सेठ आबिद की कहानी, जिन्होंने पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम में सोना स्मगलिंग के जरिए अहम भूमिका निभाई।
Key Takeaways
- सेठ आबिद ने पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम में पुर्जों की तस्करी कर अहम योगदान दिया।
- उनकी भूमिका विवादित रही, लेकिन उनकी हिम्मत और नेटवर्क का कोई सानी नहीं था।
- उनकी निजी जिंदगी में दुख और त्रासदियां थीं, जो उनकी कहानी को और जटिल बनाती हैं।
- पाकिस्तान के एटमी विकास में सिर्फ वैज्ञानिक और नेता ही नहीं, बल्कि ऐसे भी किरदार थे जिनका नाम दस्तावेजों में नहीं मिलता।
- सेठ आबिद की कहानी पाकिस्तान की राजनीतिक और सुरक्षा इतिहास का एक अनकहा पहलू है।
What the video covers
- 1980 के दशक में पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम में महत्वपूर्ण पुर्जों की कमी के कारण काम रुका था।
- सेठ आबिद ने सरकार को बिना कोई पैसा लिए एटमी बम के पुर्जे लाने का प्रस्ताव दिया।
- वे अरब शेखों और माहीगीरों के नेटवर्क का इस्तेमाल कर यूरोप से आवश्यक पुर्जे पाकिस्तान लाए।
- सेठ आबिद को सोने का बड़ा स्मगलर माना जाता था और उनका नाम इंटरपोल की वांछित सूची में था।
- उनकी निजी जिंदगी में कई दुखद पहलू थे, जैसे दो बेटे गूंगे बहरे थे और एक बेटे की हत्या हुई।
- पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम में उनकी भूमिका को लेकर विवाद और विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं।
- डॉ. अब्दुल कदीर खान ने सेठ आबिद के योगदान को कई बार नकारा है, जबकि कुछ सियासतदान उनकी तारीफ करते हैं।
- सेठ आबिद का जन्म कुसूर में हुआ और वे कराची में सोने के व्यापार में सफल हुए।
- उनकी गिरफ्तारी केवल एक बार हुई थी, लेकिन वे कई बार एफआईआर में नामजद रहे।
- उनकी मौत के बाद भी उनके जीवन से जुड़ी कई कहानियां और रहस्य बने हुए हैं।
Chapters
- 00:00एटमी प्रोग्राम में बाधाएं और सेठ आबिद का प्रवेश
- 01:40सेठ आबिद की निजी जिंदगी और परिवारिक दुख
- 03:07पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम का इतिहास और राजनीतिक दबाव
- 04:40सेठ आबिद का सोना स्मगलिंग कारोबार और नेटवर्क
- 09:07सेठ आबिद की गिरफ्तारी और कानूनी चुनौतियां
- 10:23सेठ आबिद की राजनीतिक और सामाजिक भूमिका
- 18:37सेठ आबिद का परिवार और बाद की पीढ़ी
- 22:00सेठ आबिद की विरासत और विवादित छवि
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Speaker A
80 की दहाई की शुरू में कुछ अहम पुरजे न होने की वजह से एडमी प्रोग्राम पर काम रुक गया। साइंसदान मायूस थे। हुकूमत बेबस थी, मगर एक शख्स था जो खामोशी से सब देख रहा था। उसके पास पैसा था, नेटवर्क था और सबसे
Speaker A
बढ़कर थी जुर्रत। [संगीत] वो था हमारी कहानी का मरकजी किरदार। [संगीत] सेठ आला। कहते हैं कि सेठ आबिद ने हुकूमत से कहा, "आपको एटम बम के पुरजे चाहिए, मैं लाऊंगा और एक पैसा भी आपको नहीं देना पड़ेगा।" यह
Speaker A
सुनकर सदर जिया वज़रा और दीगर हुकाम हैरान रह गए। ऐसी जबरदस्त पेशकश कैसे इंकार किया जा सकता था?
Speaker A
वो कोई मामूली करोड़पति नहीं, अरबों का मालिक था। पाकिस्तान के चंद अमीर तरीन लोगों में उसका नाम सर फेहरिस्त था। [संगीत] कहानियां मशहूर हैं कि उसने दुबई के एक शेख के साथ जुआ खेलते हुए एक रात में इतनी
Speaker A
रकम हार दी कि सुनकर कोई भी दंग रह जाए। शेख ने तंजिया अंदाज में पूछा, "अब इतना सब हार कर गुजर-बसर कैसे करोगे?" उसने खिड़की से बाहर एक नजर डाली और मुस्कुराते हुए पूछा, "शेख साहब, आपका यह दुबई कितने का है?
