संजय दत्त के संघर्षों और ड्रग्स की लत से जूझते जीवन की कहानी, उनके परिवार और फिल्मी करियर की शुरुआत।
Key Takeaways
- संजय दत्त का जीवन संघर्षों और ड्रग्स की लत से भरा रहा।
- परिवार का समर्थन और फिल्मी करियर उनके लिए उम्मीद की किरण था।
- ड्रग्स की लत ने उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को प्रभावित किया।
- नरगिस की मौत ने संजय पर गहरा प्रभाव डाला।
- इलाज और पुनर्वास की कोशिशें संजय के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं।
What the video covers
- संजय दत्त का बचपन चंबल घाटी में फिल्म शूटिंग के दौरान डकैत रूपा के साथ एक घटना से शुरू होता है।
- संजय के बचपन में बंदूक से नौकरानी पर गोली चलने का हादसा होता है, जिससे परिवार ने मामला दबा दिया।
- संजय को सिगरेट की लत लग जाती है, जिसके कारण उन्हें हिमाचल प्रदेश के लॉरेंस स्कूल में भेजा जाता है।
- स्कूल के दौरान संजय की शराब और ड्रग्स की आदतें बढ़ती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य और व्यवहार पर बुरा असर पड़ता है।
- कॉलेज में संजय ने गांजा, कोकेन, हेरोइन, एलएसडी जैसी खतरनाक ड्रग्स लेना शुरू किया।
- संजय के ड्रग्स की लत से परिवार में तनाव बढ़ता है, लेकिन नरगिस उन्हें फिल्मों में आने की उम्मीद देती हैं।
- संजय की पहली फिल्म 'रॉकी' की शूटिंग के दौरान ड्रग्स की आदत जारी रहती है, और नरगिस की कैंसर से मौत हो जाती है।
- नरगिस की मौत के बाद संजय ड्रग्स में और डूब जाते हैं, और उनके फिल्मी करियर में उतार-चढ़ाव आता है।
- संजय के नशे की वजह से प्रोड्यूसर्स परेशान रहते हैं, और उनके पिता सुनील दत्त इलाज के लिए प्रयास करते हैं।
- संजय के जीवन में दोस्ती, प्यार, और फिल्मी सफलता के साथ-साथ ड्रग्स और मानसिक स्वास्थ्य की लड़ाई भी जारी रहती है।
Chapters
- 00:00संजय दत्त का बचपन और चंबल घाटी की घटना
- 01:01बंदूक हादसा और सिगरेट की लत
- 02:07स्कूल के दिनों में बिगड़ैल व्यवहार और शराब
- 03:09ड्रग्स की शुरुआत और परिवार की चिंता
- 04:12फिल्म रॉकी की शूटिंग और नरगिस की बीमारी
- 06:26नरगिस की मृत्यु और संजय का ड्रग्स में डूबना
- 07:29फिल्मी करियर में उतार-चढ़ाव और नशे की समस्या
- 08:22इलाज की कोशिशें और मानसिक स्वास्थ्य की लड़ाई
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Speaker A
मध्य प्रदेश की चंबल घाटी में एक बॉलीवुड फिल्म की शूटिंग हो रही थी। इस फिल्म का नाम था मुझे जीने दो। फिल्म के प्रोड्यूसर सुनील दत्त अपने लाडले बेटे संजय को शूटिंग दिखाने के लिए सेट पर ले आते हैं।
Speaker A
तभी रूपा नाम का एक डकैत आ जाता है। रूपा डकैत ने संजय को अपनी गोद में ले लिया और सुनील दत्त से पूछा, अगर हम इस बच्चे को किडनैप कर लेते हैं तो कितना पैसा दोगे?
