मस्जिद नबवी के नीचे सुरंग खोदने की खुफिया साजिश और सुल्तान नूरुद्दीन जंगी का ख्वाब जो इतिहास बदल गया।
Key Takeaways
- सच्चाई छुपाने के लिए नेकी का पर्दा लगाया जा सकता है।
- सुल्तान नूरुद्दीन की मोहब्बत और जागरूकता ने मुस्लिम दुनिया को बड़ा संकट से बचाया।
- इतिहास में कई बार खुफिया मिशनों का बड़ा प्रभाव होता है।
- धैर्य और सूझ-बूझ से बड़ी साजिशों को नाकाम किया जा सकता है।
- मस्जिद नबवी जैसे पवित्र स्थलों की सुरक्षा मुसलमानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
What the video covers
- 1164 ईस्वी में मदीना मुनव्वरा में दो मुसाफिरों ने मस्जिद नबवी के नीचे सुरंग खोदने की खुफिया साजिश रची।
- वे छह महीने तक अपनी असली मंशा छुपाते हुए नेक मुसाफिरों का रूप धारण किए रहे।
- सुरंग खोदने के दौरान मिट्टी छुपाने के लिए वे जन्नतुल बकी कब्रिस्तान में मिट्टी फैलाते थे।
- सुल्तान नूरुद्दीन महमूद जंगी दमिश्क में एक खतरनाक ख्वाब देखते हैं जो उन्हें इस साजिश की जानकारी देता है।
- सुल्तान की गहरी मोहब्बत और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रति सम्मान उन्हें इस खतरे से निपटने की जिम्मेदारी देता है।
- मदीना के गवर्नर और स्थानीय लोग इन मुसाफिरों को नेक समझते थे, जिससे उनकी साजिश छुपी रही।
- सुल्तान नूरुद्दीन ने खुफिया मिशन चलाकर इस साजिश को नाकाम किया और मुस्लिम दुनिया को बचाया।
- यह कहानी इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ और मुस्लिम उम्मत की सुरक्षा की मिसाल है।
Chapters
- 00:00मदीना में सुरंग खोदने की शुरुआत
- 01:42मदीना का माहौल और मुसाफिरों का परिचय
- 03:18दो मुसाफिरों की साजिश और उनका व्यवहार
- 04:57सुरंग खोदने की तकनीक और मिट्टी छुपाना
- 08:10सुरंग मस्जिद नबवी के नीचे पहुंचती है
- 09:48सुल्तान नूरुद्दीन का ख्वाब और बेचैनी
- 11:16सुल्तान की दुआएं और तैयारी
- 12:49मदीना में सुल्तान का आगमन और जांच
- 17:28साजिश का पर्दाफाश और इतिहास का मोड़
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Speaker A
रात गहरी हो चुकी थी। मदीना मुनवरा खामोश था। गलियों में सुकून था। जमीन के नीचे दो आदमी मौजूद थे। 6 महीने से हर रात हम यही सुरंग खोद रहे हैं। लेकिन अभी तक किसी को हम पर शक भी
Speaker A
नहीं हुआ। उनके सरों के ऊपर मदीना सो रहा था। हाजी सो रहे थे। आलिम सो रहे थे। पहरेदार अपने मामूल के मुताबिक गश्त कर रहे थे। और किसी को कोई खबर नहीं थी कि मस्जिद नबवी सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के नीचे एक ऐसी
Speaker A
साजिश अपने आखिरी मरहले में दाखिल हो चुकी है जो अगर कामयाब हो जाती तो शायद पूरी मुस्लिम दुनिया सदमे में डूब जाती। लेकिन उन्हें एक बात मालूम नहीं थी। उसी वक्त सैकड़ों मील दूर दमिश्क में एक शख्स बेचैनी के आलम में बिस्तर से उठ बैठा था।
Speaker A
एक सुल्तान जिसने अभी-अभी तीसरी मर्तबा एक ही ख्वाब देखा था। एक ऐसा ख्वाब जिसने उसके दिल की धड़कनें तेज कर दी थी। एक ऐसा ख्वाब जिसने उसे यह यकीन दिला दिया था कि कहीं ना कहीं कुछ बहुत खतरनाक हो रहा है
Speaker A
और शायद वक्त बहुत कम रह गया है। यह उस रात की कहानी है जब नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के रूकदस को बचाने के लिए तकदीर ने एक सुल्तान को जगाया। यह उस खुफिया मिशन की कहानी है जिसने तारीख का
Speaker A
रुख बदल दिया। अस्सलाम वालेकुम। शुरू करने से पहले कमेंट्स में हमें जरूर बताएं [संगीत] कि आप इस वक्त यह वीडियो किस शहर या मुल्क से देख रहे हैं। लेकिन आखिर यह दो आदमी कौन थे? उनकी कहानी को समझने के
Speaker A
लिए हमें 1164 ईवी के मदीना मुनव्वरा में जाना होगा। यह नबी अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम का शहर था। एक ऐसा शहर जिसकी फजा में अकीदत और एहतराम घुला हुआ महसूस होता था। पांच सदियों से मुसलमान इस शहर की
Speaker A
