फ्रांस की सरकार कैसे काम करती है, इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान राजनीतिक संरचना का हिंदी में विस्तृत विवरण।
Key Takeaways
- फ्रांस की राजनीतिक व्यवस्था में ऐतिहासिक क्रांतियों और संघर्षों का बड़ा योगदान है।
- पांचवीं रिपब्लिक में राष्ट्रपति की भूमिका मजबूत की गई है ताकि स्थिर सरकार बनाई जा सके।
- राज्य और सरकार के बीच शक्तियों का संतुलन फ्रांस की लोकतांत्रिक प्रणाली की खासियत है।
- अल्जीरिया की आजादी की लड़ाई ने फ्रांस की आंतरिक राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
- फ्रांस की सेना में विदेशी नागरिकों की भागीदारी भी संभव है, जो देश की बहुलतावादी नीति को दर्शाता है।
What the video covers
- फ्रांस की राजनीतिक यात्रा राजशाही से रिपब्लिक तक की है, जिसमें कई क्रांतियाँ और शासन परिवर्तन हुए।
- 1792 में फ्रांस पहली बार गणराज्य बना, जिसने राजशाही की सत्ता समाप्त की।
- नेपोलियन बोनापार्ट और उनके परिवार ने फ्रांस की सत्ता पर कई बार कब्जा किया।
- तीसरी और चौथी रिपब्लिक के दौरान फ्रांस में राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार सरकार बदलने की समस्या रही।
- द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी कब्जे और चार्ल्स डिगॉल के नेतृत्व में फ्री फ्रेंच गवर्नमेंट की स्थापना हुई।
- 1958 में अल्जीरिया की आजादी की लड़ाई और आंतरिक विद्रोह के कारण चौथी रिपब्लिक खत्म होकर पांचवीं रिपब्लिक बनी।
- फ्रांस में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों की भूमिका होती है, राष्ट्रपति हेड ऑफ स्टेट और प्रधानमंत्री हेड ऑफ गवर्नमेंट होते हैं।
- राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और उसे जनता के सीधे वोट से चुना जाता है।
- फ्रांस की संसद में नेशनल असेंबली और सेनेट होते हैं, जिनकी शक्तियां और भूमिका संविधान द्वारा निर्धारित हैं।
- फ्रांस की सेना में विदेशी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं, जिनके लिए फ्रेंच फॉरेन रीजन नामक विशेष विंग है।
Chapters
- 00:00फ्रांस में प्रधानमंत्री की तेजी से बदलाव और परिचय
- 01:26फ्रांस की क्रांति और राजशाही से गणराज्य की स्थापना
- 02:39राजा की गिरफ्तारी और नेशनल कन्वेंशन की स्थापना
- 04:05नेपोलियन का उदय और फ्रेंच एंपायर
- 05:36तीसरी रिपब्लिक और फ्रांस की राजनीतिक चुनौतियाँ
- 06:56द्वितीय विश्व युद्ध और चार्ल्स डिगॉल का नेतृत्व
- 08:55फोर्थ रिपब्लिक और राजनीतिक अस्थिरता
- 10:57अल्जीरिया विद्रोह और पांचवीं रिपब्लिक का उदय
- 11:29फ्रांस की वर्तमान राजनीतिक संरचना और राष्ट्रपति की भूमिका
- 11:59सरकार, संसद और फ्रांस की सेना की विशेषताएं
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Speaker A
फ्रांस में कपड़ों से भी ज्यादा तेजी से प्रधानमंत्री बदलने लगे हैं। 6 अक्टूबर 2025 को एक और प्रधानमंत्री ने कुर्सी छोड़ दी। सबेस्टियन लिकोनो ने महज 27 दिनों में इस्तीफा दे दिया था लेकिन 9 अक्टूबर को उन्हें फिर से प्रधानमंत्री
Speaker A
बना दिया गया। सबेस्टियन लौट तो आए हैं लेकिन उनके पास संसद में बहुमत नहीं है। इसलिए वह कब तक कुर्सी पर रह सकेंगे इसको लेकर संशय है। नमस्कार मेरा नाम दिव्यांशी सुमराव है और यह है क्यूरिस्तान की स्पेशल
