ब्रिटेन के पतन की कहानी, स्वेस नहर संकट और ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का विश्लेषण।
Key Takeaways
- स्वेस नहर का नेशनलाइजेशन ब्रिटेन के लिए बड़ा झटका था।
- 1956 का संकट ब्रिटेन की वैश्विक सत्ता के अंत का प्रतीक बना।
- अमेरिका की भूमिका ने ब्रिटेन की कमजोरी को उजागर किया।
- ब्रिटेन का साम्राज्य अब केवल इतिहास बन चुका है, वर्तमान में उसकी ताकत सीमित है।
- इतिहास से सीख लेकर वर्तमान में आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देना आवश्यक है।
What the video covers
- 1956 में ब्रिटेन, फ्रांस और इसराइल ने स्वेस नहर पर नियंत्रण वापस पाने के लिए गुप्त योजना बनाई।
- इजिप्ट के राष्ट्रपति नासेन ने स्वेस नहर को नेशनलाइज कर ब्रिटेन और फ्रांस को बाहर कर दिया।
- इसराइल ने इजिप्ट पर हमला किया, ब्रिटेन और फ्रांस ने फौज उतारकर नासेन का तख्ता पलटने की कोशिश की।
- अमेरिका ने ब्रिटेन को दबाव डालकर सीज फायर करवाया, जिससे ब्रिटेन को भारी राजनीतिक और आर्थिक नुकसान हुआ।
- इस घटना ने ब्रिटेन की वैश्विक शक्ति को कमजोर कर दिया और उसे सुपरपावर की दौड़ से बाहर कर दिया।
- ब्रिटेन की वर्तमान स्थिति में राजशाही तो बनी हुई है लेकिन उसकी वैश्विक ताकत काफी कम हो गई है।
- ब्रिटेन का इतिहास, भूगोल और साम्राज्य विस्तार की कहानी भी वीडियो में विस्तार से बताई गई है।
- ब्रिटेन ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से शासन स्थापित किया और धीरे-धीरे साम्राज्य का विस्तार किया।
- वीडियो में हेल्थ इंश्योरेंस की जरूरत और डिट्टो प्लेटफार्म का परिचय भी दिया गया है।
- ब्रिटेन के पतन से यह सिखने को मिलता है कि कोई भी साम्राज्य या सत्ता स्थायी नहीं होती।
Full Transcript — Download SRT & Markdown
Speaker A
22 अक्टूबर 1956 को पेरिस के सेवरों में ब्रिटेन, फ्रांस और इसराइल के बीच एक सीक्रेट मीटिंग हुई। इस मीटिंग का एजेंडा था स्वेस नहर का कंट्रोल वापस हासिल करना। दरअसल, जुलाई 1956 में इजिप्ट के राष्ट्रपति गमाल अब्दुदेल नासेन ने स्वेस नहर को नेशनलाइज कर दिया था। स्वेस नहर रेड सी के जरिए हिंद महासागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है। ग्लोबल ट्रेड के रूट काफी महत्वपूर्ण हैं। नेशनलाइजेशन से पहले इस नहर पर फ्रांस और ब्रिटेन का कंट्रोल था। लेकिन नासेन ने एक झटके में उन्हें बाहर निकाल दिया था। इसके चलते उनके ऑयल सप्लाई और मिलिट्री मूवमेंट पर खतरा मंडरा रहा था। अक्टूबर 1956 वाली मीटिंग में उन्होंने तय किया कि इसराइल पहले इजिप्ट पर हमला करेगा। उसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस लड़ाई रोकने का अल्टीमेटम देंगे। इसराइल इस अल्टीमेटम को मान लेगा। लेकिन इजिप्ट के मना करते ही ब्रिटेन और फ्रांस अपनी फौज उतारेंगे और नासेर का तख्ता पलट कर देंगे। इस प्लान को सेवरो प्रोटोकॉल कहा गया। इसको सबसे छिपा कर रखा गया था। अगले 40 वर्षों तक यह राज दुनिया से छिपा रहा। बहरहाल, इसराइल ने सेब्रो प्रोटोकॉल पर अमल किया। 29 अक्टूबर 1956 को उसने सनाई पेनसुला पर हमला शुरू कर दिया। फिर फ्रांस और ब्रिटेन का अल्टीमेटम आया। इजिप्ट ने इस अल्टीमेटम को नकार दिया। इसके तुरंत बाद फ्रांस और ब्रिटेन ने फौज उतार दी। उन्होंने बड़ी आसानी से पोर्ट सैद और पोर्ट फवाद पर कब्जा कर लिया। अब उनकी नजर पूरे इजिप्ट पर थी। उन्हें लगा था कि इजिप्ट के लोग नासिर के खिलाफ विद्रोह कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नाससेन ने कहा कि हम लहू के आखिरी कतरे तक लड़ेंगे। उनकी अपील पर आम लोगों ने हथियार उठा लिए। दूसरी तरफ अमेरिका गुस्से से आग बबूला हो रहा था। फ्रांस और ब्रिटेन ने हमले की जानकारी अमेरिका को नहीं दी थी। अमेरिका उन दिनों कोल्ड वॉर में उलझा हुआ था। उसको डर था कि इजिप्ट और बाकी अरब देश सोवियत संघ के पाले में जा सकते हैं। उधर जंग की वजह से ब्रिटेन का खजाना भी खाली हो रहा था। फिर उसने अमेरिका से मदद मांगी। अमेरिका को दबाव बनाने का मौका मिल गया। उसने कहा कि जब तक इजिप्ट से निकलोगे नहीं तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी। आखिरकार 6 नवंबर 1956 के दिन ब्रिटेन को सीज फायर करना पड़ा। उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा हुआ था। इसके बाद फ्रांस और इसराइल भी पीछे हट गए। यह ब्रिटेन के लिए भयानक कुठाराघात था। स्वेस नेहर परमानेंटली उसके हाथों से निकल गया था। उसके यहां फ्यूल का संकट खड़ा हो गया था। इकॉनमी चौपट होने की कगार पर थी और प्रधानमंत्री एंथनी इडन को इस्तीफा देना पड़ा था। उससे भी बड़ा झटका यह था कि वर्ल्ड ऑर्डर में ब्रिटेन की बादशाहत खत्म हो चुकी थी। वो फॉरेन अफेयर्स को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं था। उसी के साथ वो सुपर पावर की रेस से बाहर हो चुका था। कट टू 2026 ब्रिटेन में आज भी राजशाही है। राजा की शानो शौकत में कोई कमी नहीं आई है। राज परिवार के प्रोग्राम्स में आज भी करोड़ों अरबों की रकम फूंकी जाती है। लेकिन पावर के मामले में उनकी हालत बिना दांतों वाले शेर जैसी हो गई है। जिस ब्रिटिश सल्तनत का सूरज कभी नहीं डूबता था, वहां हर कुछ महीने में सरकार डूब जाती है। ब्रिटेन की इकॉनमी दुनिया में पांचवें नंबर पर पहुंच चुकी है। जिस भारत को उसने 200 बरसों तक लूटा वो भी उसे टक्कर दे रहा है। यह उस साम्राज्य का हाल है जिसका दायरा अमेरिका से लेकर नाइजीरिया, भारत और ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ था। दुनिया की एक चौथाई जमीन पर उसका डायरेक्ट शासन चलता था। उसकी नेवी दुनिया के हर एक समंदर को कंट्रोल करती थी। बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग में वह पहले नंबर पर आता था। दुनिया के हर चार में से एक व्यक्ति पर ब्रिटेन के राजा या रानी राज करते थे। अपने