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Karbala Ki Mukammal Dastan | Imam Hussain (RA) Ki Woh Qurbani Jis Ne Tareekh Badal Di

इमाम हुसैन (रा) की कर्बला की कहानी, उनकी शहादत और इतिहास बदलने वाली कुर्बानी का विस्तृत वर्णन।

Key Takeaways

  • इमाम हुसैन की कुर्बानी ने इतिहास की दिशा बदल दी।
  • सच्चाई और हक के लिए संघर्ष हमेशा कठिन होता है।
  • राजनीतिक सत्ता के लिए झूठे वादे और धोखे आम हैं।
  • वफादारी और ईमानदारी की मिसाल कर्बला की घटना में देखने को मिलती है।
  • इमाम हुसैन की शहादत आज भी इंसानियत और न्याय के लिए प्रेरणा है।

What the video covers

  • इमाम हुसैन (रा) के जन्म, बचपन और रसूल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथ उनके संबंधों का परिचय।
  • मुस्लिम इतिहास में इमाम हुसैन के परिवार की भूमिका और उनके पिता हजरत अली की खिलाफत।
  • मुआविया और उसके बेटे यजीद की सत्ता में आने की प्रक्रिया और राजनीतिक परिस्थितियाँ।
  • कूफा के लोगों द्वारा इमाम हुसैन को समर्थन देने के लिए भेजे गए खत और उनकी प्रतिक्रिया।
  • मुस्लिम बिन अकील का कूफा में जाकर समर्थन की जांच और कूफा की राजनीतिक स्थिति।
  • कूफा के गवर्नर का बदलाव और उबैदुल्लाह बिन जियाद का कूफा में सख्ती से शासन।
  • मुस्लिम बिन अकील की गिरफ्तारी और कूफा में इमाम हुसैन के समर्थकों की कमी।
  • इमाम हुसैन का मदीना छोड़कर मक्का और फिर कूफा की ओर बढ़ना।
  • कर्बला के युद्ध के दर्दनाक दृश्य, शहादत और अहले बैत की कैद।
  • कर्बला की घटना का इतिहास में अमिट प्रभाव और आज तक याद किया जाना।

Answers

Questions about this video

इमाम हुसैन (रा) का नाम क्यों रखा गया था?

रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नवजात बच्चे का नाम हुसैन रखा, जिसका अर्थ है खूबसूरती वाला और भलाई वाला। यह नाम उनके चरित्र और भविष्य की महानता का प्रतीक था।

कूफा के लोग इमाम हुसैन से क्यों समर्थन मांग रहे थे?

कूफा के लोग राजनीतिक असंतोष और अन्याय के खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने इमाम हुसैन को अपना नेता और रहनुमा बनाने के लिए कई खत भेजे, यह जताने के लिए कि वे उनके साथ हैं।

मुस्लिम बिन अकील का कूफा में क्या रोल था?

मुस्लिम बिन अकील को इमाम हुसैन ने कूफा भेजा ताकि वह वहां के लोगों की नीयत और समर्थन की सच्चाई का पता लगाएं, और उन्होंने कूफा में इमाम के लिए समर्थन जुटाने का काम किया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:01
Speaker A
यह इतने सारे खत कहां ले जा रहे हो? कूफा वालों ने भेजे हैं। किसके नाम हैं यह सब?
00:07
Speaker A
हुसैन इबने अली के नाम। अब पूरा कूफा आपकी हिमायत में है। आपको वहां चले जाना चाहिए। और यहां पर आपकी जान को भी खतरा है।
00:21
Speaker A
मुझे कूफा से बगावत की ब आ रही है। हां, मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया है।
00:38
Speaker A
हमें हुसैन बिन अली को बयात पर राजी करना होगा। यह दास्तान है इमाम हुसैन रज़्लाहु अनू की। उस बच्चे की जिसके बारे में रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया था जो मुझसे मोहब्बत करता है वो हुसैन से
00:55
Speaker A
मोहब्बत करें। हिजरत का चौथा साल मदीना मुनव्वरा रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के घर में खुशी का एक और लम्हा आने वाला था। हजरत फातिमा रज़ अल्लाहहु अन्हा के यहां एक बेटे की विलादत हुई।
01:13
Speaker A
वही घर जिसे नबी करीम सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम अपने दिल के सबसे करीब रखते थे। हर तरफ खुशी थी, हर तरफ मुबारकबादें थीं। मगर फिर रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, मेरे बाद एक जालिम गिरोह इसे कत्ल कर देगा।
01:31
Speaker A
यह अल्फाज़ सिर्फ एक खबर नहीं थी। यह आने वाले कर्बला की पहली झलक थी। और जब इस नौमौलूद बच्चे का नाम रखने का वक्त आया, हजरत अली रज़ अल्लाह अनू ने इरादा किया कि उसका नाम हर्ब रखा जाए। जिसका मतलब है जंग।
01:52
Speaker A
मगर रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया नहीं। फिर आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इस बच्चे का नाम रखा हुसैन यानी हुस्न वाला, खूबसूरती वाला, भलाई वाला। यही हुसैन जिनका नाम बाद में पूरी दुनिया जानने वाली थी।
02:10
Speaker A
यही हुसैन जिन्हें कयामत तक याद रखा जाना था। दिलचस्प बात यह है कि इमाम हसन और इमाम हुसैन की उम्र में बहुत कम फर्क था। दोनों भाई तकरीबन एक साथ बड़े हुए।
02:26
Speaker A
