ताइवान और चीन के बीच जियोपॉलिटिकल टकराव, इतिहास, आर्थिक महत्व और अमेरिका की भूमिका पर विस्तार से चर्चा।
Key Takeaways
- ताइवान का जियोपॉलिटिकल और आर्थिक महत्व वैश्विक स्तर पर बहुत बड़ा है।
- चीन का ताइवान पर कब्जा करना जटिल और जोखिम भरा है।
- अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक भूमिका ताइवान की सुरक्षा में निर्णायक है।
- संभावित संघर्ष से वैश्विक आर्थिक मंदी और युद्ध की आशंका है।
- भारत की वन चाइना पॉलिसी में बदलाव ताइवान मुद्दे में नई गतिशीलता ला रहा है।
What the video covers
- ताइवान चीन से 267 गुना छोटा है लेकिन उसकी जियोपॉलिटिकल अहमियत बहुत बड़ी है।
- ताइवान का इतिहास डच, स्पेन, जापान और चीन के शासन में रहा है, और 1949 में चीन के गृह युद्ध के बाद अलग स्थिति में आ गया।
- अमेरिका ने ताइवान को कोल्ड वॉर के दौरान सैन्य सहायता दी और म्यूचुअल डिफेंस ट्रीटी के तहत सुरक्षा का आश्वासन दिया।
- ताइवान स्ट्रेट चीन और ताइवान के बीच समुद्री मार्ग है जो वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।
- ताइवान से होकर दुनिया की सेमीकंडक्टर सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है, जो वैश्विक टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के लिए जरूरी है।
- चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और कब्जा करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन यह आसान नहीं है।
- संभावित युद्ध से वैश्विक आर्थिक नुकसान और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा है, जिसमें न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल का डर भी शामिल है।
- अमेरिका और चीन के बीच ताइवान को लेकर रणनीतिक अस्पष्टता है, जिससे स्थिति जटिल बनी हुई है।
- भारत ने वन चाइना पॉलिसी का समर्थन कम किया है और ताइवान के मुद्दे पर अपनी स्थिति बदल रही है।
- ताइवान अपनी सुरक्षा बढ़ा रहा है और अमेरिका की मदद पर निर्भर है, लेकिन अमेरिका की भूमिका निश्चित नहीं है।
Chapters
- 00:00ताइवान का परिचय और भूगोल
- 01:32ताइवान का इतिहास और चीन के साथ संबंध
- 03:04कोल्ड वॉर में ताइवान और अमेरिका की भूमिका
- 05:58ताइवान स्ट्रेट और सैन्य टकराव
- 07:18ताइवान संकट और अमेरिका-चीन तनाव
- 08:39अमेरिका-चीन संबंधों में बदलाव और ताइवान की स्थिति
- 09:59ताइवान की आर्थिक और तकनीकी महत्ता
- 12:00भारत की नीति और ताइवान का भविष्य
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Speaker A
चीन के साउथ ईस्टर्न बॉर्डर से लगभग 130 कि.मी. दूर एक आइलैंड है। साइज में वो चीन से 267 गुना छोटा है। दिलचस्प यह है कि उसके नाम में भी चाइना लगा है। लेकिन उसकी रियल आइडेंटिटी अभी तक साफ नहीं हुई है।
Speaker A
दुनिया के 12 [संगीत] देश उस आइलैंड को अलग राष्ट्र मानते हैं। मगर चीन उसको अपना हिस्सा कहता है। भारत, अमेरिका, [संगीत] रूस समेत 180 से ज्यादा देश चीन के इस दावे से सहमत हैं। इसके बावजूद चीन उस पर
Speaker A
कब्जा नहीं कर पा रहा है। लेकिन क्यों? इस सवाल में जियोपॉलिटिक्स की सबसे बड़ी आशंका छिपी है। अगर उस आइलैंड पर हमला हुआ तो तीसरा वर्ल्ड वॉर शुरू हो सकता है। इसमें न्यूक्लियर वेपंस इस्तेमाल होने का डर भी रहेगा। इसके अलावा एक साल के अंदर
Speaker A
दुनिया को 10.5 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। यह पैसा भारत की 2 साल की जीडीपी [संगीत] से भी ज्यादा है। इतना ही नहीं भारत की इकॉनमी हर साल 8% तक घट सकती है। जापान और साउथ कोरिया में तो आर्थिक
Speaker A
मंदी तक आ सकती है। इस आइलैंड का नाम है रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी ताइवान। लेकिन ताइवान इतना इंपॉर्टेंट है क्यों? एक छोटा सा आइलैंड अमेरिका और चीन की नाक का सवाल कैसे बन गया? चीन कब ताइवान पर कब्जा करने
Speaker A
वाला है? और क्या ताइवान शौक को दुनिया झेल पाएगी? तो चलिए शुरू करते हैं। यह ताइवान का नक्शा है। ताइवान 168 आइलैंड से मिलकर बना है। इनमें से दो आइलैंड चीन के ठीक पास में हैं। किनमिन और मातसू। ये
