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The Tragic Last Days | The Untold Story of Pervez Musharraf

परवेज मुशर्रफ के जीवन के अंतिम दिनों की कहानी, उनकी राजनीतिक यात्रा और बीमारी की अनकही दास्तान।

Key Takeaways

  • परवेज मुशर्रफ की जिंदगी राजनीतिक उतार-चढ़ाव और खतरों से भरी रही।
  • उनकी हुकूमत ने पाकिस्तान की सियासत और सुरक्षा नीतियों को गहराई से प्रभावित किया।
  • उनकी बीमारी और राजनीतिक गिरावट ने उनके जीवन के अंतिम दिनों को दुखद बना दिया।
  • अंतरराष्ट्रीय राजनीति और स्वास्थ्य संबंधी बाधाओं ने उनकी जिंदगी को और जटिल बनाया।
  • उनका निधन एक युग के अंत का प्रतीक था।

What the video covers

  • परवेज मुशर्रफ के खिलाफ कई बार जानलेवा हमले हुए, लेकिन वे बच निकले।
  • उन्होंने 65 और 71 की जंग लड़ी, कारगिल युद्ध छेड़ा और पाकिस्तान की सेना की कमान संभाली।
  • 1999 में उन्होंने नवाज शरीफ की सरकार का तख्ता पलट कर खुद पाकिस्तान के सौदर बने।
  • उनकी हुकूमत में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं जैसे लाल मस्जिद का सना, इमरजेंसी, और आतंकवाद के खिलाफ जंग।
  • 2007 में राजनीतिक दबाव के कारण उन्होंने आर्मी चीफ का पद छोड़ दिया और बाद में सिविलियन सदर के रूप में भी पद छोड़ा।
  • 2008 के चुनावों में उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और वे पाकिस्तान छोड़कर विदेश चले गए।
  • उन्होंने दुबई में सियासत में वापसी की कोशिश की लेकिन राजनीतिक स्थिति उनके खिलाफ थी।
  • उनकी जिंदगी के अंतिम दिनों में एक दुर्लभ और खतरनाक बीमारी ने उन्हें घेर लिया, जिसका इलाज संभव नहीं था।
  • अमेरिका ने उन्हें इलाज के लिए वीजा देने से इंकार कर दिया, जिससे उनकी हालत और खराब हुई।
  • 2023 में वे दुबई के अस्पताल में अंतिम सांसें लेकर पाकिस्तान में उनका अंतिम संस्कार हुआ।

Answers

Questions about this video

परवेज मुशर्रफ को किन किन खतरों का सामना करना पड़ा?

परवेज मुशर्रफ के काफिले पर कई बार बम धमाके हुए, जिनमें वे बच निकले। अदालत ने उन्हें सजा-ए-मौत सुनाई, लेकिन वे उससे भी बच गए।

परवेज मुशर्रफ को आखिर कौन सी बीमारी हुई थी?

उनकी बीमारी इतनी दुर्लभ और खतरनाक थी कि उस वक्त पूरी दुनिया में सिर्फ 25 लोगों को थी और इसका कोई इलाज नहीं था।

अमेरिका ने परवेज मुशर्रफ को इलाज के लिए वीजा क्यों नहीं दिया?

अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ उनकी भूमिका के बावजूद उन्हें इलाज के लिए वीजा देने से इंकार कर दिया, जिससे उनकी स्वास्थ्य स्थिति और बिगड़ी।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:02
Speaker A
उसके रास्ते में बम रखा गया, मगर बच गया। बारूद से भरी गाड़ी उसके काफिले से टकरा दी गई। किस्मत तब भी मेहरबान रही। अदालत ने सजा-ए-मौत सुनाई। वहां से भी बच निकला। लेकिन आज वो दुबई के अस्पताल में आखिरी
00:18
Speaker A
सांसे ले रहा था। कोई आम शख्स नहीं था। वो था जिसने 65 और 71 की जंगे लड़ी। फौज की कमान संभाली। कारगिल की जंग छेड़ी। मुंतखिब हुकूमत का तख्ता उल्टा। सौदर बना। इत्तेहादी बनकर अमेरिका के साथ खड़ा हुआ। दहशतगर्दी के
00:37
Speaker A
खिलाफ मैदान में उतरा। मगर अब एक बीमारी के हाथों शिकस्त खाकर बिस्तर पर पड़ा था। यह कहानी है एक ऐसे शख्स की जिसने बरसों दूसरों पर हुक्म चलाया। मगर फिर उसके अपने जिस्म ने ही उसका हुक्म मानने से इंकार कर
00:54
Speaker A
दिया। यह कहानी है ताकत के उरूज से बेबसी के इंतहा की। यह कहानी है मुल्क के ताकतवर हुक्मरान जनरल परवेज मुशर्रफ की। लेकिन सवाल यह है कि परवेज मुशर्रफ को जिंदगी के आखिरी दिनों में आखिर हुआ क्या था? उन्हें ऐसी कौन सी खतरनाक बीमारी लगी
01:14
Speaker A
थी जो उस वक्त पूरी दुनिया में सिर्फ 25 लोगों को थी? और जिसका कोई इलाज भी नहीं था। देयर इज नोबडी मोर डेडिकेटेड देन द प्रोटेक्शन ऑफ़ ह ओ पीपल देन प्रेसिडेंट मुशारफ जब दहशतगर्दी के खिलाफ जंग में परवेज
01:28
Speaker A
मुशर्रफ अमेरिका के फ्रंटा लाइन इत्तहादी थे तो अमेरिका ने उन्हें इलाज के लिए वीजा देने से क्यों इंकार कर दिया?
01:37
Speaker A
इस वीडियो में आपको इन तमाम सवालों के जवाब मिलेंगे। लेकिन आगे बढ़ने से पहले हमारे चैनल को सब्सक्राइब और वीडियो पसंद आए तो इसे लाइक जरूर कीजिएगा। 14 दिसंबर 2003 परवेज मुशरफ का काफिला रावलपिंडी की एक सड़क से गुजर रहा था।
01:54
Speaker A
सामने एक पुल था और किसी को खबर नहीं थी कि उस पुल के नीचे एक बहुत बड़ा बम लगा हुआ है। 250 किलो वजनी बम। मंसूबा सिर्फ धमाका करना नहीं था। बम इस तरह लगाया गया था कि जैसे ही मुशर्रफ की गाड़ी पुल के
02:10
Speaker A
आखिरी हिस्से पर पहुंचे, धमाका हो और पुल का एक हिस्सा उड़ जाए। लोहे के सरिए बाहर निकल आए और गाड़ी या तो उन सरयों से टकरा जाए या पुल टूटने से नीचे गिर जाए। इस बम का बटन 180 मीटर दूर बैठे एक शख्स की
02:26
Speaker A
उंगली के नीचे था। काफिला आगे बढ़ते-बढ़ते पुल पर पहुंचा और एक खौफनाक धमाका हुआ। लेकिन बटन दबाने वाले ने देर कर दी। सिर्फ 2 से 3 सेकंड की और काफिला पुल से आगे निकल गया। परवेज मुशर्रफ बच गए, लेकिन
02:44
Speaker A
कहानी यहां खत्म नहीं हुई। दुश्मन एक और मंसूबा तैयार कर चुका था। पहले हमले के ठीक 11 दिन बाद 25 दिसंबर को उस हमले पर अमल किया गया। इस बार बम रास्ते में नहीं लगाया गया था बल्कि दो
02:59
Speaker A
