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Burkina Faso के Ibrahim Traore क्रांतिकारी नेता हैं या तानाशाह? Thomas Sankara

बुर्किना फासो के इब्राहिम त्रेरे और थॉमस संकारा की क्रांतिकारी और तानाशाही भूमिकाओं की कहानी। अफ्रीका के इतिहास और फ्रांस के प्रभाव का विश्लेषण।

Key Takeaways

  • इब्राहिम त्रेरे अफ्रीका के सबसे प्रभावशाली और विवादित नेताओं में से एक हैं।
  • थॉमस संकारा का क्रांतिकारी इतिहास बुर्किना फासो की पहचान बदलने में महत्वपूर्ण था।
  • फ्रांस का उपनिवेशवादी इतिहास अफ्रीका की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं की जड़ है।
  • अफ्रीका के देशों में राजनीतिक अस्थिरता और तख्ता पलट आम हैं, जो विकास में बाधक हैं।
  • इब्राहिम त्रेरे की सरकार ने आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं।

What the video covers

  • इब्राहिम त्रेरे बुर्किना फासो के युवा नेता हैं जिन्होंने तख्ता पलट के जरिए सत्ता हासिल की।
  • उनकी छवि तानाशाह और क्रांतिकारी दोनों के रूप में देखी जाती है, और उनकी तुलना थॉमस संकारा से की जाती है।
  • थॉमस संकारा बुर्किना फासो के सबसे करिश्माई नेता थे जिन्होंने फ्रांस की दादागिरी का विरोध किया।
  • अफ्रीका का इतिहास यूरोप और अमेरिका के उपनिवेशवाद और लूट के कारण जटिल रहा है।
  • बुर्किना फासो का पुराना नाम अपर वोल्टा था, जिसे 1983 में बदलकर बुर्किना फासो किया गया।
  • फ्रांस ने बुर्किना फासो और आसपास के क्षेत्रों को लंबे समय तक नियंत्रित किया और वहां के लोगों का शोषण किया।
  • अफ्रीका के अधिकांश देशों की तरह बुर्किना फासो में भी तख्ता पलट और राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा है।
  • बर्लिन कॉन्फ्रेंस (1884-85) में अफ्रीका का बंटवारा यूरोपीय शक्तियों ने बिना अफ्रीकी प्रतिनिधि के तय किया।
  • इब्राहिम त्रेरे ने अपनी सरकार के तहत माइनिंग सेक्टर को राष्ट्रीयकृत करने जैसे कदम उठाए हैं।
  • उनकी सरकार पर प्रेस फ्रीडम खत्म करने, विरोधियों को दबाने और गैर न्यायिक हत्याओं के आरोप भी लगे हैं।

Answers

Questions about this video

इब्राहिम त्रेरे कौन हैं और उनकी भूमिका क्या है?

इब्राहिम त्रेरे बुर्किना फासो के 36 वर्षीय राष्ट्रपति हैं जिन्होंने तख्ता पलट के जरिए सत्ता हासिल की। वे एक विवादित लेकिन लोकप्रिय नेता हैं जिनकी तुलना थॉमस संकारा से की जाती है।

थॉमस संकारा का बुर्किना फासो के इतिहास में क्या महत्व है?

थॉमस संकारा बुर्किना फासो के सबसे करिश्माई और क्रांतिकारी नेता थे जिन्होंने देश का नाम अपर वोल्टा से बदलकर बुर्किना फासो किया और फ्रांस की दादागिरी का विरोध किया।

बुर्किना फासो में राजनीतिक अस्थिरता के कारण क्या हैं?

बुर्किना फासो में भ्रष्टाचार, तख्ता पलट, हिंसा और विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप जैसे कारणों से राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है, जो लोकतंत्र और विकास में बाधा डालती है।

