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Congo के Patrice Lumumba को चार देशों ने मिलकर क्यों मारा था? Africa History

पेट्रिस लुमुंबा की कहानी और उनके हत्या के पीछे चार देशों की साजिश, डीआर कांगो के इतिहास पर आधारित।

Key Takeaways

  • पेट्रिस लुमुंबा अफ्रीका के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण नेता थे।
  • बेल्जियम और अन्य पश्चिमी देशों ने कांगो के संसाधनों पर कब्जा करने के लिए अत्याचार किए।
  • अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत लुमुंबा की हत्या कर दी गई।
  • कांगो का इतिहास उपनिवेशवाद और शोषण की कहानी है।
  • स्वतंत्रता के बाद भी कांगो में राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी हस्तक्षेप जारी रहा।

What the video covers

  • पेट्रिस लुमुंबा, डीआर कांगो के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्हें कुछ देशों ने मिलकर मारा।
  • डीआर कांगो पर बेल्जियम का शासन था, जिसकी शुरुआत लियोपोल्ड सेकंड से हुई।
  • बर्लिन कॉन्फ्रेंस में अफ्रीका के संसाधनों के बंटवारे का फैसला हुआ, जिसमें कांगो फ्री स्टेट लियोपोल्ड का निजी राज्य बना।
  • लियोपोल्ड के शासन में कांगो के लोगों पर अत्याचार और शोषण हुआ, जिससे लाखों लोग मारे गए।
  • 1908 में बेल्जियम सरकार ने कांगो फ्री स्टेट को नेशनलाइज कर सीधे शासन शुरू किया।
  • पेट्रिस लुमुंबा का जन्म 1925 में कसाय प्रांत के उनालुआ गांव में हुआ, जहां मिशनरियों और बेल्जियम शासन का प्रभाव था।
  • लुमुंबा का बचपन कठिन था, उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और बाद में सरकारी नौकरी की।
  • उन्होंने शुरुआत में बेल्जियम शासन की तारीफ की, लेकिन बाद में स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मांग करने लगे।
  • 1960 में कांगो को स्वतंत्रता मिली, लुमुंबा पहले प्रधानमंत्री बने, लेकिन राजनीतिक संघर्षों के कारण उनकी हत्या हुई।
  • उनकी हत्या में बेल्जियम, अमेरिका, और अन्य देशों की मिलीभगत थी, जो कांगो के संसाधनों पर नियंत्रण चाहते थे।

Answers

Questions about this video

पेट्रिस लुमुंबा कौन थे और उनकी भूमिका क्या थी?

पेट्रिस लुमुंबा डीआर कांगो के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने कांगो की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया।

कांगो पर बेल्जियम का शासन कैसे शुरू हुआ?

बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड सेकंड ने हेनरी स्टैनली की मदद से कांगो पर कब्जा किया और इसे कांगो फ्री स्टेट बनाया, जहां भारी अत्याचार हुए।

पेट्रिस लुमुंबा की हत्या क्यों हुई?

उनकी हत्या में बेल्जियम, अमेरिका और अन्य देशों की मिलीभगत थी, जो कांगो के संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते थे।

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Speaker A
यह तस्वीर अफ्रीका महाद्वीप के एक पूर्व प्रधानमंत्री की है। इस तस्वीर के कुछ दिन बाद ही उनकी जान ले ली गई थी। इसमें जो देश शामिल थे, वे पूरी दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकार के हीरो बनते फिरते हैं।
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Speaker A
लेकिन यह घटना उनके दावे पर हर रोज तमाचा मारती है। नमस्कार, मेरा नाम दिव्याशी सुमराव है। क्यूरिस्तान पर आपका स्वागत है। यह हमारी नई सीरीज नामचीन है। जिसमें हम आपको दुनिया के कुछ जानीमानी शख्सियतों की कहानी सुनाएंगे। यह किरदार सुख्यात भी हो
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Speaker A
सकते हैं और कुख्यात भी। नामचीन में आज की कहानी है डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो यानी डीआर कांगो के पहले प्रधानमंत्री पेट्रिस लुमुंबा की। अफ्रीका में कांगो नाम के दो देश हैं। एक है रिपब्लिक ऑफ कांगो। वह फ्रांस की कॉलोनी था। जबकि
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Speaker A
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो पर बेल्जियम ने शासन किया था। आज हम उसी की बात करेंगे। जुलाई 1925 में जब पेट्रिस लुमुंबा पैदा हुए तब डीआर कांगो पर बेल्जियम का शासन था। बेल्जियम के शासन की शुरुआत लियोपोल्ड सेकंड से हुई थी।
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Speaker A
लियोपोल्ड सेकंड 1865 से 1909 तक बेल्जियम का राजा रहा। कांगो में उसकी दिलचस्पी 1878 में जगी जब हेनरी मैन स्टैनली नाम का एक खोजी उसके दरबार में पहुंचा। उसने लियोपोल्ड को कांगो के बारे में बताया था। हेनरी स्टैनली को 1869 में अमेरिकी अखबार
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Speaker A
न्यूयॉर्क हेराल्ड ने हायर किया था। उसको डेविड लिविंगस्टन का पता लगाने के लिए भेजा गया था। लिविंगस्टन नील नदी का सोर्स खोजने निकले थे। लेकिन कांगो पहुंचने के बाद बाहरी दुनिया से उनका संपर्क कट गया था। 1873 में जांबिया में उनकी मृत्यु हो
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Speaker A
