1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की वजहें, इतिहास और पाकिस्तान के निर्माण की सच्चाईयों की ईमानदार व्याख्या।
Key Takeaways
- पाकिस्तान का निर्माण केवल एक राजनीतिक दुर्घटना नहीं बल्कि गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से जुड़ा था।
- हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक भिन्नताएं विभाजन की मुख्य वजह बनीं।
- ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने विभाजन की प्रक्रिया को तेज और जटिल बनाया।
- 1947 के विभाजन ने करोड़ों लोगों की जान और घरबार छीना, जिसका दर्द आज भी महसूस किया जाता है।
- इतिहास को समझना और उससे सीखना आज के युवाओं के लिए आवश्यक है ताकि भविष्य में बेहतर निर्णय लिए जा सकें।
What the video covers
- पाकिस्तान क्यों बना और भारत से अलग होने की जरूरत क्या थी, इस पर सवाल उठाए गए।
- 1947 के विभाजन के पीछे के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों की चर्चा।
- सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता और इस क्षेत्र की अलग सांस्कृतिक पहचान।
- मुस्लिम शासकों का योगदान और हिंदू-मुस्लिम तहजीब का संगम।
- मुगल साम्राज्य के दौर में हिंदुस्तान की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि।
- ब्रिटिश राज के दौरान राजनीतिक बदलाव और 1857 की क्रांति का महत्व।
- मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच संघर्ष और अलगाव की बढ़ती लकीर।
- 1947 के विभाजन के दौरान हुई हिंसा, विस्थापन और कष्टों का वर्णन।
- पाकिस्तान के निर्माण के पीछे के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक दबाव।
- आज के नौजवानों के लिए इस इतिहास को समझना और सवाल करना जरूरी है।
Chapters
- 00:00पाकिस्तान क्यों बना? विभाजन की जरूरत
- 01:42पाकिस्तान की वर्तमान समस्याएं और युवाओं के सवाल
- 03:55पाकिस्तान की धरती और प्राचीन सभ्यता
- 06:15मुस्लिम शासकों का योगदान और सांस्कृतिक विरासत
- 08:42हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक भिन्नताएं और सह-अस्तित्व
- 11:01ब्रिटिश औपनिवेशिक आक्रमण और राजनीतिक बदलाव
- 13:001857 की क्रांति और स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत
- 20:001947 का विभाजन: हिंसा, विस्थापन और उसका प्रभाव
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Speaker A
क्या जरूरत थी अलग होने की? आखिर पाकिस्तान बना ही क्यों? हिंदुस्तान के साथ ही रहते तो क्या बुरा था?
Speaker A
14 अगस्त 1947, ये रेडियो पाकिस्तान लाहौर है। आपको पाकिस्तान मुबारक। पाकिस्तान क्यों बना? एक ख्वाब की ताबीर या तारीख का हादसा। क्या जरूरत थी अलग होने की? हिंदुस्तान के साथ ही रहते तो क्या बुरा था?
Speaker A
क्या दो कौमी नजरिए में वाकई कोई हकीकत है? आई एम ऑन माय मिशन एंड आई कैन टेल यू नथिंग अबाउट देयर प्रेजेंस। क्या हमें धोखा दिया गया या वाकई कोई सॉलिड रीज़ था?
Speaker A
मोहम्मद अली की जय। अली की जय। बंटवारे का जिम्मेदार कौन था? कांग्रेस या मुस्लिम लीग?
Speaker A
हाउ कुड यू सेपरेट देम? दे लिव इन एव्री विलेज। दैट इज़ वन ऑफ़ द ऑब्जेक्शंस टू पार्टीशन?
Speaker A
हिंदू और मुसलमान मिलकर क्यों नहीं रह सकते थे? अगर तकसीम ना होती तो क्या आज हमारी हालत ज्यादा अच्छी होती?
Speaker A
इतनी बड़ी इकॉनमी, इतनी बड़ी मार्केट में होते, इतनी कुर्बानियां देकर, तारीख की सबसे बड़ी हिजरत करके, 10 लाख से ज्यादा जानें गईं, करोड़ों को बेघर करके आखिर हमें क्या मिला? आखिर पाकिस्तान बना ही क्यों?
Speaker A
बना ही क्यों? कभी रात को सुकून से बैठकर सोचा है या शायद इस भागती दौड़ती जिंदगी में इस टेंशन और महंगाई के दौर में सुकून से बैठने का टाइम ही नहीं मिलता। भाई, ना बिजली है, ना गैस पूरी आती है, नौकरी मिलती नहीं और टीवी
Speaker A
खोले तो लगता है कि बस अभी मारमारी शुरू हो जाएगी। ऐसे में ये जो अपना मुल्क है ना पाकिस्तान, अपनी धरती, कभी तो इस पर जान कुर्बान करने को दिल करता है। लेकिन, लेकिन कभी इसके हालात देखकर अगर सच पूछो तो दिल
Speaker A
खून के आंसू रोता है। ये जो मुश्किलात हैं, ये जो मायूसियां हैं, खासतौर पर अगर आप नौजवान हैं, हाथ में डिग्री है लेकिन मुस्तकबिल इस पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है। तो फिर दिमाग में कुछ सवाल जन्म
Speaker A
लेते हैं। उनमें से एक सवाल ऐसा भी है जो करने की हिम्मत शायद हमारे बाप दादा ने तो कभी नहीं की। लेकिन आज का नौजवान, आप और मैं यह जरूर सोचते हैं कि यार क्या जरूरत थी अलग होने की? आखिर पाकिस्तान बना ही क्यों?
Speaker A
हिंदुस्तान के साथ ही रहते तो क्या बुरा था। शायद आज हालात इतने खराब ना होते। इतनी बड़ी इकॉनमी, इतनी बड़ी मार्केट में होते। इतनी कुर्बानियां देकर, तारीख की सबसे बड़ी हिजरत करके, 10 लाख जानें गईं, करोड़ों को बेघर करके आखिर हमें क्या
Speaker A
मिला? सवाल बहुत मुश्किल है, बहुत सख्त है। लेकिन हमें यह सवाल खुद से करना होगा। इसका जवाब नौजवानों के सामने लाना होगा कि हमारे बड़ों ने अपना घर, अपनी जमीन, अपनी पहचान, अपना सब कुछ छोड़ दिया। आखिर क्यों? कौन सी ऐसी आग थी उनके सीनों में?