Speaker A
यह सुनकर सुनील दत्त घबरा जाते हैं। सुनील ने दिमाग से काम लिया और स्मार्टली हंसते हैं और डकैत के हाथ से अपना बच्चा ले लेते हैं। रूपा डकैत के कारण उस दिन की शूटिंग कैंसिल हो जाती है। अगले ही दिन सुनील
Speaker A
दत्त ने अपने बेटे संजय और पत्नी नरगिस को बॉम्बे वापस भेज दिया। इस तरह जाकर संजय दत्त की जान बची। संजय दत्त का जन्म 29 जुलाई 1959 के दिन हुआ था। संजय के पिता सुनील दत्त का असली नाम बलराज दत्त था। वहीं उनकी मां नरगिस
Speaker A
मुस्लिम परिवार से आती थी। उनका असली नाम था फातिमा राशिद। बचपन में संजय को खिलौने वाली बंदूकों से खेलने का शौक था। एक दिन संजय के हाथ अपने पिता सुनील दत्त की असली लाइसेंसी बंदूक लग जाती है। जिससे अपने ही
Speaker A
घर की नौकरानी पर गोली चल जाती है। दिन अच्छा था कि नौकरानी सिर्फ बुरी तरह से जख्मी हुई। दत्त परिवार ने उनका इलाज करवाया और मामले को रफादफा कर दिया। सुनील दत्त के पाली हिल वाले बंगले पर अक्सर बॉलीवुड के बहुत से लोग आते-जाते
Speaker A
रहते थे। जिनके साथ सुनील दत्त स्मोकिंग किया करते थे और इसके टुकड़े नीचे बगीचे में फेंक दिया करते थे। इन फेंकी हुई सिगरेट से ही संजय को सिगरेट की लत लग जाती है। इस समय संजय की उम्र मात्र 10
Speaker A
साल थी। एक दिन सुनील दत्त ने देखा कि बगीचे से धुआं आ रहा है। नीचे देखा तो वहां संजय जमीन पर लेटकर सिगरेट पी रहे थे। संजय की हरकतों को देखकर सुनील दत्त परेशान रहने लगे। इसलिए संजय का एडमिशन
Speaker A
हिमाचल प्रदेश के सनावर में मौजूद लॉरेंस स्कूल में करा दिया जाता है ताकि उनमें कुछ सुधार आ सके। माना जाता है कि यह सलाह किसी और ने नहीं बल्कि दत्त परिवार के करीबी रही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दी थी। स्कूल के दिनों में ही संजय के लिए
Speaker A
शराब सिगरेट रोज का हो गया। संजय स्कूल से भागकर कसौली के पास मौजूद जबली गांव जाते और वहां से देसी ठर्रा की शराब खरीद कर ले आते। संजय को हफ्ते में ₹2 मिलते थे जिससे वे शराब पर खर्च कर देते थे। स्कूल में
Speaker A
संजय को एक बिगड़ैल बच्चे के तौर पर देखा जाने लगा। टीचर्स के लिए जो एक बड़ा सिरदर्द बन जाता है। एक दिन एक टीचर ने संजय को इतना पीटा कि उन्हें गैंगन की बीमारी हो गई और उनके माता-पिता को उन्हें दिल्ली
Speaker A
के एक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। साल 1977 में 18 साल की उम्र में संजय लॉरेंस स्कूल से पास आउट हो जाते हैं। संजय का एल्फिनस्टोन कॉलेज में एडमिशन करा दिया जाता है। लेकिन संजय का पढ़ाई में कोई मन
Speaker A
नहीं लग रहा था। वे अक्सर ओबरॉय होटल के नाइट क्लब, रॉ कंसर्ट्स और मूवीज देखने के लिए निकल जाते थे। कॉलेज में ही संजय ने ड्रग्स लेना शुरू कर दिया। उस समय मुंबई में ड्रग्स फैशन में थी और ज्यादातर लोगों
Speaker A
को इनके साइड इफेक्ट्स के बारे में बिल्कुल पता नहीं था। संजय ने एक्सपेरिमेंट के तौर पर गांजा पीना शुरू कर दिया। लेकिन जल्द ही वे कोकेन, हेरोइन, एलएसडी और एसिड जैसी खतरनाक ड्रग्स भी करने लगे। हाल यह हो गया कि जितनी भी तरह
Speaker A
की ड्रग्स इंडिया में मौजूद थी, वे सब संजय ने कर डाली। इधर नरगिस को भी अपने बेटे में यह बदलाव नजर आ रहे थे। वे पूछते कि संजय के कमरे से यह अगरबत्ती जैसी खुशबू क्यों आ रही है? लेकिन उन्हें नहीं
