दिल्ली के सबसे अमीर, मगर अज्ञात बर्मन परिवार और उनकी कंपनी डाबर की 140 साल पुरानी कहानी।
Key Takeaways
- डाबर परिवार की पहचान उनके ब्रांड से ज्यादा छिपी हुई है।
- परंपरागत आयुर्वेदिक उत्पादों को आधुनिक पैकेजिंग और मार्केटिंग से लोकप्रिय बनाया गया।
- ब्रांड लॉयल्टी से बढ़कर यह एक विरासत और स्मृति बन गया है।
- डाबर की सफलता का राज परिवार की गुप्तता और सतत विकास में है।
- कॉर्पोरेट लड़ाई ने परिवार को सार्वजनिक ध्यान में लाया।
What the video covers
- डाबर कंपनी की स्थापना एक बंगाली डॉक्टर डॉ. एस. के. बर्मन ने की थी, जिन्होंने आयुर्वेदिक दवाओं को लोकप्रिय बनाया।
- डाबर का नाम डॉ. बर्मन के नाम से बना, जो 140 सालों से परिवार का व्यवसाय है।
- च्यवनप्राश जैसे पारंपरिक उत्पादों को पैकिंग के जरिए पूरे भारत में पहुंचाया गया।
- डाबर ने समय बचाने वाले उत्पाद बेचकर भारतीय घरों में अपनी जगह बनाई।
- डाबर के पास लगभग 70 ब्रांड हैं और यह 70 देशों में बिक्री करता है।
- परिवार मीडिया से दूर रहता है, इसलिए उनकी पहचान कम लोगों को है।
- डाबर ने कई कंपनियां खरीदीं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी कदम रखा।
- परिवार के बीच कोई सार्वजनिक झगड़ा नहीं हुआ है, जो एक बड़ी उपलब्धि है।
- डाबर का मुख्यालय कोलकाता से दिल्ली एनसीआर में स्थानांतरित हुआ।
- 2023 में परिवार की एक लंबी कॉर्पोरेट लड़ाई ने उन्हें अचानक सुर्खियों में ला दिया।
Chapters
- 00:00डाबर और बर्मन परिवार की परिचय
- 01:04डॉ. एस. के. बर्मन की कहानी और डाबर की शुरुआत
- 02:28पैकेजिंग का महत्व और कंपनी का विस्तार
- 05:07च्यवनप्राश का इतिहास और डाबर का योगदान
- 06:33डाबर के अन्य प्रमुख उत्पाद और ब्रांड विस्तार
- 09:16डाबर का अंतरराष्ट्रीय विस्तार और खरीदारी
- 10:16परिवार की गुप्तता और मीडिया से दूरी
- 11:092023 की कॉर्पोरेट लड़ाई और परिवार की भूमिका
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Speaker A
आपकी रसोई खोलिए। देखिए क्या दिखता है। च्यवनप्राश की एक शीशी, आमला तेल, हाजमोला, Real juice, शायद Odol भी। एक ही नाम बार बार Dabur। अब एक सवाल। यह कंपनी किसकी है?
Speaker A
रुकिए। सोच कर बताइए। अंबानी की नहीं, Tata की नहीं, Birla की नहीं तो किसकी?
Speaker A
ज्यादातर लोगों के पास इसका जवाब नहीं है। ग्राहक रोज खरीदते हैं पर परिवार का नाम कोई नहीं जानता। नाम है बर्मन। पांच पीढ़ियां, 140 साल का कारोबार। कुल दौलत करीब 80 हज़ार करोड़ रुपए। कुछ अंदाजे इसे 1 लाख करोड़ के पार बताते हैं। पर न कोई Twitter तूफान,
Speaker A
न फिल्मी सितारे के साथ फोटो, न किसी शादी की TV coverage। तो सवाल यह बनता है इतनी बड़ी कंपनी, इतना बड़ा परिवार और इतनी गहरी चुप्पी क्यों?
