अंबानी परिवार और रिलायंस साम्राज्य की राजनीतिक और आर्थिक साजिशों की गहराई से पड़ताल।
Key Takeaways
- अंबानी परिवार की सफलता में राजनीतिक समर्थन और आर्थिक साजिशों का बड़ा योगदान रहा।
- रिलायंस की शुरुआत बेहद संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में हुई थी।
- व्यापार और राजनीति के बीच गहरा तालमेल कॉरपोरेट वॉर का मुख्य कारण है।
- सरकारी एजेंसियों और मीडिया पर दबाव बनाकर व्यापारिक हित साधे गए।
- अंबानी परिवार ने रणनीतिक रूप से इंपोर्ट लाइसेंस और उत्पादन पर कब्जा किया।
What the video covers
- धीरू भाई अंबानी ने कांग्रेस के कई नेताओं को आर्थिक मदद दी और राजनीतिक प्रभाव बनाया।
- अंबानी परिवार की शुरुआती गरीबी और संघर्ष की कहानी, जिसमें एक कमरे में आठ लोग रहते थे।
- धीरू भाई अंबानी ने यमन में व्यापार करते हुए चांदी के सिक्कों की चालाकी से मुनाफा कमाया।
- रिलायंस की शुरुआत सिंथेटिक धागों के व्यापार से हुई और बाद में फैक्ट्री स्थापित की गई।
- राजनीतिक साजिशों में अंबानी परिवार का गहरा जुड़ाव, जिसमें वीपी सिंह सरकार गिराने की कोशिशें भी शामिल हैं।
- राजीव गांधी के साथ धीरू भाई अंबानी के संबंध और राजनीतिक दबावों का विवरण।
- अमिताभ बच्चन की संपत्ति को लेकर राजीव गांधी को मिली गुप्त जानकारी और उसके प्रभाव।
- रिलायंस की बढ़ती ताकत और व्यापारिक रणनीतियाँ, जैसे इंपोर्ट लाइसेंस और पॉलिस्टर उत्पादन।
- सरकारी एजेंसियों और मीडिया पर दबाव, जैसे इंडियन एक्सप्रेस पर छापा और सीबीआई जांच।
- अंबानी परिवार की आर्थिक सफलता के पीछे की राजनीतिक और कॉरपोरेट चालें।
Chapters
- 00:00अंबानी परिवार और राजनीतिक संबंधों की शुरुआत
- 03:18धीरू भाई अंबानी का यमन में व्यापार और प्रारंभिक संघर्ष
- 06:03रिलायंस की स्थापना और शुरुआती व्यापारिक गतिविधियाँ
- 09:31सिंथेटिक धागों का व्यापार और इंपोर्ट लाइसेंस की लड़ाई
- 12:46राजनीतिक साजिशें और वीपी सिंह सरकार पर प्रभाव
- 17:06राजीव गांधी के साथ अंबानी के संबंध और विवाद
- 21:17सरकारी जांच और मीडिया पर दबाव
- 26:19रिलायंस की बढ़ती ताकत और कॉरपोरेट राजनीति
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Speaker A
इंदिरा गांधी की जीत के जश्न में गुजरात के कांग्रेस सांसदों ने दिल्ली के अशोका होटल में पहली बड़ी पार्टी रखी। इसके लिए पूरा पैसा किसी और ने नहीं बल्कि धीरू भाई अंबानी ने दिया था। धीरू भाई अंबानी ने
Speaker A
इंडियन एक्सप्रेस अखबार के मालिक रामनाथ गोइंका से कहा, "मेरे पास एक सोने की चप्पल है और एक चांदी की है। आगे वाला कौन है? यह देखकर मैं या तो उसे सोने की चप्पल से मारता हूं या चांदी की चप्पल से।" अंबानी
Speaker A
परिवार के घर में टॉयलेट नहीं थी। पूरा घर चौल के ही एक कॉमन बाथरूम का यूज किया करता था, जिसे उनके अलावा करीब 100 और लोग भी डेली यूज किया करते थे। धीरू भाई के पुराने परिचित कहते थे कि धीरू भाई ने एक
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तरह से इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी यशपाल कपूर को खरीद लिया था। आरोप तो यह भी लगे कि इंदिरा गांधी जानबूझकर यह स्कीम लाई हैं ताकि अकेले धीरू भाई अंबानी को फायदा पहुंचे। धीरू भाई अंबानी विदेश से खरीदे गए पॉलिस्टर को
Speaker A
भारत में 600 पर से भी अधिक की कीमतों पर बेचते थे। राजीव गांधी के साथ अपनी पहली मीटिंग में ही धीरू भाई अंबानी ने सीधे कहा कि मेरे पास आपकी स्वर्गीय माता जी के बिहाव पर बहुत सारा फंड रखा हुआ है। मैं
Speaker A
इसका क्या करूं? राजीव गांधी को अमेरिका की एक प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के दो लेटर हाथ लगते हैं, जिसमें अमिताभ बच्चन की स्विटजरलैंड में मौजूद संपत्ति की सीक्रेट जानकारी थी। इसे राजीव को लगा कि अमिताभ के बहाने राजीव को ही तो कहीं टारगेट करने की
Speaker A
साजिश नहीं रची जा रही। इसी रात राजीव ने ईडी के डायरेक्टर भूरेलाल का ट्रांसफर कर दिया और अगले दिन सीबीआई की एक टीम इंडियन एक्सप्रेस अखबार के पत्रकार गुरुमूर्ति के यहां छापा मारने के लिए भेज दी। अब धीरू
Speaker A
भाई अंबानी ने वीपी सिंह की सरकार गिराने की कोशिशें शुरू कर दी। एक दिन शरद पवार ने बॉम्बे डाइंग कंपनी के मालिक नुस वाडिया को कॉल करके बताया कि सूचना मिली है कि आपकी हत्या करने की साजिश रची जा रही है।
Speaker A
बम्बे डाइंग वही कंपनी थी जिसके साथ Reliance1 की हत्या की साजिश की जांच हुई। तो बम्बे पुलिस ने धीरू भाई अंबानी और मुकेश अंबानी के सहयोगी कीर्ति अंबानी को नुस वाडिया की हत्या की साजिश में अरेस्ट कर लिया और इसके
Speaker A
[संगीत] बाद नमस्कार, मैं श्याम मीरा सिंह। धीरू भाई अंबानी से लेकर मुकेश अंबानी तक की यह कहानी बताती है कि कैसे सी बिजनेस में गड़बड़झाला करके धीरू भाई अंबानी की रिलायंस इस लेवल पर पहुंची। इसलिए इस वीडियो की शुरुआत में पॉलिस्टर से लेकर
Speaker A
कपड़ा मार्केट की छोटी-छोटी टेक्निकल डिटेल्स मैंने इस वीडियो में डिस्कस की हैं, जिनसे आपको समझ आएगा कि इस देश में कॉरपोरेट वॉर कैसे होते हैं और राजनीतिक पार्टियां और बड़े-बड़े नेता मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री इसमें कैसे काम आते हैं। इस
Speaker A
वीडियो को अंत तक देखने के बाद आप कहेंगे कि कॉरपोरेट और पॉलिटिक्स पर आपने इससे अच्छी वीडियो नहीं देखी। अब शुरू करते हैं अपनी कहानी। धीरू भाई अंबानी का जन्म 28 दिसंबर 1932 के दिन गुजरात के जूनागढ़ जिले में होता है। धीरू भाई के पिता
Speaker A
हीराचंद अंबानी मोड़ बनिया समुदाय से आते थे और जूनागढ़ के नवाब के एक स्कूल में अध्यापक का काम करते थे। 19 साल की उम्र में ही धीरू भाई अंबानी नौकरी करने के लिए वर्तमान यमन देश के शहर अडन चले आते
Speaker A
हैं, जो उस समय ब्रिटिशर्स के कंट्रोल में आता था। अडन पोर्ट की लोकेशन अगर आप देखेंगे तो ये उस समय दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पॉइंट था। मतलब यहां सोने, चांदी, शुगर, कपड़ों, मसालों आदि का व्यापार होता था। दुनिया भर से समुद्री जहाज आते थे और
Speaker A
दुनिया भर के इलाकों में यहां से सामान भेजा जाता था। धीरू भाई के भाई रमणीक भाई यहां 2 साल पहले से ही काम कर रहे थे। यहीं रमणीक भाई ने धीरू भाई को एक व्यापार कंपनी ए बेसे एंड कंपनी में नौकरी दिला दी।
Speaker A
धीरू भाई को कंपनी के कमोडिटी सेक्शन में क्लर्क का काम दिया जाता है। यहीं धीरू भाई ने सीखा कि कैसे अरब, यहूदी और इंडियन व्यापारी मसालों, शुगर, तेल आदि का व्यापार कर रहे हैं। उन दिनों अदन में व्यापार के
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लिए बैंकों से लोन लेना आसान था और इस नीति का फायदा उठाते हुए धीरू भाई ने यूरोप और ऑस्ट्रेलिया से चीनी, चावल और गेहूं का इंपोर्ट करना शुरू कर दिया। और अदन में माल पहुंचने से पहले ही खरीददार
Speaker A
ढूंढ लेते थे। इसी बीच यमन किंगडम के अधिकारियों को पता चला कि उनके यहां से उनका चांदी का सिक्का रियाल मार्केट से गायब होता जा रहा है। जब यमन के अधिकारियों ने इसकी इन्वेस्टिगेशन की तो पता चला कि
Speaker A
धीरू भाई अमबानी नाम के एक इंडियन क्लर्क ने जितने हो सके उतने रियल्स का ओपन ऑर्डर दे रखा है। इसलिए मार्केट से चांदी के ये सिक्के गायब होते जा रहे हैं। दरअसल धीरू भाई ने नोटिस किया कि चांदी के
Speaker A
सिक्के की जितनी कीमत है उससे ज्यादा कीमत उसमें लगी चांदी की है। इसलिए धीरू भाई बड़े लेवल पर चांदी से बने इन सिक्कों को खरीदना शुरू कर देते हैं और इन्हें पिघलाकर चांदी की सिलिया बनाकर लंदन में बेच देते हैं। जब इसके बारे में जांच
Speaker A
अधिकारियों को पता चल गया तो यमन किंगडम ने रियाल की खरीद पर रोक लगा दी, लेकिन तब तक धीरू भाई अंबानी कई लाख रुपए बना चुके थे। इस बीच 19 अप्रैल 1957 के दिन धीरू भाई अंबानी की पत्नी कोकिला बैन को एक बेटे का
Speaker A
जन्म होता है, जिसका नाम रखा जाता है मुकेश अंबानी। इन्हीं दिनों यमन में ब्रिटिशर्स से आजादी की लड़ाई तेज हो रही थी, इसलिए वे इंडियंस का भी विरोध कर रहे थे। इस कारण दिसंबर 1977 में धीरू भाई अपनी पत्नी और तीन
Speaker A
महीने के बच्चे मुकेश के साथ वापस भारत लौट आते हैं। भारत आकर अंबानी परिवार मुंबई के एक भीड़भाड़ वाले इलाके कबूतरखाना में बस जाता है। यहां जय हिंद एस्टेट नाम की एक चौल थी। इस चौल में 500 से ज्यादा लोग रहा
Speaker A
करते थे। अंबानी परिवार सात लोगों के साथ चौथी मंजिल पर एक छोटे से घर में रहता था, जिसमें सिर्फ एक कमरा था और एक रसोई थी। धीरू भाई अंबानी के घर में सिर्फ एक बाथरूम तक नहीं था। अंबानी परिवार चौल के ही एक कॉमन
Speaker A
बाथरूम का उपयोग करते थे, जिसे इनके अलावा करीब 100 लोग और साझा करते थे। इनमें ज्यादातर दूध वाले थे और आसपास के दुकानदार थे जो इसी चौल में रहा करते थे। यहीं धीरू भाई के दूसरे बेटे अनिल अंबानी का भी जन्म