Speaker A
दोनों चीन के बॉर्डर से बम मुश्किल 20 कि.मी. की रेंज में हैं। यहां पर लगभग 1.5 लाख लोग रहते हैं। यह ताइवान की पॉपुलेशन का 01% भी नहीं है। 99% से ज्यादा आबादी सिर्फ एक आइलैंड पर रहती है। मेन आइलैंड
Speaker A
लंबाई में तकरीबन 400 कि.मी. है और चौड़ाई औसत 100 कि.मी. है। एरिया में केरल से भी छोटा है। इतनी सी जगह में लगभग 2 करोड़ 30 लाख लोग रहते हैं। लेकिन 4-500 बरस पहले तक यह आइलैंड काफी वीरान था। वहां पर मूल
Speaker A
निवासियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। फिर 17वीं सदी में डच और स्पेन ने इसके किनारे पर छोटी-छोटी कॉलोनीज़ बसाई। डच ज्यादा मजबूत थे। उन्होंने स्पेन से ज्यादा समय तक शासन चलाया। फिर 1662 में चीनी सेना ने डचों को भगा दिया। 1683 में ताइवान चाइना
Speaker A
के फुल कंट्रोल में आ गया। उन दिनों चाइना पर चंग वंश का राज था। उन्होंने ताइवान को जीत तो लिया लेकिन ऐसे ही छोड़ दिया। करीब 300 वर्षों तक ताइवान मॉडर्न इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी से दूर रहा। फिर 1895 की जंग में जापान ने चीन को
Speaker A
हरा दिया। बदले में चीन को अपने कई इलाके जापान के हवाले करने पड़े। इनमें ताइवान भी था। जापान क्रूरता के लिए कुख्यात था। उसने स्थानीय लोगों का भयंकर शोषण किया। लेकिन उसी ने ताइवान में स्कूल, अस्पताल, सड़कें और दूसरे बेस इंफ्रास्ट्रक्चर
Speaker A
बनाए। इंडस्ट्रीज और गवर्नमेंट सिस्टम्स भी जापान ने ही इस्टैब्लिश किए थे। फिर 1945 का साल आया और जापान ने सेकंड वर्ल्ड वॉर में सरेंडर कर दिया। इसके बाद ताइवान चीन को वापस मिल गया। उन दिनों चीन में चियांगका शेख की होमिन पार्टी की सरकार
Speaker A
थी। वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना सीसीपी के खिलाफ सिविल वॉर लड़ रहे थे। फिर अक्टूबर 1949 में सीसीपी ने नेशनल आर्मी को हरा दिया। चियांग आइशेख को हार का अंदाजा हो चुका था इसलिए वो सरकारी खजाना लेकर ताइवान भाग गए। उनके साथ लगभग 20 लाख
Speaker A
लोग भी गए थे। इनमें सरकारी अधिकारी, कुमिनतांग पार्टी के नेता, सैनिक, जिम्मेदार, प्रोफेसर, आर्टिस्ट आदि थे। जिनको कम्युनिस्ट पार्टी से डर था। उन्होंने भी चीन छोड़ दिया। इन लोगों ने ताइवान में अपना बेस बनाया। इसको रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी कि आरओसी कहा गया। चंग का
Speaker A
शेख इसके लीडर थे। वो खुद को पूरे चीन की सरकार कहते थे। उधर चीन में माओ जिदोंग ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी कि पीआरसी बनाई। वो भी चीन के सभी इलाकों पर दावा करते थे। उनके दावे में ताइवान भी शामिल
Speaker A
था। ऐसे में दुनिया के सामने दुविधा हुई कि किसको असली हकदार माना जाए। इस समय तक कोल वॉर तेज हो चुका था। अमेरिका ने कम्युनिस्ट देशों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। उसने चियांग आईशेक के ताइवान को सपोर्ट किया। यूनाइटेड नेशंस में उसकी जगह
Speaker A
कायम रही। अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों ने उसी के साथ डिप्लोमेटिक रिलेशंस भी स्थापित किए। माओ के चीन को सोवियत ब्लॉक के देशों का सपोर्ट मिला। भारत ने पहले ताइवान को मान्यता दी थी लेकिन 1950 आते-आते वो चीन के साथ चला गया। भले ही
Speaker A
अमेरिका ने ताइवान के साथ रिश्ता रखा था, लेकिन वह उसके डिफेंस प्लान का हिस्सा नहीं था। अमेरिका उसके इंटरनल मैटर से दूर रहना चाहता था। कोल वॉर के शुरुआती दौर में अमेरिका ने फर्स्ट आइलैंड चीन बनाया था। इसमें जापान और फिलीपींस को रखा गया
Speaker A
था। इन देशों में अमेरिका की सैनिक तैनात थे। उनका मकसद चीन और सोवियत संघ की फौज को अमेरिका की तरफ बढ़ने से रोकना था। ताइवान और साउथ कोरिया की लोकेशन इस चेन के पास से गुजरती थी, लेकिन उनको इसमें
Speaker A