Speaker A
सीरीज पावर बास। पावरबाज के चौथे एपिसोड में आज हम आपको फ्रांस की कहानी सुनाएंगे। फ्रांस सितंबर 1792 में पहली बार रिपब्लिक बना। उससे पहले वहां राजशाही व्यवस्था चली आ रही थी जिसमें राजा का वचन ही शासन होता था। फिर 1789 में क्रांति हुई और उसकी
Speaker A
निरंकुश सत्ता को उखाड़ दिया गया। इसके बाद थर्ड स्टेट ने मिलकर नेशनल असेंबली बनाई। थर्ड स्टेट में किसान, वर्कर्स और मिडिल क्लास के लोग शामिल थे। उनकी आबादी 97% थी। सबसे ज्यादा टैक्स वही चुकाते थे। लेकिन सरकार में उनका रिप्रेजेंटेशन बहुत
Speaker A
कम था। उन्हें कुलीन और पादरी वर्ग की मनमानी झेलनी पड़ती थी। इसी असंतोष के खिलाफ 1789 में क्रांति हुई थी। क्रांति करने वाले संवैधानिक राजशाही वाली व्यवस्था लेकर आए। राजा को नाम मात्र की शक्ति दी गई। असली पावर नेशनल असेंबली के
Speaker A
पास लेकिन राजा को यह पसंद नहीं था। वो कोपरेट करने में आनाकानी करने लगा। उसने नई व्यवस्था के विरोधियों को मदद देनी शुरू कर दी। जून 1791 में उसने परिवार के साथ राजमहल से भागने की कोशिश की। वो अपने
Speaker A
समर्थकों के साथ मिलकर राजतंत्र वापस लाना चाहता था, लेकिन उसको रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया। वह अपने महल में कैदी बनकर रह गया था। उसमें आम लोगों का भरोसा कम हो चुका था। फ्रांस की क्रांति का असर बाकी यूरोप पर भी हुआ। यूरोप के
Speaker A
ज्यादातर देशों में राजतंत्र था। उन्हें डर हुआ कि फ्रांसीसी क्रांति की आग उन तक पहुंच सकती है। इसीलिए वे फ्रांस में राजतंत्र वापस लौटाने की कोशिश करने लगे। इस कवायद में ऑस्ट्रिया सबसे आगे था। वहां का राजा लियोपाल्ट सेकंड फ्रांस की रानी
Speaker A
मैरी एंटोनियत का भाई भी था। इससे फ्रांस की रिवोल्यूशनरी सरकार को खतरा महसूस हुआ। उन्होंने अप्रैल 1792 में ऑस्ट्रिया के खिलाफ जंग शुरू कर दी। जंग के शुरुआती दिनों में फ्रांस को भारी नुकसान हुआ। इससे राजा के खिलाफ गुस्सा और ज्यादा बढ़
Speaker A
गया। लोगों को लगा राजा हमारे दुश्मनों का साथ दे रहा है। फिर उन्होंने राजा को हटाने की योजना बनाई। इस प्लान में नेशनल गार्ड के कई सैनिक भी शामिल हुए। अगस्त 1792 में उन्होंने राजा के महल पर हमला कर
Speaker A
दिया। उन दिनों महल की सुरक्षा स्विस गार्ड्स संभाल रहे थे। उन्हें किराए पर रखा गया था लेकिन हमलावरों के सामने टिक नहीं पाए। उन्हें बेरहमी से मारा गया। फिर राजा और उसके परिवार को जेल में डाल दिया गया और महल को लूट कर उसमें आग लगा दी गई।
Speaker A
राजा की गिरफ्तारी के बाद चुनाव कराए गए। फिर नेशनल कन्वेंशन बनाई गई। यह फ्रांस की पहली लोकतांत्रिक संसद थी। सितंबर 1792 में इसकी पहली बैठक आयोजित हुई। पहले ही दिन इसने राजतंत्र वाली व्यवस्था खत्म कर दी और फ्रांस को रिपब्लिक घोषित कर दिया।
Speaker A
रिपब्लिक यानी गणतंत्र में सुप्रीम पावर आम लोगों के पास होती है। राष्ट्र का अध्यक्ष डायरेक्टली या इनडायरेक्टली लोगों के द्वारा चुना जाता है और उसका पद हेरिडिटरी नहीं होता है। सितंबर 1792 में जब फ्रांस पहली बार रिपब्लिक स्टेट बना तब
Speaker A
