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From Refugee to ₹500 Crore Matka King — Ratan Khatri's Rise & Fall Story

रतन खत्री की कहानी, एक रेफ्यूजी से ₹500 करोड़ के मटका किंग तक का सफर, जिसमें सफलता, धोखा और इमरजेंसी का सस्पेंस है।

Key Takeaways

  • सरल और पारदर्शी सिस्टम से लोगों का भरोसा जीतना सफलता की कुंजी है।
  • व्यापार में ईमानदारी और समय पर भुगतान से लोकप्रियता बढ़ती है।
  • सट्टा और मटका जैसे अवैध व्यवसाय भी बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक प्रभाव डालते हैं।
  • राजनीतिक और पुलिस दबाव व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं।
  • सही समय पर व्यवसाय छोड़ना और नैतिकता बनाए रखना लंबे समय तक सफलता का आधार है।

What the video covers

  • रतन खत्री का जन्म 1932 में कराची में हुआ और 1947 में वह परिवार के साथ बॉम्बे आकर एक रेफ्यूजी बन गया।
  • 1950 के दशक में रतन ने मटका गेम को सरल और पारदर्शी बनाकर मुंबई में लोकप्रिय बनाया।
  • 1962 में रतन ने मटका के लिए एक नया सिस्टम बनाया जिसमें ताश के पत्तों का उपयोग हुआ और इसे सार्वजनिक रूप से खेला गया।
  • रतन ने भरोसा जीतने के लिए मटका के नंबर सार्वजनिक रूप से निकाले और जीत के पैसे समय पर दिए।
  • 1970 के दशक तक रतन का मटका ₹1 करोड़ रोजाना का टर्नओवर करने लगा, जो आज के हिसाब से 40-45 करोड़ के बराबर था।
  • रतन का मटका सिर्फ छोटे लोग ही नहीं, बल्कि बड़े बिजनेसमैन, पॉलिटिशियन और बॉलीवुड स्टार्स के बीच भी लोकप्रिय था।
  • 1975 की इमरजेंसी के दौरान मटका इंडस्ट्री पर पुलिस और सरकार की सख्ती बढ़ी, जिससे रतन को जेल भी जाना पड़ा।
  • 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद रतन ने मटका फिर से शुरू किया लेकिन पुलिस की निगरानी कड़ी हो गई।
  • 1993 में रतन खत्री ने मटका बिजनेस से संन्यास ले लिया और अपनी बाकी जिंदगी शांति से बिताई।
  • रतन की कहानी में सफलता, धोखा, सस्पेंस और नैतिकता की लड़ाई शामिल है, जिसने मुंबई की सट्टा दुनिया को बदला।

Answers

Questions about this video

रतन खत्री ने मटका गेम कैसे शुरू किया?

रतन खत्री ने 1962 में ताश के पत्तों का उपयोग करके एक सरल और पारदर्शी मटका गेम बनाया, जिसमें नंबर मिट्टी के मटके से निकाले जाते थे और यह सब सार्वजनिक रूप से होता था।

रतन खत्री मटका इंडस्ट्री में क्यों प्रसिद्ध हुए?

उनकी ईमानदारी, पारदर्शिता और समय पर भुगतान के कारण, साथ ही उन्होंने मटका को छोटे और बड़े सभी लोगों के लिए आसान बनाया, जिससे वे मुंबई के सबसे पावरफुल मटका किंग बने।

रतन खत्री ने मटका व्यवसाय क्यों छोड़ा?

1975 की इमरजेंसी के दौरान पुलिस और सरकार की सख्ती के कारण रतन को जेल जाना पड़ा, और 1993 में उन्होंने मटका व्यवसाय से संन्यास ले लिया ताकि अपनी नैतिकता और शांति बनाए रख सकें।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