Speaker A
पता था कि यह गांजा है। संजय घंटों अपने कमरे में बंद रहते। नरगिस को उनके सामान से कुकीन, हेरोइन और गांजा मिलने लगा। संजय के आए दिन झगड़े होने लगे। वे ज्यादातर वक्त अपने नशेड़ी दोस्तों के साथ बाहर रहते या घंटों केवल अपने कमरे में
Speaker A
बंद रहते। लेकिन नरगिस ने अपने पति को यह नहीं बताया था कि संजय किस हद तक ड्रग्स करने लगे हैं। वे अपने बेटे को कैसे भी करके बचाना चाहती थी। नरगिस का मानना था कि एक बार फिल्मों में आने के बाद संजय की
Speaker A
यह सारी बुरी आदतें छूट जाएंगी। अब संजय दत्त को लॉन्च करने के लिए 1 करोड़ की रॉकी फिल्म बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। जिसे खुद सुनील दत्त डायरेक्ट करने वाले थे। 1 जनवरी 1980 को महबूब स्टूडियो
Speaker A
में रॉकी फिल्म का प्रोडक्शन शुरू हो जाता है। लेकिन संजय ने ड्रग्स करना नहीं छोड़ा। एक दिन संजय ने एलएसटी नाम का नशा किया हुआ था। तभी सुनील दत्त ने उन्हें अपनी ऑफिस बुला लिया। संजय को लगा कि उनके
Speaker A
पिता मोमबत्ती की तरह पिघल रहे हैं। संजय अपने पिता को बचाने के लिए उनके ही ऊपर कूद पड़ते हैं। सुनील दत्त समझ ही नहीं पाए कि उनके बेटे को क्या हो गया है। सुनील दत्त ने अपने नौकरों से कहा कि इसे
Speaker A
लेकर जाओ यह पागल हो गया है। आगे की कहानी को कहने से पहले मैं आपको इंडिया के सबसे बड़े क्रिप्टो प्लेटफार्म कॉइन स्विच के बारे में बताना चाहता हूं। यहां आप स्पॉट, फ्यूचर्स और ऑप्शंस में तीनों में इंडियन
Speaker A
रूपी में ट्रेड कर सकते हैं। कॉइन स्विच भारत का पहला और एकमात्र प्लेटफार्म है जो यह तीनों ट्रेडिंग ऑप्शंस देता है। सबसे इंटरेस्टिंग बात यह है कि आप बिटकॉइन और बाकी सारे कॉइंस में एसआईपी शुरू कर सकते हैं। वह भी मात्र ₹100 के साथ। कॉइन स्विच
Speaker A
में स्पेशल यह है कि यहां पर आप स्पॉट ट्रेडिंग में 300 से ज्यादा क्रिप्टो में ट्रेड कर सकते हैं। वह भी सिर्फ ₹100 से शुरू करके। फ्यूचर्स में 500 से ज्यादा कॉन्ट्रैक्ट्स 100 टाइम्स लेवरेज के साथ और वो भी इंडिया में सबसे कम फीस के साथ।
Speaker A
ऑप्शंस ट्रेडिंग की फीस भी सबसे कम है। सबसे बड़ी बात कॉइन स्विच को एफआईयू ऑफ इंडिया से मान्यता मिली हुई है। कॉइन स्विच पर 2.5 करोड़ से ज्यादा यूजर्स का ट्रस्ट है। कॉइन स्विच का प्रूफ ऑफ रिजर्व भी है। यहां यूजर्स की क्रिप्टो
Speaker A
होल्डिंग ₹2609 करोड़ है। तो कॉइन स्विच की क्रिप्टो होल्डिंग ₹345 करोड़ है जो कॉइन स्विच ऐप की स्ट्रांग फाइनेंशियल हेल्थ को दिखाता है। लिंक डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में है। आज ही कॉइन स्विच को चेक करें जो है आईएसओ सर्टिफाइड प्लेटफार्म।
Speaker A
अब वापस अपनी कहानी पर लौटते हैं। क्रिप्टो प्रोडक्ट्स एंड एनएफटीस अनरेगुलेटेड एंड कैन बी हाइली रिस्की। देयर मे बी नो रेगुलेटरी रिकर्स फॉर एनी लॉस फ्रॉम सच ट्रांजैक्शंस। फिल्म रॉकी की शूटिंग के दौरान ही संजय का अपनी कोस्टार टीना मुनीम से अफेयर शुरू हो
Speaker A
जाता है। लेकिन नरगिस इससे खुश नहीं थी। इन्हीं दिनों एक दिन पता चला कि नरगिस को पैनक्रियाटिक कैंसर है। नरगिस को तुरंत ही न्यूयॉर्क के एक कैंसर सेंटर ले जाया जाता है। एक ऑपरेशन के बाद नरगिस की हालत
