प्रवक्ता ने आदम (अ.स) के बाद ज़मीन पर हुए घटनाक्रम और पैगंबर शीश (अ.स) की कहानी विस्तार से बताई।
Key Takeaways
- पहला इंसानी खून काबील और हाबील के बीच बहा था।
- शीश (अ.स) इंसानियत के लिए अल्लाह का तोहफा और नबी थे।
- काबील की नस्ल ने दुनिया में बगावत और ग़लत राह पकड़ी।
- आदम (अ.स) ने अपने बेटे शीश (अ.स) को नबी चुना और ज्ञान सौंपा।
- इंसानियत की असली जंग हक और बातिल के बीच थी।
What the video covers
- आदम (अ.स) के बाद ज़मीन पर इंसानी जीवन की शुरुआत और संघर्षों का वर्णन।
- काबील और हाबील के बीच पहला इंसानी खून बहने की घटना।
- पैगंबर शीश (अ.स) का जन्म और उनका विशेष महत्व।
- शीश (अ.स) की नबूवत, ज्ञान और कायनात के रहस्यों का उद्घाटन।
- काबील की नस्ल और शीश की नस्ल के बीच संघर्ष और अलगाव।
- आदम (अ.स) की अंतिम वसीयत और भविष्य की चेतावनियाँ।
- कायनात के माहौल, इंसानी ताकतों और जंगली दरिंदों का विवरण।
- इब्लीस के फरेब और इंसानियत पर उसका प्रभाव।
- शीश (अ.स) के नेतृत्व में इंसानियत के लिए पहली ढाल और तलवार।
- आदम (अ.स) की मृत्यु और इंसानी इतिहास में पहला अंत्येष्टि संस्कार।
Chapters
- 00:00काबील और हाबील का संघर्ष और पहला इंसानी खून
- 02:11कायनात का माहौल और इंसानी ताकतों का वर्णन
- 02:54काबील की बगावत और इंसानियत पर उसका प्रभाव
- 04:18पैगंबर शीश (अ.स) का जन्म और उनका महत्व
- 05:47शीश (अ.स) की नबूवत और ज्ञान
- 07:11आदम (अ.स) की चेतावनियाँ और इब्लीस का फरेब
- 08:39काबील और शीश की नस्लों का संघर्ष
- 09:59आदम (अ.स) की अंतिम वसीयत और मृत्यु
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Speaker A
मैं तुझे इस जमीन पर जिंदा नहीं छोड़ूंगा। हबील, तेरा रब तेरी कुर्बानी कबूल कर सकता है। लेकिन तुझे मेरे कहर से नहीं बचा सकता। अगर तू मुझे कत्ल करने के लिए अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाएगा, तब भी मैं तुझे कत्ल
Speaker A
करने के लिए अपना हाथ तेरी तरफ नहीं बढ़ाऊंगा। क्योंकि मैं अल्लाह से डरता हूं जो तमाम जहानों का रब है। तसवुर कीजिए एक ऐसी वीरान और बेरहम दुनिया का जहां इंसान के कदमों तले जमीन कांपती थी। कद 70 मीटर बुलंद थे। हड्डियां चट्टान
Speaker A
जैसी फौलादी और उम्र हजार साल पर मुहीद। यह दकामत इंसानों का वो खौफनाक दौर था जहां कमजोर के लिए कोई जगह नहीं थी। जहां सिर्फ वही जिंदा बचता था जिसके बाजुओं में पहाड़ों को चीर देने वाली ताकत हो। लेकिन
Speaker A
इस कदीम दौर की सबसे बड़ी सच्चाई वो नहीं जो तारीख के ओराक में गुम हो गई। बल्कि वो राज है जो आज भी लुबनान की वादी बका में 70 मीटर लंबी एक पुरसरार कब्र की सूरत में खामोश खड़ा है। आम इंसान की कब्र से 35
Speaker A
गुना बड़ी यह कब्र सदियों से इंसानी अकल को झुंझोड़ रही है। कि आखिर इस जमीन पर चलने वाले वो कौन से देव हैकल वजूद थे जिनके निशानात वक्त की गर्दिश भी ना मिटा सकी। उस वक्त कायनात का माहौल बिल्कुल अलग
Speaker A