गाड़ियों में नस था। रावलपिंडी में परवेज मुशर्रफ के काफिले को उन गाड़ियों से निशाना बनाने की कोशिश की गई। धमाका इतना शदीद था कि परवेज मुशर्रफ की 3 टन वजनी बुलेट प्रूफ Mercedes सड़क से कई फीट ऊपर उछली।
03:14
Speaker A
उसके बाद गाड़ी सिर्फ अपने रिम्स पर दौड़ती हुई महफूज़ मकाम की तरफ गई। इस दौरान परवेज मुशर्रफ अपनी पिस्तौल निकाल चुके थे ताकि अगर जरूरत पड़े तो वह खुद रास्ता बनाकर वहां से निकल सकें। इस हमले में भी वह मुकम्मल तौर पर महफूज़ रहे। इसी
03:30
Speaker A
रात उन्होंने अपनी अहलिया के साथ बड़े इत्मीनान से इस्लामाबाद के सुरीना होटल में शादी की एक तकरीब अटेंड की। दो बार मौत बिल्कुल सामने थी और दोनों बार परवेज मुशर्रफ बच गए। लेकिन मौत से कोई हमेशा नहीं बच सकता। बाद में उन्हें एक खौफनाक
03:47
Speaker A
बीमारी ने घेर लिया। इस बीमारी और उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों की तरफ हम आगे चलकर बात करेंगे। पहले यह जानते हैं कि परवेज मुशर्रफ के उरूज का सफर शुरू कहां से हुआ था। 7 अक्टूबर 1998 रात के 8:30 बज रहे थे।
04:04
Speaker A
मंगला के कोर कमांडर परवेज मुशर्रफ अपनी अहलिया के साथ टीवी देखने में मशरूफ थे कि अचानक फोन की घंटी बजी। यह वज़र एआज़म नवाज शरीफ के मिलिट्री सेक्रेटरी का फोन था। पैगाम था कि वज़र एआज़म मिलना चाहते हैं।
04:18
Speaker A
फौरन परवेज मुशर्रफ ने कहा कि वो कल सुबह इस्लामाबाद पहुंच जाएंगे। मगर जवाब मिला कि नहीं वजीर आजम आज रात ही मिलना चाहते हैं। जितनी जल्दी मुमकिन हो सके आ जाए। परवेज मुशर्रफ समझ गए कि कोई गैर मामूली
04:33
Speaker A
बात है। अपनी किताब इन द लाइन ऑफ फायर में वो लिखते हैं कि आम हालात में वजीर आजम किसी लेफ्टिनेंट जनरल को इस तरह रात के वक्त फरी तौर पर नहीं बुलाते। खासतौर पर उस वक्त जब आर्मी चीफ भी करीब मौजूद हो।
04:48
Speaker A
बहरहाल वो तैयार हुए। मिलिट्री पुलिस का हिफाजती दस्ता साथ लिया। अपना पिस्तौल रखा और इस्लामाबाद की तरफ रवाना हो गए। जहन में यही सवाल गर्दिश कर रहा था कि वजीर एआम ने उन्हें यूं अचानक किस लिए बुलाया है? और फिर उस सवाल का जवाब उन्हें रास्ते
05:04
Speaker A
में ही मिल गया। जिस वक्त उनकी गाड़ी इस्लामाबाद में दाखिल हो रही थी, उसी वक्त उन्हें ब्रिगेडियर इजाज शाह का फोन आया और उन्होंने जो बात बताई वो परवेज मुशर्रफ के लिए किसी बड़े सरप्राइज़ से कम नहीं थी।
05:17
Speaker A
उन्होंने परवेज मुशर्रफ को मुबारकबाद दी। उन्हें आर्मी चीफ बनाया जा रहा है। [संगीत] परवेज मुशर्रफ हैरान रह गए। उन्हें यकीन नहीं आ रहा था। लेकिन उसी रात उन्हें पाक फौज का सबसे बड़ा ओहदा मिल गया। और वहीं से उनके उरूज का वो दौर शुरू हुआ जिसने
05:36
Speaker A
अगले 10 साल तक पाकिस्तान की सियासत का रुख बदल कर रख दिया। अक्टूबर 1998 में वह आर्मी चीफ बने और ठीक एक साल बाद अक्टूबर ही के महीने में उन्होंने यह ओहदा देने वाले नवाज शरीफ की हुकूमत का तख्ता पलट
05:50
Speaker A
दिया। डिअ ब्रदर्स एंड सिस्टर्स योर आर्म्ड फोर्सेस हैव नेवर एंड शैल नेवर लेट यू डाउन इंशा्लाह। अब वो सिर्फ फौज के सरबराह नहीं थे। मुल्क के हुक्मरान भी थे। और फिर अगले 9 साल तक पूरे रोब, दबदबे ताकत के साथ हुकूमत की।