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00:00
Speaker A
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़ा यह शख्स कोई आम सैनिक नहीं है। इस शख्स ने अकेले यूरोप और अमेरिका की नींद उड़ा रखी है। उसके दुश्मनों की संख्या बढ़ती जा रही है, मगर उसको इससे कोई परहेज नहीं है।
00:14
Speaker A
[संगीत] इस शख्स का नाम है इब्राहिम त्रेरे। 36 साल का नौजवान राष्ट्रपति जो बुरकीना फासों में बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। ट्राउ ने तख्ता पलट के जरिए सत्ता हत्या की, जैसा कि तानाशाह किया करते हैं। लेकिन
00:37
Speaker A
तौरे ने समय के साथ अपनी अलग छवि बनाई और बहुत जल्द आम जनता के बीच पॉपुलर हो गए। उनकी गिनती अफ्रीका के सबसे ताकतवर और सबसे लोकप्रिय नेताओं में होने लगी है। उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी रीड की
00:53
Speaker A
हड्डी स्टील की है जो किसी के सामने झुकना नहीं जानता। इसीलिए ट्राउरी की तुलना थॉमस संकारा से होती है। संकारा बुर्कीना फासो के सबसे करिश्माई नेता थे। उन्होंने फ्रांस की दादागिरी का डटकर मुकाबला किया था। वे अपने मुल्क को आत्मनिर्भर बनाना
01:12
Speaker A
चाहते थे। इससे फ्रांस को अपनी पोजीशन खिसकती हुई नजर आई। वो संकारा से नाराज रहने लगा। इसी बीच संकारा का सैन्य तख्ता पलट हो गया और बड़ी बेरहमी से उनकी हत्या करवा दी गई। कई लोग यह मानते हैं कि उनकी
01:27
Speaker A
हत्या के पीछे फ्रांस था। लेकिन कभी इसकी सही से इंक्वायरी नहीं हो पाई। आशंका है कि त्रेरे का हश्र भी संकारा जैसा हो सकता है। उनको कई बार मारने की कोशिशें भी हो चुकी हैं। लेकिन त्रवरे कहते हैं मैं किसी
01:42
Speaker A
से नहीं डरता। मेरा लक्ष्य है मातृभूमि या मौत। नमस्कार मेरा नाम है दिव्याशी सुमराव और आज मैं आपको सुनाऊंगी बुरकीना फासो और इब्राहिम त्रवड़े की कहानी। हमने थोड़ी डिटेल्ड वीडियो बनाई है ताकि आपको पूरा कॉन्टेक्स्ट इसका समझ आए। तो सब्र बनाकर
02:02
Speaker A
रखिएगा। अफ्रीका 54 देशों से मिलकर बना हुआ है। एरिया और पापुलेशन में दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। प्रकृति ने उसको ज्योग्राफी, वाइल्ड लाइफ और नेचुरल रिसोर्सेज से दिल खोलकर नवाजा है। आर्ट, कल्चर और लिटरेचर में भी इसका कोई सानी
02:19
Speaker A
नहीं है। अफ्रीका को इंसानी सभ्यता की आधारशिला भी कहा जाता है। लेकिन आज के दौर में उसकी पहचान बिल्कुल बदल चुकी है। जब भी हम अफ्रीका का नाम सुनते हैं, हमारे दिलो दिमाग में गरीबी, अकाल, भुखमरी, पलायन की दर्दनाक तस्वीरें उभरने लगती
02:37
Speaker A
हैं। हमें एक ऐसी जमीन का ख्याल आता है जहां लॉ एंड ऑर्डर के लिए कोई जगह नहीं होगी और जहां आए दिन हत्या, सिविल वॉर और तख्ता पलट का दौर चलता होगा। इस कल्पना में सब कुछ गलत भी नहीं है। अफ्रीकी देशों
02:51
Speaker A
का इतिहास इसी तरह की कहानियों से भरा पड़ा है। लेकिन जैसे ही हम इतिहास में दाखिल होते हैं, हमें इसकी वजह समझ आने लगती है। कैसे यूरोप और अमेरिका ने अफ्रीका को सदियों तक लूटा। कैसे उन्होंने सभ्य बनाने के नाम पर देशों को गुलाम बना
03:08
Speaker A
लिया। कैसे लाखों लोगों की हत्या की और कैसे उनकी संस्कृति और उनकी पहचान को नष्ट कर दिया। यह सिलसिला आज भी जारी है। बस उसका स्वरूप बदल गया है। वेस्ट अफ्रीका में बसा बुरकीना फासो इसका क्लासिक उदाहरण है। बुरकीना फासो एक लैंड लॉक्ड कंट्री
03:27
Speaker A
है। इसका बॉर्डर छह देशों से लगा हुआ है। घाना, टोगो, वेनिन, नाइजर, माली और आइवरी कोस्ट। बुरकीना फासो दो शब्दों से मिलकर बना है। बुरकीना यानी कि ईमानदार और फासो यानी लैंड से। इसीलिए इसको ईमानदार लोगों की धरती भी कहा जाता है। लेकिन यह नाम
03:47
Speaker A
पहले कुछ और था। 1983 से पहले इस देश को अपर वोल्टा कहते थे। फिर एक क्रांतिकारी लीडर ने नाम के साथ-साथ मुल्क की पहचान बदल दी। उसके लीडर का नाम था थॉमस संकारा। उनको अफ्रीका का चे ग्वेरा कहते हैं।
04:01
Speaker A
संकारा का नाम आप याद रखिएगा। क्योंकि बुर्कीना फासो के इतिहास में उनका रोल बेहद निर्णायक था। उनके बाद बुरकीना फासो का इतिहास दो हिस्सों में बट गया। एक उनसे पहले का और दूसरा उनके बाद का। अभी पहले वाला इतिहास जान लेते हैं। जहां आज
04:19
Speaker A
बुरकीना फासो है वहां लगभग 14,000 साल पहले घुमंतू कबीलों का बसेरा था। उनका गुजारा शिकार करके होता था। आगे चलकर यह कबीलों का हिस्सा बने। उन्होंने खेती और धातु बनाने जैसे काम किए और समय के साथ आपस में व्यापार और गवर्नेंस का सिस्टम भी