एक सदियों पुरानी प्रथा खत्म हो रही थी। लेकिन इसको एक झटके में खत्म करना आसान नहीं था। इसी वजह से फर्स्ट रिपब्लिक में कई दिक्कतें आई। भ्रष्टाचार, हिंसा और मतभेदों के चलते अराजकता बनी रही। फिर 1799 में नेपोलियन बोनापार्ट ने सत्ता
Speaker A
हथिया ली और 1804 में वो फ्रांस का सम्राट बन गया। उसने फ्रेंच एंपायर की स्थापना भी की। इसी के साथ फर्स्ट रिपब्लिक का अंत हो गया। नेपोलियन का बनाया फ्रेंच एंपायर 1848 तक चला। फरवरी 1848 में एक और क्रांति हुई।
Speaker A
उस समय के राजा लुई फिलिप को हटाकर फिर से रिपब्लिक सिस्टम लाया गया। इसमें पहली बार सभी पुरुषों को वोटिंग करने का अधिकार मिला। पहली बार राष्ट्रपति का डायरेक्ट इलेक्शन भी कराया गया। यह चुनाव नेपोलियन बोनापार के भतीजे नेपोलियन तृतीय ने जीता।
Speaker A
दिसंबर 1848 में वह फ्रांस के राष्ट्रपति बन गए। उनको लोकतांत्रिक तरीके से सरकार चलानी थी। मगर कुछ समय बाद ही उनकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगीं। 1851 में उन्होंने संसद को भंग कर दिया और 1852 में वह सम्राट नेपोलियन तृतीय बन गए। उनका शासन 1870 तक चला। 1870
Speaker A
के फ्रेंको प्रुशियन वॉर में फ्रांस की करारी हार हुई। इसके बाद सम्राट को पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। उसी बरस मोनार्की हटाकर तीसरी बार रिपब्लिक सिस्टम लाया गया। थर्ड रिपब्लिक 1870 से 1940 तक बिना किसी रुकावट के चला। मई 1940 में हिटलर की नाजी
Speaker A
सेना ने फ्रांस पर हमला कर दिया। नाजियों ने इतनी तेजी से हमला किया कि फ्रांस हक्काबक्का रह गया। उसने नाजी सरकार के साथ समझौता कर लिया। जुलाई 1940 में फ्रांस की संसद ने मार्शल फिलिप पेंटांग को सर्वे सर्वा बना दिया। पेंटांग नाजी
Speaker A
जर्मनी के साथ मिलकर सरकार चलाने लगे। लेकिन वह महज एक कठपुतली भर थे। फ्रांस का असली शासक हिटलर ही था। उसके निर्देश पर यहूदी विरोधी कानून बनाए गए। हिटलर के विरोधियों को निशाने पर लिया गया। इससे बचने और आजादी की लड़ाई को जारी रखने के
Speaker A
लिए कई फ्रांसीसी लोग ब्रिटेन चले गए। इनमें से एक चार्ल्स डिगॉल भी थे। वो फौज में जूनियर रैंक के अफसर थे। मगर वो फ्रांस की आजादी के पक्के हिमायती थे। उन्होंने लंदन पहुंचकर फ्री फ्रेंच गवर्नमेंट की स्थापना की। यह सरकार फ्रांस
Speaker A
के सहयोगी देशों के साथ काम करने वाली थी। 18 जून 1940 को चार्ल्स डिगॉल ने लंदन से संबोधन दिया। वो बोले फ्रांस ने एक मोर्चा गवाया है। हम पूरी जंग अभी नहीं हारे हैं। डिगॉल ने फ्रांसीसी सैनिकों और इंजीनियरों
Speaker A
से साथ मिलकर लड़ने की अपील की। उनकी अपील का जबरदस्त असर भी हुआ। भारी संख्या में फ्रांसीसी लोग उनके साथ जुड़ने लगे। फिर जुलाई 1940 में फ्री फ्रेंच फोर्सेस बनाई गई। इसने जमीन पर आजादी की लड़ाई का मोर्चा संभाला। उन्हें ब्रिटेन, अमेरिका
Speaker A
और दूसरे मित्र देशों की मदद मिली। 1944 आते-आते उन्होंने पेरिस पर कब्जा कर लिया। मार्शल पेंटांग को हटाकर जेल भेज दिया गया। फिर प्रोविजनल गवर्नमेंट बनाई गई। यह सरकार स्थाई व्यवस्था आने तक शासन चलाने वाली थी। चार्ल्स डिगॉल सरकार के मुखिया
Speaker A
बन गए। उनके नेतृत्व में पिछली सरकार के बनाए कानूनों को बदला गया। महिलाओं को पहली बार वोटिंग का अधिकार भी दिया गया। नाजी समर्थकों को अहम पदों से हटाया गया। उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की तैयारी हुई। देश की संस्थाओं को मजबूत बनाने की दिशा
