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Taliban Real Story: Putin ने तालिबान सरकार को मान्यता क्यों दी? Afghanistan History

तालिबान की असली कहानी, रूस की मान्यता और अफगानिस्तान के इतिहास पर विस्तार से चर्चा।

Key Takeaways

  • तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने में समय लगा, लेकिन रूस ने इसे पहली बार 2025 में मान्यता दी।
  • तालिबान का इतिहास जटिल है, जिसमें सोवियत आक्रमण, अमेरिका का हस्तक्षेप और स्थानीय राजनीतिक संघर्ष शामिल हैं।
  • अफगानिस्तान में तालिबान का शासन महिलाओं और मानवाधिकारों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है।
  • अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तालिबान की भूमिका और उसकी मान्यता से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
  • अमेरिका और रूस के बीच अफगानिस्तान को लेकर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है।

What the video covers

  • तालिबान ने अफगानिस्तान पर दो बार कब्जा किया, पहली बार 1996-2001 और दूसरी बार 2021 में।
  • पहली बार तालिबान को पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ने मान्यता दी थी, दूसरी बार रूस ने 2025 में मान्यता दी।
  • तालिबान की सत्ता में आने के बाद महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां और आतंकवादी गुटों का समर्थन हुआ।
  • अमेरिका ने 2001 में अलकायदा के हमले के बाद तालिबान को सत्ता से हटाया, लेकिन तालिबान खत्म नहीं हुआ।
  • सोवियत संघ ने 1979 में अफगानिस्तान में सेना भेजी, जिससे अफगान युद्ध शुरू हुआ और अमेरिका ने मुजाहिदीनों को समर्थन दिया।
  • तालिबान का गठन मुजाहिदीनों के कुछ सदस्यों ने किया था, जिन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का समर्थन मिला।
  • अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से सेना वापस ली और तालिबान ने बिना चुनौती के काबुल पर कब्जा कर लिया।
  • तालिबान की मान्यता और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी अहमियत बढ़ रही है, खासकर रूस के फैसले के बाद।
  • अफगानिस्तान का इतिहास कोल्ड वॉर, सोवियत आक्रमण, और अमेरिका-पाकिस्तान के बीच जटिलताओं से भरा है।
  • तालिबान की कहानी में कई राजनीतिक, सामाजिक और वैश्विक पहलू शामिल हैं जो इस वीडियो में विस्तार से बताए गए हैं।

Answers

Questions about this video

रूस ने तालिबान को मान्यता क्यों दी?

रूस ने 3 जुलाई 2025 को तालिबान को अफगानिस्तान का आधिकारिक प्रतिनिधि मान लिया क्योंकि यह क्षेत्रीय स्थिरता और अपनी रणनीतिक हितों के लिए जरूरी था।

तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता में रहते हुए क्या प्रमुख नीतियां लागू कीं?

तालिबान ने महिलाओं के शिक्षा और नौकरी पर पाबंदी लगाई, सार्वजनिक सजा दी और आतंकवादी गुटों को संरक्षण दिया।

अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना कब वापस ली और क्यों?

अमेरिका ने अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस ली क्योंकि वहां की सरकार कमजोर थी और तालिबान ने बिना चुनौती के काबुल पर कब्जा कर लिया था।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

