शोएब खान की कराची अंडरवर्ल्ड में उठान और पतन की कहानी, जिसमें उसके अपराध, रिश्ते और गिरावट शामिल हैं।
Key Takeaways
- शोएब खान ने अपने दम पर कराची अंडरवर्ल्ड में अपनी जगह बनाई।
- उसके संबंध पुलिस और राजनीतिक दलों से थे, जिससे उसका प्रभाव बढ़ा।
- दोस्ती और दुश्मनी के बीच उसकी जिंदगी में कई उलझनें थीं।
- उसकी मौत ने कराची अंडरवर्ल्ड में एक नया दौर शुरू किया।
- शोएब खान की कहानी कराची की राजनीति और अपराध के गहरे संबंधों को दर्शाती है।
What the video covers
- शोएब खान कराची का एक मिडिल क्लास नौजवान था जो कराची अंडरवर्ल्ड का डॉन बना।
- उसने अपने दोस्त के लिए पहली बार कत्ल किया और बाद में अपने ही दोस्तों से दुश्मनी कर ली।
- शोएब खान का ताल्लुक दाऊद इब्राहिम से था और वह मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़ा था।
- उसने कराची में जुए, सट्टे और मनशियात के बड़े कारोबार को नियंत्रित किया।
- शोएब खान ने पुलिस, सियासतदानों और बिजनेसमैनों से गहरे संबंध बनाए।
- उसकी दोस्ती असलम नाथा से जेल में हुई, लेकिन बाद में उसने असलम नाथा का कत्ल करवा दिया।
- कराची में ऑपरेशन क्लीनअप के दौरान भी शोएब खान ने अपना अलग अंडरवर्ल्ड चलाया।
- शोएब खान की जिंदगी में कई राजनीतिक और क्रिमिनल घटनाएं शामिल थीं, जैसे एमक्यूएम से टकराव।
- उसकी गिरफ्तारी और जेल में मौत के बाद भी उसके प्रभाव और विवाद जारी रहे।
- वीडियो में शोएब खान के जीवन के विभिन्न पहलुओं और कराची के अंडरवर्ल्ड की जटिलताओं को विस्तार से बताया गया है।
Chapters
- 00:00शोएब खान का परिचय और कराची अंडरवर्ल्ड में शुरुआत
- 01:40शोएब खान की पहली हत्या और दोस्ती से दुश्मनी तक
- 03:00शोएब खान का बचपन और शुरुआती संघर्ष
- 04:20राजनीति और जुए के धंधे में शोएब खान की भूमिका
- 05:50असलम नाथा से दोस्ती और बाद में उसका कत्ल
- 07:20दाऊद इब्राहिम से संबंध और कराची में अंडरवर्ल्ड का विस्तार
- 08:40शोएब खान का पतन, गिरफ्तारी और जेल जीवन
- 10:00शोएब खान की मौत और उसके बाद की घटनाएं
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Speaker A
शोएब खान कराची अंडरवर का वो डॉन जिसने कराची के किंग अल्ताफ हुसैन को ललकारा। शोएब खान दाऊद इब्राहिम का पंटर कैसे बना?
Speaker A
दाऊद इब्राहिम टू कहलाने वाले ने बैंकॉक में छोटा राजन पर हमला कैसे कराया? पाकिस्तान के आर्मी चीफ ने उसकी गिरफ्तारी का हुक्म क्यों दिया? आईएसआई के चीफ ने शोएब खान को पकड़ने का टास्क किसको दिया?
Speaker A
[संगीत] चौधरी असलम अगर उसका दोस्त था तो फिर चौधरी असलम ने ही उसे हथकड़ी क्यों लगाई?
Speaker A
[संगीत] बड़े-बड़े काम करने वाला छोटी उम्र में ही कैसे मारा गया? इंकलाब पर आज हम बात कर रहे हैं कराची अंडरवर्ड डॉन शोएब खान की। एक मिडिल क्लास नौजवान जो अरबपति बन गया। वीडियो शुरू करने से पहले हमारे चैनल को
Speaker A
सब्सक्राइब कर लें और वीडियो को लाइक जरूर कर लें। तो चलिए चलते हैं 90 के कराची में। जहां एक तरफ ऑपरेशन क्लीन अप चल रहा था तो दूसरी तरफ जुए और मनशियात का गंदा धंधा। एमए जिना रोड पर एक वकील के दफ्तर में तीन
Speaker A
लोग जमा थे। खालिद शहंशाह, उसका दोस्त शोएब खान और उसका दुश्मन इकबाल नियाजी। खालिद शहंशाह और इकबाल नियाजी में तू तू मैंम हो गई। इकबाल नियाजी ने खालिद का गला दबोचा तो शोएब खान ने पिस्तौल निकाली और इकबाल को गोली मार दी। वो वहीं पर ढेर हो
Speaker A
गया। यह शोएब खान की जिंदगी का पहला कत्ल था जो उसने अपने दोस्त के लिए किया था। कराची के इस डॉन की पर्सनालिटी का यह दिलचस्प पहलू है कि एक वक्त था उसने अपने दोस्त खालिद शहंशाह का गला दबोचने वाले एक
Speaker A
अजनबी की जान ली। फिर एक वक्त आया कि उसने अपने दोस्त इब्राहिम भोलू को गला घोट कर मरवा दिया। तो यही खालिद शहंशाह उसका दुश्मन बन गया। वो अल्ताफ हुसैन की एमक्यूएम से नहीं डरता था। मगर लियारी गैंग वालों से बचने के लिए जेल में पनाह
Speaker A
ले ली थी। इस दिलचस्प किरदार की पूरी कहानी जानने के लिए आइए माज़ी का सफर करते हैं। 60 की दहाई में कराची में पैदा होने वाले शोएब खान के छह भाई और चार बहनें थीं। उसके वालिद अख्तर अली खान भी मुबयना तौर
Speaker A
पर जुए और सट्टे के धंधे में मुलव्विस थे। साबिक एसएसपी फयाज खान के मुताबिक डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल में जितने भी जुए के अड्डे थे, वह सब के सब शोएब खान के बाप के थे। अच्छा जो नहीं थे उसके तो वो भी शोएब
