कराची के 1992 ऑपरेशन क्लीन-अप की अज्ञात कहानी और एमक्यूएम व पीपल्स पार्टी के बीच संघर्ष का इतिहास।
Key Takeaways
- कराची में 1990 के दशक की हिंसा का मुख्य कारण राजनीतिक और जातीय संघर्ष था।
- एमक्यूएम की संगठनात्मक ताकत ने उसे कराची में प्रभावशाली बनाया।
- ऑपरेशन क्लीन-अप का उद्देश्य शहर में कानून व्यवस्था बहाल करना था, लेकिन इसके परिणाम विवादित रहे।
- राजनीतिक गठबंधनों और टूटनों ने कराची की स्थिति को और जटिल बनाया।
- हिंसा और तशद्दुद के कारण आम जनता को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
What the video covers
- 1990 में कराची में एमक्यूएम और पीपल्स पार्टी के बीच हिंसक संघर्ष और तशद्दुद के कई मामले हुए।
- जनरल आसिफ नवाज जंजुआ ने जून 1992 में कराची में ऑपरेशन क्लीन-अप कराया।
- एमक्यूएम ने 1988 के चुनावों में कराची और हैदराबाद में बड़ी सफलता हासिल की थी।
- एमक्यूएम और पीपल्स पार्टी के बीच गठबंधन और फिर विवादों के कारण शहर में हिंसा बढ़ी।
- कराची में तशद्दुद, अगवा करने और ड्रिल मशीन से यातनाएं देने के कई मामले सामने आए।
- एमक्यूएम की संगठनात्मक संरचना ने उसे कराची में मजबूत बनाया था।
- 1990 के दशक में कराची में कई बार कर्फ्यू लगाना पड़ा और भारी हिंसा हुई।
- एमक्यूएम के नेताओं पर कई बार मुकदमे दर्ज हुए और पार्टी ने कई बार राजनीतिक गठबंधनों में भाग लिया।
- ऑपरेशन क्लीन-अप के दौरान पुलिस, रेंजर्स और सेना की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
- वीडियो में कराची के उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक जटिलताओं को विस्तार से समझाया गया है।
Chapters
- 00:00कराची में 1990 का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य
- 02:03एमक्यूएम की राजनीतिक सफलता और गठबंधन
- 05:39हैदराबाद और कराची में हिंसा के प्रमुख घटनाक्रम
- 07:18एमक्यूएम और पीपल्स पार्टी के बीच संघर्ष
- 09:08कराची में तशद्दुद और पुलिस की भूमिका
- 20:10ऑपरेशन के दौरान प्रमुख घटनाएं और नेताओं की भूमिका
- 23:19ऑपरेशन के बाद कराची की राजनीतिक स्थिति
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Speaker A
11 फरवरी 1990 कराची में फौज के सुबाई हेड क्वार्टर के पीछे वाके हॉकी क्लब ऑफ पाकिस्तान में एमकेएम और पीपल्स पार्टी के रहनुमा रात से जमा थे।
Speaker A
पूरी रात मुजाकरात हो रहे थे। फजर के वक्त कुछ एंबुलेंस आई। उनमें तलबा थे।
Speaker A
अगवा किए गए तलबा। एपीएमएसओ के भी और पीएसएफ के भी। दोनों तरफ के तलबा पर शदीद तशद्दुद किया गया था।
Speaker A
ड्रिल मशीनों से जिस्मों में सुराख किए गए थे। एपीएमएसओ के तलबा की पीठ पर तशद्दुद करके पीएसएफ लिखा
Speaker A
हुआ था। जबकि पीएसएफ के तलबा की पीठ पर एपीएमएसओ। यह मुजाकरात और यगुमारियों का तबादला फौजी हुक्काम की मौजूदगी में हुआ और उस वक्त के कोर कमांडर जनरल आसिफ नवाज जंजुआ की हिदायत पर।
Speaker A
वही जनरल आसिफ नवाज जंजुआ
Speaker A
जिन्होंने आर्मी चीफ बनने के बाद जून 1992 में कराची में ऑपरेशन क्लीन अप कराया। कई दफ़ा ऐसे वाक्यात हुए हैं कि एक दोनों पार्टियों के कारकुनों को जो है तब्दील कर दिया गया।
Speaker A
एक दफा फ़ौज की लीडरशिप भी जो है
Speaker A
बकायदा उसमें इनवॉल्व हुई। कारख भी कारकुनों को जो बाज़ियाब कराने के लिए जो कारकुन अगवा किए जाते थे उनप बहुत ही खतरनाक किस्म का जो है दिल हिला देने वाला जो है वो पार्टियां जो है वो एक दूसरे पे
Speaker A
तशद्दुद करती थी। ड्रिल मशीन से जो एक दूसरे पे जो है ना वो जो है ना वो सुराग किए जाते थे। तो हिस्सा ब कदरे जुस्सा जिसमें जितनी ताकत थी वो उतना जो है वो ये रास्ता इख्तियार कर रहा था। एमक्यूएम का
Speaker A
दावा है कि यह ऑपरेशन जरा पेशा अफराद के खिलाफ नहीं बल्कि एमकेएम के खिलाफ किया गया। दिलचस्प बात यह थी कि इस ऑपरेशन के वक्त एमक्यूएम आईजीआई की इत्तेहादी थी। यानी एस्टैब्लिशमेंट की बनाई गई पार्टी के साथ।
Speaker A
तो फिर यह ऑपरेशन क्यों हुआ? ऑपरेशन
Speaker A
से पहले और बाद में क्या होता रहा? आज हम कराची की तारीख के सबसे खूनी दौर को याद करेंगे। मगर उससे पहले इंकलाब को जरूर सब्सक्राइब कर लें और वीडियो को लाइक जरूर करें। हमने इंकलाब की पिछली वीडियो में एमक्यूएम
Speaker A
के कयाम, अल्ताफ हुसैन की जेल यात्रा और शहरी सिंध में एमक्यूएम की मकबूलियत का जिक्र किया था। 1992 में होने वाले कराची ऑपरेशन को समझने के लिए 1988 के इलेक्शन के बाद से शहर में होने वाले वाक्यात का
Speaker A
जायजा लेना भी जरूरी है। तो हुआ कुछ यूं कि बल्दितियाती इलेक्शन में शानदार कामयाबी के बाद नवंबर 1988 में होने वाले जनरल इलेक्शन में भी एमएम ने कराची और हैदराबाद में मैदान मार लिया। कराची में नेशनल असेंबली की 13 में से 11 सीटें एमएम
Speaker A
के उम्मीदवारों को मिली। हालांकि इस इलेक्शन में भी एमकेएम ने पार्टी के तौर पर हिस्सा नहीं लिया था बल्कि आजाद उम्मीदवारों के तौर पर इलेक्शन लड़े थे। बहरहाल शहरी सिंध के आसमान पर उस वक्त एमक्यूएम की पतंग ही सबसे ऊंची उड़ रही
