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The Family Behind Parle-G — And the Girl on the Pack Nobody Knows

Parle-G के पीछे का परिवार, बिस्किट की कहानी और तीन अलग-अलग Parle कंपनियों का इतिहास।

Key Takeaways

  • Parle-G भारत का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट है और इसका पैकेट देशभर में पहचान बना।
  • Parle कंपनी तीन अलग-अलग शाखाओं में बंटी है, जो अलग-अलग उत्पाद बनाती हैं।
  • Thums Up ने Coca Cola को भारत में कड़ी टक्कर दी और भारतीय स्वाद के अनुसार कोला बनाया।
  • Parle परिवार ने विवादों के बिना कारोबार को बांटा और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दिया।
  • ₹5 के पैकेट की कीमत स्थिर रखकर Parle-G ने आम जनता का भरोसा जीता।

What the video covers

  • Parle-G बिस्किट भारत का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट है, जिसका पैकेट पर बच्ची का चेहरा प्रसिद्ध है।
  • Parle कंपनी तीन अलग-अलग शाखाओं में बंटी हुई है: Parle Products (बिस्किट), Parle Agro (जूस), और Parle Beverages (सॉफ्ट ड्रिंक)।
  • 1929 में मोहनलाल दयाल चौहान ने विले पार्ले में Parle की शुरुआत की, जो स्वदेशी उत्पाद बनाने का प्रयास था।
  • 1939 में Parle ने Parle Gluco नाम से सस्ता बिस्किट बाजार में उतारा जो सैनिकों के राशन में भी गया।
  • पैकेट पर बच्ची का चेहरा एक आर्टिस्ट मगनलाल दैया द्वारा 1960 के दशक में बनाया गया था, जो वास्तविक नहीं है।
  • रमेश चौहान और प्रकाश चौहान ने Coca Cola के भारत छोड़ने के बाद Thums Up को बनाया, जो भारत का सबसे बड़ा कोला ब्रांड बना।
  • 1970-80 के दशक में Parle परिवार ने बिना शोर के तीन शाखाओं में कारोबार बांट लिया।
  • Parle Agro ने Fruity और Appy जैसे जूस ब्रांड लॉन्च किए, जबकि Parle Beverages ने Thums Up, Limca और Bisleri पानी को संभाला।
  • Parle-G ने 25 साल तक ₹5 के छोटे पैकेट की कीमत नहीं बढ़ाई, जिससे यह आम आदमी के लिए सस्ता और भरोसेमंद बना।
  • परिवार ने अपने कारोबार को बिना विवाद के अलग-अलग संभाला और देश में स्वदेशी उत्पादों की पहचान बनाई।

Answers

Questions about this video

Parle-G के पैकेट पर बच्ची कौन है?

पैकेट पर बच्ची का चेहरा 1960 के दशक में Everest Agency के आर्टिस्ट मगनलाल दैया द्वारा बनाया गया एक चित्र है। यह किसी वास्तविक व्यक्ति की तस्वीर नहीं है।

Parle कंपनी के तीन अलग-अलग ब्रांड कौन-कौन से हैं?

Parle कंपनी तीन शाखाओं में बंटी है: Parle Products (बिस्किट), Parle Agro (जूस), और Parle Beverages (सॉफ्ट ड्रिंक और पानी)।

Thums Up ब्रांड का इतिहास क्या है?

जब Coca Cola ने भारत छोड़ दिया, तब रमेश और प्रकाश चौहान ने भारतीय स्वाद के अनुसार Thums Up को बनाया, जो 1980 के दशक में देश का सबसे बड़ा कोला ब्रांड बन गया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
एक पीला पैकेट, सफेद लाल अक्षर, ₹5 का सिक्का। करगिल की बर्फीली चौकियां, बिहार की बाढ़, 2020 का लॉकडाउन।
00:09
Speaker A
हर जगह यही पैकेट। जंग में सैनिकों के थैले में, राहत शिविरों की कतारों में, हाईवे पर पैदल चलते मजदूरों की मुट्ठी में। दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट।
00:20
Speaker A
अमेरिका का नहीं, यूरोप का नहीं, हमारा। करोड़ों घरों की सुबह इसी से शुरू होती है। चाय की प्याली और एक बिस्किट और पैकेट पर वही बच्ची। गोल-मटोल गाल। पूरा देश उसका चेहरा जानता है। पर उसका नाम कोई नहीं जानता। कौन है वो?
