आयतुल्लाह खामनाई की रणनीतियों और साहस की कहानी, जिन्होंने आधुनिक तकनीक को मात देकर ईरान को बचाया।
Key Takeaways
- आयतुल्लाह खामनाई ने आधुनिक तकनीक और सैन्य ताकतों के बावजूद अपनी सुरक्षा के लिए प्रभावी रणनीतियाँ अपनाईं।
- उनकी राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व क्षमता ने ईरान को कई संकटों से उबारने में मदद की।
- खामनाई की जिंदगी संघर्षों और बलिदानों से भरी हुई है, जिसने उन्हें ईरान का मजबूत नेतृत्वकर्ता बनाया।
- उनका मिशन और विचारधारा आज भी ईरान की नीतियों और सुरक्षा रणनीतियों का आधार हैं।
- इसराइल और अमेरिका जैसी शक्तियों के खिलाफ खामनाई की दृढ़ता ने उन्हें वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण नेता बना दिया है।
What the video covers
- ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनाई ने इसराइल के हमलों से खुद को बचाने के लिए गुप्त अंडरग्राउंड बंकर का इस्तेमाल किया।
- 12 जून 2025 को इसराइल ने ईरान पर हमला किया, लेकिन खामनाई को ढूंढना असंभव था, जिससे इसराइल को बड़ी शर्मिंदगी हुई।
- खामनाई की जान पर कई बार जानलेवा हमले हो चुके हैं, जिनमें 1981 का बम धमाका भी शामिल है जिसमें उनका दायां हाथ मफलूस हो गया।
- उनका जन्म 1939 में मशहद में हुआ था, जहां उन्होंने धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और शाह पहलवी के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
- खामनाई ने आयतुल्लाह खुमैनी के मिशन को आगे बढ़ाया और शाह की सरकार के खिलाफ खुफिया तरीके से काम किया।
- शाह की खुफिया पुलिस द्वारा कई बार गिरफ्तार और यातनाएं सहने के बाद भी उन्होंने अपने मिशन को जारी रखा।
- 1979 के ईरानी क्रांति के बाद खामनाई ने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और धार्मिक पद संभाले, जैसे इस्लामी काउंसिल के सदस्य और नायब वज़ीर दफा।
- 1981 में हुए बम धमाके के बाद भी वे मजबूत बने रहे और बाद में ईरान के राष्ट्रपति चुने गए।
- इराक के खिलाफ युद्ध के दौरान उन्होंने फौजियों का हौसला बढ़ाया और ईरानी पासदराने इंकलाब के साथ करीबी संबंध बनाए।
- आज खामनाई ईरान के सुप्रीम लीडर हैं, जिनके पास व्यापक राजनीतिक और सैन्य अधिकार हैं।
Chapters
- 00:00यरूशलम में इसराइल की खुफिया मीटिंग और ईरान पर हमला
- 01:10आयतुल्लाह खामनाई की सुरक्षा और अंडरग्राउंड बंकर
- 02:011981 का बम हमला और खामनाई की जिंदादिली
- 03:07खामनाई का बचपन और धार्मिक शिक्षा
- 04:10शाह पहलवी के खिलाफ खामनाई की तहरीक और खुफिया काम
- 05:00गिरफ्तारी, जेल और शाह के खिलाफ संघर्ष
- 05:561979 की क्रांति और खामनाई का राजनीतिक उदय
- 07:18इराक युद्ध और ईरान में खामनाई का नेतृत्व
- 09:52खामनाई का वर्तमान नेतृत्व और वैश्विक प्रभाव
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Speaker A
