रुया भाइयों की एसआर स्टील की कहानी, सफलता, पतन और पुनरुद्धार की पूरी तस्वीर।
Key Takeaways
- बड़ा व्यापार कर्ज पर निर्भर हो सकता है, जिससे जोखिम भी बढ़ता है।
- आईबीसी कानून ने डूबती कंपनियों के पुनर्गठन में अहम भूमिका निभाई।
- व्यापार में सफलता और असफलता दोनों ही महत्वपूर्ण सीखें देती हैं।
- रुया परिवार का अनुभव और नेटवर्क उन्हें पुनः उद्योग जगत में वापसी का मौका दे सकता है।
- हर बड़े उद्योग के पीछे हजारों कर्मचारियों और उनके परिवारों की जिंदगी जुड़ी होती है।
What the video covers
- शाशी और रवि रुया ने 1969 में एसआर कंस्ट्रक्शन से अपने व्यापार की शुरुआत की।
- एसआर स्टील की स्थापना 1989 में हजीरा, गुजरात में हुई, जो गैस आधारित तकनीक पर आधारित था।
- एसआर ने तेल, बिजली, शिपिंग और टेलीकॉम जैसे कई क्षेत्रों में विस्तार किया।
- 2007-08 में कंपनी का चरम था, लेकिन भारी कर्ज और वैश्विक वित्तीय संकट ने संकट पैदा किया।
- 2017 में लागू हुए आईबीसी कानून के तहत एसआर स्टील का मालिकाना हक आर्सेलर मित्तल को मिला।
- सुप्रीम कोर्ट ने रुया परिवार के पुनः कंपनी वापस लेने के प्रयास को खारिज किया।
- रुया परिवार ने दुबई से नए कारोबार शुरू किए और ऊर्जा क्षेत्र में वापसी की योजना बनाई।
- वीडियो में एसआर स्टील के कर्मचारियों और उनके परिवारों की भी कहानी बताई गई है।
- एसआर के पतन से सरकारी बैंकों को भारी नुकसान हुआ, जो आम जनता का पैसा था।
- यह कहानी सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि असफलता और पुनः प्रयास की भी है।
Chapters
- 00:00सुप्रीम कोर्ट का फैसला और रुया परिवार की चुनौती
- 01:33रुया परिवार का व्यापारिक इतिहास और मारवाड़ी संस्कृति
- 02:57एसआर कंस्ट्रक्शन की स्थापना और शुरुआती सफलता
- 04:28एसआर स्टील का गठन और गैस आधारित तकनीक
- 06:00एसआर का विस्तार: तेल, बिजली, शिपिंग और टेलीकॉम
- 08:59वैश्विक वित्तीय संकट और एसआर की आर्थिक चुनौतियां
- 11:58आईबीसी कानून और एसआर स्टील का अधिग्रहण
- 14:48रुया परिवार की वापसी की योजना और भविष्य की दिशा
- 20:26कर्मचारियों की कहानी और सामाजिक प्रभाव
- 23:07निष्कर्ष और चैनल सदस्यता का आह्वान
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Speaker A
नवंबर 2019, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट भारत के सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीश अपनी कुर्सियों पर बैठे हैं। सामने है एक फैसला, जिसका इंतजार पूरे देश के बैंकर, उद्योगपति और वकील 2 साल से कर रहे थे।
Speaker A
एक तरफ थे लक्ष्मी मित्तल, आर्सेलर मित्तल के मालिक, जिन्हें आप इंडियास रिचेस्ट की एपिसोड चार में पहले ही देख चुके हैं। दूसरी तरफ थे शाशी रुया और रवि रुया, दो भाई जिन्होंने अपने हाथों से एसआर स्टील खड़ा किया था और अब वो कंपनी, जो उन्होंने
Speaker A
गुजरात के हजीरा में एक रेत के मैदान पर बनाई थी, उनके हाथ से जाने वाली थी। फैसला आया, आर्सेलर मित्तल को एसआर स्टील मिली 42 करोड़ में। शाशी रुया और रवि रुया दोनों भाई उस दिन कोर्ट में नहीं थे, वे दुबई में
Speaker A
