भारत के 'सेवन सिस्टर्स' क्षेत्र की संवेदनशीलता, इतिहास और संघर्षों की कहानी, जो मीडिया में कम दिखती है।
Key Takeaways
- सेवन सिस्टर्स क्षेत्र की आज़ादी और पहचान की मांग भारत के साथ तनाव का मूल कारण है।
- भारतीय सरकार ने जबरदस्ती और दमन के माध्यम से इन राज्यों को भारत में शामिल किया।
- AFSPA कानून के कारण स्थानीय लोगों के अधिकारों का हनन हुआ और संघर्ष बढ़ा।
- डेमोग्राफिक बदलाव और सांस्कृतिक दबाव ने स्थानीय लोगों में असंतोष को बढ़ावा दिया।
- यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
What the video covers
- सेवन सिस्टर्स भारत के सात पूर्वोत्तर राज्यों का समूह है जिनकी आज़ादी की मांग और अलग पहचान की लंबी इतिहास है।
- 1947 में ब्रिटिश राज के अंत के बाद ये रियासतें भारत में शामिल हुईं, लेकिन जबरदस्ती और दबाव के साथ।
- मणिपुर, त्रिपुरा और नागालैंड जैसी रियासतों में भारत सरकार ने कब्जा किया और स्थानीय शासकों को नजरबंद किया।
- स्थानीय लोगों की भाषाओं, संस्कृतियों और पहचान पर हमला हुआ, साथ ही बाहरी लोगों को यहां बसाकर डेमोग्राफी बदली गई।
- नागालैंड में 1947 से ही स्वतंत्रता की लड़ाई जारी है, जो एनएससीएन जैसे संगठनों के माध्यम से चल रही है।
- आसाम में बांग्लादेशी अप्रवासियों के कारण स्थानीय लोगों में असंतोष और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ आसाम (गुल्फा) का जन्म हुआ।
- मणिपुर में भारतीय सेना द्वारा अत्याचार और अफस्पा कानून के तहत मानवाधिकार हनन की घटनाएं हुईं।
- आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) ने सेना को व्यापक अधिकार दिए, जिससे दमन और अत्याचार बढ़े।
- सेवन सिस्टर्स क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, खासकर चिकन नेक कॉरिडोर के कारण।
- यह क्षेत्र भारत के लिए सुरक्षा और पहचान का बड़ा चुनौतीपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
Chapters
- 00:00सेवन सिस्टर्स का परिचय और भारत से अलगाव की मांग
- 01:13मीडिया में न दिखने वाली कहानी और रणनीतिक महत्व
- 02:13पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक और नस्लीय विविधता
- 03:20मणिपुर और त्रिपुरा में भारत में शामिल होने की जबरदस्ती
- 04:15डेमोग्राफिक बदलाव और सांस्कृतिक दबाव
- 05:13नागालैंड की स्वतंत्रता की लड़ाई और NSCN
- 06:20आसाम की समस्या और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ आसाम
- 07:22AFSPA कानून और मणिपुर में दमन
- 09:13सेवन सिस्टर्स की रणनीतिक स्थिति और चिकन नेक कॉरिडोर
- 10:54भारत के लिए सुरक्षा चुनौती और भविष्य की संभावनाएं
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Speaker A
ये कश्मीर नहीं, फिस्तीन भी नहीं, ये इंडिया है। इसका वो पार्ट है जिसे दुनिया की नजरों से छिपाया जाता है। इन्हें कहते हैं दी सेवन सिस्टर्स। वो सात रियासतें जो भारत के नक्शे पर तो हैं, लेकिन उनके दिल इंडिया के साथ नहीं धड़कते।
Speaker A
यहां एक ही नारा लगता है, आजादी। मतलब भारत से आजादी। एक तरफ यह भारत है जो दुनिया को दिखाया जाता है। शाइनिंग इंडिया, सेकुलर इंडिया, दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी इंडिया और दूसरी तरफ है ये इंडिया। जहां 70 से ज्यादा सेपरेटिस्ट मूवमेंट्स चल रही हैं।
Speaker A
ये वो इलाके हैं जहां कानून नहीं, जंगल का कानून चलता है। यहां कोई भी वर्दी में चलता नजर आए तो उसको मारने का खुला लाइसेंस है। और वर्दी वाले को भी मारने, रेप करने की खुली इजाजत।
Speaker A
तो आइए देखते हैं सेवन सिस्टर्स का मसला क्या है और इतना बड़ा प्रॉब्लम था तो ये इंडिया का हिस्सा क्यों और कैसे बनी?
