गांधी की जीवन की विवादित पहलुओं और उनके विचारों की जटिलता पर आधारित एक विश्लेषण।
Key Takeaways
- गांधी एक जटिल और विवादित व्यक्तित्व थे, जिनमें महानता और कमियां दोनों थीं।
- उनके विचार और व्यवहार समय के साथ विकसित हुए, लेकिन कुछ विवाद आज भी जारी हैं।
- गांधी ने नॉन-वायलेंस को वैश्विक राजनीतिक उपकरण बनाया।
- उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत जिंदगी में नैतिकता की उच्च अपेक्षाएं थीं, जो विवादों का कारण बनीं।
- इतिहासकार गांधी को केवल महात्मा के रूप में नहीं, बल्कि एक मानव के रूप में देखने की सलाह देते हैं।
What the video covers
- गांधी के सेलेबसी टेस्ट और उनके साथ रहने वाली युवा लड़कियों के साथ विवादित व्यवहार।
- साउथ अफ्रीका में गांधी का ब्लैक अफ्रीकंस के प्रति भेदभाव और उनके रेसिस्ट विचार।
- गांधी का कास्ट सिस्टम पर विश्वास और दलितों के लिए हरिजन आंदोलन।
- गांधी की राजनीतिक और व्यक्तिगत जिंदगी में नैतिकता और विवादों का मिश्रण।
- ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति गांधी की प्रारंभिक लॉयल्टी और बाद में विरोध।
- गांधी की मोरल डिक्टेटरशिप और कांग्रेस के भीतर उनके विचारों का विरोध।
- गांधी के विचारों में समय के साथ बदलाव और उनकी जटिलता।
- गांधी का वैश्विक प्रभाव, विशेषकर नॉन-वायलेंस के क्षेत्र में।
- इतिहासकारों के गांधी के व्यक्तित्व और कार्यों पर विभिन्न दृष्टिकोण।
- 2016 में घाना में गांधी की प्रतिमाओं को हटाने की घटना और विवाद।
Chapters
- 00:00गांधी के सेलेबसी टेस्ट और विवादित व्यवहार
- 00:49गांधी की छवि और विवादित जीवन के अध्याय
- 02:11सेलेबसी टेस्ट का विवरण और विवाद
- 03:32गांधी का साउथ अफ्रीका में अनुभव और नस्लीय भेदभाव
- 04:51गांधी के नस्लीय विचार और इतिहासकारों की राय
- 06:50गांधी के दृष्टिकोण में परिवर्तन और अफ्रीकन अधिकारों का समर्थन
- 07:29हरिजन आंदोलन और कास्ट सिस्टम विवाद
- 08:46गांधी का कास्ट सिस्टम पर दृष्टिकोण और डॉ. अंबेडकर की आलोचना
- 10:06गांधी की मोरल डिक्टेटरशिप और कांग्रेस के अंदर विरोध
- 10:44ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति गांधी का प्रारंभिक दृष्टिकोण
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Speaker A
गांधी जी सेलेबसी टेस्ट करने के लिए यंग लड़कियों के साथ एक ही बिस्तर में सो जाते थे। साउथ अफ्रीकंस को ब्लैक्स को वो इंडियन से कमतर समझते थे। कास्ट सिस्टम पे बड़ा यकीन रखते थे और अपनी बेगम को दवाई खाने से भी मना करते थे।
Speaker A
आई नो यह स्टेटमेंट्स बहुत कंट्रोवर्शियल हैं। लेकिन इन स्टेटमेंट्स में कड़वे सच भी हैं। और यह वीडियो जिसमें हम कंट्रोवर्सीज ऑफ गांधी डिस्कस करेंगे। यह इसलिए नहीं है कि मैं एज अ पाकिस्तानी इंडियन पॉलिटिकल फिगर पर कीचड़ उछालू।
Speaker A