यरूशलम के पहाड़ी इलाकों में वाकई एक बंकर में खुफिया मीटिंग हो रही थी। यह कोई मामूली मीटिंग नहीं थी। इसे हेड कर रहे थे इसराइल के वजीर आजम नितिन याहू। मीटिंग में हुकूमत और फौज के चंद खास लोगों को ही बुलाया गया था। लेकिन यह लोग
Speaker A
सोच रहे थे कि ईरान पर हमले का फैसला तो हो चुका है। तो फिर यह हंगामी और खुफिया मीटिंग किस लिए? नितिन याहू ने उनके चेहरों पर उभरने वाला यह सवाल शायद पढ़ लिया था। उन्होंने बताया कि हमले का मकसद ईरान की
Speaker A
एटमी साइट्स को तबाह करना, उसके फ्यूल डिपू को आग लगाना और बड़े-बड़े फौजी अफसरों को मारना है। लेकिन उन सबसे बढ़कर ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनाई को भी निशाना बनाकर खत्म करना है। [संगीत] यह सुनकर मीटिंग में शरीक हर शख्स चौंक
Speaker A
गया। सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। यह बात है 12 जून 2025 की। अगले रोज यानी 13 जून कोराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। उसकी एटमी तंसीबात, फ्यूल डिपो और फौजियों को टारगेट किया गया। मगर खामनाई कहीं नजर
Speaker A
नहीं आई। इसराइल ने जदीद आला, जदीद टेक्नोलॉजी, हाईटेक सेटेलाइट्स सब कुछ इस्तेमाल कर लिया। मगर खामनाई का कोई सुराख नहीं मिला। वो दरअसल एक ऐसे अंडरग्राउंड बंकर में चले गए थे जहां इसराइल के लिए उन्हें तलाश करना मुश्किल
Speaker A
ही नहीं नामुमकिन था। यह जंग 12 दिन तक चली। मगर इस दौरान आयतुल्लाह खामनाई इसराइल को कहीं नजर नहीं आए। नितिन याहू के लिए यह बड़ी शर्मिंदगी की बात थी। क्योंकि उन्हें इस बात का गुरूर था कि जब
Speaker A
वो ईरान के बड़े-बड़े एटमी साइंसदानों को टारगेट कर सकते हैं। खुफिया एटमी तजुर्बेगाहों को निशाना बना सकते हैं। यहां तक कि हम्मास के सरबराह इस्माइल हानिया की ईरान में घुसकर जान ले सकते हैं। तो आयतुल्लाह खामनाई को भी हिट करना
Speaker A
मुश्किल नहीं होगा। मगर यह उनकी गलतफहमी थी। आयतुल्लाह खामनाई दुश्मन के हमलों से बचने का हुनर खूब जानते हैं। उनकी जान लेने की कोशिश पहली बार नहीं थी। इससे पहले भी वह कई बार मौत को करीब से देख
Speaker A
चुके थे। 27 जून 1981 को वो तेहरान की अबूजर मस्जिद में लोगों तक आयतुल्लाह खुमैनी का पैगाम पहुंचाने के लिए खिताब कर रहे थे। इसी दौरान एक शख्स ने उनके सामने टेप रिकॉर्डर लाकर रख दिया। सब समझे कि वो
Speaker A
तकरीर रिकॉर्ड कर रहा है। मगर अभी एक मिनट भी नहीं गुजरा था। इस टेप रिकॉर्डर में छुपा एक बम जोरदार धमाके से फटा। अली खामनाई शदीद जख्मी हुए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उनका दाया बाजू हमेशा के लिए मफलूस हो चुका था। मगर जान
Speaker A
बची क्योंकि किस्मत को उनसे अभी बहुत से काम लेने थे। मशहद को ईरान का रूहानी दिल और दीनी तालीम का मरकज कहा जाता है। क्योंकि इस शहर में सिर्फ जियारत के मुकद्दस मुकामात ही नहीं बल्कि कई मदारिस, दीनी इदारे और आला मयार
Speaker A
