सरदार वल्लभ भाई पटेल की कहानी, जिन्होंने भारत को जोड़ा और पाकिस्तान के निर्माण में भूमिका निभाई। उनकी राजनीतिक सोच और फैसलों का अनकहा सच।
Key Takeaways
- सरदार पटेल ने भारत को जोड़ने के साथ-साथ पाकिस्तान के निर्माण को भी स्वीकार किया था।
- उनकी राजनीतिक सोच गांधी और नेहरू से अलग, अधिक रियलिस्ट और हार्डलाइन थी।
- पटेल ने मुस्लिम लीग की वीटो पावर को भारत के लिए खतरा माना और partition को जरूरी समझा।
- उन्होंने कांग्रेस के अंदर सत्ता और पार्टी मशीनरी को नियंत्रित किया।
- उनका योगदान आज भी भारतीय राजनीति और राष्ट्रीयता की समझ में महत्वपूर्ण है।
What the video covers
- यह वीडियो सरदार वल्लभ भाई पटेल के जीवन और राजनीतिक सफर को दर्शाता है।
- पटेल को भारत के एकजुटकर्ता के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने 560 रियासतों को जोड़कर भारत बनाया।
- पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ और वे गांधी के सिपाही थे, लेकिन उनके विचार गांधी से अलग थे।
- पटेल मुसलमानों को भाई नहीं बल्कि एक समस्या मानते थे, जिसे सुलझाना जरूरी था।
- कांग्रेस के अंदर पटेल और नेहरू के बीच विचारधारा का फर्क था, जिससे पार्टी में दो धड़े बने।
- पटेल ने मुस्लिम लीग की वीटो पावर को भारत के लिए खतरा माना और पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार किया।
- 1946 में इंट्रम गवर्नमेंट में पटेल इंटीरियर मिनिस्टर थे, लेकिन फाइनेंस मिनिस्ट्री मुस्लिम लीग के पास थी, जिससे सरकार पैरालाइज्ड हो गई।
- पटेल ने partition को एक जरूरी कदम माना ताकि भारत में एक मजबूत केंद्रीय सरकार बन सके।
- माउंटबेटन के सामने पटेल ने पाकिस्तान के निर्माण को मंजूर करवा लिया, जो एक खामोश डील थी।
- पटेल की सोच और फैसले आज के भारत की राजनीति और राष्ट्रीयता की नींव माने जाते हैं।
Chapters
- 00:00स्टैचू ऑफ यूनिटी और सरदार पटेल का परिचय
- 01:48पटेल का प्रारंभिक जीवन और गांधी से मुलाकात
- 04:06कांग्रेस में पटेल और नेहरू के विचारों का टकराव
- 05:26इंट्रम गवर्नमेंट और मुस्लिम लीग की वीटो पावर
- 08:00पटेल का पार्टीशन को स्वीकारना और मौलाना आजाद से विवाद
- 09:13माउंटबेटन के साथ पटेल की खामोश डील
- 12:06रियासतों का विलय और भारत का एकीकरण
- 14:14पटेल की विरासत और आज के भारत पर प्रभाव
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Speaker A
यह है दुनिया का सबसे ऊंचा मुजस्मा, स्टैचू ऑफ यूनिटी। [संगीत] समझो, लोहे और कंक्रीट का माउंट एवरेस्ट है ये। 790 फीट बुलंद। सिर्फ यह मुजस्मा बनाने के लिए भारत ने 42 करोड़ डॉलर खर्च कर दिए थे। लेकिन क्यों? आखिर किसका मुजस्मा है
Speaker A
ये? यह हैं इंडिया के आयरनमैन सरदार वल्लभ भाई पटेल, जिनके बारे में हर इंडियन बच्चे को स्कूल में पढ़ाया जाता है कि वही थे जिन्होंने इंडिया को इंडिया बनाया। 560 बिखरी हुई रियासतों को जोड़कर एक मुल्क बनाया। एक
Speaker A
हीरो, एक गार्डियन, एक आर्किटेक्ट। लेकिन अगर मैं कहूं कि जिसे इंडिया को जोड़ने वाला कहा जाता है, असल में वही इंडिया तोड़ने वाला आदमी था। तो क्या आप यकीन करेंगे?