हिफाजत को अपनी जानों से भी ज्यादा अहम समझते आए [संगीत] थे। शहर का नज्म नस्क इंतहाई मोहताज था। गवर्नर मस्जिद नबवी सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के करीब रहते थे। जबकि पहरेदार दिन [संगीत] रात निगरानी पर मामूर रहते। हर आने वाले मुसाफिर, हर
Speaker A
हाजी और हर अजनबी पर नजर रखी जाती थी। क्योंकि यह महज [संगीत] एक शहर नहीं था। यह पूरी मुस्लिम उम्मत के जज्बात, मोहब्बत और अकीदत का मरकज था। इन दिनों हज का मौसम करीब था और दुनिया के मुख्तलिफ इलाकों से
Speaker A
काफिले मुसलसल मदीना पहुंच रहे थे। शहर की गलियों में नई-नई सूरतें दिखाई देती थी। लेकिन निगरानी करने वालों के लिए हर चेहरा अहम था। इन दिनों आने वालों की तादाद बहुत बढ़ गई है। हर रोज नए लोग पहुंच रहे हैं।
Speaker A
और वाकई किसी को मालूम नहीं था कि इन्हीं आने वाले मुसाफिरों में दो ऐसे अफराद भी मौजूद हैं जिनके दिलों में एक ऐसा मंसूबा छुपा हुआ था जो तारीख के खतरनाक तरीन राजों में शुमार होने वाला था। अल्लाह हिफाजत फरमाए। जिस अमानत की
Speaker A
निगरानी हमारे सुपुर्द है। उसकी जिम्मेदारी आम नहीं। हज के मौसम में दो आदमी मदीना मुनव्वरा [संगीत] पहुंचे। उन दिनों शहर में हजारों जायरीन और मुसाफिर आ रहे थे। ऐसे हुजूम में किसी अजनबी का गुम हो जाना बिल्कुल मामूली बात
Speaker A
थी। और शायद यही वो मौका था जिसका यह दोनों कई अरसे से इंतजार कर रहे [संगीत] थे। उन्होंने अपना तारुफ मगरिब यानी मराकिश से आने वाले मुसाफिरों के तौर पर करवाया। [संगीत] उनकी शक्ल सूरत भी ऐसी थी कि देखने वाला आसानी से धोखा खा जाता।
Speaker A
[संगीत] लंबी दाढ़ियां, सफेद लिबास, हाथों में तस्बीह और जुबान पर इबादत और जोहद [संगीत] की बातें। वो मदीना की गलियों में चलते तो आम जायरीन ही मालूम होते। लोग उन्हें नेक और इबादत गुजार [संगीत] समझते। उनका एहतराम करते और बाज औकात उनसे दुआओं की
Speaker A
दरखास्त भी करते। बजाहिर वो आम मुसाफिर थे। लेकिन उनके दिलों में छुपा राज इतना खतरनाक था कि अगर वक्त पर इसका पर्दा ना चाक होता तो तारीख का एक नाकाबिले तसवुर सानहा जन्म ले सकता था। मदीना पहुंचने के
Speaker A
बाद उन्होंने सबसे पहले रिहाइश का इंतजाम किया। लेकिन यह कोई मामूली इंतखाब नहीं था। उन्होंने जानबूझकर ऐसा घर किराए पर लिया जो मस्जिद-ए-नबवी सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के इंतहाई करीब वाक था। रोजा मुबारक के आसपास के घरों में से एक
Speaker A
यही वो जगह थी जिसकी उन्हें जरूरत थी। इसके बाद उनका असल मंसूबा आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ने लगा। उन्होंने सिर्फ इबादत का दिखावा नहीं किया बल्कि अपनी पूरी जिंदगी को इस अंदाज में पेश किया कि हर शख्स उनसे मुतासिर [संगीत] हो जाए। वो मस्जिद नबवी
Speaker A
सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम आने वालों में सबसे पहले दिखाई देते और अक्सर सबके बाद वापस जाते। वो सदका खैरात भी खुले दिल से करते थे। कभी किसी [संगीत] जरूरतमंद की मदद कर देते। कभी यतीमों के लिए रकम दे देते और कभी खामोशी से किसी मोहताज का
Speaker A
खर्च उठा लेते। बाकी रकम भी अपने पास रख लो। उसे जरूरतमंदों पर खर्च कर देना। हम तो मुसाफिर हैं। [संगीत] हमारी जरूरतें बहुत कम है। रफ्तार रफ्ता उनकी शोहरत पूरे शहर में फैलने लगी। लोग उन्हें नेक, परहेजगार और
Speaker A
अल्लाह वाले मुसाफिर समझने लगे। उन्हें आए [संगीत] 6 महीने होने वाले हैं। लेकिन हमने कभी उनकी जुबान से दुनियावी शिकायत नहीं सुनी। हां बिल्कुल। ना गर्मी की शिकायत, ना महंगाई का जिक्र, ना किसी से झगड़ा। और यही उनकी सबसे बड़ी कामयाबी थी। वो
Speaker A
मदीना के सबसे ज्यादा नजर आने वाले नेक लोगों में शुमार होने लगे। लेकिन हकीकत में उनका असल मकसद सबकी नजरों से पोशीदा था। उन्होंने लोगों का एतमाद इस हद तक हासिल कर लिया था कि अगर कोई उन पर शक भी
Speaker A