की यूनिवर्सिटी भी हैं। 1939 में इस शहर में एक ऐसे बच्चे ने आंख खोली जिससे आज अमेरिका और इसराइल जैसी ताकतें आंख मिलाने से कतराती हैं। मिट्टी के घर में पैदा होने वाले इस बच्चे के बारे में कोई नहीं
Speaker A
जानता था कि ये बड़ा होकर दुश्मन के सामने चट्टान साबित होगा। इस बच्चे का नाम सैयद अली हुसैनी खामनाई रखा गया जिसे आज सारी दुनिया आयतुल्लाह अली खामनाई के नाम से पहचानती है। उनके वालिद के पास दुनियावी दौलत नहीं थी।
Speaker A
मगर वह दीनी दौलत से मालामाल थे। [संगीत] वो एक शिया आलिम दीन थे। आयतुल्लाह खामनाई ने उन्हीं की सरपरस्ती में दीनी तालीम हासिल की। 1962 में आयतुल्लाह खामनाई ने ईरान के बादशाह रजा शाह पहलवी के खिलाफ [संगीत] तहरीक शुरू की। वह शाह की मगरिब नवाज
Speaker A
हुकूमत और उसकी इस्लाम मुखालिफ सरगर्मियों से नाराज थे। इस वक्त सैयद अली खामनाई की उम्र सिर्फ 23 [संगीत] साल थी। वो आयतुल्लाह खुमैनी के ख्यालात और उनकी तहरीक से बहुत मुतासिर थे और उस तहरीक को आगे बढ़ाने के लिए काम भी कर रहे थे।
Speaker A
रफ्ता रफ्ता वो इमाम खुमैनी की नजरों में आ गए। मई 1963 में इमाम खुमैनी ने इस बहादुर नौजवान सैयद अली खामनाई को एक अहम और खुफिया जिम्मेदारी सौंपी जिसके तहत उन्हें मशहद में आयतुल्लाह मिलानी और दीगर उलमा तक एक खुफिया पैगाम पहुंचाना था। यह
Speaker A
वो पैगाम था जिसमें शाही हुकूमत की हकीकत को बेनकाब करने के तरीके और उसकी प्लानिंग की तफसील थी। अली खामनाई ने यह काम इंतहाई राजदारी और जिम्मेदारी के साथ अंजाम दिया और यहीं से वो आयतुल्लाह खुमैनी के दिल
Speaker A
में घर कर गए। खुमैनी की शाह मुखालिफ तहरीक ने जब एहतेजाज की सूरत इख्तियार की तो जून 1963 में शाह के फौजियों ने इसे बड़ी बेरहमी से कुचल दिया। इसी दौरान आयतुल्लाह खामनाई को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी
Speaker A
गिरफ्तारी के बावजूद पहलवी हुकूमत को यह धड़का लगा रहा। कहीं यह जेल के अंदर बैठकर उसके लिए बड़ा खतरा ना बन जाए। इसी खतरे पर आयतुल्लाह खामनाई को 1964 में जिला वतन कर दिया गया। वो तुर्की से इराक और फिर फ्रांस
Speaker A
मुंतकिल हो गए। मगर वहां बैठकर भी उन्होंने शाह के खिलाफ अपनी तहरीक जारी रखी। वह वहां से अपनी तकरीरों की कैसेटें और तहरीर पैगामात की फोटो कॉपियां भेजते जो छुपाकर ईरान लाई जाती और यहां खुफिया तरीकों से हामियों में तकसीम की जाती। इस
Speaker A
काम में भी नौजवान खामनाई आगे-आगे थे। उन्होंने खुद को मुकम्मल तौर पर आयतुल्लाह खुमैनी के मकसद की तकमील के लिए वक्त कर दिया था। वो इंतहाई खुफिया तरीके से खुमैनी के मिशन को आगे बढ़ा रहे थे। लेकिन शाह की
Speaker A
खुफिया पुलिस यह सब देख रही थी। उन्हीं दिनों अली खामनाई अपने चंद करीबी साथियों के साथ जुनूबी ईरान के शहर करमान और जाहिदान गए। इस सफर का मकसद शाह की नाम निहाद रिफॉर्म्स के हक में होने वाले रिफरेंडम की हकीकत को आवाम के सामने लाना
Speaker A