Speaker A
ये वो कहानी है जो आपको मीडिया कभी नहीं दिखाएगा, लेकिन इंकलाब इससे जरूर पर्दा हटाएगा। जुल्म की, जब्र की खूनी बगावतों की तारीख बताएगा और उस इलाके की स्ट्रेटेजिकेंस भी समझाएगा जिसे चिकन्स नेक कहते हैं। वो जगह जो किसी भी वक्त भारत की गर्दन तोड़ सकती है।
Speaker A
मिड अगस्त 1947, हिंदुस्तान की तारीख का अहम तरीन दिन। अंग्रेज हिंदुस्तान छोड़ रहे थे। जो इलाके डायरेक्ट ब्रिटिश रूल में थे, उनका फैसला तो हो चुका था। लेकिन यहां सैकड़ों ऐसे इलाके भी थे जिन्हें प्रिंसली स्टेट्स कहते थे।
Speaker A
इन छोटी बड़ी रियासतों को ऑप्शन दिया गया था कि या तो इंडिया में शामिल हो जाए या पाकिस्तान। लेकिन जो हुआ वो आपको पता ही होगा। कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ की कहानियां तो आपने सुनी ही होंगी।
Speaker A
लेकिन एक स्टोरी ऐसी है जो किसी को याद नहीं रहती और जिन्हें याद भी थी उन्होंने भी इसे भुला दिया। वो है नॉर्थ ईस्ट इंडिया का इलाका। वो जो हिस्टोरिकली कभी भी हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं रहा था।
Speaker A
इस इलाके की हमेशा अपनी आजाद बादशाहतें थीं। अपना कल्चर था। अपनी जुबाने थीं और सबसे बढ़कर वो नस्लें भी बिल्कुल अलग-थलग थीं। यहां तिब्बती, बर्मन और मंगोलियाई नस्ल के लोग रहा करते थे। जिनका रहन-सहन, खाना पीना बल्कि चेहरेवेरे भी बाकी हिंदुस्तान से बिल्कुल जुदा थे।
Speaker A
मसलन यहां की एक रियासत का नाम है मणिपुर जो एक आजाद स्टेट थी जिसकी अपनी शानदार हिस्ट्री थी। उसने 1947 में इंडिया में शामिल होने से इंकार कर दिया। अपना कॉन्स्टिट्यूशन बनाया, बल्कि 1948 में वहां इलेक्शन भी हुए।
Speaker A
जी हां, वो एक अलग मुल्क बनने वाला था। लेकिन नई दिल्ली में बैठे भारत के डेमोक्रेटिक लीडर्स को यह आजादी बिल्कुल पसंद नहीं। अक्टूबर 1949 में उन्होंने मणिपुर के महाराजा को शिलांग बुलाया और वहां नजरबंद कर दिया और फिर गन पॉइंट पर जबरदस्ती उनसे भारत में शामिल होने के मुयदे यानी मर्जर एग्रीमेंट पर साइन करवाए गए।
Speaker A
यह एक खुला और ढिटाई से किया गया कब्जा था। आवाम का कहना था कि बादशाह के पास ये अथॉरिटी है ही नहीं कि वो मर्जर एग्रीमेंट करें, लेकिन कब्जा हो गया और कोई उसे रोक नहीं पाया।
Speaker A
और यह सिर्फ मणिपुर में नहीं हुआ। यही कहानी त्रिपुरा में भी रिपीट की है। वहां की मलिका पर भी दबाव डालकर साजिश करके मजबूर किया गया कि वो भी साइन करें।
Speaker A
यहीं पर एक स्टेट नागालैंड भी है जिसकी जनता ने तो 14 अगस्त 1947 को ही इंडिया की आजादी से एक दिन पहले अपनी आजादी का ऐलान कर दिया था। उनका कहना था कि हम कभी अंग्रेज के गुलाम नहीं रहे तो हम इंडिया के गुलाम क्यों बने?