शामिल नहीं किया गया था। हालांकि कुछ महीने बाद ही सिचुएशन बदल गई। 25 जुलाई 1950 को नॉर्थ कोरिया ने साउथ कोरिया पर हमला कर दिया। नॉर्थ कोरिया एक कम्युनिस्ट देश था। उसको सोवियत संघ और चीन से बैकअप मिल रहा था। अमेरिका ने उनको रोकने के लिए
Speaker A
सेना भेजने का फैसला किया। अमेरिका को यह भी लगा कि ताइवान चीन का आसान शिकार बन सकता है। अगर ताइवान हाथ से जाता तो फर्स्ट आइलैंड चीन खतरे में आ सकती थी। इसीलिए अमेरिका ने अपनी सेवंथ प्लीट ताइवान स्टेट में तैनात कर दी। ताइवान
Speaker A
स्ट्रेट चीन और ताइवान के बीच से गुजरने वाला समुद्री रास्ता है। कोरिया वॉर ने रातोंरात ताइवान की पोजीशन बदल दी थी। उसका इंटरनल मैटर कोल्ड वॉर के साथ नत्थी हो गया था। ताइवान की हार अमेरिका की भी हार थी। इसीलिए अमेरिका ने उसको सैन्य मदद
Speaker A
देनी शुरू कर दी। 1950 से 1954 के बीच उसने ताइवान को 942 मिलियन के हथियार भेजे थे। इसकी बदौलत ताइवान ने अपनी फौज मजबूत कर ली। यह चीनी हमले से निपटने के लिए जरूरी था। इसको आजमाने का मौका कोरिया वॉर
Speaker A
के तुरंत बाद मिल गया। सितंबर 1954 में ताइवान और चीन के बीच झड़प शुरू हो गई। ताइवान दा चीन, किनमेन और मासू आइलैंड से चीन पर बमबारी करता था। जवाबी हमले में चीन इन्हीं आइलैंड्स को टारगेट करता था।
Speaker A
इसी बीच ताइवान ने अमेरिका के साथ म्यूचुअल डिफेंस ट्रीटी कर ली। इसमें तय हुआ कि ताइवान को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका हर रास्ता अपना सकता है। हालांकि दाचेन, किनमेन और मात्सू को इस ट्रीटी से अलग रखा गया था। इसीलिए अमेरिका झड़प में
Speaker A
शामिल होने के लिए बाध्य नहीं था। लेकिन वह इतनी आसानी से पल्ला भी नहीं झाड़ सकता था। फिर जनवरी 1955 में अमेरिका की संसद में फार्मूसा रेजोल्यूशन पास किया। इसने अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार दिया कि वह ताइवान को बचाने के लिए फुल मिलिट्री
Speaker A
फोर्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके बाद अमेरिका जंग में शामिल होने की तैयारी करने लगा। उसने बड़ी संख्या में सैनिक और हथियार भेजे। इससे डायरेक्ट वॉर का खतरा बढ़ रहा था। लेकिन अंत में दोनों पार्टियों ने पीछे हटने का फैसला किया।
Speaker A
हालांकि दाचीन में चीन भारी पड़ गया था। फिर ताइवान ने अमेरिका की निगरानी में दाचीन आइलैंड खाली कर दिया। इसके बाद चीन ने भी हमला रोक दिया। लेकिन जंग के बादल अभी पूरी तरह छटे नहीं थे। 1958 में चीन
Speaker A
ने ताइवान पर फिर से गोलाबारी शुरू कर दी। इस बार अमेरिका आर-पार के मूड में आ गया। उसने ताइवान की सुरक्षा के लिए एयरक्राफ्ट कैरियर्स, फाइटर जेट्स, न्यूक्लियर मिसाइलें रवाना कर दी। अमेरिका चीन पर न्यूक्लियर बम गिराने का प्लान भी
Speaker A
बना रहा था। इतने में सोवियत संघ की एंट्री हुई। सोवियत लीडर निकिता क्रशेव ने अमेरिका को एक धमकी वाली चिट्ठी भेजी। उन्होंने लिखा कि चीन अकेला नहीं है। अगर उस पर हमला हुआ तो इसे हमारे खिलाफ हमला माना जाएगा। उस सिचुएशन में हमें जवाब
Speaker A
देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। अमेरिका ने पब्लिकली तो इस धमकी को नकार दिया लेकिन उसको भी वर्ल्ड वॉर का डर सता रहा था। कुछ समय बाद उसने अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स से न्यूक्लियर मिसाइलें हटा लीं। इस तरह सेकंड ताइवान क्राइसिस भी [संगीत]
Speaker A
टल गई थी। लेकिन चीन और ताइवान की आपसी रंजिश बाकी थी। वे हर रोज एक दूसरे पर गोलाबारी करते थे। इनका कोई तय मकसद नहीं होता था। लेकिन कोई भी चुप बैठकर हार मानने वाला नहीं था। यह सिलसिला 1970 के
Speaker A
दशक तक चलता रहा। फिर एक रोज अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर हेनरी किसिंजर की तबीयत अचानक खराब हो गई। इसके बाद ताइवान की हैसियत तेजी से बदलने लगी। जुलाई 1971 में हेनरी किसिंजर पाकिस्तान गए। वहां पहुंचते ही उनके पेट में दर्द
Speaker A
