Speaker A
एक शख्स जिसकी आवाज़ पर कराची की सड़कें वीरान हो जाती थीं और दूसरा जिसके नाम पर लाखों का समंदर सड़कों पर उमड़ आता था। [संगीत] एक की पतंग बुलंदियों पर थी। मजलूमों का साथी है अल्ताफ। तो दूसरे का बल्ला हर गेंद पर मार रहा था। [संगीत] एक को कायदे तैरीक कहा गया तो दूसरा कप्तान कहलाया। दोनों वन मैन शो थे। लेकिन नौजवानों में मकबूल थे। दोनों खुद परस्त थे लेकिन ताकतवरों के लाडले थे। एक का ठिकाना बनी काला था तो दूसरे का नाइंजीर। एक ने हुकूक की बात की तो दूसरे ने तब्दीली के ख्वाब दिखाए। लेकिन फिर वही रियासत, वही ताकत, वही निजाम, एक अल्ताफ हुसैन से बनी एमकेएम बन गया तो दूसरा इमरान खान से बनी पीटीआई कहलाने लगा। यह कहानी है उन दो मकबूल तरीन सियासी लीडरों की जो हर वक्त मीडिया पर छाए रहते थे। और आज यही मीडिया उनका नाम लेने तक से कतराता है। आज की इस वीडियो में हम बात करेंगे अल्ताफ हुसैन और इमरान खान की। जिनकी सियासत का अंदाज अगरचा अलग-अलग हो मगर अंजाम शायद एक जैसा हो रहा है। दोनों ने रिकॉर्ड तोड़ मकबूलियत हासिल की लेकिन फिर दोनों ने एक जैसी गलती की। वो आउट ऑफ कंट्रोल हो गए। अब एक लंदन के घर में तन्हा हो गया तो दूसरा अडियाला जेल की कोठरी में कैद। आपसे गुजारिश है कि हमारे चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लें और वीडियो पसंद आए तो उसे लाइक और शेयर करना मत भूलिएगा। एमकेएम ने जब आंख खोली तो उस वक्त मुल्क पर वडेरा शाही और जागीरदाराना निजाम की हुक्मरानी थी। अल्ताफ हुसैन ने इस हुक्मरानी को न सिर्फ ललकारा बल्कि उसके खिलाफ बगावत का परचम लहरा दिया। उन्होंने महाजिरों के हुकूक का नारा लगाया और सियासत के एक ऐसे मैदान में उतर गए जहां कामयाबी उनके इंतजार में बैठी हुई थी। दूसरी तरफ जब इमरान खान ने पीटीआई बनाने का ऐलान किया तो यह वह दौर था जब कभी पीपल्स पार्टी की हुकूमत होती थी तो कभी नून लीग की। इमरान खान उन दोनों के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए। का नाम व्याया का नस्ताईन आपने किसी इंसान के सामने नहीं झुकना। बाद में ही सही लेकिन कामयाबी उन्हें भी मिली। इमरान अहमद नयाजी साहब ने 176 वोट हासिल किए। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक बड़ी सिमिलरिटी यह थी कि उन्होंने मुल्क में स्टेटस को के खिलाफ बगावत की और लोग उनकी तरफ खींचे चले आए। दोनों में एक और चीज भी मिलती जुलती थी वो यह कि दोनों ही मौरूसी सियासत के खिलाफ थे। [संगीत] और सिर्फ जबानी दावों से नहीं दोनों ने प्रैक्टिकली यह साबित भी किया। दोनों ने कभी अपने किसी रिश्तेदार को किसी ओदे पर नहीं बिठाया। अल्ताफ हुसैन तो सिर्फ अपनी पार्टी के कायद बने रहे। कोई सियासी या तंजीमी ओदा हो या फिर काउंसलर, असेंबली, [संगीत] सेनेट, मेयर और गवर्नर की सीट। ना कभी खुद इस पर बैठे और ना कभी अपने रिश्तेदार को बिठाया। सिर्फ एक बार कुछ अरसे के लिए उनके ससुर फैसल कबूल मुशीर वज़ीर आला सिंध रहे। लेकिन उन्हें भी जल्द हटा दिया गया था। सियासत में बिल्कुल यही रवैया इमरान खान का भी था। वो खुद तो वज़ीर-ए-आज़म के ओदे तक पहुंचे। मगर अपने किसी रिश्तेदार को किसी सियासी या सरकारी ओदे के लिए नॉमिनेट नहीं किया। उनकी बहन अलीमा खान भाई की गिरफ्तारी के बाद जद्दोजहद करती नजर आ रही हैं। मगर उनके पास भी पार्टी का कोई ओदा नहीं है। एक नजर दोनों पार्टियों के उरूज पर डालते हैं। एमकेएम बनने के फौरन बाद ही मकबूल हो गई थी। सिर्फ 4 साल बाद ही वो इतनी पॉपुलर हो चुकी थी कि 1988 के जनरल इलेक्शन में मुल्क की तीसरी बड़ी सियासी कुत बनकर उभरी। 