खालिद बिन वलीद की जंग और इस्लाम में उनके योगदान की प्रेरणादायक दास्तान।
Key Takeaways
- खालिद बिन वलीद ने इस्लाम के खिलाफ लड़ाई से इस्लाम के सबसे बड़े सिपह सालारों में से एक बनने का सफर तय किया।
- उनकी तलवार और रणनीति ने इस्लाम के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ लाया।
- मक्का के सामाजिक और राजनीतिक माहौल ने उनके जीवन और फैसलों को प्रभावित किया।
- मुसलमानों के लिए मदीना में स्थापित फिया प्रणाली ने कैदियों की आजादी को न्यायसंगत बनाया।
- खालिद बिन वलीद की कहानी इस्लाम में परिवर्तन और समर्पण का प्रतीक है।
What the video covers
- खालिद बिन वलीद का बचपन और बनू मखजूम खानदान में उनकी परवरिश।
- उनके पिता वलीद बिन मुगैरा की दौलत और मक्का में उनकी सामाजिक स्थिति।
- खालिद बिन वलीद का इस्लाम से पहले मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई करना।
- रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम द्वारा खालिद को अल्लाह की तलवार बताया जाना।
- मक्का में इस्लाम की शुरुआत, मुसलमानों पर दबाव और वलीद बिन मुगैरा की आंतरिक जद्दोजहद।
- मुसलमानों की मक्का से हिजरत और मदीना में इस्लामी रियासत की स्थापना।
- खालिद बिन वलीद का मक्का लौटना और बदला लेने की आग के साथ मदीना जाना।
- मुसलमानों के कैदियों के लिए मदीना में लागू किए गए फिया का सिस्टम।
- खालिद बिन वलीद का इस्लाम कबूल करना और मुसलमानों के लिए एक महान सिपह सालार बनना।
- उनकी बहादुरी, नौ तलवारें टूटने के बावजूद हौसला न टूटना और इस्लाम की हिफाजत में उनका योगदान।
Chapters
- 00:00खालिद बिन वलीद का परिचय और निशाने की कला
- 01:32खालिद की तलवार को रसूल्लाह का सम्मान
- 02:55वलीद बिन मुगैरा और बनू मखजूम की ताकत
- 04:17मक्का में इस्लाम की शुरुआत और सामाजिक बदलाव
- 05:41वलीद बिन मुगैरा की आंतरिक जद्दोजहद
- 06:42मुसलमानों पर दबाव और कुरान का जवाब
- 08:03खालिद बिन वलीद का मक्का लौटना और बदलता माहौल
- 09:08मुसलमान कैदियों के लिए फिया प्रणाली
- 11:29खालिद बिन वलीद का इस्लाम कबूलना और नेतृत्व
- 12:36खालिद बिन वलीद की बहादुरी और इस्लामी इतिहास में योगदान
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Speaker A
क्या बेहतरीन निशाना है। वल्लाह, इतने तेज रफ्तार घोड़े पर से भी तीर सीधा निशाने के मरकज में जा लगा। यह सिर्फ निशाना नहीं है। यह बनू मखजूम के खालिद का कमाल है। जिसके हाथ में तीर हो या तलवार,
Speaker A
वो मैदान का नक्शा बदल देता है। इस्लाम की पूरी तारीख में एक ऐसा जंगजू भी गुजरा है जिसने इस्लाम के खिलाफ तलवार उठाई थी। मुसलमानों के खिलाफ मैदान जंग में सफें उजाड़ दी थी और जिसका नाम सुनकर मुसलमान अपने घोड़ों की लगाम मजबूत कर लेते
Speaker A
थे। मगर हैरत की बात यह है कि कुछ ही अरसे बाद यही जंगजू इस्लाम का ऐसा सिपह सालार बना कि जिसके नाम से दुश्मनों के लश्कर कांपने लगे। वो सिपह सालार जिसके हाथ में एक नहीं, दो नहीं बल्कि नौ तलवारें टूट
Speaker A