Speaker A
लोग तो कहते हैं हिंदुस्तान को तोड़ने और पाकिस्तान को बनाने का कारनामा कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना का है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। हकीकत क्या है? आखिर एक अल्ट्रा नेशनलिस्ट ने इंडिया को बचाने के लिए इंडिया को ही तोड़ने का फैसला क्यों
Speaker A
किया? यह आज हम आपको बताएंगे इंकलाब में कि वल्लभ भाई पटेल कौन थे? वो अखंड भारत के हीरो थे या बहुत ही खामोशी से पाकिस्तान बनाने वाले। वल्लभ भाई पटेल सन 1875 में नडियाद में पैदा हुए। जो तब बॉम्बे प्रेसिडेंसी का
Speaker A
पार्ट था और आज इंडियन स्टेट गुजरात में है। पटेल किसी नवाब खानदान से नहीं थे और ना वह किसी सियासतदान के बेटे थे। वो तो एक किसान फैमिली में पैदा हुए थे। एक देहाती बैकग्राउंड रखने वाले आदमी और
Speaker A
देहाती सख्ती उनकी पर्सनालिटी का बहुत अहम पार्ट थी और आखिर तक उनके साथ रही। उनके मुकाबले में जवाहरलाल नेहरू तो समझो मुंह में सोने का चमचा लेकर पैदा हुए थे। पोएट्री और फिलॉसफी के आशिक थे। लेकिन पटेल एक प्रैक्टिकल अप्रोच रखने वाले आदमी
Speaker A
थे। जिनके लिए जिंदगी ख्वाबों का नहीं बल्कि हार्श रियलिटीज का नाम था। शायद इसीलिए क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ फेस किया था। जवानी में प्लेग का निशाना बने। बाल-बाल बचे। फिर बीवी की अज़यतनाक मौत से ही दोबारा कभी शादी नहीं
Speaker A
की। और 36 साल की उम्र में लंदन जाकर कानून की तालीम हासिल की। यानी लाइफ में सब कुछ बहुत लेट हासिल किया। लेकिन जिस उम्र में लोगों को मिड लाइफ क्राइसिस शुरू हो जाता है, उस उम्र में पटेल एक सक्सेसफुल
Speaker A
[संगीत] बैरिस्टर बन चुके थे। अभी वह गांधी के फॉलोअर नहीं थे, बल्कि महंगा सूट पहनने वाले, सिगार पीने वाले और गांधी की अहिंसा की यानी नॉन वायलेंस की पॉलिसी पसंद ना करने वाले वकील थे। लेकिन फिर एक लम्हा
Speaker A
ऐसा आया जिसने सब कुछ बदल दिया। 1917 में गोधरा में एक कॉन्फ्रेंस [संगीत] हुई, यानी पटेल के अपने शहर में, जहां उन्हें पहली बार गांधी जी को करीब से देखने का मौका मिला। उन्होंने देखा कि यह दुबला पतला
Speaker A
आदमी सिर्फ बातें नहीं करता बल्कि अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर बात कर रहा है। वह भी किसानों के हक के लिए और पटेल क्योंकि खुद भी किसान की औलाद थे। इसीलिए ये बातें सुनकर वो पिघल गए। अपनी
Speaker A
चलती हुई वकालत छोड़ दी। समझो डिग्रियां जला डाली। बेलचा उठा लिया और अपने विलायती सूट को आग लगाकर खद्दर पहन लिया। अब गांधी जी आगे-आगे थे और पटेल पीछे-पीछे। लेकिन एक चीज मैं यहीं पर क्लियर कर दूं। पटेल
Speaker A