2013 के इलेक्शन में तीसरी बड़ी सियासी कुत बनने का एजाज पीटीआई को भी मिला। यह अलग बात है कि इसे यहां तक पहुंचने में 17 साल लगे। पीटीआई की तीसरी कुत बनने के बाद एमक्यूएम चौथे पायदान पर चली गई। कहा जाता है कि इन दोनों जमातों को एक लंबे अरसे तक इस्टैब्लिशमेंट की आशीर्वाद हासिल थी। भुट्टो की फांसी के बाद उस वक्त के आमिर जियाउल हक को एक ऐसी ताकत की जरूरत थी जो सिंध में पीपल्स पार्टी का जोर तोड़ सके। उसके लिए उन्होंने मुबईना तौर पर एमकेएम को फ्री हैंड दिया। नतीजा यह निकला कि एमकेएम जल्द ही सिंध के शहरी इलाकों की मकबूल जमात बन गई। जियाउल हक के बाद 2002 में एक और आमिर जनरल परवेज मुशरफ ने तो एमकेएम के सर पर बकायदा हाथ रख दिया। मुशर्रफ का दौर तो एमकेएम के लिए गोल्डन पीरियड था। ऐसा ही सीन पीटीआई के साथ भी था। कहा जाता है कि इमरान खान शुरू से ही इस्टैब्लिशमेंट के फेवरेट थे। लेकिन 2010 तक हाथ हल्का रखा गया था। 2011 इमरान खान के उरूज का साल साबित हुआ। पीटीआई के जलसे अचानक भरे जाने लगे। खुर्शीद महमूद कुसूरी, शाह महमूद कुरैशी, जावेद हाशमी, बाबर अवान, फिरदौस आशिक अवान और ओवैस लारी जैसे नाम पीटीआई की कश्ती में सवार होने लगे। लोग साथ आते गए और कारवा बनता गया। बढ़ता गया। अक्टूबर 2011 की लाहौर और दिसंबर 2011 की कराची के अजीमो शान जलसों ने सबको हिला कर रख दिया। आज कराची वालों आपको बहुत मुबारक हो। यह सब मुबयना तौर पर ऊपर वालों के आशीर्वाद का रिजल्ट था। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान में एक मुशाबत यह भी थी कि दोनों को मीडिया ने खूब कवरेज दी। लेकिन दोनों को मीडिया से शिकायतें भी थीं। एमकेएम जब बनी तो शुरू में तो किसी अखबार ने इसे लिफ्ट नहीं कराई। लेकिन जब 8 अगस्त 1986 के नश्तर पार्क जलसे में अल्ताफ हुसैन ने अपनी पावर शो की तो अखबारात ने फौरन उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया। धड़ाधड़ उनकी जमात की खबरें छपने लगीं। फिर 1987 के बलियाती इलेक्शन में एमपीएम ने कराची और हैदराबाद में क्लीन स्वीप किया और 1988 के आम इंतखाबादत के बाद जब वो मुल्क की तीसरी बड़ी ताकत बनकर उभरी तो उसके बाद तो अल्ताफ हुसैन मीडिया पर छा गए। लेकिन उन्हें फिर भी अखबारात से शिकवा रहा कि वो एमकेएम की ठीक से कवरेज नहीं करते। इस इल्जाम पर उन्होंने नववें की दहाई में रोजनामा जंग का बॉयकॉट कर दिया था। इस बॉयकॉट के बाद शहर में जगह-जगह जंग से नफरत, अमन से मोहब्बत की वॉल चौकिंग भी की गई थी। दूसरी तरफ सहाफियों की भी एमपीएम की तरफ से जब्र, धौंस, धमकी और तशद्दुद की शिकायतें सामने आने लगीं। अल्ताफ हुसैन की तरह इमरान खान को भी मीडिया ने शुरू में इग्नोर किया। लेकिन फिर 2011 में वो वक्त भी आया जब न्यूज़ चैनलों ने भी उनकी मकबूलियत बढ़ाने में साथ दिया और फिर उनकी मकबूलियत को खूब कैश भी किया। न्यूज़ चैनलों पर इमरान खान की शोहरत को प्रोडक्ट की तरह बेचा जाने लगा। लेकिन जिस तरह अल्ताफ हुसैन को मीडिया से शिकायतें थीं, ठीक उसी तरह के शिकवे इमरान खान को भी मीडिया से थे। 