गईं। मगर जिसका हौसला एक लम्हे के लिए भी नहीं टूटा। एक ऐसा शख्स जो मैदान-जंग में दुश्मन की तादाद नहीं बल्कि सिर्फ फतह का रास्ता देखता था। ऐ खालिद, मक्का वाले बुरी तरह हार रहे हैं और तुम यहां खड़े तमाशा
Speaker A
देख रहे हो। तुम कब हमला करोगे? जब तक ये लोग यहां से नहीं हटते, हम कुछ नहीं कर सकते। मैं यहीं इनके हटने का इंतजार कर रहा हूं। लेकिन सबसे हैरानक बात यह है कि जिस इंसान ने इस्लाम के खिलाफ तलवार उठाई थी, उसी के
Speaker A
बारे में रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया यह अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार है। आखिर वो कौन सा लम्हा था जिसने उस शख्स की पूरी जिंदगी का रुख बदल दिया और वो कौन सा सफर था जिसके बाद
Speaker A
मक्का का वो जंगजू मदीना की तरफ रवाना हुआ ताकि रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हाथ पर इस्लाम कबूल करें। यह सिर्फ एक जंगजू की दास्तान नहीं, यह एक ऐसे इंसान की दास्तान है जिसने अपनी तलवार को इस्लाम की हिफाजत
Speaker A
के लिए वक्फ कर दिया। हजरत खालिद बिन वलीद रज्लाहु अनो और इनकी यह हैरानक दास्तान शुरू होती है सातवीं सदी के मक्का से। एक ऐसा शहर जहां ताकत सिर्फ तलवार से नहीं नापी जाती थी। यहां खानदान की ताकत, दौलत, तजारत, इज्जत और जंगी महारत इंसान की
Speaker A
हैसियत तय करती थी। और इसी मक्का में एक ऐसा बच्चा पैदा हुआ जो आगे चलकर तारीख का रुख बदलने वाला था। उस बच्चे का ताल्लुक मक्का के ताकतवर तरीन कबाइल में से एक बनू मखजूम से था। और उसके
Speaker A
वालिद थे वलीद बिन मुगैरा। वलीद बिन मुगैरा सिर्फ एक दौलतमंद शख्स नहीं थे। वो पूरे अरब के अमीर तरीन लोगों में शुमार होते थे। वलीद बिन मुगैरा की दौलत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि काबा की खिदमत और देखभाल के लिए
Speaker A
पूरा मक्का जितना माल जमा करता था, उतना माल अकेले वलीद बिन मुगैरा दिया करते थे। लेकिन उनके खानदान की असल ताकत सिर्फ दौलत नहीं थी। यह वो खानदान था जिसके जिम्मे मक्का की हिफाजत और जंगी मामलात की बड़ी
Speaker A
जिम्मेदारियां थी। इस कबीले के नौजवानों को बचपन ही से जंग के फन से आशना किया जाता था और उनकी एक खास महारत थी जंगी घोड़ों की तरबियत। वो जंगली घोड़ों को काबू करते, उन्हें तरबियत देते और फिर उन्हें
Speaker A
मैदान-जंग के लिए तैयार करते। खालिद बिन वलीद रज़िल्लाहु अनो ने भी बचपन से घोड़ों को बहुत करीब से देखा। उन्होंने उनकी ताकत को समझा। उनकी रफ्तार को महसूस किया और सबसे बढ़कर यह सीखा कि एक तरबियत याफ्ता घोड़ा मैदान जंग में किस
Speaker A
तरह पूरी फौज की तकदीर बदल सकता है। खालिद बिन वलीद रजिला अनो अपनी जिंदगी में बारह बार अरब से बाहर रूमी सल्तनत के इलाकों की तरफ भी जाते रहे। वहां पहुंचकर जब वह रूमों के बड़े-बड़े शहर देखते, उनकी
Speaker A
बुलंदोबाला इमारतें देखते, उनकी तहजीब, ताकत और शानो-शौकत देखते तो हैरान रह जाते। उस वक्त शायद खालिद बिन वलीद रजिला अनो ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वही रूमी सल्तनत जिसकी अजमत उन्हें आज हैरान कर रही है,
Speaker A