थे। यह कहानी है एक ऐसे साम्राज्य की, जो 1969 में शुरू हुआ, जो ₹ लाख करोड़ तक पहुंचा और जो एक के बाद एक किरचकिरच टूटता चला गया और फिर वापस आया। यह इंडियास रिचेस्ट। हम यहां सिर्फ सफलता की कहानियां नहीं
Speaker A
सुनाते। हम वह पूरी तस्वीर दिखाते हैं जो कहीं और नहीं मिलती। अगर आप पहली बार इस चैनल पर आए हैं तो अभी सदस्यता लें। यह बिल्कुल मुफ्त है। शाशी का जन्म सन 1944 में राजस्थान में हुआ। एक पारंपरिक मारवाड़ी व्यापारी
Speaker A
परिवार में। मारवाड़ी समाज का एक बड़ा हिस्सा 19वीं और 20वीं सदी में अपने गांव और शहर छोड़कर देश के बड़े व्यापारिक केंद्रों में बस गया था। कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद। व्यापार उनके खून में था। हिसाब किताब उनकी प्राथमिक शिक्षा थी और जोखिम
Speaker A
लेना पर सोच समझकर उनकी विरासत थी। शाशी रुया के पिता नंद किशोर रुया पहले से मुंबई में थे। एक छोटा ट्रेडिंग व्यवसाय था। शाशी रुया और उनके छोटे भाई रवि रुया दोनों ने पढ़ाई की, पर असली तालीम तजारत
Speaker A
में मिली। जहां एक छोटे कारोबार को आगे बढ़ाते हुए यह समझना होता है कि किस समय किस काम में पैसे लगाने से फायदा होगा और किस काम में हाथ नहीं डालना चाहिए। यह तालीम किसी बिजनेस स्कूल में नहीं मिलती।
Speaker A
यह मिलती है बाजार में, गोदाम में और उन मीटिंगों में जहां हाथ मिलाकर सौदे होते हैं। मुंबई उन दिनों भारत का सबसे बड़ा कारोबारी शहर था। बंदरगाह था, बाजार था और हर किस्म का काम था। लोहे का, कपड़े का,
Speaker A
अनाज का, रसायन का। रुया परिवार का कारोबार धीरे-धीरे बढ़ा। दोनों भाइयों में काम का एक अनकाहा बंटवारा था। शाशी रुया बड़े तस्वीर को देखते थे। कहां अवसर है, कहां पैसा लगाना है, किससे रिश्ते बनाने हैं? रवि रुया काम की बारीकियां देखते थे।
Speaker A
जमीन पर क्या हो रहा है, प्रोजेक्ट कहां अटका है, लागत कहां बढ़ रही है? यह जोड़ी आगे भी इसी तरह काम करती रही। पर शाशी रुया को लग रहा था कि ट्रेडिंग में एक सीमा है। असली पैसा बनाना है तो कुछ बड़ा
Speaker A
बनाना होगा। सन 1969। एसआर कंस्ट्रक्शन की स्थापना हुई। यह कंपनी थी इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए। पर शुरुआत बड़ी नहीं थी। शुरुआत थी एक छोटे से ऑफिस, कुछ ट्रकों और एक बड़े सपने से। उन दिनों भारत बड़े-बड़े सरकारी निर्माण परियोजनाओं के द्वार में था। बांध
Speaker A
बन रहे थे, बंदरगाह बन रहे थे, सड़कें बन रही थीं। जो कंपनी इन परियोजनाओं में अच्छा काम करती, उसे अगली बड़ी परियोजना मिलती। यह एक ऐसा रास्ता था जहां एक बड़े ठेके से पूरी कंपनी की किस्मत बदल सकती थी। शाशी
Speaker A
रुया और रवि रुया दोनों भाइयों ने मिलकर काम शुरू किया। शाशी रुया रणनीति देखते थे। रवि रुया जमीनी काम देखते थे। यह बंटवारा आगे भी बना रहा। और फिर आया वो ठेका जिसने एसआर को सबसे पहले पहचान दिलाई। सन 1976
Speaker A
तमिलनाडु, मद्रास बंदरगाह। सरकार को एक बड़ा काम चाहिए था। बंदरगाह के लिए एक ब्रेक वाटर, यानी लहर रोकने वाली दीवार बनानी थी। यह काम बेहद मुश्किल था। समुद्र की लहरों के बीच भारी पत्थरों को सही जगह लगाना, नींव डालना और यह सुनिश्चित करना कि यह