पीक पर ब्रिटेन के दुनिया भर में 500 से ज्यादा मिलिट्री इंस्टॉलेशंस थे। आज ये संख्या 15 से भी कम रह गई है। जिस अमेरिका पर वो राज करता था आज वो उसी अमेरिका की दया पर निर्भर है। ब्रिटेन के एक प्रधानमंत्री को तो लोग अमेरिकी राष्ट्रपति का कुत्ता तक कहते थे। यह ब्रिटेन की दशा और दुर्दशा बताने के लिए काफी है। सोचिए जो साम्राज्य कभी दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर राज करता था जिसका सूरज कभी नहीं डूबता था वो भी उतार-चढ़ाव से नहीं बचा। मतलब वक्त किसी को नहीं बखशता। चाहे वो साम्राज्य हो या हमारी अपनी खुद की जिंदगी। आज सब ठीक है। कल क्या होगा पता नहीं। पिछले साल मेरे एक रिलेटिव को अचानक हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा। सिर्फ चार दिन के इलाज का खर्च आया करीब ₹5 लाख। यह बहुत बड़ा फाइनेंशियल सेटबैक है। आजकल तो मेडिकल कॉस्ट हर साल बढ़ रही है। यही वजह है कि हेल्थ इंश्योरेंस फालतू खर्च नहीं बल्कि एक जरूरी तैयारी है। लेकिन दिक्कत यह है कि हमें इंश्योरेंस लेना सिर दर्द लगता है। मार्केट में अपनी पॉलिसीज हैं। हर एक के अपने टर्म्स एंड कंडीशंस हैं। भाषा इतनी टेक्निकल कि समझ नहीं आता क्या सही है और क्या नहीं। ऊपर से एजेंट्स का पीछे पड़ जाना, बार-बार स्पैम कॉल्स का आना यही सोचकर लोग इसे टालते रहते हैं। इस कंफ्यूजन का स्यूशन है डिट्टो के पास। यह Zerodha बैग इंश्योरेंस प्लेटफार्म है जो एक काम बड़े अच्छे से करता है। इंश्योरेंस को सिंपल बनाना। इनकी वेबसाइट से आप फ्री कंसल्टेशन बुक कर सकते हैं। कोई प्रेशर नहीं, कोई सेल्स पिच नहीं। सीधा ऑनेस्ट एडवाइस कि कौन सी पॉलिसी आपके लिए सही रहेगी? यह सिर्फ पेपर वर्क में ही नहीं बल्कि क्लेम तक में सपोर्ट करते हैं। डिट्टो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे कभी स्पैम कॉल नहीं करते। आज के दिन में ऐसा होना दुर्लभ है। तो अगर आपने भी अभी तक इंश्योरेंस को टाला है या आप कंफ्यूज्ड हैं तो डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक से डिट्टो के साथ फ्री कॉल आप बुक कर सकते हैं। सिर्फ 20 मिनट में आपकी सारी दुविधाएं क्लियर हो जाएंगी। ब्रिटेन एक आइलैंड है जिस पर तीन देश बसे हैं। इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड। उसके ठीक बगल में आयरिश आइलैंड है। वहां दो इलाके हैं। रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड और नॉर्दन आइलैंड। रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड अलग और संप्रभु देश है। उसकी सरकार डबलिन से चलती है। जबकि नॉर्दन आइलैंड इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड मिलकर यूनाइटेड किंगडम यानी कि यूके बनाते हैं। यूके की सरकार लंदन से चलती है। वेल्स, स्कॉटलैंड और नॉर्दन आइलैंड को कई मामलों में ऑटोनोमी मिली है। लेकिन डिफेंस और फॉरेन पॉलिसी जैसे मसले लंदन वाली सरकार देखती है। यह अभी का इक्वेशन है। लेकिन 1922 तक आयरलैंड और ब्रिटेन एक ही थे। तब इसका नाम था यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड। बोलचाल की भाषा में पूरे हिस्से को ग्रेट ब्रिटेन या ब्रिटेन कहते थे। वहां रहने वाले लोगों को ब्रिटिश और वहां से कंट्रोल होने वाली सत्ता को ब्रिटिश साम्राज्य कहा जाता था। भले ही ब्रिटेन चार इलाकों से मिलकर बना था। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा दबदबा इंग्लैंड का था। ब्रिटेन के साथ एक ज्योग्राफिकल एडवांटेज है। वो चारों तरफ से पानी से घिरा है। बाकी यूरोप से उसका लैंड बॉर्डर नहीं लगता। इससे उसको बाहरी हमले से बचने में मदद मिलती थी और बाकी दुनिया तक जाने पर भी कोई रोक-टोक नहीं रहती थी। इसके बावजूद एज ऑफ एक्सप्लोरेशन में वो काफी बाद में शामिल हुआ। उसका पहला खोजी जॉन केबॉट। 1497 में कनाडा के तट पर उतरा। वो इटली का था। बस उसके कैंपेन का खर्च इंग्लैंड के राजा ने उठाया था। उस समय तक स्पेन की मदद से तालमी जहाजी क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका पहुंच चुका था और पुर्तगाल का वास्कोडि गामा भारत के रास्ते पर निकला हुआ था। 1498 में वास्कोडिगामा समंदर के रास्ते भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपियन बना। जहां बाकी जमीनों में जंगल, वीरान या कबीले मिल रहे थे, वहीं भारत सोने की चिड़िया था। वहां कीमती मसालों की खेती हो रही थी। घरेलू उद्योग धंधे चल रहे थे और दूरदराज के देशों से व्यापार भी हो रहा था। वास्कोडिगामा ने भारत का वैभव देखा और चकाचौंध में खोकर रह गया। वास्कोडि गामा ने यूरोप से भारत आने का डायरेक्ट सी रूप खोजा था। इसके बाद तो भारत पहुंचने की होड़ लग गई। भारत में कदम रखने वाला पहला ब्रिटिश नागरिक राफ फिच था। वो 1583 में गोवा पहुंचा। तब गोवा पुर्तगाल के कंट्रोल में था। पिच ने आगरा, फतेहपुर सीकरी, बनारस और बंगाल में कई महीने बिताए। उसने वापस जाकर भारत की समृद्धि का बखान किया। वहां के ट्रेडर्स इससे काफी प्रभावित हुए। वे भारत के साथ व्यापार करने के लिए तैयार थे। लेकिन उन्हें सरकार और सेना का साथ भी चाहिए था। फिर 1588 में स्पेन ने लंबी चौड़ी फौज के साथ ब्रिटेन पर हमला किया। उन दिनों समंदर में स्पेन का राज चलता था। लेकिन ब्रिटेन ने स्पेन को उसी के टर्फ पर हरा दिया। इससे ब्रिटेन की ताकत बढ़ गई। उसको अपने पैर पसारने का कॉन्फिडेंस मिल गया। फिर 1600 ईसवी में ब्रिटिश क्राउन ने चार्टर के जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई। उन दिनों भारत पर मुगलों का शासन था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में फैक्ट्री लगाने की इजाजत दे दी। शुरुआती दौर में कंपनी का फोकस मुनाफा कमाने पर था। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी प्राइवेट आर्मी बना ली। जैसे-जैसे मुगल कमजोर हुए, कंपनी ने शासन कर...