Speaker A
और उससे भी बड़ा सवाल अगर यह परिवार सचमुच इतना चुप है तो 2023 में यह अचानक दिल्ली की सबसे लंबी corporate जंग के बीच कैसे आ खड़ा हुआ?
Speaker A
आज की कहानी दो हिस्सों की है। एक बंगाली डॉक्टर की, जिसका नाम आज कोई नहीं जानता और एक ऐसी लड़ाई की जो हर हिंदुस्तानी की रसोई से जुड़ती है। यह India's Richest है। यहां हम वो कहानियां सुनाते हैं जो TV पर नहीं आती। नया episode हर दिन
Speaker A
subscribe करिए मुफ्त है। शुरू कहां से करते हैं? दिल्ली से नहीं कोलकाता से। 1884 British राज बंगाल एक साथ plague, malaria और cholera से घिरा हुआ। अंग्रेजी दवा महंगी थी। आम आदमी की जेब से बाहर। इसी दौर में एक नौजवान डॉक्टर था। नाम Dr. S. K.
Speaker A
बर्मन। उसके पास पूरी अंग्रेजी degree थी। license भी था। पर उसके सामने एक अजीब सी उलझन खड़ी थी। अंग्रेजी दवा से मरीज ठीक हो सकते थे पर उन तक पहुंच नहीं सकती थी। तो वो क्या करे?
Speaker A
किताबों में सीखी दवा बेचे जो कोई खरीद न सके या कुछ और सोचे। उसने अपनी degree एक तरफ रखी और पुरानी संस्कृत की किताबें उठा ली। चरक, सुश्रुत आयुर्वेद के 2000 साल पुराने पन्ने। रात में वो जड़ी बूटियां पीसते,
Speaker A
काढ़े उबालते। malaria की एक दवा, हैजे का एक शरबत, बच्चों के बुखार के लिए एक syrup सुबह मरीजों तक पहुंचाते। दाम जितना जो दे सके। यह वो दौर था बंगाल पुनर्जागरण का जब हिंदुस्तान अपनी पुरानी चीजों को नए तरीके से देखने की कोशिश कर रहा था। पश्चिम का science,
Speaker A
पूरब की दवा। Dr. बर्मन उसी माहौल के इंसान थे। बस उन्होंने इसे भाषण नहीं दिया, सिर्फ काम किया। बंगाली मरीजों ने उन्हें एक प्यार भरा नाम दे दिया Dr. बर्मन। अब यहां रुकिए क्योंकि आगे की पूरी कहानी इसी नाम पर टिकी है। बंगाली जुबान पर Dr.
Speaker A
बर्मन धीरे धीरे एक शब्द बन गया। दो अलग टुकड़े जुड़ गए Dabur। जब उन्होंने कंपनी बनाई तो नाम भी वही रखा Dabur। एक डॉक्टर की उपाधि, एक परिवार का surname और एक ऐसा brand जिसका नाम आज एक अरब से ज्यादा हिंदुस्तानी जानते हैं।
Speaker A
पर वो एक डॉक्टर जिसके नाम पर यह पूरा साम्राज्य खड़ा है, उसका नाम आज ज्यादातर लोग नहीं जानते। यहीं से बर्मन परिवार की सबसे बड़ी आदत शुरू हुई brand को आगे, नाम को पीछे। यह आदत आगे चलकर पूरे परिवार की पहचान बन गई। Dr.
Speaker A
बर्मन 1907 में चल बसे। बेटे C. L. बर्मन। पूरा नाम चंद्र मोहन लाल बर्मन। पर कारोबार आया। उन्होंने पिता की छोटी दुकान को एक कंपनी में बदला। मशीनें आईं, packaging आई, salesman आए। पर C. L.
Speaker A
बर्मन के सामने एक बड़ा सवाल था। पिता ने भरोसा बनाया था पर भरोसा एक शहर में सिमटा हुआ था। कोलकाता तक एक बंगाली दवा को हिंदुस्तान भर तक कैसे पहुंचाया जाए। जवाब शीशी। अगर आप हर ग्राहक के घर तक खुद जाएंगे तो एक शहर से आगे नहीं जा
Speaker A
सकते। पर अगर आप शीशी में दवा पैक कर दें तो वह शीशी हजार किलोमीटर दूर की दुकान पर पहुंच सकती है। packaging सिर्फ marketing नहीं थी, पहुंच थी और C. L.