Speaker A
लेकिन उनकी आवाज को भी बंदूक की ताकत से दबा दिया गया। यह मैरिज नहीं समझे, एक अगवा था। एक नहीं बल्कि सात रियासतों को बंदूक की नोक पर इंडियन यूनियन में शामिल कर दिया गया।
Speaker A
यही वजह है कि इंडिया कभी इनका दिल नहीं जीत सका। बगावत का बीज समझे उसी दिन बो दिया गया था और फसल आगे आने वाली नस्ल काट रही है। भारत ने इन रियासतों की जमीन पर तो कब्जा कर लिया लेकिन अब उसके सामने एक और बहुत बड़ा चैलेंज था।
Speaker A
दिलों और दिमागों पर भी कब्जा करना। और इसके लिए जो तरीका इंडिया ने अपनाया वो बंदूक से भी ज्यादा खतरनाक था। उसने इन लोगों की हजारों साल पुरानी आइडेंटिटी पर ही हमला कर दिया। नई दिल्ली में बैठे नेताओं ने सोचा कि वो जबरदस्ती इन लोगों को इंडियन बनाएंगे तो उन्होंने अपनी जुबान यानी हिंदी, अपना कल्चर और अपने रिलीजन को उन पर थोपने की कोशिश की और सबसे बढ़कर उन्होंने बाहर से लाकर लाखों लोगों को यहां आबाद करना शुरू कर दिया।
Speaker A
मकसद क्या था? यह कि इन इलाकों की डेमोग्राफी ही बदल जाए। यहां के लोग अपनी ही जमीन पर माइनॉरिटी बन जाएं और दुनिया की तारीख है जब भी कोई ऐसा करता है बगावत की आग भड़कती है।
Speaker A
इस आग की तीन और बहुत ही खूनी कहानियां हैं। पहली कहानी नागा बगावत की। भारत की सबसे पुरानी जंग नागालैंड के आवाम 1947 में ही अपनी आजादी का ऐलान कर चुके थे। उन्होंने भारत के इस कल्चर अटैक को कभी कबूल नहीं किया।
Speaker A
इसलिए उन्होंने बंदूक उठा ली और यूं जन्म हुआ एनएससीएन का। यानी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड का। यह सिर्फ एक बागी ग्रुप नहीं समझे, एक पैरेलल गवर्नमेंट है जिसके फौजी कैंप हैं। यह टैक्स लेते हैं और आज भी आजाद नागालैंड के लिए लड़ रहे हैं।
Speaker A
ये इंडिया की तारीख की सबसे पुरानी जंग है जो 1955 में इलाके में इंडियन आर्मी लगाने से लेकर आज तक जारी है। 1960 में इंडिया ने नागालैंड को अलग स्टेट तो बनाया लेकिन इससे कोई मसला हल नहीं हुआ।
Speaker A
दूसरी स्टोरी है आसाम की मूवमेंट की। वहां की तो समझे कहानी ही अलग है। आसाम डायरेक्ट ब्रिटिश रूल में था। यानी यह बराहेरास्त इंडिया का पार्ट बना। फिर यहां बगावत क्यों हुई?
Speaker A
इसकी वजह है बांग्लादेश से आने वाले लाखों गैर कानूनी माइग्रेंट्स और फिर आसाम को टुकड़े-टुकड़े करना। 1970 तक आसाम एक बड़ी रियासत था। लेकिन फिर इसमें से मजीद स्टेट्स निकाली गई।
Speaker A
1972 में मेघालय को एक अलग रियासत बना दिया गया। और अरुणाचल प्रदेश और मिजोराम को यूनियन टेरिटरीज के नाम पर अलग कर दिया गया। जिन्हें 1986 में खुद भी स्टेट का दर्जा मिला।
Speaker A
लेकिन हालात इससे कहीं पहले खराब हो चुके थे। 1971 और इसके बाद बांग्लादेशी महाजरीन की आमद ने समझे बर्दाश्त की लिमिट खत्म कर दी। क्योंकि इंडियन गवर्नमेंट ने अपनी वोट बैंक की सियासत के लिए इन महाजरीन को यहां आबाद होने दिया।
Speaker A
और नतीजा आसाम के आवाम को लगा कि वो अपनी ही जमीन पर माइनॉरिटी बन रहे हैं। उनकी जबान, उनका कल्चर, उनके वसाइल सब खतरे में हैं। और इसी खौफ, इसी गुस्से ने जन्म लिया गुल्फा को।
Speaker A