00:00
Speaker A
मुंबई, 1970 के दशक, परेल की एक कॉटन मिल के बाहर रात के 9:00 बज रहे हैं। मजदूर शिफ्ट खत्म करके निकले हैं। हाथ में टिफिन बॉक्स, जेब में दिन की मजदूरी। लेकिन घर जाने से पहले वो रुक जाते हैं। एक छोटी सी
00:15
Speaker A
रेडियो पे अनाउंसमेंट होती है। एक नंबर। कोई चीख मारता है। मेरा नंबर आ गया। कोई चुप हो जाता है। और यह सीन, यह एक सीन रोज रिपीट होता था। हर दिन लाखों लोगों के साथ। सोचिए, एक आदमी का गेम इतना पावरफुल
00:31
Speaker A
था कि मुंबई की पूरी शिफ्ट टाइमिंग उसके हिसाब से चलती थी। मजदूर, टैक्सी ड्राइवर, दुकानदार सब एक ही इंसान के बनाए हुए खेल में फंसे हुए थे और वो इंसान, उसके पास ना फैक्ट्री थी, ना ऑफिस, ना प्रोडक्ट। बस एक
00:46
Speaker A
मटका, कुछ ताश के पत्ते और एक ऐसी ऑनेस्टी जो उस वक्त के मुंबई में रेयर थी। लेकिन सवाल यह है, जो आदमी इतने लोगों की उम्मीद और पैसा संभाल रहा था, वो खुद कहां से आया था? 1947 में कराची से भागा एक रेफ्यूजी
01:02
Speaker A
लड़का जिसके पास कुछ नहीं था। वो बॉम्बे का सबसे पावरफुल नाम कैसे बना और जब वो अपने पीक पे था, जब ₹1 करोड़ रोज घूम रहा था, तब उसने खुद ही यह सब छोड़ क्यों लिया?
01:14
Speaker A
यह कहानी है रतन खत्री की, द रियल मटका की, जिसमें सस्पेंस है, धोखा है, इमरजेंसी है और एक ऐसा आदमी जिसे पुलिस पकड़ नहीं पाई, जिसे पॉलिटिशियंस झुका नहीं पाए, जिसे सिर्फ उसकी अपनी जमीर ने रोका। चलिए शुरू
01:31
Speaker A
करते हैं। इस कहानी की शुरुआत होती है 1932 से। पाकिस्तान के कराची से एक सिंधी हिंदू फैमिली में एक लड़का पैदा होता है। नाम था रतन खत्री। तब पाकिस्तान नहीं बना था। सब एक ही देश था। रतन बिल्कुल नॉर्मल
01:46
Speaker A
फैमिली से था। ना ज्यादा अमीर, ना बिल्कुल गरीब। लेकिन 1947 में सब बदल गया। जब इंडिया पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब रतन सिर्फ 15 साल का था। [संगीत] कोई ट्रेन में, कोई ट्रक में, और कोई पैर पर चलके
02:00
Speaker A
लाखों लोग अपना घर छोड़कर भाग रहे थे। रतन की फैमिली भी आ गई बॉम्बे। सोचिए, एक दिन तुम्हारा अपना घर था। अगली सुबह तुम रिफ्यूजी बन गए। कुछ नहीं बचा। बस जान बचा के भागे हो। बॉम्बे उस वक्त रेफ्यूजीस से
02:15
Speaker A
भरा हुआ था। हर कोई अपनी जिंदगी फिर से शुरू कर रहा था। रतन ने भी छोटे-मोटे काम करना शुरू किए। कभी यहां काम, कभी वहां। कोई फिक्स्ड जॉब नहीं। जो मिल जाए वो कर लो। 1950 का बॉम्बे। कॉटन मिल्स चल रही
02:30
Speaker A
थी। टेक्सटाइल का बहुत बड़ा कारोबार था। कलबा देवी, जवेरी बाजार। यहां हर वक्त भीड़ रहती थी। ट्रेडर्स, ब्रोकर्स, मजदूर सबका आना-जाना लगा रहता था। रतन भी इन मार्केट एरियाज में काम करने लगा और यहां उसने एक चीज देखी जो उसकी जिंदगी बदल दी। लोग कॉटन
02:48
Speaker A
