उज़ैर बलोच की कहानी, जो रहमान डकैत के बाद लियारी का बेताज बादशाह बना, गैंगवार और राजनीतिक संघर्षों की दास्तान।
Key Takeaways
- उज़ैर बलोच ने पिता के कत्ल के बाद गैंगवार में अपनी भूमिका निभाई और लियारी का प्रमुख सरदार बना।
- राजनीतिक और अपराधी दुनिया में उज़ैर की गहरी पैठ थी, जिसने उसे स्थानीय सत्ता में प्रभावशाली बनाया।
- गैंगस्टर और राजनीतिक गठजोड़ लियारी के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करते रहे।
- उज़ैर बलोच की कहानी संघर्ष, बदला और सत्ता की राजनीति की मिसाल है।
What the video covers
- उज़ैर बलोच ने रहमान डकैत और अरशद पप्पू जैसे गैंगस्टरों के बीच अपनी ताकत बनाई।
- फैज मोहम्मद उर्फ़ मामा फैजू, उज़ैर के पिता, को अरशद पप्पू के गैंग ने अगवा कर हत्या कर दी।
- उज़ैर ने अपने पिता के कत्ल का बदला लेने के लिए गैंगवार में सक्रिय भूमिका निभाई।
- उज़ैर बलोच ने राजनीतिक क्षेत्र में भी कदम रखा और स्थानीय चुनाव में हिस्सा लिया।
- उज़ैर बलोच ने पीपल्स अमन कमेटी बनाई, जिससे वह पीपल्स पार्टी के करीब आया।
- 2006 में उज़ैर को गिरफ्तार किया गया और कई मुकदमों का सामना करना पड़ा।
- उज़ैर बलोच ने लियारी में अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए गनमैन रखे थे।
- उसकी जिंदगी में फुटबॉल और कबूतरबाजी जैसे शौक भी शामिल थे।
- गैंगवार के दौरान कई हमले और फायरिंग की घटनाएं हुईं, जिसमें कई लोग मारे गए।
- उज़ैर बलोच की कहानी लियारी के सामाजिक, राजनीतिक और अपराधी परिदृश्य को दर्शाती है।
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Speaker A
वो रहमान डकैत और अरशद पप्पू से उम्र में छोटा था। मगर फिर उन दोनों से बड़ा सरदार बना। लेरी में एमएलए और एमपीए उसी की मर्जी से बनते थे। पुलिस अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग भी वही करता था। उसने अपने बाप की लाश अपने ही हाथों से उठाई। फिर उन्हीं हाथों से बाप के कातिलों को ठिकाने लगाया। वो फुटबॉलर था। मगर इल्जाम लगा कि उसने इंसानी सरों से फुटबॉल खेली। लेरी में लोग बूंदबूंद पानी को तरसते थे। मगर उसके घर में स्विमिंग पूल था। उसके इलाके में गुर्बत का डेरा था। मगर उसका घर किसी महल जैसा था। लेरी में किसी की जिंदगी महफूज़ नहीं थी। मगर उसकी हिफाजत 10 से ज्यादा गनमैन करते थे। जी हां, हम बात कर रहे हैं मेरा नाम उज़ेर अली है। उर्फ़ उज़ैर जान बलोच की। वही उज़ैर बलोच जो रहमान डकैत की मौत के बाद कई बरसों तक लेरी का बेताज बादशाह रहा। जनवरी 2003 का यह पहला हफ्ता था। कलाकोट का एक छोटा ट्रांसपोर्टर फैज मोहम्मद अपने दफ्तर के बाहर कुर्सियां लगाकर बैठा था। उसके दोस्त यार भी बैठे थे। चाय का दौर चल रहा था। हंसी-ज़ाक हो रहा था। इतने में एक कार वहां आकर रुकी। उसमें से छह लड़के उतर कर उनकी जानिब बढ़े। उनका लीडर अरशद पप्पू था। लियारी का खतरनाक गैंगस्टर और रहमान बलोच उर्फ रहमान डकैत का जानी दुश्मन अरशद पप्पू और इसका साथी फैज मोहम्मद उर्फ मामा फैजू को अगवा करने आए थे। उन्होंने असलहा निकाल कर सबको हैंड्स अप करा दिया। फैज मोहम्मद का 26 साल का बेटा भी उनमें शामिल था। अरशद पप्पू और साथी फैज मोहम्मद को पकड़ कर ले जाने लगे तो उसने मज़ामत की। हमलावरों ने उसकी टांग पर गोली मार दी। फैज मोहम्मद का बेटा यह देखकर उन पर हमले के लिए लपका। मगर फैज मोहम्मद के दोस्तों ने उसे पकड़ लिया। हमलावरों ने फैज मोहम्मद को घसीट कर कार में बिठाया और हवाई फायरिंग करते हुए चले गए। फैज मोहम्मद का बेटा बेबसी से देखता रह गया। एक हफ्ते बाद फैज मोहम्मद उर्फ मामा फैजू की गोलियों से छल्ली लाश मिली। अपने बाप को अगवा होते देखने वाला यह नौजवान कोई और नहीं बल्कि उज़ैर अली था। जो बाद में उज़ैर जान बलोच कहलाया। जो रहमान बलोच उर्फ रहमान डकैत के बाद उससे भी बड़ा सरदार बना। इंकलाब की लियारी सीरीज में हम आज सरदार उज़ैर बलोच की सनसनीखेज दास्तान सुना रहे हैं। यहां के आवाम ने मुझे पकड़वंदी की और मुझे सरदार बनाया। उज़ैर ने रहमान बलोच या अरशद पप्पू की तरह जुर्म की दुनिया में आंख नहीं खोली थी। वो अपनी मर्जी से गैंग वॉर में शामिल नहीं हुआ था बल्कि उसे घसीटा गया। मगर फिर वो इतनी दूर निकल गया कि वापसी का रास्ता नहीं रहा। आइए उज़ैर की कहानी शुरू से शुरू करते हैं। 10 अक्टूबर 1977 सिंगोलेन लियारी की तंग गलियों वाले एक मकान में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम उज़ैर अली रखा गया। वालिद फैज मोहम्मद का ताल्लुक ईरानी बलचिस्तान के सरबाजी कबीले से था। 1992 में उज़ैर ने इलाके के स्कूल से मैट्रिक कर लिया। गवर्नमेंट डिग्री साइंस कॉलेज में दाखिला लिया मगर इंटर क्लियर ना हुआ। वो उसने कई साल बाद क्लियर किया। बाप उज़ैर को फुटबॉलर बनाना चाहता था। मगर उसका दिल कबूतरबाजी में लगता था। फुटबॉल तो वह खेलता था मगर इतने शौक से नहीं। 1997 में 20 साल की उम्र में शादी हो गई। 2 साल बाद एक बेटी का बाप भी बन गया। कुछ अरसे लहरी जनरल अस्पताल में वार्ड बॉय के तौर पर काम किया। 