00:38
Speaker A
पर रुकिए, यहां एक बात है जो शायद आप नहीं जानते। Parle एक कंपनी नहीं है। तीन हैं। तीन अलग-अलग कंपनियां। एक ही नाम, एक ही परिवार की तीन शाखाएं। बिस्किट कोई और बनाता है, Frooti कोई और, Bisleri कोई और। और ये तीनों दशकों पहले अलग हो गए। कोई अदालत नहीं,
00:59
Speaker A
कोई हेडलाइन नहीं, कोई तमाशा नहीं। इतनी खामोशी से कि देश को पता ही नहीं चला। इसी परिवार का एक आदमी जिसने Coca Cola को उसी के खेल में हराया और फिर उसने अपना सबसे बड़ा हथियार अपने ही हाथों दुश्मन को सौंप दिया। यह
01:16
Speaker A
कहानी है मुंबई के एक उपनगर के नाम पर बनी कंपनी की, एक अदृश्य परिवार की, एक खामोश बांटवारे की और उस बिस्किट की जिसने लगभग 100 साल तक इस देश का पेट भरा। यह India's Richest है। यहां हम वो कहानियां सुनाते हैं जो टीवी पर नहीं आती।
01:33
Speaker A
नया एपिसोड हर दिन। सब्सक्राइब करिए, मुफ्त है। मुंबई 1929। देश गुलाम है। बाजारों में अंग्रेजी माल, बिस्किट भी विलायती, टॉफी भी विलायती और गांधी की आवाज़ गूंज रही है स्वदेशी। अपना बनाओ, अपना खरीदो। इस आवाज़ को एक गुजराती व्यापारी ने सुना। मोहनलाल
01:55
Speaker A
दयाल चौहान। वलसाड के पास पारडी का परिवार। कहा जाता है रेशम और कपड़े के कारोबार से जुड़ा हुआ। पर मोहनलाल कुछ और चाहते थे। मीठा, ऐसा मीठा जो विलायती टॉफी को टक्कर दे। तो वे जर्मनी गए। कॉन्फेक्शनरी बनाना सीखा और मशीनें खरीद लाए। कहा जाता है लगभग
02:15
Speaker A
₹60,000 में। उस जमाने में यह एक जायदाद की कीमत थी। मुंबई के एक उपनगर में एक पुरानी जर्जर फैक्ट्री खरीदी गई। उपनगर का नाम विले पार्ले।
02:26
Speaker A
12 लोग काम पर लगे। ज्यादातर अपने ही परिवार के। मालिक भी वही, मजदूर भी वही। एक बात यहां रुक कर समझिए। मोहनलाल अकेले नहीं थे। उनके साथ उनके भाई भी थे। कहा जाता है कुल मिलाकर चौहान परिवार के चार भाई इस काम में जुटे। कोई मशीन देखता,
02:45
Speaker A
कोई हिसाब, कोई माल की सप्लाई, कोई दुकानों से रिश्ते। पत्थर की उस पुरानी इमारत में परिवार का हर सदस्य कुछ न कुछ बनता जा रहा था। कोई कैंडी मेकर, कोई अकाउंटेंट, कोई सेल्समैन।
02:58
Speaker A
यही थी Parle की असली न्यू। कोई ऊंची डिग्री नहीं, कोई विदेशी सलाहकार नहीं। बस एक परिवार, एक फैक्ट्री और एक ही सोच। जो विलायती है वो हम भी बना सकते हैं। और यह भी याद रखिए, उस वक्त मुंबई विले पार्ले कोई भव्य इलाका नहीं था। पश्चिमी रेलवे की एक छोटी सी लोकल स्टॉप।
03:17
Speaker A
आसपास तालाब, नारियल के पेड़ और खेत। शहर से बाहर की दुनिया। पर वहीं से एक ब्रांड निकला जिसे अगले 100 साल तक पूरा देश जानने वाला था। पहला प्रोडक्ट संतरे वाली गोली, एक छोटी सी नारंगी कैंडी। और अब वो किस्सा जो इस कहानी का सबसे प्यारा हिस्सा है।
03:36
Speaker A
काम में सब इतने डूबे थे कि कंपनी का नाम रखना ही भूल गए। लोग कहते विले पार्ले वाली फैक्ट्री, Parle वाली टॉफी।
03:44
Speaker A