मदीना के लोग अक्सर एक खूबसूरत मंजर देखा करते थे। रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम मस्जिद में तशरीफ फरमा होते और हसन हुसैन आपके इर्दगिर्द खेल रहे होते।
02:46
Speaker A
कभी कंधों पर चढ़ जाते, कभी हाथ पकड़ लेते और कभी दौड़ते हुए आप सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के सीने से लग जाते। रसूल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को इन दोनों से गैर मामूली मोहब्बत थी।
03:06
Speaker A
एक दिन रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो मुझसे मोहब्बत करता है वो हुसैन से मोहब्बत करें। एक मौके पर रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया हसन और हुसैन जन्नती नौजवानों के सरदार हैं।
03:23
Speaker A
यह कोई मामूली फजीलत नहीं थी। यह वो एजाज था जो दुनिया के चंद ही लोगों को नसीब हुआ। वक्त गुजरता गया। बच्चे जवान होने लगे और फिर इस्लामी तारीख एक ऐसे दौर में दाखिल हुई जहां बड़े फैसले होने वाले थे।
03:41
Speaker A
रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम इस दुनिया से पर्दा फरमा चुके थे। हजरत अबू बकर का दौर आया। फिर हजरत उमर का। फिर हजरत उस्मान का और फिर हजरत अली खिलाफत के मंसब पर फाइज हुए।
03:58
Speaker A
हसन और हुसैन अब बच्चे नहीं रहे थे। वो जवान हो चुके थे और अपने वालिद हजरत अली के साथ उम्मत के मामलात को करीब से देख रहे थे।
04:16
Speaker A
फिर 40 हिजरी आई, आलम इस्लाम के लिए गम का साल। हजरत अली रज़ अल्लाह अनो इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे। और अब मुसलमानों की निगाहें उनके बड़े बेटे की तरफ उठ रही थी। इमाम हसन।
04:37
Speaker A
लोगों ने उनके हाथ पर बैत की और वह मुसलमानों के खलीफा बन गए। मगर उस वक्त उम्मत पहले ही इख्तलाफात और सियासी कशीदगी का शिकार थी।
04:54
Speaker A
जंगों ने मुसलमानों को कमजोर कर दिया था और हर तरफ बेचैनी फैली हुई थी। इमाम हसन के सामने दो रास्ते थे। पहला इख्तलाफ को मजीद बढ़ाया जाए। दूसरा उम्मत को एक बार फिर एक मरकज पर जमा कर दिया जाए।
05:09
Speaker A
इमाम हसन ने वो रास्ता इख़्तियार किया जिससे मुसलमानों का खून बच सकता था। उन्होंने जाती इख्तेदार पर उम्मत की वहदत को तरजीह दी और फिर एक ऐसा फैसला किया जिसे तारीख आज भी याद करती है।
05:28
Speaker A
उन्होंने खिलाफत से दस्तरदार होने का ऐलान कर दिया। यूं मुआविया रज़्लाहु अनो पूरे आलिम इस्लाम के हुक्मरान बन गए और मुसलमानों के दरमियान एक बड़ी जंग टल गई।
05:44
Speaker A
वक्त गुजरता गया और यूं तकरीबन 20 साल गुजर गए। फिर आई 60 हिजरी। यह मुआविया रज़ अल्लाहहु अनू की जिंदगी का आखिरी दौर था और इसी दौर में एक ऐसा फैसला किया गया जिसने बाद में कर्बला के वाक्यात की बुनियाद रख दी।
06:02
Speaker A
मुआविया ने अपने बेटे यजीद को अपना जानशीन मुकरर करने का फैसला किया।
06:18
Speaker A
शाम के इलाकों में बहुत से लोगों ने इस फैसले को कबूल कर लिया। क्योंकि वह तवील अरसे से बनू उमैया की हुक्मरानी के आदि थे। मगर हिजाज की फजा मुख्तलिफ थी। मक्का और मदीना में बहुत सी अजीम शख्सियत इस मामले पर मुत्तफिक नहीं थी।
06:30
Speaker A
अब्दुल्ला बिन अब्बास, अब्दुल्ला बिन उमर, अब्दुल्ला बिन जुबैर और इमाम हुसैन के करीबी हल्के के कई अफराद यजीद की बैत के मामले पर तहफुजात रखते थे।
06:45
Speaker A
फिर वो दिन आ गया जब मुआविया का इंतकाल हो गया और यजीद इख्तदार में आ गया। अब इख्तलाफ एक नए मरहले में दाखिल होने वाला था। दमिश्क में बैठे यजीद ने अपने गवर्नरों को पैगाम भेजा। खासतौर पर मदीना
07:04
Speaker A
के गवर्नर को हुक्म वाज़ था। मदीना में बयत मजबूत करो। और सबसे पहले हुसैन बिन अली से बयात लो।
07:11
Speaker A
जब इमाम हुसैन को यह पैगाम मिला तो उन्होंने फौरन समझ लिया कि यह सिर्फ एक रस्मी कारवाई नहीं, यह एक ऐसा मामला है जिसके असरात बहुत दूर तक जाने वाले हैं। इसीलिए उन्होंने जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं किया।
07:28
Speaker A
वो मदीना को खून रेजी का मैदान नहीं बनाना चाहते थे। वो नहीं चाहते थे कि रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के शहर में मुसलमानों की तलवारें एक दूसरे के सामने आ जाएं। इसीलिए उन्होंने मदीना छोड़ने का फैसला किया।
07:45
Speaker A
जब काफिला रवानगी के लिए तैयार हुआ तो एक शख्स ने पूछा आप जा रहे हैं?
08:03
Speaker A
मैं फितना नहीं चाहता लेकिन मैं जुल्म को हक का लिबास पहने हुए भी नहीं देख सकता। रास्ता आसान नहीं होगा। हक का रास्ता कभी आसान नहीं होता। मगर अगर इंसान हक को छोड़ दे तो फिर जिंदा रहकर भी क्या रह जाता है?