करता तो शायद शहर के बेशतर लोग फौरन उनके दफा में खड़े हो जाते। क्योंकि बाज औकात सबसे खतरनाक राज वही होते हैं जो नेकी के पर्दे में छुपे हो। लेकिन जैसे ही ईशा की नमाज के बाद शहर पर खामोशी उतरती और मदीना
Speaker A
की गलियां सुनसान हो जाती। उन दोनों की असल सरगर्मी शुरू हो जाती। वो अपने कमरे के फर्श पर बिछे कालीन हटाते, लकड़ी के तख्ते एक तरफ करते और फिर जमीन के अंदर उतर जाते। वहां एक सुरंग थी। ऐसी सुरंग
Speaker A
जिसे वो महीनों से खामोशी के साथ खोद रहे थे। एक रात उनमें से एक ने धीमी आवाज में पूछा। आज कितनी मिट्टी निकली है? 20 थैले और आज एक भी थैला कम नहीं होना चाहिए। वक्त बहुत कम रह गया है। [संगीत]
Speaker A
लेकिन सुरंग खोदने वालों के सामने एक मसला हमेशा खड़ा रहता है। मिट्टी सुरंग जितनी लंबी होती है उतनी ही ज्यादा मिट्टी बाहर निकलती है और मिट्टी को हमेशा के लिए गायब नहीं किया जा सकता। खासतौर पर ऐसे शहर में
Speaker A
जहां लोग एक दूसरे को जानते हो और हर गैर मामूली चीज फौरन तवज्जो खींच ले। यह मसला उन दोनों ने पहले ही सोच रखा था। उन्होंने चमड़े के बड़े-बड़े थैले तैयार कर रखे थे। बिल्कुल वैसे जैसे दूरदराज सफर करने वाले
Speaker A
मुसाफिर अपने साथ रखते थे। रात भर सुरंग से निकलने वाली मिट्टी उन्हीं थैलों में भरी जाती। फिर फजर से पहले जब ज्यादातर लोग सो रहे होते [संगीत] वो खामोशी से उन थैलों को उठाकर जन्नतुल बकी की तरफ ले
Speaker A
जाते। रास्ते में वह आम मुसाफिरों की तरह दिखाई देते और किसी को उन पर शक ना होता। कब्रिस्तान पहुंचकर वो मिट्टी को मुख्तलिफ जगहों पर फैला देते। थोड़ी एक तरफ, थोड़ी दूसरी तरफ। इतनी एहतियात से कि किसी एक
Speaker A
मकाम पर ज्यादा मिट्टी जमा ना होने पाए। देखने वालों को यूं महसूस होता जैसे दो नेक आदमी कब्रिस्तान की सफाई या देखभाल में मशरूफ हो। लोग यही समझते कि वह सहाबा इकराम रज़ अल्लाह अनम की कब्रों के एतराम
Speaker A
में यह खिदमत अंजाम दे रहे हैं। वो हर रोज लोगों की नजरों के सामने काम करते थे। लेकिन फिर भी कोई उनके असल मकसद को ना समझ सका। हफ्ते गुजरते गए और फिर वही हफ्ते महीनों में तब्दील हो गए। सुरंग मुसलसल
Speaker A
आगे बढ़ रही थी। 10 [संगीत] फुट, 20 फुट, फिर 30 फुट। और हर गुजरती रात के साथ वो मदीना की मुकद्दस जमीन के नीचे अपने मकसद के मज़द करीब पहुंचते [संगीत] जा रहे थे। फिर एक रात अचानक उनके भवड़े की आवाज बदल
Speaker A
गई। यह आवाज पहले जैसी नहीं थी। एक लम्हे के लिए दोनों रुक गए। उन्होंने दोबारा जर्ब लगाई। अब उन्हें यकीन हो गया था। यह नरम मिट्टी नहीं थी। यह पत्थर था और कोई आम पत्थर भी नहीं। यह वो मजबूत बुनियाद था
Speaker A
जिसका वो महीनों से इंतजार कर रहे थे। सुरंग अब मस्जिद नबवी सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के नीचे तक आ पहुंची थी। छठे महीने तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपनी खुदाई का रुख ऊपर की जानिब कर दिया। अब हर रात उनका काम पहले से ज्यादा मोहतात और ज्यादा
Speaker A
खतरनाक हो चुका था। उन्हें लग रहा था कि जिस मकसद के लिए वह महीनों से अंधेरे में मेहनत कर रहे थे, अब वह लम्हा उनकी दस्तरस में आ चुका है। लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं था कि इसी वक्त सैकड़ों मील दूर दमिश
Speaker A
में एक और शख्स था जिसकी रात खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। वो थे सुल्तान नूरुद्दीन महमूद जंगी। शाम के हुक्मरान मुसलमानों के अजीम रहनुमा और वो शख्स जिसने ऐसे वक्त में उम्मत को संभाला जब हर
Speaker A
तरफ मायूसी फैल रही थी। कहा जाता था कि उनकी हुकूमत में अगर किसी मुसाफिर का सोने का सिक्का रास्ते में गिर जाए तो कई दिन बाद भी वह इसी जगह महफूज़ मिल सकता था। मगर उनकी एक और सिफत थी जो उन्हें बाकी
Speaker A
हुक्मरानों से अलग करती थी। और वो थी नबी अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम से उनकी बेपनाह मोहब्बत। [संगीत] ऐसी मोहब्बत जो उनके दिल की धड़कनों में बसती थी और शायद इसी मोहब्बत की वजह से अल्लाह ताला ने एक ऐसी जिम्मेदारी उन्हीं के हिस्से में लिखी