2001 में परवेज मुशर्रफ के दौर में लोकल बॉडी इलेक्शन हुए। हुज़ैर बलोच ने अपने इलाके से नाज़िम का इलेक्शन लड़ा। मगर पीपल्स पार्टी के हबीब हसन के मुकाबले में हार गया। इस अरसे में फैज मोहम्मद का ट्रांसपोर्ट का काम बढ़ गया था। इसकी 10 से ज्यादा बसें कराची से ठट्टा, सजावल और बदीन के लिए चलने लगी थीं। तो उसने उज़ैर को अपने साथ ही काम पर लगा लिया था। 2002 में उज़ैर के घर बेटा पैदा हुआ। दादा बनने की खुशी में फैज मोहम्मद ने पूरे इलाके में मिठाइयां तकसीम की। मगर चंद ही महीनों बाद जनवरी 2003 में उसका आखिरी दिन आ गया। कोई बड़ा एक चंदा देने वाला या एक इनका सपोर्टर था वो था फैज मोहम्मद उर्फ़ फैजू। रहमान का और इनका तो जब अरशद वगैरह को यह बात पता लगी कि फैजू इनको तो पैसे दे रहा है लेकिन हमारे हमें पैसे नहीं दे रहा तो उन्होंने फैजू फैज मोहम्मद फैजू से कांटेक्ट किया तो फैजू ने कोई इंकार किया या उनको वोकि बरास्त रहमान ग्रुप की सरपरस्ती में था तो उन्होंने उसको किसी तरीके से मौका पाकर अगवा कर लिया। अगवा के बदले में उन्होंने उनसे तावान मांगा। फैज मोहम्मद फैजू असल में उज़ैर बलोच जो बाद में सरदार उजैर जान बलोच बने उनका वालिद था। उन्होंने उसको अगवा किया। कुछ दिन रखा। फिर उसके बाद इन्होंने जो रसम की जो रकम थी वो तमाम फैमिली ने मिलके अरशद पप्पू गैंग के लोगों को दे दी। वो पैसे भी दे दिए। लेकिन उसके बावजूद उन्होंने इसको कत्ल करके उनकी लाश जो थी वो फेंक दी। जिसके एक बकायदा एक मैं समझता हूं कि जंग की शक्ल हुई। जो उज़ैर था ये तो स्टूडेंट था। कॉमर्स कॉलेज में पढ़ता था और एक पढ़ा लिखा और वो था। इस तमाम चीजों से वो था। लेकिन क्योंकि एक बाप को इतने बेईमाना तरीके से कत्ल किया गया। पैसे भी दिए गए। तो यह फिर तमाम छोड़कर यह बकायदा तौर पर फिर रहमान के साथ शामिल हुआ। फिर इनकी जो ताकत थी वह और दुगनी हुई। जॉइंट वेंचर शुरू हुआ। इन्होंने फिर बाकायदा तौर पर अरशद पप्पू और उसके जो लोग थे उनके खिलाफ लड़ाई लड़ना शुरू कर दी थी। उजैर बलोच उस जमाने में 24-25 साल का नौजवान था। शादीशुदा होने के बावजूद उसके सर पर कोई जिम्मेदारी नहीं थी। बड़ी बेफिक्री की जिंदगी गुजारता था। बाप उसका जो फैज मोहम्मद था वह पैसे वाला था और वह अपने बाप का लाडला भी था और उसी लाड में उसने अपने बेटे को एक जीप दिला के दी थी। उज़ैर बलोच उस जीप में अपने दोस्तों के साथ घूमता फिरता रहता था। लेकिन फिर जब इसके बाप का कत्ल हुआ तो उसने उज़ैर बलोच की पूरी जिंदगी बदल कर रख दी। वो भाइयों में सबसे बड़ा था। उसके दो छोटे भाई थे जुबैर अली और उमैर अली। लेकिन क्योंकि वो सबसे बड़ा था तो घर की जिम्मेदारियां सारी उस पर आ गई थीं। वो अपने वालिद के कत्ल का गवाह भी था और मुद्दई भी। एफआईआर में उसने अरशद पप्पू, उसके भाई यासिर अरफात और दो दूसरे लोगों के नाम दर्ज कराए। यहां से जो है अगर हम देखें तो लियारी को एक और गैंग लीडर मिलता है। मामा फैजू बेसिकली उज़ैर बलोच का बाप था। कहते हैं कि उज़ैर बलोच की वालिदा रजिया बीबी ने इसे कसम दी थी कि वो अपने बाप का बदला जरूर ले। और उज़ैर ने वादा कर लिया था। उज़ैर के मुताबिक वो अपने वालिद के केस में गवाही देने जाता था। तब भी इसको डराया धमकाया जाता था। अरशद पप्पू गुरु उन्होंने मेरा वालिद साहब को तशद्दुद करके बोरी में लाश धार के मच्छर कॉलोनी मारीपुर रोड में फेंका तो मैं उस चीज का चश्मदीद गवाह था। मैं गवाही देने जाता था तो मेरे खिलाफ उन्होंने रोकने के लिए गवाही पे मुझे मुतैहद केसों में मकरूर करवाया। इस सुरते हाल में वो अपने रिश्ते के कजिन रहमान बलोच के पास पहुंचा और उसके साथ शामिल हो गया। रहमान बलोच उस वक्त तक हिस्ट्री शीटर और नामी ग्रामी गैंगस्टर बन चुका था। इस दौरान अरशद पप्पू के वालिद हाजी लालू को 23 जनवरी 2003 को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद अरशद पप्पू ने बदला लेने के लिए रहमान के रिश्तेदारों पर कई हमले किए। दोनों तरफ से एक दूसरे के हामियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को निशाना बनाया जा रहा था। जीआईटी रिपोर्ट के मुताबिक कुछ ही अरसे बाद उज़ैर भी उनके साथ वारदातों में शामिल हो गया। 2004 में उसने बाबा लाडला, शाहनवाज शानी और फैसल पठान के साथ मिलकर मुखालिफ ग्रुप के फिदा जोगी और जहांगीर लासी पर फायरिंग की। जहांगीर लासी मारा गया जबकि फिदा जोगी शदीद जख्मी हुआ। इस हमले की एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई थी क्योंकि गैंग वॉर वाले अपना बदला खुद लेने पर यकीन रखते थे। 2005 में चौधरी असलम सरबराही में लेहारी टास्क फोर्स बनी। इस फोर्स ने गैंग वॉर वालों के खिलाफ सख्त कारवाईयां शुरू कर दीं। रहमान बलोच फरार होकर बलूचिस्तान चला गया। जबकि उज़ैर भी पहले ईरान गया। वहां का आईडी कार्ड और पासपोर्ट हासिल किया। फिर वहां से पाकिस्तान आया और ठट्टा के करीब चौहड़ जमाली के इलाके में रूपोश हो गया। 