इसी खालिद बिन वलीद रजिला अनो के नाम से खौफ महसूस करेगी। लेकिन अभी वह वक्त बहुत दूर था। इसी दौरान मक्का की एक खामोश पहाड़ी पर मौजूद एक छोटे से गार में अल्लाह ताला ने अपने आखिरी नबी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नबूवत अता फरमाई और यहां
Speaker A
से दुनिया की तारीख का एक नया बाप शुरू हो गया। रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का में आहिस्ता-आहिस्ता इस्लाम की दावत देना शुरू की। शुरू में मक्का के वो लोग जो दुनियावी एतबार से कमजोर थे, गरीब थे, जिनके पास ना बड़ी
Speaker A
दौलत थी, ना कबायली ताकत, वो इस्लाम की तरफ आने लगे। लेकिन मक्का के ताकतवर लोग इस नई दावत को अपने लिए खतरा समझने लगे। और उन्हीं ताकतवर लोगों में एक नाम ऐसा भी था जिसे शायद कोई तस्सवुर
Speaker A
भी नहीं कर सकता था कि वह कभी कुरान सुनने के लिए रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास जाएगा। वो नाम था वलीद बिन मुगैरा। वो बार-बार रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास जाते और कुरान सुनते। कुरान के अल्फाज,
Speaker A
उसका अंदाज और उसकी तासीर वलीद बिन मुगैरा के दिल पर असर डाल रही थी। लेकिन मसला यह था कि जिस चीज को वह दिल से महसूस कर रहे थे, उसे कुबूल करने के लिए उन्हें सिर्फ अपने दिल से नहीं बल्कि पूरे मक्का के
Speaker A
सामने फैसला करना था। तुमने यह खबर सुनी है कि वलीद बिन मुगैरा इस्लाम कबूल करने वाला है? हां, खबर पक्की है। मैंने खुद उन्हें नबी के घर के बाहर कई दफा खड़े हुए देखा है। यह खबर मक्का के सरदारों के लिए इंतहाई
Speaker A
खतरनाक थी। अगर मक्का का सबसे दौलतमंद और बा असर शख्स मोहम्मद की दावत कबूल कर लेता है तो फिर मक्का के बाकी लोग भी उसके पीछे चल पड़ेंगे। हमें वलीद पर दबाव डालना होगा। क्योंकि अगर वह भी मोहम्मद के साथ मिल गया,
Speaker A
तो हमारी सरदारी खत्म हो जाएगी। हां, ठीक है। वलीद बिन मुगीरा पर दबाव बढ़ने लगा। क्या तुम मोहम्मद पर ईमान ला चुके हो?
Speaker A
क्या तुमने अपने आबा अजदाद का दीन छोड़ दिया? तुम जैसा शख्स मोहम्मद की बात कैसे मान सकता है?
Speaker A
जिस हक को वो अपने दिल से पहचान चुके थे, सिर्फ लोगों के खौफ और अपनी समाजी हैसियत की वजह से उन्होंने उससे मुंह मोड़ लिया। उन्होंने पूरे मक्का में यह बात फैलाना शुरू कर दी। ऐ मक्का वालों, गौर
Speaker A
से सुनो, मोहम्मद जादूगर हैं और जो किताब उनके पास है वो तो शेरो-शायरी की किताब है। आज ही कहा। तुमने और वलीद बिन मुगीरा की इस मुखालिफत के जवाब में अल्लाह ताला ने कुरान मजीद में उनका अंजाम बयान फरमाया। फिर वो
Speaker A
पलटा और तकब्बुर किया। फिर कहा यह तो महज एक जादू है जो पहले जमाने से चला आ रहा है। यह तो इंसान का कलाम है। यह आयात वलीद बिन मुगीरा के लिए एक वाज़ तंबी थी। लेकिन वो अपनी ज़िद पर कायम रहा। और फिर कुछ ही
Speaker A
अरसे बाद एक पुराना जख्म जो बरसों पहले उसके पांव की एड़ी के करीब लगा था, दोबारा खुल गया। और उसी जख्म के बायस वलीद बिन मुगीरा की वफात हो गई। मगर उसकी मौत के बाद भी मक्का में मुसलमानों
Speaker A