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Speaker A
जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर पहली बार कब्जा किया था, तब एक साल के अंदर तीन देशों ने उसको मान्यता दे दी थी। पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई। तालिबान का दूसरा कब्जा 15 अगस्त 2021 को हुआ। लेकिन पहली मान्यता 1417 दिनों के बाद मिली। यह
00:18
Speaker A
वो देश है जिसके खिलाफ अफगान मुजाहिदीनों ने 10 वर्षों तक जंग लड़ी थी और उन्हीं में से कुछ मुजाहिदीनों ने बाद में तालिबान बनाया था। जब तालिबान पहली बार सत्ता में आया था, तब इस देश ने तालिबान के
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Speaker A
विरोधी गुटों को सपोर्ट दिया था। यह रशियन फेडरेशन यानी रूस है जिसने 3 जुलाई 2025 के दिन तालिबान को अफगानिस्तान का आधिकारिक प्रतिनिधि मान लिया। वो तालिबान 2.0 को मान्यता देने वाला पहला देश बन गया है। लेकिन रूस ने मान्यता दी क्यों? उसके
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Speaker A
फैसले से क्या कुछ बदल सकता है? तालिबान की असली कहानी क्या है? और क्या इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में तालिबान की अहमियत बढ़ रही है? नमस्कार, मैं हूं दिव्याशी सुमराव। क्यूबिस्तान में आपका बहुत स्वागत है। यह लैंड ऑफ क्यूरियोसिटी है जहां हम
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Speaker A
इंटरनेशनल रिलेशन से जुड़ी जिज्ञासा को विस्तार देते हैं। आज मैं आपके लिए तालिबान की कहानी लेकर आई हूं। [संगीत] तालिबान। तालिब शब्द से बना है। तालिब का मतलब है ज्ञान की तलब रखने वाला या छात्र। तालिब का बहुवचन बना तालिबान। तालिबान को
01:30
Speaker A
हम एक हिंसक चरमपंथी गुट के तौर पर जानते हैं। कई देश उसको आतंकवादी संगठन मानते हैं। लेकिन आज के दिन अफगानिस्तान की सत्ता उनके पास है। अफगानिस्तान में तालिबान का दूसरा टर्म अगस्त 2021 में शुरू हुआ था। पहला टर्म 1996 से 2001 तक
01:48
Speaker A
चला था। इन 5 वर्षों में तालिबान ने काफी ज्यादतियां की जैसे सरेआम मौत की सजा देना, महिलाओं को पढ़ाई, नौकरी या बाहर निकलने से रोकना, रहन-सहन से लेकर पहनावे तक के नियम तय करना। यह सब नॉर्मल बन गया
02:02
Speaker A
था। इन सबके अलावा तालिबान ने आतंकी गुटों को भी बना दी थी। वे अफगानिस्तान में रहकर बाकी दुनिया में आतंकवाद फैला सकते थे। इन्हीं में से एक गुट था ओसामा बिन लादेन का अलकायदा। अलकायदा ने सितंबर 2001 में
02:16
Speaker A
अमेरिका पर एक बड़ा हमला किया। इसमें लगभग 3000 लोग मारे गए। इसके बाद अमेरिका ने फौज उतार दी और तालिबान को सत्ता से हटा दिया। लेकिन तालिबान पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। उसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सुदूर इलाकों में जगह बचा ली थी। उसको
02:33
Speaker A
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी मदद मिली। इसकी बदौलत वे अमेरिका और उसके सहयोगी सेनाओं को नुकसान पहुंचाते रहे। जब अमेरिका को लगा कि यहां जीतना मुश्किल है, उसने तालिबान के साथ समझौता कर लिया। अमेरिका ने बाहर निकलने के लिए 31 अगस्त
02:50
Speaker A
2021 की डेडलाइन तय की थी। उससे पहले ही चुनी हुई सरकार के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर यूएई भाग चुके थे। उनके भागते ही लीडरशिप ध्वस्त हो गई। अफगान सेना ने हथियार डाल दिए थे और अमेरिका बाहर निकलने
03:05
Speaker A
का मन बना चुका था। ऐसे में तालिबान के सामने कोई चुनौती नहीं बची। उसने बड़ी ही आसानी से राजधानी काबुल को अपने कंट्रोल में ले लिया। इसके बाद के दो हफ्ते के ओस और अनिश्चितता में बीते। अगस्त के आखिर
03:20
Speaker A
में अंतिम अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से निकल गया। तब से तालिबान डिफेक्टो रूल चला रहा है। यह तालिबान का बेसिक परिचय है। लेकिन इसका कैरेक्टर इतना सिंपल नहीं है। इसकी तह में कई दिलचस्प कहानियां छिपी हुई हैं। तारीख 27 दिसंबर 1979। काबुल के ताज बेग
03:42
Speaker A
पैलेस में जश्न का माहौल था। उस रोज अफगानिस्तान के सुप्रीम लीडर हफीजुल्लाह अमीन ने अपने मित्रों को दावत पर बुलाया था। अमीन सितंबर 1979 में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान पीडीपीए के जनरल सेक्रेटरी बने थे। पीडीपीए एक कम्युनिस्ट पार्टी थी जो
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Speaker A
सोवियत संघ की तर्ज पर सरकार चला रही थी। जिसमें पार्टी का जनरल सेक्रेटरी ही मुल्क का सर्वे सर्वा होता था। अमीन से पहले कुर्सी नूर मोहम्मद तराकी के पास थी। सितंबर 1979 में अमीन ने उनका तख्ता पलट कर दिया था और कुछ दिनों बाद हत्या करा दी
04:16
Speaker A
थी। तराकी सोवियत संघ के तत्कालीन लीडर लियोनिद ब्रेज़नेव के करीबी थे। उनकी हत्या से सोवियत संघ नाराज हो गया। वो तो अमीन भी कम्युनिस्ट थे लेकिन उनकी दिलचस्पी अमेरिका में बढ़ रही थी। कुर्सी हत्याने के बाद वह अमेरिकी डिप्लोमेट आर्चर ब्लड
04:32
Speaker A
से मिल रहे थे। उन्होंने अमेरिका के साथ रिश्ते ठीक करने का आग्रह किया। आर्चर ब्लड वही डिप्लोमेट हैं जो 1971 में ईस्ट पाकिस्तान में अमेरिका के काउंसिल जनरल थे। उन्होंने ही अपनी सरकार को एक सनसनीखेज टेलीग्राम भेजा था जिसमें पाकिस्तानी सेना
04:48
Speaker A