08:20
Speaker A
चुनांचे इमाम हुसैन मदीना से निकल कर मक्का पहुंच गए। जहां लाखों जायरीन आते थे। जहां मुख्तलिफ इलाकों के लोग जमा होते थे। और जहां से जल्द ही एक ऐसा सिलसिला शुरू होने वाला था जो इमाम हुसैन को इराक की तरफ ले जाएगा।
08:35
Speaker A
ये इतने सारे खत कहां ले जा रहे हो? कूफा वालों ने भेजे हैं। किसके नाम हैं यह सब?
08:54
Speaker A
हुसैन इब्न अली के नाम। पहले एक खत आया, फिर दूसरा, फिर तीसरा और फिर दर्जनों खुतूत। सब एक ही शहर कूफा से। हर खत में तकरीबन एक ही पैगाम था, आइए हम आपके साथ हैं। हम आपको
09:14
Speaker A
अपना रहनुमा बनाएंगे। कूफा आपका इंतजार कर रहा है। अब पूरा कूफा आपकी हिमायत में है। आपको वहां चले जाना चाहिए। और यहां पर आपकी जान को भी खतरा है। खत आते रहे। यहां तक कि ऐसा महसूस होने लगा जैसे पूरा कूफा इमाम हुसैन को
09:29
Speaker A
बुला रहा हो। मगर इमाम हुसैन जज्बात में बह जाने वाले इंसान नहीं थे। उन्होंने फरमाया पहले हम तस्दीक करेंगे। क्योंकि वह जानते थे कि बड़े फैसले सिर्फ नारों पर नहीं किए जाते। फिर उन्होंने अपने काबिल एतमाद चाचाद भाई को बुलाया मुस्लिम बिन
09:46
Speaker A
अकील रज अल्लाह अनू और फरमाया मुस्लिम कूफा जाओ, लोगों के दिल देखना, सिर्फ उनकी जुबान नहीं। अगर उनका वादा सच्चा हो तो मुझे खबर देना और अगर वह झूठे निकले तो मुझे सच बताना चाहे वह सच कितना ही सख्त क्यों ना हो।
10:01
Speaker A
मुस्लिम बिन अकील रज अल्लाहहु अन इमाम हुसैन रज़ अल्लाह अनू का पैगाम लेकर कूफा पहुंचे। लोग जोक दरजक उनसे मिलने आए आने लगे। घरों के दरवाजे खुलने लगे। मजालिस होने लगी और हर तरफ एक ही नाम गूंज रहा था।
10:17
Speaker A
हुसैन बिन अली, हुसैन बिन अली, हुसैन बिन अली। मुस्लिम बिन अकील हैरान थे क्योंकि यह सिर्फ चंद अफराद की हिमायत नहीं थी। यह तो एक पूरे शहर का जोश दिखाई दे रहा था। लोग कहते थे अगर इमाम हुसैन आएंगे तो हम उनका साथ
10:35
Speaker A
देंगे। हम उनकी मदद करेंगे। और उन्हें अपना रहनुमा तस्लीम करेंगे। फिर बैत का सिलसिला शुरू हुआ। लोग एक-एक करके आते रहे। पहले हजार, फिर कई हजार और बाज रिवायत के मुताबिक तादाद 18,000 तक जा पहुंची। 18,000 लोग।
10:50
Speaker A
यह कोई छोटी तादाद नहीं थी। यह किसी भी शख्स को यकीन दिलाने के लिए काफी थी कि कूफा अपने वादे पर कायम है। यह सब देखकर मुस्लिम बिन अकील ने इमाम हुसैन को खत लिखा। उन्होंने इत्तला दी। यहां बड़ी
11:12
Speaker A
हिमायत मौजूद है। अगर आप तशरीफ लाएं तो लोग आपका साथ देंगे। यह वो खबर थी जिसका इमाम हुसैन को इंतजार था। चुनांचे इमाम हुसैन ने इराक की तरफ रवानगी का फैसला किया और एक काफिला कूफा की तरफ चल पड़ा। मगर इसी दौरान दमिश्क में बैठे यजीद को कुछ गैर मामूली महसूस होने लगा।
11:31
Speaker A
उसके पास मुकम्मल मालूमात नहीं थी। लेकिन उसे अंदाजा हो गया था कि इराक में कुछ बड़ा हो रहा है। मुझे कूफा से बगावत की ब आ रही है। हां, मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया है। हमें हुसैन बिन अली को बयात पर राजी करना होगा।
11:46
Speaker A
इसीलिए उसने एक अहम फैसला किया। कूफा का गवर्नर तब्दील कर दिया गया। पहले वहां नोमान बिन बशीर रज़ अल्लाह अनू थे। रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के सहाबी। मगर अब उनकी जगह उबैदुल्लाह बिन जियाद।
12:03
Speaker A
एक ऐसा शख्स जो सख्ती, खौफ और ताकत के इस्तेमाल के लिए मशहूर था। और बहुत जल्द वो कूफा का पूरा माहौल बदल देने वाला था। जुलहिज्जा का महीना था। उबैदुल्ला बिन जियाद कूफा में दाखिल हुआ। मगर एक अजीब अंदाज में उसने अपने चेहरे का बड़ा हिस्सा पगड़ी से ढांप रखा था और उसके साथ चंद आदमी थे। जब कूफा वालों ने उसे दूर से देखा तो वो खुशी से चीख उठे।
12:22
Speaker A