के लिए हालात बेहतर नहीं हुए बल्कि जुल्म मजीद बढ़ता चला गया। मुसलमानों पर इतना दबाव डाला गया कि आखिरकार मक्का में रहना उनके लिए तकरीबन नामुमकिन हो गया और फिर वो वक्त आया जब मुसलमानों को अपना शहर और
Speaker A
अपनी बहुत सी अजीज चीजें छोड़कर मदीना की तरफ हिजरत करना पड़ी। मदीना में मुसलमानों ने एक नई रियासत कायम की। एक ऐसी रियासत जहां इस्लाम सिर्फ एक दावत नहीं था बल्कि एक मुकम्मल मुआशरा बनकर उभर रहा था। कुछ अरसे बाद खालिद बिन वलीद
Speaker A
रजिलाहु अन अपने कुछ कामों की वजह से अरब से बाहर गए हुए थे और जब वो अपने काम मुकम्मल करके वापस मक्का पहुंचे तो उन्हें महसूस हुआ कि मक्का वो मक्का नहीं रहा था जिसे वह छोड़कर गए थे। शहर का माहौल बदल
Speaker A
चुका था। गलियों में एक अजीब सी खामोशी थी और बहुत से घरों से रोने और चीखने की आवाजें आ रही थी। खालिद बिन वलीद रज्लाहु अन ने अपने खानदान के लोगों से पूछा आखिर मक्का में ऐसा क्या हुआ है कि पूरे मक्का
Speaker A
का माहौल बदल गया है। जब आप यहां मौजूद नहीं थे। मक्का वालों और मदीना के मुसलमानों के बीच एक बहुत बड़ी जंग हुई थी। जंग बद्र और इस जंग में मुसलमानों ने कुरैश को ऐसी शिकस्त दी है जिसका मक्का
Speaker A
वालों ने तसवुर भी नहीं किया था। खालिद बिन वलीद के लिए सबसे बड़ा सदमा यह था कि उस जंग में उनके खानदान के कई अफराद मारे जा चुके थे और कुरैश का सबसे बड़ा सरदार अबू जहल भी मारा जा चुका था।
Speaker A
लेकिन अभी एक और खबर बाकी थी। मेरे बड़े भाई वलीद बिन वलीद कहां है?
Speaker A
क्या वो भी इस जंग में शरीक थे? क्या तुम्हें नहीं पता तुम्हारे बड़े भाई भी इस जंग में शरीक थे और अब वो मुसलमानों के पास कैद हैं। यह सुनकर खालिद बिन वलीद रज़्लाहु अनो के अंदर गुस्से की एक नई आग भड़क उठी। वो
Speaker A
सीधे कुरैश के सरदार अबू सुफियान के पास पहुंचे। मक्का के बड़े-बड़े लोग जमा हुए और मुसलमानों से बदला लेने का अहद किया गया। लेकिन खालिद बिन वलीद के सामने इस वक्त एक ही मकसद था, अपने भाई
Speaker A
को आजाद कराना। चुनांचे वह मदीना की तरफ रवाना हो गए। वहां पहुंचकर खालिद बिन वलीद रज़्लाहु अनो ने मुसलमानों के कैदियों के लिए एक ऐसा निजाम देखा जो उनके लिए बिल्कुल नया था। मुसलमान कैदियों को उनकी माली استطاعت के मुताबिक फिया लेकर आजाद
Speaker A
कर रहे थे। लेकिन अगर कोई कैदी इतना माल अदा करने की ताकत नहीं रखता था तो उसे सिर्फ उस शर्त पर आजाद किया जाता कि वह मुसलमानों के बच्चों को पढ़ना लिखना सिखाएगा। लेकिन जब खालिद बिन वलीद रज़्लाहु अनो ने अपने भाई के बारे में
Speaker A
पूछा तो उन्हें मालूम हुआ कि वलीद बिन वलीद रजि अल्लाहहु अनो के फिदिए की रकम दूसरे कैदियों से कहीं ज्यादा मुकर्रर की गई है। रकम थी 4000 सोने के सिक्के। वहां मौजूद
Speaker A
रज़्लाहु अनो के लिए यह कोई ऐसी कीमत नहीं [संगीत] थी जिसकी वजह से वह अपने भाई को कैद में छोड़ देते। उन्होंने फौरन पूरा फिया अदा किया और अपने भाई को आजाद [संगीत] करा लिया। लेकिन वापसी के सफर में
Speaker A
सारा दिन सफर करने के बाद खालिद बिन वलीद रज़्लाहु अनो और उनके भाई वलीद बिन वलीद रज़्लाहु अनो एक जगह रात गुजारने [संगीत] के लिए रुक गए। दोनों भाइयों ने आराम किया। अगली सुबह जब खालिद बिन वलीद रज़
