हरेन पांड्या की हत्या का रहस्य, नरेंद्र मोदी पर आरोप, और जांच की अनसुलझी गुत्थियाँ।
Key Takeaways
- हरेन पांड्या की हत्या केवल एक अपराध नहीं, बल्कि राजनीतिक साजिश का हिस्सा मानी जाती है।
- हत्या की जांच में कई विसंगतियाँ और छुपे हुए तथ्य सामने आए हैं।
- मोदी और पांड्या के बीच सत्ता संघर्ष हत्या के पीछे की संभावित वजह हो सकती है।
- सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की फर्जी एनकाउंटर हत्याओं ने मामले को और जटिल बनाया।
- जज लोया की मौत ने इस मामले की जांच को और विवादास्पद बना दिया।
What the video covers
- 26 मार्च 2003 को भाजपा नेता और पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या की अहमदाबाद में रहस्यमय हत्या हुई।
- पांड्या और नरेंद्र मोदी के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी, जो हत्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
- हत्या के बाद पुलिस ने मुस्लिमों द्वारा बदला लेने की थ्योरी पेश की, जिसे कई सवालों ने चुनौती दी।
- फॉरेंसिक रिपोर्ट और कॉल डिटेल्स की जांच में कई विसंगतियाँ सामने आईं, जो हत्या की असली कहानी पर सवाल उठाती हैं।
- सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति नामक गैंगस्टर इस हत्या से जुड़े बताए गए, जिन्हें बाद में फर्जी एनकाउंटर में मारा गया।
- जज लोया की रहस्यमय मौत ने इस मामले की जांच को और पेचीदा बना दिया।
- सीबीआई की जांच पर भी सवाल उठाए गए कि क्या वह पूरी तरह निष्पक्ष थी।
- पांड्या की हत्या को राजनीतिक साजिश माना जाता है, जिसमें कई उच्चस्तरीय अधिकारियों और नेताओं के नाम जुड़े हैं।
- मीडिया और पत्रकारों की इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स ने इस मामले के कई पहलुओं को उजागर किया।
- यह वीडियो इस हत्या के रहस्यों और उससे जुड़े राजनीतिक आरोपों की गहराई से पड़ताल करता है।
Chapters
- 00:00हरेन पांड्या की हत्या की शुरुआत और घटनाक्रम
- 02:04मोदी-पांड्या के बीच राजनीतिक संघर्ष और जासूसी
- 04:03हत्या स्थल और पुलिस जांच की विसंगतियाँ
- 05:47फॉरेंसिक रिपोर्ट और कॉल डिटेल्स की जांच
- 09:29सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की भूमिका
- 17:21फर्जी एनकाउंटर और राजनीतिक साजिश के आरोप
- 23:18जज लोया की रहस्यमय मौत और जांच की जटिलताएँ
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Speaker A
26 मार्च, 2003 के दिन गुजरात में हर दिन की तरह सूरज उगा। सुबह करीब साढ़े सात बजे, भाजपा के कद्दावर नेता और गुजरात के गृहमंत्री रहे हरेन पांड्या, अपनी मारुती 8 हंड्रेड कार लेकर, एक पार्क में टहलने के लिए निकले। लेकिन कुछ देर बाद ही पूरे अहमदाबाद में एक खबर ने सनसनी फैला दी कि
Speaker A
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधी नेता हरेन पांड्या की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई है। अहमदाबाद शहर में इस मौत को एक राजनीतिक हत्या की तरह देखा गया। नजदीक के एक अस्पताल में हरेन पांड्या का शव ले जाया गया, जब वहां मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे तो हरेन पांड्या के पिता ने
Speaker A
उन्हें वहां से चले जाने के लिए कहा। इसके बाद जब नरेंद्र मोदी हरेन पांड्या के शव पर श्रद्धांजली देने गए तो हरेन पांड्या के बूढ़े पिता ने कहा- आप यहाँ से जाइए, हमें आपकी सिम्पेथी नहीं चाहिए। भाजपा और आरएसएस से जुड़ा एक ब्राह्मण परिवार होते हुए भी हरेन पांड्या का परिवार नरेंद्र मोदी को ही उनकी
Speaker A
हत्या का जिम्मेदार मान रहा था। इसके कई कारण थे, चूँकि मोदी और हरेन पांड्या दोनों आरएसएस से आते थे, और हरेन पांड्या पहले से ही गुजरात में गृहमंत्री थे, इसलिए वे आने वाले समय में मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी हो सकते थे। मोदी शुरू से ही उन्हें अपने प्रतिद्वंदी की तरह देखते थे। जब नरेंद्र मोदी
Speaker A
को पहली बार गुजरात का CM बनाया गया तो सबसे पहले उन्होंने हरेन पांड्या के पर कुतरते हुए उन्हें गृह मंत्री पद से हटाकर राजस्व मंत्री बना दिया। चूँकि CM बनने से पहले मोदी की कोई लोकप्रियता नहीं थी, और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए पहले किसी विधानसभा सीट से जीतकर विधायक बनना था इसलिए मोदी चाहते थे