Speaker A
खान के बाप को भत्ता देते थे। शोएब खान का जो बाप था उसकी वजह से शोएब खान के जो ताल्लुकात थे पुलिस अफसरों से हो गए थे। उसके अपने बाप की वजह से। अच्छा जराय का कहना है कि शोएब खान के बाद में अपने बाप
Speaker A
से इख्तलाफात हो गए थे और इसी इख्तलाफ की वजह से इसने बाप के अपना जो धंधा या कारोबार या जो भी कह ले उसके साथ शामिल नहीं हुआ वो। उसने अपना अलग सेटअप बनाया और जो कुछ भी किया उसने अपने बलबूते पे
Speaker A
किया। कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। शोएब खान भी लड़कपन से ही गर्म दिमाग का मालिक और लड़ने भिड़ने वाला था। उसी वजह से ज्यादा तालीम भी हासिल नहीं कर सका। अच्छा गुस्से का वो
Speaker A
बहुत तेज था। बात बात पर उसका पारा चढ़ जाता था। वो यह नहीं देखता था कि कोई छोटा है, कोई बड़ा है। गली में खेलते हुए भी अगर किसी से झगड़ा हो जाए तो फौरन मारपीट पर गाल गलौज पर उतार आता था। यहां तक था
Speaker A
कि जब वो स्कूल जाता था और कोई टीचर उसको डांट दे तो वो टीचर से भी बदतमीजी करता था। तो इसका नतीजा यह हुआ कि लोग फिर उससे कतराने लगे, दूर हटने लगे और मतलब कुछ लोग उससे डरते भी थे।
Speaker A
80 की दहाई में जब अजीजाबाद में एमक्यूएम की सियासत का आगाज हो रहा था। नौजवान शोएब ने वही मोटरसाइकिलें किराए पर देने का काम शुरू किया और पुलिस के लिए मुखबरी भी करने लगा। उस जमाने में मोटरसाइकिलें इतनी आम नहीं
Speaker A
होती थी और चाइना की मोटरसाइकिलें उस वक्त तक नहीं आई थी। तो गली महलों में ऐसी दुकानें खुली हुई थी जो किराए पर मोटरसाइकिलें देती थी फी घंटे के हिसाब से। लेकिन यह काम आम आदमी नहीं कर सकता था
Speaker A
क्योंकि यह भी डर होता था कि भाई अगर जो कोई मोटरसाइकिल ले गया तो वो वापस ही ना आया या वो उसने कोई एक्सीडेंट कर दिया मोटरसाइकिल में कोई टूटफूट हो गई या वो किराया देने से इंकार कर देगा तो वसूली
Speaker A
कैसे होगी तो ये काम फिर वही लोग करते थे जिनके पुलिस वालों से ताल्लुकात हो या वो पुलिस वालों के भाई भतीजे हो तो शोएब खान के भी क्योंकि पुलिस से ताल्लुकात थे पहले से तो उसने ये काम किया उससे ताल्लुकात
Speaker A
मजीद बढ़ गए और यह भी कहा जाता है कि उसने फिर इलाके के लोगों की खबरें पुलिस तक पहुंचानी शुरू कर दी तो मोटरसाइकिलें मिलती थी शिनाख्ती कार्ड रखवाकर या किसी के रेफरेंस से कोई जानने वाला इलाके वाला
Speaker A
होता था तो उसी के रेफरेंस से वो मोटरसाइकिल मिलती थी। तो शोएब खान ये बहुत अरसे तक यह काम करता रहा। शोएब खान के पास हर पार्टी के लोग आते थे मगर उसका झुकाव पीपल्स पार्टी की तरफ था। खालिद शहंशाह से
Speaker A
उसकी गहरी दोस्ती थी जो पीपल्स पार्टी के तलबा तंजीम पीएसएफ और मिलिटेंट विंग अल जुल्फिकार वालों के बहुत करीब थे। खालिद शहंशाह बाद में बेनजीर भुट्टो के सिक्योरिटी इंचार्ज भी बने थे और 27 दिसंबर 2007 को बेनजीर के कत्ल के दिन भी
Speaker A
सिक्योरिटी की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी। खालिद शहंशाह करीमाबाद में रमी क्लब चलाते थे। रमी क्लब की आड़ में जुआ भी होता था। शोएब खान ने 1988 में खुद भी जुए के मैदान में कदम रखा तो उसे खालिद शहंशाह
Speaker A
की मदद हासिल थी। शोएब खान जुए का अड्डा तो चला रहा था मगर उससे वह खुश नहीं था। वो कुछ बड़ा करना चाहता था। डॉन बनना चाहता था। अपना धंधा बढ़ाने के लिए उसने पुलिस के आला अफसरों, बिजनेसमैनों,
Speaker A
सियासतदानों और दूसरे मशहूर लोगों से ताल्लुकात बढ़ाए। उनके लिए स्पेशल पार्टी के इंतजामात करता जहां शराब और शबाब की फरावानी होती। शोएब खान की गिरफ्तारी के बाद 2005 में जो उस वक्त के वज़रआला थे गुलाम अरबाब रहीम। उन्होंने दावा किया कि
Speaker A
शोएब खान के जो ताल्लुकात थे वो पुलिस के बड़े-बड़े अफसरों से थे। इसी तरह का इल्जाम जो उस वक्त के जो गवर्नर थे इशरतुल इबाग उन्होंने भी लगाया। उन्होंने भी तरफ इशारा किया था कि ऐसा है। मगर उन
Speaker A
ताल्लुकात के बावजूद शोएब खान के खिलाफ कत्ल, जुए, सट्टे, मनशियात बेचने जैसे इल्जाम में पर्चे दर्ज होते रहते और कभी हवालात तो कभी जेल में भी बंद होना पड़ता। जेल में ही उसकी मुलाकात असलम नाथा से हुई। एसएसपी फयाज़ खान के मुताबिक असलम
Speaker A
नाथा जुए का किंग कहलाता था। उसका सबसे बड़ा अड्डा लसबेला में था। जुए और सट्टे के साथ शराब, मनशियात फरोशी, भत्ताखोरी, इबाए तावान और कत्लो गारत के भी इल्जाम उसके ऊपर थे। फयाज़ खान के मुताबिक शहर के सारे क्रिमिनल और करप्ट पुलिस अफसर वगैरह