के अत्याचारों के बारे में बताया गया था। लेकिन रिचर्ड निकन की सरकार ने उनकी चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। खैर आर्चर ब्लड और हफीजुल्ला अमीन की मुलाकात सोवियत संघ के लिए चिंता की बात थी। इसलिए उनके मन में शक पैदा कर दिया। फिर
05:06
Speaker A
अफगानिस्तान में फौज उतारने का प्लान बना। उससे पहले अमीन को रास्ते से हटाना जरूरी था। कोल्ड वॉर में लड़ाईयों का पहला मोर्चा खुफिया एजेंसियां संभालती थीं। अमेरिका के पास सीआईए और सोवियत संघ के पास केजीबी थी। अफगानिस्तान में सोवियत
05:22
Speaker A
संघ का दखल 1960 के दशक से बढ़ गया था। इसी अनुपात में केजीबी के अफगानिस्तान में दिलचस्पी भी बढ़ी थी। उनके एजेंट्स काबुल में हरदम तैनात रहते थे। जब उन्हें आदेश मिला, उन्होंने दो बार अमीन को मारने की
05:37
Speaker A
कोशिश की। पहली बार केजीबी ने कोका कोला ड्रिंक में जहर मिलाया था। लेकिन केमिकल रिएक्शन की वजह से जहर का असर खत्म हो गया। दूसरी दफा उनको स्नाइपर शॉट से मारने की कोशिश की गई थी। लेकिन काम नहीं बना। इसी
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Speaker A
बीच अमीन ने अपना सरकारी घर छोड़ दिया और ताज बेग पैलेस में शिफ्ट हो गए। इस पैलेस में अफगान आर्मी के कोर का हेड क्वार्टर था। अमीन को लगा कि वह वहां सुरक्षित रहेंगे। इसी भरोसे में उन्होंने अपने
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Speaker A
करीबी लोगों को दावत पर बुलाया था। लेकिन केजीबी वहां भी मौजूद थी। दरअसल केजीबी का एक एजेंट रसोइया बनकर घुस गया था। उसने खाने में जहर मिला दिया था। जैसे ही भोजन खत्म हुआ, ज्यादातर मेहमान बेहोश हो चुके
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Speaker A
थे। अमीन की हालत भी बिगड़ती जा रही थी। जब सोवियत राजदूत को मालूम चला, उन्होंने तुरंत दो डॉक्टर्स भेजे। उन्हें असली प्लान के बारे में कुछ भी नहीं पता था। सोवियत डॉक्टर्स ने बड़ी मेहनत से जहर निकाल दिया था। अमीन अब सुरक्षित थे,
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Speaker A
लेकिन कुछ देर बाद डॉक्टरों के देश से एक स्पेशल फोर्स आई। उनकी एक टीम ने ताज बेग पैलेस में घुसकर अमीन को मार दिया। उसी वक्त बाकी सैनिक काबुल के अहम ठिकानों पर कब्जा कर रहे थे। अमीन के मरते ही सोवियत
06:46
Speaker A
संघ ने बारबा कमाल को अफगानिस्तान की सत्ता सौंप दी और उनके सपोर्ट में अपनी फौज भी भेज दी। यह अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के आक्रमण की शुरुआत थी। लेकिन उनकी बड़ी भूल साबित हुई। आगे चलकर इसने उनके साम्राज्य को डुबो दिया। अमीन की हत्या ने
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Speaker A
अमेरिका में हलचल पैदा कर दी थी। कोल्ड वॉर की एक और बाजी उसके हाथ से निकल गई थी। वैसे 1970 का पूरा दशक ही अमेरिका के लिए बेकार गुजर रहा था। घर में भी और घर से बाहर भी। कुछ उदाहरण इसके देखिए। 1971
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Speaker A
में भारत और सोवियत संघ ने संधि कर ली थी। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उसने अपना समुद्री बेड़ा भेजकर भारत को डराने की कोशिश की थी, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान को बुरी
07:32
Speaker A
तरह हराया बल्कि उसने ईस्ट पाकिस्तान को काटकर अलग देश भी बनवा दिया। फिर 1973 में अरब-इजराइल युद्ध के दौरान अरब देशों ने तेल की सप्लाई बंद कर दी थी। इसके चलते अमेरिका में तेल का भारी संकट खड़ा हो गया
07:46
Speaker A
था। 1974 में वाटरगेट स्कैंडल की वजह से राष्ट्रपति रिचर्ड निकन को इस्तीफा देना पड़ा। 1975 में वियतनाम वॉर खत्म हुआ जब नॉर्थ वियतनाम के कम्युनिस्टों ने साउथ वियतनाम पर कब्जा कर लिया और अमेरिका को आनन-फानन में वियतनाम छोड़कर भागना पड़ा।
08:02
Speaker A
फिर मार्च 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और नए सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खुमैनी ने अमेरिका को बड़ा शैतान घोषित कर दिया। खुमैनी से पहले ईरान की सरकार अमेरिका के इशारों पर नाचती थी। इस झटके के 9 महीने बाद अफगानिस्तान
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Speaker A
में सोवियत संघ ने अपनी सेना उतार दी थी। अमेरिका को डर हुआ कि पाकिस्तान भी उसकी पहुंच से निकल सकता है। उसके सामने इस वक्त बड़ी चुनौती पैदा हो गई थी। लेकिन एक मौका भी था। वो सोवियत संघ के लिए वियतनाम
08:32
Speaker A
वाली स्थिति बना सकता था। उसने अफगानिस्तान में अपना पूरा दमखम लगाने का फैसला कर लिया। अमेरिका ने जुलाई 1979 में ऑपरेशन साइक्लोन शुरू किया था। इसके तहत सीआईए अफगानिस्तान के एंटी कम्युनिस्ट गुटों को पैसे और हथियार दे रही थी।
08:48
Speaker A
अमेरिका के अलावा पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देश भी मदद कर रहे थे। वे सोवियत संघ को इस्लाम का दुश्मन मानते थे। हालांकि उनकी मदद लिमिटेड स्केल पर थी। जैसे ही सोवियत संघ ने सेना भेजी, मुस्लिम नेताओं ने जिहाद का ऐलान कर दिया। उनकी
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Speaker A
अपील पर 40 से ज्यादा देशों के मुसलमान लड़ाके अफगानिस्तान पहुंचे। उन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई रिक्रूट और ट्रेन करती थी। जबकि हथियार और पैसे अमेरिका के अलावा मिडिल ईस्ट के देशों से पहुंच रहे थे। सोवियत आर्मी के
09:17
Speaker A
घुसने के बाद अमेरिका ने मदद कई गुना बढ़ा दी। इस लड़ाई में कई जिहादी गुट बने हुए थे। सबके अपने-अपने समर्थक थे। उनका मॉडस ऑपरेन्डी भी अलग था। लेकिन उनका मकसद एक था, सोवियत संघ को बाहर निकालना। इन लड़ाकों