06:10
Speaker A
वो मुल्क के चीफ एग्जीक्यूटिव भी बने और बावर्दी सदर भी। इस दौरान 91 भी हुआ और दहशतगर्दी के खिलाफ जंग भी। काफ लीग भी बनी और इलेक्शन भी हुए। लाल मस्जिद का सनेहा भी पेश आया और 12 मई का भी। बुक्ला
06:25
Speaker A
की तहरीक भी चली और मीडिया की रस्सी भी टायर्ड हुई। बेनज़र भी शहीद हुई और अकबर बुकटी भी जान से गए। मुल्क में इमरजेंसी भी लगी और आइन भी मौतल हुआ। यह सब होता रहा और मुशरफ की हुकूमत चलती रही। लेकिन
06:40
Speaker A
हर उूज को एक ना एक दिन सवाल का मुंह देखना ही पड़ता है। परवेज मुशर्रफ के ज़वाल के दिन भी आ गए। 8 साल तक उन्होंने मुल्क के दो आला तरीन ओहदे अपने पास रखे। वो पाकिस्तान के सौदर
06:55
Speaker A
भी थे और आर्मी चीफ भी। लेकिन 2007 में उन्हें दोनों में से एक ओहदा छोड़ना पड़ा। सानहा लाल मस्जिद वला की तहरीक और फिर मुल्क में इमरजेंसी नाफिस करने के फैसले ने उनकी हुकूमत को शदीद सियासी दबाव में
07:10
Speaker A
डाल दिया था। हालात उनके लिए मुसलसल खराब हो रहे थे और फिर वो वक्त भी आया जब उन्हें फैसला करना था सदर रहना है या आर्मी चीफ। परवेज मुशर्रफ ने सदारत का इंतखाब किया। आई हैव गिवन अप माय पोजीशन एट द चीफ ऑफ़
07:26
Speaker A
आर्मी स्टाफ। 28 नवंबर 2007 को वह आखिरी मर्तबा फौजी वर्दी में सामने आए। फौज की कमान जनरल अशफाक परवेज कयानी के हवाले की और अगले ही दिन सिविलियन सदर की हैसियत से हलफ उठाया। लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं रहे थे।
07:43
Speaker A
वर्दी उतर चुकी थी। असल ताकत खत्म हो चुकी थी। वक्त गुजरने के साथ-साथ उनकी सियासी जड़े कमजोर होने लगी। मकबूलियत का गिराफ मुसलसल नीचे आ रहा था और फिर 2008 के इंतखाबादत ने रही सही कसर भी पूरी कर दी।
07:57
Speaker A
यह कोई आम इलेक्शन नहीं था। यह दरअसल परवेज मुशर्रफ की 9 साला हुकूमत का असल इम्तिहान था। 18 फरवरी 2008 को वोटिंग हुई। पीपल्स पार्टी ने मैदान मार लिया। नून लीग दूसरे नंबर पर रही। और काफ लीग जो
08:11
Speaker A
परवेज मुशर्रफ की सबसे बड़ी सियासी ताकत समझी जाती थी। बुरी तरह हार गई। पीपल्स पार्टी और मुस्लिम लीग नून ने मिलकर हुकूमत बना ली। लेकिन एक शख्स अब भी अपनी जगह पर मौजूद था। सदर परवेज मुशर्रफ। [संगीत] नई हुकूमत चाहती थी कि वह खुद ही
08:29
Speaker A
इस्तीफा दे दें। मगर मुशर्रफ ने इंकार कर दिया। अब हुकूमत के पास दूसरा रास्ता था उनके खिलाफ मुआकजे का। यानी इंपीचमेंट की तैयारी शुरू हो गई। परवेज मुशर्रफ ने देखा कि अब हालात उनके हाथ से निकल चुके हैं और
08:43
Speaker A
बचने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। तो उन्होंने वो फैसला किया जो करना ही नहीं चाहते थे। मैं आज ओदे से मुस्ताफी होने की का फैसला करता हूं। जिस शख्स ने 9 साल तक मुल्क पर हुकूमत की।
09:01
Speaker A
अब वो एक आम शहरी बन चुका था। इख्तेदार खत्म होते ही उनके खिलाफ मुकदमात का सिलसिला शुरू हो गया। पहले बेनजीर भुट्टो के कत्ल का पर्चा कटा। फिर अकबर बुक के कत्ल का मुकदमा बना। इसके बाद इमरजेंसी के