Speaker A
बर्मन ने वो पहुंच बनाई। 1936 में Dabur India Limited औपचारिक रूप से बनी। पर असली छलांग एक product से आई। एक ऐसा product जिसे आपने बचपन में कभी न कभी जरूर खाया होगा। सर्दियों की सुबह मां चम्मच में डालकर आगे बढ़ाती। आप मुंह बनाते,
Speaker A
भागते पर अंत में खाना पड़ता च्यवनप्राश। अब यहां एक बात है जो लोग नहीं जानते। च्यवनप्राश Dabur ने नहीं बनाया। यह ऋषि च्यवन के नाम पर एक लगभग 2000 साल पुरानी आयुर्वेदिक दवा है। संस्कृत के पुराने ग्रंथों में इसका जिक्र है। आंवला,
Speaker A
शहद, लौंग, इलायची, दालचीनी और 40 से ज्यादा जड़ी बूटियां एक साथ पकाकर बनी हुई एक गाढ़ी मीठी कड़वी चटनी। तो अगर च्यवनप्राश 2000 साल पुराना है तो Dabur ने क्या किया?
Speaker A
एक बहुत छोटी सी चीज जो बहुत बड़ा फर्क बन गई। उन्होंने उसे शीशी में बंद किया। एक जैसा नाप, एक जैसा स्वाद, एक जैसा भरोसा। लेबल लगाया, पैकिंग की। पूरे देश की दुकानों तक पहुंचाया। पहले जो चीज आपको किसी वैद्य से खरीदनी पड़ती थी,
Speaker A
अब आप उसे किसी भी दवा की दुकान से उठा सकते थे। और इस एक कदम से एक कमाल हुआ। च्यवनप्राश एक दवा से बदल कर एक रस्म बन गया। हर सर्दी, हर घर, हर बच्चे के मुंह में पीढ़ी दर पीढ़ी। एक आंकड़ा सुनिए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार
Speaker A
आज भारत के च्यवनप्राश बाजार का लगभग 60 फीसदी हिस्सा अकेले Dabur के पास है। हर तीन शीशियों में से लगभग दो शीशी उसकी। एक ऐसी दवा जिस पर किसी का पेटेंट नहीं। 2000 साल पुरानी रेसिपी कोई भी बना सकता है पर बनाता कोई और है और भारत खरीदता Dabur की शीशी।
Speaker A
यही ब्रांडिंग की ताकत है। अब यह चीज बहुत गहरी है। इसे एक तस्वीर से समझिए। दिल्ली, 90 के दशक की एक सर्दी की सुबह। एक मध्यम वर्गीय घर, रसोई में माँ, कंधे पर तौलिया, हाथ में Dabur च्यवनप्राश की भूरी शीशी,
Speaker A
मेज पर एक चम्मच। बच्चा स्कूल जाने से पहले भागता है। माँ रोकती है, एक चम्मच खाकर जाओ। बच्चा मुंह बनाता है पर खाता है। स्कूल जाता है। 25 साल बाद वही बच्चा एक बड़ा हो चुका आदमी है। अपने बच्चों
Speaker A
को स्कूल भेजने से पहले वही चम्मच निकाल रहा है। वही शीशी, वही भूरा रंग। 30 साल में शीशी नहीं बदली, लेबल नहीं बदला, रस्म नहीं बदली। यह कोई ब्रांड लॉयल्टी नहीं है। यह एक विरासत है। क्योंकि जब कोई प्रोडक्ट आदत बन जाए तो कंपनी को बेचना नहीं पड़ता। ग्राहक खुद खरीदने
Speaker A
आता है और अपने बच्चों को खरीदना सिखाता है। एक ब्रांड नहीं, एक स्मृति। अब एक बात और जोड़ लीजिए। उस दौर में जब Dabur च्यवनप्राश बाजार में आया तो बहुत लोगों ने हंसकर कहा कौन खरीदेगा?