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Speaker A
को मुजाहिदीन कहा गया। सोवियत आर्मी काफी ताकतवर थी। उनके पास पूरी एयरफोर्स थी। वे बिना जमीन पर उतरे पूरे का पूरा गांव उड़ाने की काबिलियत रखते थे। लेकिन मुजाहिदीनों के पास लोकल सपोर्ट था। वे अफगानिस्त
09:48
Speaker A
इसलिए उनको खत्म करना मुश्किल हो रहा था। फिर जब अमेरिका ने उन्हें स्ट्रिंगर मिसाइलें थमाई पूरा खेल बदल गया। इन मिसाइलों को कंधे पर रखकर चलाया जा सकता था। कुछ ही समय में मुजाहदीनों ने सोवियत एयरफोर्स को तबाह कर दिया। इसने सोवियत
10:03
Speaker A
आर्मी का बचा खुचा मनोबल भी तोड़ दिया था। और इसी बीच 1985 में सोवियत संघ में निजाम बदल गया। सत्ता मिखायल गोरबा चोफ के पास आ चुकी थी। वे कोल्ड वॉर खत्म करने का प्लान बना रहे थे। इसके लिए अफगानिस्तान से
10:17
Speaker A
निकलना बेहद जरूरी था। उन्होंने अफगान सरकार को बता दिया कि वे 1988 तक अपनी फौज बाहर निकाल लेंगे। हालांकि पैसे और हथियारों की मदद जारी रखी जाएगी। फिर अप्रैल 1988 में सोवियत संघ, अमेरिका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान ने जिनेवा
10:34
Speaker A
अकॉर्ड्स पर दस्तखत किए, और 15 फरवरी 1989 को आखिरी सोवियत सैनिक अफगानिस्तान छोड़कर निकल गया। इसके साथ ही सोवियत अफगान युद्ध खत्म हो चुका था लेकिन कुछ चीजें अब भी बाकी थी। अफगानिस्तान की सत्ता अभी भी कम्युनिस्ट पार्टी के पास थी और
10:51
Speaker A
मुजाहिदीनों ने अपने हथियार नहीं डाले थे। उन्होंने कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ लड़ाई जारी रखी। उन्हें अमेरिका से मदद मिलती रही। लेकिन दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का पतन हो गया। इसके कुछ समय बाद ही मुजाहदीनों ने काबुल की कुर्सी हथिया ली।
11:07
Speaker A
उधर अमेरिका का सबसे बड़ा मकसद पूरा हो चुका था। उसने कोल वॉर जीत लिया था। अब उसको अफगानिस्तान से कोई मतलब नहीं था। इसलिए 1992 में उसने ऑपरेशन साइक्लोन बंद कर दिया और अफगानिस्तान को अपने एजेंडे से गायब कर दिया। लेकिन कुछ समय बाद
11:25
Speaker A
अफगानिस्तान उसकी नींद में खलल डालने वाला था। इस खलल की स्क्रिप्ट अमेरिका ने ही लिखी थी। सोवियत अफगान वॉर में लगभग 15 लाख लोगों की जान गई थी। हजारों मुजाहदीन उम्र भर के लिए विकलांग हो गए थे। उनमें से एक मुल्ला
11:43
Speaker A
उमर भी था। वो कंधार के एक सुदूलर गांव में पैदा हुआ था। बचपन में ही परिवार की जिम्मेदारी उसके ऊपर आ गई थी। परिवार चलाने के लिए वह मदरसा चलाने लगा। किसी तरह उसका गुजारा चल रहा था। तभी सोवियत
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Speaker A
संघ का हमला हो गया। मुल्ला उमर भी जिहाद में शामिल हुआ। उसने गुलबदीन हिकमतयार का हिज इस्लामी गुट ज्वाइन किया था। यह मुजाहदीनों के सबसे प्रभावशाली गुटों में से एक था। इस गुट पर आईएसआई का बरदहस्त भी था। सोवियत संघ के निकलने के बाद मुजाहदीन
12:12
Speaker A
नजीबुल्लाह की सरकार गिराने में जुट गए। मोहम्मद नजीबुल्लाह अफगान सोवियत वॉर के आखिरी दिनों में राष्ट्रपति बने थे। सोवियत संघ ने जाते-जाते वायदा किया था कि उन्हें सपोर्ट मिलता रहेगा। लेकिन 1991 में सोवियत संघ टूट गया। रूस की शक्तियां
12:28
Speaker A
रूस के पास आ गई। रूस के नए राष्ट्रपति बोरिसन ने अफगानिस्तान को मदद देने से मना कर दिया। इसके बाद नजीबुल्लाह के लिए कोई चारा नहीं बचा। उनके गार्ड्स तक छोड़कर भाग चुके थे। अप्रैल 1992 में नजीबुल्लाह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और देश
12:44
Speaker A
छोड़कर भागने की कोशिश की लेकिन उन्हें जाने नहीं दिया गया। आखिर में उन्हें काबुल में यूएन के हेड क्वार्टर में शरण मिली। नजीबुल्ला के इस्तीफे के बाद सत्ता मुजाहदीनों के पास आ चुकी थी। लेकिन गुट बहुत सारे थे। हर कोई सरकार चलाना चाहता
12:59
Speaker A
था। उनके बीच गतिरोध खत्म करने के लिए पेशावर में एक समझौता हुआ। इसमें तय यह हुआ कि सब मिलकर सरकार चलाएंगे। सत्ता बुरहानुद्दीन रब्बानी को मिली। वो ताजिक मुल्क के थे। अफगानिस्तान में ताजिक दूसरे सबसे बड़े एथनिक ग्रुप हैं। उनकी आबादी
13:14
Speaker A
27% के आसपास है। सबसे बड़ी संख्या पश्तूनों की है। पॉपुलेशन में उनकी हिस्सेदारी 40% से ज्यादा की है। पेशावर अकॉर्ड से पश्तून गुट खुश नहीं थे। नाराज गुटों में सबसे प्रमुख गुलबदीन हिकमियार का हिल्स पे इस्लामी था। जिसके साथ मुल्ला
13:31
Speaker A
उमर लड़ने आया था। लेकिन सोवियत वॉर खत्म होने के बाद वह अपने गांव वापस लौट गया था। उलबदीन एक मिथियार को रब्बानी सरकार में प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली। 1993 से 1994 के बीच कुछ समय के लिए कुर्सी पर भी
13:46
Speaker A
रहा। लेकिन ज्यादातर समय वह अपनी ही सरकार के खिलाफ लड़ता रहा। दरअसल वह पाकिस्तान का पसंदीदा था। पाकिस्तान उसको काबुल की कुर्सी पर देखना चाहता था, लेकिन उसकी चाल सफल नहीं हो पाई। फिर उन्होंने चाबी भरी और एकमतियार ने नई जंग छेड़ दी थी। उसने
14:02
Speaker A
काबुल के आसपास के इलाकों को आसानी से जीत लिया। फिर काबुल की घेराबंदी करके बैठ गया और रूटीन बनाकर काबुल पर गोलाबारी करने लगा। रब्बानी सरकार के लिए ठीक से काम करना मुश्किल हो गया। अफगानिस्तान पर से उनकी पकड़ फिसलती चली गई। इसका फायदा
14:18
Speaker A