Speaker A
थी। कराची की बेशतर महाजिरा आबादियों में एमक्यूएम के नगमे गूंजते थे। दिल दिया है जा भी देंगे एम क्यूएम तेरे लिए। या फिर देखो यह कौन आया? अल्ताफ हुसैन आया। 1988 में जब एमकेएम ने एक आम इलेक्शन जीते
Speaker A
तो उस वक्त बड़ा इस उनको बड़ा गैर मामूली तौर पे जो है ना एमकेएम जो है ना पूरी पाकिस्तान की सियासत के अंदर जो है ना एक बिल्कुल एक नई रिवायत के तौर पे जो है वो सामने आई थी। लोग हैरान हो गए थे। नौजवान
Speaker A
लड़के बिल की उम्र 25 साल 30 साल है। ये कौमी वो गरीब मिडिल क्लास घरानों के जो है वो लड़के थे। वो वहां एवानों के अंदर पहुंचे। सब के सब उन्होंने इत्तेफाक के तौर पे उनके पास तो गाड़ियां भी नहीं होती
Speaker A
थी वो कुर्ता पजामा और सलवार पजामा और कुर्ता पजामा जो था उनका जो माजिर कल्चर उस जमाने में सखावत के तौर पे सामने आया वो पहन के जब एवान के अंदर दाखिल हुए थे एक पूरा एहवान का ऐवानों का चाहे वो सिंध
Speaker A
असेंबली का ऐवान हो या कम्युनिस्ट असेंबली का ऐवान हो वो पूरी पाकिस्तान की सियासत के अंदर जो है ना एक भौचाल था ये कौन लोग हैं जिन्होंने पाकिस्तान की सियासत को जो है ना वो तब्दील करके रख दिया। इस इलेक्शन
Speaker A
से कुछ ही हफ्ते पहले हैदराबाद में एक सानहा भी रोनुमा हो चुका था।
Speaker A
जो सानहा हैदर चौक कहलाता है। 30 सितंबर को हैदर चौक और दूसरे इलाकों में कार और मोटरसाइकिल सवारों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी। जिसमें 250 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
Speaker A
इस दहशतगर्दी का इल्जाम सिंधी कौम परस्त रहनुमाओं कादिर मक्खसी, शफी उर्फत समेत 30 से ज्यादा लोगों पर लगाया गया था। मगर बाद में अदालतों ने उन्हें बरी कर दिया था। उस दिन ये एक हैदराबाद में एक मिस्टेक केयर
Speaker A
हुआ जिसमें दो 250 लोग मारे गए और उसके दूसरे दिन कराची में हंगामा अराई हुई और उसमें भी काफी लोग मारे गए। ये जो था आसिफ नवाज जंजुआ ने उसके बहुत बाद में प्रेस एक प्रेस ब्रीफिंग की एडिटर्स के साथ मीट ऑफ
Speaker A
द रिकॉर्ड एक मीटिंग थी उसमें उन्होंने कहा कि उसका जिम्मेदार जीएस था 30 सितंबर को हैदराबाद में होने वाले कत्लेआम का जिम्मेदार जीएस और उन्होंने कहा दूसरे दिन उसके रिएक्शन में कराची में जो कुछ हुआ और जितनी जाने गई उसमें एमकेएम मुलविस थी और
Speaker A
उन्होंने एक बात और की उन्होंने एक बात यह की कि दोनों का कंट्रोलर एक ही तो उन्होंने यह नहीं बताया कि कौन था। उन्होंने पूछा भी अहमद अली खान साहब डॉन के एडिटर थे। उन्होंने पूछा भी के आप
Speaker A
बताएं तो सही कि राही कौन था जिसके राबते दोनों से थे? उन्होंने कहा रहने दें आप कुछ समझ लें और सवाल को मैंने आपको बता दिया। बहरहाल इन हालात में सिंध के उर्दू बोलने वालों को एमकेएम ही अपनी निजात
Speaker A
दाहिंदा महसूस होती थी। इलेक्शन के बाद एमकेएम की पोजीशन किंग मेकर जैसी हो गई थी। यानी इसकी मदद के बगैर ना पीपल्स पार्टी हुकूमत बना सकती थी ना आईजीआई। 18 नवंबर 1988 को नवाज शरीफ 90 आए। फिर 21
Speaker A
नवंबर को बेनजीर भुट्टो भी वहां तशरीफ लाए। लेकिन एमकेएम ने पीपल्स पार्टी के साथ चलने का फैसला किया। उस वक्त फिर पीपल्स पार्टी के साथ एमकेएम का एक इतिहाद हुआ। मेरा ख्याल है 52 रुकनी जो है वो एक मायदा हुआ था। जिसमें उस वक्त
Speaker A
बाज लोगों का खासतौर पे कराची बोलने में रहने वालों की एक राय थी कि पीपल्स पार्टी और एमकेएम का जो इतिहाद है वो एक फितरी इतिहाद है क्योंकि एक ही सूबे में की पार्टियां हैं दो लसानी इकाइयां हैं। अगर
Speaker A
मिलके इनमें आपस में एहतियात हो जाता है तो इससे जो है सुबह के अंदर शहर के अंदर पाकिस्तान के अंदर जो है वो अच्छा जो है वो काम हो सकता है। उस वक्त बेनजीर साहिबा जो थी उन्होंने नाइन जीरो का जो है वो
Speaker A
दौरा भी किया था। बहरहाल इस इत्तेहाद के बावजूद कराची और हैदराबाद के हालात बेहतर नहीं हुए। एमकेएम और पीपल्स पार्टी दोनों की तलबा तंजीमों के दरमियान आए रोज फसादात होते थे। जिनमें जदीद असलहे का खुलेआम इस्तेमाल होता था।
Speaker A
एक दूसरे के कारकुनों को अगवा करने और उन पर तशद्दुद करने के इल्जामात भी लगते थे। जुलाई 1989 में कराची यूनिवर्सिटी में फायरिंग से पीएसएफ के तीन तलबा जहां बाहक हो गए थे। जिसके बाद केयू में रेंजर्स तायनात कर दी गई जो अब तक वहां तायनात है।
Speaker A
बहरहाल एमकेएम को जल्द पीपल्स पार्टी से शिकायतें होने लगी कि वह वादे पूरे नहीं कर रही। इसीलिए सितंबर 1979 में एमकेएम ने आईजीआई से मुयजा कर लिया और बेनजीर भुट्टो के खिलाफ तहरीक अदम एतमाद में शामिल हो गई।
Speaker A
एमकेएम में ख्याल 11 महीने जो है हुकूमत में रही और फिर तहरीक अदम एतमाद आई थी लेकिन वो नाकाम हो गई। उस वक्त पार्लिमानी लीडर एमकेएम के डॉक्टर इमरान फारूक होते थे। उन्होंने बड़ा एक शेर पढ़ा था। वो शेर
Speaker A