Speaker A
नहर को नेशनलाइज कर दिया था। स्वेस नहर रेड सी के जरिए हिंद महासागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है। ग्लोबल ट्रेड के रूट काफी महत्वपूर्ण [संगीत] है। नेशनलाइजेशन से पहले इस नहर पर फ्रांस और ब्रिटेन का कंट्रोल [संगीत] था। लेकिन नासेन ने एक
Speaker A
झटके में उन्हें बाहर निकाल दिया था। इसके चलते उनके ऑयल सप्लाई और मिलिट्री मूवमेंट पर खतरा मंडरा रहा था। अक्टूबर 1956 वाली मीटिंग में उन्होंने तय किया कि इसराइल पहले इजिप्ट पर हमला करेगा। उसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस लड़ाई रोकने का
Speaker A
अल्टीमेटम देंगे। इसराइल इस अल्टीमेटम को मान लेगा। लेकिन इजिप्ट [संगीत] के मना करते ही ब्रिटेन और फ्रांस अपनी फौज उतारेंगे और नासेर का तख्ता पलट कर देंगे। इस प्लान को सेवरो प्रोटोकॉल कहा गया। इसको [संगीत] सबसे छिपा कर रखा गया था।
Speaker A
अगले 40 वर्षों तक यह राज दुनिया से छिपा रहा। बहरहाल इसराइल ने सेब्रो प्रोटोकॉल पर अमल किया। 29 अक्टूबर [संगीत] 1956 को उसने सनाई पेनसुला पर हमला शुरू कर दिया। फिर फ्रांस और ब्रिटेन का अल्टीमेटम आया। इजिप्ट ने इस अल्टीमेटम [संगीत] को नकार
Speaker A
दिया। इसके तुरंत बाद फ्रांस और ब्रिटेन ने फौज उतार दी। उन्होंने बड़ी आसानी से पोर्ट सैद और पोर्ट फवाद पर कब्जा कर लिया। अब उनकी नजर पूरे इजिप्ट पर [संगीत] थी। उन्हें लगा था कि इजिप्ट के लोग नासिर
Speaker A
के खिलाफ विद्रोह कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नाससेन ने कहा कि हम लहू के आखिरी कतरे तक लड़ेंगे। उनकी अपील पर आम लोगों ने हथियार उठा लिए। दूसरी तरफ अमेरिका गुस्से से आग बबूला हो रहा था। फ्रांस और ब्रिटेन ने हमले की जानकारी
Speaker A
अमेरिका को नहीं दी थी। अमेरिका उन दिनों कोल्ड वॉर में उलझा हुआ था। उसको डर था कि इजिप्ट और बाकी अरब देश सोवियत संघ के पाले में जा सकते हैं। उधर जंग की वजह से ब्रिटेन का खजाना [संगीत] भी खाली हो रहा
Speaker A
था। फिर उसने अमेरिका से मदद मांगी। अमेरिका को दबाव बनाने का [संगीत] मौका मिल गया। उसने कहा कि जब तक इजिप्ट से निकलोगे नहीं तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी। आखिरकार 6 नवंबर 1956 के दिन ब्रिटेन को सीज फायर करना पड़ा। उसके पास कोई दूसरा
Speaker A
[संगीत] चारा नहीं बचा हुआ था। इसके बाद फ्रांस और इसराइल भी पीछे हट गए। यह ब्रिटेन के लिए भयानक कुठाराघात था। स्वेस नेहर परमानेंटली उसके हाथों से निकल गया था। उसके यहां फ्यूल का संकट खड़ा हो गया था। इकॉनमी [संगीत] चौपट होने की कगार पर
Speaker A
थी और प्रधानमंत्री एंथनी इडन को इस्तीफा देना पड़ा था। उससे भी बड़ा [संगीत] झटका यह था कि वर्ल्ड ऑर्डर में ब्रिटेन की बादशाहत खत्म हो चुकी थी। वो फॉरेन अफेयर्स को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं था। उसी के साथ वो सुपर पावर की रेस
Speaker A
से बाहर हो चुका था। कट टू 2026 ब्रिटेन में आज भी राजशाही है। राजा की शानो शौकत में कोई कमी नहीं आई है। राज परिवार के प्रोग्राम्स में आज भी करोड़ों अरबों की रकम फूंकी जाती है। लेकिन पावर के मामले
Speaker A
में उनकी हालत बिना दांतों वाले शेर जैसी हो गई है। जिस [संगीत] ब्रिटिश सल्तनत का सूरज कभी नहीं डूबता था, वहां हर कुछ महीने में सरकार डूब जाती है। ब्रिटेन की इकॉनमी दुनिया में पांचवें नंबर पर पहुंच चुकी है। जिस भारत को उसने
Speaker A
200 बरसों तक लूटा वो भी उसे टक्कर दे रहा है। यह उस साम्राज्य का हाल है जिसका दायरा अमेरिका से लेकर नाइजीरिया, भारत और ऑस्ट्रेलिया [संगीत] तक फैला हुआ था। दुनिया की एक चौथाई जमीन पर उसका डायरेक्ट शासन चलता था। उसकी [संगीत] नेवी दुनिया
Speaker A
के हर एक समंदर को कंट्रोल करती थी। बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग में वह पहले नंबर पर आता था। दुनिया के हर चार में से एक व्यक्ति पर ब्रिटेन [संगीत] के राजा या रानी राज करते थे। अपने पीक पर ब्रिटेन के
Speaker A
दुनिया भर में 500 से ज्यादा मिलिट्री इंस्टॉलेशंस [संगीत] थे। आज ये संख्या 15 से भी कम रह गई है। जिस अमेरिका पर वो राज करता था आज वो उसी अमेरिका की दया पर निर्भर है। ब्रिटेन के एक प्रधानमंत्री को तो लोग अमेरिकी
Speaker A
राष्ट्रपति का कुत्ता तक कहते थे। यह ब्रिटेन की दशा और दुर्दशा बताने के लिए काफी है। सोचिए जो साम्राज्य कभी दुनिया के एक चौथाई [संगीत] हिस्से पर राज करता था जिसका सूरज कभी नहीं डूबता था वो भी उतार-चढ़ाव से नहीं बचा। मतलब वक्त किसी
Speaker A
को नहीं बखशता। चाहे वो साम्राज्य हो या [संगीत] हमारी अपनी खुद की जिंदगी। आज सब ठीक है। कल क्या होगा पता नहीं। पिछले साल मेरे एक रिलेटिव को [संगीत] अचानक हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा। सिर्फ चार दिन के इलाज का खर्च आया करीब ₹.5 लाख। यह
Speaker A
बहुत बड़ा फाइनेंशियल सेटबैक [संगीत] है। आजकल तो मेडिकल कॉस्ट हर साल बढ़ रही है। यही वजह है कि हेल्थ इंश्योरेंस फालतू खर्च नहीं बल्कि एक जरूरी तैयारी है। लेकिन दिक्कत यह है कि हमें इंश्योरेंस लेना सिर दर्द लगता है। मार्केट में अपनी
Speaker A
पॉलिसीज हैं। हर एक के [संगीत] अपने टर्म्स एंड कंडीशंस हैं। भाषा इतनी टेक्निकल कि समझ नहीं आता क्या सही है [संगीत] और क्या नहीं। ऊपर से एजेंट्स का पीछे पड़ जाना, बार-बार स्पैम कॉल्स का आना यही सोचकर लोग इसे टालते रहते हैं। इस
Speaker A