Speaker A
दीवार टिकेगी। यह काम बड़े अनुभवी और हिम्मत वाले इंजीनियरों का था। एसआर ने यह ठेका लिया और उसे समय पर सही तरीके से पूरा किया। मद्रास बंदरगाह के बाद एसआर का नाम हो गया। सरकारी दफ्तरों में, टेंडर कमेटियों
Speaker A
में, बड़ी कंपनियों के बोर्डरूम में एसआर को जाना जाने लगा। अगले डेढ़ दशक तक दोनों भाइयों ने भारत के कोने-कोने में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया। पाइप लाइनें बिछाई, पुल बनाए, बंदरगाह बनाए, एक्सप्रेसवे बने। वह एक दौर था जब भारत के
Speaker A
लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना देश सेवा भी था और व्यवसाय भी। और जो कंपनियां इस दौर में खुद को साबित करती थीं, वे आगे के बड़े मौकों के लिए तैयार होती थीं। इसी दौर में एसआर ने एक और महत्वपूर्ण काम किया। उसने
Speaker A
अपनी इंजीनियरिंग क्षमता को अंदर से मजबूत किया। अच्छे इंजीनियर, अच्छे प्रोजेक्ट मैनेजर, अच्छा प्रशिक्षण। यानी बाद में बहुत काम आई जब एसआर ने उद्योग में कदम रखा। पर शाशी रुया को सिर्फ ठेकेदार नहीं बनना था। सन 1989, हजीरा, गुजरात। एक समुद्र के किनारे का छोटा
Speaker A
सा कस्बा। एसआर स्टील की नींव पड़ी। भारत उस समय एक बड़े बदलाव की दहलीज पर था। 1991 की आर्थिक उदारीकरण अभी कुछ साल दूर था। पर उससे पहले भी जो उद्योगपति सही समय पर स्टील में उतर गए, उन्होंने इतिहास बदला।
Speaker A
टाटा और जिंदल पहले से थे। एसआर ने एक अलग रास्ता चुना। हजीरा में एक ऐसा स्टील प्लांट जो गैस पर आधारित होगा, कोयले पर नहीं। यह अपने समय में एक साहसिक तकनीकी फैसला था। शाशी रुया और रवि रुया दोनों को पता था कि
Speaker A
स्टील में जाने का मतलब है बहुत बड़ा निवेश, बहुत लंबी प्रतीक्षा और बहुत ज्यादा जोखिम। पर उन्होंने किया। एसआर स्टील की क्षमता धीरे-धीरे बढ़ी। शुरुआत में कुछ लाख टन, फिर 10 लाख टन, फिर 20 लाख टन। हजीरा का वह कारखाना जो एक
Speaker A
वीराने में शुरू हुआ था, आगे चलकर भारत के सबसे बड़े निजी स्टील प्लांटों में से एक बन गया। हजारों लोगों की नौकरी थी वहां। एक पूरा टाउनशिप बन गया था। स्कूल, अस्पताल, आवास। हजीरा का वो हिस्सा जो
Speaker A
एसआर स्टील के इर्द-गिर्द था, एक अलग दुनिया थी। और इस दुनिया की रीड थे गैस आधारित स्टील उत्पादन की वो तकनीक, जो भारत में उस समय बहुत कम लोग जानते थे। शाशी रुया और रवि रुया दोनों को यह भरोसा था कि
Speaker A
भारत का स्पार्ट उद्योग बड़ा होगा। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होना था। मकान बनने थे, पुल बनने थे और इन सबके लिए स्टील चाहिए। यह मांग कम होने वाली नहीं थी। पर एसआर सिर्फ स्टील से नहीं रुकी। 1990 का दशक भारत के उद्योग के लिए एक
Speaker A
खुला मैदान था। लाइसेंस राज खत्म हो रहा था। विदेशी पूंजी आ रही थी। टेलीकॉम, तेल, बिजली हर क्षेत्र में नए खिलाड़ी उतर रहे थे। शाशी रुया और रवि रुया ने हर मौके को पकड़ा। एसआर ऑयल गुजरात के वाडिनार में एक
Speaker A