Speaker A
कि उन्हें अहमदाबाद की एलिसब्रिज विधानसभा सीट मिल जाए। और वो सीट थी जहाँ से भाजपा नेता हरेन पांड्या लगातार तीन बार से विधायक बनकर आ रहे थे। जब हरेन पांड्या ने मोदी को अपनी विधानसभा सीट देने से मना
Speaker A
कर दिया तो वे मोदी की नजरों में खटकने लगे। इसी बीच जब गुजरात में दंगे होने लगे, 3 हजार से अधिक लोगों की हत्याएं हुईं। जांच होने लगी कि इतने बड़े स्तर पर दंगे किसने कराए? एक खबर उड़ने लगी कि मोदी के एक
Speaker A
मंत्री ने मोदी की सीक्रेट मीटिंग को लेकर एक जांच आयोग को बयान दिया है। हरेन पांड्या की जासूसी होने लगी। खुफिया विभाग के एक आईपीएस अधिकारी की डायरी से पता चला कि ये जासूसी नरेंद्र मोदी के कहने पर
Speaker A
की जा रही थी। हरेन पांड्या को मंत्री-मंडल से निकाल दिया गया। दंगों के तुरंत बाद हुए चुनाव में नरेंद्र मोदी ने उनकी टिकट भी काट दी। कुछ महीने बाद ही हरेन पांड्या की रहस्यमयी तरीके से हत्या हो गई। इस हत्या
Speaker A
को राजनीतिक हत्या की तरह देखा गया। बाद में कई साल बाद खुलासा हुआ कि सोहराबुद्दीन नाम के एक गैंगेस्टर को हरेन पांड्या की हत्या की सुपारी दी गई थी। और सुपारी भी किसी और ने नहीं दी बल्कि मोदी और अमित
Speaker A
शाह के प्रिय पुलिस अधिकारी- डीजी बंजारा ने दी थी। साल 2005 में सोहराबुद्दीन को भी गुजरात पुलिस ने एक फर्जी एनकाउंटर करके निपटा दिया गया। इसका आरोप भी ये लगा कि ये सोहराबुद्दीन को भी डीजी बंजारा ने ही निपटाया था। सोहराबुद्दीन ने जिस तुलसी प्रजापति को पैसे देकर हरेन पांड्या को मरवाया था,
Speaker A
उस तुलसी प्रजापति को भी सोहराबुद्दीन के बाद अगले ही साल गुजरात पुलिस ने एनकाउंटर में निपटा दिया। और सबसे बड़ी बात कि सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति दोनों की हत्या के मामले की सुनवाई कर रहे थे सीबीआई के जज लोया। और साल 2014 में जज इस मामले की सुनवाई के दौरान ही जज लोया की भी रहस्यमयी तरीके से मौत
Speaker A
हो गई। ये ऐसी कड़ियाँ हैं जिन्हें जोड़ा जाए तो एक सीधी कड़ी बनती है- जो 2002 से शुरू होकर साल 2014 तक जाती है। इसलिए आज के इस एपिसोड में हम इस सवाल के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे कि Who Killed Haren
Speaker A
Pandya.. हरेन पांड्या को किसने मारा? —---- नमस्कार मैं श्याम मीरा सिंह, जिन रहस्यमयी परिस्थितियों में भाजपा नेता और गुजरात के गृहमंत्री रहे हरेन पांड्या की हत्या की गई वो अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ जाती है। 26 मार्च,
Speaker A
2003 की सुबह हरेन पांड्या अपनी मारुति कार लेकर हमेशा की तरह अहमदाबाद के लॉ गार्डन मोर्निंग WALK के लिए गए। इधर उनकी पत्नी जागृति पांड्या अपने बच्चे को स्कूल के तैयार कर रही थीं जिसका स्कूल
Speaker A
सुबह के सात बजे से शुरू होता था। लेकिन काफी समय हो जाने के बाद भी हरेन पांड्या घर नहीं लौटे। उनकी पत्नी को चिंता होने लगी। तभी सुबह के दस बजे करीब यानी हरेन पांड्या के घर से निकलने के करीब तीन घंटे
Speaker A
बाद, हरेन पांड्या के सेक्रेटरी नीलेश भट्ट को एक कॉल आई। वे तुरंत भागकर लॉ गार्डन पहुंचे। वहां जाकर देखा तो लॉ गार्डन के पार्किंग एरिया में खड़ी हरेन पांड्या की कार में उनकी लाश पड़ी हुई है, जिसे
Speaker A
गोलियों से भून दिया गया था। इस मामले की जांच शुरू हुई। पुलिस ने यादराम नाम के एक ठेला लगाने वाले को एकमात्र गवाह के रूप में पेश किया। यादराम का कहना है कि- मैंने अपनी आँखों के सामने सब होता देखकर
Speaker A
इतना घबरा गया कि एक घंटे तक अपनी जगह से हिल नहीं पाया। इसके बाद मैंने अपने सेठ को फोन किया। गुजरात पुलिस के गवाह यादराम के अनुसार- दो अज्ञात गुंडों ने हरेन पांड्या को उनकी कार की खिड़की से बंदूकें
Speaker A
मारीं। हरेन पांड्या की मौत के समय केंद्र में भाजपा की सरकार थी और आडवाणी गृहमंत्री थे जो नरेंद्र मोदी के एक तरह से राजनीतिक संरक्षक थे। माना जाता है कि गुजरात सरकार की जांच पर लोग भरोसा नहीं करेंगे