शुरू हो गया। फिर प्रेस को कहा गया कि किसिंजर कुछ दिन आराम करेंगे लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहा था। किसिंजर आराम करने के बजाय सीक्रेटली बीजिंग चले गए। उस समय तक अमेरिका ने चीन को मान्यता नहीं दी
Speaker A
थी। दरअसल तब तक चीन और सोवियत संघ के रिश्तों में दरार आ चुकी थी। 1969 में उनके बीच एक बड़ी झड़प भी हुई थी। इसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। अमेरिका इस दरार का फायदा उठाना चाहता था। उसने सोचा
Speaker A
कि चीन से हाथ मिलाकर सोवियत संघ को अलग-थलग किया जा सकता है। इसी मकसद से किसिंजर बीजिंग के दौरे पर गए थे। उसी दौर में चीन को भी नए पार्टनर की जरूरत थी। यानी इस पहल से दोनों के हित सध रहे थे।
Speaker A
लेकिन ताइवान के मसले पर बातचीत अटक जा रही थी। अमेरिका का इरादा था कि चीन और ताइवान दोनों के साथ रिश्ता चले। लेकिन चीन ने कहा कि ताइवान पर कोई समझौता नहीं होगा। अगर हमसे पार्टनरशिप करनी है तो
Speaker A
ताइवान को हमारा हिस्सा मानना होगा। आखि
Speaker A
बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद ज्यादातर देशों ने ताइवान को छोड़कर चीन के साथ डिप्लोमेटिक रिलेशंस शुरू किए। 1 जनवरी 1979 को अमेरिका ने भी चीन को मान्यता दे दी। चीन को मान्यता देने का मतलब था वन चाइना पॉलिसी से सहमत होना। यानी ताइवान
Speaker A
को चीन का हिस्सा मानना। इसलिए उसको ताइवान से अपना दूतावास हटाकर बीजिंग ले जाना पड़ा। इसके साथ 1954 की म्यूचुअल डिफेंस ट्रीटी भी खत्म करनी पड़ी। अमेरिका को ताइवान में अपने मिलिट्री बेसिस हटाने पड़े और सैनिकों को भी बाहर निकालना पड़ा।
Speaker A
अब ताइवान अपनी किस्मत के भरोसे था। लेकिन अमेरिका इतनी इंपॉर्टेंट लोकेशन को आसानी से नहीं छोड़ सकता था। इसके चलते दूसरा रास्ता निकाला गया। अप्रैल 1979 में अमेरिका ने ताइवान रिलेशंस एक्ट बनाया। इसके तहत ताइवान के साथ कमर्शियल, कल्चरल
Speaker A
और दूसरे तरह के संबंध जारी रखने की इजाजत दी गई। अमेरिका उसको हथियार भी बेच सकता था और वो ताइवान पर हमले की स्थिति में जवाब देने की तैयारी भी रख सकता था। इस एक्ट में यह नहीं कहा गया कि अमेरिका
Speaker A
ताइवान को बचाने आएगा ही। लेकिन यह भी नहीं था कि नहीं आएगा। इसको स्ट्रेटेजिक एंबिगिटी यानी रणनीतिक अस्पष्टता कहते हैं। जब आप किसी चीज को लेकर श्योर हो तो उसके हिसाब से प्लानिंग कर सकते हैं। [संगीत] लेकिन जब असमंजस वाली स्थिति हो तो सारी
Speaker A
प्लानिंग धरी की धरी रह जाती है। ताइवान को लेकर अमेरिका की यही स्ट्रेटजी [संगीत] है। उसने चीन को दुविधा में रखा है। अगर ताइवान पर अभी तक कोई बड़ा हमला नहीं हुआ है तो इसकी एक वजह यह [संगीत] अस्पष्टता
Speaker A
भी है। बहरहाल एक तरफ जिओपॉलिटिक्स में उथलपुथल मची हुई थी। दूसरी तरफ ताइवान [संगीत] के अंदर भी हालात ठीक नहीं थे। 1949 से 1987 तक ताइवान में सिर्फ कुमतांग पार्टी ने शासन चलाया। 1975 तक चंगकाई शेख ने रूल किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके
Speaker A
बेटे चियांग चकओ को कुर्सी मिल गई। इस दरमियान पूरे टाइम मार्शल लॉ लागू रहा। पॉलिटिकल पार्टियों पर बैन लगा था। पत्रकारों और एक्टिविस्ट्स को अक्सर जेल और टॉर्चर का सामना करना पड़ता था। ताइवान में आने या ताइवान से बाहर जाने पर कई तरह
Speaker A
की पाबंदियां थी। हालांकि इन सबके बीच ताइवान के आर्थिक तरक्की भी हो रही थी। 1980 के दशक तक इकॉनमी एग्रीकल्चर से मैन्युफैक्चरिंग [संगीत] और सर्विज पर शिफ्ट हो चुकी थी। 1987 में ताइवान की जीडीपी 105 बिलियन डॉलर पहुंच गई थी। उसकी
Speaker A
जीडीपी हर साल करीब 13% [संगीत] की दर से बढ़ रही थी। उसके यहां प्रति व्यक्ति आय $5000 से भी ज्यादा थी। यह उस वक्त चीन से 20 गुना ज्यादा था। ताइवान के अधिकांश आबादी शहरों में रहने लगी थी। यह लोग अपने
Speaker A
अधिकारों को लेकर सजग थे। सिविल वॉर देखने वाली एक पीढ़ी गुजर चुकी थी। नई पीढ़ी को चीन से ज्यादा लगाव नहीं रह गया था। इसके अलावा ताइवान इंटरनेशनल कम्युनिटी में अलग-थलग पड़ा था। गिनती के कुछ देशों ने उसके साथ डिप्लोमेटिक रिलेशंस रखे थे।