को भी जो है बड़ी शहरत हासिल हुई थी। गजब किया। तेरे वादे पे ऐतबार किया। 11 माह तक कयामत का जो है इंतजार किया। वो शायद इसी तरह का एक शेर था। अगर शायद में कोई अल्फ़ाज़ आगे पीछे ना हो रहे हो तो। तो बहाल
Speaker A
उसके बाद जो है वो एमकेएम जो है वो मुस्लिम लीग के साथ शामिल हो गई। इस दौरान 16 अक्टूबर 1979 को एमकेएम के सुबाई हुज़रा पर फायरिंग का वाकया पेश आया। जिसके बाद 23 अक्टूबर 1989 को एमकेएम हुकूमत से अलग
Speaker A
हो गई। फिर 26 जनवरी 1990 को कराची में मुत्तहैदा अपोजिशन का एक बड़ा पावर शो मुनकद हुआ। आवाम का ठाटे मारता समंदर बता रहा था कि कराची के आवाम एमकेएम के ही साथ हैं। जलसे से नवाज शरीफ और दीगर रहनुमाओं
Speaker A
ने भी खिताब किया। मगर मैदान अल्ताफ हुसैन के हाथ ही रहा। इसके कुछ ही दिन बाद 7 फरवरी 1990 को एमकेएम की अपील पर शहर में हड़ताल की गई। इस दौरान तशद्दुद के वाक्यात में 42 अफराद हलाक हो गए। कई
Speaker A
बरसों बाद एक बार फिर कराची की कई इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। 9 फरवरी को नामालूम अफराद ने शहर में नौ लोगों को जिंदा जला दिया था। इसी के 2 दिन बाद 11 फरवरी को यरगमाली तलबा के तबादले का वो
Speaker A
वाक्या पेश आया जिसका हमने शुरू में जिक्र किया था। एमक्यूएम इस दौरान कराची और हैदराबाद में ज्यादा मजबूत हो रही थी। कहा जाता है कि एमक्यूएम की कामयाबी में बड़ा हाथ इसकी तंजीमी स्ट्रक्चर का था। जो सेक्टर और यूनिट पर मुश्तमिल था। यह भी
Speaker A
कहा जाता है कि इसके पीछे डॉक्टर इमरान फारूक का दिमाग था। जबकि कुछ लोग कहते हैं कि यह सिस्टम अल्ताफ हुसैन ने कायम किया था क्योंकि वह फौज में ट्रेनिंग कर चुके थे। बहरहाल तजियाकारों के मुताबिक एमकेएम के सेक्टर इंचार्ज इतने ताकतवर हो चुके थे
Speaker A
कि उनकी मर्जी के बगैर पुलिस भी इलाके में दाखिल नहीं हो सकती थी। इस तरह ये यूनिट और सेक्टर आवाम के लिए अपने बहुत से मसाइल का हल भी बन चुके थे। एमकम की जो असल जो ताकत थी ना वो उसका
Speaker A
सेक्टर था। लोगों के जो उसके साथ कनेक्टिविटी थी ना वो सेक्टर ही थी। वहां लोग अपने फैसले करवाने जाते थे। वहां अगर 30 फैसले गलत होते थे ना तो 70% फैसले मेरिट पर भी होते थे। फरी इंसाफ का उस वक्त सबसे बड़ा जरिया
Speaker A
था वो सेक्टर ऑफिस ही था। अब ये बात क
Speaker A
मुहासरा किया गया। बिजली, पानी और गैस की लाइनें काट दी गई। औरतें सरों पर कुरान उठाकर निकली तो उन पर भी फायरिंग कर दी गई। इस साने में 20 खवातीन समेत 50 अफराद जाबाक हुए थे। इसके नतीजे में 27 और 28 मई
Speaker A
1990 को कराची में भी फसादात भड़क उठे। दो दिन में 66 अफराद मार दिए गए। जिनमें एमकेएम के सेनेटर मोहसिन सिद्दीकी भी शामिल थे। उसके बाद भी शहर में कत्लो गारत और तशद्दुद के वाक्यात पेश आते रहे। 20
Speaker A
जून 1991 को लांडी में पाक फौज के मेजर कलीम को अगवा कर लिया गया और तशद्दुद का निशाना बनाया गया। उनके अगवा के इल्जाम में अल्ताफ हुसैन और दीगर रहनुमाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। इस वाक्य के
Speaker A
तकरीबन डेढ़ माह बाद 6 अगस्त 1990 को बेनज़ीर भुट्टो की पहली हुकूमत बरतरफ कर दी गई। बिकॉज़ आई एम द फोर्थ सस्पेंडेड प्राइम मिनिस्टर अल्ताफ हुसैन 15 मई को लंदन जा चुके थे। पीपी हुकूमत खत्म होने के बाद वो 23 अगस्त
Speaker A
को कराची आ रहे थे। उनके इस्तकबाल के लिए जगह-जगह कैंप लगाए गए। इन इस्तकबाली कैंपों पर अंधाधुंध फायरिंग हुई। जिसमें 22 लोग मारे गए। उसका इल्जाम भी आसिफ ज़रदारी पर आयद किया गया। उधर यकुम अक्टूबर को निग्रा वज़र एआला जाम सादिक अली ने
Speaker A
अल्ताफा हुसैन के खिलाफ तमाम मुकदमात वापस लेने का ऐलान कर दिया। एमकेएम ने आईजीआई से इत्तेहाद कर लिया। 24 अक्टूबर 1990 को इलेक्शन हुए तो पहली बार एमकेएम ने जमाती बुनियाद पर हिस्सा लिया और कौमी असेंबली की 15 सीटें हासिल करके मुल्क की तीसरी
Speaker A
बड़ी सियासी जमात होने का एजाज हासिल किया। एमकेएम वफाकी और सुबाई हुकूमतों में शामिल तो हुई मगर वज़र एआज़म नवाज शरीफ की काबीना में कोई वज़ारत नहीं मिली। इसके बाद कुछ महीनों तक हालात बेहतर रहे क्योंकि सिंध में भी आईजीआई की हुकूमत थी और जाम
Speaker A
सादिक अली खान वज़ीर एआला थे। जिनके अल्ताफ हुसैन से अच्छे ताल्लुकात थे। जुलाई 1991 तक तो सुरते हाल यह थी कि नवाज शरीफ ने एक बयान में कहा कि उन्हें अल्ताफ हुसैन की दोस्ती पर फक्र है और वह उनके भाई हैं। 16
Speaker A
अगस्त 1991 को जनरल आसिफ नवाज जंजुआ ने आर्मी चीफ का ओहदा संभाला। उस वक्त सिंध में डाकुओं की सरगर्मियां बढ़ने के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई का फैसला हो चुका था। उधर कराची में हालात ये थे कि पार्टी में
Speaker A
कुछ इख्तेलाफात नमूदार हो चुके थे और आमिर खान और अफाक अहमद वगैरा को पार्टी से निकाला जा चुका था। अफाक अहमद बहादुर आदमी थे? ये मैं बताऊं आपको और इनका जो मिलिटेंट ग्रुप था जो ताकत जो जरा इसको ऑपरेट करता था उसमें