के प्राइस पर बैटिंग करते थे। मतलब समझो, ऐसे न्यूयॉर्क में कॉटन की जो भी प्राइस ओपन और क्लोज होती थी, उस पर लोग मुंबई में सट्टा लगाते थे। रतन ने देखा कि लोग बहुत पैसा लगा रहे हैं। लेकिन यह गेम सिर्फ
03:02
Speaker A
ट्रेडर्स और बड़े लोग खेलते थे। बहुत कॉम्प्लिकेटेड था। फिर रतन को एक काम मिला कल्याण जी भगत के साथ। कल्याण जी भगत कौन था? वह भी गुजरात से आया हुआ एक आदमी था। वरली में रहता था। कल्याण जी ने पहली बार
03:16
Speaker A
मुंबई में मटका गैंबलिंग शुरू की थी। रतन उसका मैनेजर बन गया। छोटे-छोटे बेट पे ₹10, ₹20, कभी ₹50। रतन खुद भी ट्राई करता था और धीरे-धीरे वह समझने लगा कि यह धंधा कैसे चलता है। उसने देखा कि लोग इसमें
03:33
Speaker A
इंटरेस्ट लेते हैं। लेकिन उसके दिमाग में एक और बात आ रही थी। वह सोच रहा था, अगर मैं यह और आसान बनाऊं तो क्या होगा? अगर हर कोई खेल सके, सिर्फ बड़े लोग नहीं, तो कितना पैसा बनेगा? रतन को नहीं पता था कि
03:46
Speaker A
यह सोच उसे इंडिया का सबसे बड़ा गैंबलिंग किंग बना देगी। 1961। न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज ने एक अनाउंसमेंट किया। अब वो बॉम्बे को कॉटन के प्राइसेस नहीं भेजेंगे। बस, खत्म। यह एक बड़ा झटका था क्योंकि बॉम्बे में जो लोग बैटिंग करते
04:04
Speaker A
थे, वह कॉटन प्राइसेस पर डिपेंड करते थे। सडनली उनका पूरा गेम बंद हो गया। हर कोई परेशान था। लेकिन रतन खत्री के चेहरे पर मुस्कान थी। उसने सोचा, अगर पुरानी चीज खत्म हो गई तो मैं नई चीज शुरू कर सकता
04:18
Speaker A
हूं। रतन ने डिसाइड किया वो अपना खुद का सिस्टम बनाएगा और वो सिस्टम इतना सिंपल होगा कि कोई भी खेल सके। तो उसने क्या किया? समझो बिल्कुल आसान भाषा में। रतन ने ताश के पत्तों का एक गेम बनाया। पहले उसने
04:33
Speaker A
जैक, क्वीन, किंग निकाल दिए। सिर्फ नंबर वाले पत्ते रखे। एक से 10 तक। फिर यह पत्ते एक मिट्टी के मटके में डाल दिए। हर रोज दो बार, शाम 9:00 बजे और रात 12:00 बजे। कोई भी आदमी मटके से तीन पत्ते
04:47
Speaker A
निकालेगा। जो नंबर आएगा, वही विनिंग नंबर होगा। मतलब अगर तुमने ₹1 लगाया और तुम्हारा नंबर आ गया तो तुम्हें ₹9 मिलेंगे। इतना सिंपल, इतना साफ और सबसे बड़ी बात यह सब लोगों के सामने होगा। कोई चीटिंग नहीं। लेकिन रतन को एक प्रॉब्लम
05:05
Speaker A
थी। लोग उसकी बात क्यों मानेंगे? भरोसा कैसे करेंगे? तो उसने एक ब्रिलियंट मूव किया। 1962 की एक सुबह रतन खत्री मुंबई पुलिस कमिश्नर के ऑफिस के बाहर पहुंचा। वहां क्राइम बीट के रिपोर्टर्स थे। रतन ने उन्हें देखा और कहा, "साहब लोग, आज एक बड़ी
05:23
Speaker A
खबर के लिए चलोगे मेरे साथ?" रिपोर्टर्स थोड़ा कंफ्यूज हुए। यह कौन है? लेकिन फ्री स्टोरी का लालच था तो चले गए। रतन पहले उन्हें एक छोटे से होटल में ले गया। सबको ब्रेकफास्ट करवाया। फिर जावेरी बाजार की एक दुकान के पास ले गया। वहां एक टेबल पर