यानी यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ आसाम। एक ऐसी तंजीम जिसने कई दहाइयों तक इंडिया के खिलाफ एक खूनी गोरिल्ला वॉर लड़ी और अब भी इसी के वाक्यात आसाम में मौजूद हैं।
Speaker A
और तीसरी ओर सबसे तकलीफदेह कहानी है मणिपुर की। लेकिन इस कहानी से पहले जरूरी है उस काले कानून को समझना जिसने इंडियन आर्मी को कत्ल, तशद्दुद और रेप का खुला लाइसेंस दे रखा है।
Speaker A
जब दिल्ली के तख्त पर बैठे हुक्मरानों ने देखा कि उनका कल्चरल इन्वजन नाकाम हो रहा है, लोग अपनी आइडेंटिटी छोड़ने को तैयार नहीं तो उन्होंने फैसला किया कि अगर लोग प्यार से नहीं मानते तो उन्हें खौफ से झुकाया जाएगा।
Speaker A
यहां से शुरू होता है सेवन सिस्टर्स पर रियासती दहशतगर्दी का वो डार्क चैप्टर जो आज तक चला और इस दहशतगर्दी का सबसे बड़ा और सबसे बेरहम हथियार है एक काला कानून।
Speaker A
एक ऐसा कानून जिसे सुनकर शायद आपको यकीन ना आए कि यह दुनिया की सबसे बड़ी जमूरियत का कानून भी हो सकता है। 1958, यानी 1958 में बनने वाले इस कानून का नाम है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट, यानी शॉर्ट में अफस्पा।
Speaker A
जी हां, वही कानून जो कश्मीर में भी लागू है। मशहूर फिल्म हैदर के एक सीन में आपने इसका जिक्र भी सुना होगा। बेशर्म गुस्ताख जैसे अफस्पा।
Speaker A
तो ये अफस्पा क्या है? क्या कहता है? यह कानून भारतीय फौज को किसी भी डिस्टर्बड एरिया में ऐसे इख्तियार देता है जिनका जमूरियत में कोई तसवुर भी नहीं।
Speaker A
नंबर एक, फौज किसी को भी सिर्फ शक की बुनियाद पर गोली मारकर कत्ल कर सकती है। नंबर दो, फौज किसी भी घर में किसी भी वक्त बगैर किसी वारंट के दाखिल हो सकती है। तलाशी ले सकती है और इस मकान को तबाह बर्बाद कर सकती है।
Speaker A
नंबर तीन, फौज किसी को भी बगैर किसी वजह के गिरफ्तार कर सकती है और महीनों तक कैद कर सकती है।
Speaker A
और अगर आपको अभी तक खौफ महसूस नहीं हुआ, तो यह भी सुन लें कि ऐसा करने वाले किसी फौजी के खिलाफ किसी अदालत में कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसे पूरा कानूनी तहफुज हासिल होगा।
Speaker A
यानी वो गलत भी साबित हो तब भी उसको कोई कुछ नहीं कर सकता। असल में ये कानून नहीं, ये कत्ल का लाइसेंस है। ये रेप का लाइसेंस है। ये तशद्दुद का लाइसेंस है।
Speaker A
समझे जंगल का कानून है। जिसके आने के बाद सेवन सिस्टर्स की सर जमीन एक जेल में बदल गई। क्योंकि इस कानून के मुताबिक किसी एक के किए की सजा सबको दी जाती है।
Speaker A
अगर किसी गांव में कोई बागी छुप जाता है तो पूरे गांव को सजा मिलती है। सबके घर जला दिए जाते हैं। सबकी फसलें बर्बाद कर दी जाती हैं।
Speaker A
इन कारवाइयों में हजारों नौजवानों को रात के अंधेरे में उनके घरों से उठाया गया और वो कभी वापस नहीं आए। उनकी माएं आज भी उनकी तस्वीरें लिए इंसाफ का इंतजार कर रही हैं।
Speaker A
फिर खवातीन के रेप को भी एक जंगी हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया। उनकी इज्जतों को पामाल करके उनके मर्दों को यह मैसेज दिया गया कि वो बेबस हैं और उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
Speaker A
हमने यह कहानियां कश्मीर के हवाले से तो बहुत सुनी हैं लेकिन सच तो यह है कि नॉर्थ ईस्ट में यह सब कुछ कश्मीर से भी...
