाकों में एक स्ट्रांग पोजीशन नहीं बना पाई। कायदे आजम इस वक्त तक समझ चुके थे कि मुस्लिम लीग जो है वो अपने ही मुसलमान
Speaker A
लोगों के दिलो दिमाग में अभी तक घर नहीं कर पाई। वो बहुत कमजोर है। सबसे बड़ा पॉलिटिकल ड्रामा तो हुआ यूपी में। वहां पर भी जो जनरल सीट्स थी वो तो कांग्रेस ले गई जो मेजॉरिटी हिंदू थी। लेकिन जो मुस्लिम
Speaker A
रिजर्व सीट्स थी वो तो मुसलमानों के पास ही आ गई। तो मुस्लिम लीग ने कांग्रेस को यह प्रपोज किया कि मिलके गवर्नमेंट बना लेते हैं। कोइलिशन वाली गवर्नमेंट बना लेते। लेकिन कांग्रेस ने क्लियरली इस बात को रद्द कर दिया। उन्होंने कहा नहीं।
Speaker A
मुस्लिम लीग के लोग जब तक इंडिविजुअली कांग्रेस का हिस्सा नहीं बनेंगे उनको मिनिस्ट्रीज नहीं दी जाएंगी। अब ये बात मुस्लिम्स के लिए बिल्कुल नागवारा थी। जिना के लिए तो ये एक आई ओपनर था। उन्होंने कहा कि यार जब मुसलमान और हिंदू
Speaker A
मिलके हम चाह रहे हैं कोई कोई गवर्नमेंट बना लें तो यह डायरेक्ट ही रिजेक्ट कर रहे हैं और यह तो फेडरेशन अभी सिस्टम है। अगर सेंट्रल गवर्नमेंट बन गई और वो इसी तरह मेजॉरिटी सिस्टम में हिंदुओं की रही
Speaker A
डोमिनेटेड तो कांग्रेस तो मुसलमानों की जो पॉलिटिकल आइडेंटिटी है उसको तो बिल्कुल इग्नोर कर देगी। ये जो मुस्लिम लीग का शुरू से ले डर था वो और मजबूत हो गया। 1937 के इलेक्शंस के बाद जिन्ना साहब की टोन भी बदल गई थी। उनको यह समझ आ गया था
Speaker A
कि अब मुस्लिम लीग को स्ट्रांग करना पड़ेगा। अब आरनी यह देखें कि अगर कांग्रेस उस टाइम अग्री कर देती, कॉम्प्रोमाइज कर देती और एक कोिलिशन में एक गवर्नमेंट बना लेती तो शायद पाकिस्तान कभी बनता ही ना। सितंबर 1939 में जब वर्ल्ड वॉर टू शुरू
Speaker A
हुई तो ब्रिटिश हुकूमत ने बिना किसी से कंसल्ट किए, बिना कांग्रेस से बात किए यह ऐलान कर दिया कि अब इंडिया भी एलाइड पावर्स के साथ मिलके ब्रिटिश का साथ देगा और इस वर्ल्ड वॉर टू में हिस्सा लेगा और
Speaker A
लड़ेगा। कांग्रेस इस बात से बहुत नाराज हुई क्योंकि वह अपने आप को हिंदुस्तान की पूरी आवाम का इलेक्टेड रिप्रेजेंटेटिव समझते थे। और इतना बड़ा फैसला हो गया जो ब्रिटिश गवर्नमेंट खुद ही ले रही है बिना उनसे कंसल्ट किए। कांग्रेस ने ब्रिटिश की
Speaker A
इस हरकत को काउंटर करने के लिए इन प्रोटेस्ट अपने प्रोविंसेस में जो उनकी मिनिस्ट्रीज थी उनसे रिजाइन करना शुरू कर दिया। एक तरह से कांग्रेस ने खुद ही प्रोविंशियल पावर्स जो थी अपनी वो छोड़ दी ताकि ब्रिटिश पर प्रेशर डल सके। लेकिन इस
Speaker A
