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He Sang "Main Sharabi" to Find God? | The Untold Story of Aziz Mian Qawwal | Full Documentary

अजीज मियां कवाल की अनकही कहानी, उनकी तसवुफ़ी यात्रा और कव्वाली में अद्भुत योगदान।

Key Takeaways

  • अजीज मियां की कव्वाली में आध्यात्म और तसवुफ़ की गहरी छाप है।
  • उनकी शिक्षा और बहुभाषी कव्वाली ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध किया।
  • मुर्शद की शर्त ने उनकी आध्यात्मिक यात्रा को नया मोड़ दिया।
  • उनका 'मैं शराबी' गीत उनकी पहचान का प्रतीक बन गया।
  • अजीज मियां ने अपने कलाम खुद लिखे, जो उनकी मौलिकता दर्शाता है।

What the video covers

  • अजीज मियां कवाल की जिंदगी की शुरुआत दिल्ली के रेड लाइट एरिया से हुई जहां उन्होंने अपने मुर्शद की शर्त पूरी की।
  • उन्होंने लाहौर में उर्दू, फारसी और फलसफे में उच्च शिक्षा हासिल की और कव्वाली में फारसी शेरों का प्रयोग किया।
  • 1966 में ईरान के जश्न-ए-हुनरमंदाने आलम में उनकी परफॉर्मेंस ने उन्हें गोल्ड मेडल दिलाया।
  • मलका फरादीबा ने उनकी कव्वाली की प्रतिभा को सराहा और उन्हें खास महफिल में गाने का न्यौता दिया।
  • अजीज मियां ने दिल्ली जाकर मौलाना अब्दुल सलाम नियाजी से तसवुफ़ की तालीम ली, जिसके लिए उन्हें रेड लाइट एरिया में रात बितानी पड़ी।
  • उनकी कव्वाली में 'मैं शराबी' गीत ने दुनियाभर में उनकी पहचान बनाई।
  • अजीज मियां की शायरी और कलाम खुद उनके द्वारा लिखे गए थे, जो उनकी अलग पहचान थी।
  • उनकी कव्वाली ने पाकिस्तान में एक नया दौर शुरू किया और उन्होंने कई देशों में अपनी कला का जादू बिखेरा।
  • उनकी तसवुफ़ी यात्रा और संगीत में गहरा आध्यात्मिक अनुभव झलकता है।
  • अजीज मियां की कहानी में संघर्ष, शिक्षा, आध्यात्म और संगीत का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

Answers

Questions about this video

अजीज मियां ने रेड लाइट एरिया में रात क्यों बिताई थी?

मौलाना अब्दुल सलाम नियाजी ने अजीज मियां को शागिर्द बनाने से पहले एक शर्त रखी थी कि उन्हें एक रात रेड लाइट एरिया में बितानी होगी। यह उनकी तसवुफ़ी यात्रा का हिस्सा था।

अजीज मियां की कव्वाली में फारसी भाषा का क्या महत्व था?

अजीज मियां ने फारसी शेरों का प्रयोग अपनी कव्वाली में किया, जिससे उनकी शोहरत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी और उन्होंने फारसी में भी कव्वाली गाई।

अजीज मियां को ईरान में कौन सा सम्मान मिला था?