रिफाइनरी। यह भारत की कुछ बड़ी निजी रिफाइनरियों में से एक बनी, जो कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों में बदलती थी। यह रिफाइनरी बाद में उस सौदे का केंद्र बनी, जो दोनों भाइयों के जीवन का सबसे बड़ा लेनदेन साबित होगा। एसआर पावर,
Speaker A
बिजली उत्पादन में कदम। भारत में उन दिनों बिजली की भारी कमी थी और जो निजी कंपनियां पावर प्लांट लगाती थीं, उन्हें राज्य सरकारें लंबे समय के लिए बिजली खरीदने के अनुबंध देती थीं। यह एक स्थिर और दीर्घकालिक व्यवसाय था। एसआर शिपिंग,
Speaker A
बंदरगाह। यह तार्किक था। जो कंपनी इतना कच्चा माल आयात करती हो और इतना उत्पाद निर्यात करती हो, उसके लिए अपने जहाज और बंदरगाह होना फायदे का था। और फिर आया टेलीकॉम। 2000 के दशक की शुरुआत, मोबाइल क्रांति भारत में आ चुकी थी। हर शहर में, हर गांव
Speaker A
में लोग मोबाइल फोन चाहते थे। टेलीकॉम लाइसेंस सोने से भी कीमती था। जिसे मिल गया, उसने करोड़ों ग्राहक बना लिए। एसआर टेली होल्डिंग्स। यह वो कंपनी थी जो आगे चलकर एक बड़ी पार्टनरशिप में बदली और Vodafone एसआर बनी। ब्रिटेन की दिग्गज
Speaker A
टेलीकॉम कंपनी Vodafone ने एसआर के साथ मिलकर भारत के मोबाइल बाजार में उतरने का फैसला किया। यह पार्टनरशिप कुछ सालों तक चली और फिर Vodafone ने एसआर की हिस्सेदारी भी खरीद ली। उस सौदे से एसआर को बताया जाता है करीब $5 अरब डॉलर से
Speaker A
ज्यादा मिले। 2007-2008 का दौर एसआर के चरम का दौर था। कंपनी का साम्राज्य फैला हुआ था। स्टील, तेल, बिजली, बंदरगाह, शिपिंग। दोनों भाइयों का नाम भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिना जाने लगा था। उनके बेटे, शाशी
Speaker A
रुया के बेटे प्रशांत रुया कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज में आ गए थे। यह एक पारिवारिक साम्राज्य था, जो तीसरी पीढ़ी की तरफ बढ़ रहा था। पर उस चमक के पीछे एक बहुत बड़ी समस्या पल रही थी। एसआर का विस्तार बहुत तेज था और वह
Speaker A
विस्तार मुख्य रूप से कर्ज पर हो रहा था। स्टील प्लांट लगाने में हजारों करोड़ रुपए लगते हैं। रिफाइनरी बनाने में हजारों करोड़। पावर प्लांट में हजारों करोड़। जब आप एक साथ इतने सारे क्षेत्रों में इतना बड़ा निवेश कर रहे हो और पैसा खुद के पास
Speaker A
पर्याप्त ना हो तो बैंकों से कर्ज लेना पड़ता है। 2000 के शुरुआती दशक में यह सब आसान था। ब्याज दरें कम थीं। बैंक बड़े उद्योगपतियों को कर्ज देने के लिए तैयार थे और एसआर जैसी कंपनी जिसके पास इतनी संपत्तियां थीं,
Speaker A
उसे कर्ज मिलना कठिन नहीं था। पर 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट आया। दुनिया भर के बाजार डूब गए। भारत में भी असर हुआ। स्टील की कीमतें गिरी, तेल की कीमतें अस्थिर हुईं। पावर प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ी और जिन प्रोजेक्ट से पैसा आने की उम्मीद थी,
Speaker A
उनसे पैसा आने में देरी हुई। एसआर का कर्ज बढ़ता चला गया। यहां एक जरूरी बात समझनी है। बड़े उद्योग में कर्ज लेना बुरी बात नहीं है। हर बड़ी कंपनी कर्ज पर चलती है। Tata, Mahindra, Reliance सभी ने कर्ज लिया है। सवाल यह है
Speaker A
कि कर्ज से जो प्रोजेक्ट बन रहा है वह समय पर चालू होता है या नहीं? और जो...