Speaker A
कौन सा ऐसा खौफ था उनकी आंखों में? वो खून की नदियां, वो आंसुओं के दरिया, वो लुटी हुई इज्जतें, वो नेजों पर टंगे बच्चे। क्या वो सब एक गलती थी? एक गलतफहमी थी? एक सियासी चाल थी? एक हिस्टोरिकल एक्सीडेंट
Speaker A
था? क्या हमें धोखा दिया गया या वाकई कोई सॉलिड रीजन था? कोई ऐसी मजबूरी, कोई ऐसा खतरा था जिसने करोड़ों इंसानों को यह सब कुछ दांव पर लगाने पर मजबूर कर दिया। आज इसी मिलियन डॉलर क्वेश्चन का जवाब
Speaker A
ढूंढेंगे। पूरी ईमानदारी से, बिना किसी डर के, बगैर किसी जज्बाती नारे के। हम तारीख के आईने में झांकेंगे। दूध का दूध पानी का पानी करेंगे कि आखिर पाकिस्तान क्यों और कैसे बना और 1947 से पहले क्या हुआ था।
Speaker A
लेकिन उससे पहले इंकलाब को सब्सक्राइब जरूर करें। आइए आगे बढ़ते हैं। कहानी शुरू होती है बहुत पहले से। इस सरजमीन की कहानी जिस पर आज पाकिस्तान कायम है। यह कोई आम जमीन नहीं। यह तहजीबों का गहारा है। ट्रेडल ऑफ सिविलाइजेशंस।
Speaker A
5000 साल पहले जब यूरोप और अमेरिका में लोग झोपड़ियों या कच्चे मकानों में रहते थे। तब यहां दरिया सिंध की वादी में क्या था? मुंजदड़ो, हड़प्पा ऐसे शहर आबाद थे कि आज की दुनिया भी इनकी अर्बन प्लानिंग देखकर हैरान है।
Speaker A
पक्की ईंटें, दो मंजिला मकान, ग्रिड सिस्टम पर बनी सड़कें और सबसे बढ़कर अंडरग्राउंड सीवेज सिस्टम। जी हां, 5000 साल पहले फिर इसी सर जमीन पर गंधारा तहजीब ने जन्म लिया। यह इलाका आज का शिमाली पाकिस्तान बुधमत का एक अजीम मरकज बना।
Speaker A
टेक्सला जैसी यूनिवर्सिटी कायम हुई। जहां सिर्फ हिंदुस्तान नहीं, चीन, बस्ती, एशिया, यूनान तक से लोग इल्म हासिल करने आते थे। यह अमन की सरजमी थी। इल्म की सर जमीन थी। लेकिन एक मिनट, एक चीज मैं यहां पर क्लियर
Speaker A
करती चलूं कि यह इलाका जो आज पाकिस्तान कहलाता है, तारीख में अक्सर बाकी हिंदुस्तान से काफी अलग था और इसकी एक डिस्टिंक्ट आइडेंटिटी थी और यह बात मैं कोई हवा में नहीं कर रही। अब सिकंदर आजम, बल्कि उससे भी पहले से शुरू करें तो यह
Speaker A
इलाका कभी हिंदुस्तान की मरकजी रियासत में शामिल नहीं रहा। यहां का कल्चर, जुबाने, कनेक्शन हिंदुस्तान से ज्यादा सेंट्रल एशिया और ईरान से रहे हैं। हां, यह इलाका तहजीबों के संगम पर रहा। मगर इसकी अपनी इंफरादियत हमेशा रही। यहां तक कि आठवीं
Speaker A
सदी आ गई। एक नई आवाज आई, एक नई रोशनी। [संगीत] 712 में मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध फतह कर लिया और इस रीजन की तारीख ने एक नया मोड़ दिया। और फिर वो स्पिरिट, वो एनर्जी सामने आई जिसने आने वाली सदियों की बुनियाद रख
Speaker A
दी। मोहम्मद बिन कासिम से यहां मुसलमानों की हुक्मरानी का दौर शुरू हुआ। इसके बाद महमूद गजनवी आए, शबुद्दीन गौरी, फिर दिल्ली की सल्तनत के पांच खानदान और आखिर में द ग्रेट मुगल्स। ये सब कौन थे? आज तो प्रोपेगेंडा करने वाले कहते हैं हमलावर
Speaker A
थे, लुटेरे थे। बिल्कुल नहीं। वो कॉलोनाइज़र्स नहीं थे। वो तो एंपायर बिल्डर्स थे। बाहर से जरूर आए थे लेकिन वो यहां के होकर रह गए। उन्होंने हिंदुस्तान को अपना वतन बनाया। उनका जीना, मरना, उठना, बैठना सब इसी मट्टी से जुड़ गया।
Speaker A
उन्होंने यहां अजीमोशान सल्तनतें कायम की जो सैकड़ों साल तक कायम रही जिनकी शोहरत, उनके इंसाफ, इल्म और खुशहाली की वजह से थी। मुसलमानों ने यहां सिर्फ हुकूमत नहीं की। उन्होंने इस मुल्क को मालामाल किया। यह जो आज हम गुरबत का रोना रोते हैं ना,
Speaker A
जानते हैं कभी हिंदुस्तान सोने की चिड़िया था। मुगल दौर में खासतौर पर औरंगजेब के जमाने में हिंदुस्तान दुनिया की लार्जेस्ट इकॉनमी था। दुनिया की जीडीपी का 25%। जी हां, एक चौथाई सिर्फ हिंदुस्तान पैदा करता था। आज का अमेरिका, चीन भी इसका मुकाबला
Speaker A
नहीं कर सकते। यहां बेहतरीन कपड़ा बनता था। हीरे जवाहरात थे। सोना चांदी थे, मसाले थे। दुनिया भर से दौलत खींची चली आती थी हिंदुस्तान। फिर आज हिंदुस्तान पाकिस्तान जिन इमारतों पर फक्र करते हैं जो दुनिया भर में उनकी पहचान है। ताजमहल,
Speaker A
लाल किला, जामे मस्जिद, शालामार बाग, बादशाही मस्जिद ये सब किसकी देन है? मुसलमान हुक्मरानों की। आज शिमाली हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सबसे बड़ी जुबान कौन सी है? उर्दू। यह कहां पैदा हुई?