कंफ्यूजन का स्यूशन है डिट्टो के पास। यह zerodha बैग इंश्योरेंस प्लेटफार्म है जो एक [संगीत] काम बड़े अच्छे से करता है। इंश्योरेंस को सिंपल बनाना। इनकी वेबसाइट से आप फ्री कंसल्टेशन बुक कर सकते हैं। कोई [संगीत] प्रेशर नहीं, कोई सेल्स पिच
Speaker A
नहीं। सीधा ऑनेस्ट एडवाइस कि कौन सी पॉलिसी आपके लिए सही रहेगी? यह सिर्फ पेपर वर्क में ही नहीं बल्कि क्लेम तक में सपोर्ट [संगीत] करते हैं। डिट्टो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे कभी स्पैम कॉल नहीं करते। आज के दिन में ऐसा होना दुर्लभ
Speaker A
है। तो अगर आपने भी अभी तक इंश्योरेंस को टाला है या आप कंफ्यूज्ड हैं तो डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक से डिट्टो के साथ फ्री कॉल आप बुक कर सकते हैं। सिर्फ 20 मिनट में आपकी सारी दुविधाएं क्लियर हो
Speaker A
जाएंगी। ब्रिटेन एक आइलैंड [संगीत] है जिस पर तीन देश बसे हैं। इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड। उसके ठीक बगल में आयरिश आइलैंड है। वहां दो इलाके हैं। रिपब्लिक ऑफ आइलैंड और नॉर्दन आइलैंड। रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड अलग और संप्रभु देश है। उसकी
Speaker A
सरकार डबलन से चलती है। जबकि नॉर्दन आइलैंड इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड मिलकर यूनाइटेड किंगडम [संगीत] यानी कि यूके बनाते हैं। यूके की सरकार लंदन से चलती है। वेल्स, स्कॉटलैंड और नॉर्दन आइलैंड को कई मामलों में ऑटोनोमी मिली है।
Speaker A
लेकिन डिफेंस और फॉरेन पॉलिसी जैसे मसले लंदन [संगीत] वाली सरकार देखती है। यह अभी का इक्वेशन है। लेकिन 1922 तक आयरलैंड और ब्रिटेन एक ही थे। तब इसका नाम था यूनाइटेड [संगीत] किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड। बोलचाल की भाषा में पूरे
Speaker A
हिस्से को ग्रेट ब्रिटेन या ब्रिटेन कहते [संगीत] थे। वहां रहने वाले लोगों को ब्रिटिश और वहां से कंट्रोल होने वाली सत्ता को ब्रिटिश साम्राज्य कहा जाता था। भले ही ब्रिटेन [संगीत] चार इलाकों से मिलकर बना था। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा
Speaker A
दबदबा इंग्लैंड का था। ब्रिटेन के साथ एक ज्योग्राफिकल एडवांटेज है। वो चारों तरफ से पानी से घिरा है। बाकी यूरोप से उसका लैंड बॉर्डर नहीं लगता। इससे उसको बाहरी हमले [संगीत] से बचने में मदद मिलती थी और बाकी दुनिया तक जाने पर भी कोई रोक-टोक
Speaker A
नहीं रहती थी। इसके बावजूद एज ऑफ एक्सप्लोरेशन में वो काफी बाद में शामिल हुआ। उसका पहला खोजी जॉन केबॉट। 1497 में कनाडा के तट पर उतरा। वो इटली का था। बस उसके कैंपेन का खर्च इंग्लैंड के राजा ने
Speaker A
उठाया था। उस समय तक स्पेन [संगीत] की मदद से तालमी जहाजी क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका पहुंच चुका था और पुर्तगाल का वास्कोडि गामा भारत के रास्ते [संगीत] पर निकला हुआ था। 1498 में वास्कोडिगामा समंदर के रास्ते भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपियन
Speaker A
बना। जहां बाकी जमीनों में जंगल, वीरान या कबीले मिल रहे थे, वहीं भारत सोने की चिड़िया था। वहां कीमती मसालों की खेती हो रही थी। घरेलू उद्योग धंधे चल रहे थे और दूरदराज के देशों से व्यापार भी हो रहा
Speaker A
था। वास्कोडिगामा ने भारत का वैभव देखा और चकाचौंध में खोकर रह गया। वास्कोडि गामा ने यूरोप से भारत आने [संगीत] का डायरेक्ट सी रूप खोजा था। इसके बाद तो भारत पहुंचने की होड़ लग गई। भारत में कदम रखने वाला
Speaker A
पहला ब्रिटिश नागरिक राफ फिच था। वो 1583 में गोवा पहुंचा। तब गोवा पुर्तगाल के कंट्रोल में था। पिच ने आगरा, फतेहपुर सीकरी, [संगीत] बनारस और बंगाल में कई महीने बिताए। उसने वापस जाकर भारत की समृद्धि का बखान किया। वहां के ट्रेडर्स
Speaker A
इससे काफी प्रभावित हुए। वे [संगीत] भारत के साथ व्यापार करने के लिए तैयार थे। लेकिन उन्हें सरकार और सेना का साथ भी चाहिए था। फिर 1588 में स्पेन ने लंबी चौड़ी फौज के साथ ब्रिटेन पर हमला किया। उन दिनों समंदर में स्पेन का राज चलता था।
Speaker A
लेकिन ब्रिटेन ने स्पेन को उसी [संगीत] के टर्फ पर हरा दिया। इससे ब्रिटेन की ताकत बढ़ गई। उसको अपने पैर पसारने का कॉन्फिडेंस मिल गया। फिर 1600 ईसवी में ब्रिटिश क्राउन ने चार्टर के जरिए ईस्ट [संगीत] इंडिया कंपनी बनाई। उन दिनों भारत
Speaker A
पर मुगलों का शासन था। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में फैक्ट्री लगाने की इजाजत दे दी। शुरुआती दौर में कंपनी का फोकस मुनाफा कमाने पर था। [संगीत] लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी प्राइवेट आर्मी बना ली। जैसे-जैसे मुगल कमजोर हुए, कंपनी
Speaker A
ने शासन करना और टैक्स वसूलना भी शुरू कर दिया था। 1757 में पलासी की लड़ाई में उसने सिराजुद्दौला को हराकर बंगाल पर कब्जा कर लिया। धीरे-धीरे दूसरे इलाके भी उसके कंट्रोल में आने लगे। अब कंपनी भारत में हुकूमत चलाने लगी थी। 1857 में इस
Speaker A
हुकूमत के खिलाफ सिपाही विद्रोह [संगीत] हुआ। कंपनी की प्राइवेट आर्मी और ब्रिटिश सैनिकों ने इस विद्रोह को दबा दिया। लेकिन यहां से ईस्ट इंडिया कंपनी का इकबाल घटने लगा था। फिर 1858 में ब्रिटिश क्राउन ने भारत का कंट्रोल अपने हाथों में ले लिया।
Speaker A
भारत पर ब्रिटेन का शासन 15 अगस्त 1947 तक चला। तब तक वे तकरीबन 45 ट्रिलियन डॉलर लूट कर ले जा चुके थे। 1600 में भारत की जीडीपी दुनिया की कुल जीडीपी का 23स थी। 1947 में महज 4% रह गई थी। इस दरमियान आम
Speaker A
लोगों पर जो अत्याचार हुए उसकी कहानी अलग है। 1947 का खूनी विभाजन भी ब्रिटेन की गेंद था। उसने आनन-फानन में लकीर खींचकर भारत का बंटवारा किया था। इसके चलते हुई हिंसा में लाखों लोग मारे गए थे। इसका दंश
