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How Rwanda Became a Role Model for the World | Paul Kagame

रवांडा नरसंहार से विकास की कहानी, पॉल कगामे की भूमिका और देश की सामाजिक-राजनीतिक प्रगति।

Key Takeaways

  • पॉल कगामे ने रवांडा को नरसंहार के बाद पुनर्निर्माण और विकास की राह पर डाला।
  • जातिगत विभाजन और उपनिवेशवाद ने रवांडा की समस्याओं को जन्म दिया।
  • देश ने भ्रष्टाचार कम कर, महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी दी और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया।
  • कगामे की सरकार पर तानाशाही के आरोप हैं, लेकिन विकास और शांति में उनकी भूमिका विवादास्पद है।
  • रवांडा का मॉडल अफ्रीका में विकास और सामाजिक सुधार के लिए प्रेरणादायक है।

What the video covers

  • 1994 में रवांडा नरसंहार के दौरान लगभग 10 लाख लोगों की हत्या हुई थी।
  • पॉल कगामे ने देश की बर्बादी के बाद नेतृत्व संभाला और रवांडा को बदल दिया।
  • रवांडा की जीडीपी वृद्धि दर 2025 में 9.4% थी और प्रति व्यक्ति आय में भारी वृद्धि हुई।
  • देश भ्रष्टाचार में कम और महिलाओं की संसद में हिस्सेदारी अधिक है।
  • बेल्जियम के उपनिवेशकाल में जातिगत विभाजन और आईडी कार्ड सिस्टम ने नफरत को जन्म दिया।
  • हुतू और तुत्सी जाति समूहों के बीच सामाजिक-आर्थिक भेदभाव था, जो बाद में हिंसा का कारण बना।
  • पॉल कगामे ने युगांडा में शरणार्थी जीवन बिताया और वहां से आरपीएफ का गठन किया।
  • आरपीएफ ने रवांडा में विद्रोह किया और नरसंहार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • कगामे पर तानाशाही और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगते हैं, लेकिन देश की शांति और विकास में उनकी भूमिका अहम है।
  • रवांडा ने नरसंहार के बाद जातिगत पहचान खत्म कर सामाजिक एकता और विकास की दिशा में कदम बढ़ाए।

Answers

Questions about this video

पॉल कगामे ने रवांडा के विकास में क्या भूमिका निभाई?

पॉल कगामे ने 1994 के नरसंहार के बाद देश की बर्बादी से उबारकर रवांडा को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से विकसित किया। उन्होंने भ्रष्टाचार कम किया, महिलाओं की संसद में भागीदारी बढ़ाई और स्वास्थ्य सेवाएं सुधारीं।

रवांडा में हुतू और तुत्सी के बीच संघर्ष क्यों हुआ?

हुतू और तुत्सी जाति समूहों के बीच सामाजिक और आर्थिक भेदभाव था, जिसे बेल्जियम के उपनिवेशकाल में जातिगत पहचान के आधार पर बढ़ावा मिला। इससे नफरत और हिंसा की स्थिति उत्पन्न हुई, जो अंततः 1994 के नरसंहार में बदली।

क्या पॉल कगामे पर तानाशाही के आरोप सही हैं?

कगामे पर चुनावों में भारी मतों से जीतने के बावजूद धांधली, मानवाधिकार उल्लंघन और लोकतंत्र कुचलने के आरोप लगते हैं। हालांकि, उनके नेतृत्व में रवांडा ने शांति और विकास भी हासिल किया है, जिससे उनकी छवि विवादास्पद बनी हुई है।