Speaker A
इतनी बिगड़ गई कि वे कोमा में चली जाती हैं। डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी। इस मुश्किल दौर में भी संजय ड्रग्स नहीं छोड़ पाए। वे अपने जूतों में हेरोइन छिपाकर अमेरिका ले जाते हैं। कुछ महीनों बाद चमत्कार हुआ। नरगिस कोमा से बाहर आ गई।
Speaker A
होश में आते ही उन्होंने पूछा, संजू कहां है? संजय को तुरंत बुलाया गया। मां को होश में देखकर संजय फूट-फूट कर रोए। नरगिस भारत वापस आने और अपनी बेटी की फिल्म रॉकी देखने के लिए बेताब थी। मार्च 1981 में
Speaker A
नरगिस मुंबई वापस लौट आती हैं। लेकिन मुंबई आकर भी नरगिस की तबीयत दोबारा से बिगड़ जाती है और उन्हें मुंबई के ब्रिज कैंडी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। नरगिस की इच्छा के अनुसार रॉकी फिल्म की रिलीज़ डेट 8 मई 1981 तय की गई थी। लेकिन
Speaker A
3 मई 1981 के दिन ही यानी रॉकी फिल्म रिलीज होने से मात्र 5 दिन पहले ही नरगिस की मौत हो जाती है। नरगिस की मौत का संजय को इतना बड़ा सदमा लगा कि वह रोए तक नहीं। नरगिस की अंतिम इच्छा के मुताबिक 8 मई को
Speaker A
ही रॉकी फिल्म का प्रीमियर हुआ। प्रीमियर वाले दिन दत्त परिवार नरगिस की कब्र पर गया और सिनेमा हॉल में नरगिस की सीट यानी कि ई 15 खाली रखी गई। संजय और सुनील दत्त पूरी फिल्म के दौरान उस खाली सीट को देखते
Speaker A
रहे। फिल्म खत्म होने पर हॉल तालियों से गूंज उठा। लेकिन संजय उदास थे। जिसकी तारीफ उनके लिए सबसे ज्यादा मायने रखती थी, वह मां फिल्म देखने से कुछ दिन पहले ही हमेशा के लिए जा चुकी थी। मां की मौत
Speaker A
के बाद संजय ड्रग्स में और ज्यादा डूब जाते हैं। पिता सुनील दत्त भी अब गहरे सदमे में थे। इधर रॉकी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहती है। संजय की एक्टिंग लोगों को पसंद नहीं आई। लेकिन इस मुश्किल
Speaker A
वक्त में भी संजय का सहारा बने कुमार गौरव और टीना मुनीम। कुमार गौरव उस समय संजय की बहन नम्रता दत्त को डेट कर रहे थे। साल 1982 और 83 में संजय की दो फिल्में आईं। एक विधाता और दूसरी मैं आवारा हूं। यह दोनों
Speaker A
ही फिल्में हिट रहती हैं। विधाता साल 1982 की सबसे बड़ी हिट बनी। लेकिन संजय के सेट पर नशे में होने और बेहोश होने की खबरें अब आम थीं। संजय से अब प्रोड्यूसर्स भी परेशान रहने लगे थे। यह इतना ज्यादा हो
Speaker A
गया था कि खुद सुनील दत्त ने ही अपनी तरफ से प्रोड्यूसर्स को अपने बेटे की हालत के बारे में बताना शुरू कर दिया था। इससे दोनों बाप बेटे के रिश्ते में तनाव आ जाता है। सुनील दत्त ने संजय के इलाज की
Speaker A
कोशिशें शुरू कर दीं। मुंबई के एक क्लीनिक में संजय को इलेक्ट्रोड थेरेपी दी जाती है जो दर्दनाक थी। लेकिन इसका भी कोई फायदा संजय पर नहीं हुआ। संजय का ब्रिज कैंडी अस्पताल में भी इलाज चला लेकिन कोई फायदा
Speaker A
नहीं होता है। यहां भी संजय को हेलुसिनेशंस हो रहे थे। एक दिन संजय को अपनी बहन प्रिया की जगह गोरखा नजर आने लगी। वे ए गोर्खा ए गोर्खा कहकर उन्हें बुलाने लगे। प्रिया को डर लगने लगा। वे कोई
Speaker A
होने का नाटक करने लगी। प्रिया ने उनसे पूछा जी साहब बोलो क्या करने का है साहब?