था। फजा का दबाव मुख्तलिफ था। मकनाती सी लहरें अपने उरूज पर थी और जमीन पर चलने वाले पहले इंसानों का खून और जीनियाती साख्त इतनी खालिस थी कि जिस्म अपनी पूरी हैबत के साथ परवान चढ़ते थे। वो पहाड़ों
Speaker A
की सख्त चट्टानों से टकराते। जंगली दरिंदों से नबरद आजमा होते और उनके जिस्म फौलाद बन जाते और फिर इंसानी तारीख के इसी खूनखार मोड़ पर जमीन पर पैदा होने वाला सबसे पहला पैगंबर जाहिर हुआ। शीस अलहसलाम वो सिर्फ एक हादी नहीं थे। वो कायनात के
Speaker A
मखफी उलूम और कीमियागरी के पहले उस्ताद थे। वो आग और तपिश के दरमियान धातों [संगीत] की जबान समझते थे। सोने को चांदी से अलग करने का राज जानते थे। और उन्होंने इंसानियत के दफा के लिए तारीख की पहली ढाल
Speaker A
और तलवार तैयार की। [संगीत] लेकिन उनकी असल हैबत उनके हथियारों में नहीं थी। उनकी ताकत वो लुदनी इल्म था जो सीना बसीना कायनात के [संगीत] राज खोलता था। वो गैब की सरगोशियां सुन सकते थे। फरिश्तों से हम कलाम होते थे और उनकी
Speaker A
पेशानी पर वो नूर मोहम्मददी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दमक रहा था जिसने तारीख जमानों को रोशन करना था। मगर इस नूर के बिल्कुल सामने नीचे मैदानों में एक अंधेरा जन्म ले चुका था। काबिल की सरकश और बदकार कौम जो जिना अय्याशी और गफलत के दलदल में
Speaker A
तमाम हदें पार कर चुकी थी। लेकिन यह सारा खेल शुरू कहां से हुआ था? इसके पीछे एक ऐसा आलमिया था जिसने आसमान को भी रुला दिया था। आदम अल सलाम और अम्मा हव्वा की हर विलादत में जुआ बच्चे पैदा होते थे।
Speaker A
लेकिन जब काबील ने अपने नफ्स की प्यास में आकर अल्लाह के हुक्म से बगावत की तो हसद ने उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी। वो अपनी खूबसूरत जुड़वा बहन को हाबील के सुपुर्द नहीं करना चाहता था। और फिर तन्हाई के एक
Speaker A
सुनसान गोशे में काबील ने वो कर डाला जिसका तसवुर भी उस वक्त तक कायनात में ना था। उसने अपने सगे भाई हाबील पर वार किया और जमीन पर पहला इंसानी खून बहा दिया। भाई की लाश और अपने गुनाह की हौलनाकी देखकर
Speaker A
काबिल खौफ से कांप उठा और अपने बाप की नजरों से बचने के लिए दूरदराज की वादियों में फरार हो गया। इधर आदम अल सलाम और अम्मा हव्वा के आंसू बरसों तक ना थमे। जमीन पर हर तरफ दुख और मातम [संगीत] का
Speaker A
सुकूत था। और तब मायूसी के उस घुप अंधेरे में अल्लाह की रहमत का वो तोहफा उतरा जिसने तारीख का [संगीत] रुख मोड़ दिया। अम्मा हव्वा दोबारा उम्मीद से हुई लेकिन इस बार सदियों का निजाम टूट गया। कोई जुड़वा बच्चे पैदा नहीं हुए। फकत एक अकेला
Speaker A
बेटा [संगीत] इस दुनिया में आया। यह तन्हा विलादत कायनात का ऐलान थी कि यह बच्चा आम इंसानों जैसा नहीं है। जब आदम अल सलाम ने इस मासूम को अपने कांपते हाथों [संगीत] में उठाया तो बरसों का जख्म एकदम भर गया।
Speaker A
सीने में ठंडक उतर आई। वही के जरिए बताया गया कि यह हाबल का नेमुल बदल है और नाम रखा गया शीश यानी अल्लाह का तोहफा। इस रात मां के माथे से वो नूर नबूवत जुदा हुआ और नन्हे शीस की पेशानी पर सूरज बनकर चमक
Speaker A