Speaker A
हर बंगाली दादी अपने घर में बना लेती है। पर Dabur की सोच अलग थी। हर घर में शहद है, हर घर में आमला है, पर हर घर में शहद, आमला और 40 जड़ी बूटियां एक साथ पकाने का समय नहीं है। Dabur ने वही बेचा। दवा नहीं,
Speaker A
समय। एक शीशी, 20 मिनट का काम बच गया रोज़। और जब भारत की माँएं नौकरियों में जाने लगीं, जब बच्चों को खाने की तैयारी 2 मिनट में करनी पड़ी तब Dabur की शीशी और भी कीमती हो गई। एक चीज जो 100 साल पहले एक विकल्प थी,
Speaker A
अब एक जरूरत बन गई। फिर Dabur ने यही फॉर्मूला दूसरे प्रोडक्ट्स पर लगाया। आमला तेल, बालों के लिए। शीशी का डिजाइन 50 साल पहले भी वही था, आज भी वही है। हाजमोला, खाने के बाद की गोली जो आपके स्कूल के दिनों में तीन गोली एक रुपये में मिलती थी। Real fruit juice,
Speaker A
भारत का पहला ब्रांडेड टेट्रा पैक फ्रूट जूस। Vatika, Odonil, Odomos, Babool टूथपेस्ट, Hobby baking और Dabur सिर्फ अपने बनाए ब्रांड नहीं बेचती, कई कंपनियां खरीदी भी। 2005 में Balsara Hygiene।
Speaker A
इसी सौदे में Babool टूथपेस्ट, Odonil और Odomos Dabur के परिवार में आए। 2009 में Fem care Pharma हेयर रिमूवल कैटेगरी में एक बड़ा नाम। 2010 में तुर्की मिस्र की Hobby Cosmetics खरीदी। इसी के जरिए Dabur मध्य पूर्व और
Speaker A
अफ्रीका के पर्सनल केयर बाजार में उतरा। हर एक खरीदारी सोच समझकर, कोई शोर नहीं। बस अखबार के किसी कोने में एक छोटी सी खबर और महीने भर बाद वो ब्रांड Dabur के परिवार में शामिल। आज Dabur के पास लगभग
Speaker A
70 ब्रांड हैं। 70 देशों में बिक्री। एक बात यहां जरूर बताने लायक है। 1995 में Dabur ने Vatika लॉन्च किया। हर्बल शैम्पू और तेल का ब्रांड। अगले कुछ सालों में Vatika बालों की देखभाल की दुनिया में Dabur का सबसे बड़ा ब्रांड बन गया। एक साल बाद
Speaker A
1996 में आया Dabur Real। भारत का पहला बड़ा टेट्रा पैक फ्रूट जूस। उस वक्त तक भारतीय बाजार में डिब्बाबंद जूस बहुत सीमित था। Real ने पूरी कैटेगरी को खोल दिया। 2011 में Dabur ने अमेरिका की Namaste Laboratories खरीदी। अफ्रीकन अमेरिकन बालों की देखभाल की एक बड़ी कंपनी।
Speaker A
इसी के जरिए Dabur उत्तरी अमेरिका के एक खास बाजार में उतरा। Red टूथपेस्ट हर्बल पेस्ट का एक और नाम। भारत में जो टूथपेस्ट सबसे ज्यादा बिकते हैं, उनमें Red लगातार गिना जाता है। और यह सब ज्यादातर लोगों को नहीं पता होता कि सब
Speaker A
एक ही छत के नीचे है। एक और बात। कोलकाता से Dabur धीरे धीरे कहां गया?
Speaker A
80 के दशक में परिवार ने हेडक्वार्टर उत्तर की तरफ बढ़ाया। गाजियाबाद के पास कौशाम्बी में। क्यों?