Speaker A
संजय ने जवाब दिया मेरे लिए चरस लेकर आओ। प्रिया ने कहा चर्स नहीं है मेरे पास बीड़ी है। बीड़ी मांगता है क्या? साल 1982 में सुनील दत्त संजय को टीना के साथ इलाज के लिए जर्मनी ले जाते हैं। लेकिन यहां भी
Speaker A
कुछ फायदा नहीं हुआ। इसी दौरान टीना राजेश खन्ना के साथ सौतन फिल्म कर रही थी। दोनों के बीच अफेयर की खबरें उड़ने लगी। इस खबर से संजय का दिल बुरी तरह से टूट जाता है और टीना से उनका रिश्ता यहीं पर खत्म हो
Speaker A
जाता है। संजय को इतना गुस्सा आया कि वे एक दिन महबूब स्टूडियो पहुंच गए जहां पर राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे और उन्हें घूरते रहे। लेकिन इस दौरान राजेश खन्ना चुप रहे और मारपीट की नौबत नहीं आई। 22 मई
Speaker A
1982 की रात दिल टूटने के गम में और नशे में होने के कारण संजय ने अपने घर में अपनी एक राइफल से हवा में गोलियां चला दी। घर की खिड़कियां और कार किसी से टूट जाते हैं। पड़ोसी इकट्ठा हो जाते हैं। संजय
Speaker A
बदहवास हालात में थे और चिल्ला रहे थे। मैं ड्रग एडिक्ट नहीं हूं। घटना की खबर मिलते ही पुलिस आ गई। लेकिन संजय अपने एक दोस्त की मदद से यहां से भाग निकले। अगले दिन संजय ने खुद ही पुलिस के सामने सरेंडर
Speaker A
कर दिया। संजय पर लापरवाही से हथियार इस्तेमाल करने का केस दर्ज हो जाता है और ₹500 की जमानत पर उन्हें रिहा भी कर दिया जाता है। इस घटना के समय सुनील दत्त और संजय की बहनें अमेरिका में थी। संजय ने
Speaker A
मीडिया से कहा कि बंदूक साफ करते वक्त गलती से गोली चल गई थी। एक दिन संजय हेरोइन का नशा करने के बाद लगातार दो दिन तक सोते रहे। दो दिन बाद संजय को होश आया। संजय ने आईने में देखा कि उनकी आंखें सूझी
Speaker A
हुई हैं। धंसी हुई आंखें और बिगड़ा हुआ चेहरा देखकर संजय को लगा कि वे अब मरने वाले हैं। संजय को एहसास हो चुका था कि हालात अब बिगड़ चुके हैं। अंत में संजय अपने पिता के पास गए और रोते हुए कहा,
Speaker A
"मुझे मदद चाहिए।" जनवरी 1984 में सुनील दत्त संजय को अमेरिका ले जाते हैं। मियामी के एक अस्पताल में संजय का इलाज शुरू हुआ। डॉक्टर्स ने संजय से पूछा कि वे कौन-कौन सी ड्रग्स करते हैं? तो संजय ने कहा यार
Speaker A
यह तो सब ठीक करना पड़ेगा। संजय की हालत देखकर डॉक्टर हैरान थे कि इतनी सारी ड्रग्स लेने के बाद भी संजय जिंदा कैसे हैं? अंततः एक बार फिर अमेरिका में संजय का इलाज शुरू होता है और सुधार नजर आने
Speaker A
लगा। 1 महीने के डिटॉक्स के बाद संजय को लगा कि वे ठीक हो गए हैं। लेकिन डॉक्टर उन्हें लंबे समय के लिए मिसीसीपी के एक रिहब सेंटर भेजना चाहते थे। रिहब सेंटर में संजय को करीब 30 अन्य मरीजों के साथ
Speaker A
रखा गया। यहां उन्हें बर्तन और कपड़े धोने और खाना बनाने जैसे अपने काम खुद करने थे और धीरे-धीरे रिहब सेंटर में संजय को अच्छा लगने लग जाता है। उन्होंने दोस्त बनाए खाना बनाना सीखा और बिना ड्रग्स के जीवन का आनंद लेने लगे। इस रिहब सेंटर में
Speaker A
संजय को हफ्ते में एक बार फोन करने की इजाजत थी। हालांकि रिहब सेंटर में रहने के बाद भी संजय के लिए अकेलेपन और नशे की लत से लड़ना आसान नहीं था। सुनील दत्त को शक हुआ कि संजय ने फिर से शराब पीना शुरू कर