उठा। यह इस अहद का आगाज था जहां से हक और बाततिल की असल जंग लड़ी जानी थी। आदम अली सलाम के 40 बच्चे इस जमीन पर मौजूद थे। हर एक ताकतवर, बहादुर और अपनी जगह बेमिसाल। लेकिन उन सबके दरमियान शीश अल सलाम का
Speaker A
वजूद कुछ ऐसा था जिसे अल्फाज़ में बयान नहीं किया जा सकता था। उनका चेहरा अपने वालिद के चेहरे का हूबहू अक्स था। एक ऐसा अक्स जो जन्नत की तखलीक की एक झलक थी। आदम अली सलाम की दाढ़ी नहीं थी क्योंकि उनकी
Speaker A
तखलीक जन्नत में हुई थी। मगर जमीन पर पैदा होने वाले पहले इंसान जिनके चेहरे पर दाढ़ी का वकार नमूदार हुआ वो शीस अल सलाम थे। यह महज एक जिस्मानी फर्क नहीं था बल्कि यह इस कठिन जमीनी जिंदगी, पुख्तगी
Speaker A
और एक नए अहद की अलामत था। जहां दूसरे बोलते थे, वहां शीश अल सलाम सुनते थे। जहां दुनिया की हवस दिलों को खींचती वो ईसार करते। जब गुस्सा भड़कता तो वह ठंडी [संगीत] हवा बन जाते। और जब वो सजदे में
Speaker A
गिरते तो पूरा वजूद रब के हुजूर फना [संगीत] कर देते। आदम अली सलाम ने अपनी बसीरत से देख लिया था कि नबूवत का अगला वारिस कौन है। उन्होंने एक दिन शीश को तन्हाई में बुलाया और एक ऐसा बोझ उनके
Speaker A
कांधों पर रख दिया जिसका वजन पहाड़ भी नहीं उठा सकते थे। ए मेरे बेटे यह इलाही अमानत अब तुम्हारे सुपुर्द [संगीत] है। अल्लाह ने तुम्हें अपना नबी चुन लिया है। इस फैसले के बाद तारीख रातों में सितारों की छांव तले एक बाप और बेटे के दरमियान
Speaker A
तारीख की सबसे तवील और खामोश तरीन वसीयत का आगाज हुआ। यह कोई आम गुफ्तगू नहीं थी। यह जन्नत के अनदेखे मनाज़िर और कायनात के सरबस्तर राजों की मुंतकली थी। आदम अली सलाम अपने बेटे को उस जन्नत का एहवाल
Speaker A
सुनाते जहां वह खुद रहे थे। वहां के दरख्तों का नूर, वहां की अबदी खामोशी और बेपनाह सुकून। सुनते हुए शीश अल सलाम की आंखें नम हो जाती और आदम अली सलाम का लहजा मुधम पड़ जाता। क्योंकि जन्नत उनकी सबसे
Speaker A
खूबसूरत याद और दिल का गहरा [संगीत] तरीन जख्म थी। फिर आदम अली सलाम ने उस खुले दुश्मन से खबरदार किया जिसने कायनात [संगीत] को पहली बार उलझाया था। मेरे बच्चे इब्लीस के हरबों को पहचानना वह पहले वार नहीं करता। पहले वह कानों में मीठी
Speaker A
सरगोशी उतारता है और [संगीत] उसका वसवसा तलवार के घाव से ज्यादा जानलेवा होता है। और तुम्हारे भाई काबिल ने इसी सरगोशी पर सर झुका दिया था। [संगीत] तुम हर लम्हा अपने रब की पनाह में रहना। आदम अल सलाम ने
Speaker A
उन्हें कायनात का हर वो इल्म सौंप दिया जो इंसान के बस में था। सितारों की गर्दिश रात के मुख्तलिफ पहरों में फरिश्तों का नजूल तिब जरात तामीरात और आने वाले जमानों में नूह अल सलाम के उस अजीम तूफान की खबर
Speaker A
जो पूरी जमीन को गर्क करने वाला था। लेकिन इस इल्म के साथ-साथ उन्होंने जमीन पर एक अटल लकीर खींच दी। यह लकीर [संगीत] थी दो बिल्कुल मुख्तलिफ दुनियाओं के दरमियान। पहाड़ों के दामन से दूर सरसबज मैदानों और वादियों में काबील की नस्ल मुसलसल फैल रही
Speaker A