Speaker A
का बोझ बढ़ता रहा। 2010 तक कर्ज का बोझ इतना बड़ा हो गया था कि बैंक चिंतित होने लगे। ब्याज के भुगतान में देरी होने लगी। बैंकों ने मीटिंग की। एसर ग्रुप के अधिकारियों ने आश्वस्त करने की कोशिश की कि जो प्रोजेक्ट्स हैं वे
Speaker A
रेवेन्यू देंगे कर्ज चुकेगा। पर वो रेवेन्यू उतनी तेजी से नहीं आया जितना वादा था। 2015 16 तक एसआर स्टील अकेले पर 1 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज था। पूरे ग्रुप पर कर्ज 2 लाख करोड़ के आसपास था। बैंकों
Speaker A
ने इस कर्ज को स्ट्रेस्ड घोषित किया। यानी वापसी की उम्मीद कमजोर है। सन दो 2017 भारत सरकार ने एक नया कानून लागू किया। दिवाला एवं दिवालियापन संहिता यानी इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड आईबीसी। यह कानून भारत के इतिहास में एक
Speaker A
क्रांतिकारी बदलाव था। इससे पहले जब कोई कंपनी बड़े कर्ज में डूब जाती थी तो बैंकों के पास बहुत कम विकल्प थे। कोर्ट केस सालों साल चलते थे। कर्ज वापस आना लगभग असंभव था। प्रमोटर यानी कंपनी के मालिक किसी ना किसी तरह कंपनी पर काबिज
Speaker A
रहते थे। भले ही बैंकों का पैसा डूब रहा हो। आईबीसी ने यह बदल दिया। अब किसी कंपनी को दिवालिया घोषित किया जा सकता था। एक रेजोल्यूशन प्रोफेशनल नियुक्त होता था। बोलियां आमंत्रित होती थी और सबसे अच्छी बोली लगाने वाले को कंपनी मिल जाती थी।
Speaker A
भले ही वह मूल मालिक ना हो। एसआर स्टील उन पहली बड़ी कंपनियों में से थी जिन पर यह नया कानून लागू हुआ। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 12 बड़ी स्ट्रेस कंपनियों की सूची जारी की। एसआर स्टील उसमें थी। और इस
Speaker A
बिंदु पर शाशी रुया, रवि रुया और प्रशांत रुया तीनों ने एक फैसला किया लड़ेंगे। जो लड़ाई अगले 2 साल चली वह भारत के कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली अदालती लड़ाईयों में से एक बन गई। एक तरफ थे आरसेलर मित्तल लक्ष्मी
Speaker A
मित्तल की कंपनी जो एस सार स्टील को खरीदना चाहती थी। उनके साथ कई और बिडर्स भी थे। दूसरी तरफ थे रुया परिवार, शाशी रुया, रवि रुया और प्रशांत रुया जो यह नहीं चाहते थे कि उनकी कंपनी किसी और को
Speaker A
मिले। उन्होंने हर कानूनी रास्ता अपनाया। पहले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल, फिर नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल, फिर सुप्रीम कोर्ट, हर स्तर पर नए तर्क, नए वकील, नए दस्तावेज। यह लड़ाई इतनी लंबी खींची कि कानून विशेषज्ञ इसे आईबीसी के
Speaker A
इतिहास का सबसे जटिल मामला कहने लगे। बैंकों के वकील एक तरफ रुया परिवार के वकील दूसरी तरफ आर्सेलर मित्तल के वकील तीसरी तरफ और बीच में अदालतें जो हर बार नए सवालों से जूझ रही थी [संगीत] और इस
Speaker A
पूरी प्रक्रिया के बीच रुया परिवार ने एक और दांव खेला जिसने पूरे देश को चौंका दिया। उन्होंने एक क्रेडिटर की पोजीशन से एसआर स्टील में पैसा लगाकर कंपनी का रेजोल्यूशन प्लान खुद पेश करने की कोशिश की। यानी कंपनी के मालिकों ने एक रास्ता
Speaker A