गांधी के भक्त नहीं थे। समझो वो उनके सिपाही थे। गांधी एक आइडियलिस्ट थे। पटेल एक रियलिस्ट। गांधी को हिंदू मुस्लिम इत्याहाद बहुत प्यारा था। वो मुसलमानों को अपना भाई समझते थे। लेकिन इस मामले में पटेल की सोच जरा मुख्तलिफ थी। वो
Speaker A
मुसलमानों को भाई नहीं बल्कि मसला समझते थे। ऐसा प्रॉब्लम जिसे सॉल्व करना जरूरी है। उनके दिल में वो नरम गोशा था ही नहीं जो इस हवाले से नेहरू और गांधी के पास नजर आता था। यही वजह है कि कांग्रेस में
Speaker A
जैसे-जैसे पटेल आगे बढ़ते गए, पार्टी के अंदर दो पोल बनते चले गए। एक तरफ नेहरू, सोशलिस्ट, सेकुलर और कांग्रेस का खूबसूरत चेहरा। जनता उनसे प्यार करती थी। दूसरी तरफ पटेल थे कंजर्वेटिव, कैपिटलिस्ट और हार्ड लाइन हिंदू नेशनलिस्ट। यानी हाथी के
Speaker A
दांत दिखाने के और, खाने के और। और पटेल ही कांग्रेस की मशीनरी थे। पार्टी फंड कहां से आएगा, किसको टिकट मिलेगा, किसको क्या डेजिग्नेशन मिलेगा? यह सब कुछ उनके हाथ में था। उस जमाने में पार्टी में मौलाना अबुल कलाम आजाद बहुत ही अहम थे और
Speaker A
ऐसी सोच रखने वाले पटेल के साथ उनकी कभी नहीं बनी। तो जैसे-जैसे वक्त आगे बढ़ता रहा, कांग्रेस में पटेल का इन्फ्लुएंस बढ़ता चला गया और 1946 आते-आते वो कांग्रेस के बेताज बादशाह बन चुके थे। प्रेसिडेंट नेहरू थे। लेकिन पार्टी की
Speaker A
लगाम असल में पटेल के हाथों में थी। वह इसे जहां चाहे मोड़ सकते थे और अपनी हकीकत पसंदाना सोच की वजह से वह देख रहे थे कि अंग्रेज जा रहे हैं लेकिन पीछे एक बम छोड़कर जा रहे हैं। एक टेकिंग बम यानी
Speaker A
मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना, जिनकी कयादत में मुसलमान [संगीत] पाकिस्तान मांग रहे थे। नेहरू और गांधी तो इसे सिर्फ एक सियासी चाल समझते थे और यही समझते आए थे कि आखिर में सब मिलजुलकर रहेंगे। होगा कुछ नहीं। लेकिन पटेल रियलिस्ट पटेल वो कुछ और
Speaker A
देख रहे थे। वो समझते थे कि जिस घर में रोजाना का झगड़ा हो, वो घर कभी आबाद नहीं रह सकता और यहीं से उनकी सोच में तब्दीली आई जिसने तारीख का धारा ही बदल दिया। एक ऐसा फैसला जो नेहरू और गांधी के ख्वाब
Speaker A
तोड़ने वाला था और जिन्ना और इकबाल के ख्वाब को हकीकत बनाने वाला था। सर्जरी का वक्त आ चुका था। [संगीत] 1946, आजादी हिंदुस्तान के दरवाजे पर दस्तक दे रही थी। लेकिन घर के अंदर एक सिविल वॉर चल रही थी। अंग्रेजों ने इंडिया में एक
Speaker A
इंट्रम गवर्नमेंट बनाई जिसमें कांग्रेस और [संगीत] मुस्लिम लीग दोनों शामिल थे। नेहरू वाइस प्रेसिडेंट बने, जिनके पास वजीर आजम वाले सारे इख्तियारात थे और पटेल बने इंटीरियर मिनिस्टर। एक ऐसी पोजीशन जो हिंदुस्तान में तब से लेकर आज तक बहुत ही
Speaker A
पावरफुल है। सबको लग रहा था कि हुकूमत मिलजुलकर चलेगी। लेकिन मसला यह था कि हुकूमत चल ही नहीं रही थी। बल्कि पैरालाइज्ड हो चुकी थी। लेकिन क्यों? इसकी वजह बजाहिर तो मुस्लिम लीग थी। लेकिन हकीकत यह है कि खुद कांग्रेस की गलती थी।