Speaker A
लोग आज तक झेल रहे हैं। भारत को लूटकर ब्रिटेन ताकतवर बना था। भारत के रॉ मटेरियल से उसके यहां इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन हुआ था। भारत के सैनिक उसके लिए जंग लड़े थे। भारत का अनाज खाकर ब्रिटिश आर्मी फली-फूली थी। जैसे यह खजाना
Speaker A
उसके हाथ से निकला, ब्रिटेन की हालत पतली होने लगी। यहां से उसके पतन की शुरुआत भी हुई थी। भारत ब्रिटेन की सबसे कीमती कॉलोनी था, लेकिन वह इकलौता नहीं था। 17वीं सदी में ब्रिटेन ने अमेरिका, कनाडा और अफ्रीका में कई कॉलोनीज़ फसाई। हालांकि
Speaker A
1776 में अमेरिकी कॉलोनीज़ ने ब्रिटेन के खिलाफ विद्रोह कर दिया। 1783 में उसको अमेरिका से बाहर निकलना पड़ा। अमेरिका से निकलने के बाद भी ब्रिटेन कमजोर नहीं हुआ था। 1788 में उसने ऑस्ट्रेलिया में कॉलोनी बसा ली थी। उसी दौर में ब्रिटेन में
Speaker A
इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन हो रहा था। उसके यहां नई-नई तकनीकें इजाद हो रही थी। रॉ मटेरियल वह कॉलोनीज से ला रहा था। इस तरह वह मैन्युफैक्चरिंग का हब बन गया था। 19वीं सदी आते-आते उसका साम्राज्य अपने चरम पर पहुंच चुका था। फिर जून 1815 में
Speaker A
ब्रिटेन ने जर्मनी, ऑस्ट्रिया और रूस के साथ मिलकर नेपोलियन बोनापार्ट को हरा दिया। उसके हारते ही ब्रिटेन यूरोप का सबसे [संगीत] शक्तिशाली देश बन गया। फिर 1819 में सिंगापुर, 1840 [संगीत] में न्यूजीलैंड और 1841 में हांगकांग उसके हिस्से में आ गए। ओपियम वॉर के बाद
Speaker A
ब्रिटेन चीन में भी घुस चुका था। फिर 1882 में इजिप्ट उसके नियंत्रण में [संगीत] आ गया। 1884 में हुए बर्डन कॉन्फ्रेंस के बाद अफ्रीका के कई और इलाके ब्रिटेन की कॉलोनीज़ [संगीत] बन गए थे। 19वीं सदी के अंत तक दुनिया की एक चौथाई जमीन और उतनी
Speaker A
ही आबादी पर ब्रिटेन का शासन था। नॉर्थ अमेरिका से लेकर अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक [संगीत] उसकी पूटी बोल रही थी। ब्रिटेन की रॉयल नेवी दुनिया में सबसे ज्यादा ताकतवर थी। उसके जहाज हर वक्त दुनिया के हर एक समंदर में गश्त लगा रहे
Speaker A
थे। ग्लोबल ट्रेड के अहम [संगीत] रूट्स पर भी उसका कंट्रोल था। इसके अलावा दुनिया की 32% मैन्युफैक्चरिंग ब्रिटेन में हो रही थी। लंदन दुनिया का फाइनशियल सेंटर था। पाउंड स्टर्लिंग दुनिया की रिजर्व करेंसी [संगीत] थी। 1913 में 60% इंटरनेशनल ट्रेड
Speaker A
पाउंड स्टर्लिंग में हो रहा था। [संगीत] फिर 28 जून 1914 की तारीख आई। उस रोज सरायवो में ऑस्ट्रो हंगरी एंपायर के युवराज आस्टियो फ्रांस कॉर्डिनेंट की हत्या हो गई। इसका इल्जाम सर्बिया पर लगा। 1 महीने बाद ऑस्ट्रिया हंगरी ने सर्बिया
Speaker A
के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही फर्स्ट वर्ल्ड वॉर शुरू हो चुका था। 4 अगस्त 1914 को ब्रिटेन भी इसमें शामिल हो गया। यह जंग नवंबर 1918 तक चली। उसमें ब्रिटेन विजेता बनकर निकला था। लेकिन
Speaker A
जीतने के बावजूद वो नुकसान में था। सेकंड वर्ल्ड वॉर आते-आते नुकसान हद से बाहर पहुंच चुका था। फर्स्ट और ऑटोमन साम्राज्य का पतन हो गया। ब्रिटेन को विजेता होने का फायदा मिला। लीग ऑफ नेशंस ने इराक, फिलिस्तीन और
Speaker A
जॉर्डन का मैंडेट ब्रिटेन को दिया। जर्मनी की कुछ कॉलोनीज़ भी उसको मिली थी। इससे ब्रिटिश एंपायर की जमीन में इजाफा हुआ। लेकिन इसके लिए उसको लाखों नौजवानों [संगीत] की कुर्बानी देनी पड़ी थी। जंग लड़ने में ब्रिटेन को 7 बिलियन डॉलर से
Speaker A
ज्यादा का कर्ज लेना पड़ा था। साथ ही साथ उसकी कॉलोनीज में आजादी की मांग भी उठने लगी थी। सबसे बड़ा उदाहरण भारत का था। भारत के 13 लाख से ज्यादा सैनिक ब्रिटेन [संगीत] के लिए लड़ने गए थे। उनमें से
Speaker A
74,000 बलिदान हुए। ब्रिटेन ने वादा किया था कि जंग के बाद सेल्फ रूल का हक दिया जाएगा। लेकिन बाद में उसने वादा [संगीत] खिलाफी की। उल्टा उसने काले कानून बनाए और विरोध करने पर निहत्ते लोगों का नरसंहार किया। इसके चलते भारत में आजादी का आंदोलन
Speaker A
तेज हुआ। उधर कनाडा, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका अपने ज्यादा अधिकार मांग रहे थे। और तो और फिलिस्तीन का मैंडेट भी ब्रिटेन पर भारी पड़ रहा था। वहां आए दिन दंगे होते रहते थे। दूसरी तरफ ब्रिटेन के अंदर भी हालात ठीक नहीं थे।
Speaker A
1919 में आयरलैंड ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। 1922 में वह अलग मुल्क बन गया। हालांकि नॉर्दन आइलैंड के कुछ इलाके ब्रिटेन का हिस्सा बने रहे। इकॉनमी के मोर्चे पर भी ब्रिटेन [संगीत] पस्त था। जंग के आखिरी महीनों में उसने
Speaker A
अमेरिका से लगभग 4 बिलियन डॉलर का लोन लिया था। जंग खत्म होने के बाद ब्रिटेन ने लोन माफ करने के लिए कहा, लेकिन अमेरिका ने इससे मना कर दिया। हालांकि उसने पैसा वसूलने पर जोर भी नहीं दिया। यह लोन आज तक
Speaker A
चल रहा है। इन सबके अलावा ब्रिटेन का मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट काफी कम हो गया है। उसकी फैक्ट्रियां तबाह थी और वर्क फोर्स भी घट गया था। इसके बरक्स अमेरिका सेफ कंडीशन में था। [संगीत] फर्स्ट वर्ल्ड वॉर उसकी धरती पर नहीं लड़ा गया था। उसकी
Speaker A
फैक्ट्रियां सुरक्षित थी। वो काफी देर से जंग में [संगीत] शामिल हुआ था। इसलिए जंग के बाद भी उसकी प्रोडक्शन की क्षमता बरकरार थी। इसी दौर में अमेरिका और जापान की मिलिट्री कैपेसिटी तेजी से बढ़ रही थी। फिर 1930 के दशक में हिटलर का उदय हुआ।
Speaker A