गई थी। स्टैनली उनसे मिल पाया या नहीं, इसको लेकर संशय है। लेकिन स्टैनली को ज्यादा बड़ी चीज जरूर मिल चुकी थी। सेंट्रल अफ्रीका में हाथी, दांत, सोने और दूसरी कीमती चीजों की भरमार थी। यह देखकर उसकी आंखें चौंधिया गईं। उसने उन संसाधनों
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Speaker A
की पूरी लिस्ट बनाई और उन्हें यूरोप तक पहुंचाने का नक्शा भी तैयार किया। फिर वह अपना प्लान लेकर ब्रिटेन गया। लेकिन ब्रिटेन साम्राज्य दूसरी जगहों में उलझा हुआ था। उसको स्टैनली के प्लान पर बहुत भरोसा भी नहीं था। इसलिए उसने बहुत
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Speaker A
दिलचस्पी इसमें नहीं दिखाई। तब स्टैनली बेल्जियम पहुंचा। बेल्जियम पांच दशक पहले ही आजाद हुआ था। वह भी ताकतवर बनना चाहता था। इसके लिए इंडस्ट्रीज और फुल फ्लेजड आर्मी की जरूरत थी। इस बीच स्टैनली की मुलाकात लियोपोल्ड सेकंड से हुई। लियोपोल्ड
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Speaker A
उससे काफी प्रभावित हुआ। उसने स्टैनली को अच्छी खासी सैलरी देने का वादा किया और उसको अपना साम्राज्य फैलाने के लिए कांगो भेज दिया। स्टैनली ने कांगो में कई ट्रेड स्टेशन बनाए और बेल्जियम की तरफ से लोकल कबीलों से समझौते भी किए। लेकिन यह समझौते
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Speaker A
फरेबजादा थे। स्टैनली ने जिनसे दस्तखत करवाए उन्हें शर्तों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता था। उनको लालच देकर भरमाया जाता था। एक जगह तो उसने हर महीने एक जोड़ी कपड़े पर पूरा प्रांत हथिया लिया था। दस्तावेज में कबीले के लोगों और उनके
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Speaker A
वंशजों को आजीवन बेल्जियम की गुलामी करने की बात लिखी थी। इस मक्कारी से स्टैनली ने लगभग पूरे कांगो रीजन में बेल्जियम का राज फैला दिया था। 1884 में स्टैनली बेल्जियम लौटा। वह जमीन के कागजात और गिफ्ट्स आदि लेकर लियोपोल्ड से मिला। उसने वीवी और
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Speaker A
लियोपोल्डविले नाम के दो शहर बसाने की बात भी कही। वीवी कांगो की पहली राजधानी थी। जबकि लियोपोल्डविले को अब केनशासा के नाम से जाना जाता है। यह आज के समय में डीआर कांगो की राजधानी है। लियोपोल्ड स्टैनली से
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Speaker A
मिलकर बेहद खुश हुआ। वो कांगो पर शासन की तैयारी करने लगा। इसी बीच उसको बर्लिन से एक न्योता मिला। जर्मनी के शासक बिस्मार्क ने यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के कुछ देशों को मिलने बुलाया था। दरअसल उन दिनों यूरोप
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Speaker A
के देश अफ्रीका के संसाधनों पर कब्जे की होड़ में लगे हुए थे। उनके बीच कोई सीमा निर्धारित नहीं थी। इसीलिए उनके बीच आपस में लड़ाई हो जाती थी। इस दुविधा को खत्म करने के लिए बर्लिन कॉन्फ्रेंस बुलाई गई।
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Speaker A
इसमें तय होना था कि कौन सा देश अफ्रीका के किस हिस्से को लूट सकता है। बर्लिन कॉन्फ्रेंस में कांगो पर लियोपोल्ड का हक मान लिया गया। यह इलाका लियोपोल्ड का प्राइवेट स्टेट बन गया। इसको नाम मिला कांगो फ्री स्टेट। नाम में फ्री था लेकिन
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Speaker A
आजादी का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था। लियोपोल्ड ने ऐसे कई फैसले लिए जिसने कांगो के लोगों का जीवन नर्क बना दिया। उसने कांगो की लगभग पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया। स्टेट जब चाहे किसी भी जमीन का इस्तेमाल
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Speaker A
कर सकता था। बेल्जियम की कंपनियों को मनमानी चलाने की छूट दी गई। यह कंपनियां अपने इलाके में रहने वाले लोगों से टैक्स वसूल सकती थीं। क्योंकि स्थानीय लोगों के पास पैसा नहीं था। टैक्स के बदले उनसे फ्री में मजदूरी करवाई जाती थी। जब यूरोप
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Speaker A
में रबर और हाथी दांत की डिमांड बढ़ी तब और मजदूरों की जरूरत पड़ी। इसके लिए लियोपोल्ड के एजेंट गांव में जाते थे। जो भी लोग चल फिर सकते थे, उनसे जबरन काम करवाया जाता था। जहां कहीं विरोध होता
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Speaker A
वहां पूरे गांव में आग लगा देते थे। रेप और हत्या काफी आम थी। इस अत्याचार की वजह से कांगो में लाखों लोग मारे गए। 1891 में जहां कांगो की आबादी लगभग 2 करोड़ थी, 1911 में गिरकर 85 लाख तक पहुंच चुकी थी।
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Speaker A
इसका सबसे बड़ा जिम्मेदार लियोपोल्ड सेकंड था। लेकिन उसको कभी इसकी सजा नहीं मिली। एक तरफ स्थानीय लोग खात्मे की कगार पर थे। दूसरी तरफ लियोपोल्ड उसके परिवार, बेल्जियम की कंपनी और बैंकों का खजाना लगातार भर रहा था। फिर कुछ और देशों की नजर इस खजाने
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Speaker A