Speaker A
आपका ये दुबई कितने का है?" उसके पास दौलत थी, इज्जत थी, ताकत थी। मगर किस्मत ने उसे वह सुख न दिया जो हर बाप का ख्वाब होता है। दो बेटे पैदाइशी गूंगे बहरे। तीसरा बेटा जो नॉर्मल था, भरी जवानी में कत्ल कर
Speaker A
दिया गया। फिर बेटी भी दुनिया से चली गई। वो एक खुशनसीब इंसान था, मगर एक बदकिस्मत बाप। और हां, यह वही शख्स था जिसे पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम का एक अहम किरदार भी कहा जाता है। कहते हैं अगर वो
Speaker A
ना होता तो शायद पाकिस्तान कभी जोहरी ताकत न बन पाता। उस शख्स के बारे में जानने से पहले हम देखते हैं कि पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम का आगाज कैसे हुआ। [संगीत] 12 जनवरी 1972, मुल्तान की एक सर् और खामोश
Speaker A
शाम। एक पुरानी कोठी के बंद दरवाजे के पीछे चंद ताकतवर लोग जमा थे। मुल्क के वजीर आजम जुल्फिकार अली भुट्टो मेज के एक सिरे पर बैठे थे। सामने पाकिस्तान के बड़े-बड़े साइंसदान। फिजा में कुछ ऐसा तनाव था जो लफ्जों में बयान नहीं किया जा
Speaker A
सकता। भुट्टो ने अचानक मेज पर हाथ मारकर सवाल किए। "क्या पाकिस्तान एटम बम बना सकता है?" कमरे में सन्नाटा छा गया। सब इस सवाल पर एक दूसरे का मुंह तक रहे थे। फिर किसी ने जुर्रत करके कहा, "मुमकिन है मगर मुश्किल
Speaker A
है।" कोई बोला, "नामुमकिन है क्योंकि हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं।" किसी ने उम्मीद दिलाई, "5 साल में बना सकते हैं।" भुट्टो ने तीन उंगलियां उठाई और कहा, "3 साल बस।" [संगीत] यह वो लम्हा था जब पाकिस्तान के एटमी ताकत
Speaker A
बनने का सफर शुरू हुआ जो कई बरसों बाद मंजिल तक पहुंचा। लेकिन यह सिर्फ साइंसदानों या हुक्मरानों का कारनामा नहीं था। इस दास्तान में कुछ ऐसे किरदार भी थे जिनके नाम सरकारी कागजों में नहीं मिलते। मगर वह तारीख का धारा बदलने की ताकत रखते
Speaker A
थे। ऐसा ही एक किरदार था सेठ आबिद। [संगीत] जिसे कोई सोने का स्मगलर कहता था। कोई निजात दाहिंदा, कोई उसे वतन का वफादार मानता था तो कोई रियासती साजिशों का हिस्सा। मगर सच क्या है? आइए खोज लगाने की
Speaker A
कोशिश करते हैं आपके लाइक सब्सक्राइब के साथ। [संगीत] कहानी को आगे बढ़ाने से पहले कुछ बैकग्राउंड समझ लें। जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1972 में एटॉमिक एनर्जी कमीशन को एटम बम पर काम शुरू करने के ऐकामात तो जारी कर
Speaker A
दिए थे। मगर काम इतना आसान नहीं था। ग्लोबल विलेज का चौधरी अमेरिका नहीं चाहता था कि पाकिस्तान एटमी ताकत बने। उधर 1974 में भारत ने पोकरान में एटमी धमाके कर दिए। पाकिस्तान में खौफ और तशवीश की लहर दौड़ गई। भुट्टो ने एटॉमिक एनर्जी कमीशन
Speaker A
से पूछा तो मालूम हुआ कोई खास पेशरफ्त नहीं हुई थी। उन्हीं दिनों एटमी [संगीत] साइंसदान डॉ. अब्दुल कदीर खान ने नीदरलैंड से खत लिखकर अपनी खिदमात पेश की। भुट्टो ने उन्हें बुलाकर यह जिम्मेदारी सौंप दी। काम तेज हो गया और उसके साथ अमेरिका का
Speaker A
दबाव भी। इस दौरान पाकिस्तान ने फ्रांस से एटमी रिप्रोसेसिंग प्लांट का मुयदा कर लिया था। अगस्त 1976 में अमरीकी वज़ीर-ए-खारजा हेनरी कैसेंजर पाकिस्तान आए और भुट्टो से मुलाकात में उन्हें एटमी प्रोग्राम से बाज रहने की वार्निंग दी। 5 जुलाई 1977 को
Speaker A
भुट्टो का तख्ता पलट दिया गया। अमेरिका ने पाकिस्तान के एटमी प्रोग्राम में रुकावटें डालने का काम जारी रखा। फ्रांस ने अमेरिकी दबाव पर पाकिस्तान से मोयदा कैंसिल कर दिया। अब जो करना था पाकिस्तानी सियासतदानों को अपने बल पर करना था। 80 की
Speaker A