Speaker A
जिसका तसवुर भी कोई नहीं कर सकता था। यह दमिश की एक पुरसकून रात थी। ईशा की नमाज के बाद सुल्तान अपने मामूल के मुताबिक आराम करने चले गए। लेकिन इस रात उनकी नींद में एक गैर मामूली मंजर जाहिर हुआ।
Speaker A
उन्होंने ख्वाब में नबी अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम को देखा। मगर इस ख्वाब में एक अजीब बेचैनी थी। नबी अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम दो आदमियों की तरफ इशा
Speaker A
रंगत सफेद थी और उनकी आंखें नीली [संगीत] थी। फिर नबी अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने एक ऐसा जुमला फरमाया जिसने सुल्तान नूरुद्दीन के दिल को हिला कर रख दिया। महमूद [संगीत] मुझे उन दो आदमियों से बचाओ। सुल्तान घबरा
Speaker A
कर बिस्तर से उठ बैठे। उनकी सांसे तेज जल रही थी। पेशानी पसीने से भीग चुकी थी और दिल गैर मामूली शिद्दत से धड़क रहा था। कुछ लम्हों तक वो खामोश बैठे रहे। वो ख्वाब इतना वाज़ था कि उसे आम ख्वाब करार
Speaker A
देना मुमकिन नहीं था। लेकिन सवाल यह था कि इसका मतलब क्या था? वो दो आदमी कौन थे? वो कहां थे? और नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने उन्हीं को क्यों पुकारा था?
Speaker A
सुल्तान के जेहन में सवाल ही सवाल थे। मगर किसी सवाल का जवाब मौजूद नहीं था। वो फौरन बिस्तर से उठे, वजू [संगीत] किया, नफल अदा किए और देर तक अल्लाह ताला के हुजूर दुआ करते रहे। वो बार-बार यही सोच रहे थे कि
Speaker A
इस ख्वाब का मतलब क्या है? वो दो आदमी कौन है और मदीना में आखिर ऐसा क्या हो रहा है जिसके लिए उन्हें पुकारा गया है। काफी देर इबादत के बाद वह दोबारा आराम के लिए लेटे। लेकिन अब उनके दिल का इस्तराफ पहले से भी
Speaker A
ज्यादा बढ़ चुका था। अब उनके लिए खामोश बैठे रहना मुमकिन नहीं था। [संगीत] रात खत्म होते-होते सुल्तान एक फैसले पर पहुंच चुके थे। यह कोई आम ख्वाब नहीं था। यह एक वाज़ तबीह थी। एक इशारा जिसे नजरअंदाज नहीं
Speaker A
किया [संगीत] जा सकता था। फजर के बाद उन्होंने फौरन अपने काबिल एतमाद वजीर जमालुद्दीन [संगीत] को तलब किया। जब वजीर हाजिर हुए, तो सुल्तान ने उन्हें पूरा ख्वाब सुनाया। फिर सुल्तान ने मजबूत लहजे में कहा अगर नबी-ए अकरम सल्लल्लाहहु अलैह
Speaker A
वसल्लम तीन मर्तबा मदद के लिए पुकारे तो इंतजार की गुंजाइश बाकी नहीं [संगीत] रहती। यह अल्फाज़ सुनकर वजीर भी मामले की संगीनी समझ गए। चुनांचे इसी वक्त तैयारियों का हुक्म दे दिया गया। कोई ऐलान नहीं किया गया। किसी को असल मकसद नहीं
Speaker A
बताया गया। क्योंकि यह कोई मामूल का सरकारी सफर नहीं था। यह एक खुफिया मिशन था। ऐसा मिशन जिसकी कामयाबी पर एक ऐसी अमानत की हिफाजत मौकूफ थी जो पूरी उम्मते मुस्लिमा के दिल के सबसे करीब थी। सुल्तान ने अपने सबसे माहिर घोर सवारों को साथ
Speaker A
लिया। तेज रफ्तार घोड़े तैयार किए गए। ऊंटों पर खजाना, सदकात और कीमती तहाइफ लाद दिए गए। क्योंकि [संगीत] सुल्तान नहीं जानते थे कि मदीना पहुंचकर उन्हें किस सुरते हाल का सामना करना पड़ेगा। चुनांचे काफिला दमिश्क से गैर मामूली उजलत के साथ
Speaker A
रवाना हो गया। यह सफर आम सफरों जैसा नहीं था। यह एक ऐसे शख्स का सफर था जिसके दिल में हर गुजरते लम्हे के साथ बेचैनी बढ़ती जा रही थी। तारीख बताती है कि दमिश्क से मदीना तक का रास्ता आसान नहीं था। दरमियान
Speaker A
में वसी रेगिस्तान थे। संगलाख पहाड़ी इलाके थे और ऐसे मकामात भी थे जहां दुश्मनों और डाकुओं का खतरा हर वक्त मौजूद रहता था। लेकिन सुल्तान नूरुद्दीन वक्त के खिलाफ दौड़ रहे थे। उन्होंने दिन और रात का फर्क तकरीबन खत्म कर दिया। रास्ते में मुख्तसर
Speaker A
कयाम करते थके हुए घोड़ों को बदलते और फौरन दोबारा रवाना हो जाते। आराम उनके लिए अहम नहीं रहा था। उनके ज़हन में सिर्फ एक सवाल था। मदीना में आखिर क्या हो रहा है?