Speaker A
होता है। इसी एक छोटे से कमरे में ही धीरू भाई, उनकी मां, उनकी पत्नी, रमण के भाई और उनकी पत्नी और दोनों के बच्चे साथ में रहा करते थे। मतलब एक कमरे में आठ से ज्यादा लोग, जिसमें एक बाथरूम भी नहीं था। ये वो
Speaker A
दिन थे जब धीरू भाई अंबानी Reliance1 58 के फरवरी महीने में धीरू भाई ने बंबई की होलसेल मार्केट में Reliance1 टेबल और तीन चेयर थी। ऑफिस की जगह इतनी छोटी थी कि अगर दोनों पार्टनर और उनके दो शुरुआती एंप्लॉयज सभी प्रेजेंट
Speaker A
रहते तो किसी एक को बाहर खड़ा होकर रहना पड़ता और यह भी ₹1 महीने के किराए पर थी। धीरू भाई के ऑफिस में ही एक डॉक्टर की भी दुकान थी और दोनों के बीच में लकड़ी का पार्टीशन था। डॉक्टर और धीरू भाई दोनों ही
Speaker A
एक ही फोन का इस्तेमाल करते थे। यहीं से धीरू भाई अडन, मस्कट, ओमान और सऊदी अरेबिया के लिए मसाले बेचने लगे। चूंकि धीरू भाई के पास पैसे अधिक नहीं थे, इसलिए त्रिंबक भाई दमानी को भी उन्होंने साझेदार बना लिया।
Speaker A
इन्हीं दिनों सेम चौल में धीरू भाई के कुछ और दोस्त बने जो धागे बेचने का व्यापार करते थे। मतलब छोटे-मोटे दुकानदार थे। इस तरह धीरू भाई ने भी छोटे लेवल पर धागे खरीदने और बेचने का काम शुरू कर दिया।
Speaker A
इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री में पहले कॉटन और सिल्क के धागे चलते थे, लेकिन बाद में नायलॉन और पॉलिस्टर जैसे सिंथेटिक धागों ने इनकी जगह ले ली क्योंकि ये सस्ते थे और जल्दी सूखते भी थे और इन पर सिलवटें भी
Speaker A
नहीं पड़ती थीं। इसलिए उस समय सिंथेटिक धागों की डिमांड ज्यादा थी और सप्लाई कम हो पा रही थी। चूंकि सिंथेटिक धागा बाहर से भारत मंगाया जाता था, इसलिए इंपोर्ट लाइसेंस होना बहुत इंपोर्टेंट था और इंपोर्ट लाइसेंस केवल रजिस्टर्ड टेक्सटाइल
Speaker A
एक्सपोर्टर्स को ही दिए जाते थे। मतलब जो व्यापारी भारत से धागे बाहर विदेश में बेच रहे हैं, मतलब एक्सपोर्ट कर रहे हैं, केवल वही कुछ मात्रा में या अपने जो एक्सपोर्ट कर रहे हैं उसके कुछ वॉल्यूम की
Speaker A
मात्रा में ही बाहरी देशों से सिंथेटिक धागों का रॉ मटेरियल इंपोर्ट कर सकते हैं। इन्हें रिप्लेनिशमेंट लाइसेंस यानी आरपीज कहा जाता था। साल 1965 आते-आते धीरू भाई और उनके पार्टनर चंपक लाल दमानी के बीच दरार आ जाती है। इसके पीछे कारण यह था कि धीरू
Speaker A
भाई के कहने पर दोनों पार्टनर्स के बीच अधिक नहीं बन रही थी और चंपकलाल Reliance1 में खरीद लिया। और इस तरह Reliance1 धागों की कीमतें बढ़ जाती हैं और Reliance1 साल के अंदर ही धीरू भाई ने सिंथेटिक धागे के व्यापार करने के अलावा
Speaker A
कृष्णकांत वखरिया काम आते हैं। कृष्णकांत वखरिया ने ही धीरू भाई अंबानी को गुजरात के उस समय के इंडस्ट्रीज मिनिस्टर जसवंत मेहता की मदद से अहमदाबाद के नरोदा में जमीन दिलवा दी। इस जमीन पर धीरू भाई ने एक सिंपल सी फैक्ट्री बनवाई जिसमें मात्र चार
Speaker A
बुनाई मशीनें ही लगवाई गईं। धीरे-धीरे Reliance1 67 में कंपनी ने 90 लाख की सेल की और 13 लाख का नेट प्रॉफिट कमाया। साल 1968 में धीरू भाई ने अपना घर भी बदल लिया और एलीट एरिया अल्ट्रा माउंट रोड के एक
Speaker A
कंफर्टेबल फ्लैट में शिफ्ट हो जाते हैं। धीरू भाई ने अपने इस प्रॉफिट को वापस अपनी फैक्ट्री में ही लगाना शुरू कर दिया, जिसका परिणाम यह रहा कि मैन्युफैक्चरिंग स्टार्ट करने के 10 साल बाद यानी साल 1977 में Reliance1 8 करोड़ पहुंच जाता है और उसका
Speaker A
प्रॉफिट 10.5 करोड़ रहा। अब बंबई में एस्टेब्लिश होने के बाद धीरू भाई सरकार की पॉलिसीज को भी इन्फ्लुएंस करना शुरू कर देते हैं, जिस...
Speaker A
में उभर रहे थे यहीं से धीरू भाई अंबानी एक बड़ा गेम करते हैं जिसके बारे में यह पूरी कहानी है धीरू भाई और मुली देवरा फ्लाइट पकड़कर दिल्ली पहुंचते हैं और पॉलिटिशियन और ब्यूरोक्रेट्स के चक्कर काटते हैं ताकि उनके इंपोर्ट लाइसेंस
Speaker A
जल्दी-जल्दी अप्रूव हो जाएं धीरू भाई हर वो तरीका अपना रहे थे जिससे उनके बिजनेस में तेजी आए लोअर लेवल के ऑफिशियल जर्नलिस्ट और बाकी जो लोग इसी तरह धीरे-धीरे धीरू भाई ने बड़ी मात्रा में पॉलिटिकल डोनेशन देकर टॉप
Speaker A
लीडर्स तक अपनी पहुंच बनाना भी स्टार्ट कर दिया इस तरह इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी यशपाल कपूर से भी धीरू भाई का संपर्क हो जाता है जिनके जरिए इंदिरा गांधी से भी मुलाकातें होना शुरू हो जाता है धीरू भाई के पुराने परिचित बताते हैं
Speaker A
कि धीरू भाई ने एक तरह से यशपाल कपूर को खरीद लिया था बाद में उनके आर के धवन से भी अच्छे संबंध बन गए थे जो पीएमओ में भी काम करते थे इसके अलावा धीरू भाई ने बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेई और चंद्रशेखर
Speaker A
जैसे नेताओं से भी संपर्क बनाया ये सब संपर्क बाद में धीरू भाई के धंधे को बढ़ाने में बहुत ज्यादा काम आते हैं धीरबाई का साथ देने वाले शुरुआती लोगों में एक थे टीए पाई टीए पाई की फैमिली सिंडिकेट बैंक चलाती थी आगे टीए पाई ही
Speaker A
reliance1 69 में इंदिरा गांधी ने सिंडिकेट बैंक को नेशनलाइज कर दिया और इसके बदले टीए पाई को मिनिस्टर फॉर इंडस्ट्रीज बना दिया इससे धीरू भाई की किस्मत चमक जाती है साल 1971 में धी भाई ने टीए पाई को एक स्कीम के लिए तैयार कर
Speaker A
लिया जिसमें नायलॉन फैब्रिक के एक्सपोर्ट के एवज में पॉलिस्टर का धागा इंपोर्ट करने की परमिशन दे दी जाएगी इस तरह टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए इंदिरा सरकार ने साल 1971 में हायर यूनिट वैल्यू स्कीम की शुरुआत कर दी इस स्कीम में सरकार
Speaker A
ने अनुमति दे दी कि अगर कोई नायलॉन फैब्रिक को एक्सपोर्ट करता है तो इसके बदले पॉलिस्टर फिलामेंट यान का इंपोर्ट कर सकता है यह इसलिए किया जाता था ताकि भारत का पैसा बाहर ना जाए और जब हम कुछ बेचे
Speaker A
तभी कुछ खरीदने की अनुमति उस समय दी जाए इस स्कीम का नाम याद रखें क्योंकि इस स्कीम ने reliance1 ज्यादा थी भारत के लोग पॉलिस्टर के लिए विदेश से आने वाले पॉलिस्टर पर ही निर्भर थे लेकिन पॉलिस्टर को विदेश से तभी
Speaker A
खरीदा जा सकता था जब आप विदेशी लोगों के लिए नायलॉन बेचे लेकिन हमारे देश से नायलॉन कोई क्यों खरीदेगा जब उन्हें विदेश में ही सस्ता मिल जाता है भारत के नायलॉन के विदेश में कोई ज्यादा खरीददार नहीं थे
Speaker A
यहां आरोप लगते हैं कि धरू भाई अंबानी ने फर्जी तरीके से दिखाया कि वे नायलॉन का एक्सपोर्ट कर रहे हैं ऐसा इसलिए किया गया ताकि वे ज्यादा से ज्यादा पॉलिशर खरीद सकें और उसे भारत में ओने पौने दामों में
Speaker A
बेच सकें एक थ्योरी यह भी है कि धीरू भाई इस एक्सपोर्ट को विदेश में बेचते हैं लेकिन वहां कोई विदेशी खरीददार नहीं है बल्कि वे खुद ही अपने सामान को खरीद रहे थे वे हवाला के जरिए विदेश में बैठे फर्जी
Speaker A
वायर्स को अपने पैसे भेजते जो इस पैसे से उनके द्वारा किए जाने वाले एक्सपोर्ट का सामान खरीद लेते थे और इस एक्सपोर्ट को सिंगापुर या दुबई के किसी फ्री पोर्ट पर भेज दिया जाता था ताकि कस्टम ड्यूटी बच
Speaker A
सके और यहां सस्ते में इसे बेच दिया जाता या घाट पर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता या समंदर में फेंक दिया जाता ये सब इसलिए किया जा रहा था ताकि ज्यादा से ज्यादा पॉलिस्टर को खरीदने की अनुमति मिल सके
Speaker A
रवाई विदेश से खरीदे गए इस पॉलिस्टर को भारत में 600 पर से भी अधिक कीमतों पर बेचते थे यानी अपना खुद का ही एक्सपोर्ट किया हुआ माल समुंदर में फेंकने के बाद भी धीरू भाई को पॉलिस्टर के बिजनेस में 425
Speaker A
पर तक का प्रॉफिट हो जाता था जब तक इंदिरा सरकार चली हायर यूनिट वैल्यू स्कीम भी चलती रही और धीरू भाई देश में पॉलिस्टर के मेन इंपोर्टर बन गए हालांकि इमरजेंसी के बाद हुए साल 1977 के चुनावों में इंदिरा
Speaker A
गांधी की सरकार चली जाती है लेकिन जाते-जाते भी इंदिरा सरकार आरई पीज लाइसेंस पर कस्टम ड्यूटी माफ करके धीरू भाई को 3.75 करोड़ का फायदा पहुंचा गई मार्च 1977 में इंदिरा गांधी के बाद जनता पार्टी के मोरार जी देसाई देश के नए
Speaker A
प्रधानमंत्री बन जाते हैं शुरुआत में जनता पार्टी की सरकार में भी धीरू भाई अच्छा करते रहे और उन्हें प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई के बेटे कांतिलाल देसाई से हेल्प भी मिलती रही लेकिन 22 अगस्त 1977 के दिन जनता पार्टी में कॉमर्स मिनिस्टर मोहन
Speaker A
दरिया ने अचानक से हायर यूनिट वैल्यू स्कीम को कैंसिल कर दिया और हर आरपी लाइसेंस होल्डर को एक स्पेसिफिक क्वांटिटी में पॉलिस्टर यान इंपोर्ट करने की परमिशन दे दी इससे पॉलिस्टर के लाइसेंस के दाम गिर जाते हैं reliance1 दिन बाद यानी 2 सितंबर 1977 को