मूव का एक उल्टा असर हुआ। जहां भी कांग्रेस अपनी मिनिस्ट्रीज छोड़ रही थी, तो वहां पे एक पॉलिटिकल वैक्यूम क्रिएट हो रहा था और यह जो स्पेस है, इसको फिल करने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम लीग अपना इन्फ्लुएंस बढ़ाने लग गई। जिन्ना साहब ने
Speaker A
इस इंसिडेंट को एक पॉलिटिकल ओपोरर्चुनिटी की तरह लिया। उन्होंने ब्रिटिश को यह ऑफर की कि अगर आप मुसलमानों के राइट्स की गारंटी देते हैं तो हम आपका इस जंग में साथ देंगे। अब क्योंकि ब्रिटिश को कांग्रेस तो पहले ही बॉयकॉट कर चुकी थी और
Speaker A
प्रोटेस्ट में थी तो उनको हिंदुस्तान से कोई ना कोई रिलायबल अलाय तो चाहिए था। इसी बैकग्राउंड में मार्च 1940 को लाहौर रेज़ोल्यूशन होता है जिसको पाकिस्तान रेज़ोल्यूशन भी कहते हैं। यह रेज़ोल्यूशन यह कहता है कि जो नॉर्थ वेस्ट में मुस्लिम
Speaker A
मेजॉरिटी रीजंस हैं सिंध, पंजाब, बलूचिस्तान, एनडब्ल्यूएफपी इनको और जो नॉर्थ ईस्ट में मुस्लिम मेजॉरिटी रीजंस हैं जैसे बंगाल और आसाम के कुछ इलाके इनको इंडिपेंडेंट स्टेट्स होना चाहिए। क्योंकि यहां पे मेजॉरिटी मुसलमानों की है। तो फिर मुसलमानों को हक होना चाहिए। कि वो अपने
Speaker A
रिलीजियस और कल्चरल प्रैक्टिससेस जो भी है वो अपने हिसाब से कर सके। पॉलिटिक्स भी अपने हिसाब से वो कर सके। लेकिन पॉइंट यहां पे नोट करने वाली यह है कि इस रेजोल्यूशन में इंडिपेंडेंट मुस्लिम स्टेट्स की बात की गई है। प्लूरल में एक
Speaker A
मुल्क की बात नहीं की गई। इसमें कहीं भी पाकिस्तान का लफ्ज नहीं यूज़ हुआ था। लेकिन आहिस्ताआहिस्ता जो मुस्लिम लीग के लीडर्स थे और फॉलोअर्स थे उन्होंने इसको इंटरप्रेट किया एक मुल्क की तरह। इस रेजोल्यूशन से तो क्लियर हो गया कि जो
Speaker A
कांग्रेस और मुस्लिम लीग है इनके बीच फासला इतना हो गया है कि अब कोई ब्रिज नहीं बन सकता। यानी 1939 में जो कांग्रेस ने मिनिस्ट्री से रिजाइन किया और 1940 का जो ये लाहौर का रेज़ोल्यूशन हुआ इन दोनों
Speaker A
इंसिडेंट्स ने बेसिकली पाकिस्तान मूवमेंट का रास्ता सीधा कर दिया। 1942 में वर्ल्ड वॉर के दौरान ब्रिटेन के हालात काफी नाजुक हो गए थे। वहां से जैपनीज फोर्सेस एशिया तक आ गई थी। बर्मा तक पहुंच गई थी। लंदन को यह डर लगने लग गया कि अगर हिंदुस्तान
Speaker A
में हमें सपोर्ट नहीं मिली तो यहां से एक वॉर फ्रंट जो है हमारा वो कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए प्राइम मिनिस्टर विंस्टन चर्चल ने मार्च 1942 को एक शख्स के कंधों पर जिम्मेदारी डाली उसको एक स्पेशल मिशन देके इंडिया भेजा। उस शख्स का नाम था सर
Speaker A
स्टेफर्ड क्रिप्स और मिशन का नाम था क्रिप्स मिशन। क्रिप्स का काम यह था कि मुस्लिम लीग को, कांग्रेस को और बाकी जो ग्रुप्स थे उनको एक ऐसी ऑफर देना जिस पर वह ब्रिटिश का साथ देने लग जाए इस जंग
Speaker A