दहाई की शुरू में कुछ अहम पुरजे न होने की वजह से एडमी प्रोग्राम पर काम रुक गया। साइंसदान मायूस थे। हुकूमत बेबस थी। मगर एक शख्स था जो खामोशी से सब देख रहा था। उसके पास पैसा था, नेटवर्क था और सबसे
Speaker A
बढ़कर थी जुर्रत। वो था हमारी कहानी का मरकजी किरदार। सेठ आबिद। कहते हैं कि सेठ आबिद ने हुकूमत से कहा, "आपको एटम बम के पुरजे चाहिए। मैं लाऊंगा और एक पैसा भी आपको नहीं देना पड़ेगा।" यह सुनकर सदर जिया, वजरा और दीगर हुकाम हैरान
Speaker A
रह गए। ऐसी जबरदस्त पेशकश कैसे इंकार किया जा सकता था? इजाजत दे दी गई। सेठ आबिद ने माहीगीरों और अरब शेखों से अपने ताल्लुकात का फायदा उठाया। अपने स्मगलिंग के तजुर्बात को इस्तेमाल किया और अपनी बेपनाह दौलत का सहारा लेते हुए न सिर्फ यूरोप से
Speaker A
एटमी प्लांट्स के लिए जरूरी पुरजे हासिल किए बल्कि उन्हें समंदरी रास्तों से बाहिफाज़त पाकिस्तान पहुंचा दिया। खतरात मोलकर आलमी खुफिया एजेंसियों को चकमा देकर बाकी काम साइंसदानों का था। 80 की दहाई के वक्त में पाकिस्तान एटमी ताकत बन गया। और
Speaker A
फिर 28 मई 1998 को जागी के पहाड़ों में होने वाले पांच एटमी धमाकों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। नारा तकबीर अल्लाह हू अकबर। [संगीत] इस मौके पर सब नजरें वजीर आजम नवाज शरीफ, डॉ. अब्दुल कदीर, डॉक्टर समर मुबारक और
Speaker A
दीगर साइंसदानों पर मरकूस थी। मगर अपने घर के ड्राइंग रूम में टीवी स्क्रीन के सामने बैठे [संगीत] सेठ आबिद हुसैन का चेहरा भी फक्र से तमतमा रहा था। शेख आबिद से मुतालिक यह और दीगर कहानियां कई दहाइयों से मशहूर हैं। कई सीनियर सफी मुस्तकिल
Speaker A
लिखते आए हैं कि पाकिस्तान के एटम बम की तैयारी में सोने के एक ताजिर का बहुत बड़ा हाथ है। किसी ने साफ तौर पर नाम लिया, किसी ने इशारों किनारों में बात की। ताम इस हवाले से कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, न कोई
Speaker A
तारीखी दस्तावेज। बल्कि डॉक्टर अब्दुल कदीर खान तो इस दावे की अपने कॉलमों और इंटरव्यूज में कई बार दीद कर चुके हैं। "शेर की मैंने कभी शक्ल नहीं देखी। मैंने सिर्फ इसका सुना था कि स्मगलर है। उसने सोना 29 टन सोना स्मगल किया था और भट्ट
Speaker A
साहब के जमाने में पकड़ा गया था। और ये सब झूठ है। कतई मैंने इसकी शक्ल पहली मर्तबा जब मैं रिटायर हो चुका उसके 10 साल बाद देखी जब के सैकड़ों आइटम हम बन चुके थे। तो ये जितनी भी बातें सब झूठ हैं। एक भाई
Speaker A
क्या एक सुई भी कभी इन्होंने नहीं दी। हमने इनसे मंगाई है। इनसे बात हुई।" [संगीत] दूसरी तरफ सीनियर सियासतदान चौधरी शजाद ने एक मौके पर कहा कि बहुत कम लोगों को पता होगा कि सेठ आबिद की पाकिस्तान के तहफुज
Speaker A
और सालमियत के लिए बहुत सी खिदमत हैं। मैं जाती तौर पर जानता हूं कि सेठ आबिद ने जो कौमी खिदमत अदा की हैं वो बहुत ही कम लोगों को नसीब होती हैं। दरअसल उनकी जिंदगी के कई पहलू थे और हर पहलू की
Speaker A
बेशुमार कहानियां। इन कहानियों में कितनी सच्चाई थी और कितना अफसाना यह शायद हम कभी जान नहीं सकेंगे। लेकिन हमें यह हकीकत तस्लीम करना पड़ेगी कि उनकी जिंदगी के किसी एक पहलू को उजागर करके दूसरे को नजरअंदाज करना ज्यादती होगी। आइए देखते
Speaker A
हैं कि पंजाब के एक छोटे से शहर का शेख आबिद पाकिस्तान का सेठ आबिद कैसे बना जो गोल्ड किंग कहलाया। बाबा बुल्ले शाह, नूरजहां, मलिक मेहराज खालिद और दूसरे कई अहम शख्सियात का शहर कुसूर। 1930 की दहाई में यहां एक सुनार
Speaker A
रहते थे। एक नेक, दीनदार मगर सख्तगीर इंसान। वो घर से दुकान आते जाते तो उनके एक हाथ में तस्बीह और दूसरे में कैंची होती। उन्हें जो भी बड़ी और [संगीत] घनी मूछों वाला मिलता उसकी मूछें काट देते और