थी। काबिल ने अपनी नस्ल को ताकत और जमीन पर कब्जा करना तो सिखाया लेकिन वो उन्हें रब की पहचान, हया और आखिरत का खौफ ना सिखा सका। [संगीत] दूसरी तरफ पहाड़ों की बुलंद चोटियों पर शीस अल सलाम के गिर्द वो लोग जमा थे।
Speaker A
जिनकी जिंदगी पथरीली जमीन पर मशक्कत से कटती थी। मगर जिनके सीने तकवे और नूर से रोशन थे। आदम अली सलाम ने एक सख्त और नाकाबिले शिकस्त हुक्म जारी कर रखा था। हाबील की औलाद कभी काबिल की नस्ल से
Speaker A
रिश्ता नहीं जोड़ेगी। ना उनकी बस्तियों में कदम रखेगी। यह उसूल बजाहिर आसान था। लेकिन वक्त के साथ-साथ [संगीत] पहाड़ों पर जवान होने वाली नई नस्ल के दिलों में एक खतरनाक चिंगारी जन्म लेने लगी। तजस्सुस। नौजवान चुपके-चुपके एक दूसरे से सरगोशियां करने लगे।
Speaker A
आखिर नीचे वादियों में ऐसा क्या है? हम सिर्फ दूर से जाकर एक झलक देख क्यों नहीं सकते? क्या वो हमारे अपने खून के रिश्तेदार नहीं हैं? यह सवालात उस बंद दरवाजे की कुंडी हिला रहे थे जिसे आदम [संगीत]
Speaker A
अल सलाम ने मजबूती से बंद किया था और पहाड़ की ऊंट में छुपा हुआ इब्लीस इसी लम्हे की ताक में था। वो दरवाजा अब खुलने के करीब था। वक्त की रफ्तार धीमी हो चुकी थी और आदम अली सलाम की उम्र मुबारक का सूरज गुरूब होने के करीब था। सदियों के
Speaker A
बोझ ने उनके फौलादी जिस्म को निढाल कर दिया था। मगर दिल के अंदर अपने असल घर जन्नत की तड़प हर गुजरते दिन के साथ मजीद गहरी होती जा रही थी। एक दिन उन्होंने अपनी औलाद को पास बुलाया और धीमे लहजे में
Speaker A
फरमाया मेरे बच्चों मेरा दिल चाहता है कि मैं एक बार फिर जन्नत के फलों का जायका चखूं। बेटे उन फलों की तलाश में वादियों की तरफ निकले। मगर रास्ते में उनका सामना चंद पुरसरार अजनबियों से हुआ। यह कोई आम मुसाफिर नहीं
Speaker A
थे बल्कि इंसानी रूप में फरिश्ते थे जिनके हाथों में जन्नत के कफ़न और वहां की खुशबुएं महक रही थी। फरिश्तों ने नरमी से कहा पीछे पलट जाओ। तुम्हारे बाप का इस दुनिया में वक्त मुकम्मल हो चुका है। जब
Speaker A
वो वापस पहुंचे तो घर पर एक खामोश और पुरवकार सुकून छा चुका था। आदम अली सलाम ने फरिश्तों की आहट पाकर [संगीत] अपनी रफीक हयात अम्मा हव्वा से फरमाया मुझे मेरे रब के साथ अकेला छोड़ दो और फिर
Speaker A
वही हुआ जिसका हरजी रूह को सामना [संगीत] करना है। इंसानियत के पहले बाप की रूह मुबारक जिस्म के कफ से परवाज कर गई। रूहे जमीन पर पहली बार किसी इंसान की मौत हुई। पहली बार फरिश्तों ने अपने हाथों से गुसल
Speaker A
दिया। कफ़न पहनाया और तदवीन का तरीका सिखाया। और फिर फ
Speaker A
संभालने का लम्हा था। आदम अली सलाम के पर्दा फरमाने के बाद जमीन जैसे पहली बार सुनसान हो गई। बराहेरास्त वही लाने वाली हस्ती जा चुकी थी और अब जबानी रिवायत में तहरीफ का खतरा मुंडला रहा था। तब अल्लाह
Speaker A
ताला ने शे अल सलाम पर 50 सहीफे नाजिल फरमाए। यह तारीख की सबसे पहली तहरीरी वही थी। इसमें सिर्फ नमाज और तस्बीह का जिक्र ना था बल्कि [संगीत] एक पूरी रियासत चलाने, मुआशरती इंसाफ कायम करने और इंसानी तनाजियात को हल करने का एक मुकम्मल और
Speaker A