उसने जर्मन आर्मी को फिर से खड़ा किया। 1938 आते-आते वह यूरोप के लिए खतरा बन गया था। सितंबर 1938 में उसने चेकोस्लोवाकिया [संगीत] का स्वेटनलैंड प्राण हथियाने की धमकी दी। पहले का वक्त होता तो ब्रिटेन इसका विरोध करता [संगीत] लेकिन वो एक और
Speaker A
जंग से बचना चाहता था। ब्रिटेन को लगा कि हिटलर सुटन लैंड लेकर शांत हो जाएगा। इसलिए उसने हिटलर के साथ समझौता कर लिया। लेकिन एक बरस के भीतर हिटलर ने पोलैंड पर हमला कर दिया। ब्रिटेन ने पोलैंड को
Speaker A
डिफेंड करने की गारंटी दी थी। उसके पास अब कोई चारा नहीं बचा था। 3 सितंबर 1939 को उसने जर्मनी के खिलाफ जंग की घोषणा कर दी। इसी के साथ [संगीत] सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू हो गया। सेकंड वर्ल्ड वॉर 1945 तक चला।
Speaker A
हिटलर के मरने के बाद जर्मनी ने सरेंडर कर दिया। इटली में मुस्लिमीनी को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला [संगीत] था और जापान ने परमाणु हमले के बाद हथियार डाल दिए थे। इस बार भी ब्रिटेन विजेताओं की टीम में था
Speaker A
लेकिन जंग के बीच में उसको तीन बड़े झटके लगे थे। नंबर एक, 1940 में ब्रिटेन दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया था। उसके पास हथियार, खाना और ईंधन खरीदने तक के पैसे नहीं बचे थे। तब मार्च 1941 में
Speaker A
उसने अमेरिका के साथ लैंड लीज एग्रीमेंट किया। इसके तहत अमेरिका ने ब्रिटेन और दूसरे सहयोगी देशों को मदद भेजी। इस मदद को लौटाने की जरूरत नहीं थी। लेकिन सितंबर 1945 में अमेरिका ने एग्रीमेंट अचानक खत्म कर दिया। अब ब्रिटेन को सामान खरीदने के
Speaker A
लिए तुरंत पैसे देने थे। फिर इसको अमेरिका और कनाडा से लगभग 5.5 बिलियन लोन लेना पड़ा। इस लोन को चुकाने में उसको 60 साल लग गए। जंग में ब्रिटेन का इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह तबाह हो गया था। उसको वापस खड़ा करने में अमेरिका ने मदद
Speaker A
की। [संगीत] उसने मार्शल प्लान के तहत ब्रिटेन को तकरीबन 3 बिलियन दिए थे। इससे ब्रिटेन की निर्भरता अमेरिका पर बढ़ गई। फाइनेंशियल सुपर पावर वाली इमेज बहुत पीछे छूट चुकी। पॉइंट नंबर टू। सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान ब्रिटेन की कई कॉलोनीज पर
Speaker A
जापान ने कब्जा कर लिया था। इनमें सिंगापुर, हांगकांग और बर्मा जैसे इलाके आते थे। जापान के सरेंडर के बाद इसको कंट्रोल वापस मिल गया था। लेकिन इसने ब्रिटेन की एजे छवि को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। पॉइंट नंबर थ्री 1942 में
Speaker A
भारत में क्विट [संगीत] इंडिया मूवमेंट शुरू हो गया था। महात्मा गांधी ने करो या मरो का नारा दिया था। इसने आजादी के आंदोलन को नई रफ्तार दी। इससे ब्रिटेन की हालत और खराब हो गई। [संगीत] वो लोन लेकर
Speaker A
और अपनी संपत्तियां बेचकर जंग लड़ रहा था। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद हालात और [संगीत] बिगड़ चुके थे। इस आंदोलन को दबाना उसके लिए मुश्किल हो गया था और आखिरकार अगस्त [संगीत] 1947 में उसको भारत छोड़कर जाना पड़ा। उसी
Speaker A
बरस उसने फिलिस्तीन मैंडेट का डिसीजन यूनाइटेड नेशंस को सौंप दिया। फिर 1948 में श्रीलंका और म्यानमार आजाद हुए। 1950 और 60 के दशक में लहर अफ्रीका में चली और ब्रिटिश एंपायर ताश के पत्तों की तरह बहने लगा। 1997 में हांगकांग से निकलते ही उसके
Speaker A
साम्राज्य [संगीत] का सूर्य अस्त हो गया। एक तरफ ब्रिटेन की कॉलनीज़ एक-एक कर उसके हाथ से निकल रही थी और दूसरी तरफ वर्ल्ड ऑर्डर में उसकी पोजीशन लगातार नीचे खिसक रही थी। 1944 के ब्रिटेन व्स कॉन्फ्रेंस में यूएस डॉलर को ग्लोबल स्टैंडर्ड मान
Speaker A
लिया गया। इसी कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड और वर्ल्ड बैंक बनाने का प्लान बना। यह संस्थाएं वर्ल्ड इकॉनमी को कंट्रोल करने वाली थी और इन दोनों पर अमेरिका का कंट्रोल था। फिर अक्टूबर 1945 में यूनाइटेड नेशंस की स्थापना हुई। इसका
Speaker A
हेड क्वार्टर न्यूयॉर्क में बनाया गया। ब्रिटेन को यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में वीटो पावर जरूर मिला लेकिन वो अमेरिका की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता था। सेकंड वर्ल्ड वॉर में भी अमेरिका की फैक्ट्रियां सेफ [संगीत] थी। कोल हारबर को छोड़कर उसकी
Speaker A
जमीन पर कोई बड़ा हमला नहीं हुआ था। इसलिए वो सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल पावर बनकर सामने आया। फिर 1949 में नेटो की बारी आई। यह सोवियत संघ को चुनौती देने के मकसद से बना था। ब्रिटेन भी इसका मेंबर था। लेकिन
Speaker A
इसमें अमेरिका बिग ब्रदर की भूमिका में था। उसके बाद सबसे ताकतवर फौज थी और वही वेस्टर्न धड़े को लीड भी कर रहा था। इस तरह ब्रिटेन डिफेंस के लिए भी अमेरिका पर डिपेंड हो गया। देखा जाए तो फर्स्ट वर्ल्ड
Speaker A
वॉर ने ब्रिटेन की रफ्तार [संगीत] को धीमा किया लेकिन सेकंड वर्ल्ड वॉर ने उसको धक्का देकर बाहर निकाल दिया था। अब वो अमेरिका का पिछलू बनकर रह गया था। लेकिन अभी इस पतन पर मुर लगनी [संगीत] बाकी थी।
Speaker A
वो दिन तब आया जब इजिप्ट के राष्ट्रपति ने रेडियो पर कहा डिलिसेप्स उनके इतना कहते ही दुनिया भर में हलचल शुरू हो गई। वर्डिनेंट डीलसेप्स फ्रेंच डिप्लोमेट थे। उन्होंने इजिप्ट के राजा को स्वेस नहर बनाने की परमिशन देने के लिए मनाया था। इस
Speaker A
नहर के बनाने से जहाजों को अफ्रीका [संगीत] का चक्कर नहीं लगाना पड़ता। इससे यूरोप और एशिया की दूरी हजारों किलोमीटर तक घट जाती। इजिप्ट [संगीत] की मंजूरी के बाद 1858 में स्वेस कैनाल कंपनी बनाई गई। इसमें 52% हिस्सेदारी फ्रांस के