पर पड़ी। वे भी इस लूट में हिस्सा चाहते थे। वे लियोपोल्ड का विरोध करने लगे। आखिरकार 1908 में बेल्जियम सरकार ने कांगो फ्री स्टेट को नेशनलाइज कर दिया। अब वो लियोपोल्ड का प्राइवेट स्टेट नहीं रह गया था। बेल्जियम की सरकार इस पर सीधे शासन करने
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Speaker A
वाली थी। इस सिस्टम को आप भारत के उदाहरण से भी समझ सकते हैं। जैसे 1858 तक भारत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कंट्रोल में था। उसके बाद ब्रिटिश एंपायर ने डायरेक्ट रूल किया। कांगो में भी लगभग वैसा ही हुआ
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Speaker A
था। राजा को अपनी कंपनी सरकार के हवाले करनी पड़ी थी। इसके बदले लियोपोल्ड को अच्छा खासा पैसा चुकाया गया था। इस घटना के 17 बरस बाद कसाय प्रांत में पेट्रिस लुमुंबा का जन्म हुआ। उस समय तक बेल्जियम का शासन एक फॉर्मल सिस्टम में ढलने लगा
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Speaker A
था। उनका अत्याचार या उनकी लूट खत्म नहीं हुई थी। लेकिन वह उसको कॉर्पोरेट लुक देने में कामयाब हो गए थे। डीआर कांगो के सेंटर में एक प्रांत था कसाय। अब तो यह तीन अलग-अलग राज्यों में बट चुका है। लेकिन 1925 में पूरा कसाय एक
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Speaker A
था। इसी प्रांत के उनालुआ गांव में पेट्रिस लुमुंबा पैदा हुए थे। उनके जन्म के टाइम पर उनालुआ में ईसाई मिशनरियों का बोलबाला था। वे धर्म का प्रचार तो करते ही थे। बेल्जियम सरकार के लिए टैक्स भी वसूलते थे और स्थानीय लोगों को सजा भी
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Speaker A
देते थे। उनालुआ में मुख्य काम रबर का था। लोगों को रबर इकट्ठा करने के लिए कई-कई हफ्तों तक जंगल में रहना पड़ता था। जब वे वापस आते, रबर का वजन किया जाता। जिनके पास कम रबर होता, उन्हें सरेआम पीटा जाता
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Speaker A
था। कई बार टॉर्चर से लोगों की मौत भी हो जाती थी। पेट्रिस के पिता फ्रांसवा टोलिंगा किसान थे। वह एक डांस ग्रुप में ड्रम बजाते थे, लेकिन उनका कैरेक्टर असामाजिक था। लड़ाई झगड़ा और मारपीट उनके रूटीन का हिस्सा था। यह रवैया घर पर भी
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Speaker A
जारी रहा। वह अपनी पत्नी को छोटी-छोटी बातों पर पीटा करते थे। फिर एक दिन पेट्रिस की मां जूलियाना ने और सहने से मना कर दिया और वो अपने पति से अलग हो गई। इसने पेट्रिस के जीवन पर गहरा असर डाला।
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Speaker A
उनको कभी अपने घर से सपोर्ट नहीं मिला। उन्हें अपनी लड़ाईयां खुद ही लड़नी पड़ी। यहां तक कि उन्होंने स्कूल और करियर भी खुद ही चुना। वह स्कूल में भी विद्रोही स्वभाव के थे। मुश्किल सवाल पूछना और अपनी बात पर अड़े रहना उनकी आदत थी। उन्हें
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Speaker A
इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। एक दफा पेट्रिस ने क्लास में टीचर की चार गलतियां पकड़ी और उन्हें गलत पढ़ाने के लिए टोक दिया। इससे टीचर नाराज हो गए। उन्होंने पेट्रिस को बाहर निकाल दिया। इससे खफा होकर पेट्रिस ने स्कूल छोड़ दिया। कुछ समय
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Speaker A
बाद वह नर्सिंग स्कूल में दाखिल हो गए। यह बात उनके पुराने स्कूल टीचर को पता चल गई। उन्होंने चिट्ठी भेजकर उन्हें बाहर निकालवा दिया। पेट्रिस फिर से सड़क पर थे। मगर इस बार वह आर या पार का मन बना चुके थे। नर्सिंग
08:44
Speaker A
स्कूल से निकाले जाने के बाद पेट्रिस अपने घर गए। वहां वह कुछ घंटे ही रुके। उन्होंने एक बैग में कुछ कपड़े और किताबें रखी और हमेशा के लिए घर छोड़ दिया। 1942 का साल था। दूसरा वर्ल्ड वॉर अपने चरम पर
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Speaker A
था। इस युद्ध में बेल्जियम भी शामिल था। मई 1940 में उसकी आर्मी ने जर्मनी के सामने सरेंडर कर दिया था। हालांकि अफ्रीका में उसकी कॉलोनियाँ सुरक्षित थीं। वहां से वह अपने मित्र देशों को मदद भेज रहा था। सबसे
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Speaker A
चर्चित सप्लाई यूरेनियम की थी। इसी यूरेनियम से अमेरिका ने पहला परमाणु बम बनाया था। इस बम के लिए यूरेनियम डीआर कांगो से ही गया था। बहरहाल पेट्रिस लुमुंबा ने जब घर छोड़ा तो उनके पास कोई प्लान नहीं था। उन्हें यह भी नहीं पता था
09:28
Speaker A
कि कहां जाना है। कई दिनों तक भटकने के बाद पेट्रिस ने स्टैनलीविले की ट्रेन पकड़ ली। यह बेल्जियम कांगो के सबसे समृद्ध शहरों में से एक था। मौजूदा समय में इसका नाम किनशासा है। स्टैनलीविले में पेट्रिस की जिंदगी हमेशा के लिए बदलने
09:45
Speaker A
वाली थी। इस शहर ने उन्हें नया जीवन दिया। यहीं पर उनको सरकारी नौकरी मिली। इसी नौकरी ने उन्हें बेल्जियम के प्रति वफादारी सिखाई और जब वफादारी से पर्दा उठा फिर एक अलग किस्म...