में। प्रपोज उसने यह किया कि अभी तो जंग चल रही है। इस जंग में हमें हिंदुस्तान की सपोर्ट चाहिए। लेकिन जैसे ही जंग खत्म हो जाएगी तो हम हिंदुस्तानियों को सेल्फ गवर्नमेंट की इजाजत दे देंगे। यानी उनको डोमिनियन स्टेटस जो कब से मांग रहे थे
Speaker A
खासतौर पर कांग्रेस उनको वो मिल जाएगा। फिर हिंदुस्तानी खुद ही अपने इंटरनल अफेयर्स डिसाइड कर रहे होंगे। लेकिन यह सब ऑफ कोर्स अंडर द ब्रिटिश कॉमनव्थ होगा। साथ ही इस प्रपोजल में एक और क्लॉज़ था वो ये था कि जो प्रोवेंसेस हैं उनके पास
Speaker A
ऑप्शन है। अगर तो वो इंडियन यूनियन के साथ रहना चाहते हैं तो ठीक है। नहीं तो वो अपनी भी कोई कॉन्स्टिट्यूशनल अरेंजमेंट कर सकते हैं। पहली नजर में तो यह बहुत बड़ी कंसेशन लग रही थी। लेकिन कांग्रेस ने इसको
Speaker A
साफ-साफ मना कर दिया। गांधी का यह कहना था कि यह जो ब्रिटिश के वेग प्रॉमिससेस हैं, वह यह कभी पूरे नहीं करने वाले। उन्होंने ठान ली थी कि अब चाहिए आजादी और वह चाहिए अभी। जब क्रिप्स मिशन फेल हो गया, तो
Speaker A
गांधी ने अपने फॉलोअर्स को क्लियरली बता दिया कि अब डू और डाई वाला हिसाब है। तो उन्होंने एक मूवमेंट चलाई जिसको कहते हैं क्विट इंडिया मूवमेंट। कांग्रेस वर्किंग पार्टी ने अगस्त 1942 को यह नारे लगाना शुरू कर दिए कि ब्रिटिश क्विट इंडिया।
Speaker A
गांधी वास वेरी क्लियर कि या तो अब ब्रिटिश खुद से हिंदुस्तान को छोड़ के चले जाएंगे या फिर लोग सिविल डिसओबिडियंस करने लग जाएंगे और एक जंग छिड़ जाएगी। ब्रिटिश का रिएक्शन इस पर बहुत तेज था। जैसे ही
Speaker A
मूवमेंट का आगाज हुआ उन्होंने जितने भी टॉप के लीडर्स थे कांग्रेस के इंक्लूडिंग गांधी, नेहरू, पटेल सबको जेलों में डाल दिया। अब लीडरशिप के बगैर प्रोटेस्ट हो रहे थे और जो लोग थे, जो फॉलोअर्स थे वो और भड़क गए। उन्होंने रेलवे लाइंस तोड़
Speaker A
दी। तो उन्होंने बिल्डिंग्स जो गवर्नमेंट बिल्डिंग्स थी उनको जलाना शुरू कर दिया। कांग्रेस ने तो डिसाइड किया था कि ये नॉन वायलेंट प्रोटेस्ट होंगी लेकिन दंगे फसाद शुरू हो गए। पुलिस ने गोलियां चलाना भी शुरू कर दी और इन सारी प्रोटेस्ट में बहुत
Speaker A
सारे लोग मारे भी गए और गिरफ्तार भी हो गए। अब इस वक्त क्योंकि कांग्रेस के टॉप लीडर्स जो थे वो सारे जेलों में थे। तो मुस्लिम लीग ने इस सिचुएशन को एक चांस की तरह लिया। जिन्ना साहब का यह मानना था कि
Speaker A
यह जो टाइम है यह ब्रिटिश के साथ कंफ्टेशन करने का टाइम नहीं है बल्कि मुसलमानों को अपने गोल्स पर फोकस करना चाहिए। अब कांग्रेस तो वैसे ही बॉयकॉट कर रही थी और ब्रिटिशर्स को कोई तो हिंदुस्तान में एक
Speaker A