दूसरे गुटों ने भी उठाया। अफगानिस्तान सिविल वॉर और अराजकता के दलदल में फंसता जा रहा था। जो मुजाहिदीन जंग के बाद शांति की उम्मीद कर रहे थे, उन्हें इससे काफी बड़ा झटका लगा था। उनमें से कुछ लोग मुल्ला उमर से मिलने पहुंचे और उससे राह
14:33
Speaker A
दिखाने की अपील की। मुल्ला उमर ने पहले तो उन पर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन जब मामला बढ़ा तब उसने मदरसे के छात्रों को जमा करना शुरू किया। वो उन्हें ट्रेन करने लगा। फिर आया 1994 का साल। एक दिन कुछ
14:45
Speaker A
गांव वाले मुल्ला उमर के पास फरियाद लेकर आए। उन्होंने एक कमांडर की शिकायत की जो पड़ोस के गांव से दो लड़कियों को किडनैप कर ले गया था और उनका रेप कर रहा था। मुल्ला उमर ने तुरंत 30 छात्रों के साथ
14:56
Speaker A
मिलकर कमांडर के कैंप पर हमला किया। उसने दोनों लड़कियों को छुड़ा लिया और कमांडर को मारकर टैंक से लटका दिया। इस घटना के बाद मुल्ला उमर की ख्याति फैल गई। उसकी छवि रॉबिनहुड उमर की बन गई थी। लोग अपनी
15:12
Speaker A
छोटी बड़ी समस्याएं लेकर उसके पास जाने लगे। जो काम सरकार नहीं कर पा रही थी मुल्ला उमर उन्हें चुटकियों में पूरा करने लगा। धीरे-धीरे लोग उससे जुड़ने लगे। पाकिस्तान और ईरान के रेफ्यूजी कैंप में रहने वाले अफगान नौजवान भी उसको ज्वॉइ कर
15:27
Speaker A
रहे थे। इस तरह तालिबान की शुरुआत हुई। तालिबान ने पाकिस्तान को नई लाइफलाइन दी। वह गुलबदीन हिकमियार के पीछे पैसा बहाकर तंग आ चुका था। लेकिन उसको मनचाहा रिजल्ट नहीं मिल रहा था। जब तालिबान ने पकड़ बनानी शुरू की, पाकिस्तान ने उससे हाथ
15:43
Speaker A
मिला लिया। ऐसा उन्होंने एकमतियार की कीमत पर किया था। उसके गुट को अकेला छोड़ दिया गया था। एक मथियार इससे हक्का बक्का रह गया। उसके पांव के नीचे से जमीन खिसक गई थी। तालिबान तेजी से काबुल की तरफ बढ़ रहा
15:57
Speaker A
था। 1996 की शुरुआत में वे काबुल के करीब पहुंच चुके थे। फिर एक में राष्ट्रपति रब्बानी के पास गया। उसने प्रधानमंत्री की कुर्सी मांगी और तालिबान को रोकने में जुट गया। लेकिन तब तक कहानी पूरी तरह बदल चुकी
16:10
Speaker A
थी। सितंबर 1996 में तालिबान ने यूएन हेड क्वार्टर्स पर हमला कर दिया। उन्होंने नजीबुल्लाह को बाहर निकाला और उसको मारकर लैंप पोस्ट से लटका दिया। इसके पहले अफगान सरकार हथियार डाल चुकी थी। राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी काबुल छोड़कर भाग
16:28
Speaker A
चुके थे और गुलबद्दीन एक मिथियान ने पंचशीर घाटी में शरण ले ली थी। इसी के साथ अफगानिस्तान का तख्त तालिबान के नाम हो चुका था। मुल्ला उमर इस तख्त का बेताज बादशाह था। इससे 3 महीने पहले एक और शख्स
16:44
Speaker A
काबुल पहुंचा था। वो सऊदी अरब के एक बड़े कारोबारी का बेटा था। उसने सोवियत संघ के खिलाफ जिहाद में हिस्सा लिया था। लेकिन जिहाद के बाद अपने ही देश ने उसको निकाल दिया था। कोई और देश उसको पनाह देने के
16:59
Speaker A
लिए तैयार नहीं था। ऐसे में मुल्ला उमर ने बाहें फैलाकर उसका स्वागत किया। इस स्वागत में 21वीं सदी की एक निर्णायक घटना की नीव तैयार की थी। वो शख्स कोई और नहीं बल्कि ओसामा बिन लादेन था। ओसामा बिन लादेन सऊदी अरब के जिद्दा में
17:18
Speaker A
पैदा हुआ था। उसके पिता मोहम्मद बिन लादेन बड़े रियलस्टेट बिल्डर थे। अफगानिस्तान पर सोवियत अटैक के वक्त लादेन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहा था। जब जिहाद का ऐलान हुआ, वह भी अफगानिस्तान पहुंच गया। इस जिहाद में सऊदी अरब भी मदद कर रहा था।
17:33
Speaker A
लादेन इस पैसे को जिहादी कुटों तक पहुंचाता था। उसने मुजाहदीनों के लिए अस्पताल, सड़कें और सुरंगे बनाई। उसने अरब देशों से नौजवानों को रिक्रूट भी किया। सोवियत संघ की हार के बाद लादेन सऊदी अरब वापस लौट गया। वहां उसका स्वागत हुआ लेकिन
17:50
Speaker A
उसका मिशन खत्म नहीं हुआ था। उसके पास हजारों ट्रेन मुजाहदीन थे जो उसके एक इशारे पर कुछ भी करने के लिए तैयार थे। ब्लादीन ने तब तक अलकायदा बना लिया था। अब वो पूरी दुनिया में जिहाद फैलाना चाहता
18:04
Speaker A
था। उसने सऊदी सरकार को अपना आईडिया बताया। लेकिन सऊदी अरब अमेरिका के साथ दोस्ती मजबूत कर रहा था। उन्हें लगा कि लादेन इस रिश्ते में दरार डाल सकता है। इसलिए उन्होंने लादेन को देश से बाहर निकाल दिया। लादेन सऊदी अरब से निकला तो
18:19
Speaker A
कुछ समय अफगानिस्तान में रहा। फिर वह सूडान पहुंच गया। वहां सैन्य तानाशाह उमर अल बशीर शासन चला रहा था। लादेन ने सूडान में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स बनाने का ऑफर दिया। उसने बदले में अपने लोगों के लिए जगह मांगी। बशीर इसके लिए तैयार हो
18:34
Speaker A
गया। इस तरह अलकायदा हलने फूलने लगा। लेकिन कुछ समय बाद इंटरनेशनल कम्युनिटी की नजर टेढ़ी होने लगी। उन्होंने बशीर पर दबाव बनाया। जब लादेन को सुडान छोड़कर जाना पड़ा। मई 1996 में वह अफगानिस्तान चला गया। इसके 3 महीने बाद ही तालिबान ने
18:50
Speaker A
काबुल पर कब्जा कर लिया था। तब लादेन ने मुल्ला उमर से दोस्ती कर ली। मुल्ला उमर ने उसको अफगानिस्तान की धरती से ग्लोबल जिहाद फैलाने की खुली छूट दे दी। तालिबान के संरक्षण में लादेन ने दो फतवे जारी
19:03
Speaker A
किए। उसने कहा अमेरिका और इसराइल मुस्लिमों की सबसे पवित्र धरती पर कब्जा करके बैठे हैं। उनके लोगों को मारना दुनिया के हर एक मुस्लिम का फर्ज है। दूसरा फतवा फरवरी 1998 में जारी हुआ था। इसके 6 महीने बाद ही अलकायदा ने तंजानिया
19:20
Speaker A