10:02
Speaker A
सोने नहीं दिया। आज तक भी नहीं। 1940 के दशक में स्टेनली विले बेल्जियम की क्रूरता और लूट का सिंबल था। यह शहर गोरे लोगों के लिए तो आदर्श था लेकिन अश्वेत लोगों को कदम कदम पर अपमान मिलता था।
10:19
Speaker A
उन्हें अपने ही देश में दोयम दर्जे का महसूस कराया जाता था। शहरों में गोरे लोग अश्वेतों को नौकर तो रखते थे, लेकिन उन्हें घर के अंदर रहने की इजाजत नहीं थी। अश्वेतों को घर से दूर झोपड़ियों में रखा
10:33
Speaker A
जाता था। रात में उन्हें ताले में बंद रखा जाता था। अश्वेत बच्चों को स्कूल जाने का अधिकार नहीं था। पैसा होने के बावजूद वे क्लब्स, रेस्टोरेंट, सिनेमा, थिएटर आदि में नहीं जा सकते थे। 18 की उम्र के बाद
10:47
Speaker A
हर अश्वेत नौजवान को परमिट लेकर चलना पड़ता था। इसमें उसका नाम और उसका पेशा दर्ज होता था। पुलिस या कोई सरकारी अधिकारी कभी भी उनकी जांच कर सकता था। शाम के बाद उन्हें बाहर घूमने की इजाजत नहीं थी। अगर कोई अश्वेत व्यक्ति किसी वाइट
11:02
Speaker A
महिला को देख लेता तो उसको जेल तक हो सकती थी। जो अश्वेत गांव से शहर आते थे उन्हें ट्रांसफर परमिट लगता था। यह परमिट एक कमेटी इशू करती थी। कमेटी ज्यादातर एप्लीकेशनेशंस कैंसिल कर देती थी। स्टैनली विले में लुमुंबा को पॉल किंबूलू के घर पर
11:19
Speaker A
आश्रय मिला। पॉल उन्हीं के गांव से थे। उन्होंने पेट्रिस को अपने बच्चे की तरह रखा। वहीं रहते हुए पेट्रिस को पोस्टल सर्विस में क्लर्क की नौकरी मिली। इसने उन्हें अपने पंख फैलाने का पहला मौका दिया। नौकरी करते हुए पेट्रिस ने अपनी
11:34
Speaker A
पढ़ाई जारी रखी। ड्यूटी से इत उनका ज्यादातर समय लाइब्रेरी में गुजरने लगा। इसका उन्हें काफी फायदा मिला। पेट्रिस को सीनियर पोस्ट के लिए ट्रेनिंग मिली और ट्रेनिंग के बाद उन्हें अच्छा खासा प्रमोशन भी मिला। इन सबके बीच गोरे अफसरों
11:49
Speaker A
से उनका झगड़ा भी होता रहा। पेट्रिस गलत फैसलों का विरोध करने से परहेज नहीं करते थे। इसके चलते सीनियर अफसरों से ईगो टसल उनका चलता रहता था। हालांकि पेट्रिस को कोई खास परेशानी नहीं थी। उनका जीवन अपनी पटरी पर चल रहा था। फरवरी 1954 में उन्हें
12:06
Speaker A
रजिस्टर ऑफ द सिविलाइज्ड इंडीजीनस पॉपुलेशन में शामिल कर लिया गया। इसका मतलब था कि अब बेल्जियम सरकार की नजर में सभ्य हो चुके हैं। यह मान्यता गिने-चुने अश्वेत लोगों को मिलती थी। इसके लिए बाकायदा एप्लीकेशन निकलता था। उनकी जांच
12:20
Speaker A
पड़ताल भी की जाती थी। यह चेक किया जाता था कि आपके घर में टॉयलेट है या नहीं। आपके बच्चे पाजामा पहनते हैं या नहीं। आप खाना कैसे खाते हैं? आदि इत्यादि। परीक्षा पास करने के बाद अश्वेतों का दर्जा बढ़
12:34
Speaker A
जाता था। वे गोरे लोगों के लिए आरक्षित कुछ जगहों पर जा सकते थे। लेकिन वे कभी गोरों के बराबर नहीं पहुंच सकते थे। इस प्रोसेस से 1950 के दशक में अश्वेतों का एक नया वर्ग पैदा हुआ। इस वर्ग के पास
12:48
Speaker A
सरकारी नौकरी थी। वे अच्छा लिख पढ़ सकते थे। उनके बच्चे यूरोपियन स्कूल्स में जा सकते थे। वे क्लब्स में जा सकते थे। अखबारों में अपनी राय दर्ज करा सकते थे। लेकिन उनके अंदर आजादी का ख्याल नहीं आया था। वे बेल्जियम के शासन में ही खुश थे।
13:05
Speaker A
उनका फोकस अपने वर्ग की बेहतरी पर रहता था। पेट्रिस इसी धारा में शामिल थे। उनकी गिनती स्टैनली विले के एलट लोगों में होने लगी थी। इस समय तक वह बेल्जियम के शासन की तारीफ किया करते थे। उनके लेख किंग लपा और
13:20
Speaker A
हेनरी स्टैनली की तारीफों से भरे रहते थे। उनका मानना था कि बेल्जियम ने कांगो को बर्बरता से आजादी दिलाई और लोगों को सभ्य बनाया। फिर एक ऐसी घटना हुई जिसके बाद पेट्रिस नुमंबा की सोच बदलने लगी। 1956 की
13:36
Speaker A
शुरुआत में उनके खिलाफ गमन के आरोप लगे। जांच में पता चला कि उन्होंने कई अकाउंट से पैसों की हेराफेरी की है। हालांकि प्रमोट होने के बावजूद लुमुंबा को क्लर्क वाली सैलरी ही मिलती थी लेकिन उनका खर्च बढ़ता जा रहा था। उनके बच्चे महंगे
13:52
Speaker A
स्कूलों में पढ़ते थे। उन्हें अपना सोशल स्टेटस भी मेंटेन करना था और गोरे अधिकारियों की आभगत भी करनी पड़ती थी। इसके लिए उनकी सैलरी पर्याप्त नहीं थी। इससे पार पाने के लिए उन्होंने दूसरों के अकाउंट से पैसा निकालना शुरू कर दिया। जब
14:06
Speaker A
खाते का मालिक अपना पैसा निकालने आता तो वह किसी दूसरे अकाउंट से पैसा निकाल कर दे देते। यह सिलसिला कई बरसों तक चला। फिर 1956 में जांच हुई तो गड़बड़ी सामने आई। पूछताछ में पैटस लुमंबा ने अपना गुनाह
14:21
Speaker A
कुबूल कर लिया। उन्होंने कहा कि मैं सारा पैसा धीरे-धीरे चुकाने वाला था। मेरा पैसा लेकर भागने का कोई इरादा नहीं था। गुनाह कुबूलने के बावजूद जुलाई 1956 में पेट्रिस लुमंबा को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें एक साल की सजा मिली। जेल से उन्होंने