Speaker A
दिया है। वे निराश होकर भारत लौट आते हैं। उन्होंने संजय को नरगिस की आवाज में रिकॉर्ड किए गए कुछ टेप भेजे जिनमें नरगिस संजय को सलाह दे रही थी और अपने प्यार का इज़हार कर रही थी। इस बार अपनी मृत मां की
Speaker A
आवाज सुनकर संजय फूट-फूट कर रोए। यह संजय के जीवन का टर्निंग पॉइंट था और उन्होंने ठान लिया कि अब वे नशे को हाथ नहीं लगाएंगे। एंड दैट वास द टाइम आई डिसाइडेड दैट आई विल बी हाई ऑन लाइफ आई विल बी हाई ऑन वर्क
Speaker A
आई विल बी हाई ऑन फैमिली बट नेवर ऑन ड्रग्स नेवर एवर ऑन ड्रग्स। सितंबर 1984 में संजय मुंबई लौट आते हैं। लौटते ही संजय का ड्रग डीलर उनसे मिलने आया और नए माल का ऑफर देने लगा। यह संजय
Speaker A
के लिए डिसाइडिंग मोमेंट था। ड्रग्स लेनी है या उसे भगाना है। इस बार संजय की इच्छाशक्ति जीत गई। संजय ने ड्रग डीलर को वहां से भगा दिया। यह वह दिन था जब पहली बार संजय को लगा कि उन्होंने नशे के खिलाफ
Speaker A
पहली जंग जीत ली है। 8 महीने तक संजय को बॉम्बे में कोई खास काम नहीं मिलता है। संजय अपना ज्यादातर टाइम बांद्रा के सी रॉक होटल में स्क्वैश खेलकर बिताते थे। फिर एक दिन फिल्म प्रोड्यूसर पप्पू वर्मा ने संजय को अपनी एक्शन फिल्म जान की बाजी
Speaker A
ऑफर की। संजय ने इस फिल्म के लिए हां कर दी। जान की बाजी के सेट पर पहले ही दिन संजय घबराए हुए थे। लेकिन शॉट पूरा होते ही यूनिट ने खड़े होकर उनके लिए तालियां बजाई। जब यह फिल्म रिलीज हुई तो ठीक-ठाक
Speaker A
चली। लेकिन संजय को अब एक बड़ी हिट की तलाश थी। इसी समय चार ऐसे लोग एक साथ आए जो सक्सेस के लिए भूखे थे। डायरेक्टर महेश भट्ट जिनकी पिछली कुछ फिल्में फ्लॉप रही थी। कुमार गौरव जिनका करियर लव स्टोरी के
Speaker A
बाद अच्छा नहीं चल रहा था। स्क्रिप्ट राइटर सलीम खान जो जावेद अख्तर से अलग होने के बाद खुद को साबित करना चाहते थे और संजय दत्त जो एक यादगार वापसी के इंतजार में थे। महेश भट्ट दो सौतेले भाइयों की एक कहानी पर काम कर रहे थे।
Speaker A
कुमार गौरव ने इस फिल्म को प्रोड्यूस करने का फैसला लिया। सलीम खान ने स्क्रिप्ट लिखी। फिल्म में लीड रोल के लिए कुमार गौरव और संजय दत्त को लिया गया था। हालांकि कुमार गौरव के पिता राजेंद्र कुमार इस बात से खुश नहीं थे क्योंकि संजय
Speaker A
का किरदार जो फिल्म में मर जाता है वह ज्यादा दमदार था। लेकिन कुमार गौरव ने संजय के साथ अपनी दोस्ती निभाई और फिल्म बनाने पर अड़े रहे। इन दो सौतेले भाइयों की इस फिल्म का नाम रखा गया नाम। इसमें
Speaker A
कुमार गौरव ने जिम्मेदार भाई रवि का किरदार निभाया और संजय ने एक भटके हुए भाई विक्की का जो दुबई जाकर ड्रग्स के धंधे में फंस जाता है। विक्की का किरदार काफी हद तक संजय की असल जिंदगी से मिलताजुलता
Speaker A
था। इस फिल्म का म्यूजिक रिलीज होने से पहले ही हिट हो गया। खासकर पंकज उदास की गजल चिट्ठी आई है। चिट्ठी आई है। आई है आई है। चिट्ठी आई है। 12 सितंबर 1986 को नाम फिल्म रिलीज होती है और सुपरहिट साबित होती है। लोगों ने
Speaker A