और केन्या में अमेरिकी दूतावासों पर हमला किया। इन हमलों में 224 लोग मारे गए। इसने अमेरिका को सन कर दिया। उसको मजबूरन अफगानिस्तान पर ध्यान देना पड़ा। लेकिन उसने अपनी सेना नहीं उतारी। इसके बजाय उसने नॉर्दन अलायंस के साथ समझौता कर
19:35
Speaker A
लिया। नॉर्दन अलायंस के मुखिया अहमद शाह मसूद थे जिन्हें पंजशीर का शेर भी कहते थे। मसूद सोवियत संघ के खिलाफ लड़े थे। उन्होंने नजीबुल्लाह सरकार गिराने में भी मदद की थी। बुरानुद्दीन रब्बानी सरकार ने वो डिफेंस मिनिस्टर रहे। तालिबान के कब्जे
19:51
Speaker A
के बाद उन्हें काबुल छोड़ना पड़ा था। लेकिन उन्होंने अपना गढ़ बचा कर रखा था। उन्हें भारत, ईरान, रूस और सेंट्रल एशिया के कुछ देशों से मदद मिलती थी। अलकायदा के हमले के बाद अमेरिका भी मसूद को मदद देने
20:05
Speaker A
आया। वे साथ मिलकर लादिन को खत्म करना चाहते थे। लेकिन उससे पहले दूसरा कांड हो गया। तारीख थी 9 सितंबर 2001। दो पत्रकार कई हफ्तों से मसूद से बात करना चाह रहे थे। मसूद ने उन्हें 9 सितंबर का समय दिया
20:19
Speaker A
था। इंटरव्यू की शुरुआत में ही उनसे लादेन से जुड़ा सवाल पूछा गया। मसूद बोल ही रहे थे तभी धमाका हो गया। असल में दोनों अलकायदा के आतंकी थे। धमाके में मसूद की मौत हो गई। इसके दो दिन बाद अलकायदा ने
20:33
Speaker A
अमेरिका पर सबसे बड़ा आतंकी हमला किया। इसमें लगभग 3000 लोग मारे गए। शांति काल में अमेरिका पर इतना बड़ा हमला कभी नहीं हुआ था। वो किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठ सकता था। राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने
20:47
Speaker A
हमले के जिम्मेदार लोगों को ढूंढकर खत्म करने का वादा किया। नो डिस्टिंशन बिटवीन द टेररिस्ट। [संगीत] अमेरिका की शुरुआती जांच में अलकायदा और ओसामा बिन लादेन का नाम सामने आया। लादेन अफगानिस्तान में बैठा था। अमेरिका ने तालिबान सरकार को अल्टीमेटम दिया। लादेन
21:09
Speaker A
को सौंप दो वरना हमला करेंगे। लेकिन तालिबान ने मना कर दिया। 7 अक्टूबर 2001 को अमेरिका और ब्रिटेन ने ऑपरेशन एंडरिंग फ्रीडम लॉन्च किया। उन्होंने अलकायदा और तालिबान के ठिकानों पर बमबारी शुरू कर दी। उन्हें तालिबान के विरोधी गुटों का भी साथ
21:23
Speaker A
मिला। तालिबान पर चारों तरफ से मार पड़ रही लेकिन वो लादेन को अमेरिका के हवाले करने के लिए तैयार नहीं हुआ। उसने कहा पहले गुनाह साबित करो। अगर साबित हो गया तो हम उसको तीसरे देश में भेज देंगे।
21:37
Speaker A
लेकिन अमेरिका को नहीं सौंपेंगे। जब हमला और बढ़ा तब तालिबान सरेंडर करने के लिए तैयार हो गया। लेकिन अमेरिका ने उसका ऑफर ठुकरा दिया। इस समय तक बात समझौते से आगे बढ़ चुकी थी। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैनिक अफगानिस्तान पहुंच चुके
21:54
Speaker A
थे। 14 नवंबर तक उन्होंने तालिबान को काबुल से खदेड़ दिया था। लेकिन लादेन का कहीं अता-पता नहीं था। दिसंबर 2001 में तोराबोरा की पहाड़ियों में दो हफ्ते तक भीषण जंग चली मगर लादेन बचकर निकल गया। 9 दिसंबर को मुल्ला उमर भी कंधार छोड़कर भाग
22:10
Speaker A
गया। इसी के साथ तालिबान की सरकार गिर चुकी थी। उसका पूरा संगठन बिखर चुका था। लेकिन उसकी जड़े खत्म नहीं हुई थी। तालिबान की जड़े अफगानिस्तान के अंदर तक फैली थी। वे अफगान सोसाइटी का हिस्सा थे। आम लोगों और तालिबान में फर्क करना
22:30
Speaker A
मुश्किल था। जब उनके ऊपर खतरा आया वे समाज में घुलमिल गए और गोरिल्ला जंग करने लगे। तालिबान की लीडरशिप पाकिस्तान में छिप कर रहने लगी। पाकिस्तान वॉर ऑन टेरर में अमेरिका के साथ था। लेकिन बैकडोर से वो तालिबान को बचा भी रहा था। इसने तालिबान
22:46
Speaker A
को दोबारा खड़े होने में मदद की। जब वे दोबारा खड़े हुए तो पश्चिमी देशों को आफत होने लगी। उनके सैनिकों पर हमले बढ़ने लगे। कई अहम इलाकों पर तालिबान ने दोबारा कंट्रोल हासिल कर लिया। 2010 के दशक में
23:00
Speaker A
अमेरिका को अपनी हार का एहसास हो चुका था। अफगानिस्तान उनके लिए दूसरा वियतनाम बनने जा रहा था। इसलिए वे सम्मान के साथ वापस लौटने की फिराक में जुट गए। फिर अप्रैल 2011 में उन्होंने पाकिस्तान में छिपे ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। उनका सबसे
23:15
Speaker A
बड़ा टारगेट मारा जा चुका था। इसी मकसद से वे अफगानिस्तान गए भी थे। टूाई आई कैन रिपोर्ट टू द अमेरिकन पीपल एंड टू द वर्ल्ड द यूनाइटेड स्टेट्स है कंडक्टेड इन ऑपरेशन दैट किल्ड ओसामा बिन लाडन द लीडर
23:30
Speaker A
ऑफ़ अलका लादीन की मौत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को निकालने की शुरुआत की। 2011 में जहां 90 हजार अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में थे, 2016 तक उनकी संख्या गिरकर 6000 तक पहुंच गई थी। जो बच गए थे
23:46
Speaker A
उनका रोल अफगान आर्मी को ट्रेनिंग और एयर सपोर्ट देने तक सीमित रह गया था। फिर जनवरी 2017 में डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए थे। वे अफगानिस्तान छोड़ने को लेकर संशय में थे। उनका कहना था कि ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया
24:01
Speaker A
जाएगा। उन्होंने नए सिरे से अमेरिकी सैनिकों की तैनाती भी शुरू कर दी थी। इससे नाराज तालिबान ने हमले बढ़ा दिए। 2018 में हालात बद से बदतर हो चुके थे। तब बैकडोर से अमेरिका ने नेगोशिएशन शुरू किए। अक्टूबर 2018 में पाकिस्तान को एक फरमान
24:19
Speaker A