Speaker A
या तो असलम नाथा को जानते थे या असलम नाथा सबको जानता था। असलम नाथा फिल्म प्रोड्यूसर भी था और हुस्न परस्त भी। मुबईना तौर पर उस दौर की कई सुपर मॉडल्स, टीवी और थिएटर की अदाकाराएं उसकी एक कॉल
Speaker A
पर पहुंच जाती थीं। असलम नाथा ने मशहूर अदाकारा रूबी नियाजी से शादी भी कर ली थी। फिल्में बनाने वाले असलम नाथा और शोएब खान की जेल में दोस्ती भी बड़े फिल्मी अंदाज में हुई। तो असलम नाथा जैसे लोग जो उनके
Speaker A
जहां उनके हजारों दोस्त होते हैं वहां उनके हजारों दुश्मन भी होते हैं। ऐसे ही कुछ दुश्मनों ने जब असलम नाथा एक बार जेल में थे तो उन पर हमला करवाया। अब इत्तेफाक कहिए या किस्मत कि शोएब खान भी उन दिनों
Speaker A
जेल में था। तो उसने देखा कि असलम नाथा पर हमला हो रहा है तो उसने ना सिर्फ असलम नाथा को बचाया बल्कि उन लोगों को मारपीट कर पसपा कर दिया। अब असलम था तो तजुर्बकार आदमी था। उसकी नजरों ने भांप लिया कि शोएब
Speaker A
खान में दमखम है और जवान खून है। उनकी दोस्ती हो गई और जेल से निकलने के बाद ये दोस्ती गहरी होती चली गई। उसके बाद समझे कि शोएब खान उसका राइट हैंड बन गया। वो उसके छोटे-मोटे काम भी करता था और फिर
Speaker A
यहां तक एतमाद और क़ुर्बत बढ़ी कि असलम नाथा का एक अर्शी सिनेमा के पास एक जुए का अड्डा था। तो असलम नाथा ने उसका इंतजाम फिर शोएब खान के हवाले कर दिया था। एक और बड़ा अड्डा मिलने के बावजूद शोएब खान खुश
Speaker A
नहीं था। क्योंकि वो असल डॉन नहीं था। शहर में हुक्म और सिक्का अभी भी असलम नाथा का चलता था। शोएब खान खर दिमाग तो था ही। जल्द ही उसने अपने गॉड फादर असलम नाथा से उलझना शुरू कर दिया। नौबत यहां तक पहुंची
Speaker A
कि 13 जून 1995 को शोएब खान ने असलम नाथा को कत्ल करवा दिया। यह वो दौर था जब कराची में ऑपरेशन क्लीनअप जारी था और पुलिस की सारी तवज्जो एमक्यूएम के खिलाफ कार्रवाइयों पर थी। ऐसे में शोएब खान अपनी एक अलग दुनिया चला रहा था। उसका
Speaker A
ताल्लुक मुंबई अंडरवर के किंग दाऊद इब्राहिम से भी कायम हो चुका था। उसकी बात हम कुछ देर बाद करते हैं। पहले जरा शोएब खान के कराची अंडरवर्ड किंग बनने का जानते हैं। असलम नाथा के कत्ल के बाद जुए का जो
Speaker A
धंधा था उसमें एक बहुत बड़ी तब्दीली आई। हुआ यह था कि इंडिया के अंदर जो जुारी थे उन्होंने क्रिकेट मैचेस के अंदर जो है एक बुक मुतारिफ कराई थी। जल्द ही ये तरीका कराची में पहुंच गया और यहां मकबूल भी हो
Speaker A
गया और फिर यह कि यहां के जितने बड़े-बड़े जु्वारी थे उन्होंने इसको अपनाया और अपनी जो है क्रिकेट बुक मुतारिफ कराई। इस नए धंधे के जो कर्ताधर्ता थे वह कराची के अंडरवर वाले थे। उनकी सरपरस्ती की वजह से
Speaker A
जो क्रिकेट पर जुआ था एक बहुत बड़ी इंडस्ट्री बन गया था। तो इसका नतीजा यह हुआ कि शोएब खान और यह दूसरे जितने भी बड़े-बड़े जुआ चलाने वाले थे उन पर दौलत की बरसात होने लगी। उधर असलम नाथा के कत्ल
Speaker A
के बाद उसके दोस्त शोएब खान के दुश्मन भी बन चुके थे और उससे बदला लेना चाहते थे। उनमें से एक मनाफ परेडी भी थे जो पुलिस इंस्पेक्टर अब्दुल रसूल खानजादा के बेटे थे। उनके तीन
Speaker A
इदरीस परेड भी थे। यह चारों भाई अंडरवर और गैंग वॉर की लड़ाईयों में मारे गए। रेडी पुलिस लाइन में रहने वाले यह चारों भाई इतने खुदसर और ताकतवर थे कि एमक्यूएम के मिलिटेंट विंग वालों से भी भिड़ जाते थे।
Speaker A
साबिक एसएसपी फयाज़ खान के मुताबिक मनाफ प्रेड्डी का कत्ल शेब खान ने एमक्यूएम के ऐसे ही कारकुनों से करवाया था जो लायंस एररिया सेक्टर से ताल्लुक रखते थे। बाद में इदरीस प्रेड्डी खुद एमक्यूएम में शामिल हो गया और अपने भाई के कत्ल का बदला
Speaker A
लेने की कोशिश करने लगा। मगर इदरीस प्रेड और उसका दोस्त मोहम्मद अकबर 27 दिसंबर 1997 को मारे गए। उनके कत्ल का इल्जाम भी शोएब खान पर लगा। एक वक्त वो आया कि शोएब खान इतना ताकतवर हो गया कि उसके रास्ते
Speaker A
में कोई रुकावट नहीं रही थी। कोई भी अगर उसके रास्ते में आता तो या तो वो उसे खरीद लेता पैसों से या ताकत के बलबूते पर दबा लेता। अब जहां पुलिस वाले अपनी ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए कहते हैं कि उससे पैसे
Speaker A
लेते थे रिश्वत में देने के लिए। तो जब यहां यह हाल होता तो उसे रोकनेट टोकने वाला कौन होता। आइए अब जानते हैं कि शोएब खान का दाऊद इब्राहिम से ताल्लुक कैसे कायम हुआ। जैसा कि हमने बताया कि शोएब खान कराची में
