मुसलमानों के पतन के 500 सालों की कहानी, जो इल्म, नेतृत्व और सामाजिक कारणों से जुड़ी है।
Key Takeaways
- मुस्लिम दुनिया का पतन मुख्यतः इल्म से दूरी और नेतृत्व की कमी के कारण हुआ।
- सामाजिक और राजनीतिक तंगी ने नवाचारों को रोक दिया।
- यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति के समय मुस्लिम समाज पिछड़ गया।
- मुस्लिम समाज को अपनी गलतियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में काम करना होगा।
- पुनरुत्थान संभव है यदि नई सोच और नेतृत्व को अपनाया जाए।
What the video covers
- मुस्लिम सभ्यता का स्वर्ण युग और उसके बाद 500 वर्षों का पतन।
- हिंदुस्तान की गुलामी और संसाधनों की लूट।
- मगरिब में इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन के दौरान मुस्लिम दुनिया की पिछड़ती स्थिति।
- इल्म और नई सोच से दूरी, विशेषकर बैतुल हिकमत का पतन।
- मुस्लिम वैज्ञानिकों और विद्वानों जैसे अल-ख्वारिज़मी, जाबिर बिन हयान, इब्ने सीना की उपलब्धियां।
- सियासी नेतृत्व की कमजोरी और बादशाहों की तानाशाही।
- फिरकावाद और तंग नजरिए ने नवाचारों को रोका।
- मुगल और उस्मानी सल्तनतों में आर्थिक कमजोरियां और प्रशासनिक भ्रष्टाचार।
- यूरोप की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के मुकाबले मुस्लिम दुनिया की गिरावट।
- आज के मुस्लिम समाज में पुनरुत्थान की संभावनाएं और चुनौतियां।
Chapters
- 00:00हिंदुस्तान की गुलामी और संसाधनों की लूट
- 01:50मगरिब में वैज्ञानिक क्रांति और मुस्लिम दुनिया की पिछड़ती स्थिति
- 05:26इल्म से दूरी और बैतुल हिकमत का पतन
- 07:30मुस्लिम वैज्ञानिकों की उपलब्धियां और उनका महत्व
- 08:52सियासी नेतृत्व की कमजोरी और तानाशाही
- 10:35फिरकावाद और तंग नजरिए के प्रभाव
- 11:51आर्थिक कमजोरियां और प्रशासनिक भ्रष्टाचार
- 19:51मुस्लिम समाज में पुनरुत्थान की संभावनाएं
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Speaker A
हिंदुस्तान जो सोनी की चिड़िया थी, पिंजरे में ही जिबा कर दी। गोरों ने यहां सिर्फ हुकूमत नहीं की। उन्होंने हिंदुस्तान को लूटा। बेदर्दी से लूटा। यहां की दौलत, खजाने, बहरी जहाजों में भर-भर कर लंदन भेज दिए गए। जरा सोचें।
Speaker A
जब ये गुलामी का दौर चल रहा था। यानी 19वीं और 20वीं सदी तो मगरिब में क्या हो रहा है? वहां इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन आ रहा था। स्टीम इंजन बन रहा था। रेलगाड़ियां शुरू हो चुकी थी। टेलीग्राफ आ रहा था। नए-नए नजरियात आ रहे डार्विन का
Speaker A
जब ये गुलामी का दौर चल रहा था, यानी 19वीं और 20वीं सदी, तो मगरिब में क्या हो रहा है? वहां इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन आ रहा था। स्टीम इंजन बन रहा था। रेलगाड़ियां शुरू हो चुकी थीं। टेलीग्राफ आ रहा था। नए-नए नजरियात आ रहे थे, डार्विन का।
Speaker A
लाउडस्कर पर आज अजान जायज है या नहीं? या तस्वीर बनाना हराम है या हलाल? कि मैं थंज नहीं कर रहा। मजाक उड़ाने की खातिर नहीं कह रहा। उस हकीकत से पर्दा उठा रहा हूं जिसे हम देखना नहीं चाहते।
Speaker A
नजरिया, इत्तका, मैक्सवेल की इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म, आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी दुनिया को हैरान कर रही थी। नई-नई इजादात हो रही थीं। ये सब कहां हो रहा था? मगरिब में। और हम उस वक्त क्या कर रहे थे? हम इस बहस में उलझे हुए थे कि।
Speaker A
मैं बताता हूं कहां है कहीं भी नहीं वो हर दौड़ में हर मैदान में सबसे पीछे सबसे आखिर लेकिन क्यों? यह कैसे हुआ? कौन है इसका जिम्मेदार? क्या कोई बैरूनी साजिश या हम खुद ही जिम्मेदार?
Speaker A
लाउडस्पीकर पर आज अजान जायज है या नहीं? या तस्वीर बनाना हराम है या हलाल? कि मैं थंज नहीं कर रहा। मजाक उड़ाने की खातिर नहीं कह रहा। उस हकीकत से पर्दा उठा रहा हूं जिसे हम देखना नहीं चाहते।
Speaker A
से तो हमने वाकई कुछ नहीं किया। कोई इज, कोई दरियाफ्त, कोई निजाम जिसने दुनिया की तकदीर बदली जिस पर इंसानियत को फक्र हो। कुछ भी तो नहीं दिया हमने। देखिए बिजली किसने बनाई हमने? नहीं। टेलीफोन, रेडियो और टीवी के बाद कंप्यूटर, इंटरनेट और
Speaker A
एक सवाल, एक ऐसा सवाल जो हर मुसलमान के दिल में है कि वो कौम, वो उम्मत जो कभी दुनिया की उस्ताद थी, जिसके इल्म की, जिसकी तहजीब, जिसकी ताकत का डंका बजता था, आज कहां है? आज कहां है?