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Speaker A
1994 में रवांडा दुनिया का सबसे खतरनाक देश था। वहां आइडेंटिटी कार्ड देखकर लोगों को मारा जा रहा था। कोई कहीं पर सेफ नहीं था। पड़ोसी अपने पड़ोसियों को, टीचर, अपने स्टूडेंट्स को, पादरी प्रार्थना करने वालों को बेरहमी से मार रहे थे। 100 दिनों
00:17
Speaker A
के अंदर लगभग 10 लाख लोगों की हत्या कर दी गई। लॉ एंड ऑर्डर का कोई नामोनिशान नहीं था। बाकी दुनिया इसको तमाशबीन बनकर देख रही थी। वो देश भी जो इसे रोक सकते थे और वह भी जिन्होंने यह आग भड़काई थी। तब एक
00:30
Speaker A
नौजवान सामने आया। उसने अपनी जिंदगी के 34 साल रवांडा से बाहर बिताए थे। लेकिन वो अपने देश को नहीं भूला था। सबसे मुश्किल दौर में उसने मोर्चा संभाला। उसने पहले सत्ता बदली फिर पूरा मुल्क बदल दिया। उसका नाम था पॉल कगामे। कट्टू 2026। आज के दिन
00:48
Speaker A
रवांडा अफ्रीका महाद्वीप की शान है। 2025 में रवांडा की जीडीपी वृद्धि दर 9.4% थी। 1994 में प्रति व्यक्ति आय $110 थी। 2025 में यह $100 तक पहुंच गई है। रवांडा अफ्रीका के सबसे कम भ्रष्ट देशों में से भी एक है। 1994 में वहां औसत आयु 28 साल
01:08
Speaker A
थी। अब यह 69 साल हो चुके हैं। रवांडा की संसद में 60% से ज्यादा महिलाएं बैठती हैं। 90% लोगों को कम्युनिटी हेल्थ इंश्योरेंस मिला है। राजधानी के गाली अफ्रीका के सबसे साफ सुथरे [संगीत] देशों में गिना जाता है। एक भयानक नरसंहार से
01:24
Speaker A
निकले देश में ऐसा बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं है और इस चमत्कार का सूत्रधार पॉल कगामे को माना जाता है। कगामे 1994 में रवांडा के उपराष्ट्रपति बने थे। फिर 2000 में राष्ट्रपति बन गए। तब से वह कुर्सी पर
01:37
Speaker A
जमे हुए हैं। हर चुनाव वह 90% से अधिक वोटों से जीतते हैं। पिछले चुनाव में 99.18% वोट मिले थे। इसके चलते उन पर धांधली, मानव अधिकार, हनन और लोकतंत्र को कुचलने के आरोप लगते हैं। कई लोग उनको तानाशाह भी
01:52
Speaker A
कहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ रवांडा की शांति और तरक्की वाला पहलू भी है जो कि उनके बिना संभव नहीं था। इसलिए यहां पर दुविधा आती है। पॉल कगामी को क्या माना जाए? मसीहा या निरंकुश शासक रवांडा का असल
02:04
Speaker A
इतिहास क्या है? रवांडा को आखिर किसने बर्बाद किया था और रवांडा इस बर्बादी से कैसे उभरा इस बदलाव में कगामी [संगीत] की क्या भूमिका रही? तो चलिए शुरू करते हैं। रवांडा सेंट्रल अफ्रीका में बसा हुआ देश है। इसका लैंड बॉर्डर चार देशों से लगता
02:29
Speaker A
है। ईस्ट में तंजानिया, वेस्ट में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, नॉर्थ में युगांडा और साउथ में बुरुंडी। अब चलते हैं हिस्ट्री में। रवांडा में एक समय तक राजतंत्र चलता था। उनके यहां दो मुख्य जाति समूह थे हुतू और तत्सी। उर्दू
02:43
Speaker A
बहुसंख्यक थे। उनकी आबादी 85सदी के आसपास थी। जबकि तुत्सी अल्पसंख्यक थे। हालांकि वे एक जैसी भाषा बोलते थे। उनका धर्म एक था। उनके रीति रिवाज [संगीत] भी एक जैसे थे। अंतर मेनली सामाजिक और आर्थिक आधार पर था। तुत्सी पशुपालन करते थे। इसमें उनके
02:58
Speaker A
पास ज्यादा पैसे होते थे। समाज में उनकी हैसियत ज्यादा मानी जाती थी। जबकि हुतू खेती किसानी करने वाले लोग थे। लेकिन यह कोई हार्ड [संगीत] एंड पास्ट ट्रोल नहीं था और ना यह जन्म के आधार पर तय होता था।
03:09
Speaker A
अगर किसी हुतुू के पास ज्यादा पशु हो गए तो वह तुत्सी बन सकता था। अगर किसी तुत्सी के पशु कम हो गए तो वह भी हुतुू बन जाता था। उनके बीच शादी विवाह और रिशेदारी आम बात थी। हुतुू और तुत्सी के अलावा एक और
03:21
Speaker A
जाति थी तो वे जंगलों में रहते थे। उनकी आबादी 1स से भी कम थी। लेकिन एक दिन यूरोपियंस आए। 1884 के बर्डन कॉन्फ्रेंस में रवांडा का इलाका जर्मनी को मिला। 1897 में रवांडा जर्मन की कॉलोनी बन गया। लेकिन
03:36
Speaker A