1966 में ईरान के जश्न-ए-हुनरमंदाने आलम में अजीज मियां की परफॉर्मेंस से प्रभावित होकर शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने उन्हें गोल्ड मेडल से नवाजा था।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:01
Speaker A
रात का 1:00 बजा था। दिल्ली के रेड लाइट एरिया की तंग गलियों में एक पाकिस्तानी नौजवान घूम रहा था। वो लाहौर से दिल्ली तो किसी का मुरीद बनने आया था। मगर पीर साहब ने अजीब शर्त रख दी। शागिर्द बनना है तो
00:16
Speaker A
एक रात कोठे पर गुजारो। अब वो अपना बोरिया बिस्तर, तकिया चादर लेकर एक पते की तलाश में था। वो एक पुरानी बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर पहुंचा। वहां दो खूबसूरत लड़कियों ने उसका इस्तकबाल किया। उसने बिस्तर वगैरह एक तरफ रखे, जेब
00:33
Speaker A
से पर्स निकाला, रुपए उनकी तरफ बढ़ाए और कहा कि गाना सुनना है और फिर सर झुका कर एक तरफ बैठ गया। एक लड़की ने उसके तकिए बिस्तर को देखा और हंसकर बोली, यहां तो बड़े-बड़े नवाब और अमीरजादे आते हैं। मगर
00:49
Speaker A
वो हमारे ही बिस्तर इस्तेमाल करते हैं। आप तो अपना बोरिया बिस्तर ही साथ ले आए। उसने अब भी सर नहीं उठाया। बस धीमी आवाज में कहा, "मैं यहां अय्याशी के लिए नहीं आया। अपने मुर्शद के हुकुम पर आया हूं। उसके
01:04
Speaker A
मुर्शद का नाम सुनते ही उन लड़कियों पर तो जैसे कपकपी तारी हो गई। दोनों उसके कदमों में लिपट गई। कतार रोने लगी। माफी मांगने लगी। पाकिस्तान से आया यह नौजवान अजीज मियां था। जो बाद में पूरी दुनिया में अजीज
01:21
Speaker A
मियां कवाल के नाम से मशहूर हुआ। अजीज मियां इंडिया में किसे मुर्शद बनाने गए थे? उनके मुर्शद ने रेड लाइट एरिया में रात गुजारने का हुक्म क्यों दिया था? फिर उसे कौन सी शराब पिलाई कि वो दुनिया भर
01:34
Speaker A
में मैं शराबी मैं शराबी गाते रहे। यह सब हम जानेंगे अजीज मियां कवाल की कहानी में। लेकिन उससे पहले हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लें। तो आइए चलते हैं पार्टीशन से पहले कि दिल्ली में जहां अजीज मियां का जन्म हुआ।
01:52
Speaker A
[संगीत] 1942 दूसरी जंग अजीम उरू पर थी। हिंदुस्तान पर राज करने वाले अंग्रेज चाहते थे कि किसी तरह यहां के लोग भी इस जंग में उनका साथ दें। गांधी जी इसके सख्त खिलाफ थे। उन्होंने अंग्रेजों का साथ देने
02:08
Speaker A
के बजाय उनके खिलाफ हिंदुस्तान छोड़ दो मुहिम शुरू कर दी। जवाब में अंग्रेजों ने गांधी समेत कांग्रेस के तमाम बड़े लीडरों को जेल में डाल दिया। वो दौर बहुत ही अफरातफरी का दौर था और उसी दौर में 17
02:21
Speaker A
अप्रैल को दिल्ली में एक ऐसा बच्चा पैदा हुआ जिसने बड़े होकर अंग्रेजों को भी अपने सुरों पर नचाया। उस बच्चे का नाम अब्दुल अजीज रखा गया। पार्टीशन के बाद उनका खानदान लाहौर मुंतकिल हो गया। घराना गरीब था मगर उस बच्चे को तालीम हासिल करने का
02:37
Speaker A
जुनून की हद तक शौक था। उसकी मेमोरी भी गजब की थी। कोई भी शेर एक बार सुन लेता तो हमेशा के लिए याद हो जाता। मौसी का भी शौक था। हारमोनियम भी बजा लेता था। 8-10 साल का हुआ तो उसका रूटीन बन गया कि वो हर
02:52
Speaker A
जुमेरात को दाता दरबार जाता। वहां एक दरख्त के नीचे हारमोनियम बजाता। नातें पढ़ता और क्वाली गाता। 16 साल की उम्र तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहा। इस दौरान वो तालीम भी हासिल करता रहा। अब्दुल अजीज अब एक कड़ जवान अजीज मियां बन चुका था।