Speaker A
बखशेंगे। और यह सब कुछ अफस्पा की काली छतरी के नीचे किया गया। यानी कोई सवाल नहीं। कोई अदालत नहीं। सिर्फ बंदूक का राज है। फिर जुलाई 2004 में वो हुआ जिसने इंडिया बल्कि पूरी दुनिया का सर शर्म से
Speaker A
झुका दिया। हुआ यह कि इंडियन आर्मी ने मणिपुर में एक 32 साल की खातून थंग जाम मनोरमा को उसके घर से उठाया और अगली सुबह उसकी गोलियों से छलनी लाश मिली जिसका बुरी तरह रेप भी किया गया था [संगीत] और अफस्पा
Speaker A
कानून की वजह से यह कातिल फौजी आजाद थे। उन्हें कोई छू भी नहीं सकता था। इस जुल्म के खिलाफ मणिपुर की 12 माएं, 12 बहनें, 12 बेटियां घर से निकली और अमफाल शहर में इंडियन फौज के हेड क्वार्टर के सामने खड़ी
Speaker A
हो गई। और फिर उन्होंने अपने सारे कपड़े उतार दिए। वो इसी हालत में फौजी हेड क्वार्टर के सामने खड़ी थी और चीख-चीख कर नारे लगा रही थी। इंडियन आर्मी रेप अस टू वी ऑल आर मनोरमा मदर्स। यानी इंडियन
Speaker A
फौजियों हमारा भी रेप करो। हम मनोरमा की माएं हैं। यह कोई प्रोटेस्ट नहीं था। यह पूरी इंसानियत के मुंह पर जोर का तमाचा था। पूरा मणिपुर हिल कर रह गया। और इस प्रोटेस्ट से हमें मिला एक ऐसा कैरेक्टर
Speaker A
जो आज भी बहादुरी की मिसाल है। नाम है एरम शर्मीला। एक खातून जिन्होंने इस काले कानून के खिलाफ 16 साल तक दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़ताल की। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 500 हफ्तों से ज्यादा तक
Speaker A
फोर्स फीट किया गया ताकि वो मर ना जाए। ये तो सिर्फ तीन कहानियां है। ऐसी दर्जनों कहानियां सेवन सिस्टर्स के जंगलों और पहाड़ों में दफन जो हमें बताती है कि यह बगावत सिर्फ जमीन की नहीं ये अपनी आइडेंटिटी, अपनी इज्जत और अपने सर्वाइवल
Speaker A
की जंग। तो दिल्ली सरकार यह समझ रही थी कि वो बंदूक की नोक पर इस जुल्म और बर्बरयत [संगीत] से इन लोगों को हमेशा के लिए खामोश करा देगी। लेकिन वो गलत थी। उनका हर कत्ल, उनका हर रेप, उनका हर जुल्म बगावत
Speaker A
की आग में पेट्रोल का काम कर रहा था। इसने आजादी के जंजुओं की एक ऐसी नई खतरनाक और बेखौफ नस्ल पैदा कर दी जो अब मरने या मारने के लिए तैयार थी। और इस दौरान इस आग में और खिलाड़ी भी तेल [संगीत] डालने आ
Speaker A
चुके हैं। चीन और बांग्लादेश। यह जंग अब सिर्फ दिल्ली और बागियों के दरमियान नहीं रही। अब इस मैदान पर एक तीसरा, बहुत बड़ा और बहुत ही खतरनाक खिलाड़ी आ चुका है। चीन भारत की इन सेवन सिस्टर्स के बॉर्डर सिर्फ
Speaker A
भारत से नहीं चीन, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश से भी मिलते हैं। यानी यह एक बहुत ही सेंसिटिव और स्ट्रेटेजिक रीजन है। और चीन तो इस रीजन में इंडिया को हमेशा से चैलेंज करता है। खासतौर पर अरुणाचल प्रदेश की रियासत।
Speaker A
अरुणाचल के बारे में चीन का कहना है कि यह इलाका हिस्टोरिकली तिब्बत का पार्ट था। इसलिए यह चीन का है। वो तो इसे साउथ तिब्बत कहता है और अपने नक्शों में अरुणाचल को अपना हिस्सा दिखाता है। लेकिन यह सिर्फ एक सरहदी झगड़ा नहीं समझे ये दो
Speaker A
एशियन जॉइंट्स के बीच ताकत की जंग है। और इस इलाके में एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार है। और 2024 में बांग्लादेश में जो कुछ हुआ है इसने तो रीजन को और भी गर्म कर दिया। इस इलाके में