14:38
Speaker A
चिट्ठियां लिखकर माफी की गुहार लगाई लेकिन उन्हें कोई रियायत नहीं मिली। इतना जरूर हुआ कि उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च सरकार ने उठा लिया। जेल में रहते हुए लुमुबा ने कई लेख और किताबें लिखी। शुरुआत में वह स्थानीय लोगों के लिए बराबरी की
14:53
Speaker A
वकालत कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके विचार बदलते गए। 1957 के अंतिम महीनों में वह कांगो की आजादी की मांग करने लगे थे। इस बदलाव की कोई तात्कालिक वजह नहीं मिलती। इतिहासकारों का तर्क यह है कि लुमुंबा उम्र के साथ मैच्योर भी हो रहे थे।
15:10
Speaker A
जैसे-जैसे उन्हें जमीनी हकीकत पता चल रही थी, कॉलोनियल रूल के प्रति उनका विरोध बढ़ता जा रहा था और वो कांगो की आजादी के सबसे बड़े पैरोकार बन गए थे। सजा के दौरान ही पेट्रिस लुमुंबा को लियोपाल विले की जेल में ट्रांसफर कर दिया
15:30
Speaker A
गया था। सितंबर 1957 में उन्हें रिहाई मिल गई। उनसे कहा गया था कि जल्दी से नौकरी ढूंढ लो वरना शहर छोड़कर जाना पड़ेगा। लुमुबा को नौकरी ढूंढने में ज्यादा मुश्किल नहीं हुई। उन्हें एक शराब कंपनी ब्राक काकंगो के अकाउंट्स डिपार्टमेंट में
15:44
Speaker A
जॉब मिल गई। वो साल भर के अंदर पब्लिसिटी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर बन चुके थे। कांगो में कोई लोकल व्यक्ति पहली बार इतने बड़े पद पर पहुंचा था। उस दौर में ब्राकंगो का कंपटीशन ब्रालमा नाम की कंपनी से चलता था। दोनों कंपनियां ग्राहकों को
15:58
Speaker A
अपने प्रोडक्ट की तरफ खींचना चाहती थी। इसके चलते शहर में कंपटीशन का माहौल रहता था। यहां पर पेट्रिस लुमंबा की भाषण देने की कला काम आई। उन्होंने बड़ी ही आसानी से लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। जल्द
16:12
Speaker A
ही पेट्रिस लुमबा की कंपनी की धाक बन गई। लेकिन उनकी बेचैनी कम नहीं हुई थी। काम के सिलसिले में उनका क्लबों और बार में आना जाना लगा रहता था। यहीं से उन्होंने आजादी का माहौल बनाना शुरू कर दिया। इससे किसी
16:27
Speaker A
को शक भी नहीं हुआ और उनका कैंपेन भी बढ़ता गया। फिर 1958 का साल आया। पेट्रिस और उनके साथियों ने अपनी पॉलिटिकल पार्टी बनाई जिसका नाम रखा गया मूवमेंट नेशनल कांगुलीस यानी एमएसी। इसका मकसद बातचीत करके बेल्जियम से आजादी हासिल करना था। वे
16:45
Speaker A
शांति और अहिंसा में यकीन रखते थे। जब दिसंबर 1958 में घाना के प्रधानमंत्री क्वामे ने अफ्रीकी नेताओं की कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने डीआर कांगो से एमएसी को न्योता दिया। एमएसी की तरफ से पेट्रिस लुमुंबा भी घाना गए। 11 दिसंबर को
17:02
Speaker A
उन्होंने अपने भाषण में कहा भले ही हमें सीमाएं अलग करती हो भले ही हमारे बीच अंतर हो लेकिन हमारी चेतना और हमारी आत्मा एक है। हमारी इच्छाएं एक है। हमें पूरे अफ्रीका महाद्वीप को आजाद कराना है। हमें अफ्रीका को अनिश्चितता और औपनिवेशिक
17:19
Speaker A
गुलामी से मुक्ति दिलानी है। घाना में पेट्रिस, लुमुबा, सोवियत संघ और चीन के प्रतिनिधियों से भी मिले। कई अफ्रीकी नेताओं से उनकी वन टू वन मीटिंग हुई। इससे उन्हें पूरे अफ्रीका के बारे में सोचने समझने का मौका मिला। अब वह दूसरे अफ्रीकी
17:35
Speaker A
देशों के आंदोलनों में दिलचस्पी लेने लगे थे। घाना से लौटने के बाद लुमुंबा ने एमएसी का पहला सम्मेलन बुलाया। इसमें हजारों लोग जमा हुए। उनके सामने लुमुबा ने कहा आजादी बेल्जियम का कोई उपहार नहीं है। यह कांगो के हर नागरिक का हक है। फिर 1959
17:54
Speaker A
में लुमुंबा ने नौकरी छोड़ दी और पूरा ध्यान आजादी के आंदोलन पर लगा दिया। हालांकि अभी भी वह मध्यम मार्ग तलाश रहे थे। जब 4 जनवरी 1959 को ल्यपाल विलेय में दंगा हुआ। लुमुंबा की पार्टी से दूर रही।
18:10
Speaker A
उसने बैठकर मामला सुलझाने की अपील की। लेकिन तब तक हवा का रुख बदलने लगा था। जनवरी 1959 की हिंसा के बाद कांगो में कई बड़े बदलाव देखने को मिले। अब आम लोग भी आजादी के आंदोलन में जुड़ने लगे थे। कांगो
18:26
Speaker A
का एलट क्लास भी अपनी जिम्मेदारी महसूस कर रहा था और बेल्जियम के शासक वर्ग में भय का माहौल था। 13 जनवरी को बेल्जियम के राजा ने कांगो की आजादी का संकेत दिया। उसका संकेत कांगो में लहर बनकर फैलने लगा।
18:40
Speaker A
स्थानीय लोग यूरोपियंस को खुलकर चुनौती देने लगे। उन्होंने टैक्स जमा करने से मना कर दिया। कोर्ट के समन को नजरअंदाज किया जाने लगा। लोकल अफसर यूरोपियंस का आदेश मानने से इंकार करने लगे। उसने बेल्जियम के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी। उन्हें