03:10
Speaker A
लोग उसे अजीज मियां कवाल के नाम से जानने लगे थे। कुछ लोग कहते थे कि कवाली में उनके उस्ताद अब्दुल वहीद थे। लेकिन अजीज मियां के बकल यह फन उन्होंने किसी से नहीं सीखा था। बल्कि ये खुदा सलाहियत थी।
03:24
Speaker A
जमाना है ना वो सब बड़ा उस्ताद है। लेकिन ज मौसिक दी बाकायदा तालीम जिन कह ना जी वो मैं नहीं हासिल की। वो लाहौर के मुख्तलिफ इलाकों में कवाली की महफिलों में शरीक होते और अपने मुनफलिद अंदाज में कवाली गाते जिसे लोग पसंद करने
03:41
Speaker A
लगे थे। क्योंकि वह अपनी कवाली में बार-बार लफ्ज मियां का इस्तेमाल करते थे। इसलिए लोग उन्हें अजीज मियां कव्वाल कहने लगे थे। नौजवानी में ही उन्होंने गालिब इकबाल समेत उर्दू के मशहूर शायरों का कलाम याद कर लिया था। फिर पंजाब यूनिवर्सिटी
03:57
Speaker A
लाहौर से उर्दू, फारसी और फलसफे में मास्टर्स किया। अंग्रेजी में बैचलर की डिग्री भी हासिल की। उसके बाद अपनी कवालियों में फारसी शेर भी इस्तेमाल करने लगे और फारसी में कवाली भी गाने लगे। जिससे उनकी शोहरत दूसरे मुल्कों तक फैलने
04:13
Speaker A
लगी। [संगीत] मुख्तलिफ़ जगहों पर लिखा है कि 1966 में ईरान के बादशाह मोहम्मद रजा पहलवी ने मुल्क में एक बहुत बड़ा फेस्टिवल मनाया। उसका नाम था जश्न-ए-हुनरमंदाने आलम यानी आर्टिस्ट ऑफ द वर्ल्ड फेस्टिवल। दुनिया भर से फनकार आए। पाकिस्तान से भी एक वक्त गया
04:35
Speaker A
जिसमें अजीज मियां क्वाल भी शामिल थे। वह जब स्टेज पर आए तो लोग यही समझे थे कि वह एक कवाली गाएंगे और चले जाएंगे। मगर उन्हें नहीं पता था कि अजीज मियां ऐसा रंग जमाएंगे कि सारी महफिल पर वही छा जाएंगे
04:50
Speaker A
और सुनने वाले दंग रह जाएंगे। उन्होंने हारमोनियम संभाला और फारसी में कवाली शुरू की तो ऑडियंस पे जैसे सक्ता तारी हो गया। यह कैसे हो सकता है? कोई परदेसी हमारी जुबान, हमारे लहजे और हमारे अंदाज में गाए?
05:07
Speaker A
हैरान होने वालों में शाह मोहम्मद रजा पहलवी भी शामिल थे। वो अजीज मियां की परफॉर्मेंस से इतने खुश हुए कि उन्होंने अजीज मियां को गोल्ड मेडल से नवाजा। मलका फरादीबा भी अजीज मियां से बहुत मुतासिर हुई। कहते हैं कि उन्होंने फरमाइश की कि
05:23
Speaker A
अजीज मियां महल में आए और वहां हमारे लिए खुसूसी महफिल में गाएं। अब होना तो यह चाहिए था कि अजीज मियां खुश होते उसे अपने लिए एजाज समझते और फौरन हां कर देते। लेकिन उन्होंने मलका के सामने एक अजीब
05:37
Speaker A
शर्त रखी। उन्होंने कहा कि स्टेज पर कबाली गाने वालों के सिवा कोई नहीं होगा। बादशाह और मलका को उनके सामने जमीन पर बैठना होगा। जैसे आम सामईन बैठते हैं। शर्त मान ली गई। फिर दुनिया ने देखा कि ईरान की
05:51
Speaker A
तारीख में पहली बार मलका और बादशाह जमीन पर बैठे थे और फनकार ऊपर स्टेज पर। फिर एक और अजीब बात हुई। मलका फरादीबा ने अपने सेक्रेटरी के हाथों हाफिज शिराजी की एक किताब अजीज मियां के पास भिजवाई कि यह
06:05
Speaker A
वाली गज़ल गाएं। अजीज मियां ने गज़ल को सिर्फ देखा और किताब बंद करके पूरी गज़ल कव्वाली की सूरत में सुना दी। मलका ने दोबारा किताब भेजी और एक और गज़ल की फरमाइश की। अजीज मियां ने इस बार भी गज़ल को सिर्फ
06:19
Speaker A