2006 में रहमान बलोच की गिरफ्तारी से कुछ पहले चौधरी असलम ने उज़ैर बलोच को गिरफ्तार किया। उज़ैर का कहना है कि चौधरी असलम ने नहीं बल्कि एजेंसियों ने गिरफ्तार किया था। नहीं उसने नहीं किया। मैं जब 2006 में मुझे पकड़ा था झूठे मुकदमातों में और इसमें 17 मुतक मुकदमात इसने मुझ पे केस बनाए थे और मुझे पकड़ा अंदरून सिंध से और आईएसआई वालों ने मुझे पकड़ा था और इसके हवाले किया था। इसके बाद वो कई महीने कराची सेंट्रल जेल में कैद रहा। यहां वो फैसल रज़ा अब्दी के कहने पर पीपल्स पार्टी के कैदियों का इंचार्ज बना। जमानत पर रिहाई के बाद वह कुछ अरसे तो कोर्ट में पेश होता रहा मगर फिर उसने पेश होना छोड़ दिया। इसीलिए इसे इश्तहारी करार दे दिया गया। जैसा कि हमने रहमान डकैत वाली स्टोरी में भी बताया था कि इस दौरान रहमान पीपल्स पार्टी की कयादत के बहुत करीब हो चुका था। क्योंकि पीपल्स पार्टी एमकेएम को लियारी से दूर रखना चाहती थी। 2008 में पीपल्स पार्टी की हुकूमत बनने के बाद रहमान की अहमियत और बढ़ गई थी। साथ ही उज़ैर की भी। उन्होंने एक तंजीम पीपल्स अमन कमेटी भी बनाई थी। इसके नाम में पीपल्स शामिल करके यह तासुर दिया गया था कि यह पीपल्स पार्टी की ही कोई ज़ली तंजीम है। खैर, तो सुरते हाल यूं थी कि बाबा लाडला अगर रहमान डकैत का मिलिट्री राइट हैंड था तो उज़ैर बलोच पॉलिटिकल राइट हैंड। वो हर मीटिंग में शरीक था।
Speaker A
की लाश अपने ही हाथों से उठाई। फिर उन्हीं हाथों से बाप के कातिलों को ठिकाने लगाया। वो फुटबॉलर था। मगर इल्जाम लगा कि उसने इंसानी सरों से फुटबॉल खेली। लेरी में लोग बूंदबूंद पानी को तरसते थे। मगर उसके घर
Speaker A
में स्विमिंग पूल था। उसके इलाके में गुर्बत का डेरा था। मगर उसका घर किसी महल जैसा था। लेरी में किसी की जिंदगी महफूज़ नहीं थी। मगर उसकी हिफाजत 10 से ज्यादा गनमैन करते थे। जी हां, हम बात कर रहे हैं
Speaker A
मेरा नाम उज़ेर अली है। उर्फ़ उज़ैर जान बलोच की। वही उज़ैर बलोच जो रहमान डकैत की मौत के बाद कई बरसों तक लेरी का बेताज बादशाह रहा। जनवरी 2003 का यह पहला हफ्ता था। कलाकोट का एक छोटा ट्रांसपोर्टर फैज मोहम्मद अपने
Speaker A
दफ्तर के बाहर कुर्सियां लगाकर बैठा था। उसके दोस्त यार भी बैठे थे। चाय का दौर चल रहा था। हंसीज़ाक हो रहा था। इतने में एक कार वहां आकर रुकी। उसमें से छह लड़के उतर कर उनकी जानिब बढ़े। उनका लीडर अरशद पप्पू
Speaker A
था। लियारी का खतरनाक गैंगस्टर और रहमान बलोच उर्फ रहमान डकैत का जानी दुश्मन अरशद पप्पू और इसका साथी फैज मोहम्मद उर्फ मामा फैजू को अगवा करने आए थे। उन्होंने असलहा निकाल कर सबको हैंड्स अप करा दिया। फैज मोहम्मद का 26 साल का बेटा भी उनमें शामिल
Speaker A
था। अरशद पप्पू और साथी फैज मोहम्मद को पकड़ कर ले जाने लगे तो उसने मजामत की। हमलावरों ने उसकी टांग पर गोली मार दी। फैज मोहम्मद का बेटा यह देखकर उन पर हमले के लिए लपका। मगर फैज मोहम्मद के दोस्तों
Speaker A
ने उसे पकड़ लिया। हमलावरों ने फैज मोहम्मद को घसीट कर कार में बिठाया और हवाई फायरिंग करते हुए चले गए। फैज मोहम्मद का बेटा बेबसी से देखता रह गया। एक हफ्ते बाद फैज मोहम्मद उर्फ मामा फैजू की गोलियों से छल्ल लाश मिली। अपने
Speaker A
बाप को अगवा होते देखने वाला यह नौजवान कोई और नहीं बल्कि उज़ैर अली था। जो बाद में उज़ैर जान बलोच कहलाया। जो रहमान बलोच उर्फ रहमान डकैत के बाद उससे भी बड़ा सरदार बना। इंकलाब की लियारी सीरीज में हम
Speaker A
आज सरदार उज़ैर बलोच की सनसनीखेज दास्तान सुना रहे हैं। यहां के आवाम ने मुझे पकबंदी की और मुझे सरदार बनाया। उज़ैर ने रहमान बलोच या अरशद पप्पू की तरह जुर्म की दुनिया में आंख नहीं खोली थी। वो अपनी मर्जी से गैंग वॉर में शामिल नहीं
Speaker A
हुआ था बल्कि उसे घसीटा गया। मगर फिर वो इतनी दूर निकल गया कि वापसी का रास्ता नहीं रहा। आइए उज़ैर की कहानी शुरू से शुरू करते हैं। 10 अक्टूबर 1977 सिंगोलेन लियारी की तंग गलियों वाले एक मकान में एक बच्चा पैदा
Speaker A
हुआ जिसका नाम उज़ैर अली रखा गया। वालिद फैज मोहम्मद का ताल्लुक ईरानी बलचिस्तान के सरबाजी कबीले से था। 1992 में उज़ैर ने इलाके के स्कूल से मैट्रिक कर लिया। गवर्नमेंट डिग्री साइंस कॉलेज में दाखिला लिया मगर इंटर क्लियर ना हुआ। वो उसने कई
Speaker A
साल बाद क्लियर किया। बाप उज़ैर को फुटबॉलर बनाना चाहता था। मगर उसका दिल कबूतरबाजी में लगता था। फुटबॉल तो वह खेलता था मगर इतने शौक से नहीं। 1997 में 20 साल की उम्र में शादी हो गई। 2 साल बाद एक बेटी
Speaker A
का बाप भी बन गया। कुछ अरसे लहरी जनरल अस्पताल में वार्ड बॉय के तौर पर काम किया। 2001 में परवेज मुशर्रफ के दौर में लोकल बॉडी इलेक्शन हुए। हुज़ैर बलोच ने अपने इलाके से नाज़िम का इलेक्शन लड़ा। मगर
Speaker A
पीपल्स पार्टी के हबीब हसन के मुकाबले में हार गया। इस अरसे में फैज मोहम्मद का ट्रांसपोर्ट का काम बढ़ गया था। इसकी 10 से ज्यादा बसें कराची से ठट्टा, सजावल और बदीन के लिए चलने लगी थी। तो उसने उज़ैर
Speaker A
को अपने साथ ही काम पर लगा लिया था। 2002 में उज़ैर के घर बेटा पैदा हुआ। दादा बनने की खुशी में फैज मोहम्मद ने पूरे इलाके में मिठाइयां तकसीम की। मगर चंद ही महीनों बाद जनवरी 2003 में उसका आखिरी दिन आ गया।
Speaker A