नाम चल पड़ा Parle। एक ब्रांड जिसका नाम किसी मालिक पर नहीं, किसी देवता पर नहीं, एक रेलवे स्टेशन वाले उपनगर पर है। 10 साल तक टॉफी बनी पर असली धमाका अभी बाकी था। 1939 दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका है। बाजार में बिस्किट सिर्फ अमीरों की चीज है। विलायती ब्रांड,
04:06
Speaker A
ऊंचे दाम। आम भारतीय सिर्फ देख सकता है। Parle ने दांव खेला। सस्ता बिस्किट। गेहूं और ग्लूकोज का। हर जेब के लिए। नाम Parle Gluco।
04:17
Speaker A
सोच सीधी थी। बिस्किट विलायत की चीज नहीं, भूख मिटाने की चीज है और भूख हर हिंदुस्तानी की बराबर है। युद्ध में यह सैनिकों के राशन तक पहुंचा। ब्रिटिश भारतीय फौज के थैलों में एक स्वदेशी बिस्किट।
04:31
Speaker A
फिर 1947 आज़ादी और आज़ादी के बाद Parle ने वो विज्ञापन छापे जो आज भी पढ़ने लायक हैं। संदेश साफ था, "अंग्रेज चले गए, अब उनके बिस्किट क्यों?" स्वदेशी टॉफी से शुरू हुई कंपनी अब स्वदेशी बिस्किट की फैक्ट्री थी। पीछे-पीछे और नाम आए नमकीन मोनाको,
04:52
Speaker A
मीठा नमकीन क्रैक जैक, मेलोडी, पॉपींस, किसमी टॉफी की पूरी फौज। फिर नकलची आए। बाजार में हर तरफ Gluco नाम के बिस्किट, मिलते-जुलते पैकेट, भोले ग्राहक। जवाब में ब्रांड को नई पहचान मिली। Parle-G।
05:07
Speaker A
G यानी ग्लूकोज। पैकेट पर मोम जैसा पीला रंग और एक बच्ची का चेहरा। और 90 के दशक में वो लाइन आई जो हर बच्चे की जुबान पर चढ़ गई। G माने जीनियस।
05:18
Speaker A
रुकिए एक सवाल। पैकेट पर वो छोटी बच्ची कौन है? इंटरनेट पर सालों से अफवाह है यह Infosys वाली सुधा मूर्ति के बचपन की तस्वीर है। कोई कहता है नागपुर की कोई लड़की। कोई कहता है आज वो 70 साल की बुजुर्ग हैं। सच?
05:35
Speaker A
वो बच्ची कभी पैदा ही नहीं हुई। वो एक चित्र है। 1960 के दशक में Everest Agency के एक आर्टिस्ट ने उसे बनाया था। नाम मगनलाल दैया। एक कलाकार जिसने ब्रश से देश की सबसे पहचानी हुई बच्ची रच दी।
05:50
Speaker A
Parle कंपनी खुद यह बात कह चुकी है। तो अगली बार कोई सुधा मूर्ति वाली कहानी सुनाएं, मुस्कुराइए और यह एपिसोड भेज दीजिए। 2011 Nielsen की रिपोर्ट आती है। दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट ब्रांड Parle-G Oreo से आगे। बड़े बड़े अमेरिकी ब्रांड्स से आगे।
06:08
Speaker A
विले पार्ले की जर्जर फैक्ट्री दुनिया के नक्शे पर थी। पर बिस्किट इस परिवार की कहानी का सिर्फ एक हिस्सा था। क्योंकि परिवार अब बोतलों में उतर चुका था और वहां उसका सामना होने वाला था दुनिया की सबसे ताकतवर कंपनी से। आज़ादी के बाद Parle
06:24
Speaker A
ने सॉफ्ट ड्रिंक की दुनिया में कदम रखा। Gold Spot नारंगी धमाका। बच्चों की पहली पसंद। फिर Limca नींबू वाली ताजगी। दोनों घर-घर पहुंचे। पर बादशाह कोई और था Coca Cola। अमेरिकी दिग्गज जो आज़ादी के तुरंत बाद भारत में जम गया था। शादियों में,
06:43
Speaker A
सिनेमा घरों में, हर ठेले पर लाल वाली बोतल। देसी ब्रांड मेहनत करते पर ताज अमेरिका के पास रहता। रमेश चौहान कौन थे, यह भी थोड़ा जानिए। पैदाइश 1940 के आसपास। पढ़ाई अमेरिका में। कहा जाता है MIT से केमिकल इंजीनियरिंग की
07:01
Speaker A