Speaker A
इसी हिंदू मुस्लिम तहजीब के मिलाप से इस जुबान ने फारसी, अरबी, तुर्की, मकामी जबानों के रंग अपने अंदर समो लिए। फिर मीर गालिब, खुसरो, शायरी की दुनिया के ये बड़े नाम उसी दौर की पैदावार हैं। मौसी में कवाली, गज़ल,
Speaker A
वो मुनफरीद अंदाज ये भी उसी कॉमन तहजीब का हिस्सा है। अरे, खानों को तो मैं भूल ही गई। यह बिरयानी, कोरमा, कबाब, निहारी ये मुगलाई खाने जो आज पूरी दुनिया में हिंदुस्तान और पाकिस्तान की पहचान है। ये कहां से आए? उसी दौर में आए। तो मुसलमानों
Speaker A
ने इस मुल्क को लूटा नहीं। इसे सवारा, निखारा। इसे एक कंपोज्ड कल्चर दिया। जिसमें हिंदू और मुसलमान सदियों तक साथ-साथ रहे। जी हां। साथ-साथ रहे। लेकिन क्या वो एक हो गए? शायद नहीं। उनके अकीदे अलग, रस्मो रिवाज अलग, खाने पीने के तरीके
Speaker A
अलग, शादी ब्याह अलग, उनके हीरो अलग, उनके विलन अलग। यह हकीकत है जिसे मानना पड़ेगा। वो तेल और पानी की तरह थे। एक ही बर्तन में रहते थे, लेकिन आपस में घुलते मिलते नहीं थे। उनके दरमियान एक लकीर, एक लाइन
Speaker A
हमेशा मौजूद रही। कभी हालात ऐसे होते कि ये लकीर जरा धुंधला सी जाती, तो कभी बहुत माया हो जाती। बहरहाल 18वीं सदी में मुगल सल्तनत कमजोर पड़ने लगी। औरंगजेब के बाद कोई मजबूत हाथ नहीं आया। जो मरकजी हुकूमत
Speaker A
को संभालता। सूबे आजाद होने लगे। जिसकी मर्जी जहां चली वहां अलग हो गया। मरहटे दक्कन से उठे दिल्ली तक पहुंच गए। सिख पंजाब में ताकतवर हो गए। ईरान से नादिर शाह आया। दिल्ली को लूटा, तख्ते ताऊस ले गया। कोहिनूर ले गया। जो कमी रह गई थी वो
Speaker A
अफगानिस्तान से अहमद शाह अब्दाली की आमद ने पूरी कर दी। पानीपत की तीसरी जंग में उसने मरहटों को हरा तो दिया लेकिन मुगलों को भी कमजोर कर गया और जब घर कमजोर हो तो गिद्ध नजरें गाड़ लेते हैं और वो गिद्ध कौन थे? अंग्रेज
Speaker A
ईस्ट इंडिया कंपनी। वो जो मस्कीन ताजर बनकर आए थे। अब उनकी असली चेहरे सामने आने लगे थे। वो समझ गए कि अब मौका है हिंदुस्तान पर कब्जा करने का। उन्होंने पहले बंगाल पर कब्जा किया, फिर मैसूर पर, फिर मरहटों को
Speaker A
हराया, सिखों को शिकस्त दी। कभी जंग से, कभी साजिश के जरिए, कभी धोखे से वो आहिस्ता-आहिस्ता पूरे हिंदुस्तान को निगलते गए। और फिर उन्होंने आखिरी निवाला लिया 1857 में। लेकिन 1 मिनट, आप सोच रहे होंगे ये मैंने कौन सी तारीख की क्लास शुरू कर दी?
Speaker A
पाकिस्तान का इन सब चीजों से क्या ताल्लुक है? है बिल्कुल है। क्योंकि जब तक आप इस तारीख को नहीं समझेंगे आपको पाकिस्तान समझ में नहीं आएगा। 1857 से पहले हालात क्या थे और फिर 1947 तक कैसे पहुंचे? ये सब जानना बहुत जरूरी
Speaker A
है। 1857 सिर्फ एक साल नहीं, तारीख का एक खूनी मोड़ है। अंग्रेज इसे क्या कहते हैं? हां, कदर। सिपाहियों की बगावत। मगर यह सिर्फ सिपाहियों की बगावत नहीं थी। यह जंग आजादी थी। हिंदुस्तान की पहली मुनजिम जंग आजादी।
Speaker A
यह आवामी जंग थी। इसकी चिंगारी उठी मेर
Speaker A
मुसलमानों के पास। क्यों? क्योंकि हिंदुस्तान पर सर्दियों से उनकी हुकूमत थी। जंग का तजुर्बा था और सबसे बढ़कर दिल्ली का तख्त उनके पास था। मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर बूढ़े थे, बेख्तियार थे लेकिन हिंदुस्तान में राज तो उसी का माना
Speaker A
जाता था जो दिल्ली पर हुक्मरान होता था। तो तमाम बागी फौजें दिल्ली में जमा हुई और बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह मान लिया। ये सिंबॉलिक लेकिन बहुत अहम स्टेप था। मुसलमानों ने इस जंग में सबसे ज्यादा हिस्सा लिया। सबसे आगे रहे। सबसे ज्यादा
Speaker A
कुर्बानियां दी। उनके उलमा ने जिहाद के फतवे दिए क्योंकि वो समझते थे कि यह सिर्फ वतन नहीं यह दीन बचाने की जंग भी है। लेकिन जीत ना सके। क्यों? वसाइल की कमी। अंग्रेजों के पास जदीद हथियार थे, पैसा
Speaker A
था, मुनजिम फौज थी और हमारे पास जज्बा था लेकिन डिसिप्लिन नहीं, जोश था लेकिन जदीद हथियार नहीं। फिर पूरे हिंदुस्तान ने साथ भी नहीं दिया। जूबी हिंदुस्तान खामोश रहा। पंजाब और बंगाल ने अंग्रेजों का साथ दिया। गद्दारियां भी हुई जो हमेशा से होता आया
Speaker A
है। तो जंग हार गए और फिर अंग्रेज ने जो इंतकाम लिया वो खुदाया। चंगेज़ खान हलाकू खान की याद ताजा हो गई। उन्होंने चुन-चकर बदले लिए किससे? सबसे ज्यादा मुसलमानों से। क्योंकि वो समझते थे कि इस बगावत के असल जिम्मेदार मुसलमान
Speaker A
हैं। वो समझते थे कि मुसलमान दोबारा सर उठाएंगे। ये दोबारा हुकूमत का ख्वाब देखेंगे। तो इनकी कमर तोड़ दो हमेशा के लिए। फिर दिल्ली को मकतल बना दिया गया। हफ्तों तक कत्लेआम जारी रहा। कोई घर महफूज़ नहीं। हर गली में लाशें बिछी थीं।
Speaker A
उलमा तो चुन चुन कर मारे गए। हजारों को सरेआम फांसियां दी गई। तोपों से बांधकर उड़ा दिया गया। जिंदा जला दिया गया। मकसद सिर्फ एक था मुसलमानों की कयादत खत्म करना। बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार करके उन्हें जिला वतन कर दिया गया। उनके बेटों
Speaker A
को उनकी आंखों के सामने मार दिया गया और उनके सर काट के थाल में सजाकर बाप को पेश किए गए। यह था तहजीब याफ्ता सिविलाइज्ड अंग्रेज का इंसाफ। अब नए निजाम में मुसलमानों के लिए कुछ नहीं था। उनकी नौकरियां खत्म, तालीम तबाह,
Speaker A
मदारिस बंद कर दिए गए। उनकी जुबान फारसी और उर्दू की जगह अंग्रेजी को सरकारी जबान बना दिया गया। वो मुसलमान जो कल तक इस मुल्क के हुक्मरान थे। अशराफिया थे। एक अजीम तहजीब के वारिस थे। अब वो क्या थे?