वो ज्यादा समय तक शासन नहीं कर पाया। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद रवांडा का मैंडेट बेल्जियम के पास आ गया। यूरोप की बाकी देशों की तरह बेल्जियम भी घनघोर नस्ल भेती था। उसने आते ही रवांडा में लोगों के
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Speaker A
सिर, नाक और स्किन कलर की जांच की। फिर तय किया कि तुत्सी सुपीरियर रेस है। उनका जन्म शासन करने और सत्ता चलाने के लिए हुआ है। जबकि हुतू मजदूरी के लिए बने हैं। 1933 में बेल्जियम ने इसको अपनी ऑफिशियल
03:58
Speaker A
पॉलिसी बना लिया। वो नेशनल आइडेंटिटी कार्ड लेकर आया। उसमें पूरी आबादी को हुतू, तत्सी और त्वा में बांट दिया। उनके लिए आईडी कार्ड इशू किए गए। इसमें उनकी जाति लिखी होती थी। लोगों को यह कार्ड हर समय पहनना होता था। एक बार जिसका हुतू
04:12
Speaker A
वाला कार्ड बन गया वह कभी तुत्सी नहीं बन सकता था। जिसके पास तुलसी का कार्ड था वो हमेशा तुत्सी ही रहने वाला था। अगर आईडी कार्ड तक की बात होती तो समझा जा सकता था। लेकिन बेल्जियम का असली मकसद कुछ और था।
04:24
Speaker A
वो रवांडा के लोगों को आपस में बांटकर शासन करना चाहता था। उसने एक कौम को ताकतवर बनाने पर ध्यान दिया और उनके जरिए दूसरों पर हुक्म चलाने लगा। बेल्जियम ने तुत्सियों को शिक्षा, नौकरी और सरकार में हिस्सेदारी दी। लेकिन हुतू लोगों को इससे
04:37
Speaker A
दूर रखा। उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक समझा गया। इस बंटवारे ने नफरत का पहला बीज बो दिया था जिसका फल कड़वा ही हो सकता था। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद एशिया और अफ्रीका के देशों में आजादी की मांग उठने लगी थी।
04:52
Speaker A
लवांडा में हुतू नेताओं ने इस आंदोलन को लीड किया। लेकिन उनका गुस्सा बेल्जियम से ज्यादा तुत्सियों पर था। 1959 में हुतू भुट्टो ने उनके खिलाफ हिंसा शुरू कर दी। इस हिंसा में करीब 1000 तुत्सी लोग मारे गए। जबकि 1 लाख से ज्यादा देश छोड़कर भाग
05:08
Speaker A
गए। इनमें से एक पॉल कगामे का परिवार भी था। उनके परिवार ने युगांडा में शरण ली। तब कगामे दो साल के थे। इधर बेल्जियम ने पासा पलटते देखा तो तुरंत अपना रंग बदल लिया। उसने पूरा समय तुत्सियों को आगे
05:20
Speaker A
बढ़ाने में लगाया था। दंगों के बाद उसने हुतू ग्रुप से हाथ मिला लिया। जब 1962 में रवांडा आजाद हुआ। सत्ता की चाबी हुतू नेताओं के हाथों में थी। उनके मन में पहले से गुस्सा भरा था। उन्होंने तुत्सियों को
05:32
Speaker A
अपना दुश्मन मान लिया था। उतू सरकार ने आईडी कार्ड वाला सिस्टम भी जारी रखा ताकि तुत्स्यों को अलग-थलग करने में आसानी हो। सरकारी नीतियों के कारण स्कूलों और सरकारी नौकरियों में तुत्सियों की संख्या घटने लगी। उनके खिलाफ समय-समय पर दंगे भी होते
05:45
Speaker A
रहते थे। इसने और तुत्सियों को भागने पर मजबूर किया। 1990 का दशक आते-आते रवांडा के 5 लाख तुत्सी शरणार्थी बन चुके थे। इनमें से ज्यादातर युगांडा में रह रहे थे। लेकिन वहां भी उनको चैन नहीं मिला था। युगांडा के स्थानीय लोग उनको बोझ की तरह
06:00
Speaker A
देखते थे। तुत्सी दो पाटों के बीच पिस रहे थे। अपने देश में उनको जान का खतरा था और दूसरे देश में आत्मसम्मान से सौदा करना पड़ रहा था। इन पिसने वाले लोगों में पॉल कगामे भी थे। उनके पिता रवांडा में अच्छी
06:12
Speaker A
खासी संपत्ति के मालिक थे। लेकिन एक रोज उन्हें खाली हाथ भागना पड़ा। फिर वे युगांडा में एक रेफ्यूजी बस्ती में बस गए थे। इसी बस्ती में कगामे की दोस्ती फ्रेड विगेमा से हुई। विगेमा उनके सबसे पक्के दोस्त बन गए। कगामी की शुरुआती पढ़ाई
06:27
Speaker A
लिखाई वेंगूरो प्राइमरी स्कूल से हुई। फिर उन्होंने एतारे सेकेंडरी स्कूल में दाखिला लिया। कगामी पढ़ने में तेज थे। लेकिन बीच में उनके पिता की मृत्यु हो गई। [संगीत] इस घटना का उन्हें बड़ा सदमा लगा। उनका ध्यान भटकने लगा। एक दिन उन्हें स्कूल से
06:40
Speaker A