04:36
Speaker A
बनाया। फिर 1000 ईसवी के आसपास मोसाई साम्राज्य का उदय हुआ। इनके पूर्वज घाना से आए थे। उन्होंने ओगाडूगो को अपना सेंटर बनाया। ओगाडूगो आज के समय में बुरकीना फासो की राजधानी है। मुसाई लोग वॉरियर कबीले थे। उनके पास ताकतवर सेना थी और
04:52
Speaker A
धनधान्य में उनका कोई सानी नहीं था। इसकी बदौलत उन्होंने बुरकीना फासों के बड़े हिस्से को कंट्रोल कर लिया। उनका अपना पॉलिटिकल सिस्टम था और उनके आस-पास के देशों के साथ डिप्लोमेटिक संबंध भी थे। सब कुछ ठीक चल रहा था। फिर 19वीं सदी आ गई और
05:10
Speaker A
यूरोप के देशों के बीच अफ्रीका को लूटने का कंपटीशन शुरू हुआ। इसको स्क्रैंबल ऑफ अफ्रीका कहते हैं। स्क्रैंबल का शाब्दिक अर्थ है छीना-झपटी। यानी जल्दबाजी में कोई चीज लेकर भागने की कोशिश करना। 19वीं सदी के आखिर में यूरोप के देश अफ्रीका
05:27
Speaker A
महाद्वीप यही कर रहे थे। यूं तो जब से एज ऑफ एक्सप्लोरेशन शुरू हुआ तभी से अफ्रीका यूरोपियंस की नजर में था। लेकिन शुरुआती दौर में उनका लालच गुलामों तक सीमित था। फिर 18वीं और 19वीं सदी में यूरोप और
05:41
Speaker A
अमेरिका में इसके खिलाफ आंदोलन हुए, जिसके चलते दास प्रथा पर रोक लगानी पड़ी। तब उन्होंने नए संसाधनों पर ध्यान लगाया। गुलामों की खरीद-बिक्री के लिए यूरोपियंस लोकल ट्रेडर्स पर ज्यादा निर्भर थे। उनका कंट्रोल तटीय इलाकों तक सीमित था। वे अंदर
05:58
Speaker A
की तरफ नहीं जाते थे। जो सौदा होता था वो समंदर के तट पर ही कर लिया करते थे। लेकिन गुलामों का व्यापार बंद हुआ तो वे अंदरूनी इलाकों में जाने लगे। वहां उनकी नजर साधन संपन्न साम्राज्यों पर पड़ी। उन्हें पता
06:12
Speaker A
चला कि असली खजाना तो अंदर छिपा हुआ है। वहां नेचुरल रिसोर्सेज की भरमार थी। यूरोपियंस को अपनी फैक्ट्रियों के लिए रॉ मटेरियल्स का सोर्स मिल चुका था। वे उस पर डायरेक्ट कंट्रोल चाहते थे। इसीलिए उन्होंने पूरी ताकत से अफ्रीका को लूटने
06:28
Speaker A
की कोशिश शुरू की। लेकिन लुटेरों की संख्या ज्यादा थी। यूरोप का हर एक ताकतवर देश ज्यादा से ज्यादा हिस्सा चाहता था। इसके चलते उनके इंटरेस्ट आपस में टकराने लगे और जंग की स्थिति बनने लगी। इससे बचने के लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला। साल था
06:45
Speaker A
1884, तारीख 15 नवंबर, जगह 77 विलियम स्ट्रीट, बर्लिन। जर्मनी के चांसलर ऑटो वॉन बिस्मार्क ने अपने घर पर एक कॉन्फ्रेंस बुलाई। इसमें 14 देशों के प्रतिनिधि पहुंचे। इसमें अमेरिका भी आया था, बाकी के 13 देश यूरोप के थे। यूरोप से बस
07:04
Speaker A
स्विट्जरलैंड नहीं पहुंचा था। इस कॉन्फ्रेंस में अफ्रीका का भविष्य तय किया जा रहा था। लेकिन अफ्रीका से एक भी प्रतिनिधि टेबल पर नहीं था। जब जंजीबार के सुल्तान ने बर्लिन जाने की इच्छा जताई, ब्रिटिशर्स ने उनका प्रस्ताव हंसी में
07:19
Speaker A
उड़ा दिया। बर्लिन कॉन्फ्रेंस 104 दिनों तक चला। 26 फरवरी 1885 को जब यह कॉन्फ्रेंस खत्म हुआ तब तक लगभग पूरा अफ्रीका बट चुका था। सिर्फ दो देश इससे बच पाए। इथियोपिया और लाइबेरिया। बाकियों का भविष्य पेंसिल की नोक से खींचा जा चुका
07:39
Speaker A
था। मर्डन कॉन्फ्रेंस से पहले अफ्रीका के 20% हिस्से पर यूरोपियन पावर्स का कंट्रोल था। महज 5 बरस बाद 90% इलाका उनके कंट्रोल में जा चुका था। इस बंटवारे में बुरकीना फासो का इलाका फ्रांस के हिस्से में आया। यहां से वोल्टा नदी निकलती है और नीचे की
07:57
Speaker A
तरफ बहती हुई घाना और दूसरे देशों में जाती है। लेकिन वहां तो मूसाई किंगडम का शासन था। वे फ्रांस की ओलामी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। तब फ्रांस ने उन पर हमला कर दिया और 1896 में उसने ओगाडूगो पर
08:13
Speaker A
कब्जा कर लिया। इसी के साथ मुसाई साम्राज्य का पतन हो गया और यह इलाका फ्रेंच वेस्ट अफ्रीका का हिस्सा बन गया। वेस्ट अफ्रीका में फ्रांस की कॉलोनी को फ्रेंच वेस्ट अफ्रीका का नाम दिया गया था। फ्रांस ने वोल्टा नदी के आधार पर इस इलाके
08:27
Speaker A
को अपर वोल्टा का नाम दिया। फिर 1932 में फ्रांस ने अपर वोल्टा को भंग कर दिया और उसकी जमीन को माली, नाइजर और आइवरी कोस्ट में बांट दिया। इस तरह अपर वोल्टा का अस्तित्व खत्म करने की कोशिश की गई। लेकिन
08:43
Speaker A
दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद स्थिति बदली। लड़ाई की शुरुआत में फ्रांस हार चुका था। फिर ब्रिटेन और अमेरिका ने मिलकर उसको बचाया। फ्रांस वर्ल्ड वॉर का विजेता तो बना, लेकिन उसकी हालत खराब हो चुकी थी। वह अपनी कॉलोनीज़ में मनमानी चलाने की हालत
08:59
Speaker A
में नहीं था। जब दबाव पड़ा तो 1947 में उसने अपर वोल्टा को फिर से स्थापित किया। अपर वोल्टा पर फ्रांस का शासन 1960 तक चला। इन 64 वर्षों में उसने अपर वोल्टा को बुरी तरह लूटा। लाखों लोगों से बेगार
09:15
Speaker A
करवाया गया। हजारों लोगों की हत्या हुई और उनकी संस्कृति और पहचान को मिटाने की कोशिश भी की गई। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद फ्रांस की पकड़ कमजोर होने लगी थी। 1950 के दशक में वहां आजादी के लिए आंदोलन शुरू
09:29
Speaker A
हुआ और तब 1958 में रिपब्लिक ऑफ अपर वोल्टा बनाया गया। फ्रांस ने उन्हें ऑटोनॉमी दी और रेफरेंडम के जरिए आजादी चुनने का अधिकार दिया। आखिरकार 5 अगस्त 1960 को अपर वोल्टा पूरी तरह आजाद हुआ और आजादी की लड़ाई के नेता रहे मॉरिस ये मोगो
09:47
Speaker A
पहले राष्ट्रपति बने। आजादी से शांति और स्थिरता आनी थी। लोकतंत्र आना था, लेकिन हुआ इसका एकदम उल्टा। अपर वोल्टा में भ्रष्टाचार, अराजकता, हिंसा और तख्ता पलट का सिलसिला शुरू हो गया। अपर वोल्टा, जिसे अब बुरकीना फासो कहते हैं, में अब तक आठ
10:03
Speaker A
तख्ता पलट हो चुके हैं। सिर्फ एक बार पावर का पीसफुल ट्रांसफर हुआ है। और यह हाल सिर्फ बुरकीना फासो का नहीं है। ज्यादातर अफ्रीकी देशों का इतिहास ऐसी
10:17
Speaker A
रिपोर्ट पब्लिश की थी। इसमें दुनिया भर में हुए सैन्य तख्ता पलट का ब्यौरा दर्ज था। अमेरिकी रिसर्चरर्स जनाथन पावेल और क्लेटन थाइन ने स्टडी करके डाटा निकाला था। इसके मुताबिक अफ्रीका के 54 में से 45 देशों में कभी ना कभी तख्ता पलट की कोशिश
10:35
Speaker A
जरूर हुई है। और दुनिया भर में जितने तख्ता पलट सफल हुए उनमें से लगभग आधे अफ्रीका के थे। उसमें भी वेस्ट अफ्रीका का इलाका ज्यादा सेंसिटिव रहा है। इसीलिए इसको क्रू बेल्ट भी कहते हैं। बुरर्गीना फासू भी इस बेल्ट का हिस्सा है। लेकिन ऐसा
10:50
Speaker A
हुआ क्यों? आजादी के बाद भी इन देशों में शांति और स्थिरता क्यों नहीं आ पाई? इसके तीन बड़े कारण थे। पहला कारण था स्क्रैंबल फॉर अफ्रीका। जब यूरोप के देशों ने अफ्रीका का बंटवारा किया। उन्हें लोकल पॉपुलेशन, कल्चर और ट्रेडिशन का बिल्कुल
11:06
Speaker A
भी इल्म नहीं था। वे अफ्रीका के बारे में ज्यादा जानते भी नहीं थे और ना ही उन्होंने किसी लोकल व्यक्ति को साथ में बिठाया था। मैप पर जो लकीरें खींची गई उनका फोकस यूरोपियन इंटरेस्ट पर था। इसके चलते एक ही समुदाय के लोग अलग-अलग देशों
11:22
Speaker A
में बंट गए। आज भी कई देशों में ऐसे एथनिक ग्रुप्स मिल जाएंगे जिनका एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों में रहता है। जो भी ग्रुप्स जहां कहीं भी माइनॉरिटी में रहे उन्हें दिक्कत होती रही। कॉलोनियल रूल के दौरान एक और चीज हुई। यूरोपियंस ने डिवाइड एंड
11:38
Speaker A
रोल वाला फार्मूला वहां भी लागू किया। उन्होंने एक समुदाय के लोगों को तरजीह दी। उन्हें लूट में हिस्सा दिया और उनके जरिए दूसरे ग्रुप्स को कंट्रोल में रखा। उन्हें बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया। जब आजादी मिली और कॉलोनियल रूल खत्म हुआ
11:53
Speaker A
तब उनका असंतोष खुलकर सामने आया। प्रवांडा का जनसंहार इसका एक बड़ा उदाहरण है। वहां दो मुख्य समुदाय हैं हुतू और तुत्सी। हुतु मेजॉरिटी में है जबकि तुत्सी अल्पसंख्यक हैं। रवांडा पर बेल्जियम और जर्मनी ने शासन किया था। वे तुत्सी लोगों को
12:09
Speaker A
सुपीरियर मानते थे। उन्होंने ज्यादातर सरकारी पदों पर उन्हीं को रखा जबकि हुतू लोगों का शोषण होता रहा। इसके चलते उनके अंदर गुस्सा भरता गया। जब रवांडा आजाद हुआ, लीडरशिप हुतू नेताओं के पास आ गई। तब उन्हें बदला लेने का मौका दिखा। उन्होंने
12:24
Speaker A
हुतू लोगों को हिंसा के लिए उकसाया और उनके बीच नफरत बढ़ाते रहे। इसका परिणाम 1994 के जनसंहार में दिखा। अब दूसरा कारण समझते हैं। डोमेस्टिक फैक्टर्स। अफ्रीकी देशों में शासकों का फोकस हमेशा अपने स्वार्थ पर रहा। एक बार कुर्सी मिली फिर
12:42
Speaker A
छोड़ना भूल गए। उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान बदला। चुनावों में धांधली करवाई और स्वतंत्र संस्थाओं पर ताला लगा दिया। वे अपने इर्द-गिर्द अपने वफादारों को बिठाते रहे और सत्ता की मलाई उन्हीं में बांटते रहे। इस तरह शीर्ष पर