Speaker A
एक बार फिर इस पुरानी स्कीम को चालू कर दिया गया इसमें भी कमाल की बात यह रही कि 22 अगस्त से 2 सितंबर 1977 के बीच का जो 11 दिन का टाइम पीरियड था इसमें भी reliance1 दिनों को धीरू भाई का 11 डे
Speaker A
वंडर कहा जाता है हालांकि साल 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने इस स्कीम को डिस्कंटीन्यू कर दिया मतलब इसे बंद कर दिया यहां यह जानना जरूरी है कि साल 1977 तक यानी इंदिरा गांधी के सत्ता में रहने
Speaker A
तक reliance.in के फैब्रिक के विदेश में इतने अधिक खरीददार थे कि 60 से 70 पर फैब्रिक विदेश में ही बिक रहा था और तो फिर यह कैसे हो सकता है कि इधर भारत में कोई सरकारी स्कीम बंद हो
Speaker A
गई और यह सब विदेशी खरीददार गायब हो गए उनकी सब जरूरतें अब रह ही नहीं गई इससे यह आईडिया मिलता है कि [संगीत] reliancejewels.in प्रूव नहीं हो सका इस बीच अक्टूबर 1977 में reliance1 पर शेयर की कीमत पर कुल 28 लाख
Speaker A
इक्विटी शेयर्स पब्लिक किए जनवरी 1978 में वैसे ही आप भी बं x बा जेएम फाइनेंशियल ऐप के माध्यम से अपनी शेयर मार्केट जर्नी की शुरुआत कर सकते हैं जो कि शेयर मार्केट में ट्रेडिंग के लिए एक रिलायबल और कॉस्ट
Speaker A
एफिशिएंट प्लेटफॉर्म है ब्लिंक्स एक जीरो ब्रोकरेज ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है यहां आपको फ्री एक्सपर्ट रिसर्च कॉल्स का ऑप्शन मिलता है ये कॉल्स आपको डिटेल में समझाती हैं कि कब ट्रेड स्टार्ट करना है कब एंट्री करनी है स्टॉप लॉस कहां लगाना है
Speaker A
और टारगेट्स क्या होने चाहिए ये सब सलाहे एक्सपर्ट रिसर्च पर बेस्ड होते हैं ताकि आप शेयर मार्केट में ट्रेडिंग को लेकर बेस्ट डिसीजंस ले सकें बंक्स पर आपको तीन प्लान मिलेंगे एक सिर्फ आपको एक ही ऐप पर मिल जाते हैं तो अपनी
Speaker A
ट्रेडिंग को इजी और कन्वेनिएंट बनाने के लिए आज ही ब्लिंक एक्स ट्राई करें आप सबके लिए मैंने ब्लिंक एक्स की लिंक अपने डिस्क्रिप्शन बॉक्स और कमेंट बॉक्स में डाल दी है अब वापस अपनी कहानी पर लौटते हैं हेमस मैकडोनाल्ड अपनी किताब महाभारत
Speaker A
इन पॉलिस्टर में लिखते हैं कि धीरु भाई अंबानी की इंदिरा सरकार में अच्छी पड़ रही थी इसलिए धीरु भाई ने मुरार जी देसाई की सरकार गिराने में हेल्प करने का प्लान बनाया धीरबाई ने अपने रिसोर्सेस यानी जितने भी उन परे संसाधन थे वो सारे इंदिरा
Speaker A
गांधी के पीछे लगा दिए जनता पार्टी को तोड़ने में भी धीरू भाई का रोल कैश के सूटकेस प्रोवाइड करना था इससे इंदिरा गांधी के साथ उनका रिलेशन काफी मजबूत होता है और उन्हें गवर्नमेंट पॉलिसीज को इन्फ्लुएंस करने की बेजोड़ ताकत मिल जाती
Speaker A
है जनता पार्टी में फूट के कारण साल 1980 के चुनावों में इंदिरा गांधी दोबारा से बहुमत के साथ पावर में लौट आती हैं इंदिरा की वापसी के जश्न में गुजरात के कांग्रेस सांसदों ने दिल्ली के अशोका होटल में पहली
Speaker A
बड़ी पार्टी रखी जिसके लिए पूरा पैसा धीरू भाई ने दिया इस पार्टी में इंदिरा गांधी 2 घंटे तक मंच पर बैठकर अपने शुभचिंतकों से मिलती रही और इस पूरे समय में धीरू भाई इंदिरा गांधी के साथ रहे इंदिरा गांधी की
Speaker A
सत्ता में वापसी के साथ ही धीरू भाई अंबानी का गोल्डन पीरियड भी शुरू हो गया साल 1979 में धीरू भाई की कंपनी reliance1 से आई थी लेकिन 5 साल के भीतर ही यानी इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान
Speaker A
ही साल 1984 में reliance1 में इंद्र सरकार के द्वारा दिए गए कुल तीन लाइसेंस में से एक लाइसेंस मिल जाता है उसमें पॉलिस्टर धागे की मैन्युफैक्चरिंग के लिए लाइसेंस के लिए कुल 43 कंटेस्टेंट्स थे यानी उम्मीदवार थे लेकिन
Speaker A
reliance1 182 में इसमें प्रोडक्शन स्टार्ट हो जाता है यहां एक बार फिर मा ती वीक बाद ही यानी 23 नवंबर 1982 के दिन इंदिरा सरकार ने पॉलिस्टर के धागों पर ₹1 ज पर टन की एक्स्ट्रा इंपोर्ट ड्यूटी लगा दी इंपोर्ट ड्यूटी लगा दी मतलब भारत
Speaker A
का कोई भी व्यापारी अगर भारत से बाहर से पॉलिस्टर खरीदेगा यानी इंपोर्ट करेगा तो उसे अब ₹ ज पर टन एक्स्ट्रा टैक्स देना पड़ेगा इस कारण वे भारत के अंदर ही पॉलिस्टर खरीदने को मजबूर होंगे मतलब मतलब यहां भी
Speaker A
reliance1 धीरू भाई की दोस्ती प्रणम मुखर्जी से भी थी जो इंदिरा सरकार में फाइनेंस और कॉमर्स मिनिस्टर थे प्रणम मुखर्जी ने लाइसेंस कैपेसिटी से भी अधिक प्रोडक्शन करने की परमिशन reliance1 की फाइनेंस मिनिस्ट्री से और भी कई फायदे मिले जैसे
Speaker A
टैक्स नहीं दिया reliance1 77 में शेयर मार्केट में लिश होने के बाद से लेकर 1996 तक reliance1 97 में जब 12 पर मिनिमम अल्टरनेट टैक्स का रूल आया तब reliance1 79 से 1984 के बीच ही करने वाले शेयर होल्डर्स की संख्या 8 गुना
Speaker A
बढ़ गई 800 पर बढ़ गई इस दौरान reliance.in के शेयर की बढ़ती कीमत से शेयर होल्डर्स को बहुत फायदा हुआ साल 1978 में reliance1 शेयर ₹10 की कीमत का मिल रहा था वही शेयर साल 1982 में ₹1 के हाईए लेवल पर
Speaker A
पहुंच गया मात्र कुछ साल के भीतर ही धीरु भाई एक नए शिखर पर पहुंच गए मैगजींस के कवर्स पर धीरू भाई की तस्वीरें छपने लगी इसी साल धीरू भाई ने reliance1 का प्रोडक्शन स्टार्ट कर दिया ऐसा करने वाली
Speaker A
प्राइसेज बढ़ाना शुरू कर दिया यह काम सेल कंपनीज के थ्रू किया जा रहा था इन सील कंपनीज में मोस्टली के चेयरमैन मनोहर जे फेरवानी और धीरू भाई क्लोज थे यूटीआई ने reliance1 मिलियन से ज्यादा व्यूज वीडियो बनाने तक हो चुके हैं इसका लिंक आपको
Speaker A
डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगा धीरू भाई ने नेताओं के साथ-साथ ब्यूरोक्रेसी पर भी अपनी पकड़ बना ली थी उनकी हर किसी को सलाम करने का जो उनका एटीट्यूड था और जूनियर स्टाफ और न्यू कॉमर्स की जो मदद करने की उनकी आदत थी वो उनके बिजनेस में
Speaker A
बड़ी काम आई 1980 की शुरुआत तक धीरू भाई की पॉलिटिक्स मिनिस्ट्री या फाइनेंशियल सर्किल में बहुत ज्यादा फ्रेंड्स बन चुके थे एक बड़ा नेटवर्क बन चुका था पहले वो गुडविल क्रिएट करने के लिए या अच्छा व्यवहार रखने के लिए सूट देते थे साड़ी
Speaker A
देते थे और बाद में प्रमोटर कोटा से बहुत बड़े लेवल पर कर रहे थे उनकी इस कला के कारण पीएमओ ऑफिस और होम मिनिस्ट्री तक में उनके फ्रेंड्स बन चुके थे फांस मिनिस्ट्री में इंपोर्टेंट फाइल्स पर साइन होने से पहले ही धीरु भाई को जानकारी मिल
Speaker A
जाती थी सरकारी पॉलिसीज का बेनिफिट लेने के लिए धीरू भाई बड़ी ब्यूरोक्रेटिक पोस्ट पर अपॉइंटमेंट तक को इन्फ्लुएंस करने लगे 23 नवंबर 1985 को बॉम्बे की वीकली टैबलॉयड ब्लडज ने एक सेंसेशनल कवर स्टोरी पब्लिश की जिसका टाइटल था बिग थ्री इन महा
Speaker A
पॉलिस्टर वॉर इस वॉर में शामिल थे धीरूभाई अंबानी और के सिल्क मिल्स के कपल मेहरा और बॉम्बे डाइंग के नुस बाड़िया धीरबाई की जो मेन बैटल थी वो बॉम्बे डाइंग के नुस बाड़िया से थी जो पारसी कम्युनिटी से आते
Speaker A
थे पारसी कम्युनिटी से आने वाली वाडिया फैमिली बॉम्बे और टेक्सटाइल के बिजनेस में अच्छी तरह से एस्टेब्लिश थी और उनकी कंपनी बॉम्बे डाइंग 189 से ही टेक्सटाइल से रिलेटेड काम कर रही थी और उस समय बहुत बड़ी कंपनी थी वाडिया फैमिली के कनेक्शंस
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भी अच्छे थे नसली वाडिया के नाना मोहम्मद अली जिन्ना थे जो पाकिस्तान के फाउंडर थे इसके साथ ही उनके कई इन्फ्लुएंस फ्रेंड्स भी थे थे जिनमें रतन टाटा और इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप बनाने वाले रामनाथ गोइंका शामिल थे टाटा परिवार नसली वाडिया की
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रिश्तेदारी में भी आता था जिसका जिक्र हमने टा वाली वीडियो में भी बताया है इस वीडियो को आप मेरे youtube1 या और धीरू भाई में पॉलिशर के धागों के रॉ मटेरियल यानी कि डीएमटी और पीटीए को लेकर एक बिजनेस वॉर्ड चल रहा था
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डीएमटी और पीटीए इन दोनों शॉर्ट फॉर्म्स को आप याद रखें आगे इस वीडियो को समझने में यह दोनों काम आएंगे डीएमटी और पीटीए ये दोनों पॉलिस्टर के धागे बनाने के रॉ मटेरियल होते हैं नसली बाड़िया की कंपनी बॉम्बे डाइंग को दिसंबर 1978 में यानी
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जनता पार्टी की सरकार में डीएमटी प्लांट के लिए सरकार की तरफ से लेटर ऑफ इंटेंट मिला था लेकिन जनता पार्टी की सरकार बहुत ज्यादा जल्दी चली गई हेमस मैकडोनाल्ड अपनी किताब महाभारत इन पॉलिस्टर में लिखते हैं कि इंदिरा गांधी की सरकार आने पर संजय
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गांधी ने उनसे इस लाइसेंस के बदले डोनेशन मांगा लेकिन नसली बाड़िया ने डोनेशन देने से इंकार कर दिया और कहा कि वह यह काम नहीं करते हालांकि इसके कुछ समय बाद ही संजय गांधी की मौत हो गई इसलिए नुस