Speaker A
क्योंकि दिल्ली NCR पूरे उत्तर भारत का दरवाजा था। सरकार के दफ्तर पास। कच्चा माल, आम, आमला, जड़ी बूटियां। हिमालय की तलहटी से करीब और ट्रांसपोर्ट सब एक ही जगह पर। आज Dabur की करीब 20 से ज्यादा फैक्ट्रियां हैं। साहिबाबाद,
Speaker A
पंतनगर, बद्दी, नेपाल तक, मिस्र तक। पर अब आते हैं उस सवाल पर जो शुरू में उठा था। अगर ब्रांड इतने बड़े हैं तो परिवार क्यों छिपा है?
Speaker A
क्योंकि अंबानी को आप हर मीडिया में देखते हैं। अडानी को हर हवाई अड्डे पर। बिड़ला की तीन शाखाएं अलग अलग बिजनेस अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। पर बर्मन, आपने शायद जिंदगी में इस परिवार की एक तस्वीर भी नहीं देखी। पांच पीढ़ियां,
Speaker A
तीन शाखाएं, दर्जनों सदस्य, पर लगभग सब m
Speaker A
साझेदार थे प्रीति जिंटा, नेस वाडिया और करण पॉल। खेल भी परिवार के portfolio का हिस्सा बन गया। एक और बड़ा दांव था Aviva Life Insurance में। ब्रिटिश Aviva के साथ भारतीय joint venture। बर्मन इसमें भारतीय partner थे। लगभग
Speaker A
20 साल तक। 2019 में उन्होंने अपना हिस्सा आदित्य बिड़ला group को बेच दिया। एक बड़े सौदे में। तो insurance से बर्मन का पुराना रिश्ता था और शायद उसी रिश्ते ने आगे चलकर Religare वाली कहानी की नींव रखी। Burman परिवार में हर सदस्य की एक अलग जिम्मेदारी है। आनंद बर्मन,
Speaker A
Dabur के Chairman. कहा जाता है अमेरिका के Kansas विश्वविद्यालय से PhD है। Science और Research की तरफ रुझान। अमित Burman, Dabur के Vice Chairman, साथ ही Light Bite Foods नाम की company के Chairman.
Speaker A
Punjab Grill, Zambar, Street Foods जैसे restaurant chain इसी company के तहत चलते हैं। साकेत Burman और आदित्य Burman.
Speaker A
कहा जाता है दोनों Dubai में रहते हैं। परिवार के अंतरराष्ट्रीय निवेश और मध्य पूर्व के कारोबार की देखरेख करते हैं । एक खानदान पर काम बांटे हुए, किसी की एक category, किसी का एक भूगोल और सबसे ऊपर एक अनकहा formula,
Speaker A
जो अपने-अपने कोने में master बनो, एक दूसरे के इलाके में मत आओ। शायद इसी वजह से पांच पीढ़ियों में एक भी बड़ा झगड़ा नहीं हुआ। अमित Burman, साकेत Burman, आदित्य Burman और भी कई। पर एक भी नाम आपने आज तक Page 3 की
Speaker A
सुर्थी में नहीं पढ़ा होगा। पर परिवार सिर्फ Burman नहीं है। Company को रोज चलाने वाले पेशेवर भी हैं और यह बात भी Burman शैली का हिस्सा है। पी डी नारंग, दशकों तक Dabur के Group Director, वित्त और Corporate रणनीति के लंबे समय तक कर्ता-धर्ता। सुनील दुग्गल,
Speaker A
लगभग दो दशक तक Dabur के CEO, 2019 में retire हुए। उनके दौर में company की कमाई कई गुना बढ़ी। मोहित मल्होत्रा, वर्तमान CEO, अंदर से आए, धीरे-धीरे कमान संभाली। Burman परिवार का यह भी एक कमाल है। मालिकाना हक अपने पास
Speaker A
पर रोज के फैसले पेशेवरों पर छोड़े। यह बहुत भारतीय पारिवारिक कंपनियों में नहीं होता। ज्यादातर में परिवार हर छोटी बात में दखल देता है। यहां नहीं। एक तुलना करके देखिए। अगर आपने हमारा episode 62 देखा है, Birla बनाम Lodha,