Speaker A
जुए की बुकें चलाता था जिसके ताने-बाने दुबई में दाऊद इब्राहिम से मिलते थे। शोएब इससे पहले भी क्रिकेट पर सट्टा खिलाता था और मेमन जुवारियों से उसे दुबई में दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क का पता चला था। शोएब खान समझ गया कि अगर कराची अंडरवर्ड का
Speaker A
रियल डॉन बनना है तो दाऊद भाई से हाथ मिलाना होगा। अपना धंधा बढ़ाने के लिए वो 1992 में दुबई गया था। जहां एक दोस्त तौफीक मेमन ने उसे दाऊद इब्राहिम से मिलाया। दाऊद इब्राहिम की मुबयना आशीर्वाद से शोएब खान ने दुबई
Speaker A
में जुए का अड्डा भी खोल लिया था। जो 1997 में एक कत्ल तक चलता रहा। कत्ल हुआ था दाऊद इब्राहिम के एक कारिंदे इरफान गोगा का जिसने जुए में बहुत बड़ी रकम जीती थी। इरफान गोगा से झगड़े के बाद शोएब खान ने
Speaker A
उसे कत्ल कर दिया था। गोगा की लाश नहीं मिल सकी थी क्योंकि मुबईना तौर पर उसे तजाब के ड्रम में डाल दिया गया था। दुबई पुलिस ने उस कत्ल के इल्जाम में दाऊद इब्राहिम के करीबी साथी अनीस इब्राहिम को
Speaker A
1997 में हिरासत में लिया था। उन्हीं दिनों शोएब खान दुबई से फरार होकर मुस्तकिल तौर पर कराची आ गया। मगर दाऊद इब्राहिम से ताल्लुक बरकरार रहा। दाऊद इब्राहिम के ठाटबाट और उनके शाहाना अंदाज ने शोएब खान को बहुत मुतासिर किया था। वो
Speaker A
उनके जैसा ही बड़ा डॉन बनना चाहता था। इसीलिए कराची वापस आकर उसने जुए का एक बहुत बड़ा अड्डा हॉकी क्लब ऑफ पाकिस्तान में खोला। यह अड्डा भी रमी क्लब की आड़ में खोला गया था। उन दिनों में उम्मत
Speaker A
अखबार में था। तो जिस बिल्डिंग में उम्मत का अखबार था, उसी बिल्डिंग में एक रमी क्लब चलता था। अच्छा हमें यह तो पता था कि वहां एक रमी क्लब है। तो वहां पे लोग आते-जाते भी थे। अच्छा यह भी पता था कि यह
Speaker A
रमी क्लब है लाइसेंस याफ्ता है और यह लाइसेंस भी अंग्रेजों के दौर का है। हमने बहुत से वहां पे ऐसे लोगों को देखा इस हुलिए के और इस लिबास के और इस तरह के चालढाल वाले कि लग रहा था कि ये पुलिस
Speaker A
वाले हैं। तो वो वहां आते रहते थे। वो बहुत बाद में जाके पता चला कि यहां पर एक जुए का अड्डा था। अब जाहिर है वो इलाका बहुत हसास था और यहां पर मतलब किसी का दिमाग नहीं चाहता था कि यहां पे जुए का
Speaker A
अड्डा भी होगा। इदरीस प्रेड्डी के कत्ल के बाद एमक्यूएम से दुश्मनी के बावजूद सब सही चल रहा था कि एक वाक्य ने उसके लिए मुश्किलों के दरवाजे खोल दिए। वो वाक्या था इब्राहिम भोलू का कत्ल। पाकिस्तान से ताल्लुक रखने वाले इब्राहिम भोलू से शोएब
Speaker A
खान की दोस्ती दुबई में दाऊद इब्राहिम के जरिए ही हुई थी। तो इब्राहिम भोलू जो बाद में हाजी इब्राहिम भोलू कहलाए। उनका ताल्लुक बलदिया टाउन के पटनी मोहल्ले से था और वह एमकेएम के मशहूर कारकुन फारूक पटनी और फारूक दादा के कजिन थे। लेकिन वह
Speaker A
एमकेएम में शामिल नहीं हुए बल्कि कहते हैं कि वह पीएसएफ में शामिल थे और उसके मिलिटेंट विंग में थे। यह भी कहा जाता है कि बाद में इब्राहिम बोलू ने पीएसएफ से अलग होकर अपना अलग-अलग नेटवर्क बना लिया
Speaker A
था और फिर जुए, मनशियात और स्मगलिंग जैसे कामों में मुलविस हो गए थे। ऐसी मनशियात और सोने की स्मगलिंग की वजह से उनका नेटवर्क जो है वह जूनबी अफ्रीका और मोजबी तक फैल गया था। जूनबी अफ्रीका में उनकी
Speaker A
छोटा राजन गैंग के साथ लड़ाईयां होती थी और उस लड़ाई में दाऊद इब्राहिम जो है वह उनका साथ देते थे। इस तरह उनके दाऊद इब्राहिम से भी ताल्लुकात कायम हो गए थे। बीबीसी के एक रिपोर्ट के मुताबिक इब्राहिम
Speaker A
बोलू के पास इतना पैसा आ चुका था कि वह मोजांबीक में सदारती इंतखाबादत में पैसा खर्च करते थे और यह फैसला करते थे कि मोजांबक का सदर कौन होगा। 90ज के एंड में दाऊद इब्राहिम का एक साथी छोटा राजन उनसे
Speaker A
अलग होकर अपना गैंग कायम कर चुका था और उनके लिए खतरा बन चुका था। दाऊद ने मुबईना तौर पर शोएब खान से फरमाइश की कि छोटा राजन को ठिकाने लगाया जाए। छोटा राजन उन दिनों बैंकॉक में अपने करीबी
Speaker A
दोस्त रोहित वर्मा के साथ रहता था। शोएब खान ने उसके कत्ल की सुपारी इब्राहिम भोलू को दी। इब्राहिम भोलू के बंदों ने छोटा शकील के साथ मिलकर सितंबर 2000 में बैंकॉक में छोटा राजन पर हमला किया। उस हमले में राजन का दोस्त रोहित वर्मा और
Speaker A