Speaker A
इसलिए सीबीआई की जांच बिठा दी गई। सीबीआई ने छह महीने के भीतर ही अपनी जांच पूरी कर दी और ये जांच कुछ और नहीं थी बल्कि गुजरात पुलिस की थ्योरी को ही थी जिसके अनुसार- हरेन पांड्या की हत्या, मुस्लिमों
Speaker A
द्वारा गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए की गई है। एक तरह से इस मामले को इस्लामी आतंकवाद से जोड़ दिया गया। लेकिन ये कहानी उतनी सरल नहीं जितनी ऊपर से दिखती है। ये तो गुजरात पुलिस का वर्जन है। बाकी
Speaker A
वर्जन सामने आते हैं तो अपराधी अपराधी नहीं लगेंगे और नेता नेता नहीं लगेंगे। हरेन पांड्या की मौत को लेकर कई गंभीर सवाल उठे- पहला सवाल ये कि अहमदाबाद शहर के बीच में स्थित लॉ गार्डन और लोकल- एलिसब्रिज
Speaker A
थाने के बीच महज 2.2 किमी की दूरी है और वहां से आने में महज 7-8 मिनट का वक्त लगता है। वैसे में ऐसा कैसे हुआ कि तीन घंटे तक, एक भी पुलिसकर्मी घटना स्थल पर क्यों नहीं पहुँच पाया। दूसरा सवाल- अगर पांड्या को उनकी कार में ही गोली मारी गई थी, तो फॉरेंसिक रिपोर्ट में कार में एक भी गोली का
Speaker A
अंश क्यों नहीं मिला? उन्हें पांच गोलियां मारी गईं, ऐसे कैसे हो सकता है कि एक भी गोली का निशान न मिले? तीसरा सवाल- पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि हरेन पांड्या को एक गोली उनके अंडकोष यानी नीचे
Speaker A
से होते हुए मारी गई जो उनके पेट को चीड़ते हुए सीने से होकर निकल गई। मारुति 800 हंड्रेड जैसी एक छोटी सी गाड़ी की सीट पर बैठे करीब छह फीट के हट्ठे-हट्ठे हरेन पांड्या को साइड वाली खिड़की से गोली मारी जाए,
Speaker A
ऐसे कैसे हो सकता है कि गोली नीचे से ऊपर की तरफ शरीर को चीरते हुए निकल जाएगी? चौथा सवाल- चूँकि पांच गोलियों में से एक गोली उनके अंडकोष से होकर मारी गई, जहाँ पर कि शरीर की नसें केंद्रित होती
Speaker A
हैं, अगर वहां कोई गोली लगती है तो पूरा शरीर खून से लथपथ हो जाता। पूरी गाड़ी खून से सन जाती। लेकिन ऐसे कैसे हो सकता है कि फोरेंसिक रिपोर्ट में कार में खून ही नहीं मिला। कम से कम गाड़ी की सीट तो खून से लथपथ होती,
Speaker A
लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। फोरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार गाड़ी की सिर्फ अगली सीट पर एक धब्बा और चाबी के छल्ले पर एक धब्बा के अलावा पूरी गाड़ी में खून के निशान नहीं मिलते। पांचवा सवाल- हरेन पांड्या की कॉल डिटेल्स क्यों नहीं निकलवाई गईं? उन्होंने सुबह किसे कॉल कीं, या उन्हें किसने कॉल कीं, ये कॉल डिटेल्स हरेन पांड्या की मौत का रहस्य खोलने में महत्वपूर्ण हो सकती थीं,
Speaker A
लेकिन ऐसा नहीं किया गया। मौके पर ही उनका सैमसंग का फोन मिला लेकिन उसे नहीं जांचा गया। जब हरेन पांड्या की मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर कंपनी हच से उनका कॉल डाटा माँगा तो उसने साल 2003 के जनवरी
Speaker A
और फरवरी महीने का डाटा तो दे दिया। लेकिन मार्च महीने का डाटा देने से इंकार कर दिया, जिसमें कि हरेन पांड्या की मौत हुई थी। कंपनी ने कहा कि ये डाटा बहुत पुराना है इसलिए डाटा उपलब्ध
Speaker A
नहीं है। जबकि मार्च से पहले आने वाले जनवरी और फरवरी महीने का डाटा कंपनी ने खुद दिया, जो कि मार्च से पुराने हैं। ये भी एक अजीब बात है। ये टेलीग्राफ और तहलका जैसी मैगज़ीन में काम कर चुके
Speaker A
वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट- Who Killed Haren Pandya में तथ्यों के साथ लिखे हुए हैं। इन तथ्यों से ये इस बात की और इशारा मिलता है कि हरेन पांड्या की हत्या लॉ गार्डन के
Speaker A
पार्किंग स्थल पर नहीं हुई बल्कि उनका अपहरण किया गया और बाद में उनकी बॉडी को कार में रख दिया गया। अगर ऐसा है तो ये तथ्य गुजरात पुलिस के इकलौते गवाह यादराम के बयान पर प्रश्न खड़े करता है जिनके अनुसार
Speaker A
उनके सामने दो लोगों ने कार की ओपन खिड़की से गोली मारकर हरेन पांड्या की हत्या की गई, घटनास्थल से मात्र दस मिनट की दूरी होने के बावजूद पुलिस को पहुँचने में तीन घंटे लग गए, इसके पीछे के रहस्य
Speaker A
को टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार- किंगशुक नाग की ये बात भी और गहरा कर देती है जिसे वे अपने ब्लॉग- Who killed Haren Pandya? में बताते हैं कि उन्हें मालूम है कि कुछ पुलिस अधिकारियों को हरेन पांड्या की मौत की खबर स
Speaker A
किसी के निर्देशों के अंतर्गत काम कर रही थी. जैसे संकर्षण ठाकुर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ‘’इस बीच एलिसब्रिज पुलिस को कंट्रोल रूम से एक और फोन आता है कि पता करो लॉ गार्डंस में क्या हो रहा है,
Speaker A
वहां कुछ हंगामा हो रहा है कुछ अफ़वाहें चल रही हैं। इसके बाद एक और सब-इंस्पेक्टर वाई.ए. शेख रवाना होते हैं। लॉ गार्डंस के आधे रास्ते तक पहुंच पाते हैं कि तभी कंट्रोल रूम से उनके पास एक और कॉल आता है
Speaker A
कि परिमल गार्डंस जाना है, न कि लॉ गार्डंस। वह अपना रास्ता बदल लेते हैं। दस बजकर 50 मिनट पर उनके पास एक और कॉल आता है और उन्हें फिर से लॉ गार्डंस जाने के लिए कहा जाता है। वह दस बजकर 54 मिनट पर
Speaker A
वहां पहुंचते हैं और तब तक पंड्या को गोली मारे लगभग तीन घंटे बीत चुके थे। और यह जानकर आपको हैरानी होगी कि शेख़ के साथी सब इंस्पेक्टर नाइक, जो लॉ गार्डंस के लिए शेख़ से भी पहले रवाना हुए थे, वे भी अभी तक
Speaker A
घटनास्थल पर नहीं पहुंचे थे। तब वह आखिर कौन था जो उस सुबह लोकल पुलिस को आदेश दे रहा था। जो जगह महज 10 मिनट के फासले पर थी, वहां पहुंचने में इतना वक्त क्यों लगा? वो भी एक नहीं दो-दो पुलिसकर्मियों को.
Speaker A
इन तमाम महतवपूर्ण कड़ियों को दरकिनार करते हुए सीबीआई ने हरेन की हत्या के लिए हैदराबाद के एक 30 साल के नौजवान असगर अली जिम्मेदार ठहराया. असगर अली अपराध की दुनिया से ही आता था और मुस्लिम भी था, गुजरात की मौजूदा परिस्थितियों में उसे ही हरेन पांड्या की हत्या दोषी ठहराना आसान भी था. सीबीआई
Speaker A
ने इस मामले के लिए मुख्य साजिशकर्ता- अहमदाबाद के ही एक मौलवी- मुफ्ती सूफियान को माना और कहा कि इसने ही असगर अली को हरेन पांड्या की हत्या के लिए सुपारी दी थी. मतलब जिस केस की सुइयां भाजपा के ही बड़े नेताओं को कटघरे में खड़ा कर रही थीं, वहीं ऐसा मुस्लिम एंगल लाया गया कि उन्हें ना
Speaker A
केवल उस केस से मुक्ति मिल गई बल्कि राजनीतिक लाभ भी मिल गया कि उन्हें और उनके नेताओं को इस्लामी चरमपंथियों से खतरा है क्योंकि वे हिन्दुओं का भला करते हैं. लेकिन जब हरेन पांड्या मामले को लेकर कोर्ट में ट्रायल शुरू हुए तो सीबीआई के पास बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं थे. सत्ता की सूली
Speaker A
नाम की किताब के अनुसार- जांच कर रही सीबीआई की थ्योरी में झोल होने के बावजूद जज सोनिया गोकनी ने साल 2007 में पोटा क़ानून के तहत 12 लोगों को दोषी करार दे दिया और सभी को उम्र कैद की सजा सुना दी.
Speaker A
लेकिन झूठ और फर्जी दस्तावेजों पर टिका ये मुकदमा हाईकोर्ट में नहीं टिक पाया. गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस DH वाघेला और जस्टिस जेसी उपाध्याय ने सभी 12 दोषियों को रिहा कर दिया. हाईकोर्ट ने जांच करने वाले अधिकारीयों को भी फटकार लगाते हुए कहा कि मौजूदा केस के रिकॉर्ड से बिल्कुल साफ़ दिखने
Speaker A
वाली चीज ये है कि श्री हरेन पांड्या की हत्या के केस की जांच पूरी चकतियों से भरी पड़ी है और उसमें कहीं-कहीं रोशनी दिखती है और ये बहुत कुछ किये जाने की मांग करती है जिसे छोड़ दिया गया’’
Speaker A
हाईकोर्ट ने जांच अधिकारीयों को अयोग्य तक कहते हुए कहा- जाँच से जुड़े अधिकारीयों को अपनी अयोग्यता की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. जिसके नतीजे के तौर पर इससे जुड़े कई लोगों को भीषण उत्पीडन का सामना करना पड़ा; इसके साथ ही सार्वजनिक संसाधनों का भारी पैमाने पर नुकसान और अदालतों का टाइम वेस्ट हुआ.’’
Speaker A
दरअसल यहाँ एक बड़ी Interesitng चीज है- जिस जांच टीम के खिलाफ हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की थी उसकी अगुआई किसी और ने नहीं बल्कि आईपीएस YC मोदी ने की थी, और इन्हीं भाई साहब को साल 2017 में ही नरेंद्र मोदी सरकार ने सम्मानित करते हुए देश की ख़ुफ़िया एजेंसी- NIA का हेड बनाया.