मुनजम निजाम दर्ज था। शीत अल सलाम ने ना सिर्फ उन सहीफों को पढ़ा बल्कि पहाड़ों की बस्ती में अदल का निफाज करके दिखाया। लेकिन दूसरी तरफ नीचे वादियों के अंधेरों में इब्लीस ने इंसानी तारीख का [संगीत] सबसे भयानक और सेहरंगेज जाल बुनना शुरू कर
Speaker A
दिया था। वो एक खूबसूरत बा एतमाद और पुरकशिश नौजवान का रूप धार कर काबिल की बस्ती में दाखिल हुआ। वो एक लोहार की दुकान पर गया और बोला मुझे अपना शागिर्द बना लो। वो दिन रात खामोशी से काम करता रहा। यहां तक कि उसने
Speaker A
सबका भरोसा जीत लिया और फिर एक शाम। उसने लोहे की एक नाली उठाई। उसमें सुराख किए और अपने होठों से लगाकर एक फूंक मारी। इस लम्हे फजा में एक ऐसी आवाज गूंजी जो इससे पहले कभी इंसानी कानों ने नहीं सुनी थी।
Speaker A
यह तारीख की पहली बांसुरी थी। पहला सुर और पहला मददोश को नगमा। वो आवाज सुनकर काम करते हाथ रुक गए। रास्ते चलते कदम जम गए और लोग शहरजदा होकर इस लोहार की दुकान के गिर्द जमा हो गए। इब्लीस ने धुनों [संगीत]
Speaker A
की रफ्तार तेज की, ताल बदली और लोगों के दिलों में एक अजीब सी बेचैनी और सुस्ती उतरने लगी। यह वो आवाज थी जो इंसान को अपने आप से, अपने फराय से और अपने रब की याद से गाफिल कर देती थी। इब्लीस जल्दी
Speaker A
में नहीं था। पहले उसने उन्हें इस आवाज का आदि बनाया। फिर उसने पहली महफिल ऐशो निशात सजा दी। लोग जमा होते, गाते, झूमते और हंसते। इबादतें छूटने लगी। तस्बीहात [संगीत] खामोश हो गई और दिलों पर एक गहरी धुंध छाने लगी। फिर एक रात पहाड़ों की
Speaker A
ऊंचाई पर जब हवाएं तेज हुई तो वादियों से उठने वाली वो पुरफरेब मौसी ऊपर चट्टानों तक पहुंच गई। पहाड़ के नौजवान हैरान रह गए। उनके कानों में गूंजने वाली यह नई आवाज उनके अंदर एक तूफान बरपा कर रही थी।
Speaker A
शीश अल सलाम की लगाई हुई हुदूद अपनी जगह कायम थी मगर दिलों में तजसुस का जहर फैल चुका था। चंद नौजवानों ने रात के अंधेरे में चुपके से कदम बढ़ाए। हम सिर्फ एक [संगीत] झलक देखकर वापस आ जाएंगे। हम कुछ नहीं करेंगे।
Speaker A
वो वादी के किनारे पहुंचे और चट्टान की ऊंट [संगीत] से नीचे झांका। नीचे का मंजर उनकी दुनिया से बिल्कुल अलग था। आग के बड़े-बड़े शोले जल रहे थे। सुर बिखर रहे थे और औरतें अपने जिस्मों को सजा संवार कर
Speaker A
बन [संगीत] ठन कर रक्स कर रही थी। यह जमीन पर तारीख का पहला बेपर्दा श्रृंगार था। पहला तबरुज। नौजवानों की आंखें फटी की फटी रह [संगीत] गई। वो पलटना चाहते थे मगर नजरें कदमों को खींच रही थी। उन्होंने आगे
Speaker A
कदम बढ़ा दिया। और सदियों से बंद वो ममनुआ दरवाजा हमेशा के लिए खुल गया। पहाड़ों के वो नौजवान शायद चंद लम्हों के बाद वापस ऊपर लौट आए। मगर जो गलीज और सहरंगेज तस्वीरें उनकी आंखों ने पी ली थी, वह
Speaker A
यादें उनके जेहनों और दिलो दिमाग से निकल नहीं रही थी। वो पहाड़ की पाकीजा फिजा में बैठकर नीचे के गुनाहों की दास्ताने सुनाने लगे। वहां कुछ ऐसा है जिसे लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता। उसे सिर्फ खुद देखकर ही महसूस किया जा