संजय दत्त में एक बेहतरीन अभिनेता और एक नया स्टार देखा। फिल्म की सफलता के बाद संजय का कॉन्फिडेंस लौट आता है। अब संजय को साबित करना था कि नाम फिल्म एक तुक्का नहीं थी। संजय की लोकप्रियता बढ़ रही थी।
Speaker A
खासकर छोटे शहरों में संजय की जिंदगी की ट्रेजडीज, ड्रग्स की लत, अफेयर्स, कमबैक, बॉडी और लंबे बालों ने उन्हें एक कल्ट हीरो बना दिया। इस दौरान संजय का नाम फिलीपींस की एयर होस्टेज सा और फिर एक्ट्रेस किमी काटकर के साथ जुड़ा। लेकिन
Speaker A
यह रिश्ते ज्यादा दिन नहीं चले। फिर उनकी जिंदगी में आई रिचा शर्मा। आगे बढ़ने से पहले आपसे एक पर्सनल रिक्वेस्ट यह है कि चैनल आपके लाइक, कमेंट और शेयर से आगे बढ़ता है। जब आप यह तीनों नहीं करते तो
Speaker A
YouTube हमारे चैनल को बाकी लोगों को नहीं दिखाता। अगर आप चाहते हैं कि हम इन डेप्थ वीडियोस लाते रहें तो आपका सपोर्ट हमारे लिए बहुत जरूरी है। तो सबसे पहले यह छोटा सा काम कर दीजिए। लाइक जरूर करिए और कमेंट
Speaker A
करके जरूर जाइए और सब्सक्राइब जरूर करिए। रिचा शर्मा न्यूयॉर्क में पली बढ़ी थी और देवानंद ने उन्हें हम नौजवान फिल्म में लॉन्च किया था। संजय रिचा से साल 1985 में मिले थे और पहली ही नजर में उन पर फिदा हो
Speaker A
गए थे। संजय को लगा कि रिचा बाकी लड़कियों से अलग हैं। सीधी भरोसेमंद और पैसे के पीछे ना भागने वाली लड़की। संजय ने रिचा से शादी करने का फैसला ले लिया। लेकिन उनकी शर्त थी कि रिचा अपना एक्टिंग करियर
Speaker A
छोड़ दें। रिचा इस बात को मान जाती हैं। अक्टूबर 1987 में संजय और रिचा ने न्यूयॉर्क में शादी कर ली। इस शादी के दौरान नरगिस की एक तस्वीर भी रखी गई। सुनील दत्त बहुत खुश थे कि अब संजय की
Speaker A
जिंदगी पटरी पर आ जाएगी। शुरुआत में सब ठीक था। रिचा घर संभालती और संजय अपने काम में व्यस्त रहते। 10 अगस्त 1988 को उनकी बेटी त्रिशाला का जन्म होता है। लेकिन कुछ महीनों बाद ही रिचा को तेज सिर दर्द होने
Speaker A
लगा। अब जांच में पता चला कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है वह भी कैंसर का। एक बार फिर दत्त परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। रिचा को कैंसर के इलाज के लिए उसी अस्पताल में ले जाया गया जहां पर नरगिस का इलाज
Speaker A
हुआ था। रिचा का इलाज लंबा चलने वाला था। संजय शुरुआत में उनके साथ रहे लेकिन फिर शूटिंग के लिए मुंबई लौट आते हैं। वे बीच-बीच में न्यूयॉर्क जाते रहते। उनकी बहन प्रिया न्यूयॉर्क में ही थी और रिचा की देखभाल कर रही थी। संजय को अपनी बेटी
Speaker A
त्रिशाला की बहुत याद आती थी। रिचा की बीमारी के दौरान संजय का करियर ऊपर नीचे होता रहा। साल 1988 में संजय की कई फिल्में आती हैं। लेकिन फिल्म कब्जा को छोड़कर बाकी कोई फिल्म खास कमाल नहीं कर पाई। साल 1989 में आमिर खान, सलमान खान और
Speaker A
शाहरुख खान जैसे नए सितारे उभर रहे थे और संजय पिछड़ते जा रहे थे। इस साल भी उनकी सभी फिल्में एवरेज रही सिवाय जेपी दत्ता की हथियार फिल्म के। इसमें संजय ने एक बार फिर जुर्म की दुनिया में फंसे युवक का
Speaker A
किरदार निभाया। इन सब कारणों से संजय इनसिक्योर फील करने लगे। दूसरी तरफ रिचा की बीमारी और दूरी का असर उनके रिश्ते पर पड़ रहा था। संजय फिर से शराब और पार्टियों में डूबने लगते हैं। उनका नाम अब अमृता सिंह, एकता और अनु अग्रवाल जैसी