उसकी बीवी मारे गए। मगर राजन बच गया। हमले की नाकामी पर मुबयना तौर पर दाऊद इब्राहिम और शोएब खान में तल्ख कलामी हुई। शोएब और इब्राहिम भोलू में भी झगड़ा हुआ जिसका नतीजा इब्राहिम भोलू के कत्ल की सूरत में
Speaker A
निकला। छोटा राजन पर हमला तो नाकाम हो गया लेकिन इब्राहिम भोलू जो है वो शोएब खान से मुसलसल पैसे मांग रहा था। वो कह रहा था मुझे $ लाख दिए जाए क्योंकि मेरा खर्चा हुआ है। तो शोएब खान जो था वो बड़ा परेशान
Speaker A
था। एक दिन उसने उसे फोन किया बुलाया कि यार मेरे घर आओ बैठते हैं बात करते हैं और मामला हल करते हैं। और फिर उसके बाद इब्राहिम बोलो का कुछ पता नहीं चला। गिजरी थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर के मुताबिक
Speaker A
खयाबाने गाजी पर रहने वाले इब्राहिम भोलू 8 जनवरी 2001 को खयाबाने शहर पर वाकई एक बंगले में गए और उसके बाद लापता हो गए। उनकी कार पुलिस को अगले दिन एयरपोर्ट की पार्किंग से मिली। बहरहाल इब्राहिम भोलू के भाई मोहम्मद युसूफ ने एफआईआर शोएब खान
Speaker A
के खिलाफ दर्ज कराई। शोएब खान के नाकाबिले जमानत वारंट गिरफ्तारी जारी हुए। हाईकोर्ट ने यह वारंट खत्म कर दिए। उस जमाने में शोएब खान के पावर का यह आलम था कि डॉन जैसा अखबार भी उन्हें डॉन नहीं बल्कि
Speaker A
बिजनेसमैन लिखता था। कानून का हाथ तो उस वक्त तक शोएब खान तक नहीं पहुंच सका मगर इब्राहिम भोलू का राइट हैंड मंजर उसकी ताक में था। इब्राहिम भोलू जब कत्ल हो गया तो फिर उसके उसका जो गैंग है उसका बंदा मंजर
Speaker A
चलाने लगा। अब इब्राहिम भोलू का जो गैंग था यह भी एक ताकतवर गैंग था और कहा जाता है कि उसके ताल्लुकात बीएसएफ और पीपल्स पार्टी के रहनुमाओं से थे और वह भी पुलिस वालों का इतना ही ख्याल रखता था जितना
Speaker A
शोएब खान रखता था। शोएब खान पर मुतादिद केस चल रहे थे तो उसे कोर्ट वगैरह ले जाया जाता था तो यह डर होता था कि इब्राहिम भोलू का गैंग जो है वह उस पर हमला करेगा। तो इसलिए उसके अपने शोएब खान के अपने बंदे
Speaker A
और पुलिस वाले उसकी सिक्योरिटी पर मामूर थे। यह वो वक्त था जब खालिद शहंशाह भी इससे नाराज हो गया था शोएब खान से तो इसके लिए खतरात जो है वो बढ़ते जा रहे थे। शोएब खान को जान का खतरा महसूस होने लगा तो
Speaker A
उसने अपने जानने वाले रेंजर्स अफसरों से सिक्योरिटी मांगी जो उसके दोस्तों ने उसे दे दी। 21 फरवरी 2001 को वो जमानत बढ़वाने के लिए सिटी कोर्ट आया। उसके साथ मुसल्ला कारिंदे और रेंजर्स के अहलकार भी थे। मगर उनसे पहले वहां भोलू गैंग के बंदे पहुंच
Speaker A
गए थे। जैसे ही शोएब खान कोर्ट के अहाते में दाखिल हुआ, भोलू गैंग वालों ने फायरिंग कर दी। शोएब के कारिंदों, रेंजर्स अहलकारों ने भी जवाबी फायरिंग की। उस हमले में शोएब खान तो बच गया। मगर कई अफराद जख्मी हो गए। बाद
Speaker A
में उन रेंजर्स अफसरों का कोर्ट मार्शल भी हुआ और उन्हें फोर्स से निकाल दिया गया। जिन्होंने शोएब को सिक्योरिटी दी थी। यह सब होने के बाद शोएब खान को अंदाजा हो गया कि शहर में उसके लिए हर तरफ खतरा है
Speaker A
क्योंकि मुखालिफिन ज्यादा हैं। उसने सोचा कि इस वक्त कराची और दुबई के बजाय सबसे महफूज़ मकाम जेल होगी। जहां हर वक्त सिक्योरिटी दस्तियाब होगी। इस प्लान के तहत उसने 14 जून 2001 को पुलिस को गिरफ्तारी दे दी। शोएब खान की स्टोरी में
Speaker A
यहां एंट्री होती है लियारी गैंग वॉर के सबसे अहम किरदार रहमान बलोच उर्फ़ रहमान डकैत की। गिरफ्तारी के बाद शोएब खान को कराची सेंट्रल जेल में नहीं रखा गया था क्योंकि वहां उसके मुखालफीन थे और यह खतरा था कि जेल में भी उस पर हमला हो सकता है।
Speaker A
इसलिए शोएब खान को लांडी जेल में मुंतकिल किया गया था। इस दौरान इब्राहिम भोलू का केस इंसजादे दहशतगर्दी की अदालत में मुंतकिल हो गया जो सुल्तानाबाद में थी। शोएब खान को पुलिस के मोबाइल में पेशी पर लाया जाता था। उधर भोलू गैंग ने शोएब खान
Speaker A
के कत्ल की सुपारी ₹ करोड़ में रहमान बलोच को दे दी थी। 2 करोड़ उस जमाने में बहुत बड़ी रकम थी। आज के तकरीबन ₹20 करोड़ समझ लें। जिसमें से ₹1 करोड़ अदा कर दिए गए थे और ₹1 करोड़ बाद में मिलने थे। रहमान डकैत
Speaker A
और उसके साथियों ने 25 अगस्त 2001 को शोएब खान पर कातिलाना हमला किया। शोएब खान को एंटी टेररिस्ट कोर्ट से लांडी जेल ले जाया जा रहा था। पुलिस मोबाइल में था तो पुलिस मोबाइल जैसे ही मल में मलूक होटल के पास
Speaker A