Speaker A
कहते कि यह मजहब में जायज नहीं। यह थे सेठ आबिद के वालिद। 1935 में उनके घर पैदा होने वाले बेटे का नाम शेख आबिद हुसैन रखा गया। 1950 में शेख आबिद के वालिद अपनी फैमिली लेकर कराची मुंतकिल हो गए और यहां
Speaker A
के सराफा मार्केट में सुनार की एक छोटी सी दुकान खोली। शेख आबिद वालिद के काम में हाथ बटाने लगे। वो बचपन से ही जहीन और दूरअंदाज [संगीत] थे। हवा के रुख पर अपनी जिंदगी की कश्ती चलाने का हुनर उन्हें खूब
Speaker A
आता था। उस जमाने में सोना ज्यादातर भारत और खलीजी मुल्कों से पाकिस्तान आता था। उन्हीं दिनों शेख आबिद की मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जो भारत और खलीजी मुल्कों से सोना स्मगल करके पाकिस्तान लाता था। [संगीत] स्मगलिंग के रास्ते भी उसने खुद
Speaker A
ही दरियाफ्त किए थे। शेख आबिद ने इससे हाथ मिलाया और स्मगलिंग की दुनिया में कदम रख दिया। वो दुबई और भारत से स्मगल करके सोना पाकिस्तान लाते और यहां बेच देते। कुछ ही अरसे में उनकी काया पलट गई और रातोंरात वो
Speaker A
शेख आबिद से सेठ आबिद बन गए। जब उनका काम फैला, वो कानून की नजरों में आते चले गए। उनका नाम पाकिस्तान और इंटरपोल के मतलूब मुलजिमान की फहरिस्त में शामिल होता चला गया। पाकिस्तान में उनके खिलाफ दर्जन से
Speaker A
ज़्याद एफआईआर कटी, मगर हैरतअंगेज तौर पर वो अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ एक बार कानून की गिरफ्त में आए। अप्रैल 1958 में कराची एयरपोर्ट पर उन्हें कस्टम हुकाम ने रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह उनकी जिंदगी की पहली और आखिरी गिरफ्तारी थी।
Speaker A
[संगीत] गिरफ्तारी के बाद कस्टम हुकाम ने सफियों को बताया कि मुलजिम यानी शेख आबिद हुसैन सोने का स्मगलर है और उसके कब्जे से 2000 तोला
Speaker A
नुमाइंदों को बताया कि उनके कब्जे से 2000 तोला नहीं 3100 तोला सोना बरामद हुआ है। मीडिया ने इस बात को खूब उछाला कि कस्टम हुकाम ने सोने के एक स्मगलर से 3100 तोला सोना ज्त किया और जाहिर किया 2000 तोला
Speaker A
सोना। सेठ आबिद का आवामी सतह पर यह पहला तारुफ था। यह वाकया सेठ आबिद की वजह शोहरत बना और लोग उन्हें सोने के इंटरनेशनल स्मगलर के तौर पर जानने लगे थे। 5 माह बाद ही वह रिहा हो गए। गिरफ्तारी के
Speaker A
बास उन्होंने अपना काम अब और ज्यादा मोहताद होकर करना शुरू कर दिया था। पहले वह हर जगह खुद नजर आते थे मगर अब पसमंजर में चले गए। बहरहाल रिहा होकर वो अपने अबाई शहर कसूर चले गए। कराची से कसूर
Speaker A
मुंतकिल होने के बावजूद सोने की स्मगलिंग रुकी नहीं। अब सोना कराची के साहिल से नहीं बल्कि पंजाब की सरहद से स्मगल हो रहा था। कुछ ही अरसे के दौरान इस इलाके में उनकी शहरत फैल गई और लोग जानने लगे कि
Speaker A
सोने का एक बहुत बड़ा ताजिर या स्मगलर उनके इलाके में आबाद हो गया है। यह खबर सरहद पार भी पहुंच गई। सेठ आबिद भारत को अब मतलूब थे। उन दिनों बॉर्डर बैलेट क्राइम के तहत दोनों मुल्कों की पुलिस
Speaker A
किसी मुलजिम की गिरफ्तारी के लिए सरहद पार कर सकती थी। 60 की दहाई तक सरहदी इलाकों में दोनों तरफ किसी पुलिस का आना-जाना लगा रहता था। सो, अमृतसर की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने कसूर पहुंची। उनके घर पर छापा मारा। पुलिस को घर से सोने की 45
Speaker A
ईंटें तो मिली मगर सेठ आबिद का पता ना लगा। सेठ आबिद इसके बाद मंजर से बिल्कुल ही गायब हो गए। 6 साल बाद दिल्ली में उस वक्त सामने आए जब वह चांदनी चौक पर मोती बाजार के एक ताजिर से सोने की खरीदो फ़रोख्त का
Speaker A