Speaker A
में काम हुआ। जब फोर्थ रिपब्लिक का खाका बन रहा था तभी डिगॉल का दूसरे नेताओं से मतभेद हो गया। डिगॉल फ्रांस में प्रेसिडेंशियल सिस्टम लाने के पक्ष में थे। वो राष्ट्रपति के पद को मजबूत बनाना चाहते थे। उनका मानना यह था कि फ्रांस को
Speaker A
एक स्थिर सरकार की जरूरत है। गठबंधन की राजनीति से इसमें खलल पड़ सकता है। लेकिन उनके विरोधी संसदीय लोकतंत्र का समर्थन कर रहे थे। जब मतभेद काफी बढ़ गया तब डिगॉल ने प्रोविजनल गवर्नमेंट से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा था मैं सरकार से
Speaker A
इस्तीफा दे रहा हूं। मैं ऐसी सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहता जो मेरी नजर में कमजोर, अस्थिर और फ्रांस का भविष्य सुरक्षित रखने में अक्षम होगी। उनकी चेतावनी के बावजूद फोर्थ रिपब्लिक में पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी को तरजीह दी गई। इसमें राष्ट्रपति के पास नाम मात्र की
Speaker A
शक्तियां थीं। प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया जरूर था, लेकिन उसकी कुर्सी सांसद की मर्जी पर टिकी रहती थी। किसी भी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होता था, जिसके चलते 12 वर्षों में 21 बार सरकार बदली गई। किसी भी सरकार को ठहर कर सोचने का मौका
Speaker A
नहीं मिल रहा था। तभी 1958 का साल आया और फ्रांस ने 180 डिग्री का टर्न ले लिया। नॉर्थ अफ्रीका में एक देश है अल्जीरिया। यह एरिया में अफ्रीका महाद्वीप का सबसे बड़ा देश है। 1830 में फ्रांस ने अल्जीरिया पर कब्जा कर लिया था। सेकंड
Speaker A
वर्ल्ड वॉर के बाद अल्जीरिया में आजादी की मांग उठने लगी लेकिन फ्रांस ने इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया। धीरे-धीरे आजादी की मांग हिंसक विद्रोह में बदल गई। नवंबर 1954 में नेशनल लिबरेशन फ्रंट एफएलए ने फ्रांस के ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए।
Speaker A
फ्रांस ने इस विद्रोह को दबाने की पूरी कोशिश की मगर उसका कोई फायदा नहीं हुआ। 1958 तक फ्रांस का नुकसान काफी बढ़ चुका था। फ्रेंच आर्मी और शासक वर्ग के लोग अल्जीरिया को फ्रांस का पार्ट मानते थे। वे किसी भी कीमत पर अल्जीरिया छोड़ने के
Speaker A
लिए तैयार नहीं थे। उनका इरादा विद्रोहियों से लोहा लेने का था। लेकिन फ्रांस में सरकार का कोई ठिकाना नहीं था। वहां हर कुछ महीने पर सरकार बदल रही थी जिसके चलते निर्णय लेने में मुश्किलें आ रही थीं। फिर मई 1958 में अल्जीरिया के
Speaker A
फ्रेंच सेटलर्स और आर्मी ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने शासन व्यवस्था चलाने के लिए अपनी कमेटी बना ली और पेरिस की सरकार को डिसोन कर दिया। उनकी कई डिमांड्स थीं जैसे अल्जीरिया की आजादी पर कोई बात ना हो। फ्रेंच आर्मी को अपने तरीके से काम
Speaker A
करने दिया जाए। फ्रांस में एक स्थिर सरकार का गठन किया जाए और चार्ल्स डिगोल को वापस बुलाया जाए। उन्होंने धमकी दी कि अगर मांगे नहीं मानी गईं तो फ्रांस पर हमला कर दिया जाएगा। फ्रांस की सरकार इस धमकी के
Speaker A
आगे झुक गई। जून 1958 में संसद ने डिगोल को नई सरक...