Speaker A
लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले से दो सवाल मन में उठते हैं, एक ये कि अगर इन 12 लोगों ने हरेन पांड्या की हत्या नहीं की तो किसने की? और क्यों की? दूसरा सवाल ये गुजरात पुलिस और भाजपा की ही सीबीआई किसे बचाने के लिए इतने महत्वपूर्ण सबूतों को इग्नोर कर रही थी, किसके कहने पर जांच
Speaker A
को दूसरी दिशा में ले जाया जा रहा था. हरेन पांड्या की हत्या किसने की इसे लेकर एक महत्वपूर्ण खुलासा एक गवाह ने किया. साल 2018 में सोहराबुद्दीन शेख गैंग के एक मेंबर मुहम्मद आजम खान ने मुंबई की एक ट्रायल कोर्ट में कहा-कि सोहराबुद्दीन शेख जिसे कि गुजरात पुलिस ने एक फर्जी एनकाउंटर
Speaker A
करके मार गिराया था, उस सोहराबुद्दीन शेख ने मुझे बताया था कि उसे गुजरात के गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या करने के लिए डीजी वंजारा ने सुपारी दी थी. डीजी बंजारा वही हैं जिन्हें अमित शाह और नरेंद्र मोदी का सबसे खास अधिकारी माना जाता है. डीजी बंजारा को गुजरात में एनकाउंटर
Speaker A
स्पेशलिस्ट के नाम से जाना जाता था.अब सवाल उठता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खास अधिकारी डीजी बंजारा ने किसके कहने पर हरेन पांड्या की हत्या की सुपारी दी होगी., खैर ये एक रहस्य है. लेकिन इस रहस्य को अगर कड़ियों से जोड़ें तो जवाब ढूँढना उतना भी मुश्किल नहीं हैं, जो बात सोहराबुद्दीन के
Speaker A
दोस्त- आजम खान ने कही, वही बात गुजरात साबरमती जेल के SP रहे- आईपीएस अधिकारी रहे संजीव भट्ट, ने भी कही. उन्होंने बताया था कि साबरमती जेल में असगर अली ने, जो कि हिरेन पांड्या की हत्या के आरोप में साबरमती जेल में कैद था, उसने बताया था कि सोहराबुद्दीन प्रजापति के गुर्गे तुलसीराम
Speaker A
प्रजापति ने ही हरेन पांड्या की हत्या की थी. संजीव भट्ट के अनुसार असगर अली ने उन्हें बताया कि सोहराबुद्दीन ने हरेन पांड्या की हत्या के लिए सबसे पहले उससे ही कॉन्ट्रैक्ट किया था और इस काम के लिए उसे अहमदाबाद भी लाया था. इसके बाद उसने हरेन पांड्या की रेकी भी की थी लेकिन लास्ट मौके पर पलट
Speaker A
गया और हैदराबाद वापस लौट गया. इसके बाद उसे पता चला कि सोहराबुद्दीन के साथी- तुलसी प्रजापति ने हरेन पांड्या की हत्या कर दी है. साफ है हरेन पांड्या की मौत का आरोप- दो दो महत्वपूर्ण गवाहों के माध्यम से
Speaker A
सोह्ज्राबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति पर जाता है. लेकिन इन दोनों ही गैंगेस्टर- सोहराबुद्दीन शेख और तुलसी प्रजापति को गुजरात पुलिस ने फेक एनकाउंटर करके और झूठी कहानियां रचके निपटा दिया था. आखिर गुजरात पुलिस को ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति को किसे
Speaker A
बचाने के लिए मार दिया गया. दरअसल इस सवाल की भी एक कड़ी है- जब साल 2003 में हिरेन पांड्या की मौत हुई उस वक्त केंद्र में भाजपा की सरकार थी और सीबीआई- गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के हाथ में थी. लेकिन
Speaker A
साल 2004 में केंद्र में सरकार बदल गई और कांग्रेस की सरकार आ गई, अब सीबीआई पर आडवाणी का नियंत्रण नहीं रह गया. वो कांग्रेस के हाथ आ गई. इसे लेकर DNA वेबसाइट ने भी साल 2011 में एक खुलासा करते हुए खबर
Speaker A
की है कि सोहराबुद्दीन के माध्यम से हिरेन पांड्या को निपटाने वाले उसके राजनितिक आकाओं को लगा कि अब ये केस दुबारा खुल सकता है. इसलिए सोहराबुद्दीन को समय से ही निपटाने का प्लान बना दिया गया. और हुआ भी
Speaker A
यही था और साल 2005 में ही सोहराबुद्दीन को आतंकी बताकर एनकाउंटर में मार डाला गया. जब कांग्रेस के वक्त सीबीआई ने सोहराबुद्दीन मामले कीजांच की तो सीबीआई ने साल 2010 में अपनी चार्जशीट में खुलासा किया कि सोहराबुद्दीन कोई आतंकी नहीं था बल्कि अमित शाह के ही फिरौती रैकेट का एक सदस्य था. अमित शाह एक
Speaker A
फिरौती रैकेट चलाते थे और सोहराबुद्दीन उनके रैकेट के लिए जमीन पर काम करता था. बाद में अमित शाह ने ही डीजी बंजारा से सोहराबुद्दीन को निपटाने के लिए कहा था. यहाँ अब हरेन पांड्या की हत्या से जुड़े दो
Speaker A