Speaker A
गुलाम, गरीब, अनपढ़, बेरोजगार और हां अंग्रेज की नजर में गद्दार भी और कुछ हिंदुओं की नजर में भी जरा खुद को एक लम्हे के लिए एक लम्हे के लिए उस जमाने के मुसलमान की जगह रख कर देखें। आपके आबाओ
Speaker A
अजदाद बादशाह थे। आप इल्मो फन के मालिक थे। और आज आप सड़क पर हैं। आपका घर छीन गया। आपका रोजगार छीन गया। आपकी जुबान छीन गई। आपके बच्चों का कोई मुस्तकबिल नहीं। और उल्टा आपको जलील किया जा रहा है कि
Speaker A
आपकी शनाख्त मिटाई जा रही है। कैसा महसूस करेंगे आप? क्या आपके दिल में एक गहरा खौफ नहीं बैठ जाएगा? इनसिक्योरिटी का एहसास पैदा नहीं होगा कि अंग्रेज के बाद अगर हिंदू अक्सरियत का मुकम्मल राज आ गया तो हमारा क्या बनेगा? क्या हमें जिंदा भी
Speaker A
छोड़ेंगे? क्या आप अपनी आइडेंटिटी, अपनी डिग्निटी, अपने बच्चों के फ्यूचर के लिए परेशान नहीं होंगे?
Speaker A
यही वो खौफ था, यही वो अदम तहफुज था, यही वो जख्म था जिसने मेरे नजदीक मेरे ख्याल में पाकिस्तान की बुनियाद रखी थी। 1947 से कहीं पहले किसी लीडर के ऐलान से कहीं पहले यानी पाकिस्तान का जन्म असल में 1857 के
Speaker A
बाद जंग आजादी की राख से हो गया था। जंगे आजादी 1857 के बाद मुसलमान कौम अंधेरे में डूबी हुई थी। मायूसी, बेबसी, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। गुस्सा था अंग्रेजों पर, लेकिन लड़ने की हिम्मत नहीं थी। ऐसे
Speaker A
में इस अंधेरे में एक आवाज उठी, एक फिक्र उभरी, एक शख्सियत सामने आई सर सैयद अहमद खान। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि होश में आओ। अंग्रेज अब तुम्हारे हाकिम हैं। लड़ने से कुछ नहीं मिलेगा। पहले लड़कर देख लिया। अब
Speaker A
लड़ोगे तो मजीद कुछ ले जाओगे। इनसे नफरत ना करो। इन्हें समझो। इनकी जुबान सीखो। इनका इल्म हासिल करो। इनके सिस्टम में दाखिल हो और फिर इसी निजाम के अंदर रहकर अपने हुकूक के लिए जिद्दोजहद करो। तालीम हासिल करो,
Speaker A
नौकरियां लो, मार्शी तौर पर मजबूत बनो। यह बातें उस वक्त के जज्बाती मुसलमानों को बहुत बुरी लगी। उन्हें लगा कि सर सैयद हमें गुलामी सिखा रहे हैं। उन पर कुफ के फतवे लगे। उन्हें जान से मारने की धमकियां
Speaker A
मिली। लेकिन वो डटे रहे क्योंकि वो जानते थे कि मुसलमानों के सर्वाइवल का वाहिद रास्ता अब यही है और उन्होंने सिर्फ बातें नहीं की काम भी किया। रसाले निकाले, किताबें लिखी और सबसे बढ़कर अलीगढ़ में एक कॉलेज कायम किया। 1875 में मोहम्मद एंग्लो
Speaker A
ओरिएंटल कॉलेज जो बाद में अलीगढ़ कॉलेज कहलाया। यह सिर्फ एक कॉलेज नहीं था। यह एक तहरीक थी। जहां से मुसलमानों की एक नई नस्ल तैयार हुई जिसने जदीद तालीम भी हासिल की और अपनी मजहबी शनाख्त भी बरकरार रखी।
Speaker A
इसी अलीगढ़ ने आगे चलकर पाकिस्तान बनाने वाले कई लीडर्स पैदा किए। तो यह था सर सैयद का कारनामा। लेकिन सर सैयद सिर्फ तालीम की बात नहीं कर रहे थे। वो मुसलमानों के सियासी मुस्तकबिल के बारे में भी सोच रहे थे। और यहीं पर वो बात आती
Speaker A
है जिसने आगे चलकर पाकिस्तान की पहली ईंट रख दी। असल में सर सैयद हिंदू मुस्लिम इत्तहाद के बड़े हामी थे। वो हिंदुस्तान को एक खूबसूरत दुल्हन कहते थे जिसकी दो आंखें हैं। हिंदू और मुसलमान वो चाहते थे कि
Speaker A
दोनों कौमें मिलकर रहें। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने सर सैयद जैसे इंसान को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। वो था 1867 का उर्दू हिंदी तनाज़ा। बनारस में कुछ हिंदू रहनुमाओं ने मुतालबा किया कि सरकारी अदालतों और दफातिर में उर्दू की जगह हिंदी
Speaker A
को राइज किया जाए। उर्दू अरबी रस्मुलखत में लिखी जाती थी। यानी अलिफ बे की शक्ल में जबकि हिंदी देवनगरी स्क्रिप्ट में लिखी जाती थी। उर्दू मुसलमानों के करीब थी। उनकी कल्चरल आइडेंटिटी थी। तो ये मुतालबा देखने में तो सिर्फ जुबान का लगता
Speaker A
है। लेकिन इसके पीछे एक पूरी तहजीब को बदलने की सोच थी। उर्दू को खत्म करने का मतलब मुसलमानों की कल्चरल आइडेंटिटी पर हमला था। सर सैयद यह देखकर हिल गए। उन्हें शदीद झजका लगा। उन्होंने कहा कि आज झगड़ा
Speaker A
एक छोटी सी बात पर है। आगे चलकर यह बढ़ता ही जाएगा। यह था वो तारीखी लम्हा जब सर सैयद अहमद खान ने पहली बार यह कहा कि हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं। यह था दो कौमी नजरिया।
Speaker A
दो कौमी नजरिया जो रातोंरात पैदा नहीं हुआ था। इसके बीज तारीख की गहराइयों में थे। 1857 के जख्मों में थे और अब उर्दू हिंदी तनाजे ने इस पौधे को पानी दे दिया था। सर सैयद ने सिर्फ इस उभरती हुई हकीकत को
Speaker A
पहचान लिया था और बयान कर दिया था। बस और उनका यह ख्याल यह डायग्नोसिस आगे चलकर पाकिस्तान की बुनियाद बना। सर सैयद ने खतरे की घंटी बजा दी थी। बता दिया था कि रास्ता अलग हो सकता है। लेकिन