Speaker A
का जवाब ढूंढे कि हमारी गलती कहां थी और कहां हमारे खिलाफ साजिश हुई। आज हम आईना देखेंगे ये आसान नहीं होगा लेकिन देखना बहुत जरूरी है और आखिर में जानेंगे कि क्या मुसलमान दोबारा वो उूज हासिल कर भी
Speaker A
मैं बताता हूं कहां है। कहीं भी नहीं। वो हर दौड़ में, हर मैदान में सबसे पीछे, सबसे आखिर। लेकिन क्यों? यह कैसे हुआ? कौन है इसका जिम्मेदार? क्या कोई बैरूनी साजिश या हम खुद ही जिम्मेदार?
Speaker A
से कि आज लोग न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस, टोक्यो, बीजिंग, शघाई का नाम लेते हैं। वो शहर जहां टेक्नोलॉजी बनती है। साइंस पर काम होता है। फैशन और कल्चर सेट होता है। मगर आज से 100010 साल पहले यह सब कुछ
Speaker A
वो किसी ने कहा था ना कि हमें 1000 साल से तारीख के दस्तरखान पर हरामखोरी के सिवा कुछ नहीं। बात बहुत कड़वी है, सख्त है। लेकिन सच बताऊं तो यही है। तो यही, यही है। दुनिया के स्टेज पर हजार नहीं तो 500 साल।
Speaker A
लाइब्रेरी जहां हर जुबान की किताबें होती थी। अरबी, फारसी, यूनानी, संस्कृत और हर जुबान की किताबों के तर्जुमे होते थे। नए-नए आइडियाज जन्म लेते थे। मोहम्मद बिन मूसा अल खजमी भी यही थे। वो जीनियस जिन्होंने अलजेब्रा की बुनियादें रखी। वही
Speaker A
से तो हमने वाकई कुछ नहीं किया। कोई इजाद, कोई दरियाफ्त, कोई निजाम जिसने दुनिया की तकदीर बदली, जिस पर इंसानियत को फक्र हो। कुछ भी तो नहीं दिया हमने। देखिए बिजली किसने बनाई? हमने? नहीं। टेलीफोन, रेडियो और टीवी के बाद कंप्यूटर, इंटरनेट और।
Speaker A
फील्ड नहीं छोड़ी इस बंदे ने। यह बगदाद की ऑब्जरवेटरीज थी कि जहां मुसलमान साइंसदान रातों को जागकर सितारों की चाले पढ़ा करते थे। समझते थे कि जमीन कितनी बड़ी है। दुनिया के नक्शे बनाते थे और सिर्फ इल्म नहीं टेक्नोलॉजी भी थी। पानी की नहरों का
Speaker A
स्मार्टफोन, यह भी हमारा काम है? चांद पर कौन पहुंचा? मरीज पर कौन जा रहा है? हम, हम तो अभी तक ईद का चांद देखने पर भी लड़ रहे हैं। आखिर ऐसा सवाल क्यों आया? यह है मिलियन डॉलर का सवाल। और आज हम इसी सवाल।
Speaker A
फिल्में देखी होंगी। यह भी उस जमाने के बगदाद ही की कहानियां है और बगदाद अकेला नहीं था। स्पेन में करतबा का शहर था जो यूरोप में इल्म का मीनार था। अफ्रीका में कायरा जैसा शहर और वहां की जामे अल असर
Speaker A
का जवाब ढूंढेंगे कि हमारी गलती कहां थी और कहां हमारे खिलाफ साजिश हुई। आज हम आईना देखेंगे। ये आसान नहीं होगा, लेकिन देखना बहुत जरूरी है। और आखिर में जानेंगे कि क्या मुसलमान दोबारा वो उज़ हासिल कर भी।
Speaker A
मगर कैसे? यह एक ऐसी कहानी है जिस पर ठंडे दिल से गौर करना होगा, दिल से सुनना होगा, समझना होगा और यह बात ज़हन में रखना होगी कि ये ज़वाल यूरोप के हमले से कहीं पहले शुरू हो चुका था। बहुत पहले। ज़वाल की असल
Speaker A
पाएंगे या नहीं। तो आइए चलते हैं, इन सवालों का जवाब ढूंढते हैं। 1 मिनट, 1 मिनट। हर सवाल और उसके जवाब से पहले यह देखना जरूरी है कि हम आखिर थे क्या? ताकि अंदाजा हो कि हम कितनी ऊंचाई।
Speaker A
पूछूंगा अहम शख्सियात से वो सवालात जिनके जवाबात आप जानना चाहते हैं। तो इंकलाब वॉइस को जरूर सब्सक्राइब कीजिए। [संगीत] पहली वजह सबसे पहला और शायद सबसे बड़ा कैंसर था इल्म से दूरी। खासतौर पर नए इल्म नई सोच से दूरी। वो जो बैतुल हिकमत था
Speaker A
से कि आज लोग न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस, टोक्यो, बीजिंग, शंघाई का नाम लेते हैं। वो शहर जहां टेक्नोलॉजी बनती है। साइंस पर काम होता है। फैशन और कल्चर सेट होता है। मगर आज से 1000-10 साल पहले यह सब कुछ।
Speaker A
फितना उठा खल्लक कुरान का तो बात इतनी बढ़ गई कि जो इस नजरिए को नहीं मानता हुकूमत उसे कोड़े लगाती। जेल में बंद कर देती। क्यों? क्योंकि बादशाह बादशाह होता है। जो उसने कह दिया लोग उसी की बात को माने।