Speaker A
तो आप जानते हैं बड़े परिवारों में लड़ाईयां कितनी लंबी और महंगी होती है। एक वसीयत पर 22 साल का मुकदमा। Burman परिवार में आज तक एक भी सार्वजनिक झगड़ा दर्ज नहीं। यह अपने आप में एक उपलब्धि है। एक और बात। Burman परिवार का एक CSR foundation है। नाम,
Speaker A
संदेश Foundation. कहा जाता है इसके जरिए ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका के काम चलते हैं। हजारों गांवों में, दर्जनों राज्यों में। पर इस foundation के काम की पूरी report भी उसी शैली में आती है। साल में एक बार शांत भाषा में,
Speaker A
बिना बड़े जश्न के। दान भी उसी तरह जैसे कारोबार, चुपचाप और इस चुप्पी की एक कीमत है। एक तस्वीर से बता देते हैं। छोटे शहर की एक कोने की किराना दुकान। शाम का वक्त। एक ग्राहक आता है। "भाई साहब,
Speaker A
आमला तेल दे देना।" दुकानदार बिना पूछे शीशी उठाता है। लाल टोपी वाली। 50 साल पुराना design.
Speaker A
ग्राहक ₹40 देकर निकल जाता है। इस पूरे लेनदेन में Burman परिवार को कुछ पैसे मिले हों, शायद उससे भी कम। पर यह लेनदेन आज भारत में हर मिनट लाखों बार होता है। हर कोने में, हर दुकान में, हर गली में
Speaker A
और यही जोड़-तोड़ बनती है 1 लाख करोड़ की दौलत। बड़ी अमीरी बड़े सौदों से नहीं बनती। छोटी-छोटी शीशियों से बनती है। पर यहीं कहानी में एक बड़ा मोड़ आता है। क्योंकि अगर Burman परिवार सिर्फ शीशियों में यकीन रखता
Speaker A
तो यह कहानी यहीं खत्म हो सकती थी। पर सितंबर 2023 में परिवार ने कुछ ऐसा किया जो उनकी 100 साल पुरानी आदत के बिल्कुल उलट था। उन्होंने चुप्पी तोड़ी और तोड़ी भी तो ऐसी लड़ाई के लिए जो पिछले कई सालों की हिंदुस्तानी Corporate
Speaker A
दुनिया की सबसे लंबी takeover जंगो में गिनी गई। साल 2023, शहर दिल्ली, company Religare Enterprises.
Speaker A
Religare से Dabur का कोई सीधा रिश्ता नहीं। दवा नहीं, शहद नहीं, juice नहीं। यह एक Finance company है। Health Insurance, Stock Broking, Housing Finance.
Speaker A
नाम कहीं सुना हुआ लगता है। अगर आपने हमारा episode 46 देखा है Singh Brothers तो हां Religare उसी साम्राज्य का हिस्सा थी। मलबिंदर और शिविंदर सिंह के गिरने के बाद यह company एक स्वतंत्र board के पास आ गई। नई
Speaker A
कार्यकारी Chairperson बनी रश्मि सालुजा। कहा जाता है उन्होंने Religare को मुश्किल दौर से निकाला। सब कुछ ठीक चल रहा था। फिर Burman परिवार जो पहले से Religare के छोटे शेयरधारकों में से एक था, ने एक ऐलान किया। हम एक Open Offer लाएंगे। अतिरिक्त 26% हिस्सेदारी
Speaker A
खरीदेंगे। लगभग ढाई हज़ार करोड़ रुपए का सौदा। Media reports के अनुसार Open Offer की कीमत रखी गई थी ₹235 प्रति share के आसपास। आसान भाषा में हम Religare की कमान अपने हाथ में लेना चाहते हैं। अब यहां एक सवाल उठता है। Burman जैसे परिवार
Speaker A
जो 70 brand और 80 हज़ार करोड़ के मालिक हैं, अचानक एक Finance company के पीछे क्यों पड़े?