कर लिया गया। कूफा के उस मौजज़ बुजुर्ग को कैद करके इबने जियाद के पास ले जाया गया। यह खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई और जब मुस्लिम बिन अकील तक पहुंची तो उन्होंने फैसला किया कि अब वक्त आ गया है
12:39
Speaker A
लोगों के दावों को आजमाने का। उन्होंने लोगों को जमा किया और फरमाया ऐ कुफा के लोगों तुमने हिमायत का वादा किया था। तुमने बईद की थी। तुमने मदद का यकीन दिलाया था और आज हमारा एक वफादार साथी कैद
12:53
Speaker A
कर लिया गया है। मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। चलो। हम इबने जियाद के महल की तरफ चलते हैं और हानी बिन उरवा की रिहाई का मुतालिबा करते हैं। यह सुनते ही लोग जमा होना शुरू हो गए और फिर तकरीबन 4000 अफराद
13:11
Speaker A
मुस्लिम बिन अकील के साथ खड़े थे। यह मंजर देखकर लग रहा था कि कूफा अपने वादे पर कायम है कि लोग वाकई इमाम हुसैन के साथ हैं। मगर इबने जियाद भी खामोश नहीं बैठा था। उसने कबाइल के सरदारों को बुलाया और
13:28
Speaker A
हुकुम दिया जाओ लोगों को वापस ले आओ उन्हें डराओ उन्हें समझाओ उन्हें बताओ कि यह रास्ता खतरनाक है और फिर लोग आहिस्ता-आहिस्ता वापस जाने लगे। कोई अपने घर चला गया। कोई डर गया। कोई खामोशी से हुजूम से निकल [संगीत] गया।
13:49
Speaker A
सुबह 4000 लोग थे। दोपहर तक [संगीत] सिर्फ 400 रह गए। और जब सूरज गुरूब होने लगा तो तादाद सिर्फ चंद दर्जन रह गई। मुस्लिम बिन अकील ने नमाज अदा करवाई। सलाम फेरा और फिर पीछे मुड़कर देखा कोई नहीं [संगीत] था। एक
14:08
Speaker A
भी नहीं। वही लोग जो चंद घंटे पहले जान देने के वादे कर रहे थे। सब जा चुके थे। अब मुस्लिम बिन अकील कूफा की गलियों में तन्हा थे। यहां तक कि इसी हालत में चलते-चलते [संगीत] वह एक घर के दरवाजे तक पहुंचे। उन्होंने
14:25
Speaker A
आहिस्ता से दस्तक दी। दरवाजा [संगीत] खुला। सामने एक बूढ़ी खातून खड़ी थी। खातून ने गौर से उनके चेहरे को [संगीत] देखा। फिर आहिस्ता से बोली। क्या तुम वही हो जिसे लोग ढूंढ रहे हैं। हां। मैं वही हूं। खातून चंद लम्हे खामोश रही
14:44
Speaker A
क्योंकि वह जानती थी कि अगर यह राज खुल गया [संगीत] तो उसके लिए भी खतरा हो सकता है। उसने पूछा अगर इब्नेज जियाद के आदमियों को पता चल गया तो मुझे अपनी जान की फिक्र नहीं मुझे सिर्फ यह फिक्र है कि हुसैन तक सच पहुंच
15:00
Speaker A
जाए। यह सुनकर बूढ़ी खातून का दिल पिघल गया। उन्हें घर में जगह दी। पानी पेश किया और इज्जत और एहतराम के साथ बिठाया। रात के आखिरी पहर उसका बेटा घर वापस आया। मां ने खुशी-खुशी उसे सब कुछ बता दिया।
15:14
Speaker A
हमारे [संगीत] घर में मुस्लिम बिन अकील आए हैं। वही शख्स जिनके हाथ पर कुफा वालों ने बैत की थी। मगर जहां मां के दिल में मोहब्बत थी, वहां बेटे के दिल में लालच था। उसकी आंखों में इनाम घूमने लगा। अगली सुबह वो दौड़ता हुआ
15:31
Speaker A
इब्ने जियाद के महल पहुंचा और सारी खबर दे दी। इबने जियाद के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई क्योंकि जिस शख्स को पूरा शहर तलाश कर [संगीत] रहा था उसका ठिकाना मालूम हो चुका था। फौरन एक बड़ा मुसल्ला दस्ता रवाना
15:44
Speaker A
किया गया। सिपाहियों ने घर को चारों तरफ से घेर लिया और फिर मुस्लिम बिन अकील गिरफ्तार कर लिए गए और जंजीरों में जकड़ कर इबने जियाद के महल ले जाए गए। इधर हानी बिन उरवा पहले ही कैद थे। फिर नौ जुलहज्जा
15:58
Speaker A
का दिन आया। हानी बिन उरवा [संगीत] को शहीद कर दिया गया। और फिर मुस्लिम बिन अकील भी अपने रब से जा मिले। लेकिन शहादत से पहले मुस्लिम बिन अकील रज़ अल्लाह अनो एक आखिरी कोशिश कर चुके थे। उन्होंने एक
16:13
Speaker A
खत लिखवाया था इमाम हुसैन [संगीत] के नाम। मगर तकदीर कुछ और फैसला कर चुकी थी। वो खत इमाम हुसैन तक कभी नहीं पहुंचा। [संगीत] क्योंकि इसी वक्त इमाम हुसैन मक्का से इराक की तरफ रवाना हो चुके थे और उन्हें
16:28
Speaker A