12:57
Speaker A
बैठे कुछ लोग अमीर होते गए और आम जनता पिसती रही। इसके चलते डेमोक्रेटिक प्रोसेस में लोगों का भरोसा घटता गया। वे बदलाव के लिए किसी चमत्कार का इंतजार करने लगे। यह चमत्कार उन्हें मिलिट्री ने दिखाया क्योंकि उनके पास ताकत थी और इस ताकत से
13:14
Speaker A
सत्ता बदली जा सकती थी। इसीलिए जब-जब उन्होंने तख्ता पलट किया, लोग खुश हुए। तख्ता पलट के समर्थन में रैलियां निकाली लेकिन उनकी खुशी देर तक नहीं रुकी क्योंकि नया शासक कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हुआ। फिर लोग एक और चमत्कार का इंतजार करने
13:32
Speaker A
लगे। यह चक्र आज तक चल रहा है। अब तीसरे कारण पर आते हैं एक्सटर्नल फैक्टर्स। अफ्रीका के ज्यादातर देश 1950 और 1960 के दशक में आजाद हुए थे। तब यूरोपियन पावर्स को डायरेक्ट रूम छोड़ना पड़ा था। लेकिन उनका लालच नहीं छूटा था। इसको फ्रांस के
13:50
Speaker A
उदाहरण से समझते हैं। अफ्रीका में फ्रांस की 22 कॉलोनीज़ थी। उनकी आखिरी कॉलोनी जिबूती था। वो 1977 में आजाद हुआ। लेकिन फ्रांस ने इन देशों को कभी आत्मनिर्भर नहीं होने दिया। नेचुरल रिसोर्सेज से लेकर इकॉनमी और पॉलिटिक्स तक में उसका दखल बना
14:08
Speaker A
रहा। आज भी कम से कम 14 देशों की नेशनल करेंसी सीएफए फ्रैंक है। यह करेंसी फ्रांस छापता है और इसके जरिए इन देशों की इकॉनमी को कंट्रोल करता है। कई देशों में फ्रांस ने भ्रष्ट और तानाशाह शासकों का भी साथ
14:22
Speaker A
दिया। ऐसे शासक जो क्रूरता और दमन के लिए कुख्यात थे। लेकिन वे फ्रांस के हितेषी थे तो उनके अपराधों को नजरअंदाज कर दिया गया। इसके अलावा फ्रांस अपनी पुरानी अफ्रीकी कॉलोनीज़ में मिलिट्री भी बेचता रहा। कभी शांति के नाम पर तो कभी आतंकवाद के खत्मे
14:38
Speaker A
के नाम पर। लेकिन आरोप लगे कि फ्रांस का ध्यान कहीं और था। उसकी दिलचस्पी अपनी पॉलिटिकल और बिजनेस इंटरेस्ट में थी। फ्रांस के ऐसे इकोनॉमिक, मिलिट्री और पॉलिटिकल दखल के लिए एक टर्म का इजाद हुआ फ्रैंक अफ्रीक। यह नए दौर का उपनिवेशवाद
14:53
Speaker A
था। इसने फ्रांस को अपनी पुरानी कॉलोनीज़ को इनडायरेक्ट कंट्रोल करने का मौका दिया। अब बुरकीना फासू पर लौट चलते हैं। वहां भी यही खेल चल रहा था। बुर्कीनाफासों में पहला तख्ता पलट 1966 में हुआ। उसके बाद 1980 और 1982 में दो और तख्ता पलट हुए।
15:12
Speaker A
1982 वाली घटना में एक नौजवान अफसर ने अहम भूमिका निभाई थी। उसका नाम था कैप्टन थॉमस संकारा। जनवरी 1983 में उसको प्रधानमंत्री बना दिया गया। लेकिन राष्ट्रपति से उसकी बनी नहीं। तो राष्ट्रपति ने हाउस अरेस्ट करवा दिया। थॉमस संकारा का जन्म दिसंबर
15:29
Speaker A
1949 में हुआ था। तब बुरगिना फासो अपर बोल्टा के नाम से जाना जाता था और उस पर फ्रांस का कंट्रोल था। संकारा को अच्छी पढ़ाई का मौका मिला। उनके घर वालों ने उन्हें आर्मी में जाने के लिए कहा क्योंकि
15:41
Speaker A
वहां अच्छे भविष्य का भरोसा था। 1966 में जब पहला तख्ता पलट हो रहा था तभी संकारा ने मिलिट्री एकेडमी में दाखिला लिया। वहां से अफसर बनकर निकले और कई क्रॉस बॉर्डर मिलिट्री कैंपेन का हिस्सा भी बने। उन्हीं दिनों संकारा की दिलचस्पी दुनिया भर की
15:57
Speaker A
क्रांति में हुई। उन्होंने माओजदोंग, शेगवेरा, कार्ल मार्क्स और व्लादिमर लेनिन को पढ़ा। उनके विचारों से बेहद प्रभावित हुए। उन्हें समझ में आया कि मिलिट्री भी पॉलिटिकल बदलाव ला सकती है। फौज में रहते हुए उन्होंने कम्युनिस्ट ऑफिसर्स का एक
16:13
Speaker A
ग्रुप बनाया था। यह ग्रुप संारा के प्रति वफादार था। इसके लीडर थे ब्लेस कुमपोरे। संकारा उनको अपना छोटा भाई मानते थे। 4 अगस्त 1983 को जब संकारा हाउस अरेस्ट में बंद थे। कोमपोरे ने तत्कालीन राष्ट्रपति जिया बपिस्ता ओद्रागो को कुर्सी से हटा
16:29
Speaker A
दिया और संकारा को बाहर निकाल लाए। उसी रात संकारा ने नेशनल काउंसिल ऑफ द रिवोल्यूशन सीएनआर बनाने का ऐलान किया। वो सीएनआर के मुखिया बने कोमपुरे को नंबर टू की पोजीशन मिली। पावर मिलते ही संकारा ने अपर वोल्टा का नाम बदलकर बुरकीना फासो कर
16:45
Speaker A
दिया और मुल्क को नया झंडा और नेशनल एंथम दिया। यह कॉलोनियल पहचान मिटाने की कोशिश थी। संकारा ने और भी कई क्रांतिकारी फैसले लिए। उन्होंने राष्ट्रपति की सैलरी कम की। सरकारी अफसरों को कम वेतन पर काम करने के
16:58
Speaker A
