पाकिस्तान के 27वें संविधान संशोधन से मिलिट्री की सत्ता मजबूत होगी, जो देश की स्थिरता और लोकतंत्र के लिए खतरा है।
Key Takeaways
- पाकिस्तान की मिलिट्री राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में गहरा नियंत्रण रखती है।
- 27वें संविधान संशोधन से फौज की सत्ता और बढ़ेगी, जिससे लोकतंत्र कमजोर होगा।
- आर्मी चीफ आसिम मुनीर की भूमिका और अधिकार बढ़ेंगे।
- इतिहास में फौजी तख्ता पलट और संविधान संशोधन पाकिस्तान की स्थिरता के लिए खतरा रहे हैं।
- यह घटना क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए चिंताजनक है।
What the video covers
- पाकिस्तान की मिलिट्री देश की सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक ताकत है।
- 27वें संविधान संशोधन से मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट को सुप्रीम कोर्ट और न्यूक्लियर वेपंस तक का नियंत्रण मिलेगा।
- आर्मी चीफ आसिम मुनीर की हैसियत इस संशोधन के बाद सबसे ऊपर हो जाएगी।
- पाकिस्तान के इतिहास में फौजी तख्ता पलट और संविधान में बार-बार बदलाव होते रहे हैं।
- 1973 का संविधान आज भी लागू है लेकिन कई संशोधनों के कारण उसका मूल स्वरूप बदल चुका है।
- जनरल मुशर्रफ और जिया उल हक जैसे सैन्य शासकों ने संविधान को अपने पक्ष में मोड़ा।
- 2018 के चुनाव में फौज ने इमरान खान को समर्थन दिया, लेकिन बाद में उनकी सरकार गिरा दी गई।
- नवाज शरीफ और इमरान खान के बीच फौज की भूमिका राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करती रही है।
- 27वें संशोधन के बाद फौज का नियंत्रण और मजबूत होगा, जिससे चुनी हुई सरकारों की स्वतंत्रता सीमित होगी।
- यह बदलाव भारत और विश्व के लिए भी चिंता का विषय है।
Chapters
- 00:00पाकिस्तान की मिलिट्री और उसका प्रभाव
- 01:2227वें संविधान संशोधन का परिचय और प्रभाव
- 02:44पाकिस्तान के संविधान का इतिहास
- 04:07फौजी तख्ता पलट और संविधान में बदलाव
- 05:26मुशर्रफ का शासन और संविधान संशोधन
- 06:44चुनी हुई सरकारों और फौज के बीच संघर्ष
- 08:01इमरान खान का उदय और फौज का समर्थन
- 09:20हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और 27वें संशोधन का महत्व
- 10:57संशोधन के बाद की नई व्यवस्था और निष्कर्ष
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Speaker A
पाकिस्तान की मिलिट्री पाकिस्तान नामक देश की पेरेंट कंपनी है। कपड़ों से लेकर बिल्डिंग तक बनाने वाली फौज पाकिस्तान में सबसे बड़ा बिजनेस चलाती है। आम जिंदगी में देशों के पास अपनी फौज होती है। पाकिस्तान में फौज के पास अपना देश है। 78 बरसों में
Speaker A
आधे समय फौज ने पाकिस्तान पर डायरेक्ट रूल किया। जबकि बाकी टाइम उसका इनडायरेक्ट कंट्रोल रहा। परवेज मुशर्रफ के बाद फौज पर्दे के पीछे चली गई थी। कम से कम कागजों पर तो ऐसा ही था। पिछले 17 वर्षों में एक
Speaker A
बार भी सैन्य तख्ता पलट नहीं हुआ। पाकिस्तान के इतिहास में फौजी रूल में इतना लंबा गैप कभी नहीं रहा। इसके चलते लोगों को खुशफहमी हुई कि फौज का चरित्र बदल गया है। अब पाकिस्तान में फौजी शासन के दिन बीत गए, लेकिन इस खुशफहमी का खुमार
Speaker A
धीरे-धीरे उतरने लगा है। पर्दे के पीछे रहते-रहते फौज का मन ऊब गया था। अबकी बार उसने खुलकर खेलने का इरादा कर लिया है। इन दिनों पाकिस्तान में एक नए संविधान संशोधन की बहुत चर्चा है। इस संशोधन के बाद
Speaker A
सुप्रीम कोर्ट से लेकर न्यूक्लियर वेपंस तक हर बड़ा मसला मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट के नियंत्रण में होगा और इस नई व्यवस्था में आर्मी चीफ आसिम मुनीर की हैसियत सबसे ऊपर हो जाएगी। जानकार बताते हैं पाकिस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा तख्ता पलट है। बस
Speaker A
इसमें कोई खून खराबा नहीं हो रहा है। लेकिन इसके जरिए चुनी हुई सरकार का गला घोट दिया जाएगा। सबसे दिलचस्प यह है यह फंदा सरकार ने अपने हाथों से तैयार किया है। आखिर पाकिस्तान में ऐसा क्या होने जा
Speaker A
रहा है? 27वें संविधान संशोधन की असली कहानी क्या है? इस संशोधन से आसिम मुनीर को कैसे फायदा पहुंचेगा? और यह घटना भारत और बाकी दुनिया के लिए चिंताजनक क्यों है?