निकाल दिया गया। मगर वह स्कूल से खाली हाथ नहीं जा रहे थे। उन्हें एक कमाल का साथी मिल गया था। उसका नाम था योवेरी मुसिवेनी। वो उसी स्कूल के अलमा मैटर थे। मुसिवनी आगे चलकर योगांडा के राष्ट्रपति बनने वाले
06:52
Speaker A
थे। जिन दिनों उनकी दोस्ती कगामे से हुई उन्होंने ईदी अमीन के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था। 1979 में उन्हें तंजानिया से मदद मिली। उन्होंने मिलकर ईदी अमीन का तख्ता पलट कर दिया। ईदी अमीन के बाद मिल्टन ओबोटे युगांडा के राष्ट्रपति बने लेकिन
07:07
Speaker A
उनका शासन भी अमीन जैसा ही था। मुसवनी को ठगा सा महसूस हुआ। 1981 में उन्होंने ओबोटे सरकार के खिलाफ गोरिल्ला अवार्ड छेड़ दिया। शुरुआत में उनकी गोरिल्ला आर्मी में सिर्फ 27 लड़ाके थे। इनमें से दो रवांडा से आए शरणार्थी थे। पॉल कगामे
07:21
Speaker A
और फ्रेड विगेमा मुसेवेनी का गोरिल्ला वॉर पांच बरसों तक चला। 1986 में उन्होंने ओबोटे को कुर्सी से हटा दिया। अब सत्ता मुसवेनी के पास थी। यहां तक पहुंचने में कगामी ने काफी साथ दिया था। मुसवेनी इस बात को भूले नहीं थे। उन्होंने कगामी को
07:36
Speaker A
मिलिट्री इंटेलिजेंस की कमान सौंप दी। लेकिन यह उनकी मंजिल नहीं थी। उन्हें हमेशा से अपने देश वापस लौटना था और इसी इरादे से कगामी और विगेमा ने तत्सी शनाटों का नेटवर्क बनाना शुरू किया। 1987 में उन्होंने अपना संगठन बना लिया। को नाम
07:50
Speaker A
दिया गया रवांडन पेट्रियोटिक फ्रंट आरपीएफ। आरपीएफ का मिलिट्री विंग कहलाया रवांडन पेट्रियोटिक आर्मी आरपीए। इसी बीच उगांडा सरकार ने कगामी को ट्रेनिंग के लिए अमेरिका भेजा। उन्हें लीडरशिप और काउंटर इंसर्जेंसी की तकनीक सीखनी थी। इस ट्रेनिंग के बाद उनका प्रमोशन भी होने वाला था। जब
08:07
Speaker A
कगामे अमेरिका में थे तभी उनके ग्रुप ने रवांडा में घुसकर विद्रोह शुरू कर दिया। इस विद्रोह को कगामे के दोस्त फ्रेड विगेमा लीड कर रहे थे लेकिन उनका मिलिट्री कैंपेन उल्टा पड़ गया। 48 घंटों के अंदर वेगेमा मारे जा चुके थे। उनकी हत्या को
08:20
Speaker A
लेकर दो थ्योरीज दी जाती हैं। पहली थ्योरी यह कि वो रवांडा आर्मी की गोलियों का शिकार बने। दूसरी थ्योरी यह कहती है कि आरपीएफ के अंदर फूट पड़ गई थी। आपसी गोलीबारी में विगेमा की जान चली गई। जो भी
08:32
Speaker A
सच रहा हो लेकिन इस घटना ने आरपीएफ को ध्वस्त कर दिया। उसके लड़ाकों में अफरातफरी मची हुई थी। जब कगामी ने अपने दोस्त के मरने की खबर सुनी। वो भागकर युगांडा गए। फिर जंगल के रास्ते रवांडा में घुसे।
08:46
Speaker A
लड़ाकों को एकजुट किया और वे गेमा का अधूरा मिशन आगे बढ़ाने लगे। अगले 3 वर्षों में आरपीएफ काफी मजबूत हो चुका था। आरपीएफ में 15,000 से ज्यादा लड़ाके थे। तगामी ने उन्हें मिलिट्री ट्रेनिंग के साथ-साथ कोर ऑफ कंडक्ट और पॉलिटिक्स की ट्रेनिंग भी दी
09:00
Speaker A
थी। सैनिकों को लूटपाट, बलात्कार और आम लोगों के शोषण की [संगीत] मनाही थी। आरपीएफ की पॉलिसी साफ थी। वे सिर्फ तुत्सियों की नहीं बल्कि रवांडा के हर नागरिक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसलिए उन्हें हर वर्ग के लोगों का सपोर्ट मिला।
09:13
Speaker A
जिसकी बदौलत 1993 में आरपीएफ ने रवांडा के बड़े हिस्से पर कंट्रोल कर लिया। आखिरकार रवांडा सरकार को समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा। अगस्त 1993 में तंजानिया के अरुषा में आरपीएफ और रवांडा सरकार ने समझौते पर दस्तखत किए। इसमें युद्ध विराम पर सहमति
09:31
Speaker A
बनी। यह भी तय हुआ कि आरपीएफ को साथ लेकर एक अस्थाई सरकार बनाई जाएगी। आरपीएफ को रवांडा की मेन आर्मी में शामिल किया जाएगा। शरणार्थियों को वापस लौटने दिया जाएगा और एक तय समय के बाद मल्टी पार्टी डेमोक्रेटिक इलेक्शंस करवाए जाएंगे। इससे
09:44
Speaker A
उम्मीद यह जगी कि सिविल वॉर खत्म हो गया है। पुत और तुत्सी अब एक होकर रहने लगेंगे। यूनाइटेड नेशंस ने समझौते को लागू कराने के लिए पीस कीपिंग फ़ भी भेजी लेकिन यह सब छलावा साबित हुआ। रवांडा [संगीत] के