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बाड़िया ने राजीव गांधी से कांटेक्ट किया राजीव गांधी ने नुस बाड़िया से कहा कि वे उनके साथ न्याय करेंगे इस तरह राजीव गांधी की मदद से जुलाई 1981 में बॉम्बे डाइंग को डीएमटी प्लांट के लिए लाइसेंस मिल जाता है
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इसी समय धीरू भाई अंबानी भी पॉलिस्टर के धागे बनाने का लाइसेंस हासिल करने के लिए भागदौड़ कर रहे थे और उन्हें भी यह लाइसेंस मिल जाता है और नवंबर 1982 से इसमें प्रोडक्शन स्टार्ट हो जाता है दरअसल पॉलिस्टर डीएमटी से बनता है ऐसे में
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डीएमटी प्लांट का लाइसेंस पहले मिलने के बाद नुस बाड़िया ऐसी पोजीशन में आ गए जहां से वे धीरू भाई जैसी ही ट्रिक्स अपनाकर reliance1 का ज्यादा पैसा वसूल कर सकते थे क्योंकि धीरू भाई उनके डीएमटी प्लांट पर डिपेंडेंट होने वाले थे लेकिन नसली
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बाड़िया की बम्बे डाइंग का डीएमटी प्लांट लगने में देरी होने लगी हेमिस्ट मैकडोनाल्ड अपनी किताब महाभारत इन पॉलिस्टर में बताते हैं कि इसमें कुछ हाथ अधिकारियों का भी रहा उन्होंने इसे अटका कर रखा और बाद में वे अधिकारी
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में बड़ी-बड़ी पोजीशंस पर नौकरियां भी पाने में सफल रहे यानी उन्होंने reliance1 की कंपनी को लाइसेंस तो दे दिया लेकिन उसे बनवाने में देरी की इस बीच 1984 में reliance1 प्लांट लगाने का लेटर ऑफ इंटेंट भी मिल गया पीटीए डीएमटी का
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अल्टरनेटिव था पीटीए प्लांट के जरिए reliance1 नहीं बना रहा था अप्रैल 1945 में बॉम्बे डाइंग के डीएमटी प्लांट ने प्रोडक्शन स्टार्ट कर दिया लेकिन इसके स्टार्ट होते ही प्रेस में इसके के खिलाफ नेगेटिव खबरें आने लगी मीडिया रिपोर्ट्स
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में बॉम्बे डाइंग के डीएमटी प्लांट को कबाड़ बताया जाने लगा और डीएमटी के बारे में कहा गया कि इसके दिन चले गए हैं अब इसके मॉडर्न अल्टरनेटिव पीटीए का समय आ गया है ऐसी कई रिपोर्ट्स उन जर्नलिस्ट ने
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छापी जो reliance1 अक्टूबर 1984 के दिन इंदिरा गांधी की हत्या हो जाती है और उनके बेटे राजीव गांधी देश के नए प्रधानमंत्री बन जाते हैं प्राइम मिनिस्टर बनने के चंद घंटे बाद ही राजीव ने पीएमओ से आर के धवन
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को बर्खास्त कर दिया फिर उन्होंने प्रणव मुखर्जी को को भी हटाकर वीबी सिंह को फाइनेंस मिनिस्टर बना दिया इस तरह अंबानी के दो फ्रेंड्स सत्ता से दूर हो जाते हैं इसी बीच 29 मई 1945 को राजीव सरकार ने
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पॉलिस्टर बनाने वाले रॉ मटेरियल पीटीए को भी कंट्रोल्ड इंपोर्ट लिस्ट में डाल दिया जिससे इसका इंपोर्ट करना मुश्किल हो गया हालांकि धीरू भाई को इससे खास दिक्कत नहीं हुई सरकार ने 90 दिन के अंदर पीटीए इंपोर्ट्स करने देने की रियायत दी थी और
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धीरू भाई ने इसका खूब फायदा उठाया reliance1 4000 टन पीटीए के लिए लेटर्स ऑफ क्रेडिट जारी कर रखे थे जो 1986 के अंत में शुरू होने वाले उसके खुद के पीटीए प्लांट के शुरू होने तक कंपनी की जरूरतों
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को पूरा करने के लिए पर्याप्त थे लेकिन इसमें एक झोल भी था 27 मई से 29 मई को नई पॉलिसी जारी होने के कुछ घंटे पहले तक reliance1 इंपोर्ट करने के लिए कई लेटर ऑफ क्रेडिट जारी किए थे इसे लगा कि
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दिन के ग्रेस पीरियड के अंदर यानी 30 सितंबर तक 114000 टन पीटीए इंपोर्ट हो जाना चाहिए लेकिन reliance1 टन पीटीए ही इंपोर्ट कर पाई और बाकी 1 लाख टन को लेकर सरकार के खिलाफ कोर्ट में चली गई इस मुकदमे बाजी के बीच
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reliance1 के अगेंस्ट नेगेटिव खबरें फैलाती रही ऐसी इमेज बनाई गई कि बॉम्बे डाइंग अपने पुराने प्लांट में बहुत खराब माल बना रहा है हालांकि इस बीच धीरू भाई खुद भी फंसते जा जा रहे थे एक तो पीटीए इंपोर्ट्स को लेकर उनका केस चल रहा था
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दूसरी तरफ 26 अक्टूबर 1985 को खबर आई कि सीबीआई ने इस बात की इन्वेस्टिगेशन शुरू कर दी है कि क्या पीटीए को रिस्ट्रिक्टेड इंपोर्ट लिस्ट में डालने का फैसला पहले से ही reliance1 5 के दिन कल्याण जिले के
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असिस्टेंट कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज ने reliance1 23 करोड़ एक्साइज ड्यूटी की चोरी की है यह उस समय इंडिया की कॉरपोरेट हिस्ट्री में एक्साइज चोरी का सबसे बड़ा आरोप था इसी समय इस पॉलिस्टर महाभारत में एंट्री होती है इंडियन एक्सप्रेस के लेजेंड मालिक सेठ
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रामनाथ गोइंका की रामनाथ गोइंका कांग्रेस के क्रिटिक थे और उनका झुकाव जनसंघ की तरफ था यानी आरएसएस की तरफ था इसलिए वे अपोजिशन के रूल में सबसे ज्यादा खुश रहते थे दूसरी तरफ रामनाथ गोइंका नसली वाडिया के क्लोज फ्रेंड भी थे और उनके बेटे की
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तरह बन गए थे अट 1985 में रामनाथ गोइंका ने नुस वाडिया से पूछा कि उनका बिजनेस कैसा चल रहा है वाडिया ने कुछ खास जवाब नहीं दिया लेकिन उनकी पत्नी ने प्रेस और खुद एक्सप्रेस ग्रुप के न्यूज़ पेपर्स में
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बॉम्बे डाइंग के अगेंस्ट चल रहे मीडिया कैंपेन के बारे में बता दिया रामनाथ गोइंका ने तब तो ज्यादा कुछ नहीं कहा लेकिन अगले दिन बॉम्बे डाइंग के हेड ऑफिस जाकर वाडिया से प्रॉमिस किया कि वे ट्रस्ट ऑफ इंडिया यानी कि पीटीआई के
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चेयरमैन भी थे इसके बाद गोइंका धीरू भाई से मिलते हैं और उन्होंने यह मुद्दा उठाया हेमस मैकडोनाल्ड की किताब महाभारत इन पॉलिस्टर के हिसाब से गोइंका के दो करीबियों के अनुसार धीरू भाई ने एडमिट किया कि वे फेवरेबल प्रेस के लिए अपने
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इन्फ्लुएंस का यूज करते हैं उन्होंने गोइंका से कहा कि मेरे पास एक सोने की चप्पल है और एक चांदी की आगे वाला कौन है यह देखकर मैं या तो उसे सोने की चप्पल से मारता हूं या चांदी की चप्पल से एक दूसरा
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वर्जन यह भी है कि धीरबाई ने कहा था कि हर किसी की एक कीमत होती है लेकिन बाद में वे इससे मुकर गए और कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था लेकिन यह मीटिंग धीरू भाई के जीवन की सबसे बड़ी ब्लेंडर और मिस जजमेंट
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थी रामनाथ गोइंका ने हर कीमत पर धीरू भाई और रिलायस को एक्सपोज करने की कसम खाली इस काम के लिए उन्होंने स्वामीनाथन गुरुमूर्ति को चुना जो उनकी तरह ही आरएसएस बैकग्राउंड वाले सीए थे गुरुमूर्ति को एक्सप्रेस ग्रुप के सारे रिसोर्सेस दे दिए
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जाते हैं ताकि वे धीरू भाई अंबानी को एक्सपोज कर कर सकें तभी फरवरी 1986 में धीरबाई को अचानक से स्ट्रोक आ जाता है जिससे उनकी राइट साइड पार्शियली पैरालाइज्ड हो जाती है उन्हें इलाज के लिए अमेरिका ले जाना पड़ता है और कंपनी को
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चलाने की जिम्मेदारी उनके दो बेटों मुकेश और अनिल पर आ जाती है जो उस समय मात्र 29 और 27 साल के थे अब रामनाथ गोइंका के इंडियन एक्सप्रेस ने reliance1 के बाद एक बड़े-बड़े एक्सपोज करना स्टार्ट कर दिया
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ये सब एक्सपोज एस गुरुमूर्ति कर रहे थे और रिपोर्ट्स उनके नाम की बायलाइन के साथ ही पब्लिश होती थी गुरुमूर्ति ने डेट और एनआरआई शेयर इन्वेस्टमेंट स्कीम आदि पर reliance1 टन पर ईयर का पीटीए प्लांट लगाने की प्लानिंग कर रही थी लेकिन
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reliance1 प्लांट के लाइसेंस के लिए एप्लीकेशन देने के बाद मथुरा की रिफाइनरी के पीटीए प्लांट को 75000 टन का कर दिया गया और reliance1 टन के प्लांट का लाइसेंस दे दिया गया इसका का विरोध करने वाले सेक्रेटरी का भी ट्रांसफर कर दिया गया था