Speaker A
यूं मुसलसल सफर करते हुए उन्होंने वो फासला सिर्फ 16 दिन में तय कर लिया। जिसे उबूर करने में आम लोगों को बहुत ज्यादा वक्त लगता था। इन 16 दिनों में शायद ही कोई लम्हा ऐसा गुजरा हो जब वो ख्वाब उनके
Speaker A
जहन से दूर हुआ हो। बार-बार उन्हें वही दो चेहरे याद आते। वही पुरसरार शक्लें और हर बार उनके दिल में इस्तराब मजीद बढ़ जाता क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के वो अल्फाज़ अब भी उनके कानों में गूंज रहे थे। महमूद मुझे इन दो
Speaker A
आदमियों से बचाओ। जब आखिरकार सुल्तान नूरुद्दीन मदीना में दाखिल हुए तो किसी को उनके आने की उम्मीद नहीं थी। कोई ऐलान नहीं हुआ था। कोई तैयारी नहीं थी। शाम के सुल्तान बस अचानक शहर के दरवाजों पर जाहिर हो गए। 20 गर्द आलूद घोड़सवारों के साथ और
Speaker A
सुल्तान का चेहरा थकन और खौफ से भरा हुआ था। मदीना के लोग हैरान थे। गवर्नर परेशान था। शाम के सुल्तान [संगीत] यहां क्यों आए हैं? क्या हुआ है?
Speaker A
क्या कोई जंग होने वाली है? जरा उन्हें देखो। ऐसा लगता है। उन्होंने कोई नाकाबिले यकीन चीज देखी है। लेकिन सुल्तान नूरुद्दीन ने किसी को असल वजह नहीं बताई क्योंकि उनके पास एक बहुत बड़ा मसला था। वो जानते थे कि उन्हें दो
Speaker A
आदमियों को ढूंढना है। सुर्ख चेहरे और नीली आंखें। लेकिन मसला यह था कि हजारों लोगों के दरमियान सिर्फ दो मखसूस चेहरों को कैसे तलाश किया जाए। ना उनके नाम मालूम थे, ना उनका वतन यकीनी तौर पर मालूम था।
Speaker A
ना यह पता था कि वो शहर के किस हिस्से में रहते हैं और ना ही यह यकीन था कि वो अभी तक मदीना में मौजूद हैं। यही सवाल मुसलसल सुल्तान नूरुद्दीन के ज़हन में गर्दिश कर रहा था। वो मस्जिद-नबवी सल्लल्लाहो अलैहि
Speaker A
वसल्लम के करीब [संगीत] खामोश बैठे देर तक गौर करते रहे। या सुल्तान अगर वो दोनों आपके सामने आ जाए तो क्या आप उन्हें पहचान लेंगे? अगर मैं उन्हें देख लूं तो फौरन पहचान लूंगा। मगर पूरे शहर की तलाशी लेने
Speaker A
से वो दोनों शख्स खबरदार होकर भाग भी सकते हैं। इसके बाद सुल्तान के ज़हन में एक मंसूबा आया। ऐसा मंसूबा जिसमें किसी पर शक जाहिर किए बगैर मतलूबा लोगों को खुद उनके सामने लाया जा सकता था। अगली सुबह मदीना
Speaker A
की गलियों में एक ऐलान फैल गया। शाम के सुल्तान नूरुद्दीन [संगीत] मदीना मुनव्वरा तशरीफ लाए हैं। वो अहले मदीना और जायरीन से मोहब्बत के इज़हार के तौर पर तहाइफ [संगीत] और सदकात तकसीम करना चाहते हैं। हर शख्स मस्जिद में हाजिर हो। कोई भी इस
Speaker A
खैर से महरूम ना रहे। अगली सुबह मदीना मुनव्वरा में एक गैर मामूली मंजर देखने को मिला। लोग हर सम से मस्जिद नबवी सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की तरफ आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर एक ही
