Speaker A
22 अक्टूबर 1956 को पेरिस के सेवरों में ब्रिटेन, फ्रांस और इसराइल के बीच एक सीक्रेट मीटिंग हुई। इस मीटिंग का एजेंडा था स्वेस नहर का कंट्रोल वापस हासिल करना। दरअसल, जुलाई 1956 में इजिप्ट के राष्ट्रपति गमाल अब्दुदेल नासेन ने स्वेस नहर को नेशनलाइज कर दिया था। स्वेस नहर रेड सी के जरिए हिंद महासागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है। ग्लोबल ट्रेड के रूट काफी महत्वपूर्ण हैं। नेशनलाइजेशन से पहले इस नहर पर फ्रांस और ब्रिटेन का कंट्रोल था। लेकिन नासेन ने एक झटके में उन्हें बाहर निकाल दिया था। इसके चलते उनके ऑयल सप्लाई और मिलिट्री मूवमेंट पर खतरा मंडरा रहा था। अक्टूबर 1956 वाली मीटिंग में उन्होंने तय किया कि इसराइल पहले इजिप्ट पर हमला करेगा। उसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस लड़ाई रोकने का अल्टीमेटम देंगे। इसराइल इस अल्टीमेटम को मान लेगा। लेकिन इजिप्ट के मना करते ही ब्रिटेन और फ्रांस अपनी फौज उतारेंगे और नासेर का तख्ता पलट कर देंगे। इस प्लान को सेवरो प्रोटोकॉल कहा गया। इसको सबसे छिपा कर रखा गया था। अगले 40 वर्षों तक यह राज दुनिया से छिपा रहा। बहरहाल, इसराइल ने सेब्रो प्रोटोकॉल पर अमल किया। 29 अक्टूबर 1956 को उसने सनाई पेनसुला पर हमला शुरू कर दिया। फिर फ्रांस और ब्रिटेन का अल्टीमेटम आया। इजिप्ट ने इस अल्टीमेटम को नकार दिया। इसके तुरंत बाद फ्रांस और ब्रिटेन ने फौज उतार दी। उन्होंने बड़ी आसानी से पोर्ट सैद और पोर्ट फवाद पर कब्जा कर लिया। अब उनकी नजर पूरे इजिप्ट पर थी। उन्हें लगा था कि इजिप्ट के लोग नासिर के खिलाफ विद्रोह कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नाससेन ने कहा कि हम लहू के आखिरी कतरे तक लड़ेंगे। उनकी अपील पर आम लोगों ने हथियार उठा लिए। दूसरी तरफ अमेरिका गुस्से से आग बबूला हो रहा था। फ्रांस और ब्रिटेन ने हमले की जानकारी अमेरिका को नहीं दी थी। अमेरिका उन दिनों कोल्ड वॉर में उलझा हुआ था। उसको डर था कि इजिप्ट और बाकी अरब देश सोवियत संघ के पाले में जा सकते हैं। उधर जंग की वजह से ब्रिटेन का खजाना भी खाली हो रहा था। फिर उसने अमेरिका से मदद मांगी। अमेरिका को दबाव बनाने का मौका मिल गया। उसने कहा कि जब तक इजिप्ट से निकलोगे नहीं तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी। आखिरकार 6 नवंबर 1956 के दिन ब्रिटेन को सीज फायर करना पड़ा। उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा हुआ था। इसके बाद फ्रांस और इसराइल भी पीछे हट गए। यह ब्रिटेन के लिए भयानक कुठाराघात था। स्वेस नेहर परमानेंटली उसके हाथों से निकल गया था। उसके यहां फ्यूल का संकट खड़ा हो गया था। इकॉनमी चौपट होने की कगार पर थी और प्रधानमंत्री एंथनी इडन को इस्तीफा देना पड़ा था। उससे भी बड़ा झटका यह था कि वर्ल्ड ऑर्डर में ब्रिटेन की बादशाहत खत्म हो चुकी थी। वो फॉरेन अफेयर्स को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं था। उसी के साथ वो सुपर पावर की रेस से बाहर हो चुका था। कट टू 2026 ब्रिटेन में आज भी राजशाही है। राजा की शानो शौकत में कोई कमी नहीं आई है। राज परिवार के प्रोग्राम्स में आज भी करोड़ों अरबों की रकम फूंकी जाती है। लेकिन पावर के मामले में उनकी हालत बिना दांतों वाले शेर जैसी