लिए राजी किया और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान भी चलाया। उन्होंने अमीर जमींदारों से जमीन लेकर गरीब किसानों को दी। संकारा में दूरदराज के इलाकों में हॉस्पिटल और स्कूल्स बनवाए। इससे शिक्षा का दायरा बढ़ाने में मदद मिली। 1983 में बुरकीना
17:14
Speaker A
पासो की साक्षरता दर 13% थी। 4 बरस बाद यह 73% पर पहुंच चुकी थी। संकारा ने महिलाओं के खत्म और बहु विवाह जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाई। उन्होंने महिलाओं को सरकार में शामिल किया। संकारा अनाज के मामले में
17:31
Speaker A
किसी और पर निर्भर नहीं रहना चाहते थे। उन्होंने विदेशी मदद लेने से इंकार कर दिया। वह कहते थे जो तुम्हें खाना खिलाएगा वह तुम्हें कंट्रोल भी करना चाहेगा। इसी दौर में उन पर मानव अधिकार उल्लंघन और विरोध कुचलने के आरोप भी लगे। लेकिन दूसरे
17:44
Speaker A
अफ्रीकी नेताओं की तुलना में संगारा कहीं ज्यादा लिबरल और मॉडर्न थे। उन पर लगे आरोपों को बढ़ा चढ़ाकर इसलिए भी दिखाया गया क्योंकि यह पश्चिमी देशों और संस्थाओं का दखल पसंद नहीं करते थे। थॉमस संकारा ने अफ्रीकी देशों से एकजुट होकर इसका मुकाबला
18:00
Speaker A
करने की अपील की। वो कहा करते थे साम्राज्यवाद में शोषण सिर्फ हिंसा से नहीं होता। यह कई दूसरे रूपों में भी आता है। जैसे कर्ज, मदद, ब्लैकमेल आदि। हमारी लड़ाई उस सिस्टम के खिलाफ है जिसमें कुछ चंद लोग पूरी दुनिया पर शासन करना चाहते
18:17
Speaker A
हैं। थॉमस संगारा हर वक्त मिलिट्री ड्रेस में रहते थे। लाल टोपी उनकी पहचान थी। उनके दौर में बुरकीना फांसू तरक्की और नव उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष की मिसाल बन गया था। लेकिन यह कारवा बहुत जल्द थम गया। संकारा के फैसलों ने अफ्रीका से लेकर
18:33
Speaker A
यूरोप पर अमेरिका में कई लोगों की नींद उड़ा दी थी। अफ्रीकी नेताओं को अपनी कुर्सी पर खतरा महसूस हो रहा था। जबकि फ्रांस को लूट में कमी का डर सता रहा था और अमेरिका को कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी फैलने की आशंका थी। लेकिन यह होता उससे
18:48
Speaker A
पहले 15 अक्टूबर 1987 की तारीख आ गई। उस दिन संकारा एक मीटिंग में हिस्सा लेने पहुंचे। तभी हत्यारों ने उनके शरीर में 12 बुलेट्स दाग दी। संकारा की मौके पर ही मौत हो गई। उस रोज 12 और लोगों को मारा गया
19:02
Speaker A
था। संकारा की बॉडी को तुरंत अनजान जगह पर दफना दिया गया। उनकी बॉडी का परीक्षण करने वाले डॉक्टर्स ने रिपोर्ट में लिखा डाइड बाय नेचुरल कॉज। इसी के साथ बुर्कीनाफासों के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी चैप्टर बंद हो चुका था और इसका मास्टरमाइंड था ब्लेस
19:22
Speaker A
कुमपोरे। जी हां, वही कुमपोरे जिसने 1983 में संकारा को कुर्सी हासिल करने में मदद की थी। लेकिन 4 वर्ष बाद उसने अपने नेता का तख्ता पलट कर दिया और खुद राष्ट्रपति बन गया। कोमपोरे ने एक-एक कर संकारा की
19:37
Speaker A
पॉलिसीज को पलटना शुरू किया। उसने नेशनलाइज्ड कंपनियों को फिर से प्राइवेट कर दिया और वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से कर्ज लेना शुरू किया। कुमपोरे ने फ्रांस और अमेरिका के साथ भी दोस्ती कर ली। फ्रांस ने कुंभोरे को सिर पर बिठाकर रखा। इसके
19:50
Speaker A
अलावा जिस कमांडर ने संकारा की हत्या की थी, उसको फ्रांस ने अपना सर्वोच्च अवार्ड देकर सम्मानित किया। फ्रांस ने संकारा की हत्या में अपनी भूमिका कभी स्वीकार नहीं की लेकिन संदेह हमेशा बना रहा क्योंकि संकारा की मौत का सबसे ज्यादा फायदा उसी
20:06
Speaker A
को मिला था। खैर ब्लेस कोपोरे ने 27 बरस तक शासन चलाया। उसके कार्यकाल में बेहिसब भ्रष्टाचार और दमन चलता रहा। लेकिन वेस्टर्न कंट्रीज आंख मूंद कर उसको सपोर्ट करती रही। फिर 2014 में ब्लेस कुमपोरे के खिलाफ जबरदस्त प्रोटेस्ट हुआ और तब
20:25
Speaker A
कुमपोरे देश छोड़कर भाग गया। इसके बाद नई सरकार ने संकारा हत्याकांड की जांच का आदेश दिया। तब उनकी बॉडी को कब्र से निकाला गया। उसका डीएनए टेस्ट हुआ और फिर से उनको दफनाया गया। 2021 में संकारा की हत्या में शामिल 14 लोगों पर मुकदमा शुरू
20:39
Speaker A
हुआ। 2022 में केस का फैसला आया। तीन लोग सबूत के अभाव में छोड़ दिए गए। आठ लोगों को 3 से 20 बरस तक की सजा मिली। मेन मास्टरमाइंड ब्लेस कुमपोरे और उसके दो साथियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई।
20:52
Speaker A