अभी तक मालूम नहीं था कि कूफा में सब कुछ बदल चुका है। मगर फिर रास्ते में ऐसी खबरें मिलना शुरू हुई जिन्होंने हर दिल को हिला [संगीत] दिया कि मुस्लिम बिन अकील और हानी बिन उरवा शहीद हो चुके हैं। यह सुनकर
16:43
Speaker A
काफिले पर खामोशी छा गई। क्योंकि यही वह दो नाम थे जिन पर कूफा की उम्मीद खड़ी थी और अब दोनों इस दुनिया [संगीत] में मौजूद नहीं थे। फिर इमाम हुसैन ने इधर देखा उधर देखा मगर उन्हें कहीं वो 18,000 लोग नजर
16:58
Speaker A
ना आए जिन्होंने खुतूत लिखे थे जिन्होंने बैत की थी। जिन्होंने साथ देने का वादा किया था। ना कोई इस्तकबाल के लिए आया ना कोई लश्कर ना कोई काफिला। सिर्फ खामोशी थी। अब हकीकत वाज़ हो चुकी थी। कूफा की
17:13
Speaker A
उम्मीद कूफा के धोखे में बदल [संगीत] चुकी थी और इमाम हुसैन का काफिला आहिस्ता-आहिस्ता एक नई सरजमी के करीब [संगीत] पहुंच रहा था जिसका नाम था कर्बला। यह सिर्फ एक नाम नहीं था। चंद दिन बाद यह पूरी इंसानी तारीख [संगीत] की एक
17:28
Speaker A
अलामत बनने वाला था। अब इमाम-ए-हुसन के सामने सिर्फ एक हकीकत थी इब्न [संगीत] जियाद के लश्कर और उनका एक ही मुतालबा यज़ीद की बैत। मगर इस सबके बावजूद इमाम हुसैन ने जंग [संगीत] शुरू नहीं की। उन्होंने खूनरेजी से बचने की पूरी कोशिश
17:44
Speaker A
की क्योंकि उनका मकसद जंग [संगीत] नहीं था। इसीलिए उन्होंने मुखालिफ लश्कर के सामने तीन तजावीज पेश की। मुझे वापस मदीना जाने दो। मैं वहीं लौट जाता हूं। अगर यह कबूल नहीं तो मुझे इस्लामी सरहदों के किसी इलाके में जाने दो। मैं वहां जिंदगी गुजार
18:03
Speaker A
लूंगा। अगर यह भी कबूल नहीं तो मुझे यजीद के पास जाने दो। मैं अपना मामला बराहेरा उसके सामने रख दूंगा। यह तीन रास्ते थे। तीन मवाके थे। तीन ऐसे दरवाजे जिनसे यह बोहरान खत्म हो सकता था। [संगीत] मगर तकदीर एक और सिम जा रही थी।
18:21
Speaker A
जवाब आया। नहीं। आप वापस कहीं नहीं जा सकते। आप यहीं रहेंगे। और आपसे बैत ली जाएगी। बस इसी लम्हे बहुत से रास्ते बंद हो गए। अब मामला गुफ्तो शनीद से निकलकर दबाव [संगीत] और जब्र की तरफ बढ़ रहा था। इधर इब्न
18:41
Speaker A
जियाद मुसलसल नई फौजेें भेज रहा था। हर गुजरते दिन के साथ महासरा मजबूत होता जा रहा था। सबसे पहले 1000 सिपाहियों का लश्कर आया। उसका कमांडर था हुर बिन यज़ीद। वही हुर जिसका नाम बाद में तारीख में एक
18:56
Speaker A
मुनफिद मकाम हासिल करेगा। हुर ने इमाम हुसैन का रास्ता रोका। लेकिन उसके रवैया में एक अजीब बात थी। वो इमाम हुसैन का एतराम करता था। वो उनके करीब आने से भी झिझकता था। एक मौके पर हुर ने कहा ऐ हुसैन
19:11
Speaker A
मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से नबी सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के घराने पर तलवार उठे। इमाम हुसैन ने फरमाया तो फिर हमें जाने दो। हुर ने सर झुका लिया और बोला मैं अपने हुक्म का पाबंद हूं। इमाम हुसैन ने फरमाया इंसान सिर्फ हुक्म से
19:27
Speaker A
नहीं अपने जमीर से भी पहचाना जाता है। यह अल्फाज हुर के दिल में उतर गए क्योंकि वह जानता था कि सामने रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के नवासे खड़े हैं। लेकिन दूसरी तरफ उबैदुल्लाह बिन जियाद को महसूस होने लगा था कि हुर बिन यज़ीजीद का दिल
19:45
Speaker A
पूरी [संगीत] तरह इस जंग के साथ नहीं है। तो उसने एक और बड़ा कदम उठाया। 4000 सिपाहियों का लश्कर तैयार किया गया और उसकी कमान उमर बिन साद के हवाले कर दी गई। उबैदुल्लाह बिन जियाद ने उसे पैगाम भेजा
19:59
Speaker A
कर्बला जाओ और इस मामले को खत्म करो। उमर बिन साद हिचकिचाया क्योंकि वह जानता था कि सामने कौन [संगीत] है। मगर फिर इब्ने जियाद ने वह चीज पेश की जिसके लिए बहुत से लोग अपने जमीर का सौदा कर बैठते हैं।
20:13
Speaker A
[संगीत] इख्तेदार मंसब जमीनें। उसने कहा अगर तुम यह काम कर दो तो तुम्हें वह इलाके और वह मंसब मिलेगा जिसका तुम इंतजार कर रहे हो और अगर इंकार किया तो सब कुछ किसी और को दे दिया जाएगा। यह एक सौदा था