Speaker A
एक भयानक गलत। एक स्ट्रेटेजिक मिस्टेक। हुआ यह कि जब इंटेरम गवर्नमेंट बन रही थी तो कांग्रेस ने सोचा कि वो अहम वज़ारतें अपने पास रखेगी। मसलन फॉरेन, इंटीरियर और डिफेंस। और जो मिनिस्ट्री इतनी इंपॉर्टेंट नहीं है वो मुस्लिम लीग को दे देंगे। यूं
Speaker A
फाइनेंस मिनिस्ट्री मुस्लिम लीग को मिल गई, जिसने वजीर बनाया लियाकत अली खान। पटेल और नेहरू तो समझ रहे थे कि फाइनेंस का काम सिर्फ अकाउंट्स वाला है। लेकिन ये उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। एक बहुत बड़ी
Speaker A
सियासी गलती। हुआ यह कि लियाकत अली खान ने खजाने की ताकत का इस्तेमाल कर लिया और हुकूमत का पहिया जाम कर दिया। पटेल इंटीरियर मिनिस्टर तो थे, लेकिन फाइनेंस मिनिस्ट्री की मंजूरी के बगैर वो चपरासी भी भर्ती नहीं कर सकते थे। कोई पॉलिसी
Speaker A
नहीं बना सकते थे। कोई फंड्स रिलीज नहीं कर सकते थे और हर फाइल पर लियाकत अली खान का नोट होता, रिजेक्टेड या अंडर कंसीडरेशन। पटेल को आदत थी पावर की कंट्रोल की, इस बेबसी ने उन्हें पागल कर दिया। उन्होंने
Speaker A
देख लिया कि अगर हिंदुस्तान का फ्यूचर यही है जहां मुस्लिम लीग हर कदम पर अपनी वीटो पावर इस्तेमाल करेगी, तो यह मुल्क कभी नहीं चल सकेगा, हमेशा कमजोर रहेगा, हमेशा लड़ता रहेगा। यहीं पर इसी माहौल में उन्होंने वो
Speaker A
फैसला किया जिसने तारीख बदल दी। पटेल के सबसे बड़े राइवल मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। जी हां, [संगीत] उनकी अपनी पार्टी के प्रेसिडेंट और एक अहम लीडर। वो अपनी किताब इंडिया वंस फ्रीडम में लिखते हैं कि पटेल वो पहले कांग्रेस लीडर थे
Speaker A
जिन्होंने यह बात कबूल की कि पार्टीशन तो होगा। मौलाना आखिर तक एक यूनाइटेड इंडिया के लिए कोशिश करते रहे। पटेल से मिले, उन्हें समझाने की कोशिश भी की। लेकिन उन्हें जो जवाब मिला, उसने उनके पैरों तले जमीन निकाल दी। पटेल ने आजाद की आंखों में
Speaker A
आंखें डालकर कहा, "मौलाना, हमें यह बात पसंद हो या ना हो, लेकिन हकीकत यही है कि हिंदुस्तान में दो कौमें हैं। अगर दो भाई एक घर में सुकून से नहीं रह सकते, तो बेहतर है कि उनके बीच में दीवार खड़ी कर
Speaker A
दी जाए और वो अलग हो जाए।" जी हां, यह जुमला कायदे आजम के मुंह से नहीं, कांग्रेस के सबसे ताकतवर लीडर के मुंह से निकल [संगीत] रहा था। यह आजाद के लिए पहला और सबसे बड़ा झटका था। उन्होंने देख लिया
Speaker A
कि पटेल जहनी तौर पर पाकिस्तान को कुबूल कर चुके हैं। शायद जिन्ना से भी पहले। लेकिन क्यों? असल में पटेल दिल से नहीं दिमाग से सोचते थे। वो जज्बात पर नहीं बल्कि हकीकत पर यकीन रखते थे। उनकी फिलॉसफी बिल्कुल