पहुंची तो वहां पर रहमान बलोच और उसके साथी पहले ही घात लगाए खड़े थे। पुल पर चढ़ने के लिए गाड़ी जैसे ही स्लो हुई रहमान बलोच और उसके साथियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी। फायरिंग से चार पुलिस अहलकार जो है वह शहीद हो गए। उनमें एक सब
Speaker A
इंस्पेक्टर गुलाम दस्तगीर भी था। शोएब खान की खुशकिस्मती यह हुई कि वो फायरिंग से जख्मी तो हुआ लेकिन मरा नहीं और रहमान बलोच और उसके साथी फरार हो गया। उस हमले के बाद शोएब खान को मेडिकल बुनियाद पर
Speaker A
जमानत मिल गई। शोएब ने अब अपनी सिक्योरिटी भी बढ़ा ली और बाहर निकलना बहुत कम कर दिया था क्योंकि अब मुखालिफिन बहुत बढ़ गए थे। भोलू के कत्ल के बाद खालिद शहंशाह भी शोएब के खिलाफ हो चुके थे। 21 अप्रैल 2003
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को शोएब खान के राइट हैंड करीम खान उर्फ़ केके को कत्ल कर दिया गया। उन्हें सदर के इलाके सर्वर शहीद रोड पर वाकई उनके अपार्टमेंट में निशाना बनाया गया। करीम खान के बेटे अज़ीम खान ने बाप के कत्ल की
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एफआईआर खालिद शहंशाह के खिलाफ दर्ज कराई। अजीम के मुताबिक खालिद शहंशाह ने उसके वालिद को कत्ल की धमकियां दी थी। इन हालात के बावजूद शोएब खान ने अपना धंधा जारी रखा बल्कि उसने जमीनों पर कब्जे भी शुरू कर
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दिए और ऐसे ही एक मामले में पीपल्स पार्टी के रहनुमा मुनववर सोहरवर्दी तक से टक्कर ले ली। पीपल्स पार्टी के रहनुमा मुनववर सोहरवर्दी बेनजीर भुट्टो के करीबी और बतमाज साथी थे। वो उन्हें अपना छोटा भाई करार दिया करती थी। तो कोई यह सोच भी नहीं
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सकता था कि जो शोएब खान है वो मुनववर सोहरवर्दी से टकरा जाएगा। शोएब खान का जो जमीन का झगड़ा है वह तो अपनी जगह था। लेकिन उसे यह शिकायत भी थी कि मुनवर सौरवर्दी जो मुबईना तौर पर खालिद शहंशाह
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और भोलू गैंग की हिमायत करते थे। साबिक एसएसपी फयाज़ खान के मुताबिक शोएब खान ने फिर अल जुल्फिकार के कुछ लोगों को इनकी सुपारी दी थी मुनवर सौरवर्दी की। इसके बदले में शोएब खान ने उनसे वादा किया था
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कि वो इंस्पेक्टर जीशान काजमी को कत्ल करा देगा। असल में जो अलफिकार के जो आशिक कोसो नियास कोसो वगैरह थे यह समझते थे कि अली सुनारा की गिरफ्तारी और बाद में इनके कत्ल में इंस्पेक्टर जीशान काजमी मुलविस हैं।
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तो शोएब खान ने पहले अपना वादा पूरा करते हुए इंस्पेक्टर ईशान काजमी के कत्ल का उन्हें मौका दिया और बाद में उसके एहसान का बदला उतारने के लिए आशिक खोसो नियाज खोसो मुनवर सरवर्दी को कत्ल कर दिया। एमकेएम के खिलाफ 92 के ऑपरेशन के बाद जो
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पुलिस अहलकार नुमाया हुए थे उनमें चौधरी असलम रा अनवार इंस्पेक्टर बहादुर अली के साथ-साथ इंस्पेक्टर जीशान काजमी भी शामिल थे। मंगल 14 अक्टूबर 2003 को जीशान काजमी की लाश पी ईसीएचएस में खालिद बिन वलीद रोड से मिली। पहले उंगलियां एमकेएम के असरियत
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पसंदों पर उठी। बाद में गिरफ्तार होने वाले मुलजिमों से पता चला कि इंस्पेक्टर जीशान काजमी को शोएब खान ने अपने डिफेंस वाले घर बुलाया था और फिर धोखे से अस जुल्फिकार के आशिक खोसो और नियाज खोसो के हवाले कर दिया था। उन्होंने जीशान काजमी
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को कत्ल करके लाश सड़क पर फेंक दी थी। उसके बाद आशिक और नियाज ने अपना वादा पूरा करते हुए 17 जून 2004 को मुनववर सोहरवर्दी को कत्ल कर दिया। बेनजीर भुट्टो उन दिनों जिला वतन थी और आसिफ जरदारी जेल में। आसिफ
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जरदारी ने कत्ल का इल्जाम हुकूमत पर लगाते हुए कहा था कि यह बेनजीर को पैगाम दिया गया है कि वह वतन वापस ना आए। उन दिनों मुशरफ की गवर्नमेंट थी और एमक्यूएम भी मुशरफ की इत्तहादी बन चुकी थी। सुबाई
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हुकूमत में भी एमक्यूएम हिस्सेदार थी। शोएब खान के सियासी और पेशावराना मुखालफिन बढ़ने के बाद भी वो बेखौफी से काम जारी रखे हुए था क्योंकि उसे भी पुलिस के आला अफसरान की मुबईना सरपरस्ती हासिल थी। यही वजह है कि उसके खिलाफ 15 से ज्यादा