Speaker A
सरकार को लगा कि अगर तानाशाही चलती रही तो बचे कुचे देश भी उससे रिश्ता [संगीत] नहीं रखेंगे। इसलिए 1985 के बाद लोगों को फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का अधिकार मिलने लगा। जब 1986 में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी डीपीपी का गठन हुआ। सरकार ने उस पर
Speaker A
रोक नहीं लगाई। डीपीपी ताइवान की पहली अपोजिशन पार्टी थी। फिर जुलाई 1987 में चियांग [संगीत] चिंगू ने मार्शल लॉ हटा दिया। चियांग ने एक और चीज की थी। उन्होंने ताइवान में पैदा हुए एक ली तगुई [संगीत] को उपराष्ट्रपति बनाया था। इससे
Speaker A
यह मैसेज गया कि स्थानीय लोगों को भी शासन में अधिकार मिल रहा है। 1988 में चियांग की मृत्यु के बाद ली राष्ट्रपति बन गए। उन्होंने अगले 12 वर्षों तक राज किया। उनको मॉडर्न ताइवान का सबसे निर्णायक [संगीत] नेता माना जाता है। ली ने संविधान
Speaker A
में कई संशोधन किए। उन्होंने डायरेक्ट प्रेसिडेंशियल इलेक्शन का सिस्टम बनाया। फिर बुजुर्ग हो चुके नेताओं को जब रबर रिटायर किया। के नेता 1940 के दशक से संसद में जमे हुए थे। उन्हें कभी चुनाव का सामना नहीं करना पड़ा था। ली ने उनको
Speaker A
हटाकर नौजवानों के लिए जगह बनाई। उन्होंने चीन के साथ कम्युनिकेशन चैनल भी खोला लेकिन बात नहीं बनी। 1995 आते-आते ताइवान में डेमोक्रेसी परवान चढ़ने लगी थी। वहां अगले साल प्रेसिडेंशियल इलेक्शन होने वाला था कि डेमोक्रेसी की पहली परीक्षा थी।
Speaker A
इससे चीन असहज था। चुनाव होने के बाद ताइवान को अपने में मिलाना मुश्किल हो जाता। वो इसे किसी भी तरह रोकना चाहता था। तभी एक चिट्ठी आई और उसको यह मौका मिल गया। 1995 में अमेरिका की कॉर्नल यूनिवर्सिटी ने ली तेंगुई को बुलावा भेजा।
Speaker A
ली ने कॉर्नल से पीएचडी की थी। उन्हें एलुमिनाई के तौर पर बुलाया गया था। लेकिन वो ताइवान के राष्ट्रपति भी थे। क्योंकि अमेरिका वन चाइना पॉलिसी को मानता था इसलिए मोन को वीजा देकर चीन को नाराज नहीं करना चाहता था। लेकिन उसने कुछ समय तक
Speaker A
टालने के बाद ली को वीजा दे दिया। इससे चीन भड़क गया। उसने अपना राजदूत अमेरिका से वापस बुला लिया। ताइवान के साथ बातचीत बंद कर दी और चीनी सेना ताइवान को घेर कर ड्रिल करने लगी। कुछ समय बाद वह ताइवान
Speaker A
स्ट्रेट मिसाइलें भी टेस्ट करने लगा। हर बीतते दिन के साथ जंग की आशंका बढ़ती जा रही थी। फिर अमेरिका ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर्स ताइवान की तरफ भेजे। वे डिफेंसिव पोजीशन में थे। लेकिन उनका मैसेज क्लियर था कि ताइवान पर हमला खाली नहीं जाएगा।
Speaker A
अंत में चीन ने मिलिट्री ड्रिल रोक दी। इसके बाद अमेरिका भी पीछे हट गया। [संगीत] इसी बीच ताइवान ने पहला डायरेक्ट प्रेसिडेंशियल इलेक्शन करवा दिया था। इस चुनाव में लीडेंग हुई 54% वोटों के साथ जीत गए। [संगीत] वे चीन के निशाने पर थे।
Speaker A
फिर भी जनता ने उनको हाथों हाथ लिया था। चीन की दादागिरी ने ताइवान के आम लोगों को उससे दूर कर दिया था। बाद के बरसों में अलगावा और बढ़ा। मौजूदा समय में 8% से भी कम लोग रीयनिफिकेशन का समर्थन करते हैं।
Speaker A
जबकि पुल इंडिपेंडेंस के समर्थकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दरअसल ताइवान चीन से अलग जरूर है मगर उसने कभी फॉर्मली आजादी की घोषणा नहीं की। ताइवान में ज्यादातर लोग स्टेटस को बनाए रखना चाहते हैं। चीन इसको रेड लाइन मानता है। अगर
Speaker A
स्टेटस को टूटा तो ऑल आउट वॉर शुरू हो सकता है। खैर 1996 की घटना के बाद चीन की चुनौतियां और बढ़ गई जिनको वो कंट्रोल करना चाहता था। था उसके साथ रहना पसंद नहीं करते थे। इसने चीन को सोचने पर मजबूर
Speaker A
कर दिया। लेकिन वह इस असंतोष की वजह से नहीं रुका है। जब यह शासन करना उसकी पुरानी आदत रही है। इसे आप [संगीत] तिब्बत से लेकर हांगकांग तक देख सकते हैं। ताइवान भी इस पैटर्न का उदाहरण बन सकता था। लेकिन