09:57
Speaker A
कुछ ताकतवर हुतू इस डील से खुश नहीं थे। वे तुत्सियों के साथ पावर शेयर नहीं करना चाहते थे। इनमें [संगीत] नेता, मिलिट्री ऑफिसर्स, बिजनेसमैन, जर्नलिस्ट आदि शामिल थे। उन्हें लग रहा था सरकार ने आरपीएफ के आगे घुटने टेक दिए हैं। [संगीत] उन्होंने
10:10
Speaker A
तुत्सियों के खात्मे की साजिश रचनी शुरू कर दी। रुतु मिलिशिया ग्रुप इंट्रांबे को हथियार [संगीत] बांटे गए। उनको ट्रेनिंग दी गई। उन्हें रवांडा में रह रहे तुत्सियों की पूरी लिस्ट दी गई। [संगीत] कौन कहां पर रहता है? क्या काम करता है?
10:23
Speaker A
किसका संबंध किसके साथ है सब कुछ। इसके अलावा तुत्सियों के खिलाफ वीभत्स प्रोपगेंडा कैंपेन चलाया गया। रेडियो स्टेशन आरटीएलएम ने तुत्सियों को तलचट्टा [संगीत] कहकर संबोधित किया ताकि आम लोगों में उनके प्रति संवेदना खत्म हो जाए। इस कुकृत्य में सरकारी चैनल रेडियो रवांडा भी
10:39
Speaker A
शामिल था। इस तरह तत्सियों के नरसंहार की बुनियाद रखी गई। [संगीत] फिर 6 अप्रैल 1994 की तारीख आई। उस रोज रवांडा के राष्ट्रपति हुवेनल हाबियामाना तंजानिया से लौट रहे थे। उनके साथ बुरुबी के राष्ट्रपति भी थे। जैसे ही उनका प्लेन के
10:53
Speaker A
गाली एयरपोर्ट के पास पहुंचा उन पर दो मिसाइलों से हमला हुआ। इस हमले में प्लेन क्रैश हो गया। प्लेन में [संगीत] जितने लोग सवार थे सबकी मृत्यु हो गई। यह मिसाइलें किसने चलाई थी आज तक इस बात का
11:03
Speaker A
पता नहीं चल पाया है। लेकिन हुतू नेताओं को मौका मिल चुका था। उन्होंने हमले का आरोप आरपीएफ पर लगाया क्योंकि आरपीएफ में अधिकतर तुत्सी थे इसलिए [संगीत] सभी तुत्सी उनके दुश्मन बन चुके थे। प्रोपगेंडा ने लोगों के दिलों में नफरत
11:15
Speaker A
पहले ही भर रखी थी। 7 अप्रैल को सुबह [संगीत] तक इंट्रामवे काम पर लग चुकी थी। वे तुत्सी लोगों की लिस्ट लेकर घूम रहे थे। उनके एक हाथ में लिस्ट थी, दूसरे में हथियार थे। जहां कहीं उन्हें तुत्सी मिलते
11:26
Speaker A
उन्हें तुरंत मार दिया जाता था। इसमें रवांडा आदमी के सैनिक भी उनकी मदद कर रहे [संगीत] थे। उन्होंने पूरे शहर में पहरा बिठा दिया था। तत्सियों के निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए [संगीत] गए थे। यह नरसंहार अगले 100 दिनों तक चला। इन 100
11:39
Speaker A
दिनों में तकरीबन 10 लाख लोगों की हत्या हुई। इनमें 80% से ज्यादा तुत्सी थे। जो हुतू थोड़े उदार थे या जिन्होंने हिंसा का विरोध किया उन्हें भी निशाना बनाया गया। इनमें से एक रवांडा [संगीत] की प्रधानमंत्री अगा थे। विलिंगमाना भी थी।
11:52
Speaker A
वह सबको बराबरी का हक देना चाहती थी। उन्होंने अरुषा कॉट्स का समर्थन भी किया था। उन्हें नरसंहार के पहले ही [संगीत] दिन मार दिया गया। अगले 100 दिनों में रवांडा कसाईखाना बन चुका था। एक इंसान दूसरे इंसान की जान लेने से पहले सोचता तक
12:06
Speaker A
नहीं था। वो सिर्फ इसलिए हत्या कर रहा था क्योंकि उसे दूसरे की पहचान से नफरत थी। जब रवांडा जल रहा था। बाकी दुनिया क्या कर रही थी। अफ्रीका के मामले में और आमतौर पर जैसा होता [संगीत] है वैसा ही हो रहा था।
12:20
Speaker A
दुनिया तमाशा देख रही थी। यूएनपी कीपिंग मिशन के कमांडर जनरल रोमियो डेलर को नरसंहार की आहट मिल चुकी थी। उन्होंने जनवरी 1994 में इसकी सूचना हेड क्वार्टर्स को भेज दी थी। टेलर ने हथियार जब्त करने की इजाजत भी मांगी थी लेकिन उनके
12:33
Speaker A
डिपार्टमेंट ने मना कर दिया। बेल्जियम ने रवांडा पर कई वर्षों तक शासन किया। उसी ने लोगों के बीच नफरत पैदा की थी। उसने नरसंहार शुरू होते ही पीस कीपिंग फोर्स से अपने सैनिकों को बाहर निकाल लिया। फ्रांस ने रवांडा आदमी को हथियार और ट्रेनिंग दी
12:45
Speaker A
थी। वो अपने लोगों को निकाल कर ले गया। लेकिन उसने नरसंहार रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई और ना रवांडा सरकार पर दबाव डाला। अमेरिका ने अपने अधिकारियों को कहा कि नरसंहार शब्द का इस्तेमाल ना करना। अगर वे नरसंहार मान लेते तो उन्हें कारवाई करने