डिग्री लेकर लौटे। आधुनिक तकनीक की समझ, पश्चिमी बाजार का तजुर्बा पर मन में सोच पूरी तरह भारतीय। लौटकर Parle के सॉफ्ट ड्रिंक कारोबार में उतरे। साथ में भाई प्रकाश। दोनों का बांटवारा भी बहुत साफ था। रमेश तकनीक और उत्पाद देखते। प्रकाश बिक्री और वितरण। एक और बात
07:21
Speaker A
जब Coca Cola ने भारत छोड़ा तो चौहान भाइयों ने रातोंरात नया ब्रांड नहीं बनाया। कहा जाता है महीनों तक फॉर्मूला टेस्ट हुआ। मुंबई की एक लैब में। भारतीय जीभ के लिए विशेष स्वाद तीखा, कड़क, थोड़ा मसालेदार। पश्चिमी कोला जितना मीठा नहीं। नतीजा वही था जो हमने देखा। Thums Up।
07:41
Speaker A
अब आगे बढ़िए। फिर आया 1977। दिल्ली में नई सरकार। उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस। तेवर तीखे। नियम सख्त। विदेशी पूंजी वाले कानून का दंडा और फरमान। हिस्सेदारी घटाओ और अपना सीक्रेट फॉर्मूला भारतीय कंपनी के साथ साझा करो। Coca Cola ने कहा
08:01
Speaker A
फॉर्मूला कभी नहीं। यह हमारी रूह है और कंपनी ने भारत छोड़ दिया। बोरिया बिस्तर समेत रातोंरात बाजार खाली। करोड़ों गले और कोई कोला नहीं। ज्यादातर कारोबारी ऐसे मौके पर सोचते हैं। कुछ ही झपटते हैं। इस खालीपन को परिवार की तीसरी पीढ़ी ने देखा। एक इंजीनियर
08:21
Speaker A
रमेश चौहान, साथ में भाई प्रकाश चौहान। उन्होंने अपनी टीम के साथ नया कोला बनाया। तीखा, कड़क, मसालेदार खाने वाली भारतीय जुबान के लिए नाम Thums Up और वो अंगूठे वाला निशान जीत का निशान। 80 के दशक में Thums Up देश का सबसे
08:39
Speaker A
बड़ा कोला बन गया। और जब Coca Cola और Pepsi वापस लौटे तो उन्हें हराने वाला कोई विदेशी नहीं था। एक देसी ब्रांड था। कहा जाता है कोला बाजार का 85 फीसदी हिस्सा Thums Up के पास था। जिस कंपनी का नाम एक उपनगर की देन था,
08:53
Speaker A
उसने Coca Cola को हरा दिया था। बाहर जीत का जश्न था, पर अंदर परिवार में खामोश लकीरें खिंच रही थीं। समझिए, बड़े परिवारों में बांटवारा दो तरह का होता है। एक जो अदालतों में लड़ा जाता है, हेडलाइन बनता है और एक जो खाने की मेज पर धीमी आवाज में तय हो जाता है। Parle का बांटवारा
09:15
Speaker A
दूसरी तरह का था। 70 और 80 के दशक में धीरे-धीरे बिना शोर के साम्राज्य तीन हिस्सों में बांट गया। सटीक तारीखें धुंधली हैं। कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई। कहा जाता है बस आपसी सहमति से कागज बांट गए। पहली शाखा Parle Products
09:33
Speaker A
बिस्किट का साम्राज्य Parle-G, मोनाको, क्रैक जैक, मेलोडी। इसे संभाला विजय चौहान, शरद चौहान और आगे चलकर अनूप चौहान की शाखा ने। दूसरी शाखा Parle Agro 1984 से अलग परिचालन मुखिया प्रकाश चौहान। 1985 में इसी कंपनी ने वो चीज
09:54
Speaker A
दी जो भारत ने पहले कभी नहीं देखी थी। डिब्बे में बंद आम। बिना बोतल, बिना फ्रिज Fruity फिर सेब वाली Appy। आगे चलकर कमान उनकी तीन बेटियों के हाथ आईं। शोना, अलीशा और नादिया। तीसरी शाखा रमेश चौहान सॉफ्ट ड्रिंक का पूरा दारोमदार
10:14
Speaker A
Thums Up, Limca, Gold Spot, Maaza और एक छोटा सा पानी का ब्रांड Bisleri। अब सबसे दिलचस्प सवाल समझिए। एक ट्रेडमार्क तीन कंपनियां। यह चलता कैसे है?