Speaker A
इंडिया का सबसे अहम पार्टनर था बांग्लादेश। आवामी लीग की गवर्नमेंट हमेशा से इंडिया के साथ रही। लेकिन जुलाई 204 में एक आवामी इंकलाब के बाद यह हुकूमत खत्म हो गई। इंडिया अपने एक बड़े पार्टनर बड़े एसेट से महरूम हो चुका है। और यह बात
Speaker A
इसलिए खतरनाक है क्योंकि सेवन सिस्टर्स का रास्ता बिल्कुल चीन और बांग्लादेश के बीच से निकलता है। यह है भारत की सबसे कम डोज। वो 22 कि.मी. की पतली सी पट्टी जिसे कहते हैं सिलीगोड़ी कॉरिडोर। लेकिन इसका पॉपुलर नेम भी है चिकन स्नेक। जी हां, मुर्गी की
Speaker A
गर्दन। यही वो कच्ची डोर है जो इन [संगीत] सेवन सिस्टर्स को बाकी इंडिया से जोड़ती है। जरा इस नक्शे को देखें। अगर कल चीन और इंडिया की कोई जंग हो जाती है जैसा कि चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा भी करता है तो
Speaker A
हालात जरा भी खराब हुए और चीन इस पट्टी पर कब्जा कर लेता है तो क्या होगा? इन सातों रियासतों का इंडिया के साथ जमीनी कनेक्शन तो खत्म हो जाएगा। क्योंकि बांग्लादेश में एक भारत मुखालिफ हुकूमत होने की वजह से
Speaker A
इंडियन फौज की सप्लाई लाइनें मुकम्मल तौर पर कट जाएंगी और फिर वो दर्जनों बागी तंजीमे जो 75 साल से किसी मौके का इंतजार कर रही हैं वो क्या करेंगी इसका आपको अंदाजा अच्छी तरह हो रहा होगा तो जनाब ये
Speaker A
है इंडिया का सबसे डरौना ख्वाब यह स्ट्रेटेजिक चेकमेट है सिर्फ एक थ्योरी नहीं यह एक रियल और जीता जागता खतरा है और इसी खतरे की वजह से यह बगावतें अब सिर्फ इंडिया का अंदरूनी मसला नहीं रही। यह इसके वजूद के लिए एक खतरा है। सेवन
Speaker A
सिस्टर्स की आजादी की जंग, चीन का बढ़ता हुआ साया और हिंदुत्व की तंग नजरी ने इस इलाके को एक बारूदी सुरंग में बदल डाला है। जो किसी भी वक्त फट सकती है और आईडिया ऑफ इंडिया को भी बर्बाद कर सकती है। और
Speaker A
आईडिया ऑफ इंडिया क्या था? यूनिटी इन डायवर्सिटी। एक ऐसा मुल्क जहां सैकड़ों बल्कि हजारों जुबाने, सकाफतें और नस्लें एक साथ रहती हैं। अमन के साथ। लेकिन सेवन सिस्टर्स की कहानी तो कुछ और ही बता रही है। यह बता रही है कि यह तो सिर्फ और
Speaker A
सिर्फ हिक धावा है। खोखली बातें हैं। यह बता रही है कि इंडिया की यूनिटी किसी की रजामंदी पर नहीं बल्कि ताकत और जब्र के जोर पर है। इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल ही यही है कि दुनिया की सबसे बड़ी जमूरियत
Speaker A
होने का दावा करने वाला मुल्क क्या गन पॉइंट पर करोड़ों लोगों को हमेशा के लिए अपना गुलाम बनाकर रख सकता है। तारीख तो यही बताती है कि ऐसा ना कभी हुआ है और ना होगा। आप जमीन पर तो कब्जा कर सकते हैं
Speaker A
लेकिन आप दिलों पर और दिमागों में मौजूद आजादी की ख्वाहिश पर काबू नहीं पा सकते। सेवन सिस्टर्स की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब दिल आजाद होता है तो दुनिया की कोई फौज, कोई काला कानून इसे
Speaker A
हमेशा के लिए कैद नहीं रख सकता। सवाल अब यह है ही नहीं कि भारत टूटेगा या नहीं। सवाल अब सिर्फ यह है कि ऐसा कब होगा?
Topics:सेवन सिस्टर्सपूर्वोत्तर भारतमणिपुरनागालैंडआसामAFSPAचिकन नेक कॉरिडोरआजादी की मांगभारत की संवेदनशील क्षेत्रसांस्कृतिक संघर्ष