Speaker A
इस वीडियो में हम इन्हीं सारे विषयों पर बात करेंगे। नमस्कार, मेरा नाम दिव्याशी सुमराव है। क्रिस्तान पर आपका बहुत स्वागत है। आज पाकिस्तान के 27वें संविधान संशोधन की कहानी सुनिए। भारत का बंटवारा अगस्त 1947 में हुआ। उसी समय भारत और पाकिस्तान अलग-अलग देश बने।
Speaker A
भारत ने 3 बरस से भी कम समय में अपना संविधान लागू कर दिया था। आज भी हमारा देश उसी के हिसाब से चल रहा है। मगर पाकिस्तान को पहला संविधान बनाने में लगे 9 बरस। मार्च 1956 में पाकिस्तान का पहला संविधान
Speaker A
लागू हुआ। लेकिन 2 बरस बाद ही उसको रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। यह काम उस व्यक्ति ने किया जो नए संविधान के तहत पहला राष्ट्रपति बना था। उसका नाम सिकंदर अली मिर्जा था। मिर्जा साहब ने संविधान
Speaker A
फेंका। फिर उनके वफादार अयूब खान ने उन्हें बाहर फेंक दिया। इसी के साथ संविधान के बनने बिगड़ने का सिलसिला भी शुरू हो चुका था। अय्यूब खान ने 1962 में पाकिस्तान का दूसरा संविधान बनाया। वो खुद राष्ट्रपति बन गए थे। इसलिए उनकी व्यवस्था
Speaker A
में राष्ट्रपति सबसे ताकतवर था। उन्होंने प्रधानमंत्री का पद ही गायब कर दिया था। अय्यूब का बनाया संविधान 7 बरस तक चला। फिर 1969 में उनको इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद याया खान ने सरकार चलाई। उसने अय्यूब के बनाए संविधान को भंग कर दिया और
Speaker A
मार्शल लॉ लगाकर शासन चलाने लगा। फिर दिसंबर 1971 में भारत-पाकि बीच लड़ाई हुई। में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी और पूर्वी पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बना दिया। इस हार के बाद या खान ने इस्तीफा दे दिया। तब कुर्सी जुल्फिकार अली
Speaker A
भुट्टो के पास आई। भुट्टो ने कुर्सी मिलते ही तीसरा संविधान बनाना शुरू कर दिया। यह सन 1973 में लागू हुआ। इसके तहत प्रधानमंत्री के पद को ताकतवर बनाया गया। राष्ट्रपति को नाम मात्र की शक्तियां दी गई। फिर दो सदनों वाली संसद की स्थापना
Speaker A
हुई। केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा हुआ। आम लोगों को बुनियादी अधिकार दिए गए। न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाया गया। इन सबके अलावा इस्लाम को राजकीय धर्म और उर्दू को राष्ट्रीय भाषा भी घोषित किया गया। पाकिस्तान में आज भी
Speaker A
1973 वाला संविधान ही लागू है। लेकिन इसमें इतने झटके लगे हैं कि इसका मूल चरित्र गायब हो चुका है। जिस जुल्फिकार अली भुट्टो ने संविधान बनाया था वही अपनी कुर्सी बचाने के लिए उससे खिलवाड़ करने लगे। फिर एक रोज उनके वफादार आर्मी जनरल
Speaker A
जियाउल हक ने उनको कुर्सी से उतार दिया और अंत में भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया गया। जनरल जिया ने 1977 से 1985 तक संविधान को ताले में बंद रखा। जब पिंजरा खुला तब तक उसके पर कतरे जा चुके थे। यानी
Speaker A
बहुत सारे फेरबदल के साथ इसको वापस लागू किया गया। क्योंकि जिया राष्ट्रपति थे इसलिए राष्ट्रपति को सर्वशक्तिमान बनाया गया था। जबकि प्रधानमंत्री की कुर्सी उनकी मर्जी पर निर्भर हो चुकी थी। साथ ही साथ इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले
Speaker A
नियम भी जोड़े गए। इसकी झलक पाकिस्तान में आज तक दिखती है। बहरहाल सितंबर 1988 में एक हवाई दुर्घटना में जनरल जिया की मौत हो गई। इसी के साथ मिलिट्री के डायरेक्ट रूल पर छोटा सा विराम लग गया। अगले 11 वर्षों
Speaker A
तक चुनी हुई सरकारों ने राज किया। लेकिन प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और फौज के बीच त्रिकोणीय मुकाबला चलता रहा। इसके चलते 1988 से 1999 के बीच चार बार सरकार बदली। तीन दफा तो राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को बर्खास्त किया। चौथी दफा अक्टूबर 1999 में
Speaker A
जनरल परवेज मुशर्रफ ने सीधा तख्ता पलट कर दिया। मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अरेस्ट करवा दिया और मार्शल लॉ लगाकर शासन चलाने लगे। लेकिन उनको भी स्वीकार्यता की जरूरत थी। इसी इरादे से 2003 में वह संविधान वापस लेकर आए। लेकिन
Speaker A
बड़े बदलावों के साथ नवाज शरीफ की सरकार ने 1997 में एक संशोधन के जरिए राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित कर दिया था। उन्होंने राष्ट्रपति से नेशनल असेंबली भंग करने की शक्ति छीन ली थी। मगर मुशर्रफ ने 2003 में वो प्रावधान पलटवा दिया और संसद
Speaker A
भंग करने और प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने की शक्ति बतौर राष्ट्रपति अपने पास रखी। इस तरह मुशर्रफ निरंकुश शासन चलाने लगे। हालांकि 2007 के अंत तक उनकी स्थिति कमजोर होने लगी थी। नवंबर 2007 में बेनजी भुट्टो पाकिस्तान वापस लौट आई थी। उनको
Speaker A
देश भर में अपार जनसमर्थन मिल रहा था। मुशर्रफ के खिलाफ कई जगहों पर प्रोटेस्ट भी हो रहे थे। इन सबके बीच मुशर्रफ ने आखिरी चाल चली। उन्होंने अध्यादेश जारी कर संविधान संशोधन की शक्ति खुद को दे दी और
Speaker A
मूल अधिकारों को भी भंग कर दिया। लेकिन इसका उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। 2008 के आम चुनाव में मुशर्रफ के समर्थन वाली पार्टी हार गई। विपक्षी पार्टियों ने समझौता करके गठबंधन सरकार बना ली। उन्होंने मुशर्रफ के खिलाफ महाभियोग चलाने
Speaker A
की तैयारी कर ली थी। उससे पहले ही मुशर्रफ ने राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया और वह पाकिस्तान छोड़कर भाग गए। नए चुनाव के बाद यूसुफ रजा गिलानी प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में 18वां संविधान संशोधन लागू हुआ। इसके तहत राष्ट्रपति से
Speaker A
नेशनल असेंबली भंग करने की शक्ति वापस ली गई। प्रधानमंत्री के पद को फिर ताकतवर बनाया गया और देश में संसदीय लोकतंत्र वाली व्यवस्था लाई गई। इस समय तक फौज बैकफुट पर आ चुकी थी। मुशर्रफ की वजह से उसका पॉपुलर सपोर्ट कमजोर पड़ गया था।
Speaker A
इसलिए उसने डे टू डे पॉलिटिक्स से थोड़ी दूरी बना ली। यह स्थिति कमोबेश 2016 तक बरकरार रही। इसने चुनी हुई सरकारों को काम करने की आजादी दी। मगर 2016 में फौज को वापसी का मौका भी मिल गया। तब नवाज शरीफ
Speaker A