Speaker A
उसने समय रहते खुद को इतना जरूरी बना लिया कि इसको छूना मुश्किल होता गया। इस अचंभे की कड़ी हमारे आपके फोंस, लैपटॉप्स, टीवी से जुड़ती है। आज का दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का है। यह हर एक सेक्टर में पहुंच रहा
Speaker A
है। इसकी काबिलियत हर रोज इंसानों को आश्चर्य में डाल रही है। लेकिन एi अपने आप ताकतवर नहीं बन रहा है। उसको ताकत मिलती है सेमीकंडक्टर चिप्स से। जितनी पावरफुल चिप्स होंगी, एi उतना ज्यादा एडवांस्ड होगा। लेकिन चिप्स का इस्तेमाल सिर्फ एi
Speaker A
तक सीमित नहीं है बल्कि स्मार्टफोनस, कंप्यूटरटर्स कार एयरक्राफ्ट सेटेलाइट्स, रडार मिसाइल आदि के लिए भी जरूरी हैं। मॉडर्न दुनिया का शायद ही कोई ऐसा एरिया होगा जहां इन चिप्स की जरूरत ना पड़ती हो। इसीलिए सेमीकंडक्टर चिप्स को मौजूदा समय का तेल भी कहते हैं। अब समझते
Speaker A
हैं इन चिप्स को बनाता कौन है। 1950 और 60 के दशक में इस सेक्टर में अमेरिकी कंपनियों का दबदबा था। ये चिप डिजाइन करते थे, खुद बनाते भी थे और अपने से असेंबल भी करते [संगीत] थे। जैसे-जैसे विज्ञान ने
Speaker A
तरक्की की, चिप्स की डिमांड और बढ़ती गई, उसी रेश्यो में चिप्स की कंप्यूटिंग पावर भी बढ़ रही थी। तब अमेरिकी कंपनियों ने एक रास्ता निकाला। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग लाइन को बाहर शिफ्ट कर दिया। इन्हें जापान, साउथ कोरिया, हांगकांग या ताइवान
Speaker A
में बनाया जाने लगा। इन देशों के पास सस्ते रिसोर्सेज थे। इससे मास लेवल पर चिप्स का प्रोडक्शन होने लगा। धीरे-धीरे इन देशों ने अपनी कंपनियां बना ली। जापान और साउथ कोरिया ने पूरी सप्लाई चेन में इन्वेस्ट किया। लेकिन ताइवान ने सिर्फ
Speaker A
मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस किया। उसने 1980 में यूनाइटेड माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन यूएसी बनाया। फिर 1987 में ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड टीएसएमसी की स्थापना की। यह कंपनियां आगे चलकर ताइवान की सुरक्षा कवच बनने वाली थी। अभी का हाल ऐसा है कि
Speaker A
एडवांस चिप्स डिजाइन करने में अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है। फिर नीदोलेंस की कंपनी एएसएमएल की जरूरत पड़ती है। एएसएमएल इकलौती ऐसी कंपनी है जो एडवांस चिप्स बनाने वाली मशीनें बनाती है। इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग का रोल आता है। इसमें
Speaker A
ताइवान को महारत हासिल है। ताइवान में दुनिया की 60% सेमीकंडक्टर [संगीत] चिप्स बनते हैं। लेकिन सबसे एडवांस चिप्स में उसकी हिस्सेदारी लगभग 90% है। इन्हें बनाने में जिस तरह की स्किल्स और जिस तरह की सटीकता चाहिए वो फिलहाल किसी और के पास
Speaker A
नहीं [संगीत] है। इन्वीडिया, Apple, Google से लेकर Amazon तक के एडवांस चिप्स ताइवान में ही बन रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं ताइवान चाइनीस कंपनियों के लिए भी चिप्स बनाता है। इसमें अमेरिका ने कुछ शर्तें लगा रखी हैं। लेकिन चीन काफी हद तक
Speaker A
ताइवान की कंपनियों पर डिपेंडेंट है। मतलब यह कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की बदौलत ताइवान पूरी दुनिया के लिए जरूरी बन गया। उसको एक झटके में दरकिनार करना किसी के बस की बात नहीं है। लेकिन चिप्स के खेल में सब अच्छा अच्छा नहीं है। यही सिलिकॉन
Speaker A
शील्ड उसके लिए चुनौतियां भी लेकर आया है। चीन, जापान और साउथ कोरिया जैसे देश चिप्स इंडस्ट्री में खूब निवेश कर रहे हैं। चीन तो इसको जंग की तरह देख रहा है। उसने पिछले कुछ समय में अपनी कैपेसिटी तेजी से
Speaker A
बढ़ाई है। इस बीच एक और चीज बदली है। अमेरिका ने ताइवान को अपने यहां फैक्ट्रियां लगाने के लिए मजबूर किया है। अमेरिका में चिप बनाना ताइवान से पांच गुना महंगा पड़ता है। फिर भी उसको अमेरिका में इन्वेस्ट करना पड़ रहा है। ताइवान
Speaker A