खोजा कि बाहर से आकर अपनी ही कंपनी को वापस खरीद लें। जिस कर्ज की वजह से कंपनी दिवालियां हुई थी, उसी कर्ज के बीच एक तकनीकी रास्ते से वापसी। यह दांव इतना साहसिक था कि कानूनी दुनिया में चर्चा
Speaker A
होने लगी। क्या आईबीसी में इतनी खामी है? क्या कोई मालिक अपनी डूबती कंपनी को इस तरह वापस ले सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज किया। कोर्ट ने कहा जो लोग कंपनी के डूबने के लिए जिम्मेदार हैं वे
Speaker A
उसी कंपनी को सस्ते में वापस नहीं खरीद सकते। यह आईबीसी की मूल भावना के खिलाफ है। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आया। आरसेलर मित्तल को एसआर स्टील मिली। 42,000 करोड़ में। बैंकों को पूरा पैसा नहीं मिला। ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा
Speaker A
का कर्ज था और जो मिला वह उसका एक हिस्सा ही था। पर आईबीसी की प्रक्रिया के तहत जो सबसे अच्छी बोली थी वह मान ली गई। यह फैसला भारत में आईबीसी कानून की ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण बन गया और एक संदेश गया
Speaker A
पूरे कॉर्पोरेट जगत में। अब पुराने तरीके नहीं चलेंगे। रुया परिवार के हाथ से एसआर स्टील निकल गई। पर एसआर स्टील अकेली नहीं गई। एसआर ऑनेल वाडिनार की वो रिफाइनरी जो दोनों भाइयों ने दशकों में बनाई थी। वह भी बिकी।
Speaker A
सन 2017 में एक रूस के नेतृत्व वाले संगठन को जिसमें रोसनेफ्ट, ट्रफगुरा और यूसीओ शामिल थे 12 बिंदु 9 अरब डॉलर में। यह भारत के इतिहास के सबसे बड़े एफडीआई डील्स में से एक था। इस सौदे से रुया परिवार को
Speaker A
काफी पैसा मिला। जो कर्ज चुकाने में गया, बैंकों के पास गया और जो बचा वह भी किसी हद तक उनके हाथ में रहा। पर जो साम्राज्य उन्होंने बनाया था वह अब नहीं था। एसआर का नाम बोर्ड पर था पर मालिक बदल गए थे। जिस
Speaker A
रिफाइनरी को दोनों भाइयों ने खड़ा किया था वो अब रूस की एक कंपनी के हाथ में थी। यह नुकसान सिर्फ पैसे का नहीं था। यह एक पहचान का नुकसान था। और उसी दौर में एक और चीज हुई। ईडी और सीबीआई ने एसआर ग्रुप से जुड़े
Speaker A
मामलों में जांच शुरू की। आरोप थे मनी लॉन्ड्रिंग के। आरोप थे बैंकों को गुमराह करने के। यह मामले अदालतों में चलते रहे। रुया परिवार ने हर आरोप का खंडन किया। उनके वकीलों ने बार-बार कहा कि जो हुआ वो
Speaker A
व्यवसाय की असफलता थी। जानबूझकर की गई धोखाधड़ी नहीं। रुया परिवार शाशी रुया रवि रुया दुबई में बस गए। भारत में जो साम्राज्य उन्होंने बनाया था, वह अब दूसरों के हाथ में था। बैंकों का ज्यादातर पैसा वापस नहीं आया था और देश के बड़े
Speaker A
अखबारों में उनका नाम डिफॉल्टर के साथ जोड़कर लिखा जाने लगा था। पर कहानी यहां खत्म नहीं हुई। 2022 23 24 धीरे-धीरे एक नई कंपनी की खबरें आने लगी। एसआर ग्रुप पर नए रूप में। दुबई में बैठे शाशी रुैया और रवि रुया ने
Speaker A
चुप रहना बंद किया। दोनों भाइयों ने अखबारों को इंटरव्यू देने शुरू किए। कहा हम वापस आ रहे हैं। हमने गलतियां की पर हमारे पास अनुभव है, नेटवर्क है और नई दिशा है। दुबई से उन्होंने नई कंपनियां बनाई जिनका नाम अभी भी एसआर है। पर उनका