05:39
Speaker A
एक मटका रखा था। ताश के पत्ते थे। रतन ने जैक, क्वीन, किंग निकाले। बाकी पत्ते मटके में डाल दिए। फिर रिपोर्टर्स से बोला, "आप तीन लोग एक-एक पत्ता निकालो।" तीन रिपोर्टर्स ने तीन पत्ते निकाले। रतन ने उन नंबर्स को देखा और अनाउंस किया। उसने
05:56
Speaker A
कहा, जुए के इस नए सिलसिले का नाम मटका होगा। उसी दिन से शुरू हुआ रतन मटका और वो रिपोर्टर्स उन्होंने यह पूरी कहानी अपने न्यूज़ पेपर्स में छाप दी। मुंबई भर में बात फैल गई। रतन को पता था लोगों को खेल
06:11
Speaker A
नहीं, भरोसा चाहिए और भरोसा तब आता है जब सब कुछ खुले में हो। अब शुरू हुआ असली खेल। रतन ने अपना मटका धंजी स्ट्रीट, मुंबई देवी में शुरू किया। पहले दिन छोटे-छोटे लोग आए। कुछ लोगों ने 25 पैसे लगाए। हां,
06:26
Speaker A
सिर्फ 25 पैसे। उस जमाने में 25 पैसे भी किसी के लिए बहुत होता था और अगर वह जीत गया तो उसे ₹2.25 पैसे मिलते थे। यह रेशियो बहुत अच्छा था। लेकिन रतन का असली कमाल था उसकी ऑनेस्टी। हर रोज शाम 9:00
06:41
Speaker A
बजे और रात 12:00 बजे बिल्कुल टाइम पर पत्ते निकाले जाते थे। और वह भी पब्लिक में, कभी किसी ईरानी कैफे में, कभी किसी दुकान के बाहर, कभी सड़क के कोने पर। रतन किसी को भी बोलता, "भाई साहब, आप आ जाओ, पत्ते
06:56
Speaker A
निकालो।" एक बार तो उसने काल बदेवी में एक चाय वाले से पत्ते निकलवाए। लोगों ने देखा, यह आदमी सच में फेयर खेल रहा है और जब लोगों को जीत के पैसे मिले टाइम पे, तो उनका भरोसा और बढ़ गया। देखते ही देखते
07:10
Speaker A
रतन का मटका फेमस होने लगा। मिल में काम करने वाले मजदूर [संगीत] जो दिन भर मेहनत करते थे, वह भी 50 पैसे, ₹1 लगा रहे थे। टैक्सी ड्राइवर, दुकानदार, छोटे बिजनेसमैन सब लोग खेल रहे थे। और रतन ने एक और
07:25
Speaker A
स्मार्ट काम किया। उसने टेलीफोन का यूज़ शुरू किया। जैसे ही नंबर निकलते थे, टेलीफोन पर वो नंबर्स पूरी सिटी में भेज दिए जाते थे। फिर वो नंबर्स मुंबई से बाहर, गुजरात, राजस्थान हर जगह फोन से पहुंच जाते थे। एक मटका मुंबई में खुला
07:42
Speaker A
लेकिन उसका रिजल्ट पूरे देश में जानता था 10 मिनट में। 1964 में रतन ने एक और मटका शुरू किया। न्यू वरली मटका। अब वो कल्याण जी भगत से कमपीट कर रहा था। डिफरेंस यह था, कल्याण जी का मटका 7 दिन चलता था। रतन का
07:57
Speaker A
सिर्फ पांच दिन, मंडे से फ्राइडे। लोगों को रतन का ज्यादा पसंद आया क्योंकि रतन का गेम सिंपल था। रूल्स क्लियर थे। 1970 के दशक तक आते-आते रतन खत्री एक बड़ा नाम बन गया था। उसका डेली टर्नओवर, मतलब एक दिन
08:12
Speaker A
में कितना पैसा बेट होता था? ₹1 करोड़ तक पहुंच गया था। सोचिए, 1970 के दशक में ₹1 करोड़ रोज का टर्नओवर। आज के हिसाब से यह लगभग 40 से 45 करोड़ होगा। रतन अमीर हो गया था। बहुत अमीर। लेकिन देखने में ऐसा
08:30
Speaker A