Speaker A
अफाक अहमद नुमाया शख्सियत थे। अच्छा अफाक अहमद समझदार भी थे। इनके इख़्तलाफात उसी वजह से हुए थे कि बाज़ चीज़ों के अंदर उन्होंने अल्ताफ़ हुसैन की बात मानने से इंकार कर दिया था। और बाज़ चीज़ें ऐसी थी जिन पर अल्ताफ़ हुसैन समझते थे के पार्टी
Speaker A
के वो वो ग्रुप जो तंजीमी तौर पे तंजीमी जो उनका पार्टी का जो स्ट्रक्चर था उसमें आफाक और आमिर साहब की अमल दखल जो है वो ज्यादा है। ज्यादा होता जा रहा है और यह ज्यादा मजबूत होते जा रहे हैं। तो उनको वो
Speaker A
चीज बर्दाश्त नहीं थी। एमकेएम पर भत्ताखोरी, खाले छीनने, जबरदस्ती चंदा लेने जैसे इल्जामात भी इसी दौर में लगे थे। देखिए बोरी में राशि तो मिलती थी। भत्ते भी जो है वो लिए जाते थे। लेकिन एमकेएम की क्या ये ऑफिशियल पॉलिसी थी कि भत्ते लेना
Speaker A
है या वो लड़के जो एमकेएम के थे वो खुद जो है वो अपनी जररियात पूरी करने के लिए या शाह से ज्यादा शाह के वफादार बनके ये काम कर रहे थे। ये बात जो है ना फिर अभी तक जो
Speaker A
है इस पे एमकेएम कोई ज्यादा बेहतर करें। लेकिन ये काम बहाल हो रहा था। शायद भत्ते भी लिए जा रहे थे। बोरीबंद जो है वो है ना मुलासी भी ली जा रही थी। लेकिन उस एक बड़ी मजे की बात यह है जो एमकेएम के कमजोर होने
Speaker A
के बाद या एमकेएम के खत्म होने के बाद जो भत्ते लिए गए वो जमाने में लिए जाने वाले भत्ते थे वो भत्ते वो भत्ते आज के भत्तों का मुकाबला ही नहीं कर सकते। यह भी बताया जाता है कि जब जनरल आसिफ नवाज कोर कमांडर
Speaker A
कराची थे तब एमकेएम के कारकुनों ने ईदी फाउंडेशन की खालों का ट्रक छीन लिया था। ईदी साहब ने जनरल आसिफ नवाज से शिकायत की थी। उस पर उन्होंने अलताफ हुसैन को डायरेक्ट फोन करके कहा कि अगर 24 घंटों
Speaker A
में ट्रक वापस नहीं किया गया तो फौज 90 पर धावा बोल देगी। मौलाना अब्दुल सत्तार ईदी का एक ट्रक था खालों से भरा हुआ वो इन्होंने अगवा कर लिया इनके लड़कों ने एमकेएम के। उसके थोड़ी देर के बाद अब्दुल
Speaker A
सत्तार ईदी साहब ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उन्होंने कहा कि जनाब मैं पाकिस्तान में अपना ऑपरेशन बंद कर रहा हूं और मैं यहां से जा रहा हूं। यह इतला जंगल में आग की तरह फैली। प्रेसिडेंट जियाउल जो थे
Speaker A
उनको तक पहुंची बात तो उन्होंने कहा कि आसिफ नवाज जंजुआ को कहा कि इसको इस मामले को फरी तौर पर शॉर्ट आउट करके मुझे बताएं। आसिफ नवाज जंज यहां के कोर कमांडर तो आसिफ नवाज जंजुआ ने अल्ताफ भाई को फोन किया और
Speaker A
उन्हें बताया सीधे स्ट्रेट उन्होंने कहा देखें अगर 2 घंटे में वो ट्रक खालों समेत तमाम चीजें एदी साहब के जगह पे ना पहुंची तो आप यूं समझ लें कि 90 पे हम टैंक चढ़ा देंगे। बहरहाल उन इल्जामात के बावजूद भी
Speaker A
अल्ताफ हुसैन का तूती बोलता रहा। 12 सितंबर 1991 को कराची में क्रोटन के पत्तों पर उनकी छवि नजर आने का ऐलान किया गया। और उन्हें पीर साहब कहा जाने लगा था। जबकि 17 सितंबर 1991 को अल्ताफ हुसैन ने
Speaker A
38वीं सालगिरह पर 2000 पाउंड वजनी केक असली तलवार से काटा और उन्हें सोने का ताज पहनाया गया। और वाकई उस वक्त तक उनकी हैसियत कराची के बादशाह जैसी ही थी। मगर अब घेरा तम होने लगा। अक्टूबर 1991 में वो
Speaker A
एक बार फिर इलाज के लिए लंदन गए और दिसंबर में वापस आए। फिर यकुम जनवरी 1992 को उमरे के लिए सऊदी अरब गए। वहां से 28 जनवरी को लंदन पहुंचे और सियासी पनाह के लिए दरख्वास्त दे दी। 21 मई 1992 को सिंध में बदमनी, डाकुओं और
Speaker A
दहशत गर्दों के खिलाफ ऑपरेशन शुरू हुआ। पहले मरहले में रेंजर्स और मेहरान फोर्सेस ने अंदरून सिंध कारवयां की। इसी दौरान 25 मई को लंदन में अल्ताफ हुसैन और नवाज शरीफ की अहम मुलाकात हुई। ताम 31 मई को कराची
Speaker A
में रेंजर्स ने एपीएमएसओ के जॉइंट सेक्रेटरी शूद हाशमी समेत छह अफराद को हिरासत में लिया। यानी अब वाज़ किया गया कि हालात किधर जा रहे हैं। 19 जून को कराची में बाकायदा फौजी ऑपरेशन शुरू हो गया। एमकेएम के एक बागी धड़े एमकेएम हकीकी की
Speaker A
मुबईना तौर पर सरपरस्ती की गई और इसे एमकेएम से लड़ाया गया। कहा जाता है कि पुलिस की मोबाइलों और बख्तरबंद गाड़ियों में बिठाकर हकीकी के कारकुनों को लाया गया। उन्होंने एमकेएम के दफातिर पर कब्जा किया। जबकि एमकेएम के अरकान अंडरग्राउंड
Speaker A
हो गए। जब आसिफ नवाज जंजुआ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बन गए तो फिर इनके खिलाफ ऑपरेशन शुरू हुआ। क्योंकि वो यहां जानते थे कि यहां पर इन्होंने क्या-क्या लूप होल्स किए हुए हैं। वो जब ऑपरेशन शुरू हुआ तो उसमें
Speaker A
जब आफाक और आमिर साहब को ये हकीकी बनी और वो जब आए इसमें तो उनको सपोर्ट सपोर्टेड बाय आसिफ नवाज जंजुआ कह लें या जो भी आप उसको नाम दे लें लेकिन उनको जो ताकतवर हल्के थे उनकी हिमायत हासिल थी और उसी वजह
Speaker A