Speaker A
उस वक्त ज्यादातर लोगों ने उनकी बात को संजीदगी से नहीं लिया। 1885 में एक पार्टी बनी इंडियन नेशनल कांग्रेस जिसका दावा था कि वह तमाम हिंदुस्तानियों की जमात है। हिंदू, मुसलमान, सिख, पारसी सबकी और शुरू में कुछ मुसलमान कांग्रेस में शामिल भी
Speaker A
हुए बल्कि कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने भी अपना सियासी करियर इसी पार्टी से शुरू किया था। जिन्ना जो खुद कभी कांग्रेस में थे, हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद के सफीर कहलाते थे। लेकिन फिर वो वक्त आया जब उन्हें अंदाजा हो गया कि कांग्रेस के वादे
Speaker A
अलग हैं और दावे अलग। लेकिन कायदे आजम से बहुत पहले मुसलमान यह बात समझ चुके थे। उन्हें नजर आने लग गया था कि कांग्रेस की सियासत मुसलमानों के मफाद में नहीं। और शुरू ही में एक वाक्य भी ऐसा पेश आया
Speaker A
जिसने मुसलमानों का शक यकीन में बदल दिया था। ये थी वो 1905 में बंगाल की तकसीम यानी पार्टीशन ऑफ बंगाल। अंग्रेजों ने बंगाल के बड़े सूबे को दो हिस्सों में तकसीम कर दिया। एक तरफ मगरबी बंगाल जहां हिंदू अक्सरियत थी। दूसरी तरफ मुस्लिम
Speaker A
मेजॉरिटी वाला मशरिकी बंगाल। मुसलमानों ने इस पार्टीशन का खैरमकदमम किया क्योंकि अब उन्हें मशरिकी बंगाल में अक्सरियत मिल गई थी। उन्हें ऐसा लगा कि अब उनके हुकूक महफूज़ होंगे और उनको कुछ तरक्की के मौके भी मिलेंगे। लेकिन कांग्रेस और हिंदू कौम
Speaker A
परस्तों ने आसमान सर पर उठा लिया। शदीद एतेजाज, मुजाहरे, बॉयकॉट। उन्होंने कहा यह बंगाल को तकसीम करने की साजिश है। यह डिवाइड एंड रूल की पॉलिसी है। मुसलमान यह देखकर हैरान रह गए कि जो तकसीम हमारे फायदे में है उस पर कांग्रेस इतना शोर
Speaker A
क्यों मचा रही है। उन्हें समझ आ गया कि कांग्रेस सिर्फ हिंदू मफादात का तहफ्फुज़ कर रही है। उनके लिए मुसलमानों का फायदा फायदा नहीं नुकसान है। तो मुसलमानों को लगा कि उन्हें अपने हुकूक के लिए अपनी अलग सियासी जमात बनानी पड़ेगी। और फिर दिसंबर
Speaker A
1906 में ढाका में पूरे हिंदुस्तान के मुसलमान रहनुमा इकट्ठे हुए और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की बुनियाद रखी। मुस्लिम लीग ने पहला बड़ा मुतालबा क्या किया? यह के राइट ऑफ सेपरेट इलेक्टोरेट दिया जाए। यानी जुदाना इंतखाबादत का हक।
Speaker A
अब इसका क्या मतलब है? यह के मुसलमान वोटर सिर्फ मुसलमान उम्मीदवार को वोट देंगे। उनके लिए नशिस्तें मखसूस होंगी। यह अंग्रेज हुकूमत ने मुतालबा मान लिया। यह एक बहुत बड़ी कामयाबी थी। इसने मुसलमानों की अलग पॉलिटिकल आइडेंटिटी को कानूनी
Speaker A
हैसियत दे दी। इसके बाद बहुत कुछ हुआ जिसकी तफसील में हम जाएंगे नहीं। बड़ा लंबा हो जाएगा। लेकिन हालात 1929 में उस मुकाम पर पहुंच चुके थे कि मुसलमान सख्त मायूसी और बेयकीनी के माहौल में थे। तब एक
Speaker A
आवाज गूंजी, एक पुकार बुलंद हुई। जिसने मुसलमानों को सिर्फ हुकूक मांगने से आगे एक नई मंजिल का रास्ता दिखाया। यह आवाज थी डॉक्टर सर अल्लामा मोहम्मद इकबाल की। इकबाल ने मुसलमानों को उनकी खोई हुई शनाख्त याद दिलाई। उन्हें बताया कि तुम
Speaker A
सिर्फ अकलियत नहीं, तुम एक जिंदा कौम हो। तुम्हारा अपना एक नजरिया हयात है। तुम्हारा दीन सिर्फ पूजा पाठ नहीं यह एक मुकम्मल जाप्ता हयात है। एक तहजीब है। वो देख रहे थे कि मगरब की नेशनलिज्म और हिंदुस्तान की मुमकिना जम्हूरियत
Speaker A
मुसलमानों की इनफरादियत को निगल जाएगी। इकबाल ऐसी मुश्तका कौमियत के खिलाफ थे जो मुसलमानों की अपनी पहचान खत्म कर दे। बहरहाल मुसलमानों की सियासी जिद्दोजहद का ये सफर सिर्फ अपने हक के लिए नहीं था। बल्कि इसमें हिंदुस्तान की आजादी का जज्बा
Speaker A
भी शामिल था। इसी जज्बे के तहत 1916 में एक हिस्टोरिकल मोमेंट आया लखनऊ बैक। उस वक्त मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने हिंदू मुस्लिम इत्तहाद की ऐसी मिसाल कायम की जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। इस फैक्ट के
Speaker A
पीछे असल में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना का हाथ था। और कांग्रेस ने भी पहली बार मुसलमानों के जुदागा इंतखाबादत का हक तस्लीम किया। यानी मुसलमानों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट। ये उनकी एक बड़ी सियासी कामयाबी थी। तो इंडिया की दोनों बड़ी पार्टीज एक मेज पर
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एक मकसद के लिए यह उम्मीद की एक किरण थी। एक कोशिश थी कि हिंदुस्तान में मुसलमान अपने हक और शनाख्त के साथ आगे बढ़ सके। लेकिन यह इत्तेहाद कायम नहीं रह सका। ये खूबसूरत ख्वाब जल्द ही ग्राउंड रियलिटी से