10:28
Speaker A
जवाब एक पारिवारिक समझ। नाम तीनों का पर कारोबार अलग-अलग। इस शर्त पर कि कोई किसी के इलाके में नहीं घुसेगा। बिस्किट वाले बिस्किट बेचेंगे। जूस वाले जूस, पानी वाले पानी। पर खून का रिश्ता बाजार में नहीं चलता। 2008
10:45
Speaker A
Parle Ag
11:03
Speaker A
यह अलग company है। Parle Products से इसका कोई रिश्ता नहीं। सोचिए एक ही दादा की औलादें और packet पर लिखना पड़े हमारा कोई रिश्ता नहीं। और टकराव यहीं नहीं रुका। 1993 में Parle Agro ने पानी उतारा Bailey सीधा निशाना अपने ही चाचा की Bisleri.
11:21
Speaker A
फिर 2016 में Bisleri ने fizzy drinks उतारे Bisleri pop सीधा निशाना अपनी ही भतीजियों की Appy Fizz.
11:29
Speaker A
रुकिए, इसे ऐसे समझिए। बड़े भाई की bakery, मंजिले की juice की दुकान, छोटे का पानी का plant.
11:36
Speaker A
तीनों के board पर एक ही नाम और तीनों एक दूसरे के ग्राहक तोड़ने में लगे। एक ही आंगन के तीन चूल्हे और तीनों की आंच एक दूसरे पर। पर इस परिवार का सबसे बड़ा ज़ख्म किसी अदालत में नहीं लगा। वो लगा एक sign किए हुए कागज़ से। पर उस कागज़ तक पहुंचने से पहले
11:55
Speaker A
ज़रा दूसरी शाखा के आंगन में झांक लीजिए। 1985 प्रकाश चौहान की नई नवेली Parle Agro और हाथ में एक पागल कर देने वाला idea आम फलों का राजा। पर उसका रस पीने के दो ही रास्ते थे घर पर आम काटिए या ठेले का खुला शरबत पीजिए। धूप,
12:16
Speaker A
धूल और मक्खियों के साथ Parle Agro ने तीसरा रास्ता बनाया। वही डिब्बे वाला आम जिसका जिक्र अभी हुआ। हरा चौकोर pack भारत का पहला tetra pack वाला mango drink.
12:28
Speaker A
पर नई चीज की अपनी मुसीबत होती है। कहा जाता है शुरू में कई ग्राहक उस हरे डिब्बे को साबुन की टिकिया समझ बैठे तो प्रकाश चौहान खुद मैदान में उतरे। मुंबई के स्कूलों में गए, बच्चों के सामने डिब्बे में straw घुसाकर दिखाया ऐसे पीते हैं। बच्चों को
12:43
Speaker A
जादू मिल गया। देश को नया स्वाद और जुबान को नया गाना Mango Fruity fresh and juicy.
12:50
Speaker A
फिर इस शाखा में वारिस आए बेटे नहीं बेटियां। 2003 नादिया चौहान ने company में कदम रखा। उम्र सिर्फ 17 साल और सामने एक डरावना सच। कहा जाता है company की करीब 95% कमाई अकेली Fruity से आती थी। एक डिब्बे पर टिका पूरा साम्राज्य। 2005 में उन्होंने जवाब दिया
13:10
Speaker A
सेब का चमकीला बुलबुलों वाला drink Appy Fizz भारत के लिए बिल्कुल नई चीज। नई category बनी और उस पर राज भी उन्हीं का हुआ। बड़ी बहन शौना आगे चलकर CEO बनी और तीनों बहनें चाचा ताऊ की कंपनियों के बराबर खड़ी एक company चला रही थी।
13:27
Speaker A
पर बेटियों की यह जीत बहुत बाद की बात है। घड़ी की सुई वापस घुमाइए। 90 के दशक की दहलीज पर तीसरी शाखा के दफ्तर में वो कागज़ तैयार हो रहा था, जिस पर एक sign सब कुछ बदलने वाला था। 1990 के दशक की शुरुआत license
13:44
Speaker A
राज दरक रहा है। भारत के दरवाजे खुल रहे हैं। Pepsi आ चुकी है। Coca Cola लौटने की तैयारी में है। 14 साल तक रमेश चौहान बादशाह रहे थे। पर अब खेल बदल चुका था। उनके सामने एक बेरहम हिसाब
13:58
Speaker A
दुश्मन के पास अरबों dollar हैं। विज्ञापन के लिए अथाह पैसा। दुनिया भर के बाजारों का तजुर्बा और चाले भी। कहा जाता है Thums Up के bottlers को एक एक कर खरीदा जा रहा था। बोतल भरने वाले ही न रहे
14:11
Speaker A