बल्कि इसका मकसद यह बताना है कि लीडर्स कितने भी ग्रेट हो। आखिर वो होते इंसान ही हैं तो उनसे गलतियों की उम्मीद रखी जा सकती है। महात्मा गांधी जिनका नाम सुनके एक सेंटली इमेज आता है दिमाग में सफेद।
Speaker A
कपड़े, लाठी और नॉन वायलेंस का पैगाम। इंडिया में जिसे फादर ऑफ नेशन कहते हैं। उनकी जिंदगी में भी कुछ ऐसे चैप्टर्स जरूर रहे हैं जो कंट्रोवर्सी से जुड़े हुए हैं। गांधी को लेके सबसे बड़ी कंट्रोवर्सी तो यह थी कि उन्होंने सेलेबसी टेस्ट किया।
Speaker A
जिसको वो ब्रह्मचर्या टेस्ट भी कहते थे। इस एक्सपेरिमेंट में वह यंग लड़कियों के साथ एक ही बिस्तर में सो जाते थे बिना फिजिकल रिलेशंस कायम किए। वह अपने जमीर का एक किस्म का टेस्ट लेते थे। उनके कहने के।
Speaker A
मुताबिक वो अपने आप को एक ऐसे टेस्ट में डालते थे जहां वो अपनी फिजिकल डिजायर्स अपने लस्ट को चैलेंज करते थे। इस एक्सपेरिमेंट की जो डिटेल्स हैं, वह गांधी के अपने लेटर्स और डायरीज में ही मिलती हैं। उनका कहना यह था कि वह सेल्फ।
Speaker A
डिसिप्लिन को टेस्ट कर रहे हैं। लेकिन यह उस दौर में भी कंट्रोवर्शियल था और आजकल के दौर में भी कंट्रोवर्शियल और बाय द वे वो जो लड़कियां उनके साथ सो जाती थी एक ही बिस्तर में उनमें से एक उनकी अपनी पोती भी।
Speaker A
थी मन्नू गांधी। उनके रिलेशन अपनी वाइफ कस्तूरबा गांधी के साथ भी खराब हो गए थे। खासतौर पर इस बात पे कि गांधी उनको मेडिकल ट्रीटमेंट लेने से मना करते थे क्योंकि वो स्पिरिचुअल हीलिंग पे यकीन रखते थे। उनका अपना बेटा।
Speaker A
हरीलाल उसने तो इस हद तक बगावत कर दी के उसने इस्लाम कबूल कर लिया ब्रीफ टाइम के लिए लेकिन उसने यह बागी कदम उठाया। ये सारे एपिसोड्स गांधी की ह्यूमन साइड को दिखाते हैं। जो कभी-कभी अपनी मोरल क्विस्ट।
Speaker A
को लेके बहुत ही एक्सट्रीम पर चले जाते थे। गांधी का लीगल करियर तो लंदन से शुरू हुआ। लेकिन जब वो 1893 में साउथ अफ्रीका गए और फिर वहां पे जो उनको रेशियल डिस्क्रिमिनेशन फेस करनी पड़ी वो ट्रेन से।
Speaker A
निकालने वाला वाकया तो आपने सुना ही होगा। फिर कोर्ट में भी डिस्क्रिमिनेशन हुई क्योंकि वो नॉन वाइट थे। ये सारी जो चीजें थी ये जो एक्सपीरियंसेस थे ये गांधी के अंदर एक रिफॉर्मिस्ट फायर पैदा कर रहे थे। लेकिन इसी दौर में लिखे हुए लेटर्स और।
Speaker A
पिटीशन आज गांधी के अगेंस्ट हो जाते हैं। इंडियन ओपिनियन जर्नल जिसको वो खुद चलाते थे। उसमें उन्होंने लिखा है कि इंडियंस को यह साउथ अफ्रीकन कफर्स की तरह ट्रीट नहीं करना चाहिए। यह कफर जो लफ्ज है यह वो।
Speaker A
मुसलमानों वाला लफ्ज नहीं है। काफिर लफ्ज नहीं है। साउथ अफ्रीका में ये जो कफिर का लफज़ है ये एक रेशल स्लर था जो ब्लैक अफ्रीकंस के लिए यूज़ किया जाता था। मतलब यह उस जमाने में अगर किसी ब्लैक को आप।
Speaker A
बोलते तो यह किसी गाली से कम नहीं था। तो गांधी ने अपने जनरल में साउथ अफ्रीकन ब्लैक्स को कैफेर बोला कि इनको इंडियंस के साथ मिक्स मत करो। उनका यह कहना था कि इंडियंस बहुत सिविलाइज्ड हैं और एजुकेटेड।