एक नजर देखा और किताब बंद करके गज़ल सुना दी। जब मलका ने तीसरी बार सेक्रेटरी को भेजा तो अजीज मियां ने उनसे अर्ज किया कि वो बार-बार सेरी को ना भेजें। बस किताब का सफा नंबर या गजल का पहला मिश्रा बता दें
06:34
Speaker A
तो मैं वो गजल गा दूंगा। मलका फरादीबा का हैरत से मुंह खुला रह गया और वो यह कहे बगैर ना रह सकी कि अजीज मियां दुनिया का वाहिद कवाल है जिसे हाफिज शिराजी का पूरा कलाम जबानी याद है। जब उन्होंने मेरा लहजा
06:49
Speaker A
और मेरे अशार की आमद देखी तो वह हैरान होके रह गए कि यह पाकिस्तान की सर जमीन से ताल्लुक रखने वाला एक कवाल है और वो परर्शियन और फारसी इस तरह बोलता है कि जिस तरीके से ईरान सीना बसीना चलने वाली ऐसी रिवायतों ने
07:03
Speaker A
अजीज मियां की शोहरत को चार चांद लगा दिए। बहरहाल अजीज मियां इसके बाद भी अक्सर ईरान जाते रहते थे और अपने फन का जादू जगाते थे। अब आते हैं उनकी दिल्ली यात्रा की तरफ। यह 1965 की पाक भारत जंग से पहले की बात है।
07:22
Speaker A
किताब आफताब इल्मो इरफान के मुताबिक तालबेल्मी के दौर में अजीज मियां को इबने अरबी की फतूहात मकिया पढ़ने और समझने का शौक हुआ। यह तसवुफ की बड़ी अहम किताब शुमार होती है। जिसमें सूफी फलसफे, मारफत, शरीयत, तरीकत, हकीकत, कायनात, इंसान और
07:40
Speaker A
रूह के तमाम मामलात का तफसीली जिक्र है। अजीज मियां को यह किताब समझने के लिए किसी ने दिल्ली जाने का और मौलाना अब्दुल सलाम नियाजी से मिलने का मशवरा दिया। वो कुरान के मुफसिर, मुद्दिस और तसवुफ की दुनिया के
07:54
Speaker A
बड़े नामों में शामिल थे। कराची यूनिवर्सिटी के डॉक्टर अबुल लैस सिद्दीकी, भारत के साबिक सदर डॉक्टर जाकिर हुसैन और जोश मली आबादी जैसी शख्सियात उनकी शागिर्द रह चुकी हैं। अजीज मियां ने सामान बांधा और लाहौर से दिल्ली पहुंच गए। उनके पास
08:10
Speaker A
दरी, चादर, तकिए पर मुश्तमिल एक बिस्तर और ब्रीफ केस था। सीधे मौलाना अब्दुल सलाम नियाजी के मकान पर गए और बताया कि वो उनसे फतूहात मकिया पढ़ना चाहते हैं। मौलाना ने पहले तो इंकार किया। मगर जब इसरार हुआ तो
08:24
Speaker A
शर्त रखी कि पहले तुम्हें एक रात बाज़ारे हुस्न में गुजारनी होगी। उसके बाद हम तुम्हें अपने शागिर्दी में लेंगे। अगर यह मंजूर नहीं तो अपना सामान उठाओ और यहां से चलते बनो। अजीज मियां हर सूरत वो किताब पढ़ना चाहते
08:41
Speaker A
थे। भारी दिल के साथ सामान उठाया। रिक्शे में बैठे और तवाइफ के कोठे की जानिब चल पड़े। रिक्शे वाले ने एक इमारत के सामने उतार दिया। रात का 1:00 बज रहा था। अजीज मियां सीढ़ियां चढ़ते चले गए और फिर जैसा
08:56
Speaker A
कि हमने पहले बताया कि वो लड़कियां उनके मुर्शद मौलाना अब्दुल सलाम नियाजी का नाम सुनते ही अजीज मियां के कदमों में गिर पड़ी और रोने लगी थी। अजीज मियां ने वजह पूछी तो बताया कि हमारे मुआशी हालात पहले
09:11
Speaker A
बहुत बुरे थे। अक्सर फाकों की नौबत आती थी। मौलाना की खिदमत में हाजिर हुई तो उन्होंने दुआ फरमाई और नसीहत की कि तुम्हारे पास तीन आदमी आया करेंगे। तुम सिर्फ उन्हीं को गाना सुनाना। यह तीन आदमी हफ्ते में दो दिन गाना सुनने के लिए आते
09:27
Speaker A
हैं। अब सुरते हाल यह है कि इस मोहल्ले के सबसे मालदार हम लोग हैं। हर जुमरात हम मौलाना साहब के पास जाती हैं और इल्तजा करती हैं कि कभी वो हमारे गरीब खाने पर तशरीफ लाएं। वो हमेशा एक बात कहते हैं। जब
09:42
Speaker A