मिला और उसने तालिबान के एक बड़े नेता को बाइ्जत रिहा कर दिया। उसका नाम मुल्ला अब्दुल गनी बरादर था। उसने मुल्ला उमर के साथ मिलकर तालिबान बनाया था। अमेरिका के हमले के बाद वो पाकिस्तान में छिप गया था।
24:34
Speaker A
2010 में पाकिस्तानी सेना ने उसको कराची में गिरफ्तार कर लिया था। तब से वह जेल में था। जेल में होने के बावजूद तालिबान में उसकी तूती बोलती थी। उसके बिना पीस डील नहीं हो सकती थी। इसीलिए अमेरिका ने
24:48
Speaker A
दबाव डालकर उसको जेल से रिहा करवाया था। जेल से निकलने के बाद बरादर दोहा पहुंचा। तालिबान ने वहां 2013 में अपना पॉलिटिकल ऑफिस खोला था। बारादर ने उसकी कमान संभाली और फिर अमेरिका के साथ बातचीत शुरू हुई। फिर फरवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान ने
25:05
Speaker A
पीस डील कर ली। इसके तहत अमेरिका अपने सैनिकों को बाहर निकालने के लिए तैयार हो गया। बदले में तालिबान ने वादा किया कि वह अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ नहीं होने देगा। इस डील में अफगान सरकार को शामिल नहीं किया गया था।
25:20
Speaker A
उनसे कहा गया वे अलग से तालिबान के साथ बात करें। ट्रंप ने जो डील की थी उसको बाइडन सरकार ने लागू किया। उन्होंने डील को अमेरिका की जीत के तौर पर प्रोजेक्ट किया। अमेरिका ने दावा किया कि उनका मकसद
25:32
Speaker A
पूरा हो चुका है। इसलिए वे बाहर निकल रहे हैं। लेकिन ऐसा था नहीं। उनके निकलने की वजह कुछ और भी थी। पॉइंट वाइज आपको इसे बताते हैं। पहली वजह अफगानिस्तान में अमेरिका टेरर कैंप्स को खत्म करने गया था।
25:46
Speaker A
लेकिन वहां जाकर उसका इरादा बदल गया। वो अफगानिस्तान में नेशन बिल्डिंग की बात करने लगा। लोकल राजनीति में दखल देने लगा। अपनी पसंद की सरकार तक बनाने लगा। कहने को यह जनसमर्थन की सरकार थी। लेकिन यह सब पैसे और फौज की बदौलत हो रहा था। ऐसी
26:01
Speaker A
व्यवस्था हमेशा कायम नहीं रह सकती थी। दूसरी वजह 2003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन के इराक पर हमला कर दिया था। तब वो अपने रिसोर्सेज अफगानिस्तान से उठाकर इराक भेजने लगा। उसका ध्यान अफगानिस्तान से हट गया था। इसी दौरान तालिबान खुद को रीगुप
26:18
Speaker A
करने लगा था। वह रूरल इलाकों में अपनी पैठ भी बढ़ा रहा था। जब तक अमेरिका को इसकी भनक लगी तब तक तालिबान काफी मजबूत हो चुका था। तीसरी वजह अमेरिका ने 2001 से 2021 के बीच अफगानिस्तान पर $.2 ट्रिलियन की रकम
26:35
Speaker A
खर्च की। इस जंग में उसके 2300 से ज्यादा सैनिक मारे गए। अमेरिका के सहयोगी देशों के 1100 सैनिकों की जान भी गई। अफगानिस्तान में $.5 लाख से ज्यादा आम लोग हताहत हुए। लगभग 40 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था और यह समय के साथ
26:51
Speaker A
बढ़ता जा रहा था। अमेरिका किसी भी समय पर नुकसान कंट्रोल करने की स्थिति में नहीं था। इसके चलते उसके घर में विरोध होने लगा था। वहां एक बड़ा धड़ा अफगान वॉर को खत्म करने की मांग करने लगा था। चौथी वजह जब
27:05
Speaker A
अमेरिका का नुकसान बढ़ने लगा। उसने अपनी जिम्मेदारी शिफ्ट करने का प्लान बनाया। उसने अफगानिस्तान की सुरक्षा की जिम्मेदारी लोकल आर्मी को सौंपने का दावा किया। ट्रेनिंग, हथियार और पैसा अमेरिका ही देने वाला था। लेकिन अफगानिस्तान सरकार और फौज के अंदर बेहिसब करप्शन था।
27:22
Speaker A
इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मिला पैसा नेता खा जाते थे। अफगान सैनिकों को वर्दी तक नहीं मिलती थी। फर्जी सैनिकों के नाम पर सैलरी उठाई जाती थी और फौज के अंदर भी बहुत सारे लोग तालिबान से सहानुभूति रखते थे। इसीलिए
27:35
Speaker A
जब अमेरिका ने बाहर निकलना शुरू किया। ज्यादातर शहरों को बड़ी आसानी से जीत लिया। उन्हें अफगान आर्मी से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली। पांचवी वजह अमेरिका अफगानिस्तान में अपने रोल को लेकर कभी श्योर नहीं रहा। कभी वह लिबरेटर की भूमिका
27:50
Speaker A
में होता, कभी रिफॉर्मर बन जाता था। अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता लाने का वादा किया था। लेकिन उसके हमले में ज्यादातर आम लोग मारे जा रहे थे। इसके चलते आम जनता का भरोसा खत्म हो चुका था। अमेरिका पेस सेविंग मोड में जा चुका
28:06
Speaker A
था। बाहर निकलने के सिवा उसके कंट्रोल में और कुछ नहीं था। यह चीज काबुल एयरलिफ्ट के दौरान भी दिखी। तालिबान को लेकर अमेरिका का प्रेडिक्शन फेल रहा। उसका अनुमान था कि उसके निकलने के दो-ती महीने बाद ही तालिबान कुछ कर पाएगा। लेकिन डेडलाइन से
28:20
Speaker A
दो हफ्ते पहले ही तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था। इसके चलते भयंकर अराजकता फैली एयरलिफ्ट के बीच में एक बड़ा आतंकी हमला भी हुआ। जब तक उनका अंतिम सैनिक बाहर निकला तब तक पूरी छीछाले दर हो
28:34
Speaker A
चुकी थी। इसने जो बाइडन की इमेज को जबरदस्त धक्का पहुंचाया था। वो इससे कभी उभर नहीं पाए और अंततः उन्हें 204 के राष्ट्रपति चुनाव से अपना नाम वापस लेना पड़ा। नाम वापस लेने की तात्कालिक वजह तो उनकी उम्र थी लेकिन अफगानिस्तान ने भी
28:50
Speaker A
इसमें बेहद अहम भूमिका निभाई थी। बहरहाल अमेरिका निकला तो अफगानिस्तान में दूसरे देशों की दिलचस्पी बढ़ने लगी। इसमें से दो तो अमेरिका के कट्टर विरोधी थे। चीन और रूस। जब तालिबान की वापसी हुई तब ज्यादातर देशों ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास
29:08
Speaker A
बंद कर दिए थे और अपने डिप्लोमेट्स को वापस बुला लिया था। बहुत कम देशों ने अपने दूतावास खुले रखे थे। उनमें रूस और चीन सबसे प्रमुख थे। दिलचस्प बात यह है कि रूस ने 1990 के दशक में एंटी तालिबान फोर्सेस