Speaker A
मकाम पर जमा हो रहा हो। इस रोज मस्जिद सिर्फ इबादत की जगह महसूस नहीं हो रही थी बल्कि एक अजीम इज्तिमा का मरकज बन गई थी। दरवाजों के बाहर लंबी कतारें कायम थी। बूढ़े भी थे, जवान भी, ताजिर, मजदूर, तलबा
Speaker A
और उलमा भी। हर शख्स सुल्तान की सखावत से हिस्सा पाने के लिए आया था। लेकिन किसी को मालूम नहीं था कि असल मकसद कुछ और है। सुल्तान नूरुद्दीन एक जगह बैठे थे। उनके साथ वजीर जमालुद्दीन मौजूद थे। लोग एक-एक करके आगे आते, तोहफा लेते और
Speaker A
आगे बढ़ जाते। मगर हर शख्स के साथ एक और चीज भी हो रही थी। सुल्तान उसे गौर से देख रहे थे। एक बूढ़ा शख्स आगे आया। सुल्तान ने एक लम्हा उसके चेहरे पर नजर डाली। नहीं यह वो नहीं था। इसके बाद एक नौजवान
Speaker A
मुसाफिर आया। फिर एक और फिर एक खानदान फिर कई और लोग। और हर बार जवाब एक ही था। नहीं यह भी वो नहीं। वक्त गुजरता गया। एक घंटा, फिर दूसरा, फिर तीसरा। सैकड़ों लोग गुजर गए। फिर सैकड़ों और। हर चेहरे के साथ
Speaker A
सुल्तान की उम्मीद जागती और अगले ही लम्हे खत्म हो जाती। उनकी नजरें मुसलसल हुजूम का जायजा ले रही थी। वो ख्वाब में देखे गए उन्हीं दो चेहरों को तलाश कर रहे [संगीत] थे। आखिरकार सुल्तान ने धीमी आवाज में
Speaker A
वजीर से कहा हमने बेशुमार लोगों को देखा है मगर वो दोनों कहीं दिखाई नहीं दे रहे। वजीर ने तसल्ली देते हुए जवाब दिया। या सुल्तान अगर वो वाकई मदीना में मौजूद हैं तो जल्द या बदीर सामने आ जाएंगे। लेकिन वक्त
Speaker A
गुजरने के साथ-साथ सुल्तान की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सूरज आसमान में बुलंद हो गया। फिर दोपहर गुजर गई। तहाइफ तकसीम होते रहे। सोने के थैले हल्के होते गए। लोग खुशी-खुशी वापस लौटते रहे। मगर सुल्तान का मकसद अभी तक पूरा नहीं हुआ था। हजारों
Speaker A
चेहरे उनके सामने से गुजर चुके थे। हजारों लेकिन ख्वाब वाले दो चेहरे कहीं नजर नहीं आए। अब शाम करीब आ रही थी। सूरज आहिस्ताआहिस्ता मगरिब की तरफ झुक रहा था। कतार मुख्तसर होती जा रही थी। आखिरी चंद अफराद भी तोहफे लेकर वापस [संगीत] जा रहे
Speaker A
थे। खजाने के संदूक तकरीबन खाली हो चुके थे। जो कुछ लाया गया था तकरीबन सब तकसीम हो चुका था। लोग अपने घरों को लौट रहे थे। मस्जिद का शोर धीरे-धीरे कम हो रहा था और फिर वह लम्हा आ गया जब हुजूम [संगीत]
Speaker A
तकरीबन खत्म हो चुका था। मगर सुल्तान नूरुद्दीन अब भी खामोश बैठे थे। सुल्तान ने मदीना के गवर्नर को पास बुलाया। क्या शहर के सब लोग आ गए? जी हां, सुल्तान, हर ताजिर, हर मजदूर, यहां तक कि शहर के बाहर के भिखारी भी आए थे?