भी मेरा कोई शागिर्द तुम्हारे पास आए तो समझ जाना मैं आ गया हूं। यह 8 10 साल का इंतजार आज खत्म हो गया। अगली सुबह जब अजीज मियां मौलाना की खिदमत में हाजिर हुए तो वह मुस्कुराए और बोले कहो मियां बंदोबस्त
09:58
Speaker A
अच्छा हो गया कोई परेशानी तो नहीं हुई उसके बाद उन्होंने अजीज मियां को अपनी शागिर्दी में ले लिया। तसवुफ का यह दरस लेकर अजीज मियां पाकिस्तान वापस आए और अपनी कबालि
10:16
Speaker A
था जब मशहूर कव्वाल साबरी बिरादरान का दूर-दूर तक कोई मुकाबला नहीं था। उन दिनों अजीज मियां सिर्फ पंजाबी या फारसी में ही कवाली गाते थे। मगर जब उन्होंने साबरी बिरादरान को उर्दू में कवाली गाते सुना और लोगों में उनकी मकबूलियत देखी तो उनमें भी
10:32
Speaker A
उर्दू कव्वाली का शौक पैदा हुआ। अजीज मियां ने उन शायरों से राब्ता करने की कोशिश की जो साबरी बिरादरान के लिए कव्वाली के बोल लिखते थे। मगर उन शायरों ने अजीज मियां को लिफ्ट नहीं कराई। या यूं कह लें कि उन्होंने अजीज मियां को सीरियस
10:46
Speaker A
ही नहीं लिया। लेकिन क्या करें अजीज मियां के सर पर तो उर्दू कबाली का भूत सवार था। इसी शौक और जुनून की हालत में एक दिन वो दाता दरबार पर बैठे थे कि आमद शुरू हो गई। अल्फाज़ की बारिश बूंदों की तरह उनके ज़हन
11:00
Speaker A
पर गिरने लगी। इन्हीं लफ्जों को अपनी आवाज में पिरोकर उन्होंने वो कवाली गाई जिसने पूरे बरे सगीर में धूम मचा दी। आज पीने में क्या खराबी है मैं। म्यूजिक कंपनी ईएमआई ने यह कवाली 1973 में रिलीज की। इस कवाली में अजीज मियां ने लिखने,
11:17
Speaker A
धुन बनाने और गाने का एक नया अंदाज दरियाफ्त किया था। जिस पर उन्होंने अपनी मोहर लगाई और फिर बाकी पूरी जिंदगी उसे बरकरार रखा। मेरे दौर में जो कबाल हजरात थे मैंने उन्हें देखा कि वह अशार तो एक दो
11:32
Speaker A
या तीन और जहां तक गलेबाजी राग मुर्गियां फंदे ये इसकी भरमार ज्यादा रखते थे तो आवाम जो थीकि वो मौसिक एक बहुत ही अदक सब्जेक्ट है और आदमी आवाम इसके मुताहमिल नहीं है। बहुत कम लोग आशना है। मैंने ये
11:53
Speaker A
सोचा कि आवाम में इसे किस तरह मकबूल करूं। लिहाजा मैंने मौसी का अमेज़ा कम किया, सहारा लिया और उसकी जगह मज़ामीन और अशार की भरमार ये मैंने अपने फल में पैदा की। उनका अंदाज बिल्कुल मुनफिद था। वो आहिस्ता-आहिस्ता शुरुआत करते फिर जोरदार
12:12
Speaker A
आवाज में दलाइल से भरपूर अशार से लोगों को अपने शहर में जकड़ लेते। [संगीत] 70 की दहाई तक अजीज मियां मकबूल तरीन क्वाल बन चुके थे। पाकिस्तान और भारत में उनके कॉन्सर्ट हाउसफुल होने लगे। टिकटें ब्लैक होती लोग घंटों पहले कतार में खड़े
12:29
Speaker A
हो जाते। इज्जत, दौलत और शोहरत के सारे दरवाजे उन पर खुल चुके थे। कवाली मैं शराबी की जबरदस्त कामयाबी ने अजीज मियां को अपने दौर के बड़े कवालों की फहरिस्त में ला खड़ा किया। वो अब साबरी बिरादरान के लेवल के कवाल बन चुके थे। उन
12:46
Speaker A
दिनों जुल्फिकार अली भुट्टो वज़रे आजम थे। फनो सकाफत को पसंद करते थे और उन्होंने रियासती मीडिया को हिदायत दे रखी थी कि टीवी और रेडियो पर बाकायदगी से लोक मौसी और कवाली नशर की जाए। जब अजीज मियां की
13:00
Speaker A
कवाली मैं शराबी रेडियो और टीवी पर चली तो उनकी शोहरत नई बुलंदियों को छूने लगी। अजीज मियां की मकबूलियत से साबरी बिरादरान की शोहरत मान पड़ने लगी। ऐसे में कंपटीशन पैदा होना फितरी था क्योंकि दोनों की मार्केट एक थी और टारगेट भी [संगीत] एक
13:16
Speaker A