09:14
Speaker A
दौरान जजों को नजरबंद करने की भी एफआईआर दर्ज हुई। सिंध हाईकोर्ट ने तीनों मुकदमात में उन्हें हिफाजती जमानत तो दे दी लेकिन परवेज मुशर्रफ यह समझ चुके थे कि अब हवाओं का रुख हमेशा के लिए उनके खिलाफ हो चुका
09:28
Speaker A
है। उन्होंने बोरिया बिस्तर बांधा और नवंबर 2008 में पाकिस्तान छोड़ गए। पहले लंदन गए, फिर दुबई को अपना ठिकाना बना लिया। मुल्क से बाहर उनकी वैल्यू कम नहीं हुई थी। अमेरिका और बर्तनानिया की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज उन्हें लेक्चर देने के लिए बुलाती थी। मुख्तलिफ मुल्क
09:45
Speaker A
उन्हें पाकिस्तान के साबिक सदर की हैसियत से दावत देते थे। लेकिन जिस मुल्क पर उन्होंने बरसों हुकूमत की थी वो उनके लिए पराया हो चुका था। कहते हैं इ्तेदार का नशा एक बार चढ़ जाए तो आसानी से नहीं उतरता। शायद परवेज
10:03
Speaker A
मुशर्रफ के साथ भी यही हुआ। उन्होंने एक बार फिर सियासत के मैदान में आने का फैसला किया। [प्रशंसा] एपीएमएल शुड ड्र्रा ऑल मुस्लिम लीग टू इट्स होल्ड बिकॉज़ दिस इज कायदे आजम ओन पार्टी। 2010 में लंदन में बैठकर उन्होंने
10:21
Speaker A
पाकिस्तान में अपनी सियासी जमात बनाने का ऐलान कर दिया। लेकिन शायद वो एक बात भूल गए थे कि सियासत में आना अलग चीज है और आवाम से वोट लेना
10:35
Speaker A
थे और इंतखाबादत से ठीक 48 दिन पहले 24 मार्च को परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान आ गए। पाकिस्तान आने के एक हफ्ते बाद वो पहली बार सिंध हाईकोर्ट में पेश हुए। जमानत तौसी तो मिल गई मगर वहां जो हुआ उसकी गूंज
10:51
Speaker A
सारी दुनिया में सुनाई दी। वो अदालत के अहाते में थे। उनके हामियों और मुखालफिन दोनों की जानिब से नारेबाजी की जा रही थी। इसी दौरान किसी ने उनको जूता दे मारा। खुशकिस्मती से जूता तो उन्हें नहीं लगा मगर इस वाक्य की खबर सारी दुनिया के
11:09
Speaker A
मीडिया में लगी। बहरहाल जमानत में तौसी लेकर उन्होंने कराची, इस्लामाबाद, चितराल और कसूर चार हलकों से नॉमिनेशन पेपर्स जमा कराए। वो इलेक्शन लड़कर दोबारा सियासत में आने का ख्वाब देख रहे थे। लेकिन इलेक्शन मुहिम शुरू भी नहीं हुई थी कि उनके लिए एक-एक
11:28
Speaker A
करके दरवाजे बंद होना शुरू हो गए। सबसे पहले कानून रास्ते में आ गया क्योंकि 2007 की इमरजेंसी आइन मुतल करने और जजों को नजरबंद करने के मुकदमात उनका पीछा कर रहे थे। इलेक्शन कमीशन ने चारों हलकों से उनके
11:42
Speaker A
कागजात नामजदगी मुस्तरद कर दिए। अभी वह इस झटके से संभल ही ना पाए थे कि सिंध हाईकोर्ट ने उनके मुल्क से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी। लेकिन बात यहां भी खत्म ना हुई। इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने उनकी जमानत
11:56
Speaker A
मंसूख कर दी। पाकिस्तान आकर वो चारों तरफ से घिर चुके थे। जमानत मंसूख होने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनके इस्लामाबाद के फार्म हाउस चक शहजाद को सब जेल करार दे दिया गया। लेकिन उनकी मुश्किलात यहां भी खत्म नहीं हुई। 30