Speaker A
सुल्तान नूरुद्दीन का दिल डूब गया। उनकी नजरें जमीन पर झुक गई। फिर गवर्नर ने अचानक एक बात शामिल की। दो भाई और हैं या सुल्तान? लेकिन सच्ची बात यह है कि वह उन लोगों में से नहीं है जो कतार में खड़े हो। वो नबी के रोजे की
Speaker A
दीवार के बिल्कुल साथ वाले छोटे से घर में रहते हैं। वो अपनी रातें इबादत में गुजारते हैं और दिन में गरीबों को खाना खिलाते हैं। वो सदका लेते नहीं बल्कि देते [संगीत] हैं। वो लोग मदीने में कब आए थे
Speaker A
शायद 6 महीने पहले। और सब उनसे मोहब्बत करते हैं। यहां तक कि मैं भी उनके पास कभी-कभी दुआ के लिए जाता हूं। सुल्तान को उसके आगे कुछ और सुनने की जरूरत नहीं थी। [संगीत] उन्हें जवाब मिल चुका था। हम आज रात महल
Speaker A
नहीं जा रहे। मुझे उनके घर ले चलो। लेकिन या सुल्तान वो इस वक्त इबादत में मशगूल होंगे। और ऐसे लोगों को तंग करना एक तमाशा बना देगा। चंद ही कदमों के फासले पर उन दो आदमियों को कोई अंदाजा नहीं था कि 6 महीनों से जो
Speaker A
दीवारें उन्होंने अपने गिर्द खड़ी की थी वो गिरने वाली हैं। सुल्तान नूरुद्दीन तेजी से मस्जिद से बाहर निकले। उनके चंद मुहाफिज साथ थे। जबकि मदीना का गवर्नर आगे-आगे रास्ता दिखा रहा था। फासला ज्यादा नहीं था। चंद गलियां उबूर करने के [संगीत]
Speaker A
बाद वो उस मकान के सामने पहुंच गए जिसका जिक्र गवर्नर ने किया था। यह घर मस्जिद नबवी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम के इंतहाई करीब वाक था। गवर्नर ने आगे बढ़कर दरवाजे पर दस्तक दी। चंद लम्हों बाद दरवाजा खुला। सामने एक शख्स खड़ा था। उसने अदब से सलाम
Speaker A
किया। [संगीत] गवर्नर ने जवाब देते हुए कहा, शाम के सुल्तान आपसे मुलाकात करना चाहते हैं। वो शख्स फौरन एक तरफ हट गया। सुल्तान खामोशी से अंदर दाखिल हुए। वो हर चीज को गौर से देख रहे थे। कमरा सादा था।
Speaker A
चंद किताबें तरतीब से रखी हुई थी। एक तरफ जाए नमाजें मौजूद थी। रहल पर कुरान मजीद रखा था। फजा में खुशबू फैली [संगीत] हुई थी। जाहिरी तौर पर हर चीज एक इबादत गुजार इंसान के घर जैसी दिखाई देती थी। ऐसा मंजर
Speaker A
जो किसी भी आने वाले के दिल से हर शक निकाल दे। लेकिन फिर सुल्तान की नजर उन दोनों आदमियों के चेहरों पर पड़ी और इसी लम्हे उनके दिल में एक झटका सा महसूस हुआ। वही रंगत, वही आंखें, वही चेहरे। यह
Speaker A
बिल्कुल वही लोग थे जिन्हें वह ख्वाब में बार-बार देख चुके थे। अब उन्हें कोई शक नहीं रहा था। खामोशी को तोड़ते हुए सुल्तान ने पूछा, "तुम इतने दूर से आए हो और इतने सारे घरों में से यही घर क्यों
Speaker A
चुना? पहला आदमी मुस्कुरा दिया। या सुल्तान जो शख्स रसूल अल्लाह से मोहब्बत करता हो वो उनके करीब क्यों ना रहे?
Speaker A
[संगीत] हम यहां इबादत और जियारत के लिए आए हैं। जवाब निहायत पुरसुकून था। इतना पुरसुकून कि आम आदमी फौरन मुतमाइन हो जाता। इसी दौरान गवर्नर भी गुफ्तगू में शामिल हो गया। उसे यकीन था कि कोई गलतफहमी जरूर हुई
Speaker A
है। उसने अर्ज किया या सुल्तान मैं इन लोगों को पिछले 6 महीनों से देखता आ रहा हूं। इन्होंने कोई गलत काम नहीं किया। यह लोग तो वली अल्लाह है। गवर्नर की बातों में इखलास था क्योंकि पूरा मदीना उन्हीं बातों पर यकीन कर चुका था। इधर खबर
Speaker A
आहिस्ता-आहिस्ता बाहर फैलने लगी। [संगीत] चंद लोग जमा हुए। फिर मजीद लोग आने लगे। गली में सरगोशियां शुरू हो गई। लोग हैरान थे कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि शाम का सुल्तान खुद उन दो इबादत गुजार मुसाफिरों के घर पहुंच गया है। सुल्तान नूरुद्दीन ने
Speaker A
कमरे का एक बार फिर बगौर जायजा लिया। फिर अचानक उनकी निगाह फर्श के एक हिस्से पर ठहर गई। उन्होंने मजबूत लहजे में कहा, कालीन हटाओ। जरूर या सुल्तान यह बस फर्श है। यह पानी का एक पुराना तहखाना है और कुछ नहीं।
Speaker A