ही। यानी मुल्क के शहरी इलाकों की ऑडियंस। साबरी बिरादरान ने निजी महफिलों में अजीज मियां का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया कि उनका स्टाइल बहुत तेज और अग्रेसिव है। उनकी गायकी में सुर और लय भी नहीं। यहां तक कह दिया कि अजीज मियां की कवालियों में
13:31
Speaker A
सिवाय चीखने चिल्लाने के कुछ नहीं होता। सबसे ज्यादा निशाना उन्होंने अजीज मियां की कवाली मैं शराबी को बनाया। और यह कहना शुरू कर दिया कि कबावालियों में शराब जैसी नशा और चीज की खुले लफ्जों में तारीफ कोई अच्छी बात नहीं। जवाब में अजीज मियां ने
13:47
Speaker A
अपनी इस कवाली का ड्यूरेशन मजीद 30 मिनट बढ़ा दिया। 20 मिनट वाली कवाली अब 50 मिनट की हो गई। यह तवील कवाली 1975 में रिलीज हुई और चंद ही महीनों में इसकी 10 लाख कैसेट्स फरोख्त हो गई। इसी साल साबरी
14:01
Speaker A
बिरादरान ने कवाली भरदे झोली रिलीज की। यह भी सुपरहिट हुई। यह कव्वाली 1975 में ही बनने वाली फिल्म बिन बादल बरसात में शामिल की गई। अगले साल अजीज मियां कव्वाल एक फिल्म में खुद कव्वाली गाते नजर आए। यह पंजाबी फिल्म
14:17
Speaker A
लाइसेंस थी। 1976 में वजीर आजम जुल्फिकार अली भुट्टो ने अजीज मियां को इस्लामाबाद बुलाया कि उनके लिए गाएं और साथ बैठकर एक-दो पैग लगाएं। अजीज मियां खुशी-खुशी हाजिर हो गए। उस मुलाकात ने गुलोकारों के हलकों में अजीज मियां को और नुमाया कर दिया। अब एक
14:36
Speaker A
तरफ यह हाल था कि अजीज मियां की कवाली मैं शराबी की शोहरत कम होने का नाम नहीं ले रही थी। हर तरफ उसकी धूम मची हुई थी। नतीजा यह हुआ कि साबरी बिरादरान जो इस कवाली पर तंज तो करते ही थे। अब उन्होंने
14:49
Speaker A
इस पर एक कवाली तक गाड़ डाली। कवाली का अंदाज मुकम्मल तौर पर तंजिया था। जो ही यह कवाली मार्केट में आई, लोगों की जुबान पर चढ़ गई। बच्चा-बच्चा उसे गुनगुनाने लगा। लोग हंसते और कहते यह तो अजीज मियां के लिए है। यानी सबको पता चल
15:05
Speaker A
गया था कि साबरी बिरादरान की इस कवाली का निशाना कौन है। अजीज मियां भी भला कहां चुप रहने वाले थे। फौरन ही इसका जवाब दिया। एक कवाली लिखी उसे रिकॉर्ड कराया और रिलीज कर दिया। हाय कमबख्त तू [संगीत]
15:19
Speaker A
इस कवाली में उन्होंने साबरी बिरादरान पर तंज किया कि वो जिस नशे की बात कर रहे हैं उसकी रूहानियत को वो समझने और महसूस करने से महरूम है। तवील कवाली के आखिर में उनका तंज गुस्से में बदल जाता है और वो अपने
15:33
Speaker A
हरीफ को निशाना बनाते हुए कहते हैं कि वो अल्लाह वाले के इश्क को कैसे समझेंगे जब उन्हें मालूम ही नहीं कि यह नशा होता क्या है और कैसा लगता है। इस कवाली की भी लाखों कैसेट्स फरोख्त हुई। लोग पागल हो गए।
15:47
Speaker A
दोनों कवालियां मार्केट में एक साथ धड़ाधड़ फरोख्त हो रही थी। उस झगड़े ने पाकिस्तान ने कव्वाली को उरूज पर पहुंचा दिया। एक तरफ से आवाज आती थी, "ऐ शराबी छोड़ दे पीना, तो दूसरी तरफ से यह आवाज बुलंद होती थी। हाय कमबख्त तूने पी ही
16:03
Speaker A
नहीं। अजीज मियां की शोहरत दूरदराज के मुल्कों में भी फैल चुकी थी। अजीज मियां ने बैरूने मुल्क कई टूर्स किए। अमेरिका, बर्तनानिया फ्रांस जर्मनी सोवियत यूनियन और ईरान समेत कई मुालिक के सामईन को थिरकने और झूमने पर मजबूर किया। लेकिन
16:18
Speaker A