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टकरा गया। लेकिन लखनऊ पैक्स ने यह जरूर साबित किया कि मुसलमान अपने पॉलिटिकल वजूद का एहसास रखते हैं और इसके लिए हर लेवल पर स्ट्रगल करेंगे। खैर वक्त गुजरने के साथ-साथ हिंदू और मुसलमान में दूरियां बढ़ती चली गई और इसमें पहला बड़ा किरदार
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अदा किया 1928 की नेहरू रिपोर्ट ने। कांग्रेस के रहनुमा जवाहरलाल नेहरू ने मुतालबा किया कि जुदागा तरीका इंतखाब को मंसूक किया जाए। जी हां, उनके कहने के मुताबिक किसी कम्युनिटी को सेपरेट इलेक्टेट नहीं दिया जाएगा। फिर एक और
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मुतालबा भी किया जिसने मुसलमानों को हिला कर रख दिया। नेहरू ने हिंदी को हिंदी को सरकारी जबान बनाने का मुतालबा किया। यह लखनऊ पैक्ट की खुली खिलाफ्रर्जी थी। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के जो मुतालबात माने थे, नेहरू रिपोर्ट ने सब पर पानी फेर
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दिया। तब कायदे आजम ने जवाब में अपने मशहूर 14 नुकात पेश किए। यह कोई जज्बाती नारे नहीं थे बल्कि मुसलमानों के हुकूक के लिए एक वाज़ डॉक्यूमेंट था। इसमें असेंबलीज में मुसलमानों के लिए मुनासिब नुमाइंदगी की बात की गई थी। उनकी मजहबी आजादी के
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तहफुज की बात की गई थी। और सिंध को बंबई से अलग एक सूबा बनाने की बात भी शामिल की गई थी। हर हर मुतालबा मुसलमानों के लिए एक महफूज मुस्तकबिल की गारंटी देने वाला था और यह एक खुला ऐलान था कि कांग्रेस और
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अंग्रेजों के मुकाबले पर मुसलमान अपने किसी हक से बिल्कुल पीछे नहीं हटेंगे और फिर यही वो 14 नका थे जिनकी वजह से मुसलमानों की जिद्दोजहद तेज होती चली गई। यहां तक कि 1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के सालाना इजलास में इकबाल ने वो कह
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दिया जिसने हिंदुस्तान की सियासत का रुख बदल दिया। उन्होंने कहा मेरी ख्वाहिश है कि पंजाब, शिमाल मगरबी सरहदी सूबे, सिंध और बूचिस्तान को मिलाकर एक वाहिद रियासत बना दिया जाए। मुझे लगता है कि शिमाल मगरबी हिंदुस्तान में एक मुत्तहदा मुस्लिम
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रियासत का कयाम कम से कम शिमाल मगरबी हिंदुस्तान के मुसलमानों का हतमी मुकद्दर है। यह पहली बार था कि इतने बड़े प्लेटफार्म से इतने वाज़ अल्फाज में एक अलग मुस्लिम रियासत का नक्शा पेश किया गया हो। यह ख्वाब इकबाल का था। मगर इस ख्वाब को
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हकीकत बनाने वाला अभी लंदन में था। मोहम्मद अली जिन्ना। सर सैयद का नजरिया, मुस्लिम लीग का कयाम, इकबाल का ख्वाब सब कुछ सामने आ चुका था। लेकिन मुसलमानों की अक्सरियत और खुद मुस्लिम लीग की कयादत भी हिंदुस्तान की
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तकसीम पर शायद तैयार नहीं थी। वो अब भी एक मुतहिद हिंदुस्तान के अंदर रहने पर राजी हो सकती थी। इस दौरान कायदे आजम लंदन से वापस आकर मुस्लिम लीग की कयादत संभाल चुके थे। 1933 में गोल्ड मेज कॉन्फ्रेंस के
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मौके पर चौधरी रहमत अली का मशहूर पमफलेट पाकिस्तान नाउ नेवर सामने आया जिसमें अलग रियासत के लिए पहली बार पाकिस्तान का लफज़ तजवीज किया गया था। मगर खुद कायदे आजम और अल्लामा इकबाल ने इस मुतालबे को गैर संजीदा और नाकाबिले अमल
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तजवीज करार दे दिया था। यानी अब भी मिलकर चलने के इमकानात थे। लेकिन फिर 1937 से 1939 के वो ढाई साल आए जिन्होंने सब कुछ बदल दिया। गोया मुत्तहदा हिंदुस्तान के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। लेकिन इन ढाई
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साल में हुआ क्या था? असल में 1937 में इलेक्शन हुए थे। कांग्रेस जीत गई और 11 में से सात सूबों में गवर्नमेंट बनाई। जिन सूबों में कांग्रेस की हुकूमत बनी। वहां उसने क्या किया? मुसलमानों को साथ मिलाने की कोशिश की। मखलूत हुकूमतें बनाई।
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बिल्कुल नहीं। कांग्रेस अक्सरियत के नशे में थी। उसने मुसलमानों को मुकम्मल तौर पर नजरअंदाज किया और ऐसा रवैया अपनाया जिससे मुसलमानों के वो तमाम खदशात, वो तमाम डर सच साबित होने लगे। वंदे मातरम। वो गीत जिस पर मुसलमानों को बहुत एतराज था उसे