सुल्तान ने किसी वजाहत का इंतजार नहीं किया और अपने मुहाफिजों को इशारा किया। यह तख्ते अभी उठाओ। मुहाफिजों ने लकड़ी के तख्ते हटाने शुरू किए। अचानक एक मुहाफिज का हाथ जमीन के अंदर चला गया। या सुल्तान यह नीचे तक जाता है। यह एक सुरंग है।
Speaker A
एक ऐसी सुरंग जिस पर छ महीने काम किया गया था। हर रात वो चंद फुट और करीब पहुंचते रहे थे। पैमाइश के मुताबिक वो आखिरी पत्थर तोड़ने से सिर्फ एक रात दूर थे। सिर्फ चंद [संगीत] फुट। अगर सुल्तान नूरुद्दीन एक
Speaker A
दिन भी देर से आते तो सुरंग अपनी मंजिल तक पहुंच चुकी होती और फिर तारीख आंसुओं से लिखी जाती। सुल्तान ने उन दोनों की तरफ देखा। अब उनके चेहरों से सारी नेकी गायब हो चुकी थी। [संगीत] तुम्हें किसने भेजा? मगरिब का कोई मुसाफिर
Speaker A
रसूल अल्लाह के कदमों के नीचे खुदाई नहीं करता। सच बताओ वरना यह जमीन तुम्हारी आखिरी गवाह बनेगी। पहले दोनों खामोश रहे। फिर उनमें से एक का हौसला टूट गया। हमें हमें भेजा गया था। मराकिश से नहीं। इस्लामी सर जमीनों से
Speaker A
नहीं। सलीबियों ने हमें भेजा था। हमें सालों तक तरबियत दी गई। जबान सिखाई गई, नमाज सिखाई गई। हमें यहां भेजा गया ताकि ताकि हम उन्हें यहां से ले जाएं ताकि दुनिया मदीना आना छोड़ दे। कमरे में मुकम्मल खामोशी छा गई। वो छ महीनों से
Speaker A
खुदाई कर रहे थे। जब सुल्तान के माहिरीन ने सुरंग को नापा तो उन्हें एक ऐसी हकीकत मालूम हुई जिसने सबका खून जमा [संगीत] दिया। वो सिर्फ 3 फुट दूर थे। सिर्फ 3 फुट। एक रात की मजीद खुदाई और मुकद्दस
Speaker A
हुजरे तक रास्ता खुल जाता। अगली सुबह दोनों आदमियों को मदीना के लोगों के सामने मस्जिद नबवी के करीब लाया गया। पूरा शहर जमा था। वही लोग जो कल तक उन्हें वली समझते थे। वही लोग जो उनकी तारीफें करते
Speaker A
थे। अब सबके चेहरों पर हैरत और खौफ था और फिर उन्हें सजा-ए मौत दी गई। आखिरकार उन्होंने अपने जुर्म की पूरी कीमत चुका [संगीत] दी। पूरे शहर ने यह मंजर अपनी आंखों से देखा। मुजरिम खत्म हो चुके थे।
Speaker A
लेकिन एक सवाल अब भी बाकी था। क्या हो अगर 10 साल बाद कोई दोबारा कोशिश करे? क्या हो अगर 50 साल [संगीत] बाद या 100 साल बाद?
Speaker A
क्या हो अगर कोई दूसरी सुरंग खोदी जाए? सुल्तान नूरुद्दीन इस बात को यकीनी बनाए बगैर मदीना नहीं छोड़ सकते थे कि ऐसा दोबारा कभी ना हो। उन्होंने बेहतरीन मेमारों और माहिरीन तामीरात को मदीना बुलाया। उनका हुक्म [संगीत] बिल्कुल वाज़
Speaker A
था। रूजा-ए-अकदस के गिर्द एक ऐसी रुकावट बनाओ जिसे [संगीत] कोई सुरंग कभी पार ना कर सके। पूरे मुकद्दस हिस्से के गिर्द एक गहरी खंदक खोदी गई। इतनी गहरी कि जमीन के अंदर पानी की सतह तक पहुंच गई। फिर उसमें
Speaker A
टन्नों के हिसाब से पिघला हुआ सीसा डाला गया। जब वो ठंडा हुआ तो जमीन के अंदर नबी अलह सलातो [संगीत] व्सलाम के रोजा मुबारक के चारों तरफ एक मजबूत धाती दीवार बन चुकी थी। मुस्तकिल [संगीत] नाकाबिल शिकस्त। 900
Speaker A
साल गुजर चुके हैं। और वह शीशे की दीवार जो सुल्तान नूरुद्दीन महमूद जंगी ने बनवाई थी, आज भी मदीना की जमीन के नीचे मौजूद है। मुझे वाकई उम्मीद है कि यह कहानी आपके दिलों तक बिल्कुल वैसे ही पहुंची होगी
Speaker A
जैसे उसे पहुंचना चाहिए था। सुल्तान नूरुद्दीन महमूद [संगीत] जंगी का नाम आज भी इसी वजह से याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने सिर्फ एक सल्तनत की नहीं बल्कि मोहब्बत रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के तकाजे को पूरा करने की कोशिश की और शायद
Speaker A
इसीलिए सदियों बाद भी उनका यह किरदार तारीख के रोशन सफात में महफूज़ है। अगर आपने इस दास्तान में कोई ऐसी बात सुनी है जो आप पहले नहीं जानते थे तो उसे दूसरों तक भी जरूर पहुंचाइए। [संगीत] हो सकता है आपके एक शेर की वजह से कोई और
Speaker A
शख्स भी इस हैरतंगेज तारीखी वाक्य से वाकिफ हो जाए। जजाकुम्लाह खैरा
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