हो गई है। जिस ब्रिटिश सल्तनत का सूरज कभी नहीं डूबता था, वहां हर कुछ महीने में सरकार डूब जाती है। ब्रिटेन की इकॉनमी दुनिया में पांचवें नंबर पर पहुंच चुकी है। जिस भारत को उसने 200 बरसों तक लूटा वो भी उसे टक्कर दे रहा है। यह उस साम्राज्य का हाल है जिसका दायरा अमेरिका से लेकर नाइजीरिया, भारत और ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ था। दुनिया की एक चौथाई जमीन पर उसका डायरेक्ट शासन चलता था। उसकी नेवी दुनिया के हर एक समंदर को कंट्रोल करती थी। बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग में वह पहले नंबर पर आता था। दुनिया के हर चार में से एक व्यक्ति पर ब्रिटेन के राजा या रानी राज करते थे। अपने पीक पर ब्रिटेन के दुनिया भर में 500 से ज्यादा मिलिट्री इंस्टॉलेशंस थे। आज ये संख्या 15 से भी कम रह गई है। जिस अमेरिका पर वो राज करता था आज वो उसी अमेरिका की दया पर निर्भर है। ब्रिटेन के एक प्रधानमंत्री को तो लोग अमेरिकी राष्ट्रपति का कुत्ता तक कहते थे। यह ब्रिटेन की दशा और दुर्दशा बताने के लिए काफी है। सोचिए जो साम्राज्य कभी दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर राज करता था जिसका सूरज कभी नहीं डूबता था वो भी उतार-चढ़ाव से नहीं बचा। मतलब वक्त किसी को नहीं बखशता। चाहे वो साम्राज्य हो या हमारी अपनी खुद की जिंदगी। आज सब ठीक है। कल क्या होगा पता नहीं। पिछले साल मेरे एक रिलेटिव को अचानक हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा। सिर्फ चार दिन के इलाज का खर्च आया करीब ₹5 लाख। यह बहुत बड़ा फाइनेंशियल सेटबैक है। आजकल तो मेडिकल कॉस्ट हर साल बढ़ रही है। यही वजह है कि हेल्थ इंश्योरेंस फालतू खर्च नहीं बल्कि एक जरूरी तैयारी है। लेकिन दिक्कत यह है कि हमें इंश्योरेंस लेना सिर दर्द लगता है। मार्केट में अपनी पॉलिसीज हैं। हर एक के अपने टर्म्स एंड कंडीशंस हैं। भाषा इतनी टेक्निकल कि समझ नहीं आता क्या सही है और क्या नहीं। ऊपर से एजेंट्स का पीछे पड़ जाना, बार-बार स्पैम कॉल्स का आना यही सोचकर लोग इसे टालते रहते हैं। इस कंफ्यूजन का स्यूशन है डिट्टो के पास। यह Zerodha बैग इंश्योरेंस प्लेटफार्म है जो एक काम बड़े अच्छे से करता है। इंश्योरेंस को सिंपल बनाना। इनकी वेबसाइट से आप फ्री कंसल्टेशन बुक कर सकते हैं। कोई प्रेशर नहीं, कोई सेल्स पिच नहीं। सीधा ऑनेस्ट एडवाइस कि कौन सी पॉलिसी आपके लिए सही रहेगी? यह सिर्फ पेपर वर्क में ही नहीं बल्कि क्लेम तक में सपोर्ट करते हैं। डिट्टो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे कभी स्पैम कॉल नहीं करते। आज के दिन में ऐसा होना दुर्लभ है। तो अगर आपने भी अभी तक इंश्योरेंस को टाला है या आप कंफ्यूज्ड हैं तो डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक से डिट्टो के साथ फ्री कॉल आप बुक कर सकते हैं। सिर्फ 20 मिनट में आपकी सारी दुविधाएं क्लियर हो जाएंगी। ब्रिटेन एक आइलैंड है जिस पर तीन देश बसे हैं। इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड। उसके ठीक बगल में आयरिश आइलैंड है। वहां दो इलाके हैं। रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड और नॉर्दन आइलैंड। रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड अलग और संप्रभु देश है। उसकी