Speaker A
उन्होंने शर्त रखी कि उन्हें इमरजेंसी पावर्स मिलेंगी और नया सिस्टम बनाने की छूट भी दी जाएगी। आश्वासन मिलने के बाद ही वह सरकार बनाने आए। डिगोल ने पहले तो अल्जीरिया के फ्रेंच लोगों को शांत किया। उन्होंने दावा किया कि अल्जीरिया फ्रांस
Speaker A
का हिस्सा रहेगा। मगर उन्हीं डिगोल ने बाद में अल्जीरिया को आजाद कर दिया। इसके चलते उनके खिलाफ 1961 में एक और विद्रोह हुआ। लेकिन डिगोल ने इसे आसानी से कुचल भी दिया। बहरहाल 1958 में उन्होंने नया संविधान बनाया जिसमें प्रेसिडेंशियल
Speaker A
सिस्टम पर जोर दिया गया। कार्यपालिका की शक्तियों को काफी बढ़ाया गया। सितंबर 1958 में इस पर जनमत संग्रह हुआ। 82% से ज्यादा वोटर्स ने इसका समर्थन किया। इस तरह फिफ्थ रिपब्लिक को मंजूरी मिल गई। नए संविधान के तहत पहला राष्ट्रपति चुनाव दिसंबर 1958
Speaker A
में हुआ। इसमें चार्ल्स डिकोल ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की। वो फिफ्थ रिपब्लिक के पहले राष्ट्रपति बन गए। फ्रांस आज भी उन्हीं के बनाए संविधान से चल रहा है। फ्रांस का पॉलिटिकल सिस्टम कई देशों का मिक्सचर है। वहां अमेरिका की तरह
Speaker A
प्रेसिडेंशियल सुप्रीमसी तो है लेकिन ब्रिटेन की तरह प्रधानमंत्री का पद भी क्रिएट किया गया है। फ्रांस में राष्ट्रपति हेड ऑफ द स्टेट होता है। फॉरेन अफेयर्स और डिफेंस की जिम्मेदारी उसके पास होती है। मगर घरेलू मामलों में प्रधानमंत्री की बात सुनी जाती है। फ्रांस
Speaker A
में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अलग-अलग पार्टी से हो सकते हैं और वे कई मुद्दों पर आपस में टकराते भी हैं। तो फिर कैसे काम करता है यह सिस्टम? इसको ब्रेक करके समझते हैं। फ्रांस में सरकार के तीन मुख्य अंग है। कार्यपालिका जो सरकार चलाती है।
Speaker A
विधायिका जो कानून बनाती है और न्यायपालिका जो संविधान को अपहल्ड करती है। फ्रांस में कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच बंटी हुई है। पहले राष्ट्रपति की बात। फ्रांस में हेड ऑफ द स्टेट की जिम्मेदारी राष्ट्रपति की होती है। भारत में भी हेड
Speaker A
ऑफ द स्टेट राष्ट्रपति ही है। मगर दोनों में एक बुनियादी अंतर है। भारत में राष्ट्रपति के पास सेरेमोनियल पावर्स हैं। वो खुद से उनको अप्लाई नहीं कर सकते। लेकिन फ्रांस में राष्ट्रपति के पास एक्चुअल पावर्स हैं। वो कमोबेश सरकार की
Speaker A
सभी नीतियों में दखल दे सकते हैं। कई मसलों पर उनका निर्णय अंतिम होता है। फ्रेंच आर्मी के कमांडर इन चीफ वही हैं। प्रधानमंत्री की नियुक्ति भी वही करते हैं। उन्हें पद से हटा भी सकते हैं। राष्ट्रपति चाहे तो संसद के निचले सदन को
Speaker A
भंग कर सकते हैं। उनके पास देश में आपातकाल लगाने का अधिकार भी है। इतना ताकतवर राष्ट्रपति आखिर चुना कैसे जाता है? फ्रांस के राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 बरस का होता है। 2000 से पहले यह 7 बरस का हुआ करता था। उन्हें जनता के डायरेक्ट वोट
Speaker A
से चुना जाता है। राष्ट्रपति चुनाव में सभी योग्य वोटर्स वोट डालते हैं। देश भर में एक जैसे बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है। हर कैंडिडेट के लिए एक बैलेट पेपर तय रहता है। वोटर्स अपनी पसंद का कैंडिडेट चुनने के बाद बाकी बचे बैलेट पेपर्स को
Speaker A
डिस्कार्ड कर देते हैं। वोटिंग खत्म होने के बाद काउंटिंग शुरू की जाती है। अगर पहले राउंड में किसी कैंडिडेट को 50 फ़ीसदी से ज्यादा वोट नहीं मिलते तब दूसरे राउंड की वोटिंग कराई जाती है। इस राउंड में पहले राउंड के टॉप टू कैंडिडेट्स
Speaker A
हिस्सा लेते हैं। जिसको भी 50% से ज़्यादा वोट मिला, वह राष्ट्रपति बन जाता है। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में भी वोटिंग दूसरे राउंड तक गई थी। इसमें इमैनुअल मैक्रोन ने लगभग 59% वोटों से जीत हासिल की थी। उनका
Speaker A
कार्यकाल 2027 तक चलेगा। फ्रांस में कोई भी व्यक्ति लगातार दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं रह सकता। मैक्रो का यह दूसरा टर्म चल रहा है। 2027 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते। अगला सवाल क्या राष्ट्रपति को पद से हटाया जा सकता है?