Speaker A
जानते हैं कहां था? बगदाद। अब्बासी खिलाफत का दार हुकूमत बगदाद। जिसे कहा जाता था मदीनात सलाम यानी सिटी ऑफ पीस। यहां क्या नहीं था? शहर के मरकज में था बैतुल हिकमत यानी हाउस ऑफ विजडम। दुनिया की सबसे बड़ी।
Speaker A
बल्कि फिक्र तक महदूद रह गया। वहां सिर्फ बाल की खाल उतारने का काम होने लगा और दुनियावी उलूम को गलत समझा जाने लगा। मेडिसिन, इंजीनियरिंग, एस्ट्रोनॉमी को काफिरों का काम समझा जाने लगा। इस सोच का नतीजा यही निकलना था कि हम दुनिया में
Speaker A
लाइब्रेरी जहां हर जुबान की किताबें होती थीं। अरबी, फारसी, यूनानी, संस्कृत और हर जुबान की किताबों के तर्जुमे होते थे। नए-नए आइडियाज जन्म लेते थे। मोहम्मद बिन मूसा अल-ख्वारिज़मी भी वहीं थे। वो जीनियस जिन्होंने अलजेब्रा की बुनियादें रखी। वही।
Speaker A
पाया। पहले एक सेंट्रल गवर्नमेंट थी अब्बासियों की। आहिस्ता-आहिस्ता इसका इन्फ्लुएंस कम होता गया। यहां तक के वो सिर्फ बगदाद तक महदूद रह गई। ये सब ठीक उस जमाने में हो रहा था जब यूरोप जाग रहा था। वहां एक साइंसी इंकलाब आ रहा था।
Speaker A
अलजेब्रा जो आज पूरी दुनिया पढ़ती है। जाबिर बिन हयान, फादर ऑफ केमिस्ट्री भी, इब्ने सीना जैसा हकीम भी जिसकी किताब अल-कानून सदियों तक यूरोप में मेडिकल यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई जाती थी। अबू रिहान अल-बैरूनी जैसा ऑलराउंडर, मैथमेटिक्स, फलकिया, तारीख, जغرافिया कोई।
Speaker A
सल्तनतें चाहे वो उस्मानी हो सफी या मुगल। इनमें कुछ अजीम हुक्मरान आए और फिर उनके बाद दौर आया ना अहल अ्याश बादशाह। मुगल दौर में औरंगजेब के बाद और उस्मानियों में आखिरी दौर देखें तो वहां बात महलाती साजिशों से बढ़ते-बढ़ते बगावतों तक पहुंच
Speaker A
फील्ड नहीं छोड़ी इस बंदे ने। यह बगदाद की ऑब्जरवेटरीज थीं, जहां मुसलमान साइंसदान रातों को जागकर सितारों की चालें पढ़ा करते थे। समझते थे कि जमीन कितनी बड़ी है। दुनिया के नक्शे बनाते थे और सिर्फ इल्म नहीं, टेक्नोलॉजी भी थी। पानी की नहरों का।
Speaker A
कोई जवाल को रोकने वाला नहीं था। वजह थी ना अहल कयादत। तीसरी और अहम वजह जिस पर हम बहुत ज्यादा गौर नहीं करते या फिर इसे प्रोपगेंडा समझते हैं वो है तंग नजरी और फिरकाारी। इस्लामी तहजीब के उरूज की बुनियादी वजह थी
Speaker A
निजाम, मुफ्त अस्पताल, कागज बनाने की इंडस्ट्री, मैकेनिकल वॉचेस, बल्कि फैशन, आर्ट, कल्चर सब कुछ बगदाद में था। दुनिया भर के ताजर, सफीर, तालबल सब बगदाद आना चाहते थे। क्योंकि यह वाकई सेंटर ऑफ द वर्ल्ड था। आपने हॉलीवुड में अलादीन और सिबाद जैसी।
Speaker A
तब्दीली को खतरा समझा जाता था। जिसने भी कोई इनोवेशन की बात की उसे रिजेक्ट कर दिया गया। जैसे मुगल बादशाह अकबर ने हिंदुस्तान में प्रिंटिंग प्रेस नहीं लगने दिया। क्यों? क्योंकि उस जमाने में प्रेस में छपी हुई किताबें इतनी खूबसूरत नहीं
Speaker A
फिल्में देखी होंगी। यह भी उस जमाने के बगदाद ही की कहानियां हैं। और बगदाद अकेला नहीं था। स्पेन में करतबा का शहर था जो यूरोप में इल्म का मीनार था। अफ्रीका में कायरा जैसा शहर और वहां की जामे अल असर।
Speaker A
खैर तो मौजू की तरफ दोबारा आते हैं। अगली अहम वजह थी मुआशी कमजोरियां और बदइंतजामी। बजाहिर तो मुसलमानों के पास दौलत थी। खुसूसन हुक्मरान तबके के पास तो बहुत थी लेकिन मशत इतनी मजबूत ना थी जितनी समझी जा
Speaker A
वस्तेशिया में समरकंद, बुखारा और निशापुर जैसे शहर यह रिसर्च, इनोवेशन और साइंस के मराकिज थे। मुसलमान एक सुपर पावर थे। लेकिन हमने वो रास्ता छोड़ दिया। वो रोशनी आहिस्ता-आहिस्ता धीमी पड़ गई और ज़वाल का अंधेरा हर तरफ छा गया।
Speaker A