2014 में इमरान खान ने रोजनामा जंग और Jio न्यूज़ का बॉयकॉट कर दिया। इल्जाम लगाया कि जंग और Jio ने 2013 के जनरल इलेक्शन में मुबईना धांधली में किरदार अदा किया था। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान दोनों एक ही कश्ती के सवार थे। दोनों के पास शोहरत थी। वोट बैंक था। मीडिया की सपोर्ट थी। सर पर ऊपर वालों का हाथ था। ऐसे में अचानक दोनों एक जैसी गलती कर बैठे। 22 अगस्त 2016 को कराची प्रेस क्लब के बाहर एमकेएम के कारकुन एतेजाज कर रहे थे। अल्ताफ हुसैन ने इन एतजाज करने वाले कारकुनों से टेलीफोनिक खिताब किया। लेकिन यह खिताब उनके मुस्तकबिल के लिए खुदकुश हमला साबित हुआ। उन्होंने इस खिताब में रियासत के खिलाफ ऐसी-ऐसी बातें कीं कि इदारे इसका सख्त नोटिस लेने पर मजबूर हो गए। उसकी तफसील आप हमारी इस वीडियो में देख सकते हैं। बहरहाल अल्ताफ हुसैन की इस कंट्रोवर्शियल तकरीर पर सख्त एक्शन हुआ। 90 को सील कर दिया गया। यूनिट और सेक्टर ऑफिसों को गैरकानूनी और कब्जा कह कर सफाया कर दिया गया। एमकेएम के दफ्तरों पर ताले लगा दिए गए। कई कारकुनों को गिरफ्तार कर लिया गया। अगले रोज यानी 23 अगस्त को डॉक्टर फारूक सत्तार ने एमकेएम से अल्ताफ हुसैन को माइनस करने का ऐलान कर दिया। अल्ताफ हुसैन साहब से हमारा मुकम्मल कतह ताल्लुक है। यूं एमकेएम तो बच गई लेकिन अल्ताफ हुसैन की सियासत रूल बैक हो गई। अल्ताफ हुसैन एमकेएम के कायद से एकदम बानी एमकेएम बन गए। मीडिया पर उनका नाम लेना या उनकी तस्वीर दिखाने तक पर गैर ऐलानिया पाबंदी लग गई। एमकेएम के सारे मरकजी रहनुमाओं ने अल्ताफ हुसैन से दामन छुड़ा लिया। 10 साल हो गए मगर अल्ताफ हुसैन से ताल्लुक रखने वाले किसी भी शख्स को पाकिस्तान में पॉलिटिकल एक्टिविटी की इजाजत नहीं। ठीक उसी तरह 9 मई 2023 पीटीआई के ज़वाल का दिन बन गया। उस रोज इमरान खान को अलकादिर ट्रस्ट केस में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार करके इमरान खान को गाड़ी ले गई है। जी। गिरफ्तारी की खबर फैलते ही पीटीआई के कारकुन एतजाज करते हुए सड़कों पर निकल आए। कई शहरों में पुर ततशद्दुद मुजायरे हुए। मुख्तलिफ सरकारी और अस्करी तसीबात पर हमले किए गए। तोड़फोड़ और आग लगाने जैसे वाक्यात हुए। हुकूमत और इदारों ने इसे कौमी सलामती पर हमला करार दिया और उसका जिम्मेदार इमरान खान को करार दिया गया। पीटीआई के रहनुमाओं और कारकुनों की बड़ी तादाद में पकड़-धकड़ शुरू हो गई। कई रहनुमाओं ने तो पार्टी से अलग होकर सियासत ही छोड़ दी। इमरान खान भी चेयरमैन पीटीआई से बानी पीटीआई बन गए। अल्ताफ हुसैन और इमरान खान दोनों की पार्टियों को तोड़ने की कोशिश भी की गई। यह अलग बात है कि ये कोशिशें नाकाम साबित हुईं। हुआ यह कि 1992 के ऑपरेशन से कुछ पहले एमकेएम के अंदर बगावत हुई। एमक्यूएम के अफाक अहमद और आमिर खान ने पार्टी से अलग होकर नई पार्टी एमकेएम हकीकी की बुनियाद रखी। 92 के ऑपरेशन में इस्टैब्लिशमेंट ने उनके सर पर हाथ रख दिया। यह नया धड़ा एमकेएम को तो नुकसान न पहुंचा सका लेकिन शहर में उन दोनों के मुसल्ला तसादुम शुरू हो गए जिसमें सैकड़ों लोगों