मुहदा कर रहे थे कि अचानक पुलिस ने छापा मार दिया। सेठ आबिद तो बच निकले मगर उनका एक साथी पकड़ा गया जिससे पुलिस ने सोने की 44 ईंटें बरामद की। सेठ आबिद अब सोने के बैनल अकवामी स्मगलर के तौर पर दुनिया भर में मशहूर हो चुके
Speaker A
थे। पाकिस्तान, भारत, दुबई और लंदन तक उनका काम फैला हुआ था। सिर्फ 8 साल के मुख्तसर अरसे में उन्होंने सोने की स्मगलिंग का एक मुनज्जम नेटवर्क कायम कर लिया। पाकिस्तान और भारत की सरहद पर इधर से उधर जाना उनके लिए कोई मसला नहीं था। सेठ आबिद
Speaker A
के छह भाई थे। जिनमें से दो उनके साथ काम में शामिल थे। सेठ आबिद के छोटे भाई हाजी अशरफ को अरबी पर उबूर हासिल था। उन्होंने मिडिल ईस्ट में सोने की स्मगलिंग के मामलात को संभाला। दिल्ली में यह काम सेठ
Speaker A
आबिद के बहनोई के सुपुर्द था। सेठ आबिद के बहनोई का दिल्ली में खासा असर रुसूख था। उन्होंने ही सेठ आबिद का तारुफ दिल्ली के सोने के ताजुनों से करवाया था। सेठ आबिद अपने रिश्तेदारों के सिवा किसी पर भरोसा
Speaker A
नहीं करते थे। शायद यही उनकी कामयाबी और पकड़े ना जाने का राज था और वो बेफिक्र होकर सोने की स्मगलिंग में मशरूफ थे। [संगीत] 70 की दहाई तक उनका धंधा दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था। मगर 71 की जंग
Speaker A
के बाद पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो का इख्तेदार उनके लिए मुश्किलात का तूफान लाया। यह पीपल्स पार्टी के उरूज का दौर था। कराची से खैबर तक जिए भुट्टो जिए भुट्टो हो रहा था। सीनियर सहाफी नई मुस्तफा के बकॉल उस वक्त के वज़र एआज़म
Speaker A
जुल्फिकार अली भुट्टो ने सेठ [संगीत] आबिद से ₹5 करोड़ पार्टी फंड मांगा था। मगर सेठ आबिद ने यह कहकर इंकार कर दिया कि वह सियासत में नहीं पड़ना चाहते। उनका इंकार भुट्टो को बहुत बुरा लगा और उन्होंने सेठ
Speaker A
आबिद के खिलाफ मुकदमात कायम करवाकर इंतकामी कारवया शुरू करवा दी। सीनियर सफी नईम मुस्तफा यह भी दावा करते हैं कि एक रोज अचानक सेठ आबिद की बेटी लापता हो गई। सेठ आबिद की जानिब से यह इल्जाम लगाया गया
Speaker A
कि उनकी बेटी को रियासती इदारों ने गिरफ्तार करके गायब कर दिया है। उन दिनों बेनजीर भुट्टो ऑक्सफोर्ड में ज़रे तालीम थी। उन्हें यूनिवर्सिटी से वापसी घर जाते हुए रास्ते से अगवा कर लिया गया। कहा गया कि सेठ आबिद की बेटी के बदले में बेनजीर
Speaker A
भुट्टो को अगवा किया गया है। बड़ी शख्सियत बीच में पड़ी और यूं दोनों रिहा होकर अपने-अपने घर पहुंच गई। बेनजीर की अगवा की यह दास्तान भी सीना बसीना चलने वाली कहानियों में से एक है जो मशहूर तो हुई
Speaker A
मगर उनके शवायत नहीं मिलते। ना कहीं कोई खबर ना कोई एफआईआर ना आर्मी मीडिया में चीखो पुकार। सोचने की बात यह है कि अगर वाकई एक वज़र आजम की बेटी बर्तनानिया में अगवा हो जाए तो दुनिया खामोश नहीं रहती।
Speaker A
लेकिन कहीं कोई खबर नहीं आई। बहरहाल सेठ आबिद पर भुट्टो हुकूमत की सख्तियां जारी रही। 1974 में उनकी लाहौर और कराची के घरों पर छापे मारे गए। पुलिस ने लाहौर के घर से सवा करोड़ पाकिस्तानी रुपए, 40 लाख
Speaker A
मालियत का सोना, 20 लाख मालियत की कीमती घड़ियां और तीन महंगी गाड़ियां बरामद करने का दावा किया। यह वो गाड़ियां थी जो उस वक्त पाकिस्तान में बहुत कम लोगों के पास थी। पुलिस ने घर से दर्जन से जायद नस्ली
Speaker A
घोड़े भी बरामद की किए। सेठ आबिद के कराची के बंगले से भी बड़ी तादाद में गैर मुल्की करेंसी और सोने की ईंटें बरामद करने का दावा किया गया। मगर सेठ आबिद दोनों जगह से ही हाथ ना आए। कराची के इलाके नॉर्थ
Speaker A