तो brand किस काम का? जिनकी बोतलें नहीं, उनका कारोबार नहीं। लड़ो तो हर साल खून बहेगा। बेचो तो हमेशा के लिए सुकून और उस वक्त की कीमत भी शानदार लग रही थी। अकेला भारतीय कारोबारी दो वैश्विक दैत्यों के बीच
14:27
Speaker A
1993 फैसला हो गया। रमेश चौहान ने Thums Up, Limca, Gold Spot, Maaza अपनी पूरी फौज Coca Cola को बेच दी। कीमत कहा जाता है लगभग 186 करोड़ रुपये। कुछ reports 6 करोड़ dollar बताती हैं। जिस brand ने Coca Cola को हराया था,
14:47
Speaker A
वो अब Coca Cola का था। और फिर वही हुआ जिसका डर था। कहा जाता है Coke ने Thums Up के विज्ञापन बंद कर दिए। मकसद साफ था धीरे धीरे इस देसी cola को मार देना ताकि लाल वाली बोतल राज करे। रमेश चौहान किनारे से देखते रहे।
15:03
Speaker A
उनका दर्द record पर है। विज्ञापन के बिना soft drink जिंदा नहीं रहता। पर Thums Up मरा नहीं। दुकानदार मांगते रहे। पीने वाले अड़े रहे। brand इतना जिद्दी निकला कि Coca Cola को हार माननी पड़ी। मारने की जगह उसे ही अपना
15:17
Speaker A
champion बना लिया। रुकिए अब यह तुलना सुनिए। 2021 में Thums Up एक अरब dollar का brand बन गया। Coca Cola India का number one जो बेचा गया था कुछ करोड़ में। वो अकेला आज हजारों करोड़ की कमाई करता है और Limca,
15:33
Speaker A
Maaza वे अलग। भारतीय कारोबार की सबसे महंगी self goal की कहानियों में यह सौदा सबसे ऊपर गिना जाता है। जिस आदमी ने Coca Cola को हराया, उसने ही अपना हथियार उन्हें सौंप दिया। पर उस सौदे में एक चीज शामिल नहीं थी।
15:48
Speaker A
एक मामूली सी चीज पानी। 1969 एक Italian कारोबारी की company भारत में बोतल बंद पानी बेचने की कोशिश कर रही थी। नाम Bisleri संस्थापक Felice Bisleri.
16:00
Speaker A
चौहान परिवार ने वो company खरीद ली। कहा जाता है चंद लाख रुपए में लोग हंसे थे। भारत में पानी कौन खरीदेगा?
16:08
Speaker A
नदियों और कुओं के देश में रमेश चौहान ने जवाब दिया दशकों की मेहनत से आज बोतल बंद पानी का दूसरा नाम ही Bisleri है। Railway station पर बच्चा भी कहता है एक Bisleri देना। भले बोतल किसी और की हो। रुकिए,
16:24
Speaker A
जरा इस उपलब्धि को महसूस कीजिए। दुनिया में कुछ ही brand ऐसे हैं जो पूरी category का नाम बन गए। Xerox photocopy के लिए, Coke cola के लिए, Banded पट्टी के लिए और भारत में Bisleri बोतल बंद पानी के लिए। यह कोई विज्ञापन
16:39
Speaker A
से नहीं मिलता। यह दशकों की मौजूदगी से मिलता है। हर station पर, हर hotel में, हर शादी में। जब लोग किसी चीज को नाम से नहीं brand से पहचानने लगें तो समझिए वह brand अमर हो गया । आज देश में बोतल बंद पानी का बाजार
16:55
Speaker A
लगभग 20 हज़ार करोड़ रुपए का है। बहुत सारे नए खिलाड़ी उतरे हैं। Tata, Reliance, Coca Cola खुद भी Kinley लेकर आया। पर railway station पर वह एक शब्द आज भी बदला नहीं। एक Bisleri देना। फिर आया 2022। रमेश चौहान 80 पार कर चुके थे। थकान की बातें अखबारों में आने लगी। खरीदार भी सामने था
17:18
Speaker A
Tata। वही Tata जिसकी पूरी कहानी हमने episode 32 में सुनाई थी। सौदे की चर्चा लगभग 7 हज़ार करोड़ रुपए। और तब देश ने एक पिता का दर्द सुना। उन्होंने कहा था, "बेटी की कारोबार में दिलचस्पी नहीं है। किसे सौंपूं?"
17:34
Speaker A
बेटी जयंती चौहान। दिल्ली और मुंबई में पली-बढी। fashion और photography की पढ़ाई। सुर्खियों से दूर रहने वाली। महीनों तक खबरें चलीं। deal पक्की मानी जा रही थी। फिर March 2023, U turn deal रद्द। Bisleri बिकेगी नहीं। वजह?