18:56
Speaker A
समझ आ चुका था कि कांगो खाली करने का समय अब आ चुका है। लेकिन रिसोर्सेज का कंट्रोल छोड़ना उनके लिए आसान नहीं था। जनवरी 1959 के दंगों के बाद बेल्जियम ने कांगो को धीरे-धीरे आजाद करने का वादा किया था।
19:10
Speaker A
उसने लोकल लोगों का बुनियादी अधिकार बढ़ाने की भी बात की लेकिन जमीन पर कोई अंतर नहीं दिख रहा था। इसने पेट्रिस लुमंबा का संदेह बढ़ा दिया। अक्टूबर 1959 में उन्होंने स्टैनले विले में एक रैली की। अपने भाषण में लुमुंबा ने संघर्ष की
19:27
Speaker A
अपील की। जैसे ही उनका भाषण खत्म हुआ पूरे शहर में हिंसा होने लगी। इसमें 26 लोग मारे गए। कई गुना लोग घायल भी हुए थे। सरकार ने इसका आरोप लुमबा पर लगाया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जनवरी
19:41
Speaker A
1960 में उनको 6 महीने की सजा सुनाई गई। उसी दौरान बेल्जियम की राजधानी ब्रिसेल्स में एक राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस हो रही थी। इसमें कांगो का भविष्य तय होने वाला था। लेकिन सबसे बड़े लीडर पेट्रिस लुमुंबा जेल में थे। उनके बिना इस कॉन्फ्रेंस का कोई
20:00
Speaker A
मतलब नहीं था। इसीलिए उनके समर्थकों ने हंगामा किया। तब उन्हें रिहा करके ब्रूसेल्स भेजा गया। कॉन्फ्रेंस में पेट्रिस लुमबा तत्काल आजादी पर अड़ गए। फिर तय हुआ कि 30 जून 1960 की तारीख को कांगो आजाद हो जाएगा। उससे पहले मई में आम
20:17
Speaker A
चुनाव हुए। बेल्जियम ने अपने वफादारों को जिताने की पूरी कोशिश की लेकिन उसकी चाल कामयाब नहीं हो पाई। इस चुनाव में एमएसी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसके पास बहुमत नहीं था लेकिन वे गठबंधन सरकार बनाने के लिए तैयार थे। 24 जून को पेट्रिस
20:33
Speaker A
लोमुंबा इस सरकार के पहले प्रधानमंत्री बन गए। उनके विरोधी रहे जोसेफ कासावू को राष्ट्रपति की कुर्सी मिली। फिर 30 जून का दिन आया जब बेल्जियम ने आधिकारिक तौर पर कांगो की सत्ता छोड़ दी। उस रोज पूरे कांगो में जश्न का माहौल था। लोग अपने
20:50
Speaker A
सुनहरे भविष्य की कल्पना में खोए थे। दूसरी तरफ बेल्जियम अपने वर्चस्व को लेकर आश्वस्त था। इसको इनडायरेक्ट रूल का भरोसा बना हुआ था। तभी एक भाषण ने उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। उसकी आहट यूरोप से
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Speaker A
लेकर अमेरिका तक सुनाई पड़ी थी। यह भाषण पेट्रेस लुमुबा का था। 30 जून 1960 को कांगो की संसद में आजादी का समारोह आयोजित हुआ। इसमें बेल्जियम के राजा और कांगो के राष्ट्रपति को भाषण देना था। फिर आजादी की
21:21
Speaker A
घोषणा होनी थी। उसके बाद बेल्जियम का झंडा उतारकर कांगो का झंडा चढ़ा दिया जाता। प्रोग्राम सिंपल था लेकिन गड़बड़ तब हो गई जब बेल्जियम का राजा कांगो की आजादी को एहसान बताने लगा। उसने सारी क्रूरताओं को जस्टिफाई किया और कहा कि हमने कांगो के
21:37
Speaker A
लोगों को सभ्य बनाया है। अब देखना यह है कि आप लोग इस आजादी के काबिल है भी या नहीं। जब राजा का भाषण खत्म हुआ तो शासक वर्ग ने खूब तालियां बजाई। कांगो के राष्ट्रपति कासाबू ने राजा को शुक्रिया
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Speaker A
किया और उसकी शान में कसीदे पढ़े। लेकिन पेट्रिस लुमुंबा को यह अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने इसका जवाब देने का मन बना लिया था। जब वह बोलने के लिए खड़े हुए उन्होंने बेल्जियम को आईना दिखाना शुरू किया। लुमुबा का भाषण करीब 1 घंटे तक चला।
22:06
Speaker A
पूरे भाषण का लिंक डिस्क्रिप्शन बॉक्स में आपको मिल जाएगा। यहां पर आपको हम मेन पॉइंट्स बता देते हैं। लुमंबा ने कहा, हम यह आजादी बेल्जियम के साथ मिलकर सेलिब्रेट कर रहे हैं। लेकिन कांगो का हर व्यक्ति जानता है। यह आजादी बड़ी लड़ाईयों के बाद
22:20
Speaker A
हासिल हुई है। हमें अपने संघर्ष, आंसुओं और अपने लहू पर गर्व है। पिछले 80 वर्षों से हमारी किस्मत में अपमानजनक गुलामी थी। हमारे जख्म अभी ताजा हैं। उन्हें इतनी जल्दी भुला पाना आसान नहीं है। हमने देखा है कि गोरे और अश्वेत लोगों के लिए कानून
22:37
Speaker A
अलग था। हमारे लिए कानून क्रूर और अमानवीय था। हमने औपनिवेशिक दमन, कम मजदूरी, असभ्य भेदभाव, जमीन की लूट और मानवीय स्वतंत्रता का उल्लंघन सहा है। लेकिन अब उसका अंत हो चुका है। कांगो की सत्ता अब उसके लोगों के
22:52
Speaker A
हाथों में है। हमारा देश अब हमारा है। हमारी सरकार, हमारी जमीन, हमारा भाग्य अब हमारे हाथों में है। हम अब बराबरी के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़े होंगे। हम विदेशी मदद को स्वीकार करेंगे। लेकिन अपनी स्वतंत्रता बनाकर रखेंगे। आखिर में