20:30
Speaker A
दुनिया के बदले आखिरत का और अफसोस उमर बिन साद इस सौदे पर राजी हो गया। चुनांचे वो 4000 सिपाहियों के साथ कर्बला पहुंच गया। अब लश्करों की तादाद बढ़ती जा रही थी। एक तरफ हजारों सिपाही जमा हो रहे थे और दूसरी
20:46
Speaker A
तरफ इमाम हुसैन का छोटा सा काफिला था। [संगीत] फिर वक्त गुजरता गया और मुहर्रम की सात तारीख आ गई। यह वो दिन था जिसने कर्बला की आजमाइश को और ज्यादा सख्त बना दिया। उबैदुल्ला बिन जियाद ने हुक्म दिया
21:03
Speaker A
हुसैन और उनके साथियों को फुरात के पानी तक ना पहुंचने दिया जाए। उमर बिन साद ने फौरन अमल किया और फरात के किनारे पहरे बिठा दिए। सवार तायनात कर दिए गए। रास्ते बंद कर दिए गए। पहला दिन गुजरा फिर दूसरा,
21:21
Speaker A
फिर तीसरा और प्यास बरती गई। खेमों [संगीत] में बच्चे थे जो जंग नहीं जानते थे। सियासत नहीं समझते थे। वो सिर्फ एक लफ्ज जानते थे। पानी। फरात का पानी दूर नहीं था। वो मौजूद था। दिखाई देता था। मगर
21:37
Speaker A
उस तक पहुंचने का [संगीत] रास्ता बंद था। इधर इमाम हुसैन अपने साथियों से मशवरा करते, उनके हौसले बुलंद करते और उन्हें आने वाले वक्त के लिए तैयार करते। फिर मुहर्रम की 9 तारीख आ गई। इमाम हुसैन जान चुके थे कि दुश्मन मजीद मौलत देने के लिए
21:54
Speaker A
तैयार नहीं। लश्कर मुकम्मल हो चुके थे। महासरा मजबूत हो चुका था और आशूरा की सुबह अब ज्यादा दूर नहीं थी। इसी शाम इमाम हुसैन ने अपने तमाम साथियों [संगीत] को जमा किया। वो साथी जो मक्का से उनके साथ
22:10
Speaker A
निकले थे और जो अब कर्बला के मैदान में उनके गिर्द [संगीत] बैठे थे। इमाम हुसैन ने गुफ्तगू का आगाज अल्लाह की हमद से किया। फिर इमाम हुसैन का लहजा बदल गया और उन्होंने वो बात कही जिसने वहां मौजूद हर
22:24
Speaker A
शख्स को खामोश कर दिया। मुझे लगता है कि दुश्मन के साथ हमारा दिन कल होगा। यह अल्फाज सुनते ही हर शख्स समझ गया कि अब वक्त [संगीत] आ चुका है। फिर फरमाया कि मैंने अल्लाह का फैसला देख लिया है। यह
22:40
Speaker A
अल्फाज एक ऐसे [संगीत] शख्स के थे जो तकदीर के करीब आते कदमों को महसूस कर रहा था। रात मजीद गहरी हो गई और फिर इमाम हुसैन ने अपने तमाम साथियों को दोबारा जमा किया। यह वो लम्हा था जिसने वफादारी की नई
22:55
Speaker A
तारीफ लिखी। इमाम हुसैन रज अल्लाह अनू ने फरमाया ऐ लोगों यह लोग सिर्फ मुझे चाहते हैं। [संगीत] उनका मकसद सिर्फ मैं हूं। लिहाजा तुम सब वापस चले जाओ। रात की तारीकी तुम्हारे लिए पर्दा बन सकती है। मैं तुम
23:09
Speaker A
में से किसी को नहीं रोकता। जरा तसवुर करो। जिस शख्स के पास पहले ही बहुत कम साथी हो, वो अपने साथियों को जाने की इजाजत दे रहा है। मगर जवाब ऐसा आया जिसने [संगीत] तारीख में वफादारी को अमर कर
23:23
Speaker A
दिया। आपके बाद जिंदगी का क्या फायदा? हम आपको छोड़कर नहीं जाएंगे। यह वफादारी थी, यह ईमान था। यह वो मोहब्बत थी जिसे ना तलवारें तोड़ सकती थी और ना मौत। फिर वो रात इबादत में गुजरी, दुआओं में गुजरी, कुरान की तिलावत में गुजरी और
23:43
Speaker A
अल्लाह से राजो नियाज में गुजरी। क्योंकि वहां मौजूद बहुत से लोग जानते थे कि शायद यह उनकी जिंदगी की [संगीत] आखिरी रात है। 10 मुहर्रम 61 हिजरी आशुरा की सुबह वो सुबह जिसका इंतजार पूरी रात किया गया था
24:01
Speaker A
और वो सुबह जिसके बाद तारीख कभी पहले जैसी नहीं रहनी थी। एक तरफ हजारों सिपाहियों का लश्कर सफें बांधे खड़ा था। दूसरी तरफ [संगीत] इमाम हुसैन और उनके वफादार साथी। इसी दौरान हुर बिन यजीद अपने घोड़े पर बैठे दूर से सब कुछ देख रहे थे। उसका
24:21
Speaker A
जिस्म लश्कर में था मगर दिल कहीं और। वो अपने साथियों [संगीत] से कहने लगे क्या तुम वाकई हुसैन से जंग करने जा रहे हो? हां हुर तुम्हें क्या हो गया है?