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सरकारी तकरीबात और स्कूल्स में लाजमी करार दे दिया गया। मुसलमान क्या सोचते हैं, क्या समझते हैं, क्या कहते हैं, इसकी कोई परवाह नहीं की गई। फिर आई वारधा स्कीम जिसे विद्या मंदिर स्कीम भी कहते हैं। अब भला यह क्या था? यह
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था गांधी जी की सरबराही में बनाया गया एक नया तालीमी मंसूबा जिस पर शदीद हिंदू मजहबी रंग था। मुस्लिम तारीख और सकाफत मुकम्मल तौर पर नजरअंदाज कर दी गई और बच्चों को अहिंसा और बुतपरस्ती की कहानियां पढ़ाई जाने लगी। इसका नतीजा
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लाजमन यह निकलना था कि उर्दू भी दीवार से लग जाए। अब हर जगह हिंदी को फरोख दिया जाने लगा। इसे सरकारी जबान बनाने की बातें होने लगी। सरकारी मुलाजबतों में हिंदुओं को तरजीह मिलने लगी। कहीं फसादात होते तो
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पुलिस और इंतजामिया ज्यादातर हिंदुओं का साथ देती। बहरहाल ढाई साल का ट्रेलर देखकर मुसलमानों की आंखें तो खुल गई। उन्हें यकीन हो गया कि अगर अंग्रेजों के होते हुए कांग्रेस का यह रवैया है तो जब गोरा चला जाएगा और हिंदू अक्सरियत का मुकम्मल राज
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कायम हो जाएगा तो हमारा क्या बनेगा? हमारी मजहबी आजादी, हमारी सकाफत, हमारी जुबान, हमारा रोजगार, हमारा मुस्तकबिल सब खतरे में पड़ जाएगा। और यह सिर्फ मुस्लिम लीग का प्रोपेगेंडा नहीं था। यह लाखों मुसलमानों का एक्सपीरियंस था। मुस्लिम लीग
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ने बाकायदा रिपोर्ट शायर की। पीरपुर रिपोर्ट, शरीफ रिपोर्ट, फजले हक रिपोर्ट जिनमें ज्यादतियों के सबूत पेश किए गए। लेकिन कांग्रेस ने इन्हें मानने से इंकार कर दिया। यूं इन हालात में मोहम्मद अली जिन्ना को भी हिकमत अमली बदलनी पड़ी। उन्होंने
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हिंदुस्तान के तूफानी दौरे किए और मुसलमानों को मुस्लिम लीग के प्लेटफार्म पर इकट्ठा करना शुरू किया। कायदे आजम को अच्छी तरह पता चल गया था कि रास्ता एक ही बचा है। अलैदगी का रास्ता और फिर 23 मार्च 1940 का दिन आ गया।
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लाहौर में मुस्लिम लीग का तारीख इजलास हुआ। जिसमें शेर बंगाल मौलवी फजले हक ने एक करारदाद पेश की और इस करारदाद में पाकिस्तान का लफज़ तक नहीं था। लेकिन हिंदू प्रेस ने इसे फौरन करारदादे पाकिस्तान का नाम दिया और शायद अच्छा ही किया क्योंकि
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अब मंजिल वाज़ हो चुकी थी। मुसलमानों ने अपना अलग वतन मांग लिया था। अब वापसी का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन अंग्रेज कांग्रेस की तरह हिंदुस्तान को तकसीम नहीं करना चाहते थे। उन्होंने आखिर तक बड़ी कोशिश की। 1946 में कैबिनेट मिशन प्लान भी
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किया जिसके मुताबिक मुस्लिम इलाकों को इंडियन कन्फेडरेशन में रहते हुए खुद मुख्तारी दी जाती। मुस्लिम लीग ने प्लान मंजूर भी कर लिया लेकिन कांग्रेस ने ना कर दी। मुत्तहदा हिंदुस्तान का आखिरी मौका भी जाय हो गया। कायदे आजम ने ऐलान कर दिया
Speaker A
बातचीत खत्म। अब हमारे पास सिर्फ एक ही रास्ता है पाकिस्तान और फिर फैसला हो गया। हिंदुस्तान तकसीम होगा पाकिस्तान बनेगा। लेकिन अंग्रेज जाते-जाते भी डंडी मार गए। उन्होंने मुस्लिम अक्सरियत के कुछ इलाके भारत को दे दिए जैसे गुरदासपुर। क्यों?
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ताकि भारत को कश्मीर का जमीनी रास्ता मिल जाए। यूं मसला कश्मीर की बुनियाद पड़ गई। एक ऐसा मसला जो आज भी जिंदा है बल्कि आज पहले से कहीं ज्यादा बिगड़ चुका है। बहरहाल 14 अगस्त 1947 की रात रमजान की
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27वीं शब पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर उभरा। आप सब आजाद हैं अपनी मस्जिदों में जाने के लिए। ख्वाब पूरा हो गया। लेकिन आजादी की यह सुबह अपने साथ तारीख की सबसे बड़ी हिजरत और खूनरेजी लाई। पंजाब में, बंगाल में,
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दिल्ली में हर तरफ कत्लेआम हुआ। 10 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हुए। औरतों की इज्जतें लूटी। बच्चों को नेजों पर उछाला गया। ट्रेनें आई तो लाशों से भरी हुई। इंसानियत मर गई।
Speaker A
दहशत नाश रही थी। यह कीमत थी जो आजादी के बदले में चुकानी पड़ी। यह खून था जो इस नई जमीन की बुनियादों में डाला गया। यह कुर्बानियां थी। यह आंसू यह लहू था जो आज भी बताता है कि आजादी कितनी भारी कीमत पर
Speaker A
मिलती है। इतने वाक्यात, इतने जख्मों, इतने आंसुओं के बाद हम आते हैं अपने बुनियादी सवाल पर कि पाकिस्तान क्यों बना?