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Speaker A
पेट्रिस लुमबा ने नारा लगाया आजादी के नायक जिंदाबाद। अफ्रीका की एकता और आजादी जिंदाबाद। स्वतंत्र और संप्रभु कांगो जिंदाबाद। जब यह स्पीच खत्म हुई पूरी सभा में नारेबाजी हो रही थी। कई लोग लुमुंबा के सम्मान में अपनी सीट पर खड़े हो गए थे।
23:27
Speaker A
लेकिन बेल्जियम का राजा सन था। उसे जैसे सांप सूंघ गया था। उसने भाषण के बीच में ही मंच से जाने की धमकी दी थी। लेकिन उसको किसी तरह रोका गया। लुमुंबा के भाषण ने उसका ईगो हर्ट कर दिया था। वह बदला लेने
23:42
Speaker A
के लिए तिलमिला रहा था। इस भाषण की गूंज बेल्जियम में भी सुनाई पड़ी। वहां की मीडिया बदले की बात करने लगी। कहा जाने लगा कि पेट्रिस लुमंबा ने अक्षमय अपराध किया है। उनको माफ नहीं किया जा सकता। यहां से लुमुंबा को हटाने का प्लान तैयार
23:58
Speaker A
होने लगा। लोमुंबा को इसका एहसास था। फिर भी वह नहीं झुके। उन्होंने नियति का सामना करने का इरादा कर लिया था। जून 1960 में कांगो आजाद तो हो गया लेकिन सेना का कंट्रोल अभी भी बेल्जियम के पास था। 5 जुलाई 1960 को आर्मी चीफ एमलीसन ने
24:18
Speaker A
लोकल सैनिकों से कहा, भले ही तुम्हारा देश आजाद हो गया हो, लेकिन तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं बदला है। तुम्हें अब भी हमारा हुक्म मानना होगा। उसी शाम कांगो के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। वियानसन के इस्तीफे पर अड़ गए। यानसन उनको दबाने पर
24:34
Speaker A
आमादा था। लेकिन प्रधानमंत्री लुमुंबा ने यासन को बर्खास्त कर दिया। उसकी जगह पर जोसेफ मुबूतू को कमांडर बना दिया और सभी सैनिकों को तुरंत प्रमोट भी कर दिया। इससे बेल्जियम की बची खुची शक्ति भी जाने लगी थी। फिर उसने हाथ पैर मारने शुरू किए।
24:51
Speaker A
कांगो में उसके दो मिलिट्री बेससेस काम कर रहे थे। उसने अपना कंट्रोल बचाने के लिए सैनिकों का इस्तेमाल करने का फैसला किया। 9 जुलाई तक कांगो के कई शहरों में बेल्जियम सैनिक पहुंच चुके थे। वे यूरोपियंस को सुरक्षा देने के बहाने से आए
25:06
Speaker A
थे। लेकिन असल में वे पेट्रिस लुमंबा को घेरना चाहते थे। फिर 11 जुलाई को कटांगा प्रांत ने आजादी के लिए सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया। कटांगा का नेता मोइसोंबे लुमबा का कट्टर विरोधी था। उनसे बेइंतहा नफरत करता था। उसको बेल्जियम, फ्रांस और
25:22
Speaker A
ब्रिटेन का सपोर्ट भी मिल रहा था। कांगो के एकद और प्रांत भी अलग होने की मांग करने लगे। लेकिन कटांगा सबसे अहम था। कांगो के नेचुरल रिसोर्सेज का 60% हिस्सा कटांगा में था। उसके बिना कांगो कंगाल हो सकता था। इसी वजह से बेल्जियम कटांगा को
25:38
Speaker A
अलग-थलग करने पर अड़ा हुआ था। जबकि आजादी के टाइम बेल्जियम ने कहा था कि वह कांगो के अंदरूनी मामले में कभी दखल नहीं देगा और बिना बुलाए अपनी सेना भी नहीं भेजेगा। लेकिन आजादी के दो हफ्ते के अंदर वह अपनी
25:52
Speaker A
बात ही भूल गया। जब मामला हाथ से निकलने लगा तब लुमुबा और राष्ट्रपति कासावबू ने यूनाइटेड नेशंस में अपील की। यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने गजब की फुर्ती दिखाई। वे कांगो में यूएन फोर्स भेजने के लिए तैयार हो गए। लेकिन बेल्जियम को
26:07
Speaker A
निकालने पर उनके बीच सहमति नहीं बनी। 14 जुलाई 1960 को यूएन की फोर्स कांगो पहुंच गई। लेकिन उन्होंने विद्रोह में दखल नहीं दिया। इससे बेल्जियम ने कटांगा से हटने से मना कर दिया। फिर 22 जुलाई 1960 को लुमुंबा अमेरिका गए लेकिन अमेरिका के
26:23
Speaker A
तत्कालीन राष्ट्रपति ट्वाइट आइजन हावर उनसे नहीं मिले। आइजन हावर लुमबा को सोवियत संघ का दोस्त समझते थे। कोल्ड वॉर में इस टैग का मतलब था अमेरिका का दुश्मन। रिपोर्ट से पता चला कि आइजन हावर ने पेड्रिस लुमंबा की हत्या के प्लान पर साइन
26:40
Speaker A
कर दिया था और सीआईए ने जहर देकर उनको मारने की तैयारी भी कर ली थी। लेकिन उन्हें हाथ गंदे करने की जरूरत नहीं पड़ी। फिर भी उस वक्त अमेरिका की बेरुखी ने पेट्रिस लोमबा को दुखी कर दिया था। वो
26:53
Speaker A
चौतरफा घिर चुके थे। बेल्जियम पूरी बेशर्मी के साथ अपना समझौता भूल गया था। उनके अपने लोग पश्चिमी देशों की गोद में बैठ गए थे। यूएन उनको बचाने के लिए तैयार नहीं था और जिन अफ्रीकी देशों ने दोस्ती की कसमें खाई थी, वे भी पीछे हट चुके थे।
27:08
Speaker A
अब पेट्रिस लुमुबा के पास सोवियत संघ का सहारा बचा था। उन्होंने सोवियत लीडर निकिता क्रशेव से मदद मांगी। क्रिशेव इसके लिए तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत अपने प्लेेंस, हथियार, इंजीनियर्स और मिलिट्री अफसरों को कांगो रवाना किया। यह रेड लाइन
27:25
Speaker A