एलय चाहिए था तो नेचुरली उनकी इंक्लिनेशन भी मुस्लिम लीग की तरफ चली गई। यहां से मुस्लिम लीग ने अपनी पोजीशन को और मजबूत बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने यहां से अपने आप को एस्टैब्लिश करना शुरू कर दिया एस सोल रिप्रेजेंटेटिव ऑफ इंडियन
Speaker A
मुस्लिम्स। यानी कांग्रेस का ये जो बॉयकॉट था और जो उसका रिब्रेशन था इसके बीच में ये जो स्पेस मिली है उस स्पेस में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने सबसे ज्यादा अपने आप को पावरफुल किया। अपना नेटवर्क बढ़ाया उसको एक्सपेंड किया और पाकिस्तान का ये जो
Speaker A
आईडिया था उसको भी प्रोपगेट किया। तो क्रिप्स मिशन का फेलियर और गांधी का जो क्विट इंडिया मूवमेंट थी ये दोनों चीजें मुस्लिम लीग के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो गई। क्योंकि जब स्ट्रांग अपोजिशन नहीं थी तो उस वक्त टाइम मिल गया अपने आप
Speaker A
कोस्टैब्लिश करने का। 1945 में जब वर्ल्ड वॉर टू खत्म हुई तो ब्रिटिश हुकूमत को यह तो समझ आ गई कि अब जो है इस इतने बड़े सबक्टिनेंट पे हुकूमत कायम रखना मुश्किल हो गया है क्योंकि अब उनके पास कोई
Speaker A
रिसोर्सेज नहीं बचे थे ना पैसा बचा था इकॉनमी उनकी तकरीबन तबाह हो गई थी। अब उनका फोकस था निकलने का लेकिन एक नेगोशिएटेड ट्रांसफर ऑफ़ पावर तो करनी थी और वो भी इस तरह करनी थी कि उनकी स्ट्रेटजी के हिसाब से भी और जो पार्टीज
Speaker A
हैं वो भी खुश हो जाए। तो उन्होंने कराए इलेक्शन 1945 और 46 के जो इलेक्शन हुए इसमें बिल्कुल दूध का दूध पानी का पानी हो गया। ये इलेक्शन जो थे ये सेंट्रल और प्रोविंशियल असेंबलीज के लिए थे। अब इसमें
Speaker A
कांग्रेस और मुस्लिम लीग का जो कम्युनल डिवाइड था वो क्लियर हो गया और समझ आ गई कि यह अब इररिवर्सिबल है। क्योंकि कांग्रेस ने जितने भी नॉन मुस्लिम रीजंस थे उनमें मेजॉरिटी हासिल कर ली। फिर जो मुस्लिम रिजर्व सीट्स थी उसमें मुस्लिम
Speaker A
लीग ने क्लीन स्वीप कर दिया। अब तकरीबन हिंदुस्तान के 85 टू 90% जो मुसलमान थे वो मुस्लिम लीग को सपोर्ट कर रहे थे। अब देखें 4.4% से लेके यह नंबर 90% तक पहुंच गया। इतनी पावरफुल हो गई मुस्लिम लीग। तो
Speaker A
ये एक पॉलिटिकल जैकपॉट था। अब मुस्लिम लीग जो थी वो खुल के कह सकती थी कि वो ही एक पार्टी है जो पूरे इंडिया के मुसलमानों को रिप्रेजेंट कर रही है। और यह नंबर्स देख के तो कांग्रेस भी इंकार नहीं कर सकती थी।
Speaker A
अब इस डेडलॉक को तोड़ने के लिए 1946 में आया कैबिनेट मिशन प्लान। अब इस मिशन प्लान के हिसाब से होना यह था कि पहले तो इंडिया को एक फेडरेशन बनना था और प्रोविंसेस के तीन ग्रुप बनने थे। ग्रुप ए जिसमें हिंदू
Speaker A