Speaker A
स्वामित्व और संरचना पुरानी एसआर से अलग है। दुबई से शाशी रुया और रवि रुया ने ऐलान किया एसआर 2.0 शुरू हो रहा है। इस बार नई एसआर ग्रीन स्टील बनाएगी। हाइड्रोजन से चलने वाले स्टील प्लांट जहां पारंपरिक कोयला नहीं जलेगा बल्कि ग्रीन
Speaker A
हाइड्रोजन का इस्तेमाल होगा। यह पूरी दुनिया का एजेंडा है। यूरोप, अमेरिका, जापान सभी ग्रीन स्टील की तरफ जाना चाहते हैं। कार्बन उत्सर्जन कम करना है और जो पहले यह तकनीक लाएगा उसे भविष्य का बाजार मिलेगा। एसआर2.0 ने ब्रिटेन में एक स्टील प्लांट लगाने की
Speaker A
घोषणा की। स्कंथोरप, इंग्लैंड [संगीत] जहां ब्रिटेन का पुराना स्टील उद्योग धीरे-धीरे बंद हो रहा था, वहां एसआर ने एक नई ग्रीन स्टील मिल लगाने की बात कही। रोजगार का वादा किया। निवेश की घोषणा की। ब्रिटिश सरकार के साथ बातचीत हुई। स्थानीय
Speaker A
नेताओं ने उम्मीद जताई कि हजारों नौकरियां बनेंगी। यह एक ऐसा अवसर था जो एसआर के पुराने नाम को एक नई पहचान देने का मौका दे सकता था। ग्रीन हाइड्रोजन में भी एसआर ने कदम रखा। भारत और खाड़ी देशों में परियोजनाएं। यह
Speaker A
आने वाले दशक का ऊर्जा बाजार है और रुया परिवार एक बार फिर उसमें उतरना चाहता है। शाशी रुया ने इंटरव्यू में कहा, हम एनर्जी ट्रांजिशन का हिस्सा बनना चाहते हैं। भविष्य ग्रीन एनर्जी का है और हमारे पास उसे बनाने की क्षमता है। पर यह क्षमता अभी
Speaker A
तक ज्यादातर कागज पर है। पर कुछ सवाल हैं जो इस वापसी के साथ आते हैं। क्या यह वापसी असली है या यह महज एक नई पहचान है?
Speaker A
पुराने नाम के साथ नया कारोबार रुया परिवार पर भारत में जो मामले चल रहे हैं वे अभी खत्म नहीं हुए। बैंकों का वह पैसा जो एसआर स्टील की वजह से डूबा वो पूरी तरह वापस नहीं आया। जिन लाखों छोटे
Speaker A
निवेशकों ने एसआर की कंपनियों के शेयर खरीदे थे उनमें से कई को नुकसान हुआ। और ब्रिटेन का वह ग्रीन स्टील प्लांट जिसकी घोषणा हुई उसकी प्रगति धीमी रही है। वादे हुए पर धरातल पर काम उतनी तेजी से नहीं
Speaker A
आया। तो क्या इस साल 2.0 सच में एक नया अध्याय है या यह एक ऐसे परिवार की कोशिश है जो पुराने नाम को नई चमक देना चाहता है जबकि पुराने हिसाब किताब अभी बाकी हैं। यह सवाल अभी बिना
Speaker A
जवाब के हैं। एक और बात जो इस पूरी कहानी में अक्सर नजरअंदाज हो जाती है वो है उन लोगों की कहानी जो एसआर के इन प्लांट्स में काम करते थे। हजीरा में वाडीनार में हजारों कर्मचारी उनके परिवार जब एसआर
Speaker A
स्टील की आईबीसी प्रक्रिया चल रही थी तो उन कर्मचारियों का क्या हुआ जिनके भविष्य का फैसला अदालतों में हो रहा था उनकी तनख्वाह उनकी पेंशन उनके बकाया यह सब रेोल्यूशन प्लान का हिस्सा थे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक अहम बात यह भी थी
Speaker A
कि कर्मचारियों के बकाए को प्राथमिकता दी जाए यह छोटी बात नहीं थी शाशि काशी रुइया और रवि रुया की कहानी भारत की उस पीढ़ी की कहानी है जिसने उदारीकरण के बाद का मौका पूरी ताकत से पकड़ा जिसने राजस्थान के एक
Speaker A