Speaker A
सकता है। तजसुस की यह आग [संगीत] एक वबा बनकर फैल गई। पहले हफ्ते चंद लड़के गए। दूसरे हफ्ते एक पूरा काफिला उतरा और तीसरे हफ्ते बंद टूट गया। नीचे वादी में इब्लीस अपने जाल के नए ताने-बाने बुन रहा था। और फिर इसी
Speaker A
तारीख वादी में उसने फलों के रस को सड़ाकर तारीख का पहला नशा तैयार करवाया। शराब। चार खौफनाक फितने एक [संगीत] साथ जमा हो चुके थे। गूंजती हुई मौसी, बेलगाम रक्स, बेपर्दा श्रृंगार [संगीत] और अकल को अंधा कर देने वाली शराब। इन
Speaker A
चारों ने मिलकर इंसान की हया, गैरत और कुतइरादी को राख का ढेर बना दिया। शीत अली सलाम ने जब अपने लोगों को इस दलदल में गिरते देखा, तो वह पहाड़ की तन्हा चोटी पर घुटनों के बल गिर पड़े और बेआज रो दिए। एक
Speaker A
पैगंबर का रोना कायनात को हिला देने वाला होता है। सबसे ज्यादा कर्बनाक बात यह थी कि नौजवान खुद अपने हाथों से इस आग में कूद रहे थे। उन्होंने गिड़गिड़ा कर दुआ की ऐ मेरे रब मेरी कौम इब्लीस के जाल में
Speaker A
तड़प रही है। उन्हें बखश दे और हमें इस फितने से बचा ले। मगर जब इंसान खुद गुनाह को अपना ओढ़ना बिछूना बना ले तो वापसी के रास्ते बंद हो जाते हैं। वक्त गुजरता रहा और मैदानों में बसने वाली काबिल [संगीत] की नस्ल इतनी बढ़
Speaker A
गई कि उनके अंदर फिरौनी तकुर ने जन्म ले लिया। वो सिर्फ अपने फसाद पर मुतमई ना थे। अब उनकी खूनखार नजरें [संगीत] ऊपर पहाड़ों पर जमी थी। वो पहाड़ी लोगों से शदीद नफरत करते थे। यह नफरत क्यों थी? क्योंकि पहाड़
Speaker A
के लोग अपने सादा लिबास, पाकीजा [संगीत] किरदार और सच्चे सजदों से एक शफाफ आईने की मानिन थे। और एक गुनाहगार और बदकार इंसान हमेशा इस आईने [संगीत] से नफरत करता है जो उसका भयानक और बिगड़ा हुआ चेहरा बेनकाब कर
Speaker A
दे। एक खौफनाक सुबह काबिल की सरकश नस्ल का एक लश्कर हथियार, लाठियां और तेजधार लोहे के टुकड़े लहराता हुआ पहाड़ की चट्टानों की तरफ बढ़ा। उनका इरादा दो टोक था। या तो पहाड़ के आबिदों को अपने जैसा गलीज बना
Speaker A
लेंगे या उनका नामोनिशान मिटा देंगे। जब शीस अल सलाम तक यह खबर पहुंची तो उनके चेहरे पर खौफ का कोई शायबा तक ना था। वो जानते थे कि जब बाततिल जबान और नसीहत के तमाम रास्ते बंद कर दे तो फिर हक का कलमा
Speaker A
फौलाद के जोर पर [संगीत] ही बुलंद रहता है। उन्होंने एक तारीख और बेबाक फैसला किया। शीत अल सलाम ने मियान से तलवार खींच ली। रिवायत बताती हैं कि वह इंसानी तारीख के सबसे पहले नबी थे जिन्होंने मैदान जंग
Speaker A
में तलवार उठाई। यह जमीन पर लड़ी जाने वाली पहली मुसल्ला और उसली जंग थी। अल्लाह के इज से शीत अल सलाम और उनकी मुट्ठी भर जमात ने हमलावरों के कदम उखाड़ दिए। काबिल के लश्कर को शिकस्ते फाश हुई और पहाड़ पर
Speaker A
वो इलाही अमानत हमेशा के लिए महफूज़ कर ली गई। मारका खत्म होने के बाद शीत अली सलाम ने तलवार रख दी और अपने जख्मियों की मरहम पट्टी में लग गए। इस रात पहाड़ की चोटी पर आग जलाई गई तो उन्होंने अपने लोगों के
Speaker A