Speaker A
हैं। उन्हें इनके साथ मिक्स करना गलत बात है। इसलिए कुछ हिस्टोरियंस जैसे अश्विन देसाई और वाहिद ये कहते हैं कि साउथ अफ्रीका में जो गांधी का बिहेवियर था वहां से पता चलता है कि वो हरारकी को जस्टिफाई करते थे। वो उसके अगेंस्ट नहीं गए। लेकिन।
Speaker A
कुछ हिस्टोरियंस जैसे निशिकांत कोलगे है वो थोड़ा सा गांधी पे सॉफ्ट होते हैं और वो यह कहते हैं कि हमें इस सब को कॉन्टेक्स्ट में देखना चाहिए। वो कहते हैं कि ये गांधी के बिल्कुल शुरू के फेसेस थे।
Speaker A
उनके अंदर चेंज आ रहा था आहिस्ता-आहिस्ता और यह तब की बात है जब वह खुद कॉलोनियल इन्फ्लुएंस में थे। अब यह अपने आप में एक डिबेट है कि वाज़ गांधी अ प्रोडक्ट ऑफ ह टाइम या फिर वो वाकई एक रेसिस्ट थे जो।
Speaker A
अफ्रीकंस को इंडियंस से कमतर समझते थे। यह बात आज तक अफ्रीकन नेशनल्स को खटकती है। 2016 में घना यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स ने प्रोटेस्ट में गांधी के लगाए हुए स्टैचूस को कैंपस से हटवा दिया कि व्हाई ऑनर रेसिस्ट? और इस इवेंट ने वर्ल्ड वाइड।
Speaker A
इस डिबेट को फिर से शुरू कर दिया। लेकिन ईएस रेड्डी और बी आर नंदा जैसे राइटर्स कहते हैं कि गांधी का जो पर्सपेक्टिव था वो विद टाइम चेंज हुआ है। आगे जाके उन्होंने अफ्रीकन राइट्स के लिए भी सपोर्ट।
Speaker A
शो की है जब उनको कॉलोनियल स्ट्रक्चर पूरी तरह से समझ आ गया। तो ये एक कॉम्प्लेक्स जर्नी है जिसको सिर्फ ब्लैक एंड वाइट में नहीं देखना चाहिए। एक और कंट्रोवर्सी जो कास्ट सिस्टम को लेके गांधी से जोड़ी जाती।
Speaker A
है वह तब होती है जब वह इंडिया वापस आते हैं और एक मूवमेंट शुरू करते हैं जिसका नाम था हरिजन मूवमेंट। उस मूवमेंट में बेसिकली जो दलित हैं उनको वो एक और लफ्ज हरिजन के नाम से पुकारने लगते हैं। हरिजन।
Speaker A
जिसका मतलब है चिल्ड्रन ऑफ गॉड। अब इस पे क्रिटिक करने वाले यह कहते हैं कि गांधी साहब सिर्फ कास्ट सिस्टम को सॉफ्टन कर रहे थे। जो सबसे लोएस्ट कास्ट है जिसके साथ जातियां होती हैं उसका नाम चेंज कर दो कि।
Speaker A
चिल्ड्रन ऑफ गॉड हो गए यह तो इससे क्या होता है इससे कुछ भी नहीं होता। डॉक्टर अंबेडकर ने तो क्लियरली इस आईडिया को रिजेक्ट कर दिया था उसने कहा था गांधी सिर्फ इस कास्ट सिस्टम को सॉफ्ट कर रहे।
Speaker A
हैं लेकिन खत्म नहीं कर रहे दलित जिनको अनटचेबल समझा जाता है जिनको छूने से भी मना किया जाता है उनको राइट्स की जरूरत है आपकी सिंपथी की जरूरत नहीं है। ये कहना था डॉ. अंबेडकर का अपनी किताब में व्हाट।
Speaker A
गांधी एंड कांग्रेस हैव डन टू द अनटचेबल्स। गांधी का अलबत्ता मानना ये था कि ये जो वरना सिस्टम है ये हिंदू सोसाइटी का कोर स्ट्रक्चर है और वो ये मानते थे कि ये नेचुरल चीज है। ये अप्पर कास्ट, लोअर।