कोई बड़ा एक चंदा देने वाला या एक इनका सपोर्टर था वो था फैद मोहम्मद उर्फ़ फैजू। रहमान का और इनका तो जब अरशद वगैरह को यह बात पता लगी कि फैजू इनको तो पैसे दे रहा है लेकिन हमारे हमें पैसे नहीं दे रहा तो
Speaker A
उन्होंने फैजू फैज मोहम्मद फैजू से कांटेक्ट किया तो फैजू ने कोई इंकार किया या उनको वोकि बरास्त रहमान ग्रुप की सरपरस्ती में था तो उन्होंने उसको किसी तरीके से मौका पाकर अगवा कर लिया अगवा के बदले में उन्होंने उनसे तावान मांगा फैज
Speaker A
मोहम्मद फैजू असल में उज़ैर बलोच जो बाद में सरदार उजैर जान बलोच बने उनका वालिद था। उन्होंने उसको अगवा किया। कुछ दिन रखा। फिर उसके बाद इन्होंने जो रसम की जो रकम थी वो तमाम फैमिली ने मिलके अरशद
Speaker A
पप्पू गैंग के लोगों को दे दी। वो पैसे भी दे दिए। लेकिन उसके बावजूद उन्होंने इसको कत्ल करके उनकी लाश जो थी वो फेंक दी। जिसके एक बकायदा एक मैं समझता हूं कि जंग की शक्ल हुई। जो उज़ैर था ये तो स्टूडेंट
Speaker A
था। कॉमर्स कॉलेज में पढ़ता था और एक पढ़ा लिखा और वो था। इस तमाम चीजों से वो था। लेकिन क्योंकि एक बाप को इतने बेईमाना तरीके से कत्ल किया गया। पैसे भी दिए गए। तो यह फिर तमाम छोड़कर यह बकायदा तौर पर
Speaker A
फिर रहमान के साथ शामिल हुआ। फिर इनकी जो ताकत थी वह और दुगनी हुई। जॉइंट वेंचर शुरू हुआ। इन्होंने फिर बाकायदा तौर पर अरशद पप्पू और उसके जो लोग थे उनके खिलाफ लड़ाई लड़ना शुरू कर दी थी। उजैर बलोच उस
Speaker A
जमाने में 24-25 साल का नौजवान था। शादीशुदा होने के बावजूद उसके सर पर कोई जिम्मेदारी नहीं थी। बड़ी बेफिक्री की जिंदगी गुजारता था। बाप उसका जो फैज मोहम्मद था वह पैसे वाला था और वह अपने बाप का लाडला भी था और उसी लाड में उसने
Speaker A
अपने बेटे को एक जीप दिला के दी थी। उज़ेर बलोच उस जीप में अपने दोस्तों के साथ घूमता फिरता रहता था। लेकिन फिर जब इसके बाप का कत्ल हुआ तो उसने उज़ैर बलोच की पूरी जिंदगी बदल कर रख दी। वो भाइयों में
Speaker A
सबसे बड़ा था। उसके दो छोटे भाई थे जुबैर अली और उमैर अली। लेकिन क्योंकि वो सबसे बड़ा था तो घर की जिम्मेदारियां सारी उस पर आ गई थी। वो अपने वालिद के कत्ल का गवाह भी था और मुद्दई भी। एफआईआर में उसने
Speaker A
अरशद पप्पू, उसके भाई यासिर अरफात और दो दूसरे लोगों के नाम दर्ज कराए। यहां से जो है अगर हम देखें तो लियारी को एक और गैंग लीडर मिलता है। मामा फैजू बेसिकली उज़ैर बलोच का बाप था। कहते हैं कि उज़ैर बलोच की वाल्दा रजिया
Speaker A
बीबी ने इसे कसम दी थी कि वो अपने बाप का बदला जरूर ले। और उज़ैर ने वादा कर लिया था। उज़ैर के मुताबिक वो अपने वालिद के केस में गवाही देने जाता था। तब भी इसको डराया धमकाया जाता था। अर्शद पप्पू गुरु
Speaker A
उन्होंने मेरा वालिद साहब को तशद्दुद करके बोरी में लाश धार के मच्छर कॉलोनी मारीपुर रोड में फेंका तो मैं उस चीज का चश्मदीद गवाह था। मैं गवाही देने जाता था तो मेरे खिलाफ उन्होंने रोकने के लिए गवाही पे
Speaker A
मुझे मुतैहद केसों में मकरूर करवाया। इस सुरते हाल में वो अपने रिश्ते के कजिन रहमान बलोच के पास पहुंचा और उसके साथ शामिल हो गया। रहमान बलोच उस वक्त तक हिस्ट्री शीटर और नामी ग्रामी गैंगस्टर बन चुका था। इस दौरान अरशद पप्पू के वालिद
Speaker A
हाजी लालू को 23 जनवरी 2003 को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद अरशद पप्पू ने बदला लेने के लिए रहमान के रिश्तेदारों पर कई हमले किए। दोनों तरफ से एक दूसरे के हामियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को निशाना बनाया जा रहा था। जीआईटी रिपोर्ट
Speaker A
के मुताबिक कुछ ही अरसे बाद उज़ैर भी उनके साथ वारदातों में शामिल हो गया। 2004 में उसने बाबा लाडला, शाहनवाज शानी और फैसल पठान के साथ मिलकर मुखालिफ ग्रुप के फिदा जोगी और जहांगीर लासी पर फायरिंग की। जहांगीर लासी मारा गया जबकि फिदा जोगी
Speaker A
शदीद जख्मी हुआ। इस हमले की एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई थी क्योंकि गैंग वॉर वाले अपना बदला खुद लेने पर यकीन रखते थे। 2005 में चौधरी असलम सरबराही में लेहारी टास्क फोर्स बनी। इस फोर्स ने गैंग वॉर वालों के
Speaker A
खिलाफ सख्त कारवावयां शुरू कर दी। रहमान बलोच फरार होकर बलूचिस्तान चला गया। जबकि उज़ैर भी पहले ईरान गया। वहां का आईडी कार्ड और पासपोर्ट हासिल किया। फिर वहां से पाकिस्तान आया और ठट्टा के करीब चौहड़ जमाली के इलाके में रूपोश हो गया। 2006
Speaker A
में रहमान बलोच की गिरफ्तारी से कुछ पहले चौधरी असलम ने उज़ैर बलोच को गिरफ्तार किया। उज़ैर का कहना है कि चौधरी असलम ने नहीं बल्कि एजेंसियों ने गिरफ्तार किया था। नहीं उसने नहीं किया। मैं जब 2006 में मुझे पकड़ा था झूठे मुकदमातों में और
Speaker A
इसमें 17 मुतक मुकदमात इसने मुझ पे केस बनाए थे और मुझे पकड़ा अंदरून सिंध से और आईएसआई वालों ने मुझे पकड़ा था और इसके हवाले किया था। इसके बाद वो कई महीने कराची सेंट्रल जेल में कैद रहा। यहां वो
Speaker A