Speaker A
सिंपल थी। ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ देना अच्छा है। यही वजह है कि उन्होंने सोचा कि मुस्लिम लीग को पाकिस्तान दे दें। उन्हें अलग कर दें। ताकि बाकी हिंदुस्तान में एक मजबूत सेंट्रल गवर्नमेंट बने। जहां किसी के पास
Speaker A
वीटो पावर ना हो। जहां कोई रोक-टोक ना हो। जब मार्च 1947 में आखिरी वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन इंडिया आए, तो उनका मिशन था हिंदुस्तान के फ्यूचर का फैसला करना। नेहरू अब भी अखंड भारत के ख्वाब देख रहे थे। गांधी जी कह रहे थे, "तकसीम मेरी लाश पर
Speaker A
होगी।" लेकिन माउंटबेटन एक होशियार आदमी थे। उन्हें अंदाजा था कि इस ग्रुप में असल पावर पटेल के पास है। माउंटबेटन की रिपोर्ट में लिखा है कि पटेल ने उन्हें प्राइवेटली कहा था कि अगर आप हिंदुस्तान की पार्टीशन का कोई प्लान लाते हैं तो मैं
Speaker A
कांग्रेस से इसे मंजूर करवा लूंगा। यह एक खामोश डील थी। अंग्रेजों को बाइज्जत वापसी चाहिए थी और पटेल को एक मजबूत इंडिया जिसमें वो पावर किसी के साथ शेयर ना करें। पटेल की सोच अटल थी।
Speaker A
तरह नेहरू और गांधी को इस सर्जरी पर तैयार करना। आजाद के मुताबिक पटेल ने नेहरू को समझाया कि अगर हमने अभी पार्टीशन कबूल नहीं किया तो मुस्लिम लीग हमेशा हुकूमत को अपाहिज रखेगी। हम कभी आगे नहीं बढ़ सकेंगे। अगर एक तकसीम कबूल नहीं की तो कल
Speaker A
इंडिया के अंदर सैकड़ों छोटे-छोटे पाकिस्तान बन जाएंगे। नेहरू भी रोज-रोज़ के झगड़ों से तंग आ चुके थे। बिल आखिर उन्होंने पटेल की लॉजिक के सामने हथियार डाल दिए। अब बारी थी गांधी जी की जिनका कहना था तकसीम उनकी लाश पर होगी। जब आजाद
Speaker A
उनके पास आखिरी उम्मीद लेकर गए तो गांधी जी ने भी सर झुकाकर कहा अब पार्टीशन को कोई नहीं रोक सकता। यह मौलाना आजाद की सबसे बड़ी हार थी और पटेल की सबसे बड़ी जीत। यूनाइटेड इंडिया के ताबूत में आखिरी
Speaker A
कील [संगीत] ठोक दी गई। 3 जून 1947 को पार्टीशन का ऐलान हो गया। द ब्रिटिश गवर्नमेंट अनाउंस द प्लान [संगीत] एंड विजिंग द एस्टैब्लिशमेंट ऑफ द इंडिपेंडेंट स्टेट्स ऑफ पाकिस्तान एंड इंडिया। दुनिया समझी कि यह जिन्ना की जीत है।
Speaker A
लेकिन हकीकत यह है कि यह पटेल की [संगीत] स्ट्रेटेजिक विन थी। उन्होंने इंडिया का एक बाजू काट दिया ताकि बाकी जिस्म को बचाया जा सके। लेकिन सर्जरी अभी मुकम्मल नहीं हुई थी। अभी तो सिर्फ चेहरा लगा था। अभी होन बहने वाला था। पटेल को अब एक और
Speaker A
रूप धारना था। एक ऐसे मसीहा का रूप जो एक बिखरी हुई रियासत को जोड़ेगा। अपने आयरन हैंड से। हिंदू इंडिया एंड मुस्लिम इंडिया मस्ट बी सेपरेटेड। [संगीत] पाकिस्तान अलग हो गया। हिंदुस्तान आजाद हो गया। पटेल की सर्जरी का पहला फेज मुकम्मल
Speaker A