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लेकिन गुरुमूर्ति यहीं नहीं रुकते बल्कि 15 मई 1986 से उन्होंने थ्री पार्ट सीरीज reliance1 से 14 जून के बीच पब्लिश की गई फोर पार्ट सीरीज में गुरुमूर्ति ने नॉर्दर्न यूरोप के ब्रिटिश कंट्रोल के अंदर आने वाले टापू आइल ऑफ मैन में
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रजिस्टर्ड सेल कंपनीज के जरिए किए गए गड़बड़ जाले को फिर से हाईलाइट किया 3 महीने के अंदर ही इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्ट्स का असर दिखने लगा और धीरू भाई कई फ्रंट्स पर घिर गई आरबीआई ने reliance1 इंपोर्ट्स की पॉलिसी लीक होने
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को लेकर सीबीआई की जांच पहले से ही चल रही थी और इस तरह धीरू भाई चारों तरफ से घिर गए हालांकि मुकेश अंबानी और फिर खुद धीरू भाई के रामनाथ गोयंका से अपील करने पर रहे 5 जुलाई को टेबल इड ब्लडज ने रिपोर्ट
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पब्लिश की कि सरकारी कैनरा बैंक ने पीटीए इंपोर्ट के लिए reliance1 इंपोर्ट कर सके इसके बाद आरबीआई ने reliance1 5 में नौ बैंक्स ने reliance1 करोड़ का लोन दिया है बैंक्स ने यह भी नहीं देखा कि यह कंपनियां लोन वापस
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चुका सकती हैं या नहीं कई कंपनियां तो नई-नई खुली थी और उनके पास बस 1000 और 0000 की कैपिटल थी जबकि उन्हें लोन ₹ लाख तक का दे दिया गया ये सब खबरें मीडिया में सामने आने के बाद
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reliance1 और सनसनी के रिपोर्ट पब्लिश कर दी और [संगीत] reliance1 5 और 886 में अपने अप्रूव्ड पॉलिस्टर प्लांट्स के साथ छिपा कर 1 अरब का एक और प्लांट स्मगल किया था उस वक्त इंडिया में कुछ भी इंपोर्ट करने के लिए
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लाइसेंस चाहिए होता था और टैक्स देना होता था reliance1 182 में भी अप्रूव्ड कैपेसिटी से अधिक कैपेसिटी का प्लांट और 1985 में बैलेंसिंग इक्विपमेंट्स के नाम पर एक एडिशनल यान प्लांट स्मगल कर चुकी है आगे इस खबर के एक फॉलोअप आर्टिकल में इंडियन
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एक्सप्रेस ने दावा किया कि इस स्मगलिंग के साथ-साथ गवर्नमेंट पॉलिसीज में भी ऐसे चेंजेज हुए जो reliance1 को भी यह जांच टीम बॉम्बे के कस्टम्स हाउस में reliance1 बाद भी कई मीटिंग्स हुई लेकिन यह जांच टीम reliance1 तरह
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कर अप्रैल 1986 में प्रणव मुखर्जी को पार्टी से बाहर निकाल चुके थे जब धीरू भाई की धालिया की तस्वीर उजागर होने लगी तो राजीव को लगा कि इस मंगल फैक्ट्रीज और उनके लिए हवाला के जरिए किया गया पेमेंट
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धीरू भाई पर केस करने के लिए बेस्ट केस है इसलिए राजीव गांधी इंडियन एक्सप्रेस के गुरुमूर्ति से खुद पूरी कहानी सुनना चाहते थे इस तरह गांधी फैमिली के लॉयलिस्ट मोहम्मद यूनिस ने गुरुमूर्ति से बात की और पूरे केस को समझा इधर राजीव सरकार में
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फाइनेंस मिनिस्टर वीपी सिंह ने ब्लैक इकॉनमी के खिलाफ वर छेड़ रखी थी और भूरेलाल को डायरेक्टर ऑफ इंफोर्समेंट बना दिया यानी ईडी का डायरेक्टर बना दिया इस तरह 1986 की शुरुआत से भूरेलाल भी धीरू भाई पर अटैक करने वालों में शामिल हो जाते
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हैं इस बीच गुरुमूर्ति को वाशिंगटन बेस्ट प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी द फेयरफैक्स ग्रुप के बारे में पता चलता है और उन्होंने वहां जाकर गोइंका के बिहाव पर फेयरफैक्स के फाउंडर माइकल हट्समैन से बात की अब गोइंका के इन्विटेशन पर हट्समैन 15
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नवंबर 1988 को दिल्ली आए और यहां उन्होंने भूरेलाल से उन्हें मिलवाया गया डील हुई कि उनकी इन्वेस्टिगेशन के कारण का उसका 20 पर उन्हें दिया जाएगा इधर धीरू भाई को अब अपने लिए दिल्ली के दरवाजे खोलने की जरूरत महसूस होने लगी जो 1985
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में राजीव गांधी के सत्ता में आने के बाद बंद हो गए थे दैट आई विल बेर ट्रू फेथ एंड अलीज टू द कांस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया टू द कांस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया ए अब सवाल यह था कि राजीव को कैसे मनाया जाए इलस्ट्रेटेड
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वीकली ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 1986 में अमिताभ बच्चन के जरिए धीरू भाई और राजी गांधी के बीच एक मीटिंग अरेंज की गई राजीव के साथ अपनी पहली मीटिंग में धीरू भाई ने राजीव गांधी
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से ब्लंटली कहा कि उनके पास उनकी स्वर्गीय माता जी के बहाब पर बहुत सारा फंड रखा हुआ है और वे जानना चाहते हैं कि वे उसका क्या करें धीरबाई ने मीटिंग में इंडस्ट्रियल एक्सपेंशन को लेकर भी अपने प्लांस रखे और
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बताया कि वे कैसे राजीव के हाईटेक इंडिया के विजन से मैच करते हैं और उसमें कैसे वे मदद कर सकते हैं देश का विकास करने के लिए धीरू भाई अंबानी यह परसेप्शन पैदा करने में कामयाब रहे कि उनके दुश्मन राजीव के
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भी दुश्मन हैं इसके लिए धीरू भाई अंबानी ने वीपी सिंह और अमिताभ बच्चन की अनमन का भी इस्तेमाल किया बच्चन फैमिली और नेहरू फैमिली दोनों का होम टाउन इलाहाबाद था जहां वे एक दूसरे के काफी क्लोज थे अमिताभ
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बच्चन और राजीव साथ ही बड़े हुए थे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव के कहने पर ही अमिताभ बच्चन पॉलिटिक्स में आए यानी कांग्रेस पार्टी में आए और 1984 का इलेक्शन भी लड़े अमिताभ बच्चन उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद सीट से सांसद चुनकर आए
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थे इलाहाबाद सीट से ही वीपी सिंह भी सांसद बने थे और उनका जन्म भी इलाहाबाद में ही हुआ था एक तरह से इलाहाबाद और यूपी अमिताभ बच्चन और वीपी सिंह दोनों के लिए एक कॉमन ग्राउंड था अमिताभ की राजीव से नजदीकियां
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और राजनीति में आने जाने की उनकी संभावनाओं से वीपी सिंह और अमिताभ बच्चन के बीच एक अनुबंध थी जब राजीव सरकार में वित्त मंत्री वीपी सिंह की पॉलिसीज धीरू भाई के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही थी इस स्थिति में धीरू भाई ने अमिताभ बच्चन और
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वीपी सिंह की खराब इक्वेशंस का फायदा उठाया धीरू भाई और राजीव के बीच हुई मीटिंग्स का असर भी देखने को मिला 2 दिसंबर 1986 को सरकार ने पार्लियामेंट में बताया कि सीबीआई ने इस बात की जांच शुरू कर दी है कि क्या गुरुमूर्ति को सीक्रेट
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गवर्नमेंट पेपर्स की अनऑथराइज्ड एक्सेस दी गई थी 21 दिसंबर को सीबीआई ने मद्रास में गुरुमूर्ति के ऑफिस पर छापा मार दिया और कई डॉक्यूमेंट साथ ले आई 23 जनवरी 1987 के दिन राजीव गांधी ने अचानक से वीपी सिंह से
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फाइनेंस मिनिस्टर का पद भी छोड़कर डिफेंस मिनिस्टर का पद संभालने के लिए कह दिया कुछ दिन बाद यानी 10 या 11 मार्च 1987 की रात राजीव गांधी को दो सनसनीखेज लेटर्स दिखाए जाते हैं ये लेटर्स पीएमओ तक कैसे
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पहुंच ये पता नहीं चला लेकिन इन लेटर्स में ऐसा कुछ था जो राजीव के लिए खतरनाक साबित हो सकते थे इन लेटर्स में फेयरफैक्स इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी ने गुरुमूर्ति को अमिताभ बच्चन की स्विस प्रॉपर्टीज यानी स्विट्जरलैंड में जो प्रॉपर्टीज हैं उनके
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बारे में बताया था और अमिताभ के भाई अजिताभ बच्चन के एनआरआई स्टेटस के बारे में पूछा था इन लेटर्स में रामनाथ गोइंग का नसली वाडिया और भूरेलाल आदि का नाम भी था ये भूरेलाल वही थे जिन्हें वीपी सिंह
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ने डायरेक्टर ऑफ इंफोर्समेंट यानी ईडी का डायरेक्टर बनाया था और जो धीरू भाई अंबानी पर कार्यवाई कर रहे थे अब राजीव को लगने लगा कि वीपी सिंह और नसली बाड़िया उनकी मां के दुश्मन रहे रामनाथ गोइंका के साथ
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मिलकर उनके पुराने दोस्त अमिताभ बच्चन को टारगेट करके अंत में राजीव गांधी को ही निशाना बनाने की राजनीतिक साजिश कर रहे हैं चूंकि इस मामले में अमेरिकी प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी फेयर फैक्स भी इवॉल्व थी और ये लेटर्स उसी से रिलेटेड थे