17:53
Speaker A
कहा जाता है कीमत पर बात ही नहीं बनी। Tata ने share बाजार को खुद बताया बातचीत खत्म। और जो बेटी दूर मानी जाती थी वही आगे आई। Vice chairperson के तौर पर कमान संभाली। Sales, marketing, नई बोतलें, नया तेवर
18:09
Speaker A
सब उनकी निगरानी में। और फिर नई कमान का नया अंदाज दिखा। 2023 के आखिर में Bisleri ने अपने इतिहास में पहली बार कोई global brand ambassador चुना। दीपिका पादुकोण। पैगाम साफ था पानी की बोतल अब सिर्फ जरूरत नहीं,
18:24
Speaker A
style भी है। आंकड़े भी बोलने लगे। सालाना कमाई करीब 2700 करोड़ रुपए। देशभर में 125 से ज्यादा plant। भारत से बाहर UAE के बाजार तक। और ऐलान कमाई को 5 हज़ार करोड़ के पार ले जाने का । पिता ने जो साम्राज्य दशकों में खड़ा किया था,
18:42
Speaker A
बेटी उसे नई पीढ़ी की भाषा सिखा रही थी। 30 साल पहले एक विरासत बिकी थी और परिवार आज तक कसक गिनता है। इस बार विरासत रोक ली गई। शायद इतिहास ने खुद को दोहराने से मना कर दिया। और इसी बीच
18:56
Speaker A
उधर biscuit की दुनिया में Parle-G अपनी सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रहा था। समझिए ₹5 का गणित। लगभग 25 साल Parle-G के छोटे packet की कीमत वही रही ₹5। महंगाई बढ़ी, आटा महंगा, चीनी महंगी, diesel महंगा पर packet ₹5। कैसे?
19:17
Speaker A
वजन थोड़ा घटता रहा। फैक्ट्रियां किफायती होती गईं। मुनाफा पतला पर बिक्री समुद्र जितनी। और यही है असली किला। जो brand गरीब से गरीब जेब में रहता है, उसे कोई प्रतियोगी छू नहीं सकता। ₹5 सिर्फ कीमत नहीं, एक वादा है भरोसे का।
19:34
Speaker A
इस भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा आई 2020 में lockdown। थमी हुई ट्रेनें, बंद फैक्ट्रियां और सड़कों पर लाखों प्रवासी मजदूर पैदल सैकड़ों किलोमीटर। एक तस्वीर बनाइए। मई की दोपहर, highway का किनारा, एक परिवार पीठ पर गठरी, गोद में बच्चा। शहर ने काम छीन लिया। गांव अभी दूर है। तभी
19:58
Speaker A
सड़क किनारे कुछ लोग रुकते हैं। हाथ में पानी की बोतलें और biscuit के पीले packet। बच्चा packet खोलता है। मां पानी की बोतल थामती है। कुछ मिनट के लिए भूख हारती है। उस परिवार ने कभी नहीं जाना यह biscuit किस company का है, किस खानदान का है। उन्हें बस इतना पता था यह अपना है,
20:19
Speaker A
सस्ता है, हर जगह मिलता है। उन महीनों में Parle-G की बिक्री आठ दशकों में सबसे ऊंची रही। company ने करोड़ों packet राहत में भी बांटे। आंकड़े भी हैं। उन महीनों में biscuit बाजार में company की हिस्सेदारी करीब 5% बढ़ी। अकेले Parle-G के दम पर और lockdown लगते ही ऐलान हुआ था।
20:38
Speaker A
सरकारी agencies के साथ मिलकर 3 करोड़ packet मुफ्त बांटेंगे। वजह सीधी थी। राहत बांटने वालों के लिए इससे भरोसेमंद कुछ नहीं था। सस्ता, हर गोदाम में मौजूद और खोलते ही खाने लायक glucose की ताकत समेत जिस biscuit का जन्म गुलाम भारत के आम आदमी के लिए हुआ था,
20:56
Speaker A
वह 81 साल बाद भी अपनी जगह पर खड़ा था। सबसे मुश्किल घड़ी में, सबसे गरीब हाथ में। पर सवाल बाकी है आज यह बांटा हुआ साम्राज्य कहां खड़ा है?