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मुकदमात तो दर्ज थे मगर कोई ठोस कारवाई नहीं हुई थी। साबिक गवर्नर इशतुल इबाद ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि जब हमने शहर में जुए, सट्टे, भत्ते और दूसरे जरा के खिलाफ कारवाई करनी चाही तो पता चला कि
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पुलिस शोएब खान के खिलाफ सरकारी अहकामात सुन लेती है मगर अमल नहीं करती। मगर इस कहानी का एक और रुख भी है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक शोएब खान पैसे के बल पर पुलिस अफसरान की पोस्टिंग और ट्रांसफर तक करवा सकते थे। एक अफसर की
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पोस्टिंग के लिए उन्होंने गवर्नर सिंध इशतु इबाद के एक रिश्तेदार को ₹ लाख दिए थे। मगर पोस्टिंग नहीं हुई तो शेब खान की इशतु इबाद से तल्खी हो गई थी। जिसके बाद उनके गिर्द घेरा तंग करने का फैसला किया
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गया। इशु इबाद ने पैसे लेने के इल्जाम को सख्ती से मुस्तरद कर दिया था। उधर एक सियासतदान ने यह भी दावा किया था कि मुताहिदा कौमी मूवमेंट के मिलिटेंट विंग के नाराज कारकुन चाहे वह बाहर हो या जेल
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में बंद वो सब ही शोएब खान के लिए काम करने लगे थे। यही वजह थी कि एमकेएम के कायद अल्ताफ हुसैन उनसे सख्त नाराज थे। उर्दू पॉइंट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि शोएब खान की जानिब से सुलह की पेशकश भी
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की गई थी। उनका यह पैगाम लंदन भेजा गया था। मगर वहां से इंकार हो गया था। सिंध के उस वक्त के गवर्नर इशुल इबाद ने शोएब खान की गिरफ्तारी में मरकजी किरदार अदा किया। उन्होंने बीबीसी को बताया कि शोएब खान को
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पकड़ने के लिए उन्होंने और आईजी ने एक आला अफसर को टास्क दिया। मगर उस पर अमल नहीं हुआ। इशद इबाद के मुताबिक उन्होंने इस सुरते हाल के बाद सदर जनरल परवेज मुशर्रफ से मुलाकात की और वाज़ किया कि जराइम पेशा
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नासिर के खिलाफ कारवाई में सबसे बड़ी रुकावट यह तासुर है कि उन्हें रियासती सरपरस्ती हासिल है। जनरल मुशर्रफ ने इस तासुर के खात्मे की हिदायत दी। जिसके बाद आईएसआई के सरबरा जनरल एहसान उल हक को कराची भेजा गया। वहां वाज़ पैगाम दिया गया
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कि किसी को भी रियासत की पुशपनाही हासिल नहीं और जरा में मुलवज़ हर शख्स के खिलाफ बिला इम्तियाज कारवाई होगी। उसके बाद हुकूमत सिंध और कानून नाफिज़ करने वाले इदारों को मुकम्मल फ्री हैंड मिला और सिस्टम ने भरपूर कार्रवाई शुरू कर दी।
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शोएब खान की गिरफ्तारी के लिए सिंध पुलिस के एक और मशहूर या बदनाम किरदार चौधरी असलम को टास्क दिया गया। वह उन दिनों डीएसपी थे, मगर उनकी कहीं पोस्टिंग नहीं थी। उनके साथ टीम में उस वक्त के डीएसपी
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बहादुर अली को भी शामिल किया गया। शोएब खान उस वक्त तक ग्रुपश हो चुका था। किसी को नहीं मालूम कि वो कराची में था या मुल्क से बाहर। उसके जितने मोबाइल नंबर सिक्योरिटी इदारों के पास थे, वह सब बंद
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थे। जराय के मुताबिक वो लाहौर मुंतकिल हो गया और लाहौर कैंट के इलाके फोर्ट्रेस स्टेडियम के करीब एक सरकारी अफसर के बंगले में रह रहा था। लाहौर में कोई नहीं जानता था कि वह कराची का बदनाम डॉन है। उस जमाने
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में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो आ चुका था मगर शोएब खान की गिरफ्तारी के लिए ऐसी कोई मुहिम नहीं चलाई गई थी कि उसे लाहौर में लोग पहचान लेते। बहरहाल एक दिन उसने कराची में अपने एक अड्डे के मैनेजर को 2.5 मिनट
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कॉल की जिससे उसकी लोकेशन ट्रेस हो गई। सिंध के गवर्नर और आईजी ने चौधरी असलम और इरफान बहादुर वगैरह को रवाना किया। 27 दिसंबर 2004 को होने वाली इस गिरफ्तारी के मुतालिक दो कहानियां हैं। एक यह के कंटोनमेंट के मजाज अफसर की इजाजत से उसे
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कंटोनमेंट के अंदर ही गिरफ्तार किया गया था। दूसरी कहानी यह है कि उसका बाहर इंतजार किया गया। और जब वो बाहर आया तब उसे पकड़ा गया। कहते हैं कि चौधरी असलम की भी शोएब खान से गहरी दोस्ती थी। मगर जब