से उन्होंने क्योंकि वो अंदर के थे इंसाइडर थे ना तो उन्होंने एमक्यूएम के अंदर दरार डाल दी। उन्हीं दिनों हकीकी के रहनुमा आमिर खान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की कि हमने कराची को दहशत गगर्दों से पाक कर दिया है। टॉर्चर सेल और गलियों में नसब
Speaker A
आहिनी दरवाजे खत्म कर दिए गए। यह कराची की तारीख का एक और फैसला कुन मोड़ था। अब तक एमकेएम के कारकुन दूसरी जबान बोलने वालों से लड़ते आए थे। अब तोपों का रुख अपनों की तरफ हो गया था। कराची के अंदर जो है ना वो
Speaker A
बदतरीन इसको कहना चाहिए ना वो खून रेज़ीज़ का जो है ना वो सिलसिला शुरू हुआ। महाजिर कातिल महाजिर मकतूल की सियासत जो है उसकी बुनियाद जो है 19 जून 92 का जो ऑपरेशन था उस दिन जो है वो रखी गई। महाजिरी ही मर
Speaker A
रहा था। महाजिरी ही मार रहा था। दोनों तरफ के जो है वो नौजवान थे और वो सिलसिला जो है उस चक्कर में हजारों नौजवान जो है महाजिर नौजवान जो है वो वो तारीख राव में मारे गए। बहुत अरसे तक उसका उसका जो
Speaker A
खामियाजा था वो कराची को भुगतना पड़ा और उसमें बहुत सा चीजें ऐसी हुई कश्तो खून मतलब इलाके बट गए। कराची बट गया। नो गो एरियाज बन गए। यह बहुत सा गड़बड़ हुई और लोग मारे गए। एक दूसरे के खिलाफ गोलियां चली
Speaker A
और कराची बहुत ज्यादा अनरेस्टनेस कराची के अंदर हुई। 21 जून 1992 को एमकेएम के मरकजी दफ्तर 90 को रेंजर्स और पुलिस ने तहल में ले लिया। सफियों को अलायंस एरिया में एमकेएम के मुबईना टॉर्चर सेल का दौरा कराया गया। 22 जून को आर्मी चीफ जनरल आसिफ
Speaker A
नवाज ने बयान दिया कि कराची के आवाम एमकेएम के मुज़ालिम, धोस, तशद्दुत और दहशतगर्दी से तंग आ चुके हैं। यह तासुर गलत है कि फौज एमकेएम को कुचल रही है। हम सिर्फ अमन कायम करना और रियासत की रिट
Speaker A
बहाल करना चाहते हैं। अल्ताफ हुसैन ने फौजी ऑपरेशन के खिलाफ सदर और वजीर-ए-आजम से अपीलें की। कोई रद्दे अमल ना मिला, तो एमकेएम के बेसतर अरकाने कौमी और सुबाई असेंबली ने इस्तीफे दे दिए। चंद अरकान एमकेएम हकीकी में शामिल हो गए। 19 जुलाई
Speaker A
1992 को एमकेएम पर एक और इल्जाम लगा। पाक फौज के तर्जुमान ब्रिगेडियर आसिफ हारून ने एक प्रेस ब्रीफिंग में दावा किया कि एमकेएम के खिलाफ ऑपरेशन में ऐसे नक्शे और दस्तावेजात मिली हैं जिनसे साबित होता है कि अल्ताफ हुसैन सिंध के शहरी इलाकों को
Speaker A
पाकिस्तान से अलग करना चाहते थे। वो हांगकांग की तर्ज पर जिनापुर या उर्दू देश बनाना चाहते अल्ताफ हुसैन ने इस इल्जाम को मुस्तरद किया और कहा कि हमने अलेदा रियासत की कभी कोई बात नहीं की। हमने हमेशा पाकिस्तान की बात की है। अगस्त 2009 में
Speaker A
एक निजी चैनल को इंटरव्यू देते हुए इंटेलिजेंस ब्यूरो के साबिक सरबरा ब्रिगेडियर रिटायर्ड इम्तियाज़ ने ऐतराफ किया कि जिनापुर के नक्शे एमकेएम के दफ्तर से बरामद नहीं हुए थे बल्कि हुकूमत ने खुद तैयार कराए थे। जिनापुर के नक्शे का पूरी कहानी है। यह
Speaker A
बिल्कुल ड्रामा था। मैंने सात दिन लेने के बाद अपनी तफ्तीश कराने के बाद जाती तौर पर इस नतीजे पर पहुंचा कि यह सरासर ड्रामा है और एमकेएम के किसी दफ्तर से यह नक्शे बरामद नहीं हुए। इस दौरान एमकेएम के रहनुमाओं और कारकुनों की
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गिरफ्तारियों और उनको पकड़ने के लिए छापों का सिलसिला जारी रहा। अल्ताफ हुसैन और एमकेएम के रहनुमाओं पर दर्जनों मुकदमात भी कायम कर दिए गए। ऐसे में 28 नवंबर 1992 को अजीम अहमद तारिक अचानक मंजरे आम पर आए और
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एमकेएम की कयादत संभाल ली और अल्ताफ हुसैन ने सियासत छोड़ने का ऐलान कर दिया। अजीम अहमद तारिक भी पार्टी को जरा सा वो दूसरी लाइन पे ले जाना चाहते थे। वो कहते थे कि नहीं ये हड़ाहौड़ी वाली सियासत नहीं होनी
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चाहिए। हमें बहुत एतजाइल के साथ रहना चाहिए। जो अजीम अहमद तारिक के साथ झगड़ा हुआ वो वो भी यही था। 6 जनवरी 1993 को आसिफ नवाज जंजुआ ने ऐलान किया कि सिंध में फौजी ऑपरेशन के मुस्तकबिल का फैसला कौम के
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मफाद में किया जाएगा। इस ऐलान के सिर्फ 2 दिन बाद वो अपने कमरे में साइकिलिंग के दौरान दिल का दौरा पड़ने से इंतकाल कर गए। आसिफ नवाज की मौत ने एमकेएम को समझे फिर से जिंदा कर दिया। सेनेटर इश्तियाक अज़हर
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की दरख्वास्त पर मार्च 1993 में अल्ताफ हुसैन ने पार्टी की कयादत फिर संभाल ली। अज़म अहमद तारिक से जिम्मेदारियां वापस ले ली गई। अजीम अहमद तारिक को 18 मार्च को गिरफ्तार कर लिया गया। मगर कुछ ही दिनों बाद जमानत पर रिहाई मिल गई। यकुम मई 1993
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को अजीम अहमद तारिक को दस्तगीर में उनके ससुराल में नामालूम अफराद ने क्लासशिन कोफ का ब्रश मारकर कत्ल कर दिया। उनके कत्ल का इल्जाम भी अल्ताफ हुसैन और उनके साथियों पर लगाया गया। सिंध के वज़र आला मुजफ्फर हुसैन शाह ने दो माह बाद दावा किया था कि
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अजीम अहमद तारिक के कत्ल में खालिद मकबूल सिद्दीकी और हशाम उल ज़फर मुलव्विस थे। उधर मुल्की सतह पर सियासी हलचल उरूज पर थी। गुलाम इस्क खान की और नवाज शरीफ के झगड़ा शुरू हो गया। तो जब झगड़ा शुरू हो गया तो
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नवाज शरीफ ने एक तकरीर की और उसने कहा कि ये जो एवान सदर जो है ये साजिशों की गढ़ है। तो दूसरे दिन नवाज शरीफ की हुकूमत खत्म हो गई। 582 बी के जरिए गुलाम इस खान ने उनको हटा दिया। ये सुप्रीम कोर्ट चले
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गए। वहां नसीम हसन शाह ने जो चीफ जस्टिस ऑफ़ पाकिस्तान थे वो नवाज शरीफ के बहुत करीबी आदमी थे। तो उन्होंने नवाज़ शरीफ़ की हुकूमत को बहाल कर दिया। यह उनको इंपीच करना चाहते थे नवाज़ शरीफ़। इन्होंने जॉइंट
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सेशन बुलाया जनाब सेनेट का और कौमी असेंबली का। उस वक्त में गुलाम इसाक खान ने भी इनसे चिड़े हुए थे। उस मरहले पे एवान सदर में एक मीटिंग हुई जिसमें गुलाम इसाक खान नवाज शरीफ भी मौजूद थे। वहीद काकड़ भी
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मौजूद थे और रावलपिंडी के कोर कमांडर भी मौजूद थे। तो उन्होंने उनको कहा कि उस नमाज शरीफ से कहा कि आप भी इस्तीफा दे दें। उन्होंने कहा कि मैं तो इस्तीफा उस वक्त दूंगा जब ये भी इस्तीफा दें। गुलाम
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मिसा खान। तो गुलाम मिसा खान ने कहा कि जनाब मैं भी इस्तीफा देता हूं। नवाज शरीफ ने कहा अच्छा ठीक है। मैं अपने लोगों से मशवरा कर लूं। कोर कमांडर जो था उसने ऐसे नवाज शरीफ साहब का हाथ पकड़ा। उसने कहा
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यंग मैन स डाउन बैठे दस्तखत करें इस पे। उसके बाद आप जाए फिर भले आप आप तकरीर भी कर लें। एक उन्होंने कहा आखरी खिताब था। उन्होंने कहा खिताब आप सब करें। आराम से जाएं बाइजत तरीके से जाएं।
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इन हालात में कराची में जारी ऑपरेशन ब्लू फॉक्स में फौज सरगरम नजर नहीं आ रही थी। पुलिस की कार्रवाइयां जारी थी और एमकेएम की कयादत और कारकुनों के खिलाफ मुकदमात भी बदस्तूर कायम थे। इसी वजह से अल्ताफ हुसैन
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ने यकम अक्टूबर 1993 को ऐलान किया कि उनकी पार्टी इलेक्शन में हिस्सा नहीं लेगी। बाद में उन्होंने सुबह असेंबली का इलेक्शन लड़ा और सिंध से 27 सीटें हासिल की। मुजाकरात के बाद फरवरी 1994 में एक बार फिर एमकेएम और पीपल्स पार्टी इत्तहादी बन
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गए। काबीना में वज़ारत सेहत भी मिली। अभी इस इत्तेहाद का हनीमून पीरियड भी खत्म नहीं हुआ था कि मार्च 1994 से एमकेएम के खिलाफ छापों और गिरफ्तारियों का सिलसिला दोबारा शुरू कर दिया गया। शहर में दोबारा फौज बुला ली गई। 4 मई 1994 को 90 पर छापा
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मारकर फारूक सत्तार समेत 200 अफराद को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी महीने मेजर कलीम केस में अल्ताफ हुसैन, इमरान फारूक, सलीम शहजाद और दीगर को 27-27 साल कैद की सजा सुना दी गई। वफाकी वज़र-ए-रखला नसीरुल्ला बाबर की सरबराही में एमकेएम के
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खिलाफ दूसरे ऑपरेशन में कमांड पुलिस और रेंजर्स के पास थी। इस दौर में चौधरी असलम, राव अनवार, इंस्पेक्टर बहादुर अली, जीशान काजमी वगैरह बहुत मशहूर हुए। लेकिन अब दूसरी तरफ से भी जवाबी कारवाइयों का सिलसिला शुरू हो चुका था। 28 जून 1994 को
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इंस्पेक्टर बहादुर अली को घर से कुछ फासले पर शदीद फायरिंग करके कत्ल कर दिया गया। इंस्पेक्टर बहादुर अली पर मुलजिमों पर बेईमाना तशद्दुद का भी इल्जाम था। उनमें से एक चीरा लगाना भी था। जिसमें मुलजिम की दोनों टांगे 180 डिग्री के जाविव पर खींची
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जाती थी। जिससे उसकी मर्दाना ताकत खत्म हो जाती थी। एक ऑपरेशन नहीं हुआ इनके खिलाफ। इनके खिलाफ उसमें भी हुआ। नसीरुल्ला बाबर ने भी बड़ा जबरदस्त ऑपरेशन किया। पहले तो वह था आसिफ नवाज जंजो वाला ऑपरेशन और उसके
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बाद फिर नसीरुल्ला बाबर के दौर में ऑपरेशन हुआ। उसमें बहुत ज्यादा उसमें उसने क्या किया कि उस नसीरुला बाबर ने कि बहुत सारे जो एसएओस थे वो ऐसे लगाए गए जो खास तौर पे बुला के कि जिन लोगों ने कोई कहते हैं
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बहादुर अली ने चीरा इजाद कर दिया कि वो जी टांगे चीर देता था नौजवानों की और कोई कुछ कोई कुछ मैं मुख्तलिफ सजाएं और ये और वो एक टेरर क्रिएट कर दिया था बाबर कहता था मैं तो अमन के अमन कायम करने के लिए आया
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हूं पीस पार्टी का था और बेनजीर का बहुत ट्रस्टवर्ती आदमी थे उस जमाने में बहुत सारे पुलिस अफसरान जो है ना मशहूर हुए सबसे ज्यादा जमाने में जो शहरत मिली वो मिली बहादुर अली को। ये सब बच्चे हैं। आप समझ ले चौधरी
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असलम वगैरह जो शहरत बहादुर अली के हिस्से में आई वो किसी के हिस्से में जो है ना वो शहरत नहीं आई थी। तो बहादुर अली को फिर जो है वो एक दहशतगर्दी के मुकाबले में जो है वो शहीद कर दिया गया।
Speaker A
सितंबर 1994 से कराची के मुख्तलिफ इलाकों से महासरों और घर-घर तलाशी का सिलसिला भी शुरू हुआ। जिसमें हथियार बरामद करने के दावे किए जाते। उन महासरों ने एमपीएम के लिए हमदर्दियों में इजाफा किया। महाजिर कौम को मुस्तकिल एमकेएम से जोड़े कनेक्ट
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रखने में दो चीजों ने जो है ना उसमें बड़ा अहम रोल अदा किया। एक तो ये पुलिस मुकाबले उसप एमकेएम का प्रोपेगेंडा। उस जमाने में जो एमकेएम का जो प्रोपेगेंडा था उसकी जो प्रोपेगेंडे की जो उस जमाने की जो ताकत थी
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उसके सामने रियासत बेबस थी। तो ये मावरा अदालत कत्ल हुआ उसका प्रोपेगेंडा और जो महाशरे हुए वो महासरों ने जो है वो एमकेएम को और उर्दू स्पीकिंग को जो है ना हमेशा रोका गया क्योंकि महाश्रों के अंदर जो है
Speaker A
सबसे ज्यादा जो तंग किया गया सबसे ज्यादा देखिए हर आदमी तो एमकेएम का दहशतगर्द नहीं था हर उर्दू स्पीकिंग को मलेरी में एक मासरा हो रहा है तो हर उर्दू स्पीकिंग को चाहे उसका ताल्लुक एमकेएम का कारकुन है
Speaker A
चाहे वो एमकेएम का हमदर्द है या एमकेएम का दुश्मन है लेकिन उन मासरों में उनको भी जो है तजलील का सामना करना पड़ता था आठ साल यानी कि छोटे बच्चों से लेके बड़े बुजुर्गों तक बड़ी तजलील के साथ जो है वो
Speaker A
निकाला जाता था। पीछे हाथ बांध दिए जाते थे। आंख पे पट्टी बांधी जाती थी और उन्हीं के कपड़ों से यानी कि उसी की बनियान से उसी की कमीज से मान के नीम भराना हालत में जो है मैदान में या किसी दीवार के किनारे
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जो है वो बिठा दिया जाता था। उसका जो इंपैक्ट पड़ा उस उन मास्टरों ने एमकेएम को जो है ना वो जिंदा रखने में जो है ना वो बड़ा जो है ना एमकेएम बड़ा अहम किरदार एक तरफ एमकेएम के रहनुमाओं और कारकुनों के
Speaker A
खिलाफ ये कार्रवाईयां हो रही थी उन्हें इश्तहारी करार दिया जा रहा था तो दूसरी तरफ एमकेएम से मुज़ाकरात का सिलसिला भी जारी था| जनवरी 1995 में डॉक्टर इमरान फारूक और सलीम शहजाद समेत 16 इश्तहारी मुलजिमान की गिरफ्तारी पर इनाम का ऐलान
Speaker A
किया गया शहर के हालात बदस्तूर खराब होते रहे। मार्च में रेंजर्स को पुलिस के इख्तियारात देकर तमाम थाने उनके हवाले कर दिए गए थे। मई 1995 में बेनज़र भुट्टो ने बयान दिया कि कराची की एक तंजीम के कारकुन
Speaker A
बुज़दिल हैं। लोग उनसे नफरत करते हैं। जवाब में अल्ताफ हुसैन ने कहा कि वज़र एआज़म ने पूरी महाजिर कौम की तौहीन की है। बेनज़र बोली कि कराची वाले एमकेएम का साथ छोड़ चुके हैं। आइंदा वोट नहीं मिलेगा। एमकेएम
Speaker A
ने वज़र आजम से माफी का मुतालबा किया। सियासी गोलाबारी के साथ-साथ शहर में जलाओ घेराव भी जारी था। जून 1995 तो कराची की तारीख का खूनी तरीन महीना करार दिया जा सकता है। जब चनाब एक्सप्रेस को आग लगाई
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गई। नवाए वक्त के दफ्तर पर हमला हुआ। कभी सिंध असेंबली में बम धमाके होते तो कभी थानों पर रॉकेट लांचरों से हमले। एक महीने में मजमुई तौर पर 336 अफराद हलाक हुए। फिर अल्ताफ हुसैन की गिरफ्तारी के लिए इंटरपोल
Speaker A
से राब्ता किया गया। रेड वारंट निकलवाए गए। इंसदाद दहशतगर्दी की खुसूसी अदालतें कायम की गई जिसमें मुलजिमों को जमानत ही नहीं मिलती थी। अगस्त 1995 से कराची में मावरा अदालत कत्ल के सिलसिले का आगाज हुआ। पुलिस ने फारूक दादा, गफ्फार मादा, जावेद
Speaker A
माइकल और बाबर अली उर्फ़ डिप्टी को पुलिस मुकाबले में हलाक करने का दावा किया। बाद में दीगर मुबईना दहशतगर्दों फहीम कमांडो, अजर मोहानी, तारिक तैमूर, जीशान हैदर, मुफीज फारूकी, नईम शरी वगैरह को भी मुबईना मुकाबलों में हलाक किया गया। तजियाकारों
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के मुताबिक उनमें से कोई भी मुकाबला असली नहीं था। मेरा नहीं समझता कि उस जमाने में कोई असली मुकाबला हुआ है। मुकाबले तो सारे के सारे जाली हुए। और उसमें सिर्फ क्योंकि इनके पास ऑप्शन खत्म हो गया था के क्योंकि इनके
Speaker A
कंट्रोल से जो है ना चीजें जो निकल चुकी थी मुसल्ला अफराद का जो है वो शहर में जो है वो कंट्रोल हो चुका था वो शहर की जो है वो वो एक मुबादिल रियासत जो है वो कराची के अंदर जो है वो बन चुकी थी लेकिन इनको
Speaker A
अदालती निजाम पे हमारी हुकूमत का ऐतबार नहीं था या अदालती निजाम इतना कमजोर है या ये समझते थे कि हम इन लोगों लड़कों को जो है वो अदालतों के जरिए कानून के जरिए जो है वह सजा दिला सकते हैं। या फिर वह तौर
Speaker A
पे उन उस वक्त जो एमकेएम थी उस एमकेएम के जो लड़के थे उन पर दहशत बिठाने के लिए हुकूमती एक रोप दबदबा जमाने के लिए ये हुकूमत ने उस वक्त की प्लानिंग की कि इनको इतनी शिद्दत के साथ इन पे हमलावर हो कि उस
Speaker A
हमले से डर जाए उससे खौफजदा हो जाए। तो इस हिकमत अमली के तहत उन्होंने जो है वो पुलिस मुकाबले किए थे और उसमें बहुत सारे बेगुनाह बच्चे भी जो है वो मरे कहते हैं ना गेहूं के साथ घुन भी पिसा
Speaker A
बहुत सारे लोग ऐसे ऐसे ज्यादती का शिकार हुए मैं आपको एक्चुअल बताऊं बहुत सी फैमिली से हम मिले जाके तो इस तरह के लोग शिकार हुए जिनका कोई बहुत ज्यादा ताल्लुक नहीं था एमक्यूएम के साथ लेकिन होता है ना
Speaker A
कि आप एमक्यूएम के हैं मैं आपके साथ उठ बैठा रहा हूं तो मालूम हुआ कि वो पकड़ा तो मुझे भी ले गए साथ तो इस तरह के बहुत केसेस हुए इंसानी हुकूक की आलमी तंजीम एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इन मुकाबलों के
Speaker A
खिलाफ आवाज उठाई थी। बहरहाल दूसरी तरफ से पुलिस अहलकारों पर भी हमलों का सिलसिला जारी था। यह वो दौर था जब पुलिस अहलकार वर्दी पहनकर थाने से अकेले बाहर नहीं निकलते थे। खुद आईजी की हिफाजत के लिए एफसी तायनात की गई थी। अक्टूबर नवंबर 1995
Speaker A
में सिंध सेक्रेटेरिएट और पुलिस हेडक्वार्टर पर रॉकेटों से हमला किया गया। वज़ीर एआला सिंध अब्दुल्ला शाह के भाई एहसान अली शाह समेत पांच अफराद कत्ल हुए। तो उसके कुछ ही दिन बाद अल्ताफ हुसैन के भाई नासिर हुसैन और भतीजे आरिफ हुसैन की
Speaker A
लाशें भी गडाब में झाड़ियों से मिली। वज़र-ए-आला के भाई के कत्ल का इल्जाम एमकेएम पर लगा तो अल्ताफ हुसैन ने अपने भाई और भतीजे का कातिल हुकूमत और एजेंसियों को करार दिया। जनवरी 1996 में अल्ताफ हुसैन ने तमाम कारकुनों को रोपोश
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होने की हिदायत कर दी। 11 मार्च 1996 को गुलशन इकबाल में मुबईना पुलिस मुकाबले में नईम शरी और साथी को हलाक करने का दावा किया गया। उसके बाद वज़रआला अब्दुल्ला शाह ने ऐलान किया कि कराची से दहशतगर्दों का सफाया कर दिया गया
Speaker A
है। 17 जुलाई को एमकेएम के सेक्टर इंचार्ज जावेद लंगड़ा को बावलपुर से गिरफ्तार किया गया। एमकेएम के खिलाफ यह दूसरा ऑपरेशन जारी ही था कि 20 सितंबर 1996 आ गया। क्लिफ्टन कराची में एक मुबयना पुलिस मुकाबले में वज़र आजम बेनजीर भुट्टो के भाई
Speaker A
मीर मुर्तजा भुट्टो मारे गए। ऑपरेशन शुरू हुआ मावरा अदालत कत्ल का और ये ऑपरेशन जो है वो पूरी शिद्दत से जाता रहा। उसने उस ऑपरेशन ने बहाल एमक्यूएम की जो है उस वक्त कमर जो है ना वो तोड़ी थी।
Speaker A
लेकिन बड़ा मजेदार सुरते हाल ये हुई उस मावरा अदालत कत्ल के की कड़ी के तहत ही जो है मुर्तजा भुट्टो जो है वो एक पुलिस मुकाबले के अंदर जो है वो हलाक हो जाते हैं। और फिर अगले दिन अखबारात में जो पहले
Speaker A
खबर छपती थी कि पुलिस मुकाबला एमकेएम के तीन दहशतगर्द हलाक, दो दहशत दहशतगर्द हलाक। फिर अगले दिन के अखबारात में खबर छपी थी कि सारे अखबारात की लीड थी। पुलिस मुकाबला वज़ आजम का भाई हलाक। नवंबर 1996 में सदर फारूक लगारी ने बेनजीर भुट्टो की
Speaker A
हुकूमत बरतरफ कर दी। इसके साथ ही एमकेएम के खिलाफ ऑपरेशन सुस्त पड़ गया। 1997 के इलेक्शन में कौमी असेंबली की 12 सीटें भी मिली। एमकेएम ने एक बार फिर नवाज शरीफ से हाथ मिलाया। काबीना में भी शामिल हुई।
Speaker A
अप्रैल 1997 में एमकेएम के 750 कारकुनों को रिहा करने का फैसला किया गया। 26 जुलाई 1997 को महाजिर कौमी मूवमेंट से मुत्तहदा कौमी मूवमेंट बन गई। जनवरी 1998 में अल्ताफ हुसैन समेत तमाम रहनुमा मेजर कलीम केस से भी बरी हो गए। सब सही चल रहा था कि
Speaker A
जुलाई 1998 में नून लीग के साबिक एमएलए जुहेर अकरम नदीम के कत्ल के बाद इत्तेहाद खत्म हो गया। एमकेएम अपोजिशन में आ गई क्योंकि उनके कत्ल का इल्जाम एमकेएम पर लगाया गया था। फिर 17 अक्टूबर 1998 को हकीम मोहम्मद सईद को शहीद कर दिया गया।
Speaker A
उनके कत्ल का इल्जाम भी एमकेएम पर लगा दिया गया। सिंध में गवर्नर राज लगा दिया गया। एक बार फिर एमकेएम के खिलाफ ऑपरेशन शुरू हुआ। लेकिन 12 अक्टूबर 1999 को जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्ता उलट
Speaker A
दिया। एमकेएम उसके बाद मुशर्रफ की आंख का तारा कैसे बनी? एमकेएम की लहरी गैंग वॉर से लड़ाई क्यों हुई? एमकेएम के राज में कराची के हालात में क्या तब्दीली आई? इस पर हम अगली डॉक्यूमेंट्री में तफसील से बात करेंगे। हमारी यह वीडियो आपको कैसी
Speaker A
लगी? इस पर अपनी राय जरूर दीजिएगा।
Topics:कराचीऑपरेशन क्लीन-अपएमक्यूएमपीपल्स पार्टीजनरल आसिफ नवाज जंजुआ1992हिंसाराजनीतितशद्दुदपाकिस्तान