हो गया। लेकिन पेशेंट अभी भी खतरे में था। 15 अगस्त 1947 को जब इंडिया आजाद हुआ था तो टेक्निकली उसके अंदर 560 आजाद मुल्क मौजूद थे। प्रिंसली स्टेट्स, हैदराबाद, कश्मीर, जूनागढ़, भोपाल और उन जैसी बहुत सी रियासतें। अंग्रेजों ने जाते-जाते हर
Speaker A
रियासत को इख्तियार दिया था कि वो चाहे तो इंडिया में शामिल हो जाए या पाकिस्तान में या फिर चाहे तो आजाद रहें। समझे यह एक टूटे फूटे इंडिया का प्लान था। अगर यह रियासतें अलग हो जाती तो इंडिया का नक्शा
Speaker A
किसी स्विस चीज जैसा होता जिसमें सिर्फ सुराख ही सुराख होते। इस टूटे फूटे ख्वाब को जोड़ने के लिए ना नेहरू की पोएट्री और फिलॉसफी काम आने वाली थी और ना गांधी जी का अहिंसा का फलसफा। यहां जरूरत थी डंडे
Speaker A
की। पटेल के डंडे की। पटेल ने मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट संभाली और दुनिया कहती है कि तब उन्होंने अपने दो हथियार निकाले। [संगीत] कैरेट एंड स्टिक बिल्कुल नहीं। पटेल ने ऐसा कोई वेस्टर्न तरीका नहीं अपनाया। उन्होंने हजारों साल पुरानी इंडियन
Speaker A
स्ट्रेटजी [संगीत] अपनाई थी। चाणकिया नीति। जी हां, पटेल मॉडर्न हिस्ट्री के चाणिकिया बन गए और साम, दाम, डंट और भेद के चारों रूल इस्तेमाल किए और डट कर किए। कैसे? आइए समझाता हूं। साम क्या है?
Speaker A
समझाना, बातचीत करना, डायलॉग करना। सबसे पहले पटेल ने उन रियासतों के राजाओं को प्यार से समझाया। [संगीत] उनके अंदर देशभक्ति जगाई। उन्होंने कहा कि वक्त बदल रहा है। इसे पहचानो। भलाई इसी में है कि इंडिया के साथ मिलो। जो प्यार से नहीं
Speaker A
माने उनके लिए लाए दाम यानी खजाने के मुंह खोले। राजाओं को भारी तनख्वाएं और बड़े-बड़े टाइटल्स ऑफर किए। [संगीत] समझे उनकी ताज की कीमत लगाई। उसके बाद भी जो अकड़ दिखा रहे थे उनके लिए पटेल ने इस्तेमाल किया भेद का। उन्होंने इन राजाओं
Speaker A
को अपनी रियाया से डराया। उन्हें कहा अगर साइन नहीं किए तो तुम्हारी जनता बगावत कर देगी और हम तुम्हें बचाने के लिए नहीं आएंगे। उन्होंने रियासत के अंदर मौजूद डिवीजन का फायदा उठाया और आखिरी चीज जहां कोई हरबा काम ना हो। जैसे हैदराबाद में
Speaker A
जूनागढ़ में वहां पटेल ने चाणक्या का आखिरी रूल इस्तेमाल किया। डंड यानी ताकत का इस्तेमाल किया। सबसे पहले बारी आई जूनागढ़ की। गुजरात के साहिल पर वाकई एक रियासत यानी पटेल के अपने पड़ोस में। यहां का नवाब मुस्लिम था। लेकिन रियाया 80%
Speaker A
हिंदू थी। नवाब ने पाकिस्तान के साथ मिलने का ऐलान कर दिया। पाकिस्तान ने कुबूल भी कर लिया। पटेल खुद गुजराती थे। वो कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? उन्होंने कोई बात नहीं की। बस जूनागढ़ का पानी और कोयला बंद
Speaker A