नहीं लगता था। वो अभी भी वही सफेद कुर्ता पायजामा पहनता था। काले चप्पल, सिर पर रुमाल, Mercedes नहीं, बस में घूमता था। और तो और कभी-कभी पैदल भी घूमता था। लोग कहते थे, इतना पैसा है इसमें और यह ऐसे घूम रहा
08:46
Speaker A
है। लेकिन रतन को पता था, जितना सिंपल रहोगे, उतना लोगों का भरोसा बना रहेगा। उसने बॉलीवुड में भी पैसा लगाया। 1976 में उसने एक फिल्म प्रोड्यूस की। रंगीला रतन। ऋषि कपूर और परवीन बाबी फिल्म में थे। ऋषि कपूर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखा है
09:03
Speaker A
एक इंटरेस्टिंग बात। शूटिंग के दौरान रतन सेट आता था। वो ऋषि कपूर और अशोक कुमार से कहता था, "आप एक पत्ता निकालो।" वो दोनों पत्ता निकालते थे और 10 मिनट बाद वो नंबर पूरी मुंबई में फैल जाता था। आज का मटका
09:19
Speaker A
नंबर। बॉलीवुड के स्टार्स अपने हाथ से मटका के नंबर डिसाइड कर रहे थे। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी, रतन का मटका सिर्फ छोटे लोगों के लिए नहीं था। बड़े बिजनेसमैन, पॉलिटिशियंस, बॉलीवुड स्टार्स सब खेलते थे। रतन के पास सब लेवल के लोग
09:36
Speaker A
आते थे। लेकिन 1975 में एक तूफान आने वाला था। एक ऐसी चीज जो रतन खत्री को जेल भेजने वाली थी। 1975, रतन खत्री अपने पीक पर था। उस वक्त पूरे इंडिया में मटका इंडस्ट्री का मंथली टर्नओवर ₹500 करोड़ तक पहुंच गया
09:54
Speaker A
था। रतन अकेला नहीं था। कल्याण जी भगत और कई और भी लोग मटका चलाते थे। लेकिन सबसे पावरफुल नाम था रतन खत्री। उसी साल एक फिल्म आई, धर्मात्मा। डायरेक्टर थे फिरोज खान। यह इंडिया की पहली फिल्म थी जो
10:09
Speaker A
हॉलीवुड की फेमस फिल्म द गॉडफादर से इंस्पायर्ड थी। और उस फिल्म का मेन विलेन कैरेक्टर जो प्रेमनाथ ने प्ल...
10:23
Speaker A
थिएटर्स में जा रहे थे और बोल रहे थे देखो देखो यह तो रतन खत्री है। हर शाम 9:00 बजे जब मटका के नंबर अनाउंस होते थे तो लगता था जैसे पूरी मुंबई रुक गई है। मिल एरियाज, परेल, वरली, वहां मजदूर काम छोड़
10:39
Speaker A
के नंबर सुनने खड़े होते थे। टैक्सी स्टैंड्स पर ड्राइवर्स रेडियो लगाकर बैठे रहते थे। घर में लोग चुपचाप इंतजार करते थे। और जब नंबर आता था तो हर जगह शोर, कोई जीत गया, कोई हार गया। यह सिर्फ एक गेम
10:54
Speaker A
नहीं था इससे मुंबई की जिंदगी बन गया था। लेकिन 1975 में एक और बड़ी बात हुई। प्राइम मिनिस्टर इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी। पूरे देश में पुलिस, आर्मी, सरकार सब टाइट हो गए। न्यूज़पेपर्स बंद करने लगे। लोगों को जेल में डाला जाने लगा और
11:11
Speaker A
इंदिरा गांधी की नजर गई रतन खत्री पे। क्योंकि मटका ब्लैक मनी का सबसे बड़ा सोर्स था। सरकार ने डिसाइड किया रतन खत्री को पकड़ना है। लेकिन तब तक कुछ और इंटरेस्टिंग हुआ। लोगों ने नारे लगाने शुरू किए। इंदिरा गांधी को हटाओ, रतन
11:28
Speaker A
खत