नाज़बाद में भी उनकी मौजूदगी की इतला पर छापा मारा गया। मगर वह इससे पहले ही फरार हो चुके थे। सेठ आबिद के खिलाफ तहकीकात के लिए ट्रिब्यूनल कायम किया गया। जिसने तीन बार उन्हें तलब किया मगर वो तीनों बार
Speaker A
नहीं गए। कारवाईयां चलती रही। गोया बयानात रिकॉर्ड कराते रहे। ट्रिब्यूनल सजाएं सुनाता रहा। मगर सेठ आबिद पेश नहीं हुए। रिट चैलेंज होने पर भुट्टो तिलमिला गए। जैसा कि हमने पहले बताया था कि सेठ आबिद जहीन और दूर की सोचने वाले शख्स थे।
Speaker A
मुल्की सियासत से उन्हें दिलचस्पी नहीं थी। मगर मुल्की हालात पर उनकी गहरी नजर थी। समझ चुके थे कि भुट्टो हुकूमत का खात्मा होने वाला है। इसीलिए उन्होंने जानबूझकर मामले को तूल दिया और वही हुआ जिसकी उन्हें तवको थी। भुट्टो हुकूमत खत्म
Speaker A
हो गई और जियाउल हक का दौर शुरू हो गया। मिस्टर भुट्टो की हुकूमत खत्म हो चुकी है। सारे मुल्क में मार्शल लॉ नाफिस कर दिया गया है। कहा यह भी जाता है कि जियाउल हक ने एटमी प्लांट के पुरजे लाने के बदले सेठ आबिद को
Speaker A
माजी के जरा से माफी की पेशकश की थी। वैसे भी जियाउल हक को भुट्टों के सताए लोगों को करीब लाने की सख्त जरूरत थी। और मुबईना तौर पर जब शेख आबिद मतलूबा पुरजे स्मगल करके ले आए तो सदर जियाउल हक बहुत खुश हुए
Speaker A
और उनके करीबी ताल्लुकात कायम हो गए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कराची में देबा एकेडमी के ज़रे एतमाम स्पेशल बच्चों के हवाले से एक तकरीब थी। सदर जियाउल हक और सेठ आबिद दोनों शरीक थे। मेहमानों को कोल्ड ड्रिंक पेश की जा रही थी कि अचानक
Speaker A
कोल्ड ड्रिंक के चंद कतरे सेठ आबिद के कपड़ों पर गिर गए। जियाउल हक ने फौरन अपनी जेब से रुमाल निकाला और इसे साफ करने लगे। इस छोटे से वाक्य से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों में कितनी करीबी दोस्ती थी।
Speaker A
कहा जाता है कि जियाउल हक ने सेठ आबिद को अपनी काबीना में भी शामिल करने की पेशकश की थी। मगर उन्होंने इंकार कर दिया और सियासत से दूर रहने के अपने फैसले पर कायम रहे। जिया दौर में सेठ आबिद ने समाजी
Speaker A
कामों पर भी तवज्जो देना शुरू कर दिया। यह जियाउल हक ही थे जिन्होंने सेठ आबिद को स्मगलिंग छोड़ने और फलाई कामों पर आमादा किया। 1985 में जियाउल हक के दौर में ही सेठ आबिद गोल्ड स्मगलिंग केस पर कौमी
Speaker A
असेंबली में बहस हुई और चौधरी निसार की सरबराही में एक खुसूसी कमेटी बनी जिसने मामले की तहकीकात की। 1986 में पाकिस्तान सेंटर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने उन्हें वह 3100 तोला सोना वापस कर दिया। जो 1998 में कराची एयरपोर्ट पर उनसे ज़ किया गया था। यह
Speaker A
सोना कौमी खजाने में जमा था। उन्हीं दिनों सेठ आबिद ने कराची के जिना पोस्ट मेडिकल इंस्टट्यूट और अब्बासी शहीद अस्पताल की तामीर के लिए ₹1.5 लाख का चंदा दिया। उस जमाने में यह बहुत बड़ी रकम थी। उसका फायदा यह हुआ कि सेठ आबिद जो भुट्टो दौर
Speaker A
में सोने का स्मगलर कहलाता था। अब उसकी छवि एक फलाही शख्सियत के तौर पर उभरने लगी। उन्हीं दिनों सेठ आबिद के मुतालिक यह कहानी भी गर्दिश करने लगी कि अगर पाकिस्तान की हुकूमत उन्हें फैसिलिटेट करते तो वह अकेले ही मुल्क के तमाम कर्जे
Speaker A
उतार सकते हैं। मगर जियाउल हक ने उनकी यह बात नहीं मानी। उसके बाद सेठ आबिद ने चंद बरसों में ही मुल्क में रिफाही इदारों की एक चैन कायम कर दी। कराची से खैबर तक फलाही काम शुरू कर दिए। जियाउल हक के दौर
Speaker A
में जो गरीब बच्चों की शादियों का सिलसिला शुरू हुआ यह स्कीम भी सेठ आबिद की ही बताई हुई थी। सेठ आबिद के अपने दो बच्चे गूंगे और बहरे रहे थे। इसीलिए उन्होंने ऐसे बच्चों के लिए एक बड़ा इदारा हमजा
Speaker A