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इसलिए मामला अब दो देशों का हो गया अब राजीव सरकार की तरफ से सीबीआई के डायरेक्टर मोहन काटरेना में नेशनल सिक्योरिटी का एंगल डालने को कहा गया अब सीबी ने इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट यानी ईडी से ला से जुड़ी हुई इन्वेस्टिगेशन के सारी
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फाइल्स ले ली राजीव को लेटर मिलने के तुरंत बाद ही यानी 11 मार्च की रात 10:30 बजे ही भूरेलाल को ईडी के डायरेक्टर पद से हटा दिया जाता है और उनका ट्रांसफर करेंसी और कॉइन सेक्शन में कर दिया जाता है 12
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मार्च की रात 1:30 बजे सीबीआई की एक टीम गुरुमूर्ति के घर पर छापा मारकर उन्हें क्रिमिनल कंस्पिरेशन और ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट का उल्लंघन करने के आरोप में अरेस्ट कर लेती है 13 मार्च को सीबीआई ने दिल्ली में मौजूद इंडियन एक्सप्रेस के के गेस्ट
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हाउस पर छापा मार दिया और यहां तोड़फोड़ की उस समय रामनाथ गोइंका गेस्ट हाउस पर ही थे और नुस वाडिया और कंट्रोवर्शियल हिंदू गॉड मैन यानी चंद्रा स्वामी उनसे मिलने के लिए आए हुए थे सीबीआई की सर्च के बाद नसली
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वाडिया और चंद्रा स्वामी को जाने दिया गया लेकिन गोइंका वहीं रहे जब सीबीआई के डिटेक्टिव्स उनके पेपर्स की जांच कर रहे थे तभी गोइंका को एक टेलीफोन कॉल आता है ये कॉल किसी और का नहीं बल्कि धीरू भाई
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अंबानी का था धीरू भाई अंबानी ने गोइंका को हेल्प ऑफर की लेकिन यह सुनकर गोइंका ने फोन को नीचे पटक दिया वहीं सीबीआई ने गुरुमूर्ति को दिल्ली लाकर उनसे 48 घंटे तक लगातार पूछताछ की इसमें से ज्यादातर सवाल अमिताभ बच्चन की टारगेटिंग को लेकर
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थे अभी तक बाहर किसी को भी फेयरफैक्स के इन लेटर्स के बारे में नहीं पता था इसलिए सीबीआई ने गुरुमूर्ति से कहा कि उसे 11 मार्च को एक विश्वसनीय इंफॉर्मेशन मिली है कि गुरुमूर्ति और बाकी लोग फॉरेन डिटेक्टिव एजेंसीज के कांटेक्ट में हैं और
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उन्हें गवर्नमेंट की सेंसिटिव इंफॉर्मेशन दी है लेकिन गुरुमूर्ति ने खाना और कपड़ा लाने वाले फ्रेंड्स के जरिए गोइंका तक यह खबर पहुंचा दी कि सरकार के पास कोई लेटर्स हैं 17 मार्च को सीबीआई ने गुरुमूर्ति को दिल्ली के चीफ मजिस्ट्रेट के सामने पेश
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किया और यहां पहली बार यह जिक्र किया गया कि उसके पास एक लेटर है जिसमें लिखा है कि गुरुमूर्ति ने फेयरफैक्स को पेमेंट किया था गुरुमूर्ति ने अपने डिफेंस में कहा कि फेयरफैक्स को भूरेलाल ने हायर किया था
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उन्होंने नहीं उन्होंने हैं इस दौरान 20 मार्च के दिन कलकाता के न्यूज़पेपर द स्टेट्समैन ने फेयरफैक्स के पहले लेटर को पब्लिश कर दिया जिसके बाद गुरुमूर्ति और गोइंका आदि को समझ आ गया कि दरअसल हो क्या रहा है गोइंका को शक हुआ कि
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यह लेटर किसी अमेरिकन ने नहीं बल्कि इंडियन ने लिखा है दूसरी तरफ फेयरफैक्स के फाउंडर माइकल हर्स मैन और उनके डिप्टी मैकी ने कहा कि यह लेटर फर्जी हैं उन्होंने कहा कि वे इतने बेवकूफ तो कम से कम नहीं हैं इतने अनप्रोफेशनल नहीं हैं कि
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ऐसी चीजें पेपर्स पर लिखेंगे अब बात देश की संसद में भी पहुंच जाती है पार्लियामेंट में कांग्रेस के मिनिस्टर्स और एमपीज ने वीपी सिंह को टारगेट किया और कहा कि उन्होंने अमेरिका की खुप एजेंसी सीआईए से लिंक वाली फॉरेन एजेंसी
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फेयरफैक्स को इवॉल्व करके नेशनल सिक्योरिटी को खतरे में डाला है कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि फेयरफैक्स को सेंसिटिव इंफॉर्मेशन दी गई है जिसका सीआईए के ऑपरेटिव भारत को ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं अब इस मामले की जांच
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के लिए जस्टिस एमपी ठक्कर और एस नटराजन के अंडर एक इंक्वायरी कमीशन बना दी जाती है जिसे ती महीने में ही अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया 12 अप्रैल को वीपी सिंह प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलने के लिए
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गए लेकिन इस बार उन्हें वैसा सपोर्ट नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे इसलिए उसी दिन वीपी सिंह ने कांग्रेस सरकार में अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया वीपी सिंह के इस्तीफा देने के 4 दिन बाद ही वो फोर्स
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स्कैम सामने आ जाता है जिसमें आरोप लगा कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने 1.2 अरब डॉलर की तोप खरीद का इंडियन आर्मी का कांट्रैक्ट पाने ने के लिए इंडियन एजेंट्स और पॉलिटिशियन को बड़ी रिश्वत दी थी इसी
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स्कैम में राजीव गांधी का भी नाम सामने आया जिसके कारण वीपी सिंह और उनमें टकराव और अधिक बढ़ गया अंततः जुलाई 1987 में कांग्रेस ने वीपी सिंह को पार्टी से बाहर निकाल दिया 30 नवंबर को गवर्नमेंट को ठक्कर नटराजन कमीशन की रिपोर्ट मिल गई
Speaker A
जिसका राजीव गांधी को बेसब्र से इंतजार था इस रिपोर्ट में कहा गया कि वीपी सिंह ने भूरेलाल को अमेरिका की एक ऐसी डिटेक्टिव एजेंसी जिसमें सीआईए के कुछ पुराने अधिकारी भी काम करते थे उसके साथ इंगेज होने की की परमिशन देकर भारत की सुरक्षा
Speaker A
को खतरे में डाला है इस कमीशन की रिपोर्ट के कंक्लूजन में कहा गया कि नसली वाडिया ने इस मामले में एक्टिव रोल प्ले किया है और उन्होंने reliance1 188 में धीरू भाई ने ऐलान किया कि वे गुजरात के भरूच में एक ऑयल रिफाइनरी
Speaker A
बनाने के लिए अप्लाई कर रहे हैं जो हर साल 60 लाख टन का प्रोडक्शन करेगी अभी तक ऑयल रिफाइनरी का काम सर सरकारी या सरकार द्वारा कंट्रोल कंपनीज के हाथों में ही होता था इसलिए धीरू भाई को ऑयल रिफाइनरी
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के लिए परमिशन मिलने के चांसेस बहुत ज्यादा कम थे लेकिन फिर भी उन्होंने इसके लिए अप्लाई किया धीरू भाई का कहना था कि आज नहीं तो कल सरकार को रिलाइज हो जाएगा कि वे अकेले इंडिया की बढ़ती हुई ऑयल
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रिफाइनिशिव नसली बाड़िया की बम्बे डाइंग के साथ अब धीरू भाई और पॉलिस्टर महाभारत पीटीए और डीएमटी से पराक्लिन तक पहुंच गया जिससे यह दोनों चीजें बनती हैं 1988 तक reliance1 प्लांट स्टार्ट हो चुका था जो नेपता से पराक्लिन
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बनाने लगा था दूसरी तरफ बम्बे डाइंग को अपने डीएमटी प्लांट के लिए पराक्लिन इंपोर्ट करना पड़ रहा था मार्च 1988 में सरकार ने पराक्लिन पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाकर 85 पर से 120 पर कर दी इसके साथ ही इंटरनेशनल मार्केट में भी पैक्सन का
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प्राइस $400 टन से बढ़कर $85 टन हो गया बम्बे पराक्लिन का एकमात्र इंडियन इंपोर्टर था लेकिन अब इंटरनेशनल मार्केट में पराक्लिन की कीमतें बढ़ने और कस्टम ड्यूटी बढ़ जाने के कारण दोनों तरफ से नुकसान हो रहा था जुलाई 1988 में
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reliance1 लाख टन की बजाय 0000 टन की कीमत पर खरीद सकती थी दिलचस्प बात यह रही कि बम्बे डाइंग से जुड़ी नेशनल पेरोक्साइड को यह स्टेटस नहीं मिला इसलिए धीरू भाई अंबानी अब इस रेस में आगे निकल गए साल
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1989 के अंत में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले धीरू भाई अंबानी को कांग्रेस के एक बड़े बैकर के तौर पर देखा जाने लगा सरकार में धीरू भाई के फ्रेंड्स की वापसी होने लगी थी मार्च 1989 में आरके धवन की
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प्राइम मिनिस्टर ऑफिस में दोबारा वापसी होती है जो इंदिरा गांधी के पॉलिटिकल मैनेजर और धीरू भाई के करीबी थे अब वे वापस से राजीव सरकार में आ चुके थे वहीं मार्च 1987 से ही पूरा माहौल नसली वाडिया और इंडियन एक्सप्रेस के खिलाफ होने लगा था