कर दिया। फिर फौज भेजी और महासरा कर लिया। नवाब कब तक टिकते? पाकिस्तान चले गए और पटेल ने जूनागढ़ पर कब्जा कर लिया। लेकिन इससे कहीं बड़ा चैलेंज था हैदराबाद का। यह इंडिया की सबसे बड़ी प्रिंसली स्टेट थी। इसका एरिया इंग्लैंड जितना था
Speaker A
और यहां के हुक्मरान निजाम उस्मान अली खान दुनिया के अमीर तरीन आदमी थे। उनके पास अपनी फौज थी और रजाकार नाम की एक मलेशिया भी थी। हैदराबाद तो पाकिस्तान में भी शामिल नहीं होना चाहता था बल्कि वो एक
Speaker A
आजाद इस्लामिक रियासत बनना चाहता था। लेकिन पटेल का एक मशहूर जुमला था। हैदराबाद इंडिया के पेट में एक कैंसर है। इसे सर्जरी के जरिए निकालना होगा। नेहरू जंग से डर रहे थे। वो तो यूनाइटेड नेशंस में जाने की बातें कर रहे थे। लेकिन पटेल
Speaker A
ने इंतजार नहीं किया। 13 सितंबर 1948 को उन्होंने ऑपरेशन पोलो का हुकुम दे दिया। इंडियन फौज चारों तरफ से हैदराबाद में दाखिल हो गई। सिर्फ 5 दिन में निजाम की फौज ने हथियार डाल दिए और फिर वो हुआ जो
Speaker A
आज तक छुपाया जाता है। हजारों मुसलमानों का कत्लेआम हुआ। सुंदरलाल रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस एक्शन के दौरान बड़े पैमाने पर कत्लो गारत हुई। लेकिन पटेल ने इस रिपोर्ट को दबा दिया और हैदराबाद को इंडिया का हिस्सा बना लिया। एक और रियासत
Speaker A
भी थी कश्मीर। लेकिन यहां कहानी उल्टी थी। राजा हिंदू था लेकिन प्रजा की अक्सरियत मुसलमानों की। इस बारे में पटेल की सोच भी जरा मुख्तलिफ थी। वो पाकिस्तान के साथ डील करना चाहते थे कि वो हैदराबाद छोड़ दें।
Speaker A
हम कश्मीर छोड़ देंगे। क्योंकि हैदराबाद इंडिया के बीचोंबीच था। वो कश्मीर से कहीं ज्यादा इंपॉर्टेंट था। लेकिन यहां दो मसले थे। एक यह कि नेहरू खुद कश्मीरी थे। उनका कहना था कि जब मेरा इलाका ही इंडिया में ना हो तो ऐसी आजादी का क्या फायदा? दूसरा
Speaker A
मसला जूनागढ़ ने पैदा किया। पाकिस्तान ने उसका एक्सेशन मान लिया था जिस पर पटेल का रवैया भी तब्दील हो गया। उन्होंने कहा कि अगर जिना जूनागढ़ ले सकते हैं तो मैं कश्मीर क्यों नहीं ले सकता? और फिर वही थे
Speaker A
जिन्होंने कश्मीर के महाराजा हर सिंह से एक्सेशन के डॉक्यूमेंट पर साइन करवाया और इंडियन फौज को हवाई जहाजों के जरिए श्रीनगर भेजा। वह कश्मीर के मामले को अकवामे मुत्तहदा में ले जाने के भी खिलाफ थे। लेकिन नेहरू ने ऐसा कर दिया और नतीजा
Speaker A
यह निकला कि कश्मीर एक कंट्रोवर्शियल इलाका बन गया और आज तक है। बहरहाल 1950 तक सिर्फ 3 साल में पटेल ने अपना सारा काम मुकम्मल कर लिया। नेहरू और गांधी जी अपने आदर्शों के साथ महफूज़ रहे और सारा डर्टी
Speaker A
वर्क पटेल [संगीत] ने किया। उन्होंने साबित कर दिया एक मुल्क बनाने के लिए सिर्फ आदर्श यानी आइडियल काफी नहीं होते। बेरहमी [संगीत] भी दिखानी पड़ती है। बिल्कुल वैसे ही जब घी सीधी उंगली से ना निकले तो उसे टेढ़ा