12:11
Speaker A
अप्रैल 2013 को पेशावर हाईकोर्ट ने इलेक्शन लड़ने पर लाइफ टाइम पाबंदी लगा दी और यह सब इतनी तेजी से हो रहा था कि उन्हें संभलने का मौका भी नहीं मिला। पाकिस्तान में कदम रखने के सिर्फ 37 दिनों के अंदर वह इलेक्शन से बाहर भी हो गए और
12:28
Speaker A
मुल्क छोड़ने पर पाबंदी भी लग गई। गिरफ्तार भी हुए और जिंदगी भर के लिए ना अहल भी करार पाए। बहरहाल परवेज मुशर्रफ कैद में थे और मुकदमात चल रहे थे। इसी दौरान 2016 आ गया। मुशर्रफ के वकीलों ने
12:43
Speaker A
अदालत को बताया कि साबिक सदर की तबीयत खराब है और उन्हें बैरूने मुल्क इलाज की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ऑफ पाकिस्तान ने उनका नाम एग्जिट कंट्रोल लिस्ट यानी ईसीएल से निकालने का हुक्म दिया। हुकूमत ने भी उन्हें बाहर जाने की इजाजत दे दी। हुकूमत
12:59
Speaker A
का कहना था कि मुशर्रफ के वकीलों ने यकीन दहानी कराई है कि वह चार से छह हफ्तों में वापस आकर मुकदमात का सामना करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 18 मार्च 2016 को परवेज मुशर्रफ कराची एयरपोर्ट पर पहुंचे। एमरेट्स की परवाज में बैठे और दुबई रवाना
13:17
Speaker A
हो गए। फिर कभी वापस नहीं आए। वो पाकिस्तान से तो चले गए लेकिन सियासत में आने की ख्वाहिश अब भी उनके दिल में करवटें ले रही थी। 2018 में जब एक बार फिर इंतखाबादत का वक्त आया तो उनके वकीलों और
13:31
Speaker A
पार्टी ओहदेदारों ने चितराल से उनके कागजात नामजदगी जमा करा दिए। व्हाटएवर केसेस हैव बीन इंस्टीट्यूटेड, हैव बीन डन ऑन पॉलिटिकल ग्राउंड्स फॉर पॉलिटिकल विक्टिमाइजेशन। एंड दैट आई एम प्रिपयर्ड टू फेस व्हेन आई गेट देयर। लेकिन एक मसला था वो यह कि वो तो ता हयात ना अहल थे। इस
13:49
Speaker A
ना अहली को खत्म कराने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले अदालत के सामने पेश हो। लेकिन परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान में थे ही नहीं। वह तो दुबई में बैठे थे और उन्हें मालूम था कि अगर वह पाकिस्तान वापस
14:04
Speaker A
आए तो गिरफ्तारी का खतरा मौजूद है। यूं ना वो अदालत के सामने पेश हुए ना उनकी ता हयात ना अहली खत्म हुई और फिर इलेक्शन से कुछ ही दिन पहले परवेज मुशरफ़ ने अपनी पार्टी की चेयरमैनशिप से इस्तीफा दे दिया।
14:18
Speaker A
उनकी जमात ने इंतखाबादत में हिस्सा तो लिया लेकिन 47 हलकों में से एक भी सीट ना जीत सकी और उसके बाद ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग हमेशा के लिए माज़ का किस्सा बन गई। लेकिन परवेज मुशरफ की मुश्किलात का
14:33
Speaker A
सिलसिला खत्म नहीं हुआ था। दिसंबर 2019 में उनकी जिंदगी में एक और खतरनाक मोड़ आया। इस्लामाबाद की खुसूसी अदालत ने उन्हें आइन तोड़ने पर सजा-ए मौत सुना दी और सिर्फ सजा-ए मौत नहीं खुसूसी अदालत के सरबरा जस्टिस सेठ वकार ने फैसले में हुक्म
14:51
Speaker A