प्रधानमंत्री हुआ करते थे। अप्रैल 2016 में उनका और उनके बच्चों का नाम पनामा पेपर्स में आया। उनके ऊपर पैसों के गबन और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगे। जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद के अयोग्य ठहरा दिया जिसके बाद नवाज शरीफ को इस्तीफा
Speaker A
देना पड़ा। भले ही नवाज के खिलाफ कोर्ट से फैसला आया था लेकिन कहा गया कि असली खेल फौज ने खेला है। दरअसल नवाज शरीफ विदेश नीति और दूसरे जरूरी मुद्दों में फौज को दरकिनार करने लगे थे। यह सर्वव्यापी
Speaker A
मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट को पसंद नहीं आया। फिर 2018 में नए आम चुनाव की बारी आई। तब तक फौज ने अपना प्यादा तैयार कर लिया था। वो थे पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पीटीआई के इमरान खान। इमरान को जिताने के लिए सारे तड़म अपनाए गए। फौज के सपोर्ट के
Speaker A
बदौलत इमरान प्रधानमंत्री बन भी गए। नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन को काफी परेशान किया गया। उनके नेताओं के खिलाफ केस पर केस थोपे जाने लगे। कईयों को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। दूसरी तरफ इमरान फौज के सपोर्ट से सरकार चलाने लगे।
Speaker A
लेकिन धीरे-धीरे उन्हें यह गलतफहमी हुई कि सरकार उनकी अपनी है और वह जो चाहे कर सकते हैं। अक्टूबर 2021 में इसी ओमान में उन्होंने नए आईएसआई चीफ की नियुक्ति रोक दी। इसने फौज को नाराज कर दिया। अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव लाकर उनकी
Speaker A
सरकार गिराई जा चुकी थी। यह अविश्वास प्रस्ताव लाने वालों में सबसे आगे नवाज शरीफ की पार्टी थी। इमरान के जाने के बाद नवाज के भाई शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री बन गए। उन्होंने फौज का इस्तकबाल सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया और इसी की बदौलत नवाज
Speaker A
शरीफ को पाकिस्तान वापस लौटने का वरदान मिला। उनको एक दिन की भी जेल नहीं हुई जबकि इमरान खान पिछले ढाई बरसों से चक्की पीस रहे हैं। फिर फरवरी 2024 आया। अब नए आम चुनावों की बारी थी। इसमें इमरान की
Speaker A
पार्टी पीटीआई फेवरेट बताई जा रही थी। लेकिन ऐन मौके पर उनका इलेक्शन सिंबल छीन लिया गया। तब भी पीटीआई के कैंडिडेट्स निर्दलीय मैदान में उतरे। शुरुआती काउंटिंग में वे बहुमत की तरफ बढ़ते दिखाई दे रहे थे। फिर आधी रात को अचानक रुझान
Speaker A
बदलने लगा। जब फाइनल रिजल्ट आया पीटीआई बहुमत से दूर हो गई थी। आरोप लगते हैं यह खेल भी फौज के इशारे पर हुआ। जब मार्च में शहबाज शरीफ ने दूसरी
Speaker A
एहसानों के नीचे पूरी तरह दबे हुए थे। तब तक आसिम मुनीर को पाकिस्तान का आर्मी चीफ बने 16 महीने हो चुके थे और उन्होंने सिस्टम पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। आसिम मुनीर की पहली बड़ी चाल नवंबर 2024
Speaker A
में सामने आई। जब संसद ने उनका कार्यकाल बढ़ाकर 5 साल कर दिया। उससे पहले आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के चीफ का कार्यकाल 3 वर्ष का होता था। वे सिर्फ 64 की उम्र तक सेवा दे सकते थे। लेकिन नई व्यवस्था में
Speaker A