ढूंढ लिया गया था। यानी अब यूरोप को दुनिया से तजारत के लिए मुसलमानों के इलाके से गुजरने की जरूरत ही नहीं थी। शारा रेशम की अहमियत कम होती चली गई। जमीनी नहीं समुद्री रास्तों की अहमियत बढ़ गई और यहां समंदरों में यूरोप का राज था।
Speaker A
मगर कैसे? यह एक ऐसी कहानी है जिस पर ठंडे दिल से गौर करना होगा, दिल से सुनना होगा, समझना होगा और यह बात ज़हन में रखना होगी कि ये ज़वाल यूरोप के हमले से कहीं पहले शुरू हो चुका था। बहुत पहले। ज़वाल की असल।
Speaker A
थी जिसने बगावतों को जन्म दिया। और आखिरी और एक बहुत अहम वजह वो थी मिलिट्री टेक्नोलॉजी में पीछे रह जाना। देखिए उस्मानियों ने आधा यूरोप फतह किया। कैसे? अपने तोपखाने की मदद से। मुगल कैसे हिंदुस्तान पर बा आसानी काबिज हो गए। अपनी
Speaker A
वजहात हमारे अंदर पहले से मौजूद थी। जिसकी वजह से एक अजीम तहजीब खत्म हो गई। आए एक-एक करके जानते हैं कि वो वजहात क्या थी। इंतजार खत्म होने वाला है। तहलकाज़ इंटरव्यूज के साथ वापस आ रहा हूं। जिसमें।
Speaker A
उन्हीं पुरानी तोपों और तलवारों के साथ थे। उन्हें एहसास ही नहीं था कि अब जमाना बदल चुका है। नतीजा ये निकला कि 18वीं और 19वीं सदी में जब मुसलमानों का यूरोप से टकराव हुआ तो ज्यादातर हमने शिकस्त दिखाई।
Speaker A
पूछूंगा अहम शख्सियत से वो सवालात जिनके जवाबात आप जानना चाहते हैं। तो इंकलाब वॉइस को जरूर सब्सक्राइब कीजिए। [संगीत] पहली वजह, सबसे पहला और शायद सबसे बड़ा कैंसर था इल्म से दूरी। खासतौर पर नए इल्म, नई सोच से दूरी। वो जो बैतुल हिकमत था।
Speaker A
रख दिया। जब घर के अंदर से कमजोरी हो, जब रखवाले आपस में लड़ रहे हो या गफलत की नींद सो रहे हो तो बाहर के लुटेरे और डाकू कब तक इंतजार करें? मुस्लिम दुनिया अंदर की बीमारियों की वजह से खत्म हो चुकी थी और
Speaker A
जहां हर जुबान से इल्म आ रहा था। जहां हर नए ख्याल को अप्रिशिएट किया जाता था। जहां क्रिटिकल थिंकिंग की हौसला अफजाई होती थी। वहां अंधी तकलीद का दौर शुरू हो गया। मिसाल ले लें जब मामून रशीद के दौर में एक।
Speaker A
जब वास्कोडि गामा जैसे एक्सप्लोरर नए समुंदरी रास्ते ढूंढने निकले थे। लेकिन असल कयामत टूटी 17वीं, 18वीं और खासकर 19वीं सदी में। एक ऐसा डार्क पीरियड शुरू हुआ जिसने मुसलमान दुनिया की रूह तक को जख्मी कर दिया। यह दौर था बराहेरास्त
Speaker A
फितना उठा खल्लक कुरान का तो बात इतनी बढ़ गई कि जो इस नजरिए को नहीं मानता, हुकूमत उसे कोड़े लगाती। जेल में बंद कर देती। क्यों? क्योंकि बादशाह बादशाह होता है। जो उसने कह दिया लोग उसी की बात को माने।
Speaker A
1764 में बक्सर की जंग हुई और शिमाली हिंदुस्तान पर गोरों का कंट्रोल हो गया। फिर 1799 में टीपू सुल्तान की शहादत के साथ मैसूर पर भी कब्जा हो गया। मुज़ाहमत का आखिरी चिराग भी बुझ गया और मुसलमानों ने
Speaker A
सवाल उठाने की मुखालफत होने लगी। तो इसके बाद उलमा भी सख्त हो गए। फलसफे और अक्ल को मशकूक नजरों से देखा जाने लगा और फिर नतीजा यह निकला कि साइंस और मैथमेटिक्स पर तवज्जो कम हुई। मदरसों का करिकुलम बस मजहब।
Speaker A
लूटा। यहां की दौलत, खजाने, बहरी जहाजों में भर-भर कर लंदन भेज दिए गए। एक अंदाजे के मुताबिक बर्तानिया ने हिंदुस्तान पर राज करते हुए आज के लिहाज से खरबों डॉलर की दौलत लूटी। यही नहीं यहां की सनदें बर्बाद कर दी गई। खासकर कपड़े की सनद ताकि
Speaker A
बल्कि फिक्र तक महदूद रह गया। वहां सिर्फ बाल की खाल उतारने का काम होने लगा और दुनियावी उलूम को गलत समझा जाने लगा। मेडिसिन, इंजीनियरिंग, एस्ट्रोनॉमी को काफिरों का काम समझा जाने लगा। इस सोच का नतीजा यही निकलना था कि हम दुनिया में।
Speaker A
किया। भाई जो किया अपने लिए किया ना? रेलवे लाइन बिछाई तो अपने लिए, नहरी निजाम बनाया तो अपने लिए ताकि ज्यादा से ज्यादा यहां के वसाइल को लूट सके। अगर वो खैरह होते तो किसानों पर इतना टैक्स लगाते?