Speaker A
बिल्कुल हटाया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लगाना होगा। इसको शुरू करने के लिए किसी एक सदन के 10 फीसदी मेंबर्स के दस्तखत चाहिए। अगर दस्तखत मिल गए फिर यह प्रस्ताव उस सदन की लॉ कमेटी के पास जाता है। कमेटी देखती है
Speaker A
कि प्रस्ताव में दम है या नहीं। और क्या महाभियोग लगाने के लिए पर्याप्त आधार है?
Speaker A
राष्ट्रपति के खिलाफ देशद्रोह जैसे संगीन आरोपों में भी महाभियोग लग सकता है। जब कमेटी प्रस्ताव पर मोहर लगा देती है तब उस सदन में वोटिंग कराई जाती है। अगर वहां दो तिहाई सदस्यों ने समर्थन किया तो प्रस्ताव दूसरे सदन में जाता है। दूसरे सदन ने भी
Speaker A
प्रस्ताव पास कर दिया। फिर दोनों सदन हाई कोर्ट में बदल जाते हैं। इस कंडीशन में उनकी जॉइंट बैठक होती है। इसमें वे डिबेट करते हैं कि राष्ट्रपति का रवैया संविधान सम्मत है या नहीं। डिबेट खत्म होने के बाद
Speaker A
फिर से वोट होती है। अगर इसमें दो तिहाई सदस्यों ने महाभियोग का समर्थन किया तो राष्ट्रपति को कुर्सी छोड़नी पड़ती है। फिर ऊपरी सदन के स्पीकर कार्यवाहक राष्ट्रपति बनते हैं और 20 से 35 दिनों के अंदर नया राष्ट्रपति चुनाव कराना होता है।
Speaker A
हालांकि फिफ्थ रिपब्लिक के इतिहास में आज तक महाभियोग की नौबत नहीं आई है। यह तो हुई राष्ट्रपति की कहानी। अब प्रधानमंत्री के बारे में भी जान लेते हैं। फ्रांस में प्रधानमंत्री हेड ऑफ द गवर्नमेंट होते हैं। सरकार का रोजमर्रा का कामकाज चलाना
Speaker A
उनके जिम्मे है। संसद से बिल पास कराना और उन्हें लागू कराना भी उनकी ही जिम्मेदारी है। राष्ट्रपति के निर्देश पर वह कैबिनेट को लीड करते हैं। एक तरह से वह राष्ट्रपति की कठपुतली होते हैं। लेकिन यह सिचुएशन तभी तक रहती है जब तक प्रधानमंत्री और
Speaker A
राष्ट्रपति एक ही पार्टी या फिर गठबंधन से हो। फ्रांस में पीएम की कुर्सी काफी हद तक संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली पर निर्भर करती है। उनको डायरेक्ट जनता के वोट से नहीं चुना जाता। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। किसी भी योग्य
Speaker A
व्यक्ति को पीएम बना सकते हैं। भले ही वह संसद का सदस्य हो या फिर ना हो। लेकिन आमतौर पर ऐसे ही व्यक्ति को पीएम बनाया जाता है जिसके पास नेशनल असेंबली में पर्याप्त समर्थन हो। अगर उसके पास बहुमत
Speaker A
नहीं है तो उसकी कुर्सी डामाबाडोल रहती है। एक तो उसको बिल पास कराने में बहुत मुश्किल होती है। दूसरी बात ऐसे प्रधानमंत्री को अविश्वास प्रस्ताव लाकर कभी भी हटाया जा सकता है। जैसा कि पिछले कुछ महीनों से फ्रांस में चल रहा है।
Speaker A
फ्रांस में नेशनल असेंबली का पिछला इलेक्शन जुलाई 204 में हुआ था। इसमें किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। राष्ट्रपति मैक्रो का गठबंधन दूसरे नंबर पर खिसक गया। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी विपक्ष को नहीं दी। इसके बजाय
Speaker A
उन्होंने अपने धड़े के माइकल बर्नियर को प्रधानमंत्री बना दिया। लेकिन उनके पास नेशनल असेंबली में बहुमत नहीं था। जिसके चलते बजट और दूसरे जरूरी बिल पास कराने मुश्किल होने लगे। फिर दिसंबर 2024 में उनको अविश्वास प्रस्ताव लाकर हटा दिया