फाउंडेशन भी कायम किया। जहां स्पेशल बच्चों को इंटरनेशनल लेवल की तालीम और सहूलियात फराम की जाती हैं। इमरान खान के शौकतखानाम अस्पताल की तामीर में भी सेठ आबिद ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। कराची, लाहौर और कसूर में अमीन हयात मेमोरियल
Speaker A
मेडिकल सेंटर गरीब और नादिर बच्चों के लिए कराची में साबरा सेकेंडरी स्कूल का कयाम वगैरह सोने का स्मगलर कहलाने वाला अब सोशल वर्कर कहलाने लगा था। साथ ही लाहौर में बड़े पैमाने पर प्रॉपर्टी खरीदो फरोख्त का काम भी शुरू किया। मकसद था खुद को एक जायज
Speaker A
और कानूनी शख्सियत के तौर पर उभारना। इसी दौरान उन्होंने आबिद ग्रुप की बुनियाद रखी जो आज पाकिस्तान के चंद बड़े कारोबारी ग्रुप में शामिल होता है। वह कराची में भी कई जायदादों के मालिक थे। और पनामा लीग्स में नाम आने के बाद उन्होंने अपने असासे
Speaker A
ब्रिटिश वर्जन आइलैंड में मुंतकिल कर दिए थे। [संगीत] हाफिज शेख अयाज़ शेख आबिद का वो बेटा था जो बोलने और सुनने की सलाहियत रखता था। वो हाफिज कुरान था और कराची के खालिक दीना हॉल में तरावीह भी पढ़ाता था। सेठ आबिद ने
Speaker A
90 की दहाई के आखिर में अपना सारा कारोबार और दीगर जिम्मेदारियां रफ्ता रफ्ता अपने इसी बेटे हाफिज शेख अयाज़ के हवाले करना शुरू कर दी। हाफिज शेख अयाज़ ने बाप की इन तमाम जिम्मेदारियों को अच्छे तरीके से निभाया। मगर फिर एक दिन 2 नवंबर 2006
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हाफिज शेख अयाज़ लाहौर में अपनी एयरलाइन हाउसिंग सोसाइटी में कुछ लोगों के साथ मौजूद थे कि उनके सिक्योरिटी गार्ड ने अचानक फायरिंग कर दी। एक गोली शेख अयाज़ के सीने को चीरती हुई निकल गई और वह वहीं दम तोड़ गए।
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[संगीत] फायरिंग के इस वाक्य में पांच लोगों की मौत हुई। प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी के गार्ड को गिरफ्तार कर लिया गया। वाक्य की एफआईआर दर्ज हुई मगर कोई खास कारवाई नहीं हुई। सेठ आबिद ने खुद ही कारवाई में दिलचस्पी नहीं ली। लेकिन जवान बेटे की मौत
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ने सेठ आबिद को अंदर से तोड़ कर रख दिया। वो सेठ आबिद जो कभी पाकिस्तान, भारत और दुबई का गोल्ड किंग कहलाता था। अचानक गोशाशी हो गया। अलग-थलग रहने लगा। जिंदगी के आखिरी दिनों में वह जानबूझकर बिल्कुल गुमनाम हो चुके थे। 8 जनवरी 2021 को
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कोरोना वबा के दौरान 85 बरस की उम्र में कराची में उनका इंतकाल हो गया। तत्वीन कराची के ही मॉडल कॉलोनी कब्रिस्तान में की गई। उनकी मौत पर इमरान खान ने सोशल मीडिया पर दुख का इज़हार करते हुए लिखा कि सेठ आबिद शौकतखाना मेमोरियल
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अस्पताल को अतिया देने वाले इब्तदाई लोगों में से थे। 23 अप्रैल 2015 को सेठ आबिद के बेटे अयास को कत्ल करने वाले सिक्योरिटी गार्ड रिजवान को फांसी दे दी गई। सिक्योरिटी गार्ड ने सेठ आबिद के बेटे को क्यों कत्ल किया? इस राज पर आज तक पर्दा
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पड़ा हुआ है। सेठ आबिद की मौत के अगले साल 18 जून 2022 को उनकी बेटी फरा मज़र की भी लाहौर के मुस्लिम टाउन में गोली चलने से मौत हो जाती है। पुलिस ने उनके लेपालक बेटे फराहद और घरेलू मुलाजमा अतिया को कत्ल के जुर्म
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में गिरफ्तार किया। उन पर इल्जाम था कि दोनों ने मिलकर फरा मज़र को कत्ल किया और इसे खुदकुशी का रंग देने की कोशिश की। पुलिस ने पहले तो इब्तदाई तफ्तीश के बाद कहा कि फ़हाद रजिया नामी एक ऐसी खातून से