जर्मनी और जापान में भी फैक्ट्री लगा रहा है। कई एक्सपर्ट्स ये मानते हैं इससे ताइवान का सिलिकॉन शील्ड कमजोर पड़ सकता है। जिस चीज की वजह से वो दुनिया के लिए वैल्यूुएबल है अगर वही छीन गया तो उसके
Speaker A
पास क्या बचेगा? हालांकि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री से इधर भी ताइवानों की जरूरत है। वह सबसे अहम ट्रेड रूट के सेंटर में बसा है। दुनिया के टोटल समुद्री व्यापार का 20% हिस्सा ताइवान स्टेट से होकर जाता है। साउथ कोरिया और जापान के ट्रेड का एक
Speaker A
बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। चीन का ज्यादातर सी ट्रेड भी ताइवान के पास से निकलता है। जंग की स्थिति में यह रूट पूरी तरह ठप पड़ सकता है। सेमीकंडक्टर इंडस्ट्रियल और ट्रेड रूट का एक साथ बंद
Speaker A
होना डेडली कॉम्बिनेशन साबित होगा। फरवरी 2026 में ब्लूमबर्ग ने ताइवान वॉर से होने वाले नुकसान का आकलन किया था। इसके मुताबिक अगर ताइवान में जंग हुई तो ग्लोबल जीडीपी को 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। यह 2008 की आर्थिक
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मंदी और कोरोना महामारी में हुए नुकसान से भी ज्यादा है। जंग की सिचुएशन में ताइवान की इकॉनमी पूरी तरह चौपट हो जाएगी। इससे चीन को भी कम नुकसान नहीं होगा। उसकी जीडीपी 11% तक घट सकती है। इसके अलावा
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अमेरिका को 6.6%, यूरोपियन यूनियन को 10.9%, ब्रिटेन को 6.1%, साउथ कोरिया को 23% और जापान को 14.7% का झटका लग सकता है। ताइवान पर हमला भारत के लिए भी खतरे का सौदा होगा। भारत का लगभग 15% ग्लोबल ट्रेड ताइवान स्टेट के
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जरिए होता है। वो पूरी तरह रुक सकता है। भारत और ताइवान ने ट्रेड रिलेशंस भी बनाए हुए हैं। 2025 में दोनों के बीच 12.5 बिलियन का कारोबार हुआ था। इसके अलावा ताइवानी कंपनियां भारत के साथ सेमीकंडक्टर चिप्स एंड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम
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कर रही हैं। ताइवान के साथ भारत का एक जिओपॉलिटिकल इंटरेस्ट भी जुड़ा है। चीन हमेशा दूसरों से उम्मीद रखता है। वे वन चाइना पॉलिसी का समर्थन करें। लेकिन जब भारत के इंटरनल मैटर की बात आती है अपना स्टैंड बदल लेता है। जम्मू कश्मीर हो, ले
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लद्दाख हो या अरुणाचल प्रदेश हो चीन ने भारत के हितों का ध्यान नहीं रखा है। इसीलिए 2010 के बाद से भारत ने वन चाइना पॉलिसी का खुला समर्थन करना बंद कर दिया है। अगर ताइवान पर हमला हुआ तो यह दूसरे
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देश की वन चाइना पॉलिसी से पीछे हट सकते हैं। यह चीन की ग्लोबल पॉलिसी के लिए खतरनाक होगा। तो क्या चीन इस डर से रुक जाएगा? इसका जवाब है नहीं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताइवान को सिविलाइजेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा कहते
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हैं। उनका मकसद 2049 तक चीन को ग्लोबल सुपर पावर बनाने का है। वो सेंचुरी ऑफ ह्यूमिलिएशन की तस्वीर बदलना चाहते हैं। 19वीं और 20वीं सदी के दौरान ब्रिटेन, पुर्तगाल और जापान में उसके कई इलाकों पर कब्जा कर लिया था। चीन उन इलाकों को वापस
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लाना चाहता है। ताइवान इस प्रोजेक्ट का आखिरी और सबसे जरूरी हिस्सा है। चीन ने अक्सर पीसफुल रीयनिफिकेशन की बात की है। वह ताइवान के लोगों का दिल जीतने का दावा करता है। यानी ऐसी सिचुएशन बने कि ताइवान के लोग खुद यूनिफिकेशन के लिए तैयार हो
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जाए। लेकिन जैसे उनके चाल चलन है इसकी संभावना कम ही नजर आती है। ऐसे में मिलिट्री अटैक का विकल्प बचता है। चीन लंबे समय से इसकी तैयारी भी कर रहा है। जब कभी टेंशंस बढ़ती हैं वो ताइवान स्ट्रेट