गिर्द घेरा डालकर एक ऐसा जुमला फरमाया जो सदियों की तकदीर था। इस दिन को याद रखना अल्लाह की हिफाजत उसी वक्त उतरती है जब तुम अपने अज्म पर कायम रहते हो। जब तक तुम इस पहाड़ पर रहोगे और इस अमानत
Speaker A
को सीने से लगाए रखोगे खुदा तुम्हारा निगहबान रहेगा। लेकिन पहाड़ के इस सन्नाटे में शीस अल सलाम का दिल जानता था कि उनकी अपनी सांसों का चिराग अब आखिरी टिमटिमाहट पर था। 912 साल जरा इस दौरानिए पर गौर कीजिए। आज का
Speaker A
इंसान 70 80 या बम मुश्किल 100 [संगीत] साल जीता है। मगर शीत अली सलाम ने इससे 10 गुना तवील जिंदगी इस कायनात में गुजारी। उन्होंने अपनी आंखों के सामने नस्लों को जन्म लेते, फैलते, भटकते और मिटते देखा। इस तवील तरीन हयात की एक-एक सांस उन्होंने
Speaker A
अपनी जात बनाने के लिए नहीं बल्कि अपने कांधों पर रखी सच्चाई की इमारत को कायम [संगीत] रखने के लिए खर्च किया। मगर अब वह जिस्म जिसने सदियों के तूफान बर्दाश्त किए थे झुकने लगा था। कदम धीमे हो चुके थे।
Speaker A
आवाज धीमी पड़ गई थी। और एक सुबह बेदार होते ही उनके दिल में वही मानूस एहसास उतरा जिसने सदियों पहले आदम अली सलाम को खबरदार किया था। अब रब से मुलाकात का वक्त करीब है। उन्होंने अपनी औलाद को तलब किया।
Speaker A
मगर सबको नहीं सिर्फ अनुश को। नबूवत का बोझ हुजूम के हवाले नहीं किया जाता। यह सिर्फ एक मुंतखब और पाकीजा दिल के सुपुर्द होता है। अनुूष अपने वालिद के पहलू में बैठे तो 912 साल से मुसलसल जलने वाले नूर
Speaker A
की चमक उस मोहम्मद पैगंबर की आंखों में अब भी वैसे ही रोशन थी। शीत अल सलाम ने अपने लरसते मगर पुरवकार लहजे में वसीयत फरमाई। ए मेरे बेटे जो कुछ आदम अलहसलाम ने मेरे सुपुर्द किया था वो आज मैं तुम्हारे हवाले कर रहा हूं।
Speaker A
इन सहीफों की हिफाजत करना। इन तालीमात को सीने से लगाए रखना। और याद रखना कभी काबिल की नस्ल से घुलमिल मत जाना। क्योंकि बाततिल के साथ वो मिलाप हक के वजूद का खात्मा बन जाएगा। अनुष की आंखों से आंसू बह निकले मगर शीत अल सलाम
Speaker A
का चेहरा [संगीत] पुरसुकून था। जो मौत को सच्चाई के साथ जान लेता है, वह इससे खौफजदा नहीं होता बल्कि उसका इस्तकबाल करता है। उन्होंने आदम अली सलाम से मिले हुए सहीफे और अपने ऊपर नाजिल होने वाले 50 सहीफे अनूश के हवाले किए और उनके कान में
Speaker A
वो पोशीदा हकीकतें कायनात के पोशीदा राज और रब के अस्मा-ए आजम सरगोशी कर दिए जो सिर्फ अंबिया के सीनों में अमानत होते हैं। फिर वो आखिरी बार अपनी कौम के सामने आए और पुकार कर फरमाया। "ऐ लोगों मैं जा रहा हूं मगर जो देकर जा
Speaker A
रहा हूं वो हमेशा बाकी रहेगा।" जो मुझे मिला, वो मैंने तुम्हें सौंप [संगीत] दिया। अब यह तुम्हारा फर्ज है कि इसे अपनी औलादों के दिलों में मुंतकिल करो। इस नूरानी जंजीर को कभी टूटने मत देना। क्योंकि जब यह सिलसिला टूटता है तो इंसान
Speaker A
अंधेरों में भटक जाता है और अंधेरे का मुसाफिर हर चमकती हुई आग को रोशनी समझकर उसकी तरफ दौड़ता है। हर गुनाह कुफ्र का दरवाजा खोल सकता है। गुनाहों से बचकर अपने ईमान की हिफाजत करो। और अगर कभी पांव फिसल जाए तो फौरन तौबा की