Speaker A
कास्ट ये तो होती ही है। अगर बिना वायलेंस के ये कास्ट सिस्टम एक्सिस्ट कर रहा है तो इसमें कोई मसला नहीं होना चाहिए। लेकिन दलित इंटेलेक्चुअल्स जो थे वो इस बात के बिल्कुल खिलाफ इंडिपेंडेंस मूवमेंट की बात करें तो गांधी की जो कंट्रीब्यूशन है वो।
Speaker A
अनडिनायबल है। नो डाउट ब्रिटिश को तो उन्होंने मोरल क्राइसिस में डाल दिया जब उन्होंने नॉन वायलेंस की अप्रोच अपनाई। लेकिन उनकी पॉलिटिकल डिसीजन मेकिंग पे कुछ लोग सवाल उठाते हैं। क्रिटिक करने वाले ये कहते हैं कि गांधी के अंदर एक मोरल।
Speaker A
डिक्टेटर था जो अपने फॉलोअर्स से भी यही एक्सपेक्ट करता था कि वो भी व्रत रखें, फास्टिंग करें, वो भी सेलिब्रेसी को अख्तियार करें। तो कांग्रेस के अंदर ही ऐसे बहुत सारे लोग थे जैसे डॉक्टर अंबेडकर हैं, सुभाष चंद्र बोस हैं वो बिल्कुल ही।
Speaker A
गांधी के इन आइडियाज को रिजेक्ट करते थे और यह कहते थे कि जो गांधी की मोरल डिक्टेटरशिप है वो सियासत के अंदर भी आ रही है। तो क्रिटिसिज्म यह आता है कि उन्होंने जो एक प्रगमेटिक अप्रोच होती है।
Speaker A
वो छोड़ दी थी और इमोशनली इतना इन्वेस्ट हो गए थे यूनिटी और पीस को लेके कि सियासत में जो कुछ कदम प्रैक्टिकिटी के बेस पे होते हैं वो उनसे नहीं उठाए गए। साउथ अफ्रीका और इंडिया में ब्रिटिश की जो।
Speaker A
हुकूमत थी उसको इनिशियली तो गांधी ने सपोर्ट ही किया। शुरू में लॉयल्टी ही दिखाई क्योंकि काफी टाइम तक वो यही मानते थे कि ब्रिटिश क्राउन एक रिफॉर्मेबल इंस्टट्यूट है। उसमें अगर चीजें बेहतर हो जाए तो ठीक है। उनका 1909 का एक टेक्स्ट।
Speaker A
है हिंद स्वराज जिसको पढ़ो तो समझ आता है कि गांधी मॉडर्न सिविलाइजेशन को एक बीमारी समझते थे। लेकिन फिर वो ब्रिटिश एंपायर के इस रूल को ठीक भी समझते थे। तो ये दो चीजें आपस में कंट्राडिक्ट भी कर रही हैं।
Speaker A
लेकिन वो ब्रिटिश एंपायर को दुश्मन भी नहीं समझते थे। गांधी को खासतौर पर इंडिया में एक सेंट के रूप में ही देखा गया है। लेकिन मॉडर्न हिस्टोरियंस ये कहते हैं कि अगर हम उनको महात्मा के पेडिस्टल से उतार।
Speaker A
के देखेंगे तो वो हमें एक इंसान नजर आएंगे। जिनके अंदर कंट्राडिक्शंस भी हैं, जिनके अंदर इंटरनल फाइट्स भी चल रही हैं, जो गलतियां भी कर रहे हैं, सही डिसीजन भी ले रहे हैं और क्वेश्चनेबल डिसिशनंस भी ले रहे हैं। रामचंद्र गुहा के हिसाब से गांधी।
Speaker A
की सबसे बड़ी जो कंट्रीब्यूशन थी वो ये थी कि उन्होंने सियासत में एक मोरल लैंग्वेज को इंट्रोड्यूस किया। खासतौर पर नॉन वायलेंस की जो अप्रोच थी। लेकिन वो यह कहते हैं कि इशू यह था कि वो एक मोरल बेंच।
Speaker A
सेट कर देते थे और वो एक्सपेक्ट करते थे कि बाकी लोग भी पार्टी में उसी स्टैंडर्ड्स पर चलेंगे जिस पे गांधी चल रहे हैं। वो मोरल बेंचेस जो गांधी ने सेट किए हुए हैं। यही वजह थी कि सुभाष चंद्र।