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में मिलिट्री ड्रिल करने लगता है। उसके फाइटर जेट्स अक्सर ताइवान की हवाई सीमा में मंडराते हैं। इसके अलावा चीन सरकार समय-समय पर हमले की धमकी भी देती रहती है। ताइवान को इसका अंदाजा है। उसको यह डर भी है कि मुसीबत में कोई इसकी मदद ना करें।
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इसीलिए वो अपने लोगों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रहा है। वो नए हथियार खरीद रहा है और लगातार डिफेंस बजट भी बढ़ा रहा है। 2027 में उसका डिफेंस बजट 31.4 बिलियन डॉलर तक जा सकता है। यह रकम उसकी जीडीपी
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के 3% से भी ज्यादा है। इतना पैसा नेटो के कई देश भी खर्च नहीं करते हैं। लेकिन क्या यह पैसा ताइवान को चीन से बचाने के लिए काफी है? शायद नहीं। चीन और ताइवान में जमीन आसमान का अंतर है।
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चीन एरिया में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है जबकि ताइवान 134वें नंबर पर आता है। चीन की पॉपुलेशन 140 करोड़ से ज्यादा है। ताइवान की आबादी महज 2 करोड़ 30 लाख है। चीन जीडीपी के मामले में दूसरे नंबर
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पर है। उसकी जीडीपी लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं ताइवान की जीडीपी 1 ट्रिलियन [संगीत] डॉलर से भी कम है। चीन के 180 से भी ज्यादा देशों के साथ डिप्लोमेटिक संबंध है। उसके पास यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में वीटो पावर है। की तुलना में ताइवान कहीं
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नहीं टिकता। वो यूएन का मेंबर तक नहीं है। अब मिलिट्री पावर की बात कर लेते हैं। चीन ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स में तीसरे नंबर पर है। जबकि ताइवान का नंबर 22वां है। चीन का सालाना डिफेंस बजट 300 बिलियन से
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ज्यादा है। वहीं ताइवान डिफेंस पर महज 31 बिलियन खर्च कर रहा है। आर्मी नेवी एयरफोर्स तीनों में चीन ताइवान से काफी आगे है। चीन के पास 600 से ज्यादा न्यूक्लियर वेपन्स हैं। लेकिन ताइवान के पास एक भी नहीं है। यानी आमने-सामने की
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लड़ाई में उसका बचना मुश्किल है। अगर अमेरिका से मदद नहीं मिली तो चीन उसको आसानी से हड़प सकता है। मगर अमेरिका आएगा या नहीं यह कतई तय नहीं है। जब तक रियल सिचुएशन नहीं बनती तब तक हर कोई अनुमान ही
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लगा सकता है। लेकिन पिछले कुछ समय में अमेरिका और ताइवान के रिश्तों में दरार आई है। डॉन्ड ट्रंप कह रहे हैं कि अपनी फैक्ट्रियां हमारे यहां लगाओ। उनकी सरकार ताइवान को हथियार बेचने में देरी करने लगी है। इसके अलावा ट्रंप ताइवान का डिफेंस
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बजट 10% तक बढ़ाने का दबाव भी बना रहे हैं। वरना अमेरिका सपोर्ट नहीं करेगा। अगर अमेरिका का यही रवैया जारी रहा तो ताइवान के लिए सस्टेन [संगीत] करना मुश्किल हो जाएगा। चीन को इसी का इंतजार है। तो यह थी
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ताइवान की कहानी। आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या चीन ताइवान पर कब्जा कर सकता है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। अगर वीडियो पसंद आया हो तो इसको लाइक और शेयर करते रहिए। हमारे चैनल
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की ओर स्थान को सब्सक्राइब भी कर लीजिए। यह तमाम जानकारी आपके लिए। लेकर आए थे मेरे साथी अभिषेक कुमार। नए वीडियो में नई कहानी के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए मुझे विदा [संगीत] कीजिए। बहुत-बहुत शुक्रिया।
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