उम्र की बाध्यता खत्म कर दी गई और उन्हें दूसरे टर्म के योग्य भी बना दिया गया था। यानी मुनीर ने 2032 तक पद पर रहने का इंतजाम कर लिया था। फिर आया अप्रैल 2025। मुनीर ने एक सभा में भारत के खिलाफ जहर
Speaker A
उगला। इसके कुछ दिन बाद ही पहलगाम में आतंकी हमला हुआ। आतंकियों ने 25 बेगुनाह लोगों की हत्या कर दी। भारत ने इसका जवाब देने के लिए ऑपरेशन सिंदूर ल्च किया और सबूत के साथ पाकिस्तान के टेरर कैंप्स और
Speaker A
11 एयर बेसेस को तबाह कर दिया। फिर 10 मई को दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम समझौता हो गया। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया था। पाक फौज बैकफुट पर जा चुकी थी। उनका प्रोपगेंडा भी एक-एक कर ध्वस्त हो रहा था।
Speaker A
मगर भुलावे में रहना पाकिस्तान की पुरानी परंपरा रही है। उसने अपने नुकसान से ध्यान हटाने के लिए नई माया रची। इसका फायदा भी जनरल आसिम मुन्नी ने ही उठाया। उन्होंने अपने लिए फील्ड मार्शल की पदवी का इंतजाम कर लिया था। फील्ड मार्शल फाइव स्टार जनरल
Speaker A
होते हैं। उन्हें असाधारण वीरता और नेतृत्व, क्षमता दिखाने के लिए उपाधि मिलती है। पाकिस्तान में मुनीर से पहले यह तंबगा सिर्फ अय्यूब खान के पास था। वो बिना लड़ाई में उतरे ही फील्ड मार्शल बन गए थे। दरअसल तख्ता पलट करने के बाद
Speaker A
उन्होंने खुद को फील्ड मार्शल घोषित कर दिया था। हालांकि मुनीर ने इतना ध्यान जरूर रखा कि उपाधि चुनी हुई सरकार से मिले। यह अलग बात है कि इस सरकार को मुनीर ने खुद चुना है। फील्ड मार्शल बनने के बाद
Speaker A
से मुनीर का नया रूप दिख रहा है। आमतौर पर सिविलियन रूल के वक्त पाकिस्तानी जनरल पर्दे के पीछे से डोर खींचा करते थे। मगर मुनीर ने खुलकर खेलना शुरू कर दिया है। वो दूसरे देशों में पाकिस्तान को रिप्रेजेंट
Speaker A
करने लगे हैं। डॉनल्ड ट्रंप के साथ मीटिंग हो या सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ गायब हो गए हैं। जबकि आसिम मुनीर लीडरशिप रोल में दिख रहे हैं। 27वां संविधान संशोधन इस पहलू को और मजबूत करने वाला है। दरअसल पाकिस्तान
Speaker A
सरकार संविधान में बड़े बदलावों के लिए एक बिल लेकर आई है। 8 नवंबर को फेडरल कैबिनेट ने बिल को मंजूरी दे दी। 9 नवंबर को संसद की जॉइंट स्टैंडिंग कमेटी ऑन लॉ एंड जस्टिस ने भी इसे अप्रूव कर दिया। अब इस
Speaker A
पर संसद के दोनों सदनों में वोटिंग होगी। इसको आगे बढ़ाने के लिए दो तिह वोट्स की दरकार है। सत्ताधारी गठबंधन के पास सेनेट और नेशनल असेंबली दोनों जगह यह संख्या नहीं है। उन्हें कुछ विपक्ष और निर्दलीय उम्मीदवारों का सपोर्ट लगेगा। अगर बिल के
Speaker A
किसी प्रावधान का असर राज्यों पर पड़ता है तो राज्यों की विधानसभा में भी दो तिहाई सदस्यों का समर्थन चाहिए। तभी इसको राष्ट्रपति के पास दस्तखत के लिए भेजा जा सकता है। वैसे जिस तरह यह संविधान संशोधन बिल डिजाइन हुआ है, मिलिट्री
Speaker A
एस्टैब्लिशमेंट इसको पास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। संसद से मंजूरी मिलने के बाद यह बिल राष्ट्रपति के पास जाएगा। राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद संविधान संशोधन लागू हो जाएगा। यानी 27वां संविधान संशोधन लागू होने से बस कुछ कदम दूर है।