फिर 1977 में मार्शल लॉ लग गया। मिस्टर भुट्टो की हुकूमत खत्म हो चुकी है। सारे मुल्क में मार्शल लॉ नाफिज़ कर दिया गया है। पाकिस्तान में शराब की खरीदो फरोख्त पर पाबंदी लग चुकी थी। अब शराब पीना तो क्या
16:30
Speaker A
नाम लेना भी जुर्म था। अब ऐसे में कोई कहे कि मैं शराबी, मैं शराबी तो सोचिए क्या होगा। अजीज मियां के साथ भी वही हुआ। उनकी महफिलों में अक्सर छापे पड़ते। कभी-कभी अजीज मियां को पुलिस थाने भी ले जाती। वो
16:43
Speaker A
वहां थाने जाते, छूट कर आते और वापस आकर मैं शराबी, मैं शराबी गाने लगते। मोहताज जरूर हो गए थे मगर बाज नहीं आए। अब उनके पिटारे में ज्यादातर रिवायती कवालियां शामिल होती थी। मगर वो हमेशा अपनी महफिल का इख्तताम शराबी वाली कवाली से ही करते।
17:00
Speaker A
लोग डरते तो वो हंसकर कहते घबराओ मत। छापा पड़ा तो पकड़ा मैं जाऊंगा। तुम लोग नहीं। खड़े नहीं जांगा पैदा की जा अगस्त 1988 में जिया की आम्रियत तो खत्म हो गई मगर वो पाकिस्तान से कव्वाली का सुनहरा दौर भी साथ ले गई जो आज तक वापस
17:19
Speaker A
नहीं आया। अजीज मियां ने बहुत कोशिश की मगर 11 साल का तवील वफा आ चुका था। अब ना वो महफिलें थी ना लोगों की कवाली में पहले जैसी दिलचस्पी। अजीज मियां मायूस हो गए। इसी दौरान एक नया नाम मैदान में आया जिसने
17:36
Speaker A
कबाली को ना सिर्फ दोबारा जिंदा किया बल्कि अजीज मियां और साबरी बिरादरान को पसमंजर में धकेल दिया। वो नाम था नुसरत फतेह अली खान। [संगीत] अजीज मियां 1990 की पूरी दहाई में गाते रहे। मगर नुसरत फतेह अली खान और दूसरे नए
17:54
Speaker A
कवालों ने उन्हें कभी दोबारा उभरने का मौका नहीं दिया। 1973 से 1982 की शोहरत और कामयाबी का जो आसमान अजीज मियां का था, आज उस पर नुसरत फतेह अली खान उड़ रहे थे। उनकी आवाज और अंदाज ने सुनने वालों को
18:08
Speaker A
अपने शहर में जकड़ लिया था। 1980 से 1990 की दहाई के दौरान नुसरत फतेह अली कव्वाली के मैदान में छाए रहे। इस अरसे में उनके एल्बम की 1 करोड़ से ज़्याद कॉपियां फ़रोख्त हुई। लेकिन उनमें और अजीज मियां में एक
18:22
Speaker A
बड़ा फर्क था शायरी का। अजीज मियां अपनी शायरी के बोल खुद लिखते थे। जबकि नुसरत फतेह अली खान ने कभी एक लफ्ज तक नहीं लिखा था। अजीज मियां वैसे तो अपना कलाम ही गाते थे। मगर उन्होंने अल्लामा इकबाल, कतील
18:36
Speaker A
शिफाई और दीगर शोहरा के कलाम को भी कवाली की सूरत में पेश किया। वो आला तालीम याफ्ता तो थे ही मगर उनका मुताला भी बहुत वसी था। फलसफे से गहरी दिलचस्पी थी। अपने ख्यालात का इज़हार हमेशा दलील और मंतक के
18:50
Speaker A
साथ करते थे। [संगीत] अजीज मियां की कवालियां आज भी सुनने वालों पर वज तारी कर देती हैं। उनकी हमदिया और नातिया कवालियां आज भी रोजे अव्वल की तरह मकबूल है। अल्लाह ही जाने कौन बशर है। नबी नबी या नबी नबी ना कलीम का तसवुर ना ख्याल
19:11
Speaker A
तूर सीना मेरी आरजू मोहम्मद मेरी जुस्तजू मदीना। कल्प और रूह को आज भी तस्कीन का सामान फराहम करती हैं। उन्होंने कवाली के कदीम फन को ना सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि इसे नए जमाने के साथ जोड़ दिया। वो अपनी जात
19:25
Speaker A
में एक फलसफी, शायर और सूफी मुफकिर भी थे। उनके लिए उनकी ऑडियंस ही सब कुछ थी। वह कभी उन्हें मायूस नहीं करते थे। एक बार क़तर में प्रोग्राम था। वह बहुत ज्यादा थके हुए लग रहे थे। हुआ यह था कि उसी रोज
19:39
Speaker A