व्यापारी परिवार को मुंबई की सड़कों पर खड़ा किया और वहां से एक ऐसा साम्राज्य बनाया जो ₹ लाख करोड़ तक पहुंचा। स्टील से तेल, तेल से पावर, पावर से टेलीकॉम यह उस दौर की कहानी है जब हर सेक्टर में एंट्री
Speaker A
लेना पॉसिबल था। और जोखिम उठाने वाले को इनाम मिलता था। पर यह कहानी यह भी बताती है कि कर्ज पर बनाया हुआ साम्राज्य जब बाजार बदलता है। जब नियत में कमी हो, जब कर्ज चुकाने की क्षमता कमजोर पड़े तो
Speaker A
टूटने में देर नहीं लगती। भारत के बैंकों ने जो पैसा खोया वह ज्यादातर सरकारी बैंकों का था। यानी आम जनता का। वो पैसा जो अरबों रुपए में था उसे एक हद तक लिखना पड़ा। यह कोई छोटी बात नहीं है। योर
Speaker A
आईबीसी जिसने एसआर स्टील का मामला निपटाया, उसने देश को एक संदेश दिया। बड़े नाम हो, बड़े कनेक्शन हो या बड़ी अदालती लड़ाई हो, नया कानून किसी के लिए नहीं झुकेगा। यह संदेश भारत के उद्योग जगत में अब भी गूंजता है। लक्ष्मी मित्तल जिनके
Speaker A
बारे में आपने इस चैनल पर एपिसोड चार में सुना। उन्होंने जो कंपनी 42,000 करोड़ में ली, वह वही कंपनी थी जिसे दोनों भाइयों ने दशकों में खड़ा किया था। एक भारतीय ने यूरोप का स्पार्ट साम्राज्य जीता और दूसरे
Speaker A
भारतीयों ने अपनी कंपनी गवाई। यह संयोग भी इतिहास का हिस्सा है। तो आज सर कहां है?
Speaker A
एसआर स्टील आर्सेलर मिटल निपोन स्टील इंडिया के नाम से चल रही है। एसआर ओनेलका वाडिनार रिफाइनरी रोसनेफ्ट के नेतृत्व वाली कंसोर्टियम के अधीन है। और एसआर 2.0 ग्रीन स्टील और हाइड्रोजन के साथ अभी भी घोषणाओं के द्वार में हैं। शाशी रुया और
Speaker A
रवि रुया दोनों भाई अभी भी कारोबार में हैं। दुबई से और उनके बेटे प्रशांत रुया भी। क्या यह परिवार एक बार फिर भारत के बड़े उद्योग जगत में वापस आएगा? क्या ग्रीन स्टील का वादा पूरा होगा? क्या वे बैंकों
Speaker A
और निवेशकों का भरोसा दोबारा जीत पाएंगे? और क्या भारत की अदालतें उन मामलों में क्या फैसला देती हैं जो अभी भी लंबित है?
Speaker A
एक बात और प्रशांत रुया जो शाशी रुया के बेटे हैं वे अब एसआर2.0 के चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। तीसरी पीढ़ी जिस पीढ़ी को पहले पिता ने पाला जिसने कंपनी को बनते देखा और जिसने इसे टूटते भी देखा। क्या यह पीढ़ी अपने दादा
Speaker A
और पिता की कहानी से कुछ अलग रास्ता बना पाएगी? या यह एक ऐसी कहानी है जहां शीर्षक हमेशा रहेगा। वे वापस आए। पर असली वापसी कभी नहीं होगी। यह प्रश्न अभी खुला है और भारत का कारोबारी जगत इसका जवाब देख रहा है।
Speaker A
इंडियास रिचेस्ट इसीलिए है। सिर्फ उठान नहीं, गिरावट [संगीत] भी, सिर्फ साम्राज्य नहीं, उसके टूटने की कहानी भी। और जब वापसी का दावा हो तो वह दावा कितना सच है और कितना जमीन पर है यह भी। अगर आज की
Speaker A
असार की कहानी ने कुछ सोचने पर मजबूर किया तो चैनल की सदस्यता लें। और यह कड़ी किसी ऐसे दोस्त को भेजें जो भारत की असली कारोबारी कहानियां जानना चाहता हो। सिर्फ सफलता वाला हिस्सा नहीं पूरी तस्वीर। कल फिर मिलते हैं।
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