13:00
Speaker A
के लिए मजबूर होना पड़ता। सोच कर देखिए। एक देश में लाखों लोग बेमौत मारे जा रहे थे और दुनिया का सबसे ताकतवर देश शब्दकोश में उलझा हुआ था। अगर यूरोप के किसी देश में ऐसा हो रहा होता क्या तब भी अमेरिका
13:11
Speaker A
या दूसरे ताकतवर देश या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस तरह चुप्पी साध कर बैठी रहती? शायद नहीं। खैर जब किसी ने मदद नहीं की तब भी जनरल रोमियो डेलर रुके रहे। उनकी पीस कीपिंग फोर्स में सिर्फ 270 सैनिक बचे थे।
13:25
Speaker A
डेलर ने उनके साथ मिलकर 32,000 तत्सियों को शरण दी। डलर ने खुद उर्दू कमांडर से नेगोशिएट भी किया। तब जाकर इन लोगों की जान बच सकी। लेकिन यह नाकाफ़ था। इसका एहसास डेलर को भी था। उन्होंने बाद में
13:37
Speaker A
अपनी किताब शेख हैं वि द डेविल में लिखा। रवांडा नरसंहार ने पूरी मानव जाति को शर्मसार कर दिया। यह पूरी मानवता की असफलता थी। मैं जानता हूं कि ईश्वर हैं क्योंकि रवांडा में मैंने दानवों से हाथ मिलाया था। मैंने उन्हें देखा, उन्हें
13:52
Speaker A
महसूस किया और उन्हें छुआ भी। मैं जानता हूं कि दानव असल में होते हैं। इसीलिए मैं कह सकता हूं कि ईश्वर भी होते हैं। बहरहाल जुलाई आते-आते हिंसा की रफ्तार धीमी पड़ने लगी थी। आरपीएफ ने ज्यादातर इलाकों को
14:04
Speaker A
अपने कंट्रोल में ले लिया था। 4 जुलाई 1994 को आरपीएफ के [संगीत] गाली में घुस गई। कुछ दिनों के अंदर सरकार का पतन हो गया। हिंसा में शामिल इंट्रामवे और हुतू नेता रवांडा से भागने लगे। अब रवांडा की
14:16
Speaker A
गद्दी पर [संगीत] आरपीएफ के बैठने का समय आ चुका था। आगे चलने से पहले रवांडा नरसिंहार के चार मुख्य जिम्मेदारों के बारे में भी जान लीजिए। पहले नंबर पर बेल्जियम। बेल्जियम ने 46 वर्षों तक रवांडा पर शासन किया। वही आईडी कार्ड वाला
14:29
Speaker A
सिस्टम लेकर आया। उसी ने हुतू और तत्सियों के बीच खाई पैदा की। उन्हें आपस में लड़ने के लिए उकसाया और जब उसके कारण नरसंहार शुरू हुआ। उसने चुपचाप अपने सैनिकों को बाहर निकाल लिया। दूसरा नंबर फ्रांस का आता है। फ्रांस उतू सरकार को हथियार बेचता
14:41
Speaker A
था। नरसंहार में इन हथियारों का इस्तेमाल हुआ था। फ्रांस ने रवांडा आर्मी को ट्रेनिंग भी दी थी। नरसंहार खत्म होने के बाद फ्रांस ने ऑपरेशन टरपॉइज़ ल्च किया। कहने को यह राहत अभियान था। लेकिन असल में इससे दोषियों को बच निकलने में मदद मिली।
14:55
Speaker A
इस तरह फ्रांस ने हत्यारों को बचाया। तीसरे नंबर पर आता है यूनाइटेड नेशंस। यूएन की पीस कीपिंग फोर्स कई महीनों पहले से रवांडा में तैनात थी। उन्हें नरसंहार की आशंका थी। उन्होंने यूएन हेड क्वार्टर को अलर्ट भी किया था लेकिन कोई एक्शन नहीं
15:08
Speaker A
लिया गया। कॉफी अनान उन दिनों पीस कीपिंग डिपार्टमेंट चलाते थे। वह बाद में यूएन के सेक्रेटरी जनरल बन गए। चौथा नंबर रवांडा के उन लोगों का था जिन्होंने अपने फर्ज से गद्दारी की। पत्रकारों को सही सूचनाएं पहुंचानी थी लेकिन वे प्रोपगेंडा फैलाने
15:21
Speaker A
का जरिया बन गए। उन्होंने आम लोगों को नरसंहार के लिए उकसाया। कमांडा आर्मी को देश के हर नागरिक की सुरक्षा करनी थी। लेकिन उसने आईडी कार्ड देखकर हत्याएं की। नेताओं का काम देश को एकजुट रखना था। लेकिन वे नफरत की आंधी में ऐसा बहे कि
15:34
Speaker A
उन्हें अच्छे बुरे का कोई ख्याल तक नहीं रहा। नरसंहार के जिम्मेदार वे लोग भी थे जो नफरत फैलने से रोक सकते थे। लेकिन उन्होंने चुप रहना चुना। उनकी चुप्पी रवांडा को गर्त में ले गई। नरसंहार के बाद यूनिटी गवर्नमेंट बनाई गई।
15:49
Speaker A
आरपीएफ सबसे ताकतवर फोर्स बनकर उभरी थी। पॉल कगामी इसके लीडर थे। उन्होंने उपराष्ट्रपति का पद लिया। हुतू नेता पाश्चर बिजमुंगा को राष्ट्रपति बनाया गया। इससे संदेश दिया गया कि नई सरकार सबकी है। वो किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगी। नई