थी। कांगो में यूरेनियम, कोबाल्ट, डायमंड और कॉपर जैसे रिसोर्सेज का बड़ा भंडार था। अमेरिका इन संसाधनों के सबसे बड़े खरीददारों में से एक था। सोवियत संघ की एंट्री से कम्युनिज्म फैलने का खतरा तो था ही। उससे भी बड़ा खतरा जरूरी मिनरल्स से
27:41
Speaker A
हाथ धोने का था। सोवियत संघ को बुलाने के बाद लुमुंबा पश्चिमी देशों के निशाने पर आ गए। अमेरिका ने बेल्जियम को फुल सपोर्ट दिया। उसने आर्मी चीफ जोसेफ मुबूत को अपने पाले में कर लिया था। मुबूतू ने राष्ट्रपति कासावू के साथ मिलकर पेट्रिस
27:59
Speaker A
लुमुंबा का विरोध शुरू कर दिया। फिर 5 सितंबर को कासावू ने पेट्रिस को हटाने की कोशिश की। लेकिन पेट्रिस लुमुंबा ने संसद का सपोर्ट जुटा लिया। फिर मोबूतू ने मोर्चा संभाल लिया। 14 सितंबर को उसने दोनों को कुर्सी से उतार दिया और मिलिट्री
28:17
Speaker A
शासन का ऐलान कर दिया। मोबतू ने सोवियत संघ को भी बाहर निकाल दिया। लुमुंबा को लपा विले में ही हाउस अरेस्ट करके रखा गया। उनको कुर्सी से उतारा जा चुका था। फिर भी पश्चिमी देश संतुष्ट नहीं थे। वे
28:32
Speaker A
पेट्रिस लुमंबा को पूरी तरह खत्म करना चाहते थे। लेकिन नवंबर 1960 में लुमुंबा हाउस एरेस्ट से भाग गए। वे स्टैनली विले पहुंचना चाहते थे। वहीं से उनका करियर और पॉलिटिक्स शुरू हुई थी। वह उनका अपना शहर था। लुमुंबा को उम्मीद थी वह स्टैनली विले
28:48
Speaker A
में सुरक्षित रहेंगे। लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही उन्हें पकड़ लिया गया। लुमुंबा दुश्मन सैनिकों से घिरे हुए थे जो उनकी जान लेने पर उतारू थे। फिर भी उनकी आवाज में तनिक भी डर नहीं था। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा, आज तुम लोग कासावू और मोभूतू की
29:05
Speaker A
बातें मान रहे हो, लेकिन मेरे बाद यह तुम्हारे भी दुश्मन बन जाएंगे। मैं इतनी आसानी से नहीं मरूंगा। अगर तुम मुझे नदी में फेंकोगे तो मछलियां मेरे शरीर को खाएंगी। कांगो के लोग उन मछलियों को खाएंगे और मैं हमेशा के लिए उनके शरीर का
29:19
Speaker A
हिस्सा बन जाऊंगा। मैं अपने लोगों से कभी दूर नहीं रहूंगा। उनके भाषण का सैनिकों के कमांडर पर कोई असर नहीं हुआ। उन्हें घेर कर ले जाया गया। लुमुंबा ने यूएन के सैनिकों से मदद की अपील की लेकिन उन्हें
29:33
Speaker A
दखल देने का आदेश नहीं था। फिर लुमुबा को लोपाल विले ले जाया गया। उन्हें कैमरे के सामने पीटा गया। उनके शरीर से खून बहता रहा मगर कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। फिर 17 जनवरी 1961 को उन्हें कटांगा
29:48
Speaker A
ले जाया गया। वहां लुमुंबा के विरोधी मोइस तोंबे का शासन था। कटांगा में ही लुमुंबा और उनके दो साथियों को फायरिंग स्क्वाड ने गोली मार दी। मोइस्ोंबे और बेल्जियम पुलिस के कई अफसर मौके पर मौजूद थे। लुमुबा की
30:03
Speaker A
मौत के बाद भी उनकी नफरत खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने डेड बॉडी को टुकड़ों में काटा। फिर उसे तेजाब के घोल में डुबो दिया। यह पेट्रिस लुमुबा के हर निशान को मिटा देना चाहते थे। फिर भी एक दांत बचा
30:17
Speaker A
रह गया। दरअसल हत्या में शामिल एक बेल्जियम पुलिस अफसर ने ट्रॉफी के तौर पर पेट्रिस लुमुंबा का एक दांत रख लिया था। कई बरस बाद बेल्जियम की संसद ने पेट्रिस लुमुंबा की हत्या की जांच की। इसमें सरकार की भूमिका स्पष्ट थी। फिर 2002 में
30:33
Speaker A
बेल्जियम सरकार ने माफी मांगी और 2022 में आखिरी दांत पेट्रिस लुमुंबा के परिवार को लौटा दिया। पेट्रिस लुमंबा को गुजरे 64 बरस बीत चुके हैं। मगर उनकी विरासत कायम है। पेट्रिस लुमंबा ने कहा था एक दिन अफ्रीका अपना इतिहास खुद लिखेगा। यह
30:52
Speaker A
इतिहास गर्व और आत्मसम्मान से भरा होगा। जब कभी अफ्रीकन यूनिटी की बात आती है। उनका नाम नायकों की तरह लिया जाता है। उनके बाद के कई अफ्रीकी नेताओं ने उनसे प्रेरणा ली। मुर्गीना फासो के थॉमस संकारारा हो या साउथ अफ्रीका के नेल्सन
31:08
Speaker A
मंडेला उन्होंने पेट्रिस लुमुंबा को अपना आदर्श माना। अफ्रीका की कई शहरों में उनकी मूर्तियां आज भी दिख जाती हैं। लेकिन उनके सपनों का अफ्रीका नहीं दिखता। लुमुंबा का अपना देश तानाशाही, सैन्य विद्रोह, सिविल वॉर और संसाधनों की लूट में उलझा रहा है।
31:27
Speaker A
उन्होंने जो सपना दिखाया था वह हर पल के साथ बिखर रहा है। फिर भी उम्मीद है कि वह सुबह कभी तो आएगी। पेट्रिस लुमंबा के बारे में आप क्या सोचते हैं? हमें कमेंट कर जरूर बताएं। अगर वीडियो आपको पसंद आया तो
31:40
Speaker A
इसको लाइक और शेयर करते रहिए। हमारे चैनल क्यूरिस्तान को सब्सक्राइब भी कर लीजिए। आपके लिए तमाम जानकारी लेकर आए थे। मेरे साथ हैं अभिषेक कुमार। कैमरा के पीछे हैं आकाश गौतम।
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