Speaker A
अभिनेत्रियों के साथ जोड़ा जाने लगा। इसी समय संजय के उनकी कोस्टार माधुरी दीक्षित के साथ अफेयर के स्ट्रांग रमर्स आने लगे। दोनों थानेदार साजन खलनायक समेत कई फिल्मों में एक साथ काम कर रहे थे। साजन एक लव ट्रायंगल फिल्म थी जिसमें संजय ने
Speaker A
एक अपाहिज कवि का किरदार निभाया था जो माधुरी दीक्षित से प्यार करता था। लेकिन अपने भाई यानी सलमान खान के लिए अपना प्यार कुर्बान कर देता है। यह फिल्म सुपरहिट रही और संजय के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। संजय के लंबे बालों वाला
Speaker A
लुक फैशन बन जाता है। आगे फिल्म साजन और महेश भट्ट की फिल्म सड़क की सक्सेस ने संजय को फिर से टॉप पर पहुंचा दिया। इसी बीच खबरें आने लगी कि संजय और माधुरी शादी करने वाले हैं। इसी दौरान उन्होंने साथ
Speaker A
में साहिबान फिल्म की। फिल्म के डायरेक्टर रमेश तलवार के मुताबिक संजय सेट पर माधुरी के पीछे घूमते रहते और उन्हें आई लव यू कहते रहते। यह सब खबरें न्यूयॉर्क में रिचा शर्मा तक पहुंच रही थी। अक्टूबर 1992 में रिचा अपनी शादी बचाने के लिए अपनी
Speaker A
बेटी त्रिशाला के साथ मुंबई वापस आ जाती हैं। लेकिन संजय रिचा से बच रहे थे। संजय रिचा को लेने के लिए एयरपोर्ट पर भी नहीं गए थे। संजय का रूह का व्यवहार देखकर रिचा केवल 15 दिन ही मुंबई में रहती हैं और
Speaker A
वापस न्यूयॉर्क चली आती हैं। साल 1993 की शुरुआत में संजय ने तलाक की अर्जी डाल दी। इससे रिचा बहुत नाराज होती हैं। बेटी त्रिशाला की कस्टडी को लेकर भी संजय और रिचा में अब कड़वाहट और बढ़ जाती है और
Speaker A
तभी मिड 1993 में रिचा को दोबारा से कैंसर हो जाता है। इधर संजय अपनी पर्सनल लाइफ में जूझ ही रहे थे कि एक बड़ी घटना उनके जीवन में होती है। 9 अप्रैल 1993 के दिन संजय दत्त को मुंबई पुलिस ने टेररिस्ट एंड
Speaker A
डिसरप्टिव एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट यानी कि टाड़ा एक्ट के तहत अरेस्ट कर लिया जो कि आतंकवादियों पर लगाया जाता है। पुलिस ने संजय दत्त के घर से एक AK-57 राइफल और गोला बारूद बरामद कर लिया। पुलिस ने आरोप लगाया कि इन हथियारों का संबंध मुंबई बम
Speaker A
धमाकों में इस्तेमाल हुए हथियारों से है। यानी संजय दत्त को साल 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों की साजिश में शामिल होने के आरोप में अरेस्ट कर लिया जाता है। यहां से संजय की जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है।
Speaker A
संजय दत्त को मुंबई हमलों के आरोप में अरेस्ट क्यों किया गया? इसके पीछे की पूरी कहानी क्या है? रिचा के साथ संजय के संबंध आगे कैसे रहे? संजय के जेल के दिनों से लेकर अब तक की पूरी कहानी दूसरे और फाइनल
Speaker A
एपिसोड में। यह संजय दत्त पर पहला एपिसोड था। इससे पहले हमने अमिताभ बच्चन और मिथुन पर डिटेल्ड वीडियोस बनाई हैं। यह एपिसोड्स नॉर्मल सिनेमा स्टोरीज से अलग हैं। इन्हें देखने पर आपको इन डेप्थ जानकारियां मिलेंगी। लिंक कमेंट बॉक्स में मिल जाएगी।
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