16:03
Speaker A
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती न्याय दिलाने की थी। लेकिन रवांडा का जस्टिस सिस्टम ध्वस्त [संगीत] हो चुका था। ज्यादातर जजेस, वकील, कोर्ट ऑफिशियल्स या तो मारे जा चुके थे या देश छोड़कर भाग गए थे। अगर प्रॉपर कोर्ट सिस्टम से मुकदमा
16:15
Speaker A
चलता तो सारे केसेस की सुनवाई में 100 बरस से ज्यादा लग जाते। इसलिए कगामे दूसरा विकल्प ढूंढ रहे थे। उन्हें रास्ता रवांडा की गाचाचा प्रथा में मिला। गाचाचा का मतलब होता है घास। पुराने जमाने में बड़े बुजुर्ग घास पर बैठकर लड़ाई झगड़ों का
16:30
Speaker A
निपटारा किया करते थे। कगामी सरकार ने 2001 में गा चाचा सिस्टम पूरे देश में लागू किया। इसके तहत देश भर में 12,000 कम्युनिटी कोर्ट्स बनाए गए। आम लोगों को जजेस के तौर पर चुना गया। इन कोर्ट्स में कोई वकील नहीं होते [संगीत] थे। सुनवाई के
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Speaker A
दौरान एक तरफ जनसंहार के आरोपी बैठते थे, दूसरी तरफ पीड़ित बैठते [संगीत] थे। आरोपी उनके सामने अपना गुनाह कबूल करते थे और माफी मांगते थे। अधिकतर मामलों में कम्युनिटी सर्विस से लेकर कुछ महीनों की जेल की सजा सुनाई जाती थी और पूरा फोकस
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Speaker A
पुराने जख्मों को भुलाकर आगे बढ़ने पर रहता था। गा चाचा सिस्टम 2012 तक चला। इस दौरान तकरीबन 19 लाख केसों का निपटारा किया गया। इसमें भी धांधली के आरोप लगे। लेकिन गा चाचा सिस्टम से जो हासिल हुआ वो
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Speaker A
कहीं ज्यादा सार्थक था। इसने लोगों को प्रायश्चित करने का मौका दिया और यह दबे हुए गुस्से को निकालने में भी सफल रहा। कगामी सरकार का दूसरा दाब था उमगांदा। इसका अर्थ होता है किसी खास मकसद के लिए साथ आना। रमांडा ने कानून बनाकर कम्युनिटी
17:23
Speaker A
सर्विस को अनिवार्य कर दिया। हर महीने के आखिरी शनिवार को 18 से 65 की उम्र के स्वस्थ लोगों को सेवा देनी होती है। वे साथ मिलकर सफाई करते हैं। सड़कों की मरम्मत करते हैं। पौधे लगाते हैं और भी
17:34
Speaker A
जितने छोटे-मोटे काम है उनमें हाथ बटाते हैं। राष्ट्रपति, मंत्री, सांसद से लेकर आम लोगों तक सबको इसमें शामिल होना होता है। इस कानून ने नरसंहार के बाद बिखरे समाज को साथ लाने में बड़ी मदद की। कगामी का तीसरा सबसे जरूरी फैसला था हुतु और
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Speaker A
तुत्सी वाले आईडी कार्ड्स को रद्द करना। नरसंहार के बाद हुतु, तुत्सी या त्वा में कैटेगराइज करना गैरकानूनी बना दिया गया। इसको सरकारी फॉर्म, स्कूल रिकॉर्ड्स, जनगणना पब्लिक डिस्कोर्स से भी हटा दिया गया। सरकार ने साफ-साफ कहा रवांडा में कोई
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Speaker A
हुतू, कोई तुत्सी या कोई त्वा नहीं है। यहां हर कोई एक समान है। कगामे के शासन में रवांडा कैसे बना? इसको कुछ आंकड़ों से समझते हैं। 2025 में रवांडा की जीडीपी 9.4% की दर से बढ़ी। उससे पहले के 3
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Speaker A
वर्षों में औसत वृद्धि दर 8.5% था। रवांडा की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर है। तकरीबन 50% लोग इस सेक्टर में काम करते हैं। हालांकि सर्विज और इंडस्ट्रीज की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। रवांडा में 90% लोगों के पास
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Speaker A
कम्युनिटी बेस्ड हेल्थ इंश्योरेंस है। इनकम के बेसिस पर सालाना प्रीमियम देते हैं। गरीब लोगों के प्रीमियम का खर्च सरकार उठाती है। रवांडा ने हेल्थ केयर के लिए नेशनल ड्रोन डिलीवरी नेटवर्क बना रखा है। इसे दूरदराज के इलाकों में समय पर
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Speaker A