Speaker A
हो सकता है जब तक यह वीडियो पब्लिश होगा तब तक बिल पास भी हो चुका हो। मगर इसके चरित्र ने लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान में अभी से इसका विरोध होने लगा है। विपक्षी पार्टियों और सिविल
Speaker A
राइट्स ट्रुप्स ने आंदोलन की चेतावनी दी है। वे इसे साइलेंट कु यानी मौन तख्ता पलट का नाम दे रहे हैं। उनका तर्क है कि इस संशोधन के बाद सिविलियन सरकार का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। तो आखिर क्या है ऐसा इस
Speaker A
संविधान संशोधन में? अगर यह लागू हुआ तो पाकिस्तान में क्या-क्या बदल जाएगा? इसके जो तीन बड़े प्रावधान हैं जिनका असर दूर तक दिखेगा उन्हें भी एक बार समझ लेते हैं। पहला बड़ा प्रावधान है फेडरल कॉन्स्टिट्यूशन कोर्ट एफसीसी का गठन।
Speaker A
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत है। एफसीसी के बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुतबा घट जाएगा। वो सिर्फ सिविलियन और क्रिमिनल केसेस की सुनवाई कर पाएगी। संविधान बुनियादी अधिकारों और दो सरकारों के बीच के विवादों का निपटारा करेगी। एफसीसी और सुप्रीम
Speaker A
कोर्ट को भी उसका फैसला मानना होगा। नई व्यवस्था में एफसीसी सबसे बड़ी अदालत बन जाएगी। एफसीसी का अपना चीफ जस्टिस होगा और जजों की टीम भी होगी। एफसीसी के चीफ जस्टिस का कार्यकाल 3 वर्ष का होगा। जजों के लिए रिटायरमेंट की उम्र 78 बरस तय की
Speaker A
गई है। एफसीसी के जजों की नियुक्ति जुडिशियल कमीशन की सिफारिश पर राष्ट्रपति करेंगे। जब भी एफसीसी का गठन होगा, उसके जजों की नियुक्ति शुरुआत से होगी। मतलब यह कि सरकार अपने फायदे के हिसाब से वफादारों को भर सकती है। जिस तरह सबसे बड़ी अदालत
Speaker A
को कॉम्प्रोमाइज करने का रास्ता खुल गया है। इसका फायदा मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट को भी बराबर मिलेगा क्योंकि उनकी मर्जी के बिना तो सरकार एक कदम नहीं चलती। अतीत में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने थोड़ी बहुत स्वतंत्रता दिखाई है। लेकिन एफसीसी के गठन
Speaker A
के बाद इसकी गुंजाइश पूरी खत्म हो सकती है। दूसरा प्रावधान डिफेंस से जुड़ा है। इसमें पहला विषय है चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस सीडीएफ के पद की स्थापना। 27वां संविधान संशोधन लागू होने के बाद चेयरमैन जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी का पद खत्म हो जाएगा।
Speaker A
अभी यह पद जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के पास है। उनका कार्यकाल 27 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहा है। उसके बाद चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस की नियुक्ति होने लगेगी। चेयरमैन जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेट तीनों सेनाओं के बीच कोऑर्डिनेट करते थे। उनका पद
Speaker A
सेरेमोनियल था और यह पद तीनों सेनाओं के बीच रोटेट होता रहता था। लेकिन संशोधन के बाद सिर्फ आदमी चीफी सीडीएफ बन सकेंगे। नेवी और एयरफोर्स के ऊपर उनकी सुप्रीम अथॉरिटी होगी और उनके पास डिसीजन मेकिंग पावर्स भी होंगे। यह कुर्सी भी आसिम मुनीर