मेजॉरिटी प्रोविंसेस थे। यूपी, बिहार, मद्रास, बॉम्बे वगैरह। फिर आता है ग्रुप बी। ग्रुप बी जिसमें नॉर्थ वेस्ट के मुस्लिम मेजॉरिटी प्रोविंसेस आ जाते हैं। सिंध, बलूचिस्तान, एनडब्ल्यूएफपी और पंजाब। फिर आता है ग्रुप सी जिसमें ईस्टर्न मुस्लिम मेजॉरिटी बंगाल और आसाम आ
Speaker A
जाते हैं। हर ग्रुप के पास अपनी ऑटोनमी होगी। इंटरनल मैटर्स वो खुद ही सॉल्व करेंगे। हां लेकिन फॉरेन अफेयर्स है, डिफेंस है, कम्युनिकेशन है ये जो चीजें हैं बड़ी ये पावर सेंटर के पास रहेंगी। एक और इसमें जो इंटरेस्टिंग क्लॉज़ था वो था
Speaker A
ऑप्शन टू क्विट। यानी प्रॉमिसेस जो है वो शुरू में तो इस फेडरेशन का हिस्सा होंगी। लेकिन अगर आगे जाके वो चाहें तो इससे एग्जिट भी ले सकती है। यानी इस जो यूनियन है उससे अलग होके वो अपनी हुकूमत भी बना
Speaker A
सकते हैं। अगेन कांग्रेस को ये नहीं था कबूल क्योंकि कांग्रेस शुरू से लेके ये चाह रही थी कि एक सेंट्रल गवर्नमेंट होनी चाहिए जो स्ट्रांग हो और ये जो फेडरल सिस्टम है ये उनको नहीं था कबूल क्योंकि उनका डर ये था एक तो इस तरह पाकिस्तान का
Speaker A
ये जो बीज है वो हम बो देंगे। ये जो मुस्लिम मेजॉरिटी स्टेट्स बनेंगी ये फिर अपने तरीके से चलने लग जाएंगे। इन पे सेंट्रल की कोई से ही नहीं होगी। तो शुरू में तो मुस्लिम लीग ने इसको कबूल कर लिया
Speaker A
था। लेकिन फिर जब कांग्रेस ने यह बात आगे जाके रखी तो फिर मुस्लिम लीग ने भी अपने हाथ पीछे कर दिए। और फिर आया इंडियन हिस्ट्री में एक और खौफनाक दिन डायरेक्ट एक्शन डे। कैबिनेट मिशन के फेल होने के बाद जिना
Speaker A
साहब ने हिंदुस्तान के जितने भी मुसलमान थे उनको यह कहा था कि अब अपने घरों से बाहर निकलो और अब हमने डिमांड करनी है अपने सेपरेट होमलैंड की। अब हमें अलग एक वतन चाहिए तो उसके लिए आवाज उठाओ और
Speaker A
ब्रिटिश पे प्रेशर डालो। अब हुआ ये कि ये जो प्रोटेस्ट हो रहे थे वो अनफॉर्चूनेटली दंगों में बदल गए। यहां पर कम्युनल राइट्स हो गए। लोगों ने घर जलाने शुरू कर दिए। हिंदुओं के मॉब्स और मुसलमानों के मॉब्स
Speaker A
आपस में लड़ने लग गए। इतनी तबाही मच गई कि सिर्फ कोलकाता के शहर में 4000 लोगों की जाने चली गई और हजारों लोग जख्मी हो गए। और फिर यह वायलेंस यहां पे रुका नहीं। यह बंगाल में भी हुआ, बिहार में भी हुआ,
Speaker A
नौखैली में भी हुआ और पंजाब में भी हुआ। इस अनफॉर्चूनेट दिन के इंसिडेंस की वजह से यह तो क्लियरली समझ आ गई कि अब पीसफुल को एकिस्टेंस जो है इन दोनों कम्युनिटीज़ के बीच में इंपॉसिबल हो चुका है। और यह एक
Speaker A
किस्म की ब्रिटिश के लिए भी वार्निंग थी कि अगर वो और डिले करते गए पावर ट्रांसफर करने में, तो हिंदुस्तान में एक बहुत बड़े लेवल पर सिविल वॉर शुरू हो जाएगी। इसी बैकड्रॉप में 3 जून 1947 को माउंटबेटन