Speaker A
पीछे रहते गए। जब आप अपने नए ख्याल को रोकेंगे, नए आइडियाज का गला घोटेंगे, सवाल करने से डरेंगे, तो जाहिर है यही होगा। तो इल्मी ज़वाल के बाद सियासी ज़वाल भी शुरू हो गया और ऐसा शुरू हुआ कि कोई इसको रोक नहीं।
Speaker A
पहुंचे डच यानी हॉलैंड वाले। उनकी डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंडोनेशिया के जजीनों पर कब्जा जमा लिया। किस लिए? मसालों के लिए। लौंग, काली मिर्च, जायफल, दारचीनी। यह मसाले यूरोप में सोने के भाव बिकते थे। और इसके लिए उन्होंने मकामी आबादी पर जुल्मो
Speaker A
पाया। पहले एक सेंट्रल गवर्नमेंट थी अब्बासियों की। आहिस्ता-आहिस्ता इसका इन्फ्लुएंस कम होता गया। यहां तक कि वो सिर्फ बगदाद तक महदूद रह गई। ये सब ठीक उस जमाने में हो रहा था जब यूरोप जाग रहा था। वहां एक साइंसी इंकलाब आ रहा था।
Speaker A
ही और खेला गया। उस्मानी सल्तनत पहली जंग अजीम में जर्मनी का साथ देकर हारी तो यह गिद्ध उसकी लाश पर टूट पड़ी। जंग के दौरान ही बर्तनानिया और फ्रांस ने आपस में एक खुफिया मुयदा किया। साइकस पीको एग्रीमेंट
Speaker A
कॉपरनिकस, गैलिलियो, न्यूटन कायनात के नए-नए राजों से पर्दा उठा रहे थे। और हम क्या कर रहे थे? माजी की बातें या फिरकावाराना बहस। अब आती है दूसरी वजह और बहुत अहम वजह थी सियासी इंतशार और ना अहल कयादत। मुस्लिम।
Speaker A
अरबों को उस्मानियों के खिलाफ बगावत पर उकसा रहा था। उनसे आजादी का वादा कर रहा था। लेकिन जंग के बाद अरबों की पीठ में खंजर खोपा गया। और यही नहीं बर्तानिया ने एक वादा यहूदियों से भी किया था। बेल फॉर
Speaker A
सल्तनतें चाहे वो उस्मानी हो, सफी या मुगल। इनमें कुछ अजीम हुक्मरान आए और फिर उनके बाद दौर आया ना अहल अयाश बादशाह। मुगल दौर में औरंगजेब के बाद और उस्मानियों में आखिरी दौर देखें तो वहां बात महलाती साजिशों से बढ़ते-बढ़ते बगावतों तक पहुंच।
Speaker A
मिडिल ईस्ट में तेल दरियाफ्त हुआ तो इन इलाकों पर बहाने बहाने से मुदाखलत करते रहे। चाहे इराक में होने वाली दो जंगे हो या ईरान का खौफ दिलाकर अरब मुल्कों में फौजी अड्डे बनाना हो। मिस्र से आगे शिमाली
Speaker A
गई थी। बादशाह कमजोर हो गए तो जिस सूबे में जिसका जोर चलता, अलग हुकूमत बना लेता। पहले अब्बासियों के टुकड़े हुए। फिर एक-एक करके हर सल्तनत के यहां तक कि आखिरी बड़ी सल्तनतों, उस्मानी, सफी और मुगलों के भी।
Speaker A
इटली के कब्जे में मिस्र अमलन बर्तनानिया के पास। यह हाल था मुस्लिम दुनिया का। गुलामी तो गुलामी ही होती है। लेकिन जो फ्रांस ने किया उसकी मिसाल बहुत कम मिलती है। उसने अपने कब्जे में मौजूद हर इलाके की जुबान, सकाफत और शनाख्त को भी मिटाने
Speaker A
कोई ज़वाल को रोकने वाला नहीं था। वजह थी ना अहल कयादत। तीसरी और अहम वजह जिस पर हम बहुत ज्यादा गौर नहीं करते या फिर इसे प्रोपगेंडा समझते हैं वो है तंग नज़री और फिरक़ारी। इस्लामी तहजीब के उरूज की बुनियादी वजह थी।
Speaker A
फ्रांस, इटली, हॉलैंड वगैरह तो एक तरफ उधर रूस भी मुस्लिम दुनिया पर चढ़ दौड़ा। 19वीं सदी में रूस ने वस्ती एशिया की मुख्तलिफ रियासतों पर कब्जा कर लिया जिनमें बुखारा, खेवा, हॉक वगैरह शामिल थी। और फिर दागिस्तान पर भी कब्जा जमा लिया
Speaker A
इसकी रवादारी। यानी इख्तलाफात को बर्दाश्त करना। लेकिन वक्त के साथ-साथ ये रिवायत मुकम्मल तौर पर खत्म हो गई। फिरक़ायत की आग तो ऐसी भड़की कि उस्मानियों और सफियों के बीच जंग लंबे अरसे तक चली। वजह शिया-सुन्नी इख़्तिलाफ। उस दौर में हर नई सोच और।
Speaker A
को नोच लिया गया। ये है वो तारीख जो शर्मनाक भी है और इबरतनाक भी। ये वो जमाना था जब मुस्लिम दुनिया का शायद ही कोई इलाका हो जो किसी यूरोपी ताकत के कब्जे में ना हो या उनके इन्फ्लुएंस में ना हो।
Speaker A
तबदीली को खतरा समझा जाता था। जिसने भी कोई इनोवेशन की बात की उसे रिजेक्ट कर दिया गया। जैसे मुगल बादशाह अकबर ने हिंदुस्तान में प्रिंटिंग प्रेस नहीं लगने दिया। क्यों? क्योंकि उस जमाने में प्रेस में छपी हुई किताबें इतनी खूबसूरत नहीं।
Speaker A
हाल अफगानिस्तान का भी था जिसकी सरहद तक अंग्रेजों ने सेट की। यानी मिडिल ईस्ट से फार ईस्ट तक और शिमाली अफ्रीका से वस्ती एशिया तक हर तरफ मुसलमान गुलाबी की जंजीरों में जकड़े हुए थे। मगरिब ने सिर्फ हमारी जमीन हमारे वसाइल को
Speaker A
होती थीं। फिर अकबर समझता था कि अगर प्रेस लगा दिया गया तो उसके कातिल बेरोजगार हो जाएं। ये था जिद्दत से डर। बिल्कुल वैसे ही जैसा आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से डर रहे हैं कि ये हमारी नौकरियां खा जाएगी।