29:21
Speaker A
को सपोर्ट दिया था। 2003 में उसने तालिबान को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था और उसने वॉर ऑन टेरर में भी अमेरिका की मदद की थी। लेकिन 2021 आते-आते वर्ल्ड पॉलिटिक्स बदल चुकी थी। अब अमेरिका और रूस दोस्त नहीं थे। उनके बीच टकराव बढ़ गया था
29:37
Speaker A
और रूस तालिबान को सहयोगी के तौर पर देखने लगा था। उसने तालिबानी लीडर्स को न्योता देना शुरू कर दिया था। फिर अप्रैल 2025 में रूस ने तालिबान का टेररिस्ट टैग हटा लिया और जुलाई में तालिबान सरकार को मान्यता भी दे दी। अब वह खुलकर
29:51
Speaker A
अफगानिस्तान के साथ ट्रेड और आर्म्स डील कर सकता है। जिस तरह दो नॉर्मल देशों के रिश्ते होते हैं, वैसे रिश्ते रख सकता है। लेकिन रूस ने तालिबान को मान्यता दी क्यों? गौर से देखने पर दो बड़ी वजह इसकी
30:03
Speaker A
समझ में आती हैं। पहली वजह है इस्लामिक स्टेट इन खुरासान प्रोविंस। आईएसकेपी का उदय। आईएसकेपी अफगानिस्तान में खिलाफत की स्थापना करना चाहता है। वो तालिबान का दुश्मन तो है ही। उसने रूस में भी कई आतंकी हमले किए हैं। यह रूस के लिए
30:17
Speaker A
सिक्योरिटी प्रॉब्लम बनता जा रहा है। तालिबान को मान्यता देकर वह आईएसकेपी से बेहतर तरीके से डील कर सकता है। दूसरी वजह है बैलेंस ऑफ पावर। दिसंबर 2024 में रूस को सीरिया में एक बड़ा झटका लगा था। जब बशर अल असद को देश छोड़कर भागना पड़ा। फिर
30:33
Speaker A
सत्ता हयात तहरीर अलशाम एचटीएस के पास आ गई। एचडीएस को वेस्टर्न कंट्रीज ने आतंकवादी संगठन घोषित किया हुआ था। लेकिन जब उन्होंने असद को हराया तब पश्चिमी देशों की नजर बदलने लगी। उन्होंने एचटीएस से हाथ मिला लिया। उसके साथ ट्रेड डील
30:49
Speaker A
करने लगे और प्रतिबंध भी हटा लिए। बशर अल असद की सरकार रूस के सपोर्ट पर टिकी थी। असद के रहते रूस ने सीरिया में मिलिट्री बेससेस बनाकर रखे थे। लेकिन एचटीएस के आने के बाद उन्हें बाहर जाना पड़ा। कई
31:02
Speaker A
एक्सपर्ट्स तालिबान की मान्यता को सीरिया के काउंटर की तरह देख रहे हैं। यह सिंबॉलिक है लेकिन लॉन्ग टर्म में काफी गुलखिला सकता है। एक और चीज है अफगानिस्तान में सिर्फ रूस का स्टेक नहीं है। कई और देश भी तालिबान सरकार को अपने
31:16
Speaker A
साथ इंगेज कर रहे हैं। जिससे चीन अपने इकोनॉमिक कॉरिडोर का विस्तार अफगानिस्तान तक करना चाहता है। उसकी नजर अफगानिस्तान के नेचुरल रिसोर्सेज पर भी है। अगला नाम पाकिस्तान का है। उसने तालिबान की वापसी पर खूब जश्न मनाया था। वो खुद को किंग
31:30
Speaker A
मेकर की तरह देखता है। लेकिन पिछले कुछ समय में उनके आपसी रिश्ते खराब हुए हैं। पाकिस्तान ने तालिबान पर तहरीक तालिबान पाकिस्तान यानी कि टीटीपी और बलोच गुटों को शरण देने का आरोप लगाया है। इसी आधार पर उसने कई बार अफगानिस्तान में बमबारी की
31:46
Speaker A
है और अफगान शरणार्थियों को जबरन बाहर भी निकाला है। लेकिन लंबे समय की दुश्मनी उसके हित में नहीं है। भारत की अगर बात करें तो वो अफगानिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया तक पहुंचना चाहता है और अफगानिस्तान के जरिए पाकिस्तान पर भी दबाव बनाकर रख
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Speaker A
सकता है। इसलिए भारत ने तालिबान 2.0 के साथ बातचीत जारी रखी है। मई 2025 में भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर ने पहली बार तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुताकी से फोन पर बात की थी। ईरान भी
32:16
Speaker A
तालिबान को इंगेज कर रहा है क्योंकि दोनों देशों के बॉर्डर आपस में जुड़े हुए हैं और लाखों की संख्या में अफगान शरणार्थी उसके यहां रहते हैं। मतलब यह कि तालिबान सरकार के साथ कई देशों के हित जुड़े हुए हैं।
32:29
Speaker A
लेकिन रूस के बाद उसको मान्यता कौन देता है यह देखने वाली बात होगी। और अब आखिरी बात जिओपॉलिटिक्स को छोड़ देते हैं। स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट को भी दरकिनार कर देते हैं। अफगानिस्तान 3.5 करोड़ लोगों का देश है। इनमें से लगभग आधी महिलाएं हैं।
32:46
Speaker A
तालिबान ने पहले टर्म में भी उनको कैदी बनाकर रखा था। दफा भी उनसे बुनियादी अधिकार छीने गए हैं। बच्चियों के स्कूलों पर ताला है। महिलाओं के बाहर निकलने पर पहरा है। काम करने पर पाबंदी है। उनके पास बुनियादी अधिकार तक नहीं है। आम लोगों के
33:01
Speaker A
लिए जिंदगी जस की तस है। वे आज भी भू गरीबी, बेरोजगारी और एक आतताई सरकार की जादतियों से जूझ रहे हैं। उनका ख्याल किसी को नहीं है। उनमें कोई भी देश स्टेक नहीं लेना चाहता। उनकी सौदेबाजियों में आम जनता
33:17
Speaker A
दूर-दूर तक नहीं है। यह असली त्रासदी है जिससे अफगानिस्तान पांच दशकों से जूझ रहा है और इसका अंत दूर तक नजर नहीं आता। यह तमाम जानकारी आपके लिए लेकर आए हैं अभिषेक और कैमरा के पीछे हैं आकाश गौतम। इस
33:33
Speaker A
वीडियो में इतना ही। अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा। क्यस्तान को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करते चलिएगा। एक और कहानी के साथ फिर किसी वीडियो में आपसे मुलाकात होगी। तब तक के लिए चलती हूं। शुक्रिया।
Topics:तालिबानअफगानिस्तान इतिहासरूस मान्यतासोवियत आक्रमणअमेरिका अफगानिस्तानमुजाहिदीनअलकायदाअशरफ गनीअंतरराष्ट्रीय राजनीतिआईएसआई

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