Speaker A
प्लान अनाउंस होता है और उस प्लान के हिसाब से हिंदुस्तान को दो मुल्कों में डिवाइड करना था। एक बना इंडिया भारत और दूसरा पाकिस्तान जो दो हिस्सों पे मुश्तमिल था। एक वेस्ट पाकिस्तान, आज का पाकिस्तान और एक ईस्ट पाकिस्तान जो आगे
Speaker A
चलके 1971 में बांग्लादेश बना और साथ ही जो प्रिंसली स्टेट्स हैं उनको ऑप्शन दी जाएगी कि वो इंडिया के साथ जाना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं। फाइनली 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान को आजादी मिली। 15 अगस्त 1947 को इंडिया को
Speaker A
आजादी मिली। आप आजाद हैं। आजाद रहें। आप लोग इस मुल्क पाकिस्तान में अपनेप इबादत गांव, मस्जिदों या मंदिरों में जाने के लिए। लेकिन ये जो पार्टीशन हुई इसकी वजह से बहुत बड़े क्राइसिस भी उठे और सबसे बड़ा क्राइसिस था
Speaker A
मैस इमीग्रेशन का। तकरीबन डेढ़ करोड़ लोगों ने अपनी पुरखों की जमीन छोड़ी, अपने घर छोड़े, अपनी जायदाद छोड़ी, अपने पैसे छोड़े, सब कुछ छोड़ा और वो एक नए मुल्क की तरफ चल पड़े। कुछ हिंदुस्तान से पाकिस्तान, कुछ पाकिस्तान से हिंदुस्तान
Speaker A
और यह मैस माइग्रेशन कोई पीसफुल तरीके से नहीं हुई। यह सफर खून से भर गए। एस्टीमेट्स के मुताबिक इन मेस माइग्रेशंस में होने वाले कम्युनल राइट्स की वजह से 10 लाख लोग कत्ल हो गए। पूरे के पूरे गांव
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जल गए। ट्रेंस जब आती थी रेफ्यूजीस से भरी हुई तो एक भी बंदा उनमें जिंदा नहीं होता था। घोस्ट ट्रेंस कहने लगे थे उन्हें। पूरी की पूरी कम्युनिटीज खत्म हो गई थी। और यह सब इतना सडन हुआ, इतना वायलेंट हुआ
Speaker A
कि उस दौर में समझ नहीं आती थी कि आजादी की खुशी मनाई जाए या इस ट्रेजडी पर रोया जाए। तो दोस्तों, यह आजादी किसी महफिल का गीत नहीं है। यह आजादी खून के दरियाओं को पार करके मिली है। आजादी मिली तो है,
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लेकिन इस आजादी की कीमत बहुत भारी है। जिनमें मांओं की चीखें हैं, बहनों की आंसू हैं और बच्चों की लाशें भी हैं। यह वो कीमत है जो इस धरती ने चुकाई है। तो अब आप जब भी आजादी का जश्न मनाए, तो परचम लहराने
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के साथ-साथ जिन लोगों ने इस पर कुर्बानियां दी हैं उनको भी याद रखना। इस वतन पे फक्र करना, इसकी हिफाज़त करना, इसके लिए बेहतरीन सोचना, इसके लिए बेहतरीन करना, इसमें अगर कुछ गलत हो रहा हो तो उस पर तनकीद करना और उसको बेहतर बनाना यह सब
Speaker A
हमारा फर्ज है। पाकिस्तान जिंदाबाद।
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