Speaker A
अल्लाह अनो बेदार हुए तो उन्होंने देखा कि उनके भाई का बिस्तर खाली है और उनके बिस्तर पर एक खत रखा हुआ था। खालिद रजिला अनो ने खत उठाया और उसे पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था खालिद मैं तुम्हें बताए
Speaker A
बगैर वापस मदीना चला गया हूं। मैं इस्लाम कुबूल कर चुका हूं। क्योंकि मैंने अपनी पूरी जिंदगी में मोहम्मद जैसा इंसान नहीं देखा। मैंने पहले इस्लाम इसलिए कबूल नहीं किया कि लोग यह ना समझे कि मैं कैद के खौफ
Speaker A
से मुसलमान हुआ हूं। अब जब तुमने मुझे आजाद करा दिया है तो मैं एक आजाद [संगीत] इंसान की हैसियत से अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल करना चाहता हूं। खालिद बिन वलीद रजिला अनो के लिए यह खबर यकीनन [संगीत]
Speaker A
हैरानक थी। लेकिन उस वक्त भी खालिद रज़्लाहु अनो के दिल में इस्लाम की तरफ आने का ख्याल पैदा नहीं हुआ। बल्कि उनके अंदर अभी तक अपने खानदान के खून का बदला लेने की आग जल रही थी। और फिर अगले साल
Speaker A
कुरैश ने दोबारा मुसलमानों के खिलाफ जंग की तैयारी शुरू कर दी। इस बार खालिद बिन वलीद रजिला अनू सिर्फ एक आम जंगजू नहीं रहने वाले थे। उन्हें पहली बार अपनी फौज की एक अहम कमान सौंपी और यूं मक्का से
Speaker A
3000 अफराद पर मुश्तमिल एक लश्कर मुसलमानों से जंग करने के लिए मदीना की तरफ रवाना हुआ। दूसरी तरफ मुसलमानों के पास सिर्फ 1000 अफराद थे। तादाद के ऐतबार से मक्का का लश्कर मुसलमानों से तीन गुना बड़ा था। लेकिन रसूल्लाह सल्लल्लाहहु
Speaker A
अलैहि वसल्लम ने जंग के लिए एक ऐसी हिकमत अमली इख्तियार की जिसने मुसलमानों की पोजीशन को बहुत मजबूत बना दिया। उहद के पहाड़ के एक अहम मकाम पर आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने 50 तीर अंदाजों को तायनात फरमाया और उन्हें एक बिल्कुल वाज़ हुक्म
Speaker A
दिया। तुम अपनी जगह से हरगिज़ ना हटना। चाहे तुम देखो कि मुसलमान फतह हासिल कर रहे हैं। तुम्हारी जिम्मेदारी सिर्फ एक है इस रास्ते की हिफाजत करना। और उन 50 तीर अंदाजों के सामने [संगीत] दूर खड़ा एक शख्स उन्हें इंतहाई गौर से देख रहा था। वो
Speaker A
शख्स थे खालिद बिन वलीद। फिर जंग शुरू हुई। मुसलमानों ने ऐसी शिद्दत के साथ हमला किया कि कुरैश की सफें पीछे हटने लगी। मुसलमान मुसलसल आगे बढ़ते गए और देखते ही देखते मक्का का लश्कर मैदान से पीछे हटने
Speaker A
लगा। ऐसा महसूस होने लगा जैसे मुसलमानों ने जंग जीत ली हो। ऐ खालिद मक्का वाले बुरी तरह हार रहे हैं और तुम यहां खड़े तमाशा देख रहे हो। तुम कब हमला करोगे? जब तक ये लोग यहां से नहीं
Speaker A
हटते हम कुछ नहीं कर सकते। मैं यहीं इनके हटने का इंतजार कर रहा हूं। पहाड़ पर मौजूद कुछ तीर अंदाजों ने जब यह मंजर देखा तो उन्हें लगा कि मुसलमानों ने जंग जीत ली है। उनमें से बहुत से लोगों ने अपनी जगह
Speaker A
छोड़ दी और पहाड़ से नीचे उतरने लगे। जैसे ही खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह अनू ने देखा कि तीर अंदाज अपनी जगह छोड़कर नीचे उतर रहे हैं। उन्हें फौरन समझ आ गई। अब वक्त आ गया है। खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह अनू ने
Speaker A
अपने घोड़ों को तैयार किया और अपने घोड़सवारों के साथ पहाड़ के पीछे से मुसलमानों पर हमला कर दिया। मुसलमानों को शदीद नुकसान उठाना पड़ा और इस जंग में रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम खुद भी शदीद जख्मी हुए। बड़े-बड़े सहाबा
Speaker A
रजिल्लाहु अनू शहीद हुए। और उन्हीं शोहदा में रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के महबूब [संगीत] चाचा हजरत हमजा रज अल्लाह अनू भी शामिल थे। मक्का वापस पहुंचने पर कुरैश ने खालिद बिन वलीद का शानदार इस्तकबाल किया। जिस शख्स ने ओहद में
Speaker A
मुसलमानों को पीछे धकेला [संगीत] था। मक्का वालों की नजर में वो एक हीरो बन चुका था। लेकिन खालिद बिन वलीद रजिला अनो के लिए अब एक अजीब मरहला शुरू होने वाला था। क्योंकि जिस मकसद के लिए वह मुसलमानों
Speaker A
के खिलाफ लड़ रहे थे वो मकसद हासिल हो चुका था। अपने खानदान के खून का बदला वो ले चुके थे। लेकिन इसके बावजूद वो अगली बड़ी जंग जंग खंदक में भी कुरैश के साथ मौजूद रहे। वो मुसलमानों के खिलाफ अपनी
Speaker A
जंगी महारत इस्तेमाल करने के लिए आए। लेकिन इस मर्तबा खालिद बिन वलीद रज़िल्ला अनू की मौजूदगी के बावजूद कुरैश मुसलमानों को शिकस्त ना दे सके। फिर आई 6 हिजरी सुलहे हुदैबिया से कुछ दिन पहले मक्का में अचानक एक खबर तेजी से फैल गई। मदीना से
Speaker A
रसूल अल्लाह लगभग 1400 सहाबा के साथ उमरा अदा करने के लिए मक्का की तरफ रवाना हो चुके हैं। अगर मुसलमान मक्का में दाखिल हो गए तो कुरैश की सियासी और कबाईली हैसियत को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचेगा। तो बेहतर यही है कि मुसलमानों को मक्का तक
Speaker A
पहुंचने ही ना दिया जाए और उनका रास्ता रोकने के लिए हमारे मशहूर घुड़सवार खालिद को भेजा जाए। हां, यह फैसला ठीक है। खालिद बिन वलीद अपने घुड़सवारों के साथ पूरी रफ्तार से मुसलमानों की तरफ रवाना [संगीत] हुए। लेकिन जब खालिद बिन वलीद
Speaker A
वहां पहुंचे तो मंजर उनकी तवक्को के बिल्कुल बरक्स था। जाओ पता करके आओ कि बाकी मुसलमान कहां हैं। वहां सिर्फ चंद मुसलमान मौजूद थे। बाकी मुसलमान एक दूसरे रास्ते से मक्का की तरफ जा रहे हैं। और खालिद बिन वलीद की फौज को एक ऐसे मकाम
Speaker A
पर पहुंचा दिया गया था जहां से वो मुसलमानों की असल पोजीशन को रोक ही नहीं सकते थे। और यहां खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाहहु अनो के सामने एक ऐसी हकीकत आहिस्ताआहिस्ता वाज़ होने लगी कि मोहम्मद सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम सिर्फ एक मजहबी
Speaker A
पेशवा नहीं बल्कि गैर मामूली बसीरत [संगीत] रखने वाले कायद भी हैं। यह वाकया उनके दिल में एक नई सोच छोड़ गया और वक्त के साथ खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह अनो की इस्लाम के बारे में सोच बदलने लगी। फिर
Speaker A
सुलेह हुदैबिया का जमाना आया और इस मुआहिदे के बाद खालिद बिन वलीद के ज़हन में इस्लाम के बारे में वह सवाल और भी गहरे हो गए। एक दिन मक्का के बड़े लोग जमा थे। गुफ्तगू इस्लाम [संगीत] और रसूल्लाह
Speaker A
सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के बारे में हो रही थी। खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाहहु अनो ने वहां बैठकर एक ऐसी बात कह दी जिसने मजलिस में मौजूद लोगों को हैरान कर दिया। उन्होंने कहा तुम लोग जो कहना चाहते हो कहो [संगीत]
Speaker A
लेकिन यह कैसे मुमकिन है कि मोहम्मद जैसा वाजे और सच्चा इंसान जादूगर या झूठा हो। यह बात इसलिए भी हैरानक थी क्योंकि कभी रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम को जादूगर कहने वालों में खालिद बिन वलीद के अपने वालिद वलीद बिन मुगीरा भी शामिल थे।
Speaker A
मोहम्मद एक जादूगर है। और अब वालिद के इंतकाल के बाद उनका अपना बेटा ही उनके दावे को रद्द कर रहा था। खालिद बिन वलीद रजिला अनो के दिल में इस्लाम की तरफ झुकाव बढ़ता जा रहा था। और इस दौरान उनके मुसलमान भाई वलीद बिन वलीद
Speaker A
रजिला अनो भी मदीना से उन्हें खुतूत भेजते रहते थे। वह उन्हें मदीना के हालात [संगीत] बताते। मुसलमानों की बढ़ती हुई ताकत के बारे में बताते और उन्हें इस्लाम कबूल [संगीत] करने की दावत देते। यहां तक कि एक दिन रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि
Speaker A
वसल्लम ने खुद उनके भाई से पूछा खालिद कहां है? फिर आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि खालिद जैसे जहीन और समझदार इंसान [संगीत] को अब तक इस्लाम की तरफ आ जाना चाहिए था। अपने भाई के लिए रसूल्लाह
Speaker A
सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के यह अल्फाज सुनकर वलीद बिन वलीद ने फौरन खालिद बिन वलीद की तरफ खत भेजा। उन्होंने अपने भाई को लिखा खालिद अब अपनी आंखें खोलो। रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने तुम्हारा जिक्र किया है। तुम्हारी अक्ल और
Speaker A
समझ [संगीत] की तारीफ की है। अब मजीद देर ना करो और इस्लाम कबूल कर लो। यह खत खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह अनो के दिल पर बहुत गहरा असर छोड़ गया। वो सोचने लगे मैंने ओहद में मुसलमानों के खिलाफ क्या कुछ नहीं
Speaker A
किया। मैंने उनके खिलाफ तलवार उठाई। मैंने उनके खिलाफ जंग की और इस सब के बावजूद मोहम्मद सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम मेरे लिए नफरत नहीं रखते बल्कि वो मेरे इस्लाम कबूल [संगीत] करने की उम्मीद रखते हैं। यह सोच खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह अनो के अंदर
Speaker A
कुछ तोड़ रही थी और कुछ नया बना रही थी। आखिरकार उन्होंने फैसला कर लिया। अब मक्का में मजीद नहीं रहना। अब मदीना जाना है। लेकिन जैसे ही मक्का के लोगों को खालिद बिन वलीद रजिला अनू के इस फैसले की खबर
Speaker A
हुई, मक्का के बड़े सरदारों में बेचैनी [संगीत] फैल गई। और फिर अबू सुफियान खुद खालिद बिन वलीद के पास पहुंचा। उसने खालिद से पूछा, [संगीत] क्या यह बात सच है? क्या तुम वाकई हमें छोड़कर मोहम्मद के पास जाने वाले हो? हां,
Speaker A
यह सच है। यह जवाब सुनते ही अबू सुफियान गुस्से से भड़क उठा। लेकिन खालिद बिन वलीद रजिला अनू अकेले नहीं थे। उनके पीछे मक्का का ताकतवर कबीला बनू मखजूम खड़ा था। खालिद बिन वलीद रजिला अनो ने मक्का के लोगों के सामने
Speaker A
अपना फैसला वाज़ कर दिया। मैं अब अपने माजी के साथ नहीं बल्कि अपने मुस्तकबिल के साथ खड़ा हूं। और फिर वो मक्का से निकल पड़े। [संगीत] मंजिल थी मदीना। लेकिन खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह अनो को अभी मालूम नहीं था [संगीत]
Speaker A
कि इस सफर में वह अकेले नहीं रहेंगे। अमर बिन आस भी इस्लाम कबूल करने के इरादे से मदीना की तरफ जा रहे थे और उनके साथ उस्मान बिन तल्हा भी थे। आखिरकार वो वक्त आ गया जब खालिद बिन वलीद, अमर बिन आस और
Speaker A
उस्मान बिन तल्हा मदीना पहुंच गए। वो शहर जहां रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम मौजूद थे। वो शहर जहां से इस्लाम एक ताकतवर रियासत की शक्ल [संगीत] इख्तियार कर चुका था। यह वो लम्हा था जिसका तसवुर शायद चंद साल पहले खुद खालिद बिन वलीद
Speaker A
रजिला अनू भी नहीं कर सकते थे। और यूं मक्का का वो जंगजू जिसके नाम से कभी मुसलमान मोहतात हो जाते थे। अपनी जिंदगी [संगीत] के सबसे बड़े फैसले के लिए रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के सामने पहुंच चुका था। खालिद बिन वलीद रज
Speaker A
अल्लाहहु अनू ने रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की तरफ देखा और फिर इस्लाम कबूल कर लिया। उनके साथ अमर बिन आस और उस्मान बिन तल्हा ने भी इस्लाम कबूल किया। वो शख्स जो कभी मुसलमानों के लिए मैदान जंग में सबसे बड़ा खतरा था। अब खुद इस्लाम
Speaker A
के लश्कर का हिस्सा बन चुका था। और हजरत खालिद बिन वलीद की जिंदगी का यह मोड़ हमें एक बहुत बड़ी हकीकत सिखाता है। किसी इंसान को उसकी माजी से मत परखो। आज हमारे मुआशरे में हम अक्सर [संगीत] लोगों को उनकी पुरानी गलतियों की वजह से
Speaker A
हमेशा के लिए बुरा समझ लेते हैं। हम कहते हैं यह तो ऐसा ही है। यह कभी नहीं बदल सकता। इसने इतनी गलतियां की हैं। अब इसके लिए [संगीत] वापसी कहां? लेकिन खालिद बिन वलीद की दास्तान हमें बताती है इंसान
Speaker A
[संगीत] बदल सकता है और कभी-कभी जिस शख्स को हम आज अपने से बहुत दूर समझ रहे होते हैं वही कल अल्लाह के करीब होने वालों में शामिल [संगीत] हो सकता है। इसलिए किसी गुनाहगार को हकारिकारत से मत देखो बल्कि
Speaker A
अपने लिए भी डरो क्योंकि हमें नहीं मालूम अल्लाह हमारे बारे में क्या फैसला करेगा। अल्लाह ताला हमें हक को पहचानने, उसे कुबूल [संगीत] करने और उस पर साबित कदम रहने की तौफीक अता फरमाए। आमीन। और अगर आप चाहते हैं कि ऐसी तारीखी और सबक आमोज़
Speaker A
इस्लामी दस्तावेजात मजीद लोगों तक पहुंचे तो इस वीडियो को शेयर जरूर करें। हो सकता है आपका एक शेर किसी ऐसे शख्स तक यह पैगाम पहुंचा दे जिसे आज [संगीत] अल्लाह की तरफ वापस आने की जरूरत हो। जजाकुल्लाह खैरा।
Speaker A
ॐ
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