Speaker A
करना पड़ता है। पटेल ने एक बिखरे हुए इंडिया को जोड़ दिया। प्यार से नहीं धमकियों से, फौज से, चालों से, उनकी कोशिशों से पाकिस्तान तो बन गया लेकिन इंडिया बच गया। आजादी के सिर्फ 3 साल बाद अपना काम
Speaker A
मुकम्मल होते ही 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का इंतकाल हो गया। एक [संगीत] किसान का बेटा जिसने एक सल्तनत तोड़ी, एक मुल्क बनाया जिसने पाकिस्तान बनाने पर मोहर लगाई और इंडिया [संगीत] को अपने आयरन हैंड से वेल्ड किया। अगर पटेल
Speaker A
ना होते तो शायद कांग्रेस और [संगीत] लीग एक कमजोर फेडरेशन पर समझौता कर लेते। शायद कायदे आजम को ऐसा पाकिस्तान मिलता जो नाम का पाकिस्तान होता। लेकिन दिल्ली के कंट्रोल में रहता। लेकिन पटेल को कमजोर इंडिया बिल्कुल कबूल ना था। उन्होंने अपनी
Speaker A
रियलिस्टिक सोच का पूरी बेरहमी से इस्तेमाल किया। उन्होंने दुश्मन को वो चीज दे दी जिसके लिए वह लड़ रहा था। लेकिन खुद वो हासिल कर लिया जिसके लिए वो कोशिश कर रहे थे। यानी एक मजबूत इंडिया। आज 75 साल
Speaker A
बाद इंडिया की पॉलिटिक्स पर पटेल का साया नेहरू से भी बड़ा हो चुका है। इसीलिए हमें आज भारत में दुनिया का सबसे बड़ा स्टैचू गांधी जी का नहीं, नेहरू का नहीं बल्कि [संगीत] पटेल का नजर आता है। यह इस बात का
Speaker A
ऐलान है कि इंडिया पटेल की पॉलिसी पर चलेगा। बीजेपी गवर्नमेंट उन्हीं को अपना आइडियल मानती है। उनका सख्त मिजाज, मुसलमानों के बारे में उनका रवैया और नेशनलिस्टिक सोच यह सब आज के नए इंडिया की सियासत है। नेहरू का सेकुलरिज्म कमजोर हो
Speaker A
चुका है। बल्कि अपनी आखिरी सांसे ले रहा है। जबकि पटेल का नेशनलिज्म अपनी पीक पर है। तो क्या इससे यह साबित होता है कि पटेल ने ठीक किया? इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं। पटेल ने इंडिया को बिखरने से
Speaker A
बचाया। 565 रियासतों को जोड़कर एक मुल्क बनाया। यह एक बड़ा कारनामा है। लेकिन इस इत्तेहाद की कीमत पार्टीशन थी। इसकी कीमत वो लाखों जाने थी जो पार्टीशन के मौके पर दंगों में जाया हुई। उसकी कीमत वो दुश्मनी है जो आज भी दो न्यूक्लियर ताकतों के
Speaker A
दरमियान दीवार बनकर खड़ी है। आज जब हम दोनों मुल्कों के बीच सरहदों पर कांटेदार तारों और दिलों में नफरतें देखते हैं तो सवाल उठता है कि क्या पटेल की सोच कामयाब हुई [संगीत] या उसने एक बहुत बड़े चैलेंज
Speaker A
को जन्म दे दिया है। ऐसा चैलेंज जो दोनों मुल्कों के वजूद के लिए भी खतरा है। [संगीत]
Topics:सरदार वल्लभ भाई पटेलस्टैचू ऑफ यूनिटीभारत का एकीकरणपाकिस्तान का निर्माणगांधी और नेहरूमुस्लिम लीगमौलाना आजादइंट्रम गवर्नमेंटमाउंटबेटनहिंदू मुस्लिम तकरार