Speaker A
इन्वेस्टर्स [संगीत] ने खरीदी। 44% शेयर इजिप्ट के पास थे। ब्रिटेन ने इस प्रोजेक्ट में शामिल होने से इंकार कर दिया था। वो फ्रांस को दुश्मन मानता था। उसको [संगीत] प्रोजेक्ट की सफलता पर संदेह भी था। तमाम रुकावटों के बावजूद 1869 में
Speaker A
स्वेस नहर बनकर तैयार हो गई। लेकिन कुछ ही समय बाद इजिप्ट पर काफी कर्ज हो गया। फिर उसने स्वेस कैनाल कंपनी ने अपनी पूरी हिस्सेदारी ब्रिटेन को बेच दी। अब स्वेस नहर ब्रिटेन और फ्रांस के जॉइंट कंट्रोल में आ गई और यह सिलसिला 1956 तक चलता रहा।
Speaker A
इस बीच इजिप्ट पर ब्रिटेन का कब्जा हुआ। फिर उसको आजादी भी मिली। बीच में दो-दो वर्ल्ड वॉारर्स हुए और इजिप्ट में राजतंत्र का खात्मा भी हो गया। लेकिन नहर पर ब्रिटेन और फ्रांस का कंट्रोल बना रहा। फिर 1954 में गमाल अब्दुदेल नासे इजिप्ट
Speaker A
के राष्ट्रपति बन गए। वो नील नदी पर असान डैम बनाना चाहते थे। इससे लाखों लोगों को सिंचाई और पीने का पानी मिलने वाला था। अमेरिका और ब्रिटेन ने इसके लिए फंड देने का वादा किया और उसी दौर में नासेर की
Speaker A
नजदीकी सोवियत संघ से भी बढ़ रही थी। इसके चलते अमेरिका और ब्रिटेन ने एन मौके पर असान के लिए पैसा देने से मना कर दिया। नासेर इससे [संगीत] नाराज हो गए। उन्होंने स्वेस नहर को नेशनलाइज करने का फैसला
Speaker A
किया। उनका प्लान स्वेस से होने वाली कमाई से डैम बनाने का था। नासे ने 26 जुलाई 1956 के रोज स्वेस पर कब्जे का प्लान बनाया था। उस शाम उनको एक जगह भाषण देने जाना था। [संगीत] इस भाषण का रेडियो पर
Speaker A
लाइव ब्रॉडकास्ट हो रहा था। नासेन ने बता रखा था कि जैसे ही डीएससेस बोलूंगा वैसे ही कंपनी में घुस जाना और वैसा हुआ भी। नासेस ने अपने भाषण में 13 बार डलेसेस का नाम लिया। हिंट मिलते ही उनके सैनिक कैनाल
Speaker A
कंपनी के दफ्तर में घुस गए और नहर का कंट्रोल अपने हाथों में ले लिया। जैसे ही यह खबर ब्रिटेन पहुंची वहां तहलका मच गया। उसके इनकम का बड़ा सोर्स हाथ से निकल रहा था और दूसरी तरफ ऑयल सप्लाई और मिलिट्री
Speaker A
मूवमेंट भी [संगीत] खतरे में थे। तब उसने फ्रांस और इसराइल के साथ मिलकर अटैक का सीक्रेट प्लान बनाया। 29 अक्टूबर 1956 को इसराइल ने इजिप्ट पर हमला कर दिया। उसके बाद [संगीत] अल्टीमेटम देकर ब्रिटेन और फ्रांस ने सेना उतार दी। उन्होंने बड़ी
Speaker A
आसानी से नहर के मेन पॉइंट्स पर कब्जा कर लिया था। लेकिन इंटरनेशनल कम्युनिटी उनके खिलाफ हो गई। उन दिनों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच कोल्ड वॉर चल रहा था। लेकिन स्पेस के मसले पर वे दोनों [संगीत] साथ आ
Speaker A
गए। उनके दबाव में ब्रिटेन को सीस फायर करना पड़ा। वो चाहकर भी अमेरिका को नाराज नहीं कर सकता था। इस संकट में ब्रिटेन के हाथ से सिर्फ स्वेस का [संगीत] कंट्रोल नहीं गया था बल्कि उसकी बची खुची प्रतिष्ठा भी खत्म हो गई थी। फिर 1960 के
Speaker A
दशक में उसने परर्शियन गल्फ, साउथ यमन और सिंगापुर [संगीत] से अपने सैनिक बाहर निकाल लिए। मिलिट्री बेससेस का खर्च उस पर भारी पड़ रहा था। ब्रिटेन के पास ऐसा कुछ भी नहीं बचा था जिसे बचाने के लिए इन
Speaker A
[संगीत] बेससेस की जरूरत पड़ती। उसने मान लिया था कि उसकी मिलिट्री सुप्रेमसी का अंत हो चुका है। 1970 का दशक आते-आते ब्रिटिश एंपायर काफी हद तक सिमट गया था। उसके ऊपर अरबों डॉलर्स का कर्ज लगा था। बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर
Speaker A
पूरी तरह बर्बाद था। फैक्ट्रियां दोबारा से खड़ी की जा रही थी। सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा था। इस बार उसके सामने कुछ नई चुनौतियां थी। जो रॉ मटेरियल वो कॉलोनी से कौड़ी के भाव में लाता था, वह बंद हो चुका
Speaker A
था। दूसरी चीज समुद्री रास्तों में उसका एकाधिकार खत्म हो गया था। इसलिए ट्रांसपोर्ट का खर्च भी बढ़ने वाला था। तीसरी चीज यह हुई कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नए देशों ने एंट्री ले ली थी। इन देशों में मजदूरी सस्ती थी और [संगीत]
Speaker A
उनके यहां नियम कानून ज्यादा फ्लेक्सिबल थे। इसीलिए ब्रिटेन ने मैन्युफैक्चरिंग के [संगीत] बजाय सर्विज पर फोकस किया। लंदन को फिर से फाइनेंसियल सेंटर के तौर पर पेश किया गया। वहां बिजनेसेस को आसान बनाया [संगीत] गया। टैक्स से जुड़े नियमों में
Speaker A
ढील दी गई। इस तरह इन्वेस्टर्स और मल्टीनाशन में कंपनियों को लुभाया गया। ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से जुड़ने का भी फायदा मिला। वो 1973 में इसका मेंबर बना था। ईयू यूरोप के सबसे विकसित देशों का गुट है। इसके मेंबर्स को एक दूसरे के
Speaker A
मार्केट का फ्री एक्सेस मिलता है। उनके प्रोडक्ट्स पर ईयू के अंदर किसी तरह का टेरिफ ही नहीं लगता। यानी ब्रिटेन को एक बड़ा बाजार मिल गया था। फिर अमेरिका, जापान और यूरोप की कंपनियों ने ब्रिटेन में अपनी फैक्ट्रियां खोली। यह सबके लिए
Speaker A
विनविन सिचुएशन थी। ईयू को सस्ता सामान मिल रहा था। विदेशी कंपनियों को फ्री मार्केट का एक्सेस था और ब्रिटेन के लोगों को नौकरियां मिल रही थी। कुछ ही बरसों [संगीत] में ईयू ब्रिटेन का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बन गया। उसने ब्रिटेन की
Speaker A
इकॉनमी को पटरी पर लाने में मदद की। लेकिन इसी बीच ब्रिटेन के अंदर ईयू से नाराजगी [संगीत] भी पनप रही थी। कई लोगों का मानना था कि ब्रिटेन में ईयू का दखल बढ़ रहा है। लोग कह रहे थे ईयू हमारे रूल्स एंड रेगुलेशंस