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शादी करना चाहता था जो तलाकियाफ्ता और एक बेटे की [संगीत] मां थी। मगर इस पर फ़हाद की वालिदा फरा राजी नहीं थी। बाद में मज़ीद तफ्तीश हुई तो पुलिस ने घर के दीगर मुलाजमीन को भी गिरफ्तार किया। पुलिस के
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मुताबिक मुलाजिमा अतिया ने कत्ल के बाद खून आलूदा बेड की चादरें तब्दील की। आबिद और शाहिद ने कत्ल में इस्तेमाल होने वाला असला छुपाया। जबकि एक और मुलाजिम मुलजिम फहद के साथ मकतूला को हस्पताल ले गया। लेकिन पुलिस ने जब तफ्तीश मुकम्मल की तो
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कहानी कुछ और ही बताई। पुलिस तफ्तीश के मुताबिक फराम अज़र दिमागी मसाइल का शिकार थी और वह अपने हाथ में मौजूद पिस्तौल से गोली चलने के सबब हलाक हो गई। फराम अज़र की मौत ना कत्ल है ना खुदकुशी बल्कि वो अचानक
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गोली चलने से मौत का शिकार हुई। इस तरह सेठ आबिद के घराने में यह दूसरा अफसोसनाक वाक्या था। अगरचा सेठ आबिद सारी जिंदगी शोहरत से दूर भागते थे। मगर शहरत फिर भी उन्हें मिली और खूब मिली। वह सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं
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पाकिस्तान से बाहर भी मशहूर थे। एक बार उन्होंने एक टीवी शो में नीलामी के दौरान क्रिकेटर जावेद मियां दाद का शारजा के में इस्तेमाल होने वाला बल्ला अपने बेटे के लिए ₹5 लाख में खरीदा। इस वाक्य से भी उनका चर्चा गैर मुल्की मीडिया में
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बहुत हुआ। वैसे शेख आबिद सिर्फ सोने के स्मगलर थे। कभी माफिया लॉर्ड या मंशियात फ़रोश नहीं रहे। एक बार एक निजी महफिल में उन्होंने अपने बारे में कुछ इस तरह रिमार्क्स दिए कि मेरे और मेरे माजी के बारे में बहुत सी अफवाएं हैं। मगर मैं कभी
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जमीनों पर कब्जे भत्ताखोरी या बेगुनाहों के कत्ल में मुलव्विस नहीं रहा। मेरा काम सिर्फ सोने का था। उम्र के साथ-साथ इंसान दोस्ती उनकी तवज्जो का मरकज बनती गई थी। अपने मकतूल बेटे की याद में उन्होंने कराची और लाहौर में कई मसाजिद तामीर
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करवाई। उनकी तरफ से हर साल रमजान में लाखों रुपए का राशन तकसीम किया जाता था। अखबारात जब उन्हें बदनामे जमाना पाकिस्तानी सोने के स्मगलर की हैसियत से पेश करते तो सेठ आबिद नाराज होते। उनका कहना था कि वह एक ऐसे शख्स हैं जिसने सोने
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जैसी कीमती शय को आम आदमी के लिए सस्ता बनाने का काम किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने शिकवा किया कि उन्हें सोने का बदनाम स्मगलर क्यों कहा जाता है। वो तो कौम की बहनों और बेटियों की शादियों के लिए सस्ता सोना फराहम कर रहे थे और माशरे
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और रियासत के लिए खिदमत अंजाम दे रहे थे। किसी भी तारीफ और पहचान के बजाय उन्हें उल्टा बदनाम किया जा रहा है। उनसे मुतालिक बहुत से किस्से सीना बेसीना चलने वाली दास्तानों की तरह हैं। मगर उनमें कितनी हकीकत है और कितना अफसाना है। इस बारे में
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हत्मी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। यानी सेठ आबिद की शख्सियत मौत के बाद भी किसी राज से कम नहीं। [संगीत]
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