तारों को जोड़ा जा सकता है, एक आजम खान का बयान कि डीजी बंजारा ने सोहराबुद्दीन को हरेन पांड्या की हत्या के लिए सुपारी दी थी. दूसरा तार डीजी बंजारा ने ही अमित शाह के कहने पर सोहराबुद्दीन को एक फर्जी
Speaker A
एनकाउंटर करके निपटा दिया था. क्यों निपटाया गया ये अब आप सोचें. ऐसा नहीं है कि इन तारों को सच मान लिया जाना चाहिए. इन दोनों कड़ियों पर भी शक किया जाना चाहिए. लेकिन कुछ ऐसी घटनाएँ और हैं जो
Speaker A
इन कड़ियों को गलत साबित करने के बजाय सही साबित करती हुई मालूम पड़ती हैं… दरअसल हरेन पांड्या की हत्या के आरोपी- सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर करने से पहले उसका अपहरण किया गया था. 22 नवंबर, 2005 के दिन हैदराबाद के जहीराबाद के पास एक लक्जरी बस के सामने एक क्वालिस कार रूकती है,
Speaker A
सीबीआई की चार्जशीट की मानें तो गुजरात पुलिस के द्वारा इस बस में से सोहराबुद्दीन, सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति को उतार लिया जाता है, और गुजरात के लिए ले जाया जाता है. रास्ते में तुलसीराम प्रजापति को उदयपुर में, राजस्थान पुलिस को सौंप दिया जाता है. माना
Speaker A
जाता है कि तुलसीराम प्रजापति ने ही गुजरात पुलिस को सोहराबुद्दीन का पता बताया था. पुलिस ने ही उससे कहा था कि वो तुलसीराम प्रजापति का कुछ नहीं होने देंगे. इसलिए तुलसी प्रजापति को राजस्थान पुलिस को सौंप दिया गया और सोहराबुद्दीन और उसकी गर्भवती पत्नी कौसर भी को सीधे अहमदाबाद में स्थित दिशा फ़ार्म
Speaker A
हाउस ले जाया गया. 23 से 25 नवंबर तक सोहराबुद्दीन को दिशा फार्म में ही रखा गया लेकिन 25 नवंबर की रात सोहराबुद्दीन को दिशा फ़ार्म से अरहम फ़ार्म नाम की जगह शिफ्ट कर दिया गया और फिर इसी 25-26 नवंबर
Speaker A
की रात सोहराबुद्दीन को अहमदाबाद के विशाला सर्किल के पास, सोहराबुद्दीन को गोलियां मारकर निपटा दिया गया. जिन अधिकारीयों ने मिलकर सोहराबुद्दीन को निपटाया, उन अधिकारीयों के संपर्क में एक नेता- 22 नवंबर यानी जिस दिन सोहराबुद्दीन को अगवा किया और 26 नवंबर, यानी जिस दिन उसे निपटा दिया गया, इन चार
Speaker A
दिनों में वो शीर्ष नेता इन अधिकारीयों के लगातार संपर्क में था. ये बातें तब बाहर आईं जब इन सीबीआई ने इन अधिकारीयों की कॉल डिटेल्स निकालीं., उस नेता का नाम था- अमित शाह. सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में अमित शाह का न. जारी करते हुए बताया कि इस नंबर पर लगातार इस पूरे ऑपरेशन की पल पल की खबर ली जा रही
Speaker A
थी. सोहराबुद्दीन को निपटाने के बाद गुजरात पुलिस ने सेम थ्योरी रची कि ये लश्कर ए तैयबा का आतंकी था जो नरेंद्र मोदी को मारने आया था. हम राजस्थान पुलिस के साथ इसकी तलाश कर रहे थे, और तभी ये हाइवे पर
Speaker A
बाइक चलाते हुए दिखा, हमने इसे रोकने की कोशिश की और इसने हम पर ही बन्दुक चला दी, हमें भी सेल्फ डिफेन्स के लिए बन्दुक चलानी पड़ीं और सोहराबुद्दीन मारा गया. सोहराबुद्दीन को तो निपटा दिया गया लेकिन उसके अपहरण के दो गवाह थे- एक उसकी गर्भवती पत्नी- कौसर बी, जो इस मामले से पूरी तरह अनजान थी, और एक
Speaker A
तुलसीराम प्रजापति. कांग्रेस सरकार के वक्त सीबीआई ने जारी की अपने चार्जशीट में खुलासा किया है कि सोहराबुद्दीन की हत्या के बाद अमित शाह और मोदी के खास अधिकारी डीजी बंजारा और एसपी राजकुमार पांडियन ने सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी से मामला सुलटाने की कोशिश की. अपने पति की हत्या की खबर सुनने के बाद
Speaker A
निर्दोष कौसर बी रो-रोकर पागल हो गई. एकाएक उसकी हालत बिगड़ गई. उसे समझा-बुझाकर कुछ पैसे देने के लिए ऑफर किया गया. लेकिन कौसर बी नहीं मानी. अंत में कौसर बी को भी मार दिया गया; लेकिन उसकी मौत से पहले ही उसे एक और त्रासदी देखनी पड़ी थी, सीबीआई के अनुसार- गुजरात पुलिस के SI रविन्द्र मकवाना ने
Speaker A
बयान दिया कि उसने अजय परमार और संतराम शर्मा को आपस में बातचीत करते सुना था कि जिस सब इसंपेक्टर बीआर चौबे को दिशा फ़ार्म में कौसर बी की देखभाल के लिए रखा था, उसी बीआर चौबे ने उसकी उसके साथ बलात्कार