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उसकी गिरफ्तारी का टास्क उन्हें मिला तो फिर उन्होंने कोई रियायत नहीं की और चौधरी असलम और इरफान बहादुर ये दोनों उसे लाहौर से अपनी गाड़ी में लेकर आए थे। कराची अंडरवर का किंग कराची का डॉन कराची सेंट्रल जेल पहुंचा दिया गया। उसे वक्तन
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फवक्तन अदालत में पेश करके उसका रिमांड लिया जाता रहा। 13 जनवरी 2005 को उसकी निशानानदेही पर गुलबर्ग कब्रिस्तान में खुदाई करके इब्राहिम भोलू की वाक्यात भी बरामद की गई। बहरहाल उसकी गिरफ्तारी को एक महीना भी नहीं गुजरा था कि 26 और 27 जनवरी 2005 की
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दरमियानी रात जेल हुकाम ने दावा किया कि शोएब खान दिल का दौरा पड़ने से इंतकाल कर गया। जेल के उस वक्त के डिप्टी सुपरिटेंडेंट अमानुल्लाह नियाजी का दावा था कि शोएब खान दो दिन से बीमार था और जेल
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के अस्पताल में ज़रे इलाज था। तबीयत बिगड़ने पर उसे रात 3:00 बजे एनआईसीवीडी ले जाया जा रहा था कि रास्ते में दम तोड़ गया। डॉन की 28 जनवरी 2005 की रिपोर्ट के मुताबिक शोएब खान की लाश पोस्टमार्टम के
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लिए मुर्दाखाने मुंतकिल की गई। मगर कानूनी पेचीदगियों के बायस कारवाई ना हो सकी। हत्ता के लाश डीकंपोज होने यानी सड़ने लगी थी। उसका पोस्टमार्टम तकरीबन 24 घंटे बाद हुआ था। शोएब के अहलेखाना का इल्जाम था कि उसे जहर देकर हलाक किया गया। उन्होंने
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न्यूट्रल इंक्वायरी का भी मुतालबा किया था। शोएब खान के अहलेखाना ने तो ये शक जाहिर किया कि उसे जहर दिया गया। मगर एक सीनियर क्राइम रिपोर्टर ने हमें बताया कि मुबईना तौर पर जेल में उसके हाथ और पांव
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कुर्सी से बांध दिए गए। फिर दो लोगों ने उसे पकड़ा और उसकी नाक में प्लास्टिक की नलकियां लगा दी गई थी और मुंह पे भी पट्टी बांध दी गई थी और उस वो जो नलकियां हैं वो पानी की बाल्टी में रख दी गई। तो उसने जब
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सांस लिया तो वो सारा पानी उसके फेफड़ों में गया और कुछ देर में उसकी मौत वाक्य हो गई। अब वला आलम यह कितना सच है। मुहाजिर कौमी मूवमेंट के सरबरा अफाक अहमद भी उन दिनों जेल में थे। उन्होंने बीबीसी से
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गुफ्तगू करते हुए कहा था कि एमकेएम के मिलिटेंट विंग के लोग पार्टी से इख्तलाफात कर रहे थे। उन्हें एमक्यूएम से निकाला जाता था तो शोएब खान उन्हें अपने साथ शामिल कर लेता था। इस पर मुतहिदा ने जेल हुकाम से शोएब को कत्ल करने की फरमाइश की
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और इस फरमाइश पर जेल अफसरान पीर शब्बीर और अमानुल्ला नियाजी आपस में लड़ पड़े कि यह काम हम कर देंगे। उस वक्त के वज़र दाखला और एमकेएम के रहनुमा रऊफ सिद्दीकी से राब्ता किया गया तो उन्होंने इस इल्जाम को
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बेबुनियाद करार देते हुए कहा कि शोएब खान के भाइयों ने तो मुझसे मुलाकात भी की थी। उन्होंने तो मुझसे ऐसा कुछ नहीं कहा। अफाक के इल्जामात सिर्फ कहानियां हैं। साबिक गवर्नर सिंह इशरतुल इबाद ने भी अफाक अहमद के मौके पर अपनी राय देते हुए कहा कि यह
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सब कहानियां हैं। अगर शोएब खान को मारना ही होता तो गिरफ्तारी के बाद रास्ते में मार सकते थे। इतना लंबा मामला क्यों रखते?
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शोएब खान की पुरसरार मौत पर अब तक पर्दे पड़े हैं। मगर शोएब की कहानी उन नौजवानों के लिए जरूर सबक है जिनकी आंखों और अकल पर दौलत की हवस पर्दे डाल देती है। पैसे की चमक के पीछे जो अंधेरे रास्तों पर चल
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पड़ते हैं और फिर तारीख राहों या तारीख रातों में मारे जाते हैं। दोस्तों, आपको यह वीडियो कैसी लगी और शेब खान के मुतालिक आपकी क्या राय है? हमें कमेंट में बताना बिल्कुल मत भूलिएगा।
Topics:शोएब खानकराची अंडरवर्ल्डदाऊद इब्राहिमएमक्यूएमअसलम नाथाजुआसट्टाकराचीऑपरेशन क्लीनअपपाकिस्तान