उन्होंने रावलपिंडी में कवाली की थी। उसके बाद फ्लाइट पकड़ कर सीधे क़तर चले गए। थकावट तो थी ही और यह थकावट नजर भी आ रही थी। मगर उन्होंने वहां मौजूद पब्लिक को यकीन दिलाया कि वो परेशान ना हो क्योंकि
19:53
Speaker A
वो जब थके हुए होते हैं तो और अच्छा गाना गाते हैं। आप ये महसूस ना करें कि कवाली में कोई फर्क आएगा। जिस दिन थका हुआ होता हूं उस दिन ज्यादा थका जाएगा। अजीज मियां पान बहुत शौक से खाते थे।
20:07
Speaker A
जान है तो जान है प्यारे और जिंदगी पानदान है प्यारे। [हंसी] 28 अप्रैल 1983 को अजीज मियां को वो शहादत मिली जो आज तक किसी कवाल को नसीब नहीं हुई। किस्सा यह है कि वो उमरे के लिए मक्का मुकर्रमा में मौजूद थे। वो जिस होटल
20:22
Speaker A
में ठहरे हुए थे वहां लोगों को पता चला कि अजीज मियां आए हुए हैं तो मजमा लग गया। लोगों ने अमीर मक्का से दरख्वास्त की कि अजीज मियां से यहां कबाली करवाई जाए। अमीर मक्का ने इजाजत दे दी। खाना काबा के ऐन
20:36
Speaker A
सामने स्टेज लगा। अजीज मियां रात 9:00 बजे से सुबह 4:00 बजे तक कवाली करते रहे। अल्लाह तबारक व ताला ने जहां और एजाजात दिए उनमें ये मैं तो समझता हूं सबसे बड़ा एजाज है के 1400 साला तारीख शाहिद है।
20:50
Speaker A
[संगीत] आज तक वहां कोई ऐसी महफिल ना हुई। रात के 9:00 बजे से [संगीत] सुबह 4:00 बजे तक बिल्कुल आम महफिल थी। तकरीबन 7 8000 पाकिस्तानी [संगीत] हजरात का मजमा था और दीगर यानी अरब लोग भी थे वहां के और तमाम शब कवाली
21:07
Speaker A
होती रही। खुदा का फजलल है मैं समझता हूं कि ये एजाज मुझे वहीं से अता ये तो अजीज मियां का दावा था। ताम उस दौर में मक्का में रहने वाले कहते हैं कि यह कवाली हरम में नहीं बल्कि वहां से दूर एक
21:19
Speaker A
खाली प्लॉट में मुनकिद हुई थी। खैर 1989 में उन्हें तमगा हुस्ने कारकरदगी से नवाजा गया। यह एजाज हुकूमत पाकिस्तान की जानिब से उनके फन की सलाहियतों का एतराफ है। 1994 में साबरी बिरादरान के गुलाम फरीद साबरी चल बसे। भाइयों की जोड़ी टूटी तो
21:36
Speaker A
उनका फन भी बिखर गया। 1997 में नुरसत फतेह अली खान भी दुनिया छोड़ गए। अजीज मियां के लिए मैदान एक बार फिर खाली था। मगर उनका दौर गुजर चुका था और ऊपर से हेपेटाइटिस की बीमारी भी उन्हें घेर चुकी थी। जिगर जवाब
21:50
Speaker A
दे रहा था। जिस्म कमजोर और आवाज में थकावट आ चुकी थी। दिसंबर 2000 में हुकूमत ईरान ने अजीज मियां को यौमे अली पर कबाली के लिए मदू किया। अब सेहत तो पहले जैसी थी नहीं। सफर करने के काबिल भी नहीं थे।
22:04
Speaker A
लेकिन इसके बावजूद वो तेहरान पहुंचे और वहां मुसलसल 6 घंटे तक कबाली गाई। हैरतंगेज तौर पर उनके अंदाज, लहजे और गायकी से कहीं महसूस नहीं हो रहा था कि वह बीमार हैं। वहां मौजूद लोगों को अंदाजा ही नहीं था कि स्टेज पर बैठा यह शख्स अपने
22:21
Speaker A
अंदर कितने दर्द और कितनी तकलीफों से लड़ रहा है। अगली सुबह यानी 5 दिसंबर को अजीज मियां का इंतकाल हो गया। जा [संगीत] सूरत के यूं पाकिस्तान में कवाली का एक और अजीम सितारा गुरूब हो गया। अजीज मियां की मयत
22:41
Speaker A
पाकिस्तान लाई गई और उन्हें मुल्तान में दफन किया गया। अजीज मियां के तीन बच्चे अब अपने वालिद के फन को आगे बढ़ा रहे हैं। आपको अजीज मियां की कवालियां कैसी लगती हैं और कौन सी कवाली सबसे ज्यादा अच्छी
22:53
Speaker A
लगती है? हमें कमेंट्स में जरूर बताइएगा। [संगीत]
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