Speaker A
किया. कौसर बी के शव को ATS यानी एंटी-टेरर स्क्वाड की जीप से इलोल गाँव ले जाया गया, ये इलोल गाँव किसी और का नहीं बल्कि डीजी बंजारा का गाँव था. इस जीप के ड्राईवर ने सीबीआई के आगे गवाही दी कि कौसर बी
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का अंतिम संस्कार- इलोल गाँव की धावडी नदी के किनारे किया गया, उसकी हड्डियों और राख को एक बैग में रखकर उसके बचे हुए हिस्सों को नर्मदा नदी में फैंक दिया गया. और इस तरह सोहराबुद्दीन के अपहरण की गवाह कौसर
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बी को भी निपटा दिया गया. सोहराबुद्दीन और कौसर बी दोनों की हत्याओं के सूत्रधार डीजी बंजारा. वही डीजी बंजारा जो अमित शाह के खास थे, वही डीजी बंजारा जिन्होंने इसी सोहराबुद्दीन को हरेन पांड्या को निपटाने के लिए कथित तौर पर सुपारी दी थी, उन्होंने ही सीबीआई के अनुसार उन्हें निपटा दिया. कौसर बी की
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हत्या पर गुजरात सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट में अंततः मानना पड़ा कि हाँ उसके शरीर को जला दिया गया था. 1 मई, 2007 की फाइनेंसियल एक्सप्रेस की खबर के अनुसार- गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस तरुण चटर्जी की बेंच के सामने अंततः कबूल किया कि हाँ कौसर बी की हत्या की गई थी और उसे जलाया गया
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था. सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी का ये रहस्य कभी बाहर ना आ पाता अगर उनके भाई ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर न बताया होता कि जिस दिन सोहराबुद्दीन की हत्या हुई., तब से ही उनकी भाभी कौसर बी भी गायब है.
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इसका मतलब इस एनकाउंटर की कहानी में झोल है और अदालत को इसकी जाँच करवानी चाहिए. जैसा कि ऊपर बताया हरेन पांड्या की मौत से सोहराबुद्दीन को गुजरात पुलिस ने आतंकी बताकर निपटा दिया, उसके अपहरण की गवाह कौसर भी को भी बलात्कार कर मौत के घाट उतार दिया गया. लेकिन अब भी एक गवाह बचा था- जिसका नाम था- तुलसीराम
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प्रजापति. जो हरेन पांड्या, सोहराबुद्दीन और कौसर बी की मौत के रहस्यों को जानता था. इसी तुलसीराम प्रजापति द्वारा सोहराबुद्दीन ने हरेन पांड्या की हत्या की थी. और यही तुलसीराम प्रजापति इस बात का गवाह था कि सोहराबुद्दीन कोई लश्कर ए तैयबा का आतंकी नहीं था बल्कि हरेन पांड्या की हत्या से
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जुड़ी हुई एक कठपुतली था, जिसे चलाने वाले असली हाथ गुजरात में सबसे शक्तिशाली लोग थे. हरेन पांड्या की मौत के मामले में राजनितिक आकाओं को बचाने के लिए तुलसीराम प्रजापति का निपटाना जरूरी हो गया, और हुआ भी यही सोहराबुद्दीन की मौत के एक साल के भीतर ही- 28 दिसंबर 2006 की सुबह पांच बजे तुलसीराम
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प्रजापति की पुलिस कस्टडी में ही हत्या कर दी गई. सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक इस एनकाउंटर में भी डीजी बंजारा की ही केन्द्रीय भूमिका थी. इस केस में भी कहा गया कि तुलसीराम प्रजापति पुलिस की कस्टडी से भाग गया था, जब पुलिस ने छानबीन की तो उसे समर्पण करने के लिए कहा लेकिन उसने फायरिंग कर दी और पुलिस
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को सेल्फ डिफेन्स में बन्दुक चलानी पड़ी और तुलसीराम प्रजापति का एनकाउंटर करना पड़ा. वही कहानी- अपराधी कस्टडी से भाग रहा था और पुलिस को सेल्फ-डिफेन्स में एनकाउंटर करना पड़ा., राम राज्य में तुलसीराम के नाम में लगा ‘राम’ भी तुलसीराम प्रजापति को बचा न सका. अगर ये तुलसी प्रजापति कोई मुस्लिम होता
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तो इस कहानी में ये भी ये भी जोड़ दिया जाता कि ये लश्कर ए तैयबा का आदमी था जो हिन्दू ह्रदय सम्राट को मारने आया था., इस खबरों पर जनता की क्या प्रतिक्रियाएं रहतीं ये आप सोच सकते हैं.