Speaker A
इस सवाल पर वापस आते हैं। पहले लड़ाई खत्म कर लीजिए। रश्मि सालुजा ने विरोध किया। कहा उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया और SEBI से शिकायत की। कहा जाता है Insider Trading तक के आरोप लगाए। Burman पक्ष ने पलटवार किया। रश्मि सालुजा
Speaker A
पर सत्ता बचाने के इरादे और company के कामकाज में गड़बड़ी के आरोप। एजेंसियां आईं, FIR हुईं, notice निकले। अदालतों में तारीखें पड़ी। NCLT गया मामला Supreme Court तक भी। SEBI, दिल्ली की एक जिला अदालत, मुंबई में शिकायतें। एक ही जंग,
Speaker A
कई फोरम एक साथ। एक तरफ भारत का सबसे खामोश परिवार, दूसरी तरफ Religare की सबसे मुखर chairperson। रुकिए, यहां एक बात याद रखिए। यह दोनों तरफ के आरोप हैं। कोई भी अदालत में अंतिम तौर पर साबित नहीं हुआ है। कई मामलों में जांच अभी भी जारी है। लड़ाई महीने दर
Speaker A
महीने खिंचती गई। हर तिमाही में एक नई सुर्थी। कभी शेयरधारकों की बैठक, कभी अदालत का आदेश, कभी board की नई नियुक्ति। लगभग ढाई साल बीत गए। फिर आया February 2026। रुकिए, Religare की timeline थोड़ी और साफ कर देते हैं। September
Speaker A
2023 बर्मन ने open offer का ऐलान किया। December 2023 Religare board ने आपत्ति दर्ज करवाई। SEBI को शिकायत भेजी। पूरे 2024 में मामला अदालतों में झूलता रहा। कभी बर्मन के हक में, कभी Religare board के हक में। 2025 के आखिर में एक
Speaker A
बड़ी शेयरधारक बैठक। voting। नतीजा बर्मन के पक्ष में। February 2026 नए board ने अपनी पहली बैठक की । पुराने कार्यकारी चेहरे बाहर। एक ढाई साल पुरानी जंग का पहला बड़ा चरण खत्म। Religare की एक नए सिरे से हुई शेयरधारक
Speaker A
बैठक में बर्मन पक्ष के लिए फैसला हो गया। board का नियंत्रण उनके हाथ। रश्मि सलूजा को कार्यकारी भूमिका से हटा दिया गया। एक ढाई साल की जंग का एक चरण खत्म। हालांकि कुछ मुकदमे अभी भी चल रहे हैं। पर अब
Speaker A
आते हैं उस अनसुलझे सवाल पर। बर्मन ने Religare के पीछे इतनी लंबी लड़ाई क्यों लड़ी?
Speaker A
क्या यह सिर्फ एक company की बात थी? नहीं, इससे बड़ी बात थी। समझिए, बर्मन परिवार अब तक जो कुछ भी बेचता था, वो सब रोजमर्रा की चीजें थीं। साबुन, तेल juice दवा। एक ग्राहक की एक खरीद, कुछ रुपए। पर एक finance company का काम बिल्कुल अलग होता है। वहां ग्राहक एक
Speaker A
बार 10 लाख का insurance खरीदता है। 10 साल तक premium भरता है। वहां एक home loan 20 साल तक कमाता है। एक ग्राहक, एक फैसला, 10 साल की कमाई। और यह पहला ऐसा दांव भी नहीं था। बर्मन परिवार का Universal Sompo General Insurance में भी हिस्सा रहा है। Motor,
Speaker A
health, household cover यानी पिछले दो दशक से बर्मन धीरे धीरे insurance की दुनिया में अपने कदम बढ़ाते रहे। Aviva से लेकर Sompo तक। कहीं छोटी हिस्सेदारी, कहीं बड़ी। Religare वो अगली सीढ़ी थी और शायद सबसे ऊंची। यह पैसा कमाने का एक बहुत अलग रास्ता है। शीशी वाला नहीं
Speaker A
subscription वाला। Religare के जरिए बर्मन को यही रास्ता खुलना था। आमला तेल से insurance तक, च्यवनप्राश से health policy तक। पर इस दांव की कीमत भी थी 100 साल की चुप्पी। बर्मन को इसके लिए हर अखबार के पन्ने पर आना पड़ा।
Speaker A
हर TV channel की बहस में एक परिवार जो कभी कैमरे में नहीं देखता था, अचानक हर कैमरे के सामने था। क्या यह कीमत जायज थी?