लेकिन कुमपोरे की सजा का पालन नहीं हो सका। वो 2014 से आइवरी कोस्ट में रह रहा है। उसको वहां की नागरिकता भी मिल गई है और उसका बुरकीना पासो लौटने का कोई इरादा नहीं है। भले ही कुछ लोगों ने थॉमस संारा
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Speaker A
को मिटाने की कोशिश की हो लेकिन उनकी लेगसी आज भी जिंदा है। अफ्रीका के कई देशों में लोगों ने अपना रोल मॉडल मानते हैं। साउथ अफ्रीका के चुनाव में संकारा को अक्सर याद किया जाता है और बुर्कीनाफासों में तो उन्हीं जैसा एक शख्स सरकार चला रहा
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Speaker A
है जिसका नाम है इब्राहिम त्रेरे त्रेरे ने अपने सामने संकारा को नहीं देखा। उनकी पैदाइश 1988 की है। तब तक संकारा जा चुके थे लेकिन उनकी झलक जरूर मिलती है। ट्राउ कहते भी हैं जो काम थॉमस संारा ने शुरू
21:39
Speaker A
किया था उसको अंजाम तक मैं पहुंचाऊंगा। तो क्या है इब्राहिम ट्राउडे की कहानी? जब तक बुर्कीना फासों में सितंबर 2022 का सैन्य तख्ता पलट नहीं हुआ था। इब्राहिम ट्राउडे को बहुत कम लोग जानते थे। वह फौज में लोअर
21:51
Speaker A
रैंक के अफसर थे। उनकी उम्र महज 34 साल थी। लेकिन 2022 में हुए दूसरे सैन्य तख्ता पलट ने उनको सीधे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा दिया। इब्राहिम ट्रावरे ने 2009 में आर्मी ज्वाइन की थी। उनकी ट्रेनिंग मोरक्को में हुई और उन्होंने माली और
22:09
Speaker A
बुरकीना फासो में जिहादियों के खिलाफ ऑपरेशंस में हिस्सा लिया था। लेकिन वे कभी बड़ी लीडरशिप रोल में नहीं रहे थे। शुरुआती दिनों में ट्राउरी ने दो बड़े वादे किए। पहला दो से 3 महीनों के अंदर आतंकवाद खत्म कर दूंगा और दूसरा मैं
22:23
Speaker A
ज्यादा दिन पावर में नहीं रहूंगा। जुलाई 2024 तक कुर्सी फुल टाइम सरकार को ट्रांसफर कर दी जाएगी। इन वादों को 32 महीने हो चुके हैं, लेकिन इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं हुआ है। बुरकीना फासों में आतंकवाद की समस्या अभी भी बरकरार है और
22:38
Speaker A
ट्ररे मिलिट्री रूल को 2029 तक एक्सटेंड कर चुके हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि चुनाव कराना उनकी प्राथमिकता नहीं है। उनकी सरकार पर प्रेस फ्रीडम खत्म करने, विरोधियों को दबाने और गैर न्यायिक हत्याओं के आरोप भी लगते रहते हैं। इन
22:53
Speaker A
सबके बावजूद इब्राहिम त्रवड़े की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। वो सिर्फ बुरकीना पासो नहीं बल्कि पूरे अफ्रीका के सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके हैं। लेकिन कैसे? इसको तीन पॉइंट्स में समझते हैं। नंबर वन त्राउ ने सत्ता में आते ही फ्रांस
23:09
Speaker A
से रिश्ता तोड़ लिया। उन्होंने फ्रांसीसी सैनिकों और डिप्लोमेट्स को बाहर निकाल दिया। फ्रेंच सैनिक 2013 से जिहादी गुटों के खिलाफ जंग लड़ रहे थे। लेकिन कहा जा रहा था कि उनका फोकस जिहादियों से ज्यादा अपने बिजनेस और पॉलिटिकल इंटरेस्ट पर है।
23:24
Speaker A
जैसा कि हमने पहले भी बताया मुर्गीना फासों पर फ्रांस ने 64 वर्षों तक डायरेक्ट रूल किया और अगले छह दशकों तक इनडायरेक्टली कंट्रोल करते रहे। इसके चलते आम जनता फ्रांस से नाराज थी। जिसे भी फ्रांस की लूट का अंदाजा है वो उनको
23:39
Speaker A
विदेशी आक्रांता की तरह देखता है। जब त्रेरे ने उनको बाहर निकाला तो उसको बुरकीना फासों में नई आजादी की तरह सेलिब्रेट किया गया। अब चलते हैं सेकंड पॉइंट पर। इब्राहिम त्राउ ने अपनी पर्सनालिटी थॉमस संतारा के इर्द-गिर्द बुनी है। ड्रेस और भाषणों से लेकर उनके
23:58
Speaker A
डिसीजंस तक में संतारा की झलक मिलती है। उन्होंने प्रेसिडेंट की सैलरी लेने से मना कर दिया। वे भी मिलिट्री कैप्टन वाला वेतन ही लेते हैं। फ्लाऊरी ने सरकारी अधिकारियों का बढ़ा हुआ वेतन भी घटा दिया। बुरकीना फासो में गोल्ड का बड़ा भंडार है।
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Speaker A
अफ्रीका में गोल्ड एक्सपोर्ट करने के मामले में चौथे नंबर पर है। 2022 तक बुरकीना फासो की गोल्ड माइंस पर फ्रांस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया की कंपनियों का एक अधिकार था। त्रेरे सरकार एक-एक कर उनका लाइसेंस रद्द कर रही है। उन्होंने गोल्ड
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Speaker A
माइंस को नेशनलाइज करना शुरू कर दिया है और नए लाइसेंस नई शर्तों पर एलोकेट कर रहे हैं। जो भी विदेशी कंपनियां बुरकीना फासो में माइनिंग के लिए लाइसेंस लेंगी उन्हें 15% हिस्सेदारी बुरकीना फासो की सरकारी कंपनी को देनी होंगी। साथ ही साथ उन्हें