फैसल रज़ा अब्दी के कहने पर पीपल्स पार्टी के कैदियों का इंचार्ज बना। जमानत पर रिहाई के बाद वह कुछ अरसे तो कोर्ट में पेश होता रहा मगर फिर उसने पेश होना छोड़ दिया। इसीलिए इसे इश्तहारी करार दे दिया
Speaker A
गया। जैसा कि हमने रहमान डकैत वाली स्टोरी में भी बताया था कि इस दौरान रहमान पीपल्स पार्टी की कयादत के बहुत करीब हो चुका था। क्योंकि पीपल्स पार्टी एमकेएम को लियारी से दूर रखना चाहती थी। 2008 में पीपल्स
Speaker A
पार्टी की हुकूमत बनने के बाद रहमान की अहमियत और बढ़ गई थी। साथ ही उज़ैर की भी। उन्होंने एक तंजीम पीपल्स अमन कमेटी भी बनाई थी। इसके नाम में पीपल्स शामिल करके यह तासुर दिया गया था कि यह पीपल्स पार्टी
Speaker A
की ही कोई ज़ली तंजीम है। खैर, तो सुरते हाल यूं थी कि बाबा लाडला अगर रहमान डकैत का मिलिट्री राइट हैंड था तो उज़ैर बलोच पॉलिटिकल राइट हैंड। वो हर मीटिंग में शरीक होता। मगर फिर रहमान ने पीपल्स
Speaker A
पार्टी के मुकाबले में मनमानी शुरू कर दी। एमएनए नबील गबूल का इलाके में दाखिला बंद कर दिया। म्यनिसिपल नाजिमों से इस्तीफे मांगने शुरू कर दिए। बलूचिस्तान की एक आला शख्सियत ने सदर आसिफ अली जरदारी से शिकायत की तो ज़रदारी ने रहमान डकैत को पकड़ कर
Speaker A
कानून के हवाले करने की हिदायत कर दी थी। इसके सर की कीमत भी ₹50 लाख मुकरर कर दी गई। फिर 9 और 10 अगस्त 2009 की दरमियानी रात चौधरी असलम ने रहमान डकैत को मुतनाजा पुलिस मुकाबले में मार दिया।
Speaker A
बहसियत एसएसपी ईस्ट इन्वेस्टिगेशन इस बात की तस्दीक करता हूं कि यह रहमान डकैत है। उज़र बलोच ने इस मुकाबले को जाली करार देते हुए हाई कोर्ट जाने का ऐलान किया था। जो लियारी के मुख्तलिफ इलाके थे उन पे
Speaker A
मुख्तलिफ कमांडर्स जो हैं वह मुकर्रर किए गए थे और उन सबको जो है वह बाबा लाडला देखता था जिसमें शफी पठान था बादशाह खान था बाबा लाडला था ताजू था उस्ताद ताजू था इस तरह के मुख्तलिफ लोग थे जिन्हें
Speaker A
मुख्तलिफ इलाकों में जिम्मेदारियां दी गई थी और इसमें जाहिर है सबसे इंपॉर्टेंट आदमी हुजैर बलोच था जो बेसिकली मामा फैजू के कत्ल के बाद जिसने रहमान को जॉइन कर लिया था और रहमान के साथ ही वह कारवाइयों में शामिल शामिल भी था। उसका गैंग ज्वाइन
Speaker A
कर चुका था और रहमान के बाद उसने फिर गैंग की कमान भी संभाली। जराय बताते हैं कि इस अरसे में उज़ैर बलोच ने आसिफ अली ज़रदारी समेत पीपल्स पार्टी की आला कयादत के दिलों में भी जगह बना ली थी।
Speaker A
रहमान के बाद गैंग की सरदारी और पीपल्स अमन कमेटी के नए लीडर के लिए दो नाम सामने आए थे। उज़ैर बलोच और बाबा लाडला। मगर आखिरकार यह पगड़ी उज़ैर बलोच के सर सजाई गई। और वो बन गया सरदार उज़ैर जान बलोच।
Speaker A
रहमान बलोच की पुलिस मुकाबले में मुबईना हलाकत के बाद फैसला हुआ कि उसके बड़े बेटे को जो है वो सरदार बनाया जाए। लेकिन वो उम्र में बहुत छोटा था। इसलिए पीपल्स अमन कमेटी वालों ने फैसला किया कि किसी और को
Speaker A
उबूरी सरदार बनाया जाता है। अब उनके सामने दो नाम थे। एक था बाबा लाडला और दूसरा उज़ैर बलोच। अक्सरियत ने उज़ैर बलोच के हक में राय दी। क्योंकि एक तो वो पढ़ा लिखा था। फिर पॉलिटिकल भी था। पीपल्स पार्टी से
Speaker A
उसके राबते भी थे। फिर जिस तरह बलोचों में सरदार बनाने का रिवाज है तो एक बाकायदा एक तकरीब हुई दस्तारबंदी की जिसमें उसके सर पर पगड़ी सजाई गई। तो इस तरह उज़ेर बलोच सरदार उज़ेर जान बलोच बन गया। हालात
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वाक्यात कुछ ऐसे हुए कि फैजू मामा जो था वो उनका बेटा उज़ैर बलोच जो कि रहमान के साथ मिलके अपने बदले की आग के लिए जो है वो बदले के लिए कोशिशें कर रहा था। तो उसने फिर एक बाकायदा तौर पर तमाम बागडोर
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संभाल ली। एक बहुत बड़ी तकरीब में लारी में जो है वो उसकी उसको दस्तारबंदी उसकी की गई और उसको एक सरबराह के तौर पर जो पेश किया गया। इस दौरान जुल्फिकार मिर्जा सिंध के वज़र दाखला बन गए थे। उन्होंने पीपल्स अमन
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कमेटी के सर पर हाथ रखा और उन्हें लाखों असल लाइसेंस दिए। जब पीपल्स पार्टी का दौर आया तो इस वजह से हमें जो है कलाच कोप के परमिट दिए लेरी वालों को मुझे नहीं सबको और उसमें शॉर्ट गन के लाइसेंस दिए पिस्टल
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के लाइसेंस दिए कि आप लोग अपनी दपा करें जिस तरीके से मुत्तहदा और अर्शद पप्पू ग्रुप के गप्पड़ जिगरी के लोग आते हैं यहां जब रात को लोड शेडिंग होते हैं दस्ती बम फेंकते हैं जिसमें काफी लोग शहीद हुए
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काफी वारदात ऐसे हो चुके थे इस वजह से हमारी दफा के लिए हमें दिया था। फिर उसके बाद जो बहुत ज्यादा मजबूत हुआ। एक बकायदा एक जिरगे की शक्ल होती थी। बड़ा कारनवाय था। एक पुलिस का बड़ा लोगों का
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निजाम था। उजैर बलोच के साथ उनकी पोस्टिंग पुलिस वालों की उसकी मर्जी से होती थी। तमाम जो लहरी के अंदर कौन कहां से किस वक्त कैसे इलेक्शन लड़ेगा तमाम फैसले वो करता था। टिकट वो करता था। फिर जो है वो