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रामनाथ गोइंका की तबीयत भी खराब होने लगी थी 1988 के अंत तक एक्सप्रेस ग्रुप के अगेंस्ट 230 से अधिक केस चल रहे थे सरकार ने उससे अपने एड्स वापस ले लिए जो विज्ञापन थे वो वापस ले लिए और बैंक्स को
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उसे कर्ज नहीं देने के लिए कहा गया 1999 के अंत तक एक्सप्रेस ग्रुप कॉलेप्स होने की कगार पर था इसलिए वाडिया को सबसे बड़ा झटका लगा 1989 में 12 जुलाई 1989 को वाडिया फॉरेन ट्रिप से बॉम्बे के सांता
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क्रूज एयरपोर्ट पर उतरे ही थे कि इमीग्रेशन ऑ ऑफिशल्स ने उन्हें डिपोर्टेशन ऑर्डर थमा दिया जिसमें लिखा था कि भारत सरकार ने उन्हें अनडिजायरेबल एलियन डिक्लेयर कर दिया है वाडिया को देश छोड़ने के लिए महज 24 घंटे का समय दिया गया ऐसा
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देश जहां उनका जन्म हुआ जहां उन्होंने अपना अधिकांश जीवन गुजारा और जहां उनकी फैमिली 300 सालों से बिजनेस कर रही थी हालांकि वाडिया ने कोर्ट में अर्जेंट अपील की जिसने इस ऑर्डर पर रोक लगा दी लेकिन इसी बीच एक अजीब सी घटना होती है
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महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर शरद पवार ने नुसरी बाड़िया को टेलीफोन करके बताया कि उनका एसिनेट करने की साजिश रची जा रही है शरद पवार वाडिया के पुराने दोस्त थे और धीरू भाई से उनकी खास नहीं बनती थी 1
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अगस्त की शाम को बम्बे सीआईडी ने कीर्ति अंबानी को अरेस्ट कर लिया जो लाय में जनरल मैनेजर थे और पब्लिक रिलेशंस और कस्टम्स एक्ससाइज से संबंधित मामलों को संभालते थे कीर्ति अंबानी पर नसली वाडिया की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा आरोप लगा कि
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कीर्ति अंबानी अर्जुन बावरिया नाम के एक बैंड सिंगर की मदद से नुस बाड़िया को मारने का प्लान बना रहे थे बाद में एक इंटरव्यू में बाबरिया ने वाडिया के एसनेस की प्लानिंग करने की बात एक्सेप्ट की उन्होंने बताया कि वाडिया उनकी हिट
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स्क्वाड के हाथों मारे जाने से बाल-बाल बचे थे एक मौके पर ये हिट स्क्वाड वेस्टर्न घाट में वाडिया के पीछे-पीछे एक बंगले तक पहुंच गई थी लेकिन वे दो घंटे लेट थे इसलिए वाडिया बच जाते हैं इसी तरह
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इस गैंग ने वाडिया को उनके घर के सामने और एक हॉस्पिटल के सामने पकड़ने की भी कोशिश की थी जहां वे बीमार रामनाथ गोइंका को देखने के लिए आए थे लेकिन गैंग इसमें सफल नहीं हुई वाडिया को मारने की इस पूरी
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साजिश का जुलाई 1989 में भंडाफोड़ हुआ दरअसल इनकी गैंग का एक मेंबर एक बार में शराब पीने के दौरान इस बारे में बात कर रहा था जिसे पुलिस के एक मुखबीर ने सुन लिया इसके बाद पुलिस इस गैंग मेंबर को
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पूछताछ के लिए ले गई जहां उसने सारे राज उगल दिए पूरी साजिश पता लगने के बाद बॉम्बे के पुलिस कमिश्नर यानी कि वसंत शराब को इसके बारे में बताया गया पुलिस कमिश्नर ने इसके बारे में चीफ मिनिस्टर शरद पवार को ब्रीफ किया जिन्होंने सारे
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एविडेंस खुद देखे इसके बाद उन्होंने वाडिया को स्पेशल प्रोटेक्शन प्रोवाइड करने का आदेश जारी किया और पुलिस से बहुत सावधानी से इस मामले की जांच करने के लिए कहा 31 जुलाई 1989 को शरद पवार ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऑफिस में फोन
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करके कैबिनेट सेक्रेटरी यानी बीजी देशमुख को पूरी साजिश के बारे में इंफॉर्मेशन इतनी आगे बढ़ गई है कि अब उसे रोका नहीं जा सकता इसलिए डैमेज कंट्रोल करने के लिए 4 अगस्त को इस केस को अब सीबीआई को
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ट्रांसफर कर दिया गया इसी समय पर इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर मानेक डावर ने एक ऐसी रिपोर्ट पब्लिश की जिससे साफ हो गया कि सीबीआई डायरेक्टर मोहन काटरेया के आदमी हैं इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया कि मोहन काटरेना की
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₹ लाख कमा रहे थे इस पैसे से उन्होंने बॉम्बे में एक अपार्टमेंट भी खरीदा जिसमें कई बार सीबीआई डायरेक्टर मोहन काटर खुद भी रुकते थे इसके साथ ही उमेश ने एक अंबानी जिनके अंडर कीर्ति अंबानी काम करते थे उन्होंने सीबीआई से कहा कि हमें कीर्ति
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अंबानी के अरेस्ट के बाद ही उनके इस साजिश में इवॉल्व होने की बात पता चली सीबीआई के हाथ में आने के बाद जल्द ही यह केस पब्लिक व्यू से गायब हो जाता है और सभी आरोपियों को धीरे-धीरे जमानत मिल जाती है 1989 के
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अंत में 22 और 24 नवंबर को लोकसभा चुनाव आ जाते हैं इन चुनावों में राजीव गांधी की कांग्रेस की सीटों की संख्या 415 से गिरकर 192 पर आ गई हालांकि कांग्रेस अभी भी सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन लेकिन बहुमत हासिल
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नहीं कर सकी इस तरह राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो जाते हैं और विपक्षी गठबंधन के समर्थन से राजीव गांधी के विरोधी वीपी सिंह प्राइम मिनिस्टर बन जाते हैं वीबी सिंह की नई सरकार में धीरू भाई के सारे
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विरोधी फिर से पावर में आ गए ईडी के पूर्व डायरेक्टर रहे भूरेलाल को प्रधानमंत्री का स्पेशल ऑफिसर बना दिया गया नए फाइनेंस मिनिस्टर मधु दंडवते भी पब्लिक सेक्टर के सपोर्टर थे और अंबानी स्टाइल के बड़े क्रिटिक थे अब वीपी सिंह की सरकार आने के
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बाद लाय के खिलाफ पुराने मामलों को फिर से खोला जाने लगा 12 दिसंबर 1989 को सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम्स ने बॉम्बे कस्टम के कलेक्टर के विश्वनाथन को एक नया ऑर्डर जारी कर दिया इस ऑर्डर में बॉम्बे
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कस्टम के कलेक्टर के विश्वनाथन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक्स्ट्रा पॉलिस्टर प्लांट स्मगल मामले में अंबानी को बचाने के लिए गलत कारण दिए थे और अपने जजमेंट में गंभीर गलतियां की हैं इस ऑर्डर में यह भी साफ-साफ कहा गया कि
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बम्बे कस्टम के नए कलेक्टर बना दिए गए एएम सिन्हा ने दोबारा से इस केस को कस्टम्स एक्साइज एंड गोल्ड कंट्रोल अपीलेट ट्रिब्यूनल में खुलवाया कुछ ही समय के बाद एक और कस्टम्स स्कैंडल सामने आया सेंट्रल कस्टम्स एंड एक्साइज बोर्ड की जांच में
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पता चला कि नवंबर 1982 में 03 करोड़ का नुकसान हुआ इस तरह जनवरी 1990 में बीवी कुमार को भी सेंट्रल बोर्ड ऑफ कस्टम्स एंड एक्साइज से बाहर निकालकर ट्रांसफर कर दिया जाता है मई 1990 में बॉम्बे कस्टम्स के अधिकारियों ने पाताल
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गंगा में मौजूद reliance1 प्लांट में लगी मशीनरी की जानकारी ली तुरंत बाद ही कंपनी को 170 पेज का नोटिस भी सौंप दिया जाता है इसमें reliance1 टन सालाना कैपेसिटी का लाइसेंस था जबकि उसने 1.90 लाख टन कैपेसिटी वाला
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पीटीए प्लांट इंपोर्ट किया वहीं जिस पराक्लिन प्लांट की कैपेसिटी 51000 टन बताई गई थी वह हर साल 4 लाख टन का प्रोडक्शन कर सकता था कस्टम ने आरोप लगाया कि कम कैपेसिटी दिखाकर कंपनी ने ₹ अरब की ड्यूटी बचाई है यानी सरकारी टैक्स बचाया
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है इसके जवाब में reliance1 या द्वारा प्रमोटेड वेंटा से लगाए जा रहे हैं और लाइसेंस के तहत ही पूरी मशीनरी मंगाई गई है हुई थी धीरू भाई अंबानी और reliance1 वी बालू सुब्रमण्यम ने रूलिंग अलायंस और बाहर से सरकार को समर्थन दे रहे
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बड़े-बड़े नेताओं को अपनी तरफ करना स्टार्ट कर दिया साल 1979 में धीरू भाई ने जनता सरकार को गिराने के लिए इंदिरा गांधी की मदद की थी और एक बार फिर से वीपी सिंह सरकार की कमजोरियां धूड़ी जाने लगी