Speaker A
गया। उसके बाद मैक्रो ने अपने एक और करीबी फ्रांसपा बैरो को प्रधानमंत्री बनाया। मगर उनका भी वही हश्र हुआ। सितंबर 2025 में उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा। उनके बाद सबेस्टियन रिकोनू को कुर्सी मिली। उन्होंने महज 27 दिनों में इस्तीफा सौंप
Speaker A
दिया। फिर नए प्रधानमंत्री की तलाश शुरू हुई लेकिन वह विपक्षी कैंडिडेट को कुर्सी नहीं देना चाहते थे। इसलिए 9 अक्टूबर को उन्होंने लिपोनू को दोबारा पीएम नियुक्त कर दिया। अगर उन्होंने विपक्षी नेता को पीएम बना दिया होता फिर क्या होता? फिर
Speaker A
उनका शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा। डोमेस्टिक शोज़ में मैक्रो का दखल नहीं के बराबर रह जाएगा। इससे बचने के लिए उन्हें स्नैप इलेक्शन कराना पड़ सकता है। मगर इसमें उनके गठबंधन की जीत के आसार बेहद कम है। इसीलिए मैट्रो बीच का रास्ता निकालना
Speaker A
चाहते थे। उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति ढूंढना था जो विपक्ष को साथ लेकर चल सके। लेकिन अंत में उन्होंने निपणों को तरजीह दी जिससे पता चलता है कि उनके पास कितने कम विकल्प रह गए हैं। अब सरकार की दूसरी शाखा विधायिका के बारे
Speaker A
में जानते हैं। फ्रांस संसद में दो सदन हैं। ऊपरी सदन को कहते हैं सेनेट। इसमें 348 मेंबर्स हैं। उनका चुनाव प्रांतों के अधिकारी, सांसद और काउंसलर्स मिलकर करते हैं। सेनेट के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। सेनेट को कभी भी भंग नहीं
Speaker A
किया जा सकता। संसद के निचले सदन का नाम है नेशनल असेंबली। इसमें 577 मेंबर्स होते हैं। यह सदस्य इलेक्टोरल डिस्ट्रिक्ट्स को रिप्रेजेंट करते हैं। उन्हें आम लोगों के डायरेक्ट वोट से चुना जाता है। नेशनल असेंबली के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का
Speaker A
होता है। लेकिन नेशनल असेंबली को कार्यकाल के बीच में भंग किया जा सकता है। संसद के पास शक्तियां क्या-क्या हैं? संसद कानून बनाती है। बजट अप्रूव करने का अधिकार संसद के पास है। वह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। संसद संविधान में
Speaker A
संशोधन कर सकती है और राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग चलाने का फैसला भी संसद ही लेती है। दोनों सदनों की शक्तियों को परखा जाए तो नेशनल असेंबली भी साबित होती है। सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ नेशनल असेंबली में लाया जा सकता है और बजट के
Speaker A
मामले में फाइनल अथॉरिटी नेशनल असेंबली की ही होती है। सेनेट सिर्फ उस्म सराह दे सकती है। यूं तो संसद के पास अच्छी खासी शक्तियां हैं। उन्हें कई मामलों में विशेष अधिकार भी प्राप्त हैं। इसने कार्यपालिका को निरंकुश होने से रोका है। मगर कई दफा
Speaker A
इसने कार्यपालिका को अपंग भी किया है। सरकारों को अस्थिर करने में संसद की भूमिका रही है और इसी वजह से फ्रांस में नए पॉलिटिकल सिस्टम पर बहस होने लगी है। अब जानते हैं सरकार की तीसरी शाखा के बारे
Speaker A