Speaker A
तक तनाजे की वजह है। सबसे बढ़कर उन्होंने हमारा तालीमी निजाम तबाह किया। अपनी जबान को सरकारी जबान बनाया, इल्मी जबान बनाई। मकसद था ऐसा पढ़ा लिखा तबका पैदा करना जो देखने में तो हिंदुस्तानी या अरब हो लेकिन जहनी तौर पर मगरिब का गुलाम। लॉर्ड मैकाले
Speaker A
खैर तो मौजू की तरफ दोबारा आते हैं। अगली अहम वजह थी मुआशी कमजोरियां और बदइंतजामी। बजाहिर तो मुसलमानों के पास दौलत थी। खासतौर पर हुक्मरान तबके के पास तो बहुत थी लेकिन मशत इतनी मजबूत न थी जितनी समझी जा।
Speaker A
अक्ल में अंग्रेज। यह था वह सबसे खतरनाक काम जो उन्होंने किया जिसके असरात हम आज भी मुसलमानों के अंदर देखते हैं। इस गुलामी ने हमारी नफसियात पर जो गहरे जख्म लगाए उसकी पेशगोई तो सदियों पहले ही एक अजीम मुस्लिम मुफकिर कर चुका था। आज से
Speaker A
रही थी या जितनी होनी चाहिए थी। यूरोप उस जमाने में तजारत के नए-नए रास्ते ढूंढ रहा था। उसने अमेरिका दरियाफ्त कर लिया था। एक मुकम्मल तौर पर नई सरजमीं। फिर अफ्रीका के गिर्द घूमकर हिंदुस्तान का नया रास्ता भी।
Speaker A
है। एक वक्त आता है कि महकूम सिर्फ रोटी के लुक्मे और जिनसी जिबिल्लत के लिए जिंदा रहता है। क्या ये हज हमारे मुहाशों की तस्वीर नहीं है? तो जनाब ये थी ये थी गुलामी की लंबी तारीख रात जिसने हमारी
Speaker A
ढूंढ लिया गया था। यानी अब यूरोप को दुनिया से तजारत के लिए मुसलमानों के इलाके से गुजरने की जरूरत ही नहीं थी। शारा रेशम की अहमियत कम होती चली गई। जमीनी नहीं, समुद्री रास्तों की अहमियत बढ़ गई और यहां समंदरों में यूरोप का राज था।
Speaker A
बार-बार यह एहसास दिलाया जाए कि तुम कमतर हो, तुम जाहिल हो, तुम पसमांदा हो और तुम्हारे आका बरतर है, मुजब है, इल्म वाले हैं। तो आहिस्ताआहिस्ता वो कौम खुद भी इस झूठ पर यकीन करने लगती है। उसके अंदर से
Speaker A
इससे मुस्लिम दुनिया में मईत कमजोर होती चली गई और जो कमी रह गई थी।
Speaker A
अंदर भर गया। हमारे ज़हनों में यह बात बैठ गई कि मगरब हमसे हर लिहाज बेहतर है। उनकी जुबान बेहतर, उनका लिबास बेहतर, उनका कल्चर बेहतर, उनका इल्म बेहतर। हमने अपनी हजार साला इल्मी और तहजीबी मीरास को भुला दिया और मगरब की अंधी तकलीद को ही तरक्की
Speaker A
समझ लिया। [संगीत] जरा सोचें जब ये गुलामी का दौर चल रहा था। यानी 19वीं और 20वीं सदी तो मगरब में क्या हो रहा था? वहां इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन आ रहा था। स्टीम इंजन बन रहा था। रेलगाड़ियां शुरू हो चुकी थी। टेलीग्राफ आ
Speaker A
रहा था। नए-नए नजरियात आ रहे थे। डार्विन का नजरिया इर्तका मैक्सवेल की इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म। आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी दुनिया को हैरान कर रही थी। नई-नई एजादात हो रही थी। बिजली का बल, टेलीफोन, रेडियो, हवाई जहाज, मोटर कार, कैमरा, फिर नए सियासी और सामाजी
Speaker A
नजरियात भी आ रहे जम्हूरियत, सोशलिज्म, कम्युनिज्म, फेमिनिज्म और पता नहीं क्या-क्या। यह सब कहां हो रहा था मगरब। और हम हम उस वक्त क्या कर रहे थे? हम इस बहस में उलझे हुए थे कि लाउडस्कर पर आजान जायज
Speaker A
है या नहीं। या तस्वीर बनाना हराम है या हलाल? ये मैं थंज नहीं कर रहा। मजाक उड़ाने की खातिर नहीं कह रहा। सिर्फ इस उस हकीकत से पर्दा उठा रहा हूं जिसे हम देखना नहीं चाहते। हमारी तालीम से दूरी की वजह
Speaker A
से हमें ना खुदा ही मिला ना विसा। हमने इल्म का मतलब ही महदूद कर दिया। सिर्फ दीनी उलूम और वो दीनी इल्म जिस पाहे का होता है उसका अंदाजा मुझे भी अच्छी तरह है और आपको भी अच्छी तरह। हमने साइंस,
Speaker A
टेक्नोलॉजी, मैथमेटिक्स, फलसफा इनको दुनियावी या गैर जरूरी समझकर नजरअंदाज किए रखा। नए सवाल उठाने छोड़ दिए गौर फिक्र करना छोड़ दिया। बस पुरानी बातों को दोहराना या दूसरों की तहकीक को नकल करना यही हमारा स्टाइल बन गया। रट्टा सिस्टम ने
Speaker A
ताबूत में आखिरी कील ठों। तो ये सब करने का नतीजा क्या निकला? फसल कटने का वक्त आया तो वह फसल किसने काटी? मगरब। साइंस में नोबेल इनाम किसे मिला? ज्यादातर मगरबी साइंसदानों को। आज तक साइंस में नोबेल प्राइज लेने वाले मुसलमान साइंसदान सिर्फ
Speaker A
तीन। जी हां, सिर्फ तीन। अहमदन जुबेल, अजीज, संजर, मुंशी बाबंदी और तीनों को यह एजाज पिछले 25 सालों में मिला है। इससे पहले कोई नहीं। आज दुनिया कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्टफोन, स्पेस टेक्नोलॉजी बल्कि इससे भी आगे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में पहुंच चुकी है। और हर नई