Speaker A
यह इतिहास तय करेगा। पर इतना तय है बर्मन जब चुप रहते हैं तो पूरी तरह चुप रहते हैं और जब बोलते हैं तो पूरे दम खम से बोलते हैं। Religare की जीत के बाद कोई विजय जुलूस नहीं हुआ,
Speaker A
कोई press conference नहीं, कोई विज्ञापन नहीं। बस एक नई board meeting, नए नाम, नए कागज और परिवार वापस अपनी उसी चुप्पी में लौट गया। तो अब कहानी को समेटते हैं। Dabur India Limited share बाजार में listed। बाजार पूंजीकरण करीब 95,000 करोड़ रुपए।
Speaker A
पिछले साल की कमाई 13,000 करोड़ से ऊपर। Religare Enterprises नए board के साथ। मुकदमे कुछ लंबित पर कारोबार पटरी पर। Aviva Insurance में हिस्सेदारी। शराब के कारोबार में, real estate में, खेल में दर्जनों निवेश। अगर शुरू में जो सवाल था
Speaker A
इतनी बड़ी company, इतना बड़ा परिवार और इतनी गहरी चुप्पी क्यों? उसका जवाब बर्मन परिवार के दफ्तर में नहीं है। जवाब आपकी अपनी रसोई में है। रसोई का shelf खोलिए। च्यवनप्राश की शीशी, पास में honey, नीचे Hajmola, ऊपर Odonil,
Speaker A
बच्चे की bottle में real juice। आपने कभी इनके पीछे किसी परिवार का नाम खोजा?
Speaker A
कभी सोचा पिछले 10 साल में मैंने इन शीशियों पर कितना खर्च किया? शायद नहीं। क्योंकि सबसे बड़ी अमीरी वो होती है जो दिखे नहीं। एक बंगाली doctor जिसका नाम आज ज्यादातर लोग नहीं जानते, ने 1884 में जो दवा बनाई थी,
Speaker A
वो आज एक अरब से ज्यादा हिंदुस्तानी रसोईयों में है। और उस doctor की पांचवीं पीढ़ी आज देश की सबसे खामोश दौलत की मालिक है। एक शुक्रिया। इस channel पर membership शुरू हुई है। पहले दो member विनोद Kapoor11 और GT911 आप दोनों का दिल से शुक्रिया।
Speaker A
अगर आप भी जुड़ना चाहें subscribe के बगल में join button है तो एक आखिरी सवाल आपके लिए। क्या आप एक ऐसे परिवार को पसंद करते हैं जो चुप रहकर कमाता है या एक ऐसे जो हर मौके पर अखबार के पन्ने पर होता है?
Speaker A
Comment में लिखिए। अगले episode में एक ऐसा हिंदुस्तानी नाम जो भारत में नहीं अमेरिका में जमा। और एक ऐसा राज जो हर motel के counter पर छुपा है। अगर कहानी अच्छी लगी तो channel को subscribe करना मत भूलिए। ऐसी कई और छुपी हुई कहानियां आ रही हैं।
Topics:डाबरबर्मन परिवारआयुर्वेदच्यवनप्राशभारतीय ब्रांडकॉर्पोरेट लड़ाईपरिवार की कहानीहर्बल उत्पादब्रांडिंगभारत का व्यवसाय