सरकार डबलिन से चलती है। जबकि नॉर्दन आइलैंड इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड मिलकर यूनाइटेड किंगडम यानी कि यूके बनाते हैं। यूके की सरकार लंदन से चलती है। वेल्स, स्कॉटलैंड और नॉर्दन आइलैंड को कई मामलों में ऑटोनोमी मिली है। लेकिन डिफेंस और फॉरेन पॉलिसी जैसे मसले लंदन वाली सरकार देखती है। यह अभी का इक्वेशन है। लेकिन 1922 तक आयरलैंड और ब्रिटेन एक ही थे। तब इसका नाम था यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड। बोलचाल की भाषा में पूरे हिस्से को ग्रेट ब्रिटेन या ब्रिटेन कहते थे। वहां रहने वाले लोगों को ब्रिटिश और वहां से कंट्रोल होने वाली सत्ता को ब्रिटिश साम्राज्य कहा जाता था। भले ही ब्रिटेन चार इलाकों से मिलकर बना था। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा दबदबा इंग्लैंड का था। ब्रिटेन के साथ एक ज्योग्राफिकल एडवांटेज है। वो चारों तरफ से पानी से घिरा है। बाकी यूरोप से उसका लैंड बॉर्डर नहीं लगता। इससे उसको बाहरी हमले से बचने में मदद मिलती थी और बाकी दुनिया तक जाने पर भी कोई रोक-टोक नहीं रहती थी। इसके बावजूद एज ऑफ एक्सप्लोरेशन में वो काफी बाद में शामिल हुआ। उसका पहला खोजी जॉन केबॉट। 1497 में कनाडा के तट पर उतरा। वो इटली का था। बस उसके कैंपेन का खर्च इंग्लैंड के राजा ने उठाया था। उस समय तक स्पेन की मदद से तालमी जहाजी क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका पहुंच चुका था और पुर्तगाल का वास्कोडि गामा भारत के रास्ते पर निकला हुआ था। 1498 में वास्कोडिगामा समंदर के रास्ते भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपियन बना। जहां बाकी जमीनों में जंगल, वीरान या कबीले मिल रहे थे, वहीं भारत सोने की चिड़िया था। वहां कीमती मसालों की खेती हो रही थी। घरेलू उद्योग धंधे चल रहे थे और दूरदराज के देशों से व्यापार भी हो रहा था। वास्कोडिगामा ने भारत का वैभव देखा और चकाचौंध में खोकर रह गया। वास्कोडि गामा ने यूरोप से भारत आने का डायरेक्ट सी रूप खोजा था। इसके बाद तो भारत पहुंचने की होड़ लग गई। भारत में कदम रखने वाला पहला ब्रिटिश नागरिक राफ फिच था। वो 1583 में गोवा पहुंचा। तब गोवा पुर्तगाल के कंट्रोल में था। पिच ने आगरा, फतेहपुर सीकरी, बनारस और बंगाल में कई महीने बिताए। उसने वापस जाकर भारत की समृद्धि का बखान किया। वहां के ट्रेडर्स इससे काफी प्रभावित हुए। वे भारत के साथ व्यापार करने के लिए तैयार थे। लेकिन उन्हें सरकार और सेना का साथ भी चाहिए था। फिर 1588 में स्पेन ने लंबी चौड़ी फौज के साथ ब्रिटेन पर हमला किया। उन दिनों समंदर में स्पेन का राज चलता था। लेकिन ब्रिटेन ने स्पेन को उसी के टर्फ पर हरा दिया। इससे ब्रिटेन की ताकत बढ़ गई। उसको अपने पैर पसारने का कॉन्फिडेंस मिल गया। फिर 1600 ईसवी में ब्रिटिश क्राउन ने चार्टर के जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई। उन दिनों भारत पर मुगलों का शासन था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में फैक्ट्री लगाने की इजाजत दे दी। शुरुआती दौर में कंपनी का फोकस मुनाफा कमाने पर था। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी प्राइवेट आर्मी बना ली। जैसे-जैसे मुगल कमजोर हुए, कंपनी ने शासन कर...