Speaker A
को डिक्टेट करता है। हमारी संप्रभुता खतरे में है। ईयू के साथ रहने से हमारा घाटा हो रहा है और इसी आधार पर ईयू से अलग होने की मांग उठने लगी। सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी के अंदर भी दो धड़े बन गए थे। फिर
Speaker A
2016 में डेविड कैमरन की सरकार ने ब्रेग्जिट पर रेफरेंडम कराया। इसमें लगभग 52% वोटर्स ने अलग होना [संगीत] चुना। ब्रेगिट के वक्त कैमरन प्रधानमंत्री थे। वो ईयू के साथ बने रहने के पक्ष में थे। उन्होंने कहा था कि ईयू से अलग होकर हमें
Speaker A
पछतावा होगा लेकिन [संगीत] उनकी अपील बेकार गई। इसलिए रेफरेंडम पास होते ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। तब से अब तक ब्रिटेन में सात प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं। कैमरन के बाद टेरेसा ने बोरिस जॉनसन, लेस ट्रस्ट, ऋषि सुनक और के
Speaker A
स्टारमर और एंडडी बर्नहम कुर्सी पर आए हैं। यह मौजूदा समय में ब्रिटेन के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है। इस क्राइसिस के पीछे ब्रेग्जिट का बड़ा हाथ है। इस बीच कोविड-19 [संगीत] रूस, यूक्रेन वॉर और ईरान वॉर जैसे मसले
Speaker A
भी आए लेकिन ब्रेक्सिट ने अभी तक पीछा नहीं छोड़ा है। ब्रेग्जिट के कारण ब्रिटेन ने ईयू के मार्केट का प्री एक्सेस खो दिया था। [संगीत] ट्रेडर्स के लिए ईयू में सामान बेचना या वहां से इंपोर्ट करना पेचीदा और खर्चीला हो गया। [संगीत] इसके
Speaker A
चलते ब्रिटेन की अनुमानत जीडीपी 6% तक घटी है। [संगीत] रोजगार में 3 से 4% की कमी आई है और विदेशी निवेश 12% तक कम हुआ है। ताजा सर्वे के मुताबिक ब्रिटेन [संगीत] में 64% लोग ब्रेग्जिट को बड़ी गलती मानते
Speaker A
हैं। जबकि 2016 में महज 32% लोग ब्रेक्सिट के खिलाफ थे। इससे आप ब्रेगिट से हुए नुकसान का अंदाजा लगा सकते हैं। ब्रिटेन आज भी दुनिया के सबसे विकसित देशों में एक है। जीडीपी में वह पांचवें नंबर पर आता है। पर कैपिटा इनकम $0000 से
Speaker A
ज्यादा है। ब्रिटेन के पास परमाणु हथियार हैं। वो नेटो और G7 जैसे ग्रुप्स का मेंबर [संगीत] है। उसको यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में वीटो पावर भी मिला हुआ है। इन सबके बावजूद ब्रिटेन की हैसियत एक जूनियर पार्टनर की रह गई है। अकेले दम पर वर्चस्व
Speaker A
बनाना [संगीत] उसके बस की बात नहीं रही। अमेरिका की छत्रछाया के बिना उसकी ताकत आधी रह जाती है। यह तो हुई वर्ल्ड ऑर्डर की बात लेकिन घर के अंदर भी ब्रिटेन मुश्किलों से घिरा है। ब्रिटेन का राजतंत्र अभी तक कायम है। आज [संगीत] भी
Speaker A
राजा ही हैड ऑफ द स्टेट हैं। लेकिन उनका सम्मान घट रहा है। राज परिवार के लोगों का नाम [संगीत] गंभीर स्कैंडल्स में आता रहता है। इसके चलते राजतंत्र खत्म करने की मांग बढ़ गई है। आज का ब्रिटेन या यूके चार
Speaker A
इलाकों से मिलकर बना है। [संगीत] इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आइलैंड। पावर का सेंट्रल इंग्लैंड में है। उसको छोड़कर बाकी तीन जगहों में आजादी की बात चल रही है। स्कॉटलैंड ने 2014 में रेफरेंडम भी कराया था। लेकिन तब यह फेल हो
Speaker A
गया था। अब वहां दूसरे रेफरेंडम की तैयारी चल [संगीत] रही है। वेस में भी ब्रिटेन से अलग होने की राजनीति जोर पकड़ रही है। नॉर्दन आयरलैंड में तो आजादी के लिए 30 बरस लंबा सिविल वॉर [संगीत] चला था। 1998
Speaker A
में समझौते के बाद यह सिविल वॉर रुक गया। लेकिन वहां कभी भी चिंगारी भड़क सकती है। फिर आती है पॉलिटिक्स। ब्रिटेन की पॉलिटिक्स इतनी पोलराइज हो चुकी [संगीत] है कि पार्टियों के अंदर कई धड़े बन गए हैं। ऊपर से आर्थिक संकट और स्कैंडल्स
Speaker A
इनकी वजह से कोई भी प्रधानमंत्री टिक कर काम नहीं कर पा रहा है। पिछले 10 वर्षों में कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। ऋषि सुनक ने जॉनसन का बचा टर्म पूरा किया था। लेकिन अगले
Speaker A
चुनाव में उनकी पार्टी ही सत्ता से बाहर हो गई। हालिया समय में ब्रिटेन में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी रिफॉर्म यूके का उभार हुआ है। रिफॉर्म यूके गो राडिकल है। उसने झूठ, डर और प्रोपगेंडा फैलाकर अपना बेस बनाया है। 2029 के चुनाव में सबसे बड़ी
Speaker A
[संगीत] पार्टी बन सकती है। इसको ब्रिटेन की शांति और स्थिरता के लिए खतरा माना जा रहा है। लेकिन लोग पुरानी पार्टियों से इतने परेशान हैं कि पेसी में विकल्प देखने लगे हैं। सर्वशक्तिमान [संगीत] ब्रिटिश साम्राज्य का ऐसा हाल किसी ने शायद ही
Speaker A
सोचा होगा। जैसे ब्रिटिश साम्राज्य का उतार-चढ़ाव हमें [संगीत] सिखाता है कि वक्त कभी भी बदल सकता है। वैसे अपनी और अपनों की सेहत को लेकर तैयार रहना जरूरी है। इसलिए डिट्टो से फ्री कॉल बुक करिए और सही इंश्योरेंस [संगीत] चुनिए। लिंक
Speaker A
डिस्क्रिप्शन में है। अगर आपका एक्सपीरियंस अच्छा रहे तो कमेंट में जरूर बताइएगा ताकि बाकी लोग भी इसका फायदा उठा सकें। आपको यह वीडियो कैसा लगा? आप और किन सब्जेक्ट्स पर वीडियो देखना चाहेंगे वह भी जरूर बताइए। अगर वीडियो पसंद आया तो इसको
Speaker A
लाइक और शेयर करते रहिए। हमारे चैनल क्यूरिस्तान को सब्सक्राइब भी कर लीजिए। यह तमाम जानकारी आपके लिए लेकर आए थे अभिषेक कुमार। नए वीडियो में नई कहानी के साथ फिर मिलूंगी। तब तक के लिए मुझे विदा दीजिए। बहुत-बहुत शुक्रिया।
Topics:ब्रिटेन पतनस्वेस नहर संकटब्रिटिश साम्राज्य1956 की घटनाइजिप्ट नेशनलाइजेशनगमाल अब्दुल नासेनईस्ट इंडिया कंपनीब्रिटेन इतिहासवैश्विक शक्तिहेल्थ इंश्योरेंस