Speaker A
टेक्नोलॉजी मगरिब से आई और हम सिर्फ इस्तेमाल करने वाले यानी यूज़र्स बनकर रह गए। अपनी दुनिया आप पैदा करने वाले नहीं आज आप दुनिया की टॉप 50 बल्कि 100 बड़ी कंपनीज भी देख लें। Fords और Fortune की लिस्ट उठाकर देख लें। आपको Apple, Google,
Speaker A
Microsoft, Amazon, Facebook, Tesla जैसी अमेकी कंपनियां मिलेंगी। यूरोपी कंपनियां मिलेंगी, जापानी कोरियाई चीनी कंपनियां मिलेंगी बल्कि इंडिया की कंपनीज़ भी मिलेंगी। नहीं मिलेगी तो किसी मुसलमान मुल्क की कंपनी। हां, सऊदी अरामको का नाम आएगा लेकिन वो भी कुदरती वसाइल की वजह से।
Speaker A
वो भी ऐसे जिन्हें अमेरिका और मगरब की टेक्नोलॉजी की मदद से निकाला जाता है। आज दुनिया की ज्यादातर बड़ी कंपनीज नॉलेज बेस्ड इकॉनमी से ताल्लुक रखती हैं। जिस मैदान में हमारा कुछ नहीं। यह है हमारा असल जवाल। सिर्फ सियासी जवाल नहीं असरी
Speaker A
जवाल नहीं। इल्मी साइंसी और तखलीकी ज़वाल। ऐसा सवाल जिसने हमें दुनिया की दौड़ में बहुत पीछे धकेल दिया। यहां एक और सवाल उठता है। जब जापान और जर्मनी जैसी कौमें जो दूसरी जंग अजीम में मुकम्मल तौर पर तबाह हो गई थी। सिर्फ 30-40 साल में
Speaker A
दोबारा उठ गई। दुनिया की बड़ी इकोनॉमिक और इंडस्ट्रियल पावर्स बन गई। तो हम क्यों नहीं कर सकते? आखिर मुसलमान गुलामी की नफसियात से क्यों नहीं निकल पा रहे? अपनी तबाही से सबक सीख कर दोबारा क्यों खड़े नहीं हो पा रहे? यह सवाल आज हर कोई पूछ
Speaker A
रहा है। [संगीत] तो गुलामी की लंबी तारीख रात बिल आखिर खत्म हुई। 20वीं सदी के मिड तक ज्यादातर मुस्लिम मुल्क गुलामी से आजाद हो गए। इख्तदार हमारे अपने हाथों में आया। एक नई सुबह की उम्मीद जागी। एक नए ख्वाब का आगाज
Speaker A
हुआ। लेकिन आज इस आजादी को भी 7075 साल गुजर चुके हैं। इस दौरान दुनिया कहां से कहां पहुंच गई? चांद पर दोबारा जाने की बातें हो रही हैं। मार्स पर बस्तियां बनाने के मंसूबे बन रहे हैं। एआई हमारी
Speaker A
जिंदगी बदल रही है। बायोटेक्नोलॉजी में इंकलाब आ रहा है। और हम हम मुसलमान आज कहां खड़े हैं वहीं के वहीं या शायद इससे भी बदतर हालात। आइए जरा आज की मुस्लिम दुनिया पर नजर डालते हैं। आज तकरीबन 57
Speaker A
ऐसे मुालिक हैं जहां मुसलमान अक्सरियत में हैं। उनमें से कितने हैं जहां हकीकी मानों में जम्हूरियत है। जहां आवाम की राय का एहतराम किया जाता है। जहां आदाना और मुंसफाना इलेक्शंस होते हैं। जहां हुक्मरान आवाम को जवाबदेह हैं। जवाब
Speaker A
अफसोसनाक है। ज्यादातर मुल्कों में बादशाहत या आमरियत है। जहां नाम निहाद जम्हूरियत है भी वहां ऐसा कमजोर निजाम है जहां असल ताकत आवाम के पास नहीं कहीं और है। कई मुल्क सियासी तौर पर मुस्तहकम नहीं है। कहीं खाना जंगी है तो कहीं प्रॉक्सी
Speaker A
वॉर्स चल रही हैं। शाम हो या यमन, लीबिया हो या इराक, अफगानिस्तान हो या सूडान ये सब मुस्लिम मुल्क है। जहां मुसलमान ही मुसलमान को मार रहा है। किस लिए? इख्तेदार के लिए या किसी बैरूनी ताकत के मफाद के
Speaker A
लिए? हां, जहां दौलत है। जैसे खलीज के मुस्लिम मुल्क जहां चमक दमक है, ऊंची ऊंची इमारतें हैं। लग्जरी लाइफ है, वहां क्या यह दौलत सब तक पहुंच रही है? या सिर्फ शाही खानदान और उसके हवालियों के लिए वहां
Speaker A
के आम शहरी और वहां काम करने के लिए आने वाले गैर मुल्की मजदूरों का क्या हाल है?
Speaker A
बताने की जरूरत शायद नहीं है। ज्यादातर मुस्लिम दुनिया गुरबत और माशी बदहाली का शिकार है। दुनिया के गरीब तरीन मुल्कों की लिस्ट देखें। इनमें कई मुसलमान मुल्क हैं। सोमालिया, यमन, सूडान, अफगानिस्तान जहां भूख का राज है, पीने का साफ पानी तक मौजूद
Speaker A
नहीं। ये है करोड़ों मुसलमानों का मुकद्दर। और अब तो ऐसे ही लगता है कि इन मसाइल से निकलना मुमकिन ही नहीं। क्योंकि हमारी इंडस्ट्रीज आज भी बहुत पीछे हैं। हमारी एक्सपोर्ट ज्यादातर रॉ मटेरियल्स हैं। तेल, गैस वगैरह। हम टेक्नोलॉजी और
Speaker A
मशीनरी के लिए मगरब के मोहताज हैं या फिर चीन के। कई मुस्लिम मुल्क कर्जों के बोझ तले दबे हुए हैं। तालीम, साइंस और टेक्नोलॉजी में हम कहां खड़े हैं। यह तो आप जान ही चुके हैं। लेकिन लिटरेसी रेट भी
Speaker A
बताता है कि हमारे इस दलदल से निकलने के इमकानात बहुत कम है। साइंसी तहकीक पर हम खर्च नहीं करते। ओआईसी के मेंबर मुल्क औसतन अपनी जीडीपी का 05% साइंसी तहकीक पर लगाते हैं। जबकि इसराइल 49 और साउथ कोरिया 48% लगाता है। पेटेंट्स