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जब ये सारी सिचुएशन हुई इस ताकत की तमाम चीजों की तो बदले की जो आग थी वो उसकी कंटिन्यू लगी थी क्योंकि उसको अपने बाप का बदला लेने के लिए ये सब कुछ करना पड़ा था तो उसके लिए वो अरशद पप्पू और उसके गैंग
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के लोगों के पीछे लगा रहा। अक्टूबर 2010 में शेरशाह कबाड़ी मार्केट में होने वाले कत्लेआम का इल्जाम बाबा लाडला के साथ-साथ उज़ैर बलोच पर भी लगा। मुत्तहदा कौमी मूवमेंट इस जमाने में पीपल्स पार्टी की इत्तेहादी थी। पुलियारी गैंग के खिलाफ
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पीपल्स पार्टी से मुस्तकिल शिकायतें करती रही। इसके साथ-साथ मुबईना तौर पर उज़ैर बलोच के मुखालिफन यानी अरशद पप्पू और गफ्फार जिकरी को एमकेएम की पुश्तपनाही भी हासिल थी। इस दौरान कच्छी राब्ता कमेटी के नाम से एक और तंजीम भी बनाई गई। जिसमें
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मुत्तहदा से ताल्लुक रखने वाले लड़के भी शामिल थे। एमकेएम और लेरी गैंग की लड़ाई पर हम जल्द तफसीली डॉक्यूमेंट्री लाएंगे। मुख्तसिर यह समझ लें कि उज़ैर बलोच के ग्रुप को पीपल्स पार्टी की सरपरस्ती हासिल थी। तो दूसरे ग्रुपों को मुत्तहदा की। अब
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लेरी ओल्ड सिटी एरिया और शहर के दूसरे इलाकों में जबान के नाम पर कत्ल गारत का सिलसिला शुरू हो चुका था। शनाख्ती कार्ड देखकर लोग कत्ल किए जाने लगे थे। बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। जिसने कराची अमनो अमान केस की समात शुरू
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कर दी। एक मौके पर उज़ैर बलोच पीपल्स पार्टी की कयादत से सख्त नाराज हो गए गो जरदारी गो और ज़रदारी जो अभी जो काम कर रहा है ना वो कराची बेच के कर रहा है। जो पहले 10% था जिस टाइम पे यहां एमपीए था ये अब
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वो 100% बन गया है। वो कराची को बेच के कर रहा है और उसने अपने सदर के सीट के लिए उसने अमेरिका और बर्तनानिया से सौदा कर चुका है। और बिल्कुल जो है एमक्यूएम की जो मंशूर है वो मंसूर पे चल रहा है। और जो
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एमक्यूएम का मंशूर है वो बर्तनानिया और अमेरिका से आर्डर आता है उस मंशूर है। अब दोनों की मंशूर सेम हो गई। अब यह भी जो है अपना बदमाशी रोल पे आया है। बहरहाल अक्टूबर 2011 में पीपल्स अमन कमेटी पर
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टारगेट किलिंग, अगवा बराए तावान, भत्ताखोरी समेत दीगर इल्जामात की वजह से पाबंदी लगा दी गई। फिर भी उज़ैर बलोच और इसके ग्रुप का इलाके में असरो- रुसूख बरकरार रहा। यहां तक कि अप्रैल और मई 2012 में चौधरी असलम ने उज़ैर बलोच और इसकी
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पार्टी के खिलाफ क्रैकडाउन भी किया। मगर पुलिस की गाड़ियां चील चौक और दूसरी तरफ से ली मार्केट तक महदूद रही। लिहारी के अंदर की गलियों में ना जा सकी। कई दिनों के मुहासरे के बाद चौधरी असलम नाकाम होकर वापस लौट गए। रहमान बलोच की तरह
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उज़ैर बलोच भी इन दिनों इलाके की आवाम में बहुत मकबूल हो चुका था। औरतें इसके हक में नारे लगाती हैं। खैर, यह ऑपरेशन खत्म होने तक उज़ैर बलोच भी दोबारा आसिफ जरदारी के गुण गाने लगा था। वो अपने खिलाफ कारवाइयों का जिम्मेदार
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नबील गबोल और अवैस मुजफ्फर टप्पी को ठहराता था। अवैस मुजफ्फर टप्पी आसिफ अली ज़रदारी के मुंह बोले भाई थे। उज़ैर के मुताबिक ओवैस मुजफ्फर उर्फ़ टप्पी लियारी से इलेक्शन लड़ना चाहते थे। मगर उसने इंकार कर दिया था। जिस पर अवैस मुजफ्फर ने
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ऑपरेशन शुरू करा दिया था। उज़ैर का इल्जाम था कि सिंध के असल वज़रआला कायम अली शाह नहीं बल्कि अवैस मुजफ्फर टप्पी हैं। तो अवैस मुजफ्फर टप्पी गवर्नर का दोस्त है अरशुलबाद का और सरकारी जितने जमीनें हैं सिंध के ये दोनों ने मिलके 99 लीज़ बना के
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उस जमीनों को भी फरोख्त किया है। और जब हमने उसको मना किया उनका इरादा था कि जब हम यह लड़ेंगे सीट हम आगे सीएम हो। क्योंकि आज भी मौजूदा सीएम अवैस मुजफ्फर टप्पी है। कायम अलीशा नहीं है। कायम अलीशाह तो यूं
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बैठा हुआ है जो कहता है सहन करता है। तमाम आरे पास अवैस मुजफ्फर टप्पी करता है। हमने मना किया तो उसने चौधरी असलम को हमारे ऊपर मुसल्लत किया। हम बिलावल हाउस बैठ के हमारी मीटिंग हुई थी। तब हम पाकिस्तान
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पीपल्स पार्टी के थे। हम सब कुछ सही था। जब हमने उसको मना किया। उन्होंने चौधरी असलम को मुसल्लत किया और हमारे ऊपर इनाम लगवाया ₹ लाख। बहरहाल अवै मुजफ्फर से अनमन के बावजूद उज़ैर का तूती बोलता रहा। उन दिनों लिहारी