Speaker A
बोस, अंबेडकर, इवन भगत सिंह और बहुत सारे जो लोग थे वो उनसे इख्तलाफ करते थे। गांधी का इंपैक्ट तो ग्लोबल था। इसमें कोई शक नहीं। मार्टिन लूथर किंग, जूनियर, नेल्सन मंडेला और बहुत सारे लीडर्स उनसे बहुत इंस्पायर्ड थे। खासतौर पर नॉन वायलेंस को।
Speaker A
एक उन्होंने पॉलिटिकल यूनिवर्सल टूल बना दिया। लेकिन आयरनी ये है कि उसी गांधी के स्टैचूस अफ्रीका में हटाए भी जा रहे हैं। तो पूरा सच देखना बहुत जरूरी है और ये जैसे एक इंसिडेंट है 2016 में गाना में।
Speaker A
उनके स्टैचूस को हटाना ये एक रिमाइंडर है कि हीरोज़ को भी क्वेश्चन किया जा सकता है। इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में निशिकांत कोलगे का एक पेपर था जिसमें वो क
Speaker A
उसे फ्रीज नहीं करना। उसके अंदर एक एवोल्यूशन चल रही थी। रेस को, कास्ट को लेके और पॉलिटिक्स को लेके उनकी सोच आहिस्ता-आहिस्ता बदल रही थी। लेकिन यह ट्रांसफॉर्मेशन कभी कंप्लीट नहीं हुई। जैसे रामचंद्र गुहा ने कहा है अंडरस्टैंडिंग गांधी एज अ फ्लॉड विज़नरी इज
Speaker A
बेटर देन वरशिपिंग हिम एस अ फौ्टलेस प्रॉफिट। तो गांधी इन शॉर्ट एक ह्यूमन पैराडॉक्स थे। वो मॉडर्न सिविलाइजेशन को एक बीमारी भी कहते थे। फिर मॉडर्न जमाने की टेक्नोलॉजी भी यूज करते थे अपना मैसेज पहुंचाने के लिए। वह गुर्बत को वर्चू
Speaker A
समझते थे, बड़ा अच्छा समझते थे, लेकिन जो इलिट हैं, उनके सपोर्ट के साथ वह चल भी रहे थे। तो, यह जो डुअलिटी है, यह ही उनको इंटरेस्टिंग बनाती है। और यह एक किस्म की वार्निंग है, एक रिमाइंडर है कि कितने भी
Speaker A
बड़े मोरल लीडर्स हो उनके अंदर कंट्राडिक्शंस होती हैं। अंदर ही अंदर उनके कुछ कॉन्फ्लिक्ट्स होते हैं क्योंकि वो भी इंसान ही होते हैं। तो, आपके लिए जो क्रिटिकल क्वेश्चंस हैं जिनके मैं चाहूंगा आप नीचे कमेंट्स में मुझे जवाब दो। पहला
Speaker A
क्वेश्चन यह है कि क्या हमें ऐसे हिस्टोरिकल फिगर्स के जो अच्छे काम हैं उन्हीं से ही उनको जज करना चाहिए या पूरे कॉन्टेक्स्ट को देखना चाहिए? अगर गांधी ने अपने हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से कुछ चीजें की तो क्या हम उनको आज के
Speaker A
स्टैंडर्ड से जज कर सकते हैं? तो गांधी एक विज़नरी भी थे लेकिन कंट्राडिक्शन भी थी। दुनिया को उन्होंने नॉन वायलेंस और मोरल पॉलिटिक्स तो सिखाई लेकिन उनके अंदर भी वीकनेस तो थी। उनका रेस पर और कास्ट पर जो
Speaker A
एक कंफ्यूज्ड किस्म का स्टांस था। फिर पर्सनल जिंदगी के जो उनके सेलिबसी के एक्सपेरिमेंट्स थे या जो उनके पॉलिटिकल कुछ डिसीजंस थे यह सब मिला के एक कॉम्प्लेक्स लेगसी बनती है। जैसे गुहा लिखते हैं कि गांधीस ग्रेटनेस लाइ नॉट इन
Speaker A
ह परफेक्शन बट इन ह कास्टेंट स्ट्रगल विद इमपरफेक्शन। थैंक यू सब्सक्राइब कर देना।
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