था। वहां उन्होंने मुख्तलिफ आवामी इतमाद में तकरीर की और पहलवी हुकूमत की अमेरिका नवाज पॉलिसियों को बेनकाब किया। फिर खामोशी से वापस अपने शहर मशहद आ गए। लेकिन वो शाह की खुफ़िया पुलिस के रेडार पर थे। एक सर्द शाम में मशहद की गलियां मामूल के
Speaker A
मुताबिक खामोश थीं। अली खामनाई अपने घर के छोटे से कमरे में कुछ लिख रहे थे। उनके सामने तफसीर, इस्लामी तारीख और इंकलाबी किताबों का ढेर था। अचानक दरवाजे पर होने वाली दस्तक ने खामोशी तोड़ दी। वो उठे और
Speaker A
दरवाजा खोला। सामने सवाग के मुसल्ला अहलकार खड़े थे। सवाग शाह की खास फोर्स थी, जिसे मुखालफीन पर नजर रखने और उन्हें कुचलने के लिए बनाया गया था। आप अली खामनाई हैं? एक अहलकार ने पूछा। मुख्तसर सा जवाब मिला। जी। अहलकार उन्हें धकेलते
Speaker A
हुए अंदर दाखिल हो गए। पूरे घर की तलाशी शुरू कर दी। वहां कुछ नहीं था सिवाय किताबों के। यह किताबें शाह की हुकूमत के लिए किसी खतरनाक हथियार से कम नहीं थीं। अली खामनाई को हथकड़ियां लगाकर ले जाया गया।
Speaker A
मगर कुछ अरसे बाद इस वार्निंग के साथ छोड़ दिया गया कि वो शाह के खिलाफ जुबान बंद रखेंगे और आइंदा खुमैनी का पैगाम नहीं फैलाएंगे। वो रिहा तो हो गए मगर समझ चुके थे कि अब वह मुसलसल साबा की नजरों में
Speaker A
रहेंगे। फिर भी उन्होंने अपना मिशन नहीं छोड़ा बल्कि यह काम उन्होंने अंडरग्राउंड होकर पहले से ज्यादा मुतासिर होकर किया। लेकिन फिर वह इसी जुर्म में कई बार गिरफ्तार भी हुए। उन्हें जेल में डाला गया। यातनाएं दी गईं। मौत से डराया गया। मगर
Speaker A
हर बार वो जेल से बाहर आते तो पहले से ज्यादा जुर्रतमंद, बहौसला और पुरजश दिखाई देते। और फिर 1979 में वो इंकलाब आया जिसने ईरान को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आयतुल्लाह खुमैनी वापस ईरान आए तो अब अली
Speaker A
खामनाई उनके सिर्फ फॉलोअर नहीं थे बल्कि इस इंकलाब के एक सिपाही बन चुके थे। आयतुल्लाह खुमैनी अली खामनाई की कुर्बानियों से वाकिफ तो थे ही मगर वो उन्हें पहचान भी चुके थे कि उनका मिशन कोई आगे लेकर जा सकता है तो
Speaker A
वह खामनाई ही हैं। खुमैनी ने इंकलाब के बाद बनने वाली हुकूमत में खामनाई को अहमियत दी। [संगीत] वह इस्लामी इंकलाबी काउंसिल में अहम ओहदों पर भी रहे। रुकने पार्लियामेंट मुंतखिब हुए। नायब वज़ीर दफा की हैसियत से जिम्मेदारियां भी निभाई।
Speaker A
इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी बनाने में भी उनसे मदद ली गई। आयतुल्लाह खुमैनी ने उन्हें खास तौर पर तेहरान की मस्जिद में नमाज़ जुम्मा की इमामत के लिए भी मुंतखिब किया। अब अली खामनाई की बातें, तकरीरें, खुदबात सब नेशनल लेवल पर अहमियत इख्तियार कर चुके
Speaker A
थे। उनकी शख्सियत अब पूरे ईरान में पहचानी जाने लगी थी। लेकिन फिर उन्हें इसकी कीमत भी अदा करनी पड़ी। 27 जून 1981 को तेहरान की मस्जिद में बम धमाके के जरिए उन पर कातिलाना हमला हुआ जिसका जिक्र हम पहले कर
Speaker A