21:06
Speaker A
आज की स्थिति। जुलाई 2026। एक factory से निकली तीन कंपनियां, तीन अलग दुनियाएं। Parle Products सबसे बड़ी। सालाना कमाई 18 हज़ार करोड़ रुपए से ऊपर बताई जाती है। देश की सबसे बड़ी FMCG food कंपनियों में गिनती। हर महीने कहा जाता है 100 करोड़ से ज्यादा packet। कमान तीसरी पीढ़ी के पास।
21:28
Speaker A
परिवार आज भी media से दूर। कोई reality show नहीं, कोई विवाद नहीं, सिर्फ biscuit। Parle Agro बेटियों का राज। शौना चौहान CEO। नादिया Marketing और रणनीति की धुरी। अलीशा सामाजिक जिम्मेदारियों की। कमाई लगभग 3 हज़ार करोड़ रुपए और
21:46
Speaker A
ऐलान बड़ा है। 2030 तक 20 हज़ार करोड़ का लक्ष्य। Frooti और Appy Fizz आज भी बाजार में लड़ते हुए। Bisleri जयंती चौहान की अगुवाई में Tata वाली deal के बाद बिकने की कोई नई खबर नहीं। पिता अब पीछे,
22:00
Speaker A
बेटी आगे। एक अनिच्छुक वारिस जो अब पूरी तरह मैदान में है। और Thums Up वह आज भी बादशाह है। पर ताज Coca Cola के सिर पर। एक परिवार, चार साम्राज्य, तीन अपने, एक पराया हो चुका। अब एक और परत
22:17
Speaker A
जो कम कही जाती है। चौहान परिवार की कुल दौलत का सही आंकड़ा कोई नहीं जानता। कोई company listed नहीं, कोई शेयर बाजार का number नहीं, कोई Forbes की सटीक गिनती नहीं। पर अंदाजे कहते हैं तीनों शाखाओं की मिलीजुली संपत्ति
22:33
Speaker A
करीब पचास हज़ार करोड़ रुपये से ऊपर। कुछ reports तो इसे भी कम आंकती हैं। पर उनके नाम पर कोई हवाई जहाज नहीं, कोई शानदार महल नहीं जो सुर्खियों में हो। कोई विवादित शादी नहीं, कोई अरबपतियों की party नहीं। मुंबई के posh इलाकों में कहीं-कहीं उनके घर
22:51
Speaker A
low profile, सादगी भरे। कोई Instagram reel नहीं, कोई David Beckham के साथ photo नहीं। एक खामोश अरबपति संस्कृति जो शायद देश में और भी दुर्लभ होती जा रही है। अब आखिरी बात। इस channel पर हमने कारोबारी परिवारों की जंगें देखी हैं। भाई के खिलाफ भाई। अदालतें,
23:12
Speaker A
जासूस, तिजोरियां। हल्दीराम वाली महाभारत episode 18 में आपने देखी ही है। चौहान परिवार ने दूसरा रास्ता चुना। बांट गए पर बिखरे नहीं। मुकाबला किया पर तमाशा नहीं बनाया। शायद इसीलिए आपने उनका नाम कभी नहीं सुना। और शायद इसीलिए उनके brand कभी नहीं गिरे। कुछ परिवार लड़ते हैं,
23:33
Speaker A
कुछ चुपचाप अलग हो जाते हैं। पर brand अमर रहता है। और सबसे बड़ी बात लगभग 100 साल की इस कहानी में इस परिवार ने महल नहीं बेचे, सपने नहीं बेचे। ₹5 में पेट भरने का भरोसा बेचा। अमीरी की सैकड़ों कहानियां हमने सुनाई हैं।
23:49
Speaker A
पर ₹1, ₹2 के धंधे से खड़ा हुआ यह खामोश साम्राज्य शायद उन सबसे ज्यादा अमीर है। और शायद इसीलिए यह कहानी इतनी खास है। क्योंकि इसमें कोई खलनायक नहीं, कोई बर्बादी नहीं, कोई अदालत की जंग नहीं जो पीढ़ियों तक चलती हो। बस एक परिवार,
24:07
Speaker A
तीन शाखाएं, तीन brand और एक packet जो आज भी ₹5 में हर जेब का साथी है। आपके बचपन की कौन सी याद Parle-G से जुड़ी है?
24:16
Speaker A
comment में लिखिए। अगले episode में एक और साम्राज्य, एक और परिवार और एक ऐसा राज़ जो दशकों तक तिजोरी में बंद रहा। subscribe अगर अभी तक नहीं किया है। बहुत बड़ी कहानियां आ रही हैं।
Topics:Parle-GParle परिवारThums Upस्वदेशी उत्पादबिस्किट इतिहासParle AgroCoca Cola भारतBisleriभारतीय ब्रांडरमेश चौहान

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