Speaker A
तरफ लौटो और उसके बाद सदका और इबादत को अपना ढाल बना लो। अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। और फिर कायनात के इस अजीम पैगंबर ने अपनी आखिरी सांस ली। पहाड़ों पर एक गहरा मातम फैल गया। मगर इस गम के साथ-साथ एक गैर
Speaker A
मामूली सुकून भी था। क्योंकि वह जो मशल जला कर गए थे वह बुझने वाली नहीं थी। रिवायत के मुताबिक अनुष ने उन्हें मक्का में कोहे अबू कुबीज के दामन में उनके वालदैन के पहलू में सुपुरदे [संगीत] खाक किया। और फिर इनके बाद अनुश नबी बने। फिर
Speaker A
किनान फिर महलाईल और फिर यारत तशरीफ लाए। हक नहीं बदला। सिर्फ सुनाने वाली आवाजें बदलती रही। और फिर इस सिलसिले का वो दरखशा सितारा नमूदार हुआ जिसे दुनिया इदरीस अल सलाम के नाम से जानती है। वो नबी जिन्होंने शीत अल सलाम के दिए हुए इल्म
Speaker A
तहरीर को कमाल बख्शा और आसमानों के राजों को मजीद गहराई से खोला। इदरीस अल सलाम पर हमारी तफसीली वीडियो उस वक्त सामने आएगी जब इस वीडियो पर 5000 लाइक्स मुकम्मल होंगे और अगर आप चैनल को सब्सक्राइब कर लेंगे तो अगली दास्तान आपसे कभी छूट नहीं
Speaker A
पाएगी। आज हजारों साल गुजर चुके हैं। दुनिया का नक्शा बदल गया, जुबाने बदल गई, शहर बदल गए। लेकिन इब्लीस के हरबे और इंसान के नफ्स की कमजोरियां आज भी वही हैं। शीत अल सलाम का यह वाकया माजी का कोई
Speaker A
अफसाना नहीं बल्कि आज के इंसान के लिए भी इसमें सबक है। सबसे बड़ा खतरा हमेशा अंदर से जन्म लेता है। काबिल के लश्करों ने पहले दिन पहाड़ पर चढ़ाई नहीं की थी। पहले साज की दिलफरेब आवाज उतरी, फिर आंखों का
Speaker A
तजस्सुस जागा और फिर हया की लकीरें धुंधला गई। ईमान किसी एक बड़े हमले से नहीं लुटा। यह छोटी-छोटी रियायतों और समझौतों से आहिस्ता-आहिस्ता रुखसत होता है। और किसी का चुना जाना कोई आसाइश नहीं। एक भारी जिम्मेदारी है। शीत अल सलाम नबी बने तो
Speaker A
उनकी जिंदगी [संगीत] फूलों की सहज नहीं बनी बल्कि 900 साल का एक ना खत्म होने वाला इम्तिहान बन गई। आपको भी जिंदगी [संगीत] में किसी ना किसी मकसद, रिश्ते या शूर के लिए चुना गया है। खुद से पूछिए कि
Speaker A
आप इस [संगीत] चुनाव का हक कैसे अदा कर रहे हैं? यह नूरानी सिलसिला आदम अल सलाम से चला। शीत अल सलाम ने इसे संभाला। इदरीस अल सलाम ने परवान चढ़ाया। नूह अल सलाम ने तूफानों से गुजारा। इब्राहिम अल सलाम ने
Speaker A
निखारा और बिल आखिर हमारे नबी हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम पर लाकर मुकम्मल कर दिया गया। वक्त चेहरे और जुबाने बदल गई मगर आसमान की आवाज आज भी वही है। खुदा एक है। जवाबदेही बरहक है और अबदी जिंदगी के लिए तैयारी करो। [संगीत]
Speaker A
अगर यह अल्फाज आज आपकी रूह तक पहुंच रहे हैं तो याद रखिए कि आप भी इसी सिलसिले की एक कड़ी हैं। इस कड़ी को कभी अपने हाथ से टूटने मत दीजिएगा। जजाकुम्ला खैरा।
Topics:आदम अलैहिस्सलामपैगंबर शीशकाबील और हाबीलइंसानी इतिहासनबूवतइब्लीसकायनात के राजहिंदू धर्मइस्लामिक इतिहासदास्तान-ए-कामिल