चुके हैं। यह एक बागी ग्रुप का हमला था जो नाकाम रहा। मगर इसी साल इसी बागी ग्रुप ने एक और हमला किया। इसमें ईरान के सदर मोहम्मद अली रजाई जाबाग हो गए। अब नया सदर मुंतखब करने के लिए इलेक्शन होने थे।
Speaker A
मुल्क की निगरानी काउंसिल ने चार उम्मीदवारों के नाम दिए। जिनमें अली खामनाई का नाम भी शामिल था। इंतखाबी मैदान में खामनाई को उतारा गया। वो भारी अक्सरियत से सदर मुंतखिब हो गए। 4 साल बाद 1985 में वो दोबारा सदर मुंतखिब हुए।
Speaker A
लेकिन उनका दौर सदारत आसान नहीं था। यह वो दौर था जब ईरान इराक के खिलाफ जंग में घिरा हुआ था। सदर की हैसियत से वो बाकायदा महाज जंग का दौरा करते और फौजियों का हौसला बढ़ाते थे। इराक के
Speaker A
खिलाफ जंग के दौरान ही उनके ईरानी पासदराने इंकलाब के साथ करीबी ताल्लुकात कायम हुए। आज वह इस इदारे के सरबराह हैं और इसके कमांडर्स की तकरुरी और बरतरफी उन्हीं के इख्तियार में है। मुल्क अंदरूनी तौर पर भी सियासी अदम इस्तेकाम का शिकार
Speaker A
था। लेकिन खामनाई ने मुल्क को कामयाबी के साथ चलाकर साबित कर दिया कि वो खुमैनी के राइट हैंड हैं। लेकिन फिर 4 जून 1989 को पूरे ईरान में सफे-मातम बिछ गई। 89 साला आयतुल्लाह खुमैनी दिल का दौरा पड़ने से इंतकाल कर
Speaker A
गए थे। ईरान को अब एक नए सुप्रीम ल
Speaker A
बार अली खामनाई को अपना जानशीन बनाने की तरफ इशारा किया था। इस बात का सबूत तो किसी के पास नहीं था। मगर इसकी मुखालफत भी किसी ने नहीं की। यूं आया खामनाई को शिया मुस्लिम दुनिया का नया रहनुमा मुंतखिब कर
Speaker A
लिया गया। आज जब ईरान में ताकत की बात होती है तो सदर का नाम बाद में आता है। पहला नाम आया खामनाई का लिया जाता है। वो तकरीबन चार दहाइयों से ईरान के सुप्रीम लीडर हैं और इस दौरान कौन सी परेशानी है
Speaker A
जिसका उन्होंने सामना नहीं किया। ऐसा कौन सा बोहरान है जिसका उन्होंने मुकाबला नहीं किया। लेकिन तमामतर मुश्किलात और मसाइल के बावजूद वो हर बार सुर्ख हुए। इराक से जंग के बाद मईत तबाह हो चुकी थी। ईरान आलमी तन्हाई का शिकार था। मुल्क के अंदर से भी
Speaker A
इंकलाब मुखालिफ आवाजें उठ रही थी। मगर आया खामनाई ने इन तमाम मसाइल से ईरान को निकाला। तबाह हाल मशत और माशरे को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा किया। यह कोई आसान काम नहीं था। मगर उन्होंने यह कर दिखाया। साथ
Speaker A
ही मुल्की खुद मुख्तारी और इस्लामी इंकलाब की भी हिफाजत की। मगरिब की साजिशों, इसराइल के हमलों और अमेरिका की धमकियों का भी डटकर मुकाबला किया। [संगीत] इस वक्त वो ईरान की सबसे ताकतवर शख्सियत हैं। बतौर रहबर आला खामनाई को किसी भी
Speaker A
हुकूमती मामले में वीटो का इख्तियार हासिल है। उन्हें यह भी इख्तियार है कि वो जब चाहे जिसे चाहे किसी को भी किसी भी पब्लिक ऑफिस ओदे पर फाय कर सकते हैं। वो रियासत के सरबराह भी हैं और फौज के कमांडर इन चीफ
Speaker A