में जो है न्यायपालिका। इसको दो पार्ट्स में बांटा गया है। ऑर्डिनरी कोर्ट सिविलियन और क्रिमिनल केसेस की सुनवाई करते हैं। जबकि एडमिनिस्ट्रेटिव कोर्ट सरकारी संस्थाओं और कानूनों से जुड़े विवादों को निपटाते हैं। इन दोनों से ऊपर कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट है। यह संविधान का
Speaker A
पालन कराने पर ध्यान देती है। वो संसद से पास कानूनों की समीक्षा करती है। आम लोग भी इसी कानून के खिलाफ केस दायर कर सकते हैं। यह कोर्ट ऐसे कानूनों को अवैध घोषित कर सकती है। उसके फैसले को कहीं भी चुनौती
Speaker A
नहीं दी जा सकती। हालांकि कॉन्स्टिट्यूशन कोर्ट किसी कानून में संशोधन नहीं कर सकती। यह काम संसद का होता है। यह कोर्ट राष्ट्रपति और संसद के चुनावों पर निगरानी भी रखती है। अगर कोई धांधली मिली तो वह नतीजों को रद्द कर सकती है। जनमत संग्रह
Speaker A
के रिजल्ट्स की पुष्टि भी यही कोर्ट करती है। कॉन्स्टिट्यूशन कोर्ट में नौ जजेस होते हैं। तीन जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। तीन को नेशनल असेंबली के स्पीकर चुनते हैं। जबकि बाकी तीनों की नियुक्ति सेनेट के चेयरमैन करते
Speaker A
हैं। इस कोर्ट का अध्यक्ष भी राष्ट्रपति ही अपॉइंट करते हैं। फिर भी फ्रांस में न्यायपालिका ने अपनी स्वतंत्रता बचा कर रखी है। इस तरह सरकार की तीनों शाखाएं पूरी हुई। अगले चैप्टर में कुछ जरूरी फैक्ट्स जानेंगे। फ्रांस यूरोपियन यूनियन
Speaker A
नेटो जी7 और यूएन सिक्योरिटी काउंसिल का परमानेंट मेंबर है। वो यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। फ्रांस मेनलैंड यूरोप का इकलौता ऐसा देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। इन हथियारों को सबमरीन और फाइटर जेट से ल्च किया जा सकता
Speaker A
है। रूस यूक्रेन युद्ध के बीच उसने पड़ोसी देशों को अपने न्यूक्लियर अंब्रेला में शामिल करने की बात की है। फ्रांस का डिफेंस बजट दुनिया में नौवें स्थान पर आता है और यूरोप में सबसे बड़ी सेना उसी के पास है। इसी वजह से उसका कद यूरोप के बाकी
Speaker A
देशों से ऊपर माना जाता है। फ्रांस का मौजूदा संविधान 1958 में लागू हुआ। लेकिन राष्ट्रपति का पहला डायरेक्ट इलेक्शन 1962 में हुआ। जिन चार्ल्स डिगोल ने संविधान बनवाया था। उन्होंने 1969 तक शासन चलाया। 1969 में उनका लाया एक जनमत संग्रह फेल हो
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गया जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। आखिरी फैक्ट फ्रांस की सेना में विदेशी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं। इसके लिए बाकायदा एक विंग है जिसका नाम है फ्रेंच फॉरेन रीजन। इसमें तय समय तक सर्व करने के बाद फ्रांस की नागरिकता भी मिलती
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है। तो यह थी फ्रांस के पॉलिटिकल सिस्टम की पूरी कहानी। उम्मीद है आपको यह एपिसोड पसंद आया होगा। अगर कोई काम की जानकारी इससे मिली हो तो वीडियो को लाइक और शेयर जरूर कीजिए। पावर बाज के बाकी एपिसोड्स आप
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होगी। तब तक के लिए मैं विदा लेती हूं। बहुत-बहुत शुक्रिया। हो
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