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की कोशिशों पर चर्चा ना होती हो लेकिन पॉलिटिकल सिचुएशन ही ऐसी बनी थी कि वीपी सिंह की सरकार खुद ही कमजोर होती जा रही थी वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर दी थी और सरकार के द्वारा इस
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फैसले के बाद समाज के कुछ तबकों में बड़ा ही विरोध होता है इसके बाद इधर बीजेपी और संघ ने अयोध्या में राम मंदिर को लेकर अपना अभियान शुरू कर दिया 12 सितंबर 1990 को लाल कृष्णा आडवानी ने रथ यात्रा शुरू
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कर दी थी अगले दो महीनों में देश भर के कई स्थानों पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दंगे शुरू हो जाते हैं और इन सब घटनाओं से सरकार पर दबाव बढ़ने लगा और सरकार कमजोर नजर आने लगी सितंबर आते-आते यह साफ हो गया
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कि वीपी सिंह की सरकार अब लड़खड़ा रही है इस बीच 23 अक्टूबर को बिहार राज्य में विपक्षी पार्टियों से मिलकर बने जनता दल की सरकार ने यानी लालू प्रसाद यादव ने आडवानी की रथयात्रा को रोक लिया और इस
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घटना से जनता दल और भाजपा के बीच बिगड़ हो जाती है भाजपा ने तुरंत ही वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और इसी मौके पर कांग्रेस के राजीव गांधी और जनता दल के ही दूसरे नेता यानी चंद्रशेखर ने जनता दल
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के सांसदों को तोड़ना शुरू कर दिया अब धीरू भाई भी चंद्रशेखर के इस अभियान को सपोर्ट करने वाले चार बड़े बिजनेसमैन में से एक थे 7 नवंबर 1990 को सरकार के वन थर्ड सांसदों ने वीपी सिंह के खिलाफ वोट
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कर दिया और उन्हें पीएम पोस्ट से इस्तीफा देना पड़ गया 3 दिन बाद ही चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली जिसे कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी इससे अब reliance1 के हाईएस्ट लेवल पर पहुंच जाता
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है इसी बीच 6 मार्च 1991 को राजीव गांधी ने चंद्रशेखर से समर्थन वापस ले लिया और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया ही थॉट दैट नोबडी गोइंग टू रिजाइन द पोस्ट ऑफ द प्राइम मिनिस्टर एंड द फर्स्ट
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पवा देर आई रिजाइन दैट इज द आई नेवर मेट राजीव गांधी इस तरह 1991 में एक बार फिर दोबारा से लोक सवा चुनाव कराए जाने की घोषणा की जाती है 1991 के चुनावों के प्रचार के दौरान ही 21 मई 19 91 के दिन
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तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या कर दी जाती है इससे कांग्रेस को लोगों की सिंपैथी मिलती है और कांग्रेस 226 सीटें जीतने में कामयाब हुई इस तरह कांग्रेस के पीवी नरसिंहा राव देश के नए प्रधानमंत्री बने इस वक्त तक देश की इकोनॉमी डूबने वाली
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थी और भारत पर बहुत अधिक कर्ज बढ़ चुका था इसलिए देश में कुछ बड़े बदलाव किए जाने की जरूरत महसूस हो रही थी इससे पहले आपने देखा कि अलग-अलग चीजों के लिए अलग-अलग बिजनेसमैन को लाइसेंस दिया जा रहा था इसका
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मतलब देश की इकॉनमी पर सरकार का बहुत अधिक कंट्रोल था सरकार ही ज्यादातर उद्योगों को कंट्रोल कर रही थी इसलिए उस दौर को लाइसेंस दौर भी कहा जाता है इस लाइसेंसी दौर को खत्म करने के लिए पीवी नरसिंहा राव
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के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने इंडियन इकॉनमी को लिबरलाइज कर दिया और इंडियन इकॉनमी का एक नया युग शुरू कर दिया हालांकि अब तक reliance1 में धीरू भाई अंबानी ने मुकेश अंबानी को जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी दी गई मुकेश अमानी थोड़े इंट्रोवर्ट थे वो
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एक तरह से ऑपरेशन गाय थे उनका काम था टाइम पर और बजट में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स का सेटअप करना वहीं अनिल अंबानी थोड़े एक्स्ट्रो वर्ट थे तो वो reliance1 194 में नरसिंहा राव की सरकार ने अरब सागर से गैस और तेल निकालने का काम
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एक कंसोर्टिंग को देने का फैसला लि किया जिसमें reliance1 4 और 93 में रिलाइंस टाटा आयरन और स्टील को पछाड़कर एनुअल सेल्स ऑपरेशन प्रॉफिट नेट प्रॉफिट नेट वर्थ और एसेट्स के मामले में इंडिया की सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी बन जाती है 1993 के अंत तक
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कंपनी में काम कर रहे धीरू भाई के अडन के कलीग्स को भी अब रिटायर कर दिया गया क्योंकि मुकेश और अनिल को लग रहा था कि अब उनमें कंपनी के एक्सपेंशन को आगे ले जाने लायक एनर्जी नहीं बची है इसलिए उन्हें
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रिटायर कर दिया गया उनकी जगह पर देश भर के अलग-अलग हिस्सों से मैनेजर्स को हायर किया जाता है इससे कंपनी में गुजरातियों का प्रभाव कम हो गया अमानी फैमिली ने भी अपनी संपत्ति का बंटवारा कर लिया धीरू भाई के
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दोनों भाइयों यानी कि रमनी भाई और नातू भाई ने reliance1 रूल्स छोड़ दिए और बाहर अपने पर्सनल बिजनेस पर ध्यान देना शुरू शुरू कर दिया यानी उन्होंने अलग बिजनेस करना शुरू कर दिया हालांकि दोनों भाई अभी भी reliance1 था कि उनके बच्चे कंपनी के
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वारिसों में यानी वो अब मालिक नहीं रहेंगे असली वारिस अब धीरू भाई के बेटे अनिल और मुकेश हैं आगे जून 2000 में reliance1 पर हिस्सेदारी हो गई 2001 आते-आते 51 पर पॉलिस्टर मार्केट और पी पीटीए और एमजी जैसे पॉलिस्टर इंटरमीडिएट्स
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की 80 पर मार्केट पर reliance1 पर प्लास्टिक अब reliance1 के बराबर हो गया इस बीच 24 जून 2002 को धीरू भाई अंबानी को दूसरा बड़ा स्ट्रोक आता है और वे 12 दिन तक लाइफ सपोर्ट पर कोमा में रहते हैं 6 जुलाई 2002
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को धीरू भाई दुनिया छोड़कर चले गए जब धीरू भाई की मौत हुई तो उनके दोनों बेटे मुकेश और अनिल अंबानी उनके पास ही थे अनिल ने बताया कि धीरू भाई के पर्सनल फिजीशियन डॉक्टर पांडे ने उसी सुबह कहा था कि अगर
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धीरू भाई जाएंगे तो सैटरडे की रात को ही जाएंगे क्योंकि वे किसी को परेशान नहीं करना चाहते सैटरडे रात को उनका निधन होगा तो सभी संडे को आराम से उनका अंतिम संस्कार कर सकेंगे और लोगों को ऑफिस की
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छुट्टी नहीं करनी पड़ेगी इसके आगे लाय में अनिल अंबानी और मुकेश अंबानी का योग शुरू हो जाता है मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी की कहानी आगे फिर कभी लेकिन यहां 1991 में हुए लिबरलाइजेशन की स्टोरी बहुत ज्यादा इंटरेस्टिंग है जब भारत की अर्थव्यवस्था
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अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी और भारत पर बहुत ज्यादा कर्ज बढ़ चुका था तब वित्त मंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने देश को कैसे उभारा कैसे भारत की अर्थव्यवस्था को ग्रोथ के रास्ते पर वापस लाए आखिर 1991 का
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लिबरलाइजेशन क्या है इसे लेकर मैंने एक डिटेल वीडियो बनाई है जिसे आप मेरे चैनल पर देख सकते हैं इसका लिंक मैंने डिस्क्रिप्शन बॉक्स में डाल दिया है इसके साथ साथ ही टाटा ग्रुप की ग्रोथ कैसे हुई जीआरडी टाटा से लेकर रतन टाटा तक का पूरा
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इतिहास बताने वाली वीडियो भी हमने अपने चैनल पर अपलोड की हुई है इसे भी आप मेरे चैनल पर देख सकते हैं इसकी भी लिंक आपको डिस्क्रिप्शन बॉक्स में मिल जाएगी जाते-जाते बात ब्लिंक एकस की अगर आप भी शेयर मार्केट में ट्रेड करना चाहते हैं तो
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ब्लिंक एकस को डाउनलोड करें इसका लिंक मैंने कमेंट बॉक्स और डिस्क्रिप्शन बॉक्स में डाल दिया है एक पर्सनल अपील कृपया इस चैनल को जरूर सब्सक्राइब करें आपके ऐसा करने से हमारा मनोबल बढ़ता है इसी तरह की और भी वीडियो देखने के लिए बने रहिए चैनल
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पर नमस्कार
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