Speaker A
रजिस्टर करवाने में पूरी मुस्लिम दुनिया मिलकर भी शायद इसराइल या साउथ कोरिया का मुकाबला ना कर सके। और दुनिया की टॉप 500 यूनिवर्सिटीज में हमारी कितनी है? शायद 10 भी मुश्किल से हो। और जो हैं उनके यहां रिसर्च का मयार क्या है? कुछ नहीं कह
Speaker A
सकते। और यह सब देखते हुए भी हम मुतहिद नहीं होते। सुन्नी, शिया, वहाबी, बरेलवी, देवबंदी हम कितने फिरकों और मसलकों में बटे हुए हैं। एक दूसरे को काफिर कहते हैं। एक दूसरे की मस्जिदों पर कब्जे करते हैं। एक दूसरे का खून बहाते हैं। क्या यही
Speaker A
इस्लाम? आज फिर वही अरब और अजम का झगड़ा है। कुर्द, बलोच, पश्तून का झगड़ा है। हम आज भी उन तासुबात से निकल नहीं पाए जिन्हें खत्म करने के लिए इस्लाम आया है। बेइंतहा पसंदी और दहशतगर्दी का कैंसर है।
Speaker A
जिसने मुस्लिम दुनिया को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जिसने इस्लाम का नाम बदनाम किया है और जिसके खिलाफ जंग में हम खुद भी संजीदा नजर नहीं आते। ये है आज की मुस्लिम दुनिया की तस्वीर। एक ऐसी दुनिया जो टूटफूट का शिकार है। सियासी तौर पर गैर
Speaker A
मुस्तहकम है। माशी तौर पर कमजोर है। इल्मी और साइंसी तौर पर पसमांदा है। और आलमी सतह पर उनकी बात में कोई वजन नहीं। बल्कि साफ अल्फाज़ में कहूं तो उनकी कोई इज्जत ही नहीं। हां, कुछ पॉजिटिव स्टोरीज भी हैं। कुछ
Speaker A
मुल्कों ने तरक्की की भी है। मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया। कुछ खलीजी रियासतें हैं। फिर नौजवान नस्ल में बेदारी भी आ गई। लेकिन मजमई तस्वीर अफसोसनाक हद तक मायूस। तो क्या हम यह मान ले कि हम पहले से भी बदतर मकाम पर हैं? क्या हमारा सूरज अब
Speaker A
हमेशा के लिए डूब चुका है? या अब भी कोई रास्ता बाकी है। तो मुसलमानों का यह सफर उूज की दास्तानों से लेकर सवाल की इंतहाओं तक। गुलामी की जंजीरों से लेकर आजादी के शराब तक और आज के अनगिनत चैलेंजेस तक यह सब सुनने के बाद
Speaker A
क्या जहन में आता है? मायूसी, नाउदी, गुस्सा ये सब जज्बात फितरी। लेकिन अगर हम सिर्फ मायूसी और माजी का रोना लेकर बैठ गए तो क्या कुछ बदलेगा? कुछ नहीं। यह वीडियो आपको सिर्फ अफसुरदा करने के लिए नहीं थी।
Speaker A
यह आपको सिर्फ तारीख का सबक याद दिलाने के लिए नहीं थी। बल्कि यह आपको झंझोड़ने के लिए थी। आपको आईना दिखाने के लिए थी। आपको सोचने पर मजबूर करने के लिए थी और शायद आपके अंदर कुछ कर गुजरने की एक चिंगारी
Speaker A
लगाने के लिए थी। वो चिंगारी इल्म की प्यास की, तहकीक की, लगन की, खुद एतजाबी की, जुर्रत की, अमल की ताकत की और सबसे बढ़कर एक नई रोशन सुबह की उम्मीद। याद रखें तब्दीली हमेशा फर्द से शुरू होती है।
Speaker A
अगर मैं बदललूंगा अगर आप बदलेंगे अगर हम सब अपनी-अपनी जगह पर अपनी-अपनी जिम्मेदारी महसूस करना शुरू कर देंगे तो एक बड़ी इज्तिमाई तब्दीली आ सकती है। एक कलेक्टिव ट्रांसफॉर्मेशन हो सकती है। ये नामुमकिन नहीं है। और इसके लिए क्या करना होगा?
Speaker A
पढ़ें और सिर्फ पढ़े नहीं समझे भी। अपनी तारीख भी और दूसरों की तारीख भी। कुरान को भी समझे और साइंस को भी। माजी से भी सीखें और मुस्तकबिल के लिए भी तैयार। सवाल करें। हर चीज पर सवाल करें। अंधी तकलीफ छोड़
Speaker A
दें। तनकीदी और तजियाती सोच अपनाएं। सच और झूठ में तमीज करना सीखें। अपने आप पर यकीन रखें। एहसास कमतरी के खौल से बाहर निकलें। याद करें कि आप किस अजीम तहजीब के वारिस हैं और आप में भी दुनिया बदलने की सलाहियत
Speaker A
मौजूद है। पॉजिटिव रहें। मायूसी शैतान का हथियार है। उम्मीद का दामन कभी ना छोड़ें और अपने हिस्से का काम करें। अपने घर में, अपने मोहल्ले में, अपने शहर में, अपने मुल्क में जो भी मजबत किरदार अदा कर सकते
Speaker A
हैं, वह जरूर करें। चाहे वो कितना ही छोटा क्यों ना हो क्योंकि कतरा कतरा मिलकर ही दरिया बनता है। शायद हम अपनी जिंदगी में वो अजीम इस्लामी नशत सानिया ना देख पाए जिसका ख्वाब इकबाल ने देखा था लेकिन हम
Speaker A
उसकी तरफ पहला कदम तो उठा सकते हैं। हम उसकी बुनियाद तो रख सकते हैं। हम वो बीज तो बो सकते हैं जिसका सायादार दरख्त हमारी आने वाली नस्लों को नसीब हो। फैसला आपका है। क्या आप तारीख के सफात पर एक सवालिया
Speaker A
निशान बनकर रहना चाहते हैं या एक रोशन बाप का आगाज करना चाहते हैं? माजी का कैदी बनना है या मुस्तकबिल का मेमार अफराद के हाथों में है अकवाम की तकदीर। हर फर्द है मिल्लत के मुकद्दर का सितार।
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