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ऑपरेशन की कवरेज के लिए वहां आने वाले सहाफी उज़ैर का आलीशान घर देखकर हैरान रह जाते। लिहारी की पतली गलियों में वाकई इस घर में जिंदगी की हर सहूलत देखो मैं अल्हम्दुलिल्लाह मैं एक ट्रांसपोर्टर हूं और मेरी ज़री जमीनें भी हैं और मैं दुबई
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में एक्सक्रे का भी कारोबार है मेरा। और अल्लाह का शुक्र है मैं पैदाइशी लैंड लॉब हूं और ना के हाथ से। मेरे अल्लाह ने मुझे दिया हुआ है। पैसे दिए हुए हैं। मैं स्विमिंग पूल भी बनाऊंगा, बिल्डिंग भी
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बनाऊंगा, अपशार भी बनाया हुआ है मैंने। अल्लाह ने मुझे दिया हुआ है। मगर उज़ैर फिर भी बेचैन रहता था। इसे अब तक अपने बाप के कत्ल का बदला लेने का मौका नहीं मिला था। लेकिन 2013 में यह मौका भी
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मिल गया। इसके बाप को कत्ल करने वाले अरशद पप्पू को 2006 में गिरफ्तार कर लिया गया था। 2012 में वह जमानत पर रिहा हुआ। 16 मार्च 2013 को अरशद पप्पू, इसके भाई यासिर अरफात और एक साथी शेरा पठान को डिफेंस से
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अगवा करके लेरी लाया गया। इसकी डिटेल आप अरशद पप्पू वाली स्टोरी में देख सकते हैं। इनके हाथ पैर काटे गए। फिर मरने के बाद लाशों के टुकड़े-टुकड़े करके जला दिए गए। सर को काटकर फुटबॉल खेली गई। अरशद पप्पू
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के अगवा वाले दिन ही नबील गबोल ने पीपल्स पार्टी छोड़कर एमकेएम में शामिल होने का ऐलान किया। इन्हीं दिनों निग्रा हुकूमत कायम हो चुकी थी। इलेक्शन में पीपल्स पार्टी को मजबूरन उज़ैर के लोगों यानी जावेद नागोरी और सानिया नाज़ वगैरह को
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टिकट देने पड़े जो वहां से कामयाब भी हुए। इन उम्मीदवारों ने उज़ैर बलोच से वफादारी का हलफ भी उठा लिया। इलेक्शन में जीतने के बाद उज़ैर बलोच ने उनके एजाज में डिनर दिया। जिसमें वज़र-ए-आला सिंध, कायम अली शाह, आसिफ जरदारी की बहन फरियाल तालपुर,
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अब्दुल कादिर बलोच और दीगर रहनुमा शरीक हुए थे। बाद में यह सब रहनुमा उज़ैर बलोच से किसी भी ताल्लुक से मुकर गए थे। सैयद गनी ने बाद में कहा कि डिनर तो इलाके के आवाम ने दिया था। जिसमें कोई भी शरीक हो
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सकता था। मुत्तहदा कौमी मूवमेंट ने भी वज़र एआला की लेरी जाने पर सख्त तनकीद की थी। मैं इतना जानता हूं कि वज़रआला सिंध हलफ लेने के बाद मज़ारे कायद नहीं गए थे। लेरी गए थे। और उसकी दावत पर गए थे और वहां जाकर खाना
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खाया था। वहां से आशीर्वाद लिया था। बहरहाल मई 2013 में होने वाले इलेक्शन में मुल्क में नवाज शरीफ की हुकूमत बनी। अरशद पप्पू केस भी सुप्रीम कोर्ट में चला गया था। सुप्रीम कोर्ट की हिदायत पर उज़ैर बलोच, बाबा लाडला और दीगर के खिलाफ एफआईआर
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दर्ज कर ली गई थी। सितंबर 2013 में कराची में जरायम पेशा अफराद के खिलाफ ऑपरेशन शुरू किया गया। नवंबर 2013 में जनरल राहिल शरीफ आर्मी चीफ बने तो इस ऑपरेशन में तेजी आई। उन्होंने कराची में आला सतह की एक
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कमेटी में कहा था कि क्रिमिनल चाहे किसी भी सियासी जमात के हो सबके खिलाफ कारवाई होगी। बहरहाल उज़ैर बलोच समेत गैंग वॉर के बड़े-बड़े नाम लियारी से फरार हो गए। उज़ैर बलोच भी पहले ईरान गया। वहां चाबहार में उसकी मुलाकात हाजी नासिर से हुई।
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जिसने इसका राब्ता मुबईना तौर पर ईरानी इंटेलिजेंस से कराया। पाकिस्तान ने इसकी गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल से रेड वारंट जारी करा दिए थे। 29 दिसंबर 2014 को इसे इंटरपोल ने दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया। ताम पाकिस्तान में इसकी
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गिरफ्तारी 30 जनवरी 2016 को जाहिर की गई। रेंजर्स ने एक प्रेस रिलीज में बताया कि उज़ैर बलोच को कराची के मजाफात से गिरफ्तार किया गया। इससे असलह भी बरामद हुआ। सरदार उज़ैर जान बलोच गिरफ्तारी के वक्त बहुत कमजोर और बूढ़ा दिखाई दिया। उससे तफ्तीश
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के लिए एक जीआईटी कायम की गई। जीआईटी में इसने 198 अफराद के कत्ल में मुलविस होने का एतराफ किया। मुबईना तौर पर जीआईटी रिपोर्ट में इसने आसिफ जरदारी की बहन फरियाल तालपुर को भत्ता पहुंचाने का एतराफ भी किया था। इमरान खान और पीटीआई रहनुमाओं
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ने इस हवाले से आसिफ जरदारी पर सख्त इल्जाम भी लगाए उजैर बलोच कहता है के 14 शुगर मिलों के ऊपर सिंध में मैंने कब्जा किया है। इसके इसका भाई टप्पी के साथ मिल के मैंने शुगर मिलों के ऊपर कब्जा किया और