Speaker A
क्या यह वाकई जरूरी था? इसका जवाब एक लफ्ज में नहीं बल्कि चंद ठोस, तारीखी और जमीनी हकीकतों में है। सबसे बुनियादी वजह थी प्रिजर्वेशन ऑफ डिस्टिंक्ट आइडेंटिटी यानी अलग शनाख्त का तहफुज। मुसलमानों को खतरा था कि मुत्तहदा हिंदुस्तान की अक्सरियती हिंदू तहजीब उनकी
Speaker A
यूनिकनेस को इनफरादियत को निगल जाएगी। वो अपनी शनाख्त खोना नहीं चाहते थे। इट वाज़ अबाउट आइडेंटिटी। फिर फियर ऑफ मेजॉरिटी डोमिनेशन यानी अक्सरियत के गलबे का खौफ भी था। यह सिर्फ सकाफती खौफ नहीं था। यह सियासी खौफ भी था और इकोनॉमिक भी। उन्हें
Speaker A
डर था कि एक जमहूरी हिंदुस्तान में जहां हिंदू अक्सरियत में होंगे वो हमेशा माइनॉरिटी बनकर रहेंगे। उनकी आवाज सुनी नहीं जाएगी। उनके हुकूक पामाल होंगे। उन्हें नौकरियों, वसाइल और इ्तदार में बराबर का हिस्सा नहीं मिलेगा। वो दूसरे दर्जे के शहरी बनकर रह जाएंगे। यह सिर्फ
Speaker A
वहम नहीं था। जमहूरी निजाम होता ही ऐसा है। और आप देख भी रहे हैं कि आज के भारत में क्या हो रहा है। तो मुसलमानों का खौफ सिर्फ नजरियाती नहीं था। इसकी बुनियाद ठोस वजूहात पर थी। ठोस तजुर्बात पर थी। 1857
Speaker A
में अंग्रेजों का लिया गया इंतकाम। 1937 के बाद कांग्रेसी राज के ढाई साल इन तजुर्बात ने मुसलमानों को यकीन दिला दिया था कि उनके खदशात बेबुनियाद नहीं है। मुत्तहदा हिंदुस्तान में उनका मुस्तकबिल महफूज़ नहीं है। हिस्ट्री वाज़ रिपीटिंग
Speaker A
इटसेल्फ। या यूं समझ लें कि उन्हें इस चीज का खौफ था कि तारीख फिर दोहराई जाएगी। फिर एक और अहम चीज थी सर्वाइवल और डिग्निटी का मसला। यह सेल्फ रिस्पेक्ट यानी इज्जत नफ्स और नेशनल सर्वाइवल का मसला बन गया था।
Speaker A
क्या मुसलमान एक ऐसे मुल्क में रहे जहां उन्हें हमेशा शक की निगाह से देखा जाए?
Speaker A
जहां उनकी वफादारी मशकूक हो जहां उन्हें अपनी शराब छुपानी पड़े या वो एक अपना घर बनाएं। जहां वो सर उठाकर जी सकें। इज्जत या जिल्लत यह था असल सवाल। मुसलमान चाहते थे एक ऐसी रियासत, एक ऐसी जगह जहां वो
Speaker A
इस्लामी उसूलों और अपनी तहजीबी इदार के मुताबिक आजादी से जिंदगी गुजार सके। बगैर किसी बैरूनी दबाव के, बगैर किसी मुदाखलत के तो बना पाकिस्तान। कोई हादसा नहीं था। कोई जज्बाती फैसला नहीं था। यह सदियों के तारीखी अमल, तल्ख तजुर्बात, गहरे खौफ और
Speaker A
आइडेंटिटी क्राइसिस का मंतकी नतीजा था। यह करोड़ों लोगों का इ्तमाई फैसला था जो उन्होंने बहुत सोच समझ कर बहुत भारी कीमत चुका कर किया था। आज जब आप पाकिस्तान के मसाइल देखते हैं, करप्शन देखते हैं, नाइंसाफी देखते हैं, गुरबत देखते हैं तो
Speaker A
गुस्सा आना, मायूस होना बिल्कुल नेचुरल है। यहां सवाल उठाना भी आपका हक है। लेकिन जब आप यह सवाल पूछे कि पाकिस्तान क्यों बना? तो अपनी तारीख को मत भूलें। उन कुर्बानियों को मत भूलें। उन वजूहात को मत भूलें जिनकी बिना पर यह मुल्क वजूद में
Speaker A
आया। यह जानना जरूरी है बल्कि बहुत जरूरी है ताकि आप कदर कर सकें इस आजादी की, इस शनाख्त की, इस वतन की जो आपको प्लेट में रखकर नहीं मिला। जिसके लिए आपके बुजुर्गों ने खून दिया है, आंसू बहाए हैं। सब कुछ
Speaker A
लुटाया है। जब कोई आपको बहकाए, बरगलाए, यह कहे कि यह मुल्क बनना ही नहीं चाहिए था। यह गलती थी तो आपके पास इल्म हो, दलील हो, जवाब हो। अपनी तारीख खुद पढ़ें, समझें बल्कि मुख्तलिफ पॉइंट ऑफ व्यू से पढ़ें।
Speaker A
सिर्फ निसाबी किताबों से नहीं हमारे बड़ों ने सिर्फ एक मुल्क नहीं मांगा था। उन्होंने एक ख्वाब देखा था। एक ऐसे पाकिस्तान का ख्वाब जहां इंसाफ हो, बराबरी हो, खुशहाली हो, जहां हर शहरी इज्जत से रह सके। और यह ख्वाब यह तो आज तक पूरा नहीं
Speaker A
हुआ। यह ख्वाब अधूरा है। इसे पूरा करना है। अब यह आपकी जिम्मेदारी है। यह मेरी जिम्मेदारी है। यह हमारी जिम्मेदारी है। माजी को याद रखें। इससे सबक सीखें। हाल की खामियों को पहचाने। इन्हें बदलने की कोशिश करें। और मुस्तकबिल
Speaker A
अपना मुस्तकबिल खुद बनाएं। यह मुल्क आपका है। इसे वैसा बनाएं जैसा आप इसे देखना चाहते हैं। [संगीत]
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