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Speaker A
लोकल पॉपुलेशन को ट्रेन भी करना होगा। इसके अलावा सरकार बुरकीना फासू में गोल्ड रिफाइनरी और गोल्ड रिजर्व बना रही है। यह मुल्क के इतिहास में पहली बार हो रहा है। त्रावरे का कहना है कि रिसोर्सेज पर पहला हक आम लोगों का होना चाहिए। जिस देश में
24:59
Speaker A
लगभग आधी आबादी गरीब और बेरोजगार है और जहां ज्यादातर शासकों ने लोगों को लूटा है वहां त्रुरे हक देने की बात कर रहे हैं। संकारा के बाद पहली बार कोई नेता उन्हें ऐसा सपना दिखा रहा है। इसीलिए वे उनका
25:15
Speaker A
समर्थन कर रहे हैं। अब थर्ड पॉइंट समझते हैं। इब्राहिम ट्रावरे की उम्र 37 साल है। वे अफ्रीका के किसी भी देश के सबसे कम उम्र के राष्ट्रपति हैं। अफ्रीका में शीर्ष नेताओं की औसत उम्र 63 बरस है। कई
25:28
Speaker A
नेता तो ऐसे हैं जो ठीक से चल फिर भी नहीं पाते लेकिन किसी ना किसी विधि से कुर्सी में चिपके हुए हैं। उनकी तुलना में तौरे यंग हैं, एनर्जेटिक हैं और नौजवान पीढ़ी को आकर्षित करते हैं। वे ऐसी बातें कहते
25:41
Speaker A
हैं जो उनके समर्थकों को गर्व करने का मौका देती हैं। जैसे 2023 में रशिया अफ्रीका समिट के दौरान ट्राउ ने अफ्रीकी नेताओं को टारगेट कर कहा था दूसरों के इशारों पर नाचना बंद कीजिए। तब उनका इशारा अफ्रीका में वेस्टर्न कंट्रीज के दखल की
25:55
Speaker A
तरफ था। प्राउड फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रोन से भी पंगा लेते रहते हैं। जनवरी 2025 में मैक्रोन ने कहा था कि अफ्रीकी नेताओं को फ्रांस को शुक्रिया कहना चाहिए क्योंकि हमने आतंकवाद से लड़ने में उनकी मदद की। इस पर ट्राउ का जवाब था
26:10
Speaker A
अगर कोई एहसान फरामोश है तो वह फ्रांस है। फ्रांस का अस्तित्व हमारे पूर्वजों की वजह से बचा है। उन्हें हमें धन्यवाद देना चाहिए। मुर्गीना फासो में मीडियन एज 18 बरस के आसपास यानी आबादी का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है। वहां
26:25
Speaker A
त्रेरे की लार्जर दिन लाइफ छवि है और बनाई भी गई है। उनके भाषणों की उनकी ट्रेनिंग की, उनके काफिले की क्लिप सिस्टमैटिक ढंग से फैलाई गई हैं। कई बार तो क्लिप्स फेक भी होते हैं। मगर इसने त्रवरे का एक कल्ट
26:40
Speaker A
गढ़ा है और आम लोग इससे कनेक्ट कर रहे हैं। इसने त्रवरे को अपने मुल्क में अभिजीत बना दिया है। इन सबके बावजूद कुछ तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है। इब्राहिम त्राऊरे ने तख्ता पलट से सत्ता हत्या थी। बुर्कीना फासों में तख्ता पलट
26:54
Speaker A
करने वालों का अंत एक और तख्ता पलट से ही हुआ है। क्या तौरे अववाद होंगे? दावे से नहीं कहा जा सकता। तौरे ने वेस्टर्न कंट्रीज को बुर्कीना फासों से दूर किया। लेकिन वे रूस और चीन को दावत दे रहे हैं।
27:06
Speaker A
वे प्राइवेट मिलिट्री ग्रुप्स को भी बुला रहे हैं। यह भी तो नव उपनिवेशवाद ही है। आखिरी बात इब्राहिम ट्रावरे जनता के वोट से सत्ता में नहीं आए हैं जो कि किसी भी डेमोक्रेसी के लिए एक अनिवार्य शर्त होती
27:18
Speaker A
है और ट्राउ का डेमोक्रेटिक प्रोसेस में कोई इंटरेस्ट नहीं है। उन्होंने अपना कार्यकाल 2029 तक बढ़ा लिया है। इसके बाद भी वह कुर्सी लोकतांत्रिक सरकार को दे देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। और ऐसा कई देशों में हुआ है। क्रांति का दावा करने
27:33
Speaker A
वाले लीडर कुर्सी पाते ही तानाशाह हो जाया करते हैं। लीबिया का मोमार गद्दाफी या इजिप्ट के हुस्ने मुबारक या चीन का माओ ज़दोंग इसके कुछ बड़े उदाहरण हैं। आपको क्या लगता है? इब्राहिम चावरे क्रांतिकारी नेता है या तानाशाह हमें कमेंट कर बताएं।
27:48
Speaker A
अगर वीडियो पसंद आया तो इसको लाइक और शेयर करते रहिए और हमारे चैनल को सब्सक्राइब भी कर लीजिए। यह तमाम जानकारी आपके लिए इकट्ठा की थी। अभिषेक कुमार ने। नए वीडियो में नई कहानी के साथ मैं एक बार फिर आपसे
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Speaker A
मिलूंगी। तब तक के लिए विदा लेती हूं। बहुत-बहुत शुक्रिया। [संगीत]
Topics:इब्राहिम त्रेरेथॉमस संकाराबुर्किना फासोअफ्रीका इतिहासतख्ता पलटफ्रांस उपनिवेशवादराजनीतिक अस्थिरताबर्लिन कॉन्फ्रेंसराष्ट्रीयकरणप्रेस फ्रीडम

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