मेडिकल सप्लाई पहुंचाई [संगीत] जाती है। रवांडा सरकार अपने बजट का 13 से 14% हिस्सा एजुकेशन पर खर्च करती है। रवांडा की संसद में 61% महिलाएं हैं। इतनी महिलाएं दुनिया की किसी देश की संसद में नहीं मिलेंगी। 1994 के नरसंहार में मरने
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Speaker A
वाले ज्यादातर पुरुष थे। जिंदा बच गई आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 70% की थी। उन्होंने देश को फिर से पैरों पर खड़ा किया। उनकी भूमिका आज भी अहम बनी [संगीत] हुई है। रवांडा की राजधानी की गाली को अफ्रीका का सबसे साफ शहर माना जाता है।
19:12
Speaker A
वहां सड़कों पर गंदगी मिलनी दुर्लभ है। 2008 से रवांडा में प्लास्टिक पर बैन है और लोग इसका पालन भी करते हैं। रवांडा को बदलाव और विकास का रोल मॉडल माना जा सकता है। कम से कम अफ्रीका में तो उस जैसा कोई
19:24
Speaker A
दूसरा नहीं है। इस तरक्की की मिसालें आने वाले कई वर्षों तक दी जाएंगी। लेकिन रवांडा ने इसकी जो कीमत चुकाई है उसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। पोलकागामी 1994 से पावर में है। 2000 में वह देश के राष्ट्रपति बन गए थे। तब से
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Speaker A
उन्होंने लगातार चार चुनाव जीते। 204 के चुनाव में उनको 99% से ज्यादा वोट मिले। ऐसा आंकड़ा बस नॉर्थ कोरिया के इलेक्शन में नजर आता है। रमांडा में विपक्ष ना के बराबर है। जिन नेताओं ने कगामे को चुनौती देने की कोशिश की उन्हें किसी ना किसी
19:53
Speaker A
आरोप में अरेस्ट कर लिया गया। कुछ को देश छोड़कर भागना पड़ा। कगामे पर विपक्षी नेताओं की हत्या के आरोप भी लगते हैं। रवांडा में फ्री प्रेस पर पाबंदी है और सरकार की आलोचना करने वाले चैनलों पर ताला लगना नॉर्मल है। पत्रकारों पर अक्सर
20:05
Speaker A
भेदभाव या नरसंहार वाली विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगा दिया जाता है। इस तरह से उन्हें डिस्क्रेडिट करना आसान रहता है। पड़ोसी देश कांगो में दखल देने के लिए भी कगामे की [संगीत] आलोचना होती है। वे कांगो के विद्रोही गुटों को सपोर्ट देकर
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Speaker A
उनसे हिंसा करवाते हैं। कई बार उनकी आर्मी ने डायरेक्ट दखल दिया है। [संगीत] इस हिंसा में लाखों लोगों की जान जा चुकी है। कगामे कांगो के नेचुरल रिसोर्सेज की लूट में भी शामिल रहे हैं। इसमें पॉल कगामे की
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Speaker A
पहचान को लेकर विरोधाभास [संगीत] चलता रहता और सवाल भी उठता है कि कगामे को आखिर क्या माना जाए? बेशक उन्होंने रवांडा को नरसंहार के दलदल [संगीत] से बाहर निकाला। जो रवांडा अपने पैरों पर चल नहीं सकता था, उसे दौड़ने के काबिल बनाया।
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Speaker A
रवांडा की [संगीत] तरक्की वाकई काबिले तारीफ है, लेकिन इसके आधार पर कगामे की कमियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कगामे को खुद भी अपनी गलतियां स्वीकार करनी चाहिए और उन्हें ठीक करने के [संगीत] लिए आगे बढ़ना चाहिए। यह काम वो करवा चुके
20:58
Speaker A
हैं। उन्हें इसमें कोई खास मुश्किल नहीं आएगी। यह रवांडा के अच्छे भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या पॉल कगामी को लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहिए या पूरी सख्ती से शासन चलाना [संगीत] चाहिए? हमें कमेंट कर जरूर
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Speaker A
बताइएगा। अगर यह वीडियो पसंद आया तो इसको लाइक और शेयर करते रहिए। हमारे [संगीत] चैनल की स्थान को सब्सक्राइब भी कर लीजिए। नए वीडियो में नई कहानी के साथ एक बार फिर से मुलाकात होगी। बहुत-बहुत शुक्रिया। ओम
Topics:रवांडापॉल कगामेनरसंहारजातिगत विभाजनआरपीएफविकास मॉडलअफ्रीकामानवाधिकारराजनीतिसामाजिक सुधार

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