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उनको कब्जा करके ज़रदारी को सस्ती कीमत पे दिलवाया है कि कराची में बिलावल हाउस के इर्द-गिर्द जो घर थे हमने वहां जाके लोगों को डरा के और धमका के जबरदस्ती उनको सस्ते दामों पे उनको घरों को खरीदा जरदारी के
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लिए और फरियाल तालपुर को वो कहता के हर महीने मैं ₹1 करोड़ भत्ता इकट्ठा करके फरियाल तालपुर को पकड़ाता था। कुछ बातें उज़ेर बलोच के एतराफी बयान में भी सामने आई थी जो उसने मजिस्ट्रेट के सामने दिया था। यह बयान बाद में सिंध
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हाईकोर्ट में जमा कराया गया। उसमें उज़ेर बलोच ने दावा किया कि वो कराची से एक महीने के अंदर ₹ करोड़ का भत्ता इकट्ठा करता था और उसमें से ₹1 करोड़ आसिफ जरदारी की बहन फरियाल तालपुर को जाता था। उज़ेर
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बलोच ने यह भी कहा कि उसने अवैस मुज़फर टप्पी को 14 शुगर मिलों पर कब्जा कराया। इसी तरह आसिफ जरदारी की हिदायत पर उसने बिलावल हाउस कराची के इर्द-गिर्द 30-40 बंगले खाली कराए। उजर बलोच ने यह बयान भी
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दिया कि उसने 2008 से 2013 के दौरान बड़े पैमाने पर असलाह खरीदा था। असलाह बेचने वालों में लाला तवक्कल, सलीम पठान और दूसरे शामिल थे। ये असलहा कोटा और पशीन से लाया जाता था। उस ज़हर के मुताबिक ये
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असलाहा कत्ल, इवाए तावान, पुलिस मुकाबलों, पुलिस पर हमलों और जो ये जलसे जुलूस होते हैं, उसमें सियासी ताकत दिखाने के लिए इस्तेमाल होता था। सिंध हुकूमत ने कई बरस तक जेआईटी रिपोर्ट जारी नहीं की। कई बरसों बाद जब रिपोर्ट जारी की गई तो इसमें
Speaker A
पीपल्स पार्टी के किसी रहनुमा का कोई नाम नहीं था। उज़ैर बलोच पर एक इल्जाम ईरानी इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए जासूसी करने का भी था। इस इल्जाम में मिलिट्री कोर्ट ने 2020 में इसे 12 साल की कैद सुनाई थी।
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इसके अलावा इस पर कत्ल और कत्ल की कोशिश वगैरह के 72 मुकदमात थे। जिनमें से 60 केसेस खत्म हो चुके हैं या उनमें जमानत मिल चुकी है। अदालत ने 13 साल पुराने केस में मुलजिम उजैर बलोच को बरी कर दिया है।
Speaker A
अब सिर्फ 12 मुकदमात रह गए हैं जिनमें अरशद पप्पू केस भी शामिल। ये काफी मैं समझता हूं कि एक बहुत बड़ी हिस्ट्री थी इनके केसेस की, इनके वाक्यात की। फिर बड़ी बात ये कि मीडिया पे आना। फिर ये सारी चीजें सामने थी।
Speaker A
मुकदमा भी दर्ज हुआ और इसके अलावा बहुत सारे मुकदमात उजैर बलोच के खिलाफ और थे जो एक बड़ी तादाद है जैसे कि मुकदमात की और आप बड़ी एक दिलचस्प सिचुएशन बनी हुई है पिछले कई सालों से देखा होगा के कोई उन
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वाक्यात की एक ट्रायल की कोई खबर नहीं आती केसेस की एक खबर ये आती है कि फला मुकदमे में उज़ैर बलोच को जो है वो बाइज्जत बरी कर दिया गया और फला मुकदमे में उज़ैर बलोच के खिलाफ कोई शहिद नहीं मिले और वो केस जो
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है उससे निकाल दिया गया तो मैं समझता हूं क्योंकि अगर आप मक्खन से बाल जैसे निकालते हैं उसमें भी शायद कोई थोड़ी सी देर लगती है जितना तेजी से वो केसेस से उनको फारग किया जा रहा है। इसके वकील आबिद जमान कहते
Speaker A
हैं कि अक्सर केस चौधरी असलम के बनाए गए थे। ज्यादातर मुकदमात में शवाहिय इतने ठोस नहीं कि जिसकी बुनियाद पर इसको सजा हो सके। वकीलों ने मिलिट्री कोर्ट से मिलने वाली सजा के खिलाफ भी अपील हाई कोर्ट में
Speaker A
दायर कर दी है। बहरहाल कुछ साफियों के मुताबिक उज़ैर बलोच ने रियासत के लिए कुछ ऐसे काम किए हैं जिनकी वजह से इसे मुस्तकिल रिहाई मिल सकती है। गिरफ्तारी के दौरान शुरू में तो तमाम मामलात ठीक चल रहे थे। फिर कोई मुल्की
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लेवल पे एक दो वाक्यात ऐसे हुए जिसमें इसको जो है वो इदारों ने इससे कांटेक्ट किया और इसने उस मामले में एक बहुत अहम किरदार अदा किया। मैं समझता हूं कि हम आप सब मिलके लोग मुल्क के लिए जो कुछ करते
Speaker A
हैं और इससे उस सरदार उज़ैर बलोच से एक ऐसा काम करवाया जा चुका है जो मैं समझता हूं कि मुल्क के लिए बहुत जरूरी था और वो एक कुर्बानी की तर्ज का है और यह शायद इसके सिले में यह
Speaker A
सारी चीजें इसको आने वाले दौर में मिलेगी। उज़ैर अली उर्फ़ उज़ैर जान बलोच की पूरी कहानी आपने जान ली। आपकी इसके मुतालिक क्या राय है और क्या आप लिया गैंग के मजीद किरदारों के बारे में जानना चाहते हैं?
Speaker A
हमें अपनी राय जरूर दीजिएगा।
Topics:उज़ैर बलोचरहमान डकैतअरशद पप्पूलियारी गैंगवारकराची अपराधपाकिस्तान राजनीतिगैंगस्टरपीपल्स पार्टीगैंगस्टर दस्तावेज़सत्ता संघर्ष