दिया कि अगर परवेज मुशर्रफ मुर्दा हालत में मिले तो उनकी लाश इस्लामाबाद के डी चौक पर लाई जाए। जहां इसे तीन दिन तक लटकाया जाए। क्योंकि मुलजिम मिसाली सजा का मुस्तहिक है। इस खौफनाक सजा के खिलाफ परवेज मुशर्रफ ने लाहौर हाईकोर्ट का
15:07
Speaker A
दरवाजा खटखटाया। लाहौर हाईकोर्ट ने मौत की सजा गैर आईनी करार दे दी। यूं वो सजाए मौत से तो बच गए मगर मौत से ना बच सके। अब मौत बंदूक लेकर उनके पीछे नहीं थी। इस बार मौत एक बीमारी बनकर उनके जिस्म में दाखिल हो
15:24
Speaker A
चुकी थी। परवेज मुशर्रफ जिस्मानी तौर पर बिल्कुल फिट थे। रिटायरमेंट के बाद भी भरपूर जिंदगी गुजार रहे थे। लेकिन फिर 2018 में अचानक सब कुछ बदलने लगा। उनका वजन तेजी से कम हो रहा था। जिस्म के मुख्तलिफ हिस्सों
15:42
Speaker A
में दर्द रहने लगा। मैदे का निजाम भी खराब हो चुका था। एक डॉक्टर ने देखा फिर दूसरे ने, फिर तीसरे ने दर्जनों डॉक्टरों ने उनका मुआयना किया। लेकिन किसी को समझ नहीं आ रही थी कि आखिर उन्हें बीमारी है क्या?
15:56
Speaker A
खुद परवेज मुशर्रफ हैरान थे। पहले तो [संगीत] वो आइडेंटिफाई नहीं हो रही थी। प्रॉब्लम तो मुझे है। वो कोई डॉक्टर आइडेंटिफाई नहीं कर सकता था कि मुझे है क्या? प्रॉब्लम क्या है मुझे? एक साल गुजर गया मगर बीमारी का सिरा ना मिला।
16:13
Speaker A
फिर 2019 के आखिर में अमेरिका के एक डॉक्टर ने उनकी तमाम रिपोर्ट्स देखी और वो बीमारी सामने आई जो आगे चलकर परवेज मुशर्रफ की जिंदगी पर दी एंड की मोहर लगाने वाली थी। इस बीमारी का नाम था एमेलॉय डोसिस। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें
16:30
Speaker A
जिस्म के अंदर एक अजीब किस्म का प्रोटीन बनना शुरू हो जाता है। यह प्रोटीन आहिस्ता-आहिस्ता जिस्म के मुख्तलिफ पार्ट्स को डैमेज करने लगता है। यह इतनी नायाब बीमारी है कि करोड़ों इंसानों में किसी एक को होती है और जिस वक्त परवेज
16:44
Speaker A
मुशर्रफ इसका शिकार हुए तब पूरी दुनिया में इसके सिर्फ 25 मरीज थे। बाद में पता हुआ मुझे जो प्रॉब्लम है वो वन इन अ मिलियन है। वो ऐसी चीज है कि सबको नहीं होती है। आम नहीं है। इस बीमारी का आज तक कोई इलाज भी सामने
17:01
Speaker A
नहीं आया। सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके सिम्टम्स भी जाहिर नहीं होते। पता तब चलता है जब मामला काफी बिगड़ चुका हो और परवेज मुशर्रफ के साथ भी यही हुआ। अमेरिकी डॉक्टरों ने उनकी बिगड़ती हुई हालत देखकर
17:16
Speaker A
उन्हें अमेरिका आकर इलाज कराने का मशवरा दिया। लेकिन कहते हैं ना बुरा वक्त आए तो अपने पराए सब साथ छोड़ने लगते हैं। परवेज मुशर्रफ का भी बुरा वक्त चल रहा था। उन्हें अमेरिका ने वीजा देने से इंकार कर
17:28
Speaker A
दिया। वजह यह बताई किक चकि परवेज मुशर्रफ पाकिस्तानी शहरी हैं इसलिए वह दुबई या बर्तनानिया से अमेरिकी वीजा के लिए अप्लाई नहीं कर सकते। उन्हें पाकिस्तान जाकर वहां से दरख्वास्त देना होगी। लेकिन परवेज मुशर्रफ की हालत ऐसी नहीं थी कि वह
17:43
Speaker A