भी। उनके मुंह से निकली हुई हर बात ईरान में हत्मी समझी जाती है। मुल्क के तमाम हुकूमती मामलात में आखिरी फैसला उन्हीं का होता है। ईरान की सियासत ही नहीं मुसल्ला अफवाज पर भी उनकी गिरफ्त मजबूत है। ईरान
Speaker A
की फॉरेन पॉलिसी उन्हीं के बनाए गए या बताए गए उसूलों पर चलती है। अमेरिका को आंखें दिखाना हो या इसराइल से टक्कर लेना। आखिरी फैसला उन्हीं का होता है। गजा में हम्मास, लबनान में हिजबुल्लाह और यमन में होसियों की हिमायत भी आयतुल्लाह खामनाई ही
Speaker A
की पॉलिसी है। इसराइल इसीलिए तो उनकी जान का दुश्मन बना हुआ है क्योंकि ये तीनों तंजीमे सयनी रियासत की दुश्मन हैं। नितिन याू आयतुल्लाह खामनाई को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते हैं। उनका मंसूबा है कि किसी तरह खामनाई को रास्ते से हटाकर ईरान में
Speaker A
रिजीम चेंज की जाए और वहां ऐसी हुकूमत लाई जाए जो इसराइल की हामी और मगरिब के इशारों पर चलने वाली हो। लेकिन नितिन याू को अभी तक अपने इस मकरू मंसूबे में कामयाबी नहीं मिली। 13 जून 2025 को ईरान पर होने वाले
Speaker A
हमले में इसराइल आया खामनाई को निशाना क्या बना था? उल्टा ईरान ने इसे भरपूर जवाब देकर दुनिया को हैरान कर दिया। ईरान को तबाह करने का ख्वाब देखने वाले इसराइल को खुद अपनी सलामती के लाले पड़ गए थे।
Speaker A
ईरानी मिसाइल मौत बनकर आ रहे थे और पूरा इसराइल सायरन की आवाजों से गूंज रहा था। [संगीत] लोग अपनी जान बचाने के लिए बंकरों की तरफ भाग रहे थे। यह मनाजिर सारी दुनिया ने देखे। ईरान की जानिब से ऐसे सख्त रद्दे
Speaker A
अमल की किसी को तवकको नहीं थी। इसराइल की बेबसी का तमाशा देखकर अमेरिका को भी इसकी मदद के लिए मैदान में आना पड़ा। इसने ईरान के एटमी लैबोरीियों को निशाना बनाया। लेकिन जब ईरान ने कतर और इराक में अमकी
Speaker A
फौजी अड्डों पर भी मिसाइल बरसाए तो मजबूरन अमेरिका को इसराइल से जंग रोकने का मुतालबा करना पड़ा। कहते हैं कि इस 12 रोजा जंग के दौरान इसराइल को शर्मिंदा करने में मरकजी किरदार सुप्रीम लीडर आयातुल्ला खामनाई का ही था।
Speaker A
मैदान जंग में दुश्मन के सामने फौलाद बनने वाले आया खामनाई अंदर से बहुत नरम मिजाज हैं। वो सेंट्रल तेहरान के एक कंपाउंड में अपनी फैमिली के साथ इंतहाई सादा जिंदगी गुजारते हैं। उनके अपनी अहलिया मंसूरा खजिस्ता बाकरजादा से छह बच्चे हैं। जिनमें
Speaker A
चार बेटे और दो बेटियां हैं। वो बागबानी के शौकीन भी हैं और शायरी से भी शक रखते हैं। खामनाई की उम्र 87 साल हो चुकी है। उनके सेहत के मसाइल को देखते हुए यह सवाल सबके ज़हनों में है कि उनके बाद उनकी जगह
Speaker A
कौन संभालेगा और जो उनके बाद आएगा क्या वह भी खामनाई के बनाए हुए रास्ते पर चलेगा या फिर उसकी पॉलिसी कुछ और होगी। फिलहाल इन सवालों के जवाब अभी किसी के पास नहीं।
Topics:आयतुल्लाह खामनाईईरानइसराइलसुप्रीम लीडरखुफिया मिशनईरानी क्रांतिराजनीतिसैन्य रणनीतिईरान-इराक युद्धआधुनिक तकनीक