Speaker A
को मिलने वाली है। दूसरा विषय है आजीवन तमंगा। फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ एयरफोर्स और एडमिरल ऑफ नेवी की पदवी उम्र भर के लिए होगी। उन्हें उसी हिसाब से सुविधाएं भी मिलती रहेंगी। उनकी पदवी सिर्फ महाभियोग लगाकर वापस ली जा सकती है। एक तरह से उनके
Speaker A
पास राष्ट्रपति जैसी शक्तियां आ जाएंगी। फिलहाल पाकिस्तान में सिर्फ एक जीवित फाइव स्टार जनरल है आसिम मुनीर। उन्होंने कुर्सी के साथ भी और कुर्सी के बाद भी खुद को बचाने का इंतजाम कर लिया है। अब तीसरे बड़े फेरबदल के बारे में भी जान लेते हैं।
Speaker A
ये है नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड। यह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और मिसाइलों से जुड़े फैसले लेने वाली बॉडी है। अभी तक इसमें सिविलियन लीडर्स का डिसीजन फाइनल होता था। नई व्यवस्था में इसका कमांडर आर्मी का कोई अफसर होगा। उसकी नियुक्ति
Speaker A
सीडीएफ की सिफारिश पर प्रधानमंत्री करेंगे। यानी पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी आजम मुनीर के डायरेक्ट कंट्रोल में आ जाएंगे। तो यह थी पाकिस्तान के 27वें संविधान संशोधन की पूरी कहानी। इसके जरिए कुल 48 आर्टिकल्स में बदलाव किया जा रहा
Speaker A
है। सबसे दिलचस्प और सबसे बड़े बदलावों में फेडरल कॉन्स्टिट्यूशन को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस और नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड जैसे विषय हैं। इन बदलावों का सबसे बड़ा फायदा आर्मी चीफ आसिम मुनीर और मिलिट्री इस्टैब्लिशमेंट को होने वाला है। इससे ना सिर्फ मुनीर की हुकूमत का सिक्का
Speaker A
स्थापित होगा बल्कि मिलिट्री इस्टैब्लिशमेंट की सर्वोच्च सत्ता को संवैधानिक मंजूरी भी मिल जाएगी। जिस मिलिट्री इस्टैब्लिशमेंट का पूरा वजूद भारत विरोध पर टिका हो उसके हाथों में निरंकुश शक्तियों का आना वाकई चिंताजनक है। लेकिन भारत ऐसी परिस्थितियों के लिए
Speaker A
हमेशा से तैयार रहा है। इस समय सबसे ज्यादा फिक्रमंद पाकिस्तान के लोगों और उनके नेताओं को होना चाहिए क्योंकि उनके ऊपर मिलिट्री डिक्टेटरशिप का साया मंडरा रहा है। नेताओं ने तो अपना जमीर गिरवी रख दिया है लेकिन पाकिस्तान के लोगों को इसका
Speaker A
विरोध जरूर करना चाहिए। यही उनके और उनके देश के हित में होगा। पाकिस्तान के 27वें संविधान संशोधन पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। यह क्यूरिस्तान है। प्लैंड ऑफ क्यूरियोसिटी यानी जिज्ञासा की जमीन। इस जमीन को उपजाऊ
Speaker A
बनाने में आपकी भूमिका बेहद अहम है। क्यूरिस्तान को अपना प्यार देते रहिए। वीडियो को लाइक और शेयर कीजिए। हमारा काम आपको पसंद आ रहा है तो चैनल को सब्सक्राइब भी कर लीजिएगा। यह तमाम जानकारी आपके लिए लेकर आए थे अभिषेक कुमार। अब मैं आपसे
Speaker A
विदा लेती हूं बहुत जल्द फिर मिलूंगी। शुक्रिया।
Topics:पाकिस्तान27वां संविधान संशोधनमिलिट्री एस्टैब्लिशमेंटआसिम मुनीरफौजी तख्ता पलटपाकिस्तान संविधानइमरान खाननवाज शरीफपाकिस्तान राजनीतिसुप्रीम कोर्ट