24:33
Speaker A
अल्लाह की कसम मैं खुद को जन्नत और जहन्नुम के दरमियान खड़ा पा रहा हूं। और मैं जन्नत पर किसी चीज को तरजीह नहीं दे सकता। यह कहकर उन्होंने अपने घोड़े का रुख मोड़ा और तेजी से इमाम हुसैन के खमों की तरफ
24:47
Speaker A
बढ़ने लगे। जब वह करीब पहुंचे [संगीत] तो उनका सर झुका हुआ था। आंखों में निदामत थी और दिल तौबा से भरा हुआ। वो इमाम हुसैन के सामने आए और अर्ज किया ऐ फरजंदे रसूल सल्लल्लाहहु अलैहि व आही वसल्लम मैं वही
25:05
Speaker A
हूं जिसने आपका रास्ता रोका था। मैं वही हूं जिसने [संगीत] आपको इस सरजमीन तक पहुंचाया। क्या मेरी तौबा कबूल हो सकती है? इमाम हुसैन ने फरमाया हां अल्लाह तुम्हारी तौबा कबूल करे। जो अल्लाह की तरफ लौट आए अल्लाह उसे दूर नहीं करता। हुर की
25:25
Speaker A
आंखों से आंसू बहने लगे। फिर उसने अर्ज किया मुझे इजाजत दीजिए। मैं सबसे पहले अपनी जान कुर्बान करना चाहता हूं। और यूं हु ने दुनिया का लश्कर छोड़ दिया। और हक के काफिले में शामिल हो गए। कर्बला ने दुनिया को एक अजीम सबक दिया कि जब तक
25:44
Speaker A
सांस बाकी है वापसी का दरवाजा खुला रहता है। फिर जंग शुरू हो गई और कर्बला का मैदान कुर्बानियों की सरजमी बनने लगा। फिर अहले बैत [संगीत] के जवान मैदान में उतरने लगे और उनमें सबसे नुमाया नाम था अली अकबर
26:02
Speaker A
रजिलाहु अन। इमाम हुसैन के बड़े साहबजादे जवानी की उम्र बुलंद हौसला और अपने नाना सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम से मुशाबहत रखने वाले वो मैदान में उतरे और पूरी बहादुरी के साथ मुकाबला किया दुश्मनों की तादाद बहुत ज्यादा थी मगर अली अकबर रज़ अल्लाह अन
26:22
Speaker A
पीछे नहीं हटे वो लड़ते रहे यहां तक कि शदीद जख्मी हो गए जब उनके आखिरी लम्हात करीब आए तो इमाम हुसैन उनके पास पहुंचे इमाम हुसैन ने उन्हें अपनी आगोश में लिया और उनकी तरफ [संगीत] देखते रहे क्योंकि वह
26:38
Speaker A
सिर्फ एक मुजाहिद नहीं थे। वो उनके बेटे भी [संगीत] थे। फिर कर्बला की रेत एक और अजीम कुर्बानी की गवाह बन गई और अहले [संगीत] बैत का एक और चिराग बुझ गया। अली अकबर की शहादत के बाद कर्बला का मैदान मज़द
26:54
Speaker A
बोझल हो गया। हर नई शहादत इमाम हुसैन के दिल पर एक नया जख्म छोड़ रही थी। मगर इसके बावजूद वफादारी का काफिला रुका नहीं। एक-एक करके अहले बैत के जवान शहीद होते गए। और हर शहादत के बाद [संगीत] इमाम
27:11
Speaker A
हुसैन मज़द तन्हा होते गए। मगर एक उम्मीद अभी बाकी थी। एक शख्सियत अभी बाकी थी। एक ऐसा नाम जिस पर बच्चों की उम्मीदें थी, जिस पर खमों की नजरें जमी हुई थी। वो थे हजरत अब्बास। अलमबरदार कर्बला वफादारी की
27:29
Speaker A
अलामत और इमाम हुसैन के सबसे काबिल एतमाद साथियों में से एक खमों में बच्चे प्यास से निढाल थे। फरात का पानी करीब था मगर रास्ता बंद था। आखिरकार उन्होंने [संगीत] इमाम हुसैन से इजाजत तलब की। मुझे इजाजत दीजिए कि मैं फुरात की तरफ जाऊं और पानी
27:50
Speaker A
लाने की कोशिश करूं। इजाजत मिल गई। हजरत अब्बास रज़्लाहु अन अपने घोड़े पर सवार हुए। मशकीजा साथ लिया और फरात की तरफ रवाना हो गए। दुश्मन जानता [संगीत] था कि अगर अब्बास पानी ले आए तो खमों में नई उम्मीद पैदा हो जाएगी। इसीलिए
28:09
Speaker A
पहरे पहले से ज्यादा सख्त थे। [संगीत] मगर हजरत अब्बास आगे बढ़ते रहे। आखिरकार वो फरात के किनारे पहुंच गए। पानी उनके सामने [संगीत] था। ठंडा पानी, साफ पानी। और कई दिनों की प्यास के बाद सिर्फ एक झुकाव उन्हें पानी तक पहुंचा सकता था।
28:27
Speaker A
[संगीत] मगर फिर उन्हें खमों में मौजूद बच्चे याद आ गए। उन्हें अहले बैत रजिला अनू की प्यास याद आ गई। और उन्होंने खुद पानी पीने के [संगीत] बजाय पानी मशकीजे में भरना शुरू कर दिया। मशकीजा भर गया और हजरत अब्बास
28:42
Speaker A
वापसी के लिए मुड़े। लेकिन दुश्मन यह मंजर देख चुका था। अब हर तरफ से हमले शुरू हो गए। तीरों की बारिश, तलवारों के वार और रास्ता रोकने की कोशिशें। मगर हजरत अब्बास मशकीजे को बचाते हुए आगे बढ़ते रहे।
28:58
Speaker A
[संगीत] उनकी एक ही फिक्र थी किसी तरह पानी खेमों तक पहुंच जाए। किसी तरह बच्चे पानी पी लें। मगर दुश्मनों ने हमले तेज कर दिए। मशकीजे को निशाना बनाया गया और फिर पानी जमीन पर बहने लगा। कर्बला की खुश्क
29:15
Speaker A
रेत ने वो पानी भी अपने अंदर जजब कर लिया जिसका इंतजार खेमों में मौजूद बच्चे कर रहे थे। यह मंजर कर्बला के सबसे दर्दनाक मनाजिर में शुमार होता है। क्योंकि यह सिर्फ पानी का बहना नहीं था। यह उम्मीद का
29:30
Speaker A
टूटना भी [संगीत] था। लेकिन अब हजरत अब्बास वापस नहीं आने वाले थे। अलमबरदार कर्बला अपना फर्ज अदा करते हुए अपने रब से जा मिले। जब यह खबर इमाम हुसैन तक पहुंची तो उनके दिल पर एक और जख्म [संगीत] लगा।