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दरअसल भारतीय आपराधिक मामलों में, इस्लामी एंगल, आलू की तरह है, जिसे किसी भी सब्जी में डालकर अच्छा स्वाद तैयार किया जा सकता है. उन दिनों गुजरात 2002 दंगों के कारण काफी संवेदनशील स्थिति से गुजर रहा था. गुजरात में कोई भी बड़ी घटना घटती, उसका जिम्मा- पाकिस्तान की ISI, लश्कर ए तैयबा, दाउद और अंत में
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लोकल मुस्लिमों पर डाल दिया जाता. सिर्फ मुस्लिम नाम ही नहीं पकड़ा जाता, बल्कि ऐसे मुस्लिम नाम को पकड़ा जाता जिसकी पृष्ठभूमि भी थोड़ी सी अपराधिक किस्म की रही हो ताकि आसानी से आम जनता में ये विश्वास बनाया जा सके कि अमुक घटना उसी ने की होगी. इस तरह ये कांसेप्ट सत्ताधारी पार्टी की तीन तरह से
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मदद करता- एक तो ये कि इससे असली अपराधियों को बचा लिया जाता. दूसरा- इससे गुजरात में सांप्रदायिक आधार पर जनता को बांटने में भी मदद मिलती और अंततः इसका राजनितिक लाभ मिलता. तीसरा- इससे आम जनता में ये भी सन्देश जाता कि एनकाउंटरों के माध्यम से राज्य में क़ानून का शासन लाया जा रहा है और अपराधियों को
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निपटाया जा रहा है और ये काम सिर्फ एक शक्तिशाली नेता ही कर सकता है. गुजरात में मोदी के शासन के ऊपर किताब लिखने वाले रिटायर्ड आईएएस हर्ष मंदर अपनी किताब- Between Memory and Forgetting: Massacre and the Modi Years in Gujarat में लिखते हैं कि ये वो दौर था- जब गुजरात में जगह जगह एनकाउंटर हुए. करीब
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22 ऐसे लोगों को पुलिस के द्वारा निपटाया गया जिन पर मोदी की हत्या की साजिश रचने और आतंक फ़ैलाने का आरोप लगाया गया. बाद में जाँच करने पर कईयों एनकाउंटर फर्जी निकले. दरअसल उन दिनों गुजरात में बहुत से
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मुस्लिमों का ये कहकर एनकाउंटर कर दिया गया कि ये आतंकी थे और मोदी की हत्या करने आए थे. नरेंद्र मोदी की जान को खतरा बताकर ‘एनकाउंटर’ कर देने के भी कई फायदे थे- पहला इससे ये सन्देश जाता था
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कि नरेंद्र मोदी की जान को खतरा इसलिए है क्योंकि वे हिन्दुओं के हित की सोचते हैं, इससे नरेंद्र मोदी के ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ वाली इमेज बिल्ड की गई. गुजरात में उन दिनों ऐसी बहुत सी खबरें आती थीं कि मोदी,
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आरएसएस नेताओं और भाजपा नेताओं की हत्या की साजिश रचने वालों को पकड़ लिया गया. अब जबकि मोदी केंद्र में प्रधानमंत्री तक बन गए, तब भी आपको हर साल ऐसी कोई न कोई खबर मिल जाएगी जिसमें प्रचारित किया जाता
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है कि मोदी की जान को खतरा है., ये एक सोची समझी टेक्निक है जिससे हिन्दू वोटों में संवेदनाएं पैदा की जाती हैं. इसी टेक्निक पर चलते हुए हरेन पांड्या की हत्या को जिसे कि उनका खुद का परिवार एक राजनितिक हत्या के तौर पर देख रहा था, पत्रकार इसे एक राजनितिक हत्या के तौर पर देख रहे थे उस
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घटना को भी मुस्लिमों पर डाल दिया गया और उल्टा इसे भाजपा और मोदी के ही फेवर में कर दिया गया. ये थी हरेन पांड्या की मौत की कहानी. इससे पिछली वीडियों- सोहराबुद्दीन और अमित शाह के संबंधों के ऊपर बनाई
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है. उसकी लिंक भी इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगी. इसी सोहराबुद्दीन का केस सुन रहे जज लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. जज लोया की मौत के रहस्य के ऊपर विस्तार से वीडियो बनाई है. उसे
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भी आप देख सकते हैं. उसकी लिंक भी डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगी. इन सभी वीडियो को देखकर आप हरेन पांड्या, सोहराबुद्दीन शेख, तुलसीराम प्रजापति, और आखिर में जज लोया की मौत के रहस्य को समझ जाएँगे. जज लोया से जुडी इस सीरीज का ये आखिर ये आख़िरी वीडियो है. आप सबने मुझे इतने धैर्य से सुना. इसके लिए
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बहुत शुक्रिया. ये सीरीज उन इमानदार जज लोया को ही समर्पित है, जिन्होंने अपने पिता से कहा था- मैं तबादला ले लूँगा, मैं नौकरी छोड़ दूंगा, मैं गाँव जाकर खेती कर लूँगा लेकिन गलत फैसला नहीं सुनाऊंगा.
Speaker A
ऐसे जजों को बचाए जाने की जरूरत है. अगर न्यायाधीश नहीं बचेंगे तो न्याय नहीं बचेगा., अगर न्याय नहीं बचेगा तो हमारे पास कहने का वो आखिरी कारण नहीं बचेगा, जिसके आधार पर हम कह पाएँगे कि हम इन्सान हैं और मोहब्बत में यकीन रखते हैं. तय आपको करना है, सत्ता के लिए पिपाशु हो चुके नेताओं को बचाना
Speaker A
है या न्याय, शांति, प्यार, भाईचारा और मोहब्बत में यकीन रखने वाले छोटे छोटे आम इंसानों को.
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