पाकिस्तान का सफर करते। यूं अमेरिका जाने का रास्ता बंद हो गया। उनका इलाज दुबई में ही होता रहा। इलाज का सबसे तकलीफ देह मरहला वो इंजेक्शन था जो उनके बोन मैरो में लगाया जाता था। यह मामूली इंजेक्शन नहीं था। जब यह लगता तो परवेज मुशरफ दर्द
18:00
Speaker A
से तड़प उठते और देखने वाले की आंखों में आंसू आ जाते। वक्त गुजरता रहा और परवेज मुशर्रफ का जिस्म आहिस्ता-आहिस्ता जवाब देता गया। पहले चलना फिरना बंद हुआ। वो व्हीलचेयर पर आ गए। फिर वह व्हीलचेयर से अस्पताल के बेड तक महदूद होकर रह गए। वह
18:19
Speaker A
खुद से खा पी भी नहीं सकते थे। नलकियों के जरिए खुराक दी जाने लगी। सांस लेने में मुश्किल हुई तो ऑक्सीजन मास्क लगाना पड़ा। और फिर एक वक्त ऐसा भी आया जब उनके बोलने की सलाहियत भी खत्म हो गई। अल्लाह ताला
18:34
Speaker A
पाकिस्तान को हिफ्जो अमान में रखे। पाकिस्तान हमेशा पिंदाबाद। जिस शख्स की आवाज में कभी गरज थी, जिसके एक जुमले पर बड़े-बड़े फैसले हो जाते थे, अब मुंह से एक लफ्ज निकालने के काबिल नहीं था। जिस्म इतना कमजोर हो चुका था कि देखने
18:58
Speaker A
वालों को यूं महसूस होता था जैसे बिस्तर पर कोई हड्डियों का ढांचा पड़ा हो। आंखें अंदर धंस चुकी थी। रंग पीला पड़ चुका था। जिल्द ढीली पड़ गई थी। होठों पर खुश्की और पपड़ियां जम चुकी थी। 25 जून 2022 को उस
19:14
Speaker A
वक्त के आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा दुबई पहुंचे और अपनी अहलिया और डॉक्टरों की एक टीम के साथ अस्पताल में परवेज मुशर्रफ की अयादत की और उन्हें पाकिस्तान वापस आने की दावत भी दी। लेकिन परवेज मुशर्रफ की फैमिली ने मुआजत कर ली। उनका
19:29
Speaker A
कहना था कि पाकिस्तान में इस बीमारी के इलाज की मुनासिब सहूलत मौजूद नहीं। इसलिए उन्हें इस्लामाबाद मुंतकिल करना उनकी जिंदगी के लिए खतरनाक हो सकता है। जनरल बाजवा के साथ मौजूद मेडिकल टीम ने भी इस बात से इत्तेफाक किया। यूं परवेज मुशर्रफ
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Speaker A
की पाकिस्तान वापसी एक बार फिर मुल्तवी हो गई। लेकिन उनकी हालत में बेहतरी के कोई आसार नहीं नजर आ रहे थे। बीमारी बढ़ रही थी। जिस्म कमजोर हो रहा था और वक्त तेजी से खत्म हो रहा था। 5 फरवरी 2023 को परवेज मुशर्रफ ने अपनी
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Speaker A
आखिरी सांस ली और आंखें हमेशा के लिए बंद कर दी। यह एक शख्स की मौत नहीं पूरे एक दौर का खात्मा था। परवेज मुशर्रफ के इंतकाल के अगले रोज 6 फरवरी को उनकी मयत दुबई से पाकिस्तान पहुंची। उनके साथ बेवा
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Speaker A
सहबा मुशर्रफ, बेटा बिलाल और बेटी आयला भी थे। मयत को कराची एयरपोर्ट से कंबाइंड मिलिट्री अस्पताल मलीर कैंट शिफ्ट किया गया। पोलो ग्राउंड मलीर में नमाज जनाजा अदा की गई। जिसके बाद पूरे फौजी एजाज के साथ चनेसर गोट के करीब आर्मी कब्रिस्तान
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में तदवीन कर दी गई। ताकत का सफर कब्र पर आकर खत्म हो गया। [संगीत]
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