29:46
Speaker A
क्योंकि अब्बास सिर्फ एक साथी नहीं थे। वो भाई थे, सहारा थे। वफादारी की अलामत थे। अब कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन पहले से कहीं ज्यादा तन्हा हो चुके थे। इसी दौरान इमाम हुसैन की नजर अपने शीरखार बेटे
30:02
Speaker A
पर पड़ी। अली असगर एक मासूम [संगीत] बच्चा जिसने अभी जिंदगी की इब्तदा ही देखी थी। मगर कई दिनों की प्यास ने उसकी कमजोरी को नुमाया कर दिया था। इमाम हुसैन ने अपने बेटे को आगोश में लिया और मैदान की तरफ
30:17
Speaker A
बढ़े। क्योंकि शायद अब भी किसी दिल में रहम बाकी [संगीत] हो। शायद अब भी कोई जमीर जाग जाए। इमाम हुसैन मुखालिफ लश्कर के करीब पहुंचे और बुलंद आवाज में फरमाया। अगर तुम्हारा इख्तलाफ मुझसे है [संगीत] तो उस मासूम का क्या कसूर है? अगर मुझे पानी
30:34
Speaker A
नहीं देना चाहते तो कम से कम इस बच्चे को [संगीत] पानी दे दो। यह अल्फाज एक बाप की फरियाद थे। एक ऐसे बाप की जो अपने बच्चे [संगीत] के लिए पानी मांग रहा था। कुछ लम्हों के लिए फजा जैसे रुक सी गई। चंद
30:48
Speaker A
निगाहें झुक गई। चंद दिल लरज उठे। मगर जुल्म जब हद से गुजर जाए तो इंसान रहम करना भी भूल जाता है। और फिर एक तीर छोड़ा गया। एक ऐसा तीर [संगीत] जिसने कर्बला के दर्द को हमेशा के लिए तारीख में सब कर
31:04
Speaker A
दिया। इमाम हुसैन की आगोश में मौजूद मासूम बच्चा जख्मी हो गया और एक बाप अपने शीरखार बेटे को देखता रह गया। इमाम हुसैन ने अपने बच्चे को देखा फिर आसमान की तरफ निगाह उठाई क्योंकि अब शिकायत इंसानों से नहीं
31:19
Speaker A
अपने रब से राजो नियाज की थी और फिर वो वापस खेमों की तरफ लौटे। [संगीत] मगर अब कर्बला में तकरीबन सब कुछ कुर्बान हो चुका था। वक्त गुजरता गया और आशुरा का सूरज आहिस्ताआहिस्ता दोपहर की तरफ बढ़ने लगा।
31:35
Speaker A
इसी दौरान नमाज ज़हर का वक्त आ गया। जंग जारी थी। खतरा मौजूद था। तीर चल रहे थे। मगर इमाम हुसैन ने अपने साथियों के साथ नमाज अदा की। [संगीत] यह सिर्फ नमाज नहीं थी। यह एक ऐलान था कि हालात कितने ही सख्त
31:51
Speaker A
क्यों ना हो जाए अल्लाह की बंदगी नहीं [संगीत] छोड़ी जाती। नमाज के बाद इमाम हुसैन ने मैदान की तरफ देखा। फिर खेमों की तरफ देखा, [संगीत] अहले बैत की तरफ देखा और एक आखिरी नजर अपने खानदान पर डाली। फिर
32:05
Speaker A
उन्होंने मैदान की तरफ रुख किया क्योंकि अब आजमाइश का आखिरी मरहला बाकी था। जिस्म पर जख्म थे, शदीद थकन थी। मगर अज्म में कोई कमी नहीं थी। इमाम हुसैन मैदान में उतरे और आखिरी लम्हों तक साबित कदम रहे।
32:22
Speaker A
हर तरफ दुश्मन थे। मगर उनके दिल में सिर्फ अल्लाह था। हर तरफ तलवारें थी मगर उनकी जुबान पर सब्र था। फिर वो लम्हा आ पहुंचा जिसकी खबर रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने बरसों पहले दी थी। वो लम्हा जिसने तारीख [संगीत] का रुख हमेशा के लिए
32:42
Speaker A
बदल दिया। इमाम हुसैन शहीद हो गए। रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे फातिमा रज़ अल्लाहहु अन्हा के लखते जिगर अली रज़ अल्लाहहु अनो के बेटे अपने रब से जा मिले। कर्बला की रेत उस अजीम कुर्बानी की [संगीत] गवाह बन गई और आसमान
33:01
Speaker A
उस सब्र की गवाही देने लगा जिसकी मिसाल तारीख में कम मिलती है। इमाम हुसैन की शहादत के बाद अहले बैत की खवातीन और बच्चों को कैद कर लिया गया। आज 1400 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है। बड़ी-बड़ी
33:18
Speaker A
सल्तनतें मिट गई। बड़े-बड़े बादशाह तारीख के सफा में खो गए। मगर हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। क्योंकि कर्बला ने दुनिया को सिखाया कि हक हमेशा तादाद से नहीं जीता जाता और बाततिल हमेशा ताकत से कामयाब नहीं
33:37
Speaker A
होता। बाज औकात चंद सच्चे लोग हजारों तलवारों से ज्यादा ताकतवर [संगीत] साबित होते हैं। और शायद कर्बला का सबसे बड़ा पैगाम यही है कि जब हक और बाततिल आमने-सामने हो तो खामोशी भी एक इंतखाब बन जाती है [संगीत] और इंसान को फैसला करना
33:57
Speaker A
पड़ता है कि वो किस तरफ खड़ा है। अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं। अगर [संगीत] आप उस दौर में होते तो क्या आप हक के साथ खड़े होते या खामोश तमाशाई बन जाते?
34:09
Speaker A
[संगीत] अपना जवाब कमेंट में जरूर लिखिए और अगर आप चाहते हैं कि कर्बला का यह पैगाम मजीद लोगों तक पहुंचे तो इस वीडियो को जरूर शेयर कीजिए क्योंकि कर्बला सिर्फ एक वाकया नहीं कर्बला एक पैगाम है एक जिम्मेदारी है
34:25
Speaker A
और एक सवाल है जो हर दौर के इंसान से पूछा [संगीत] जाता है। जब हक और बाततिल आमने-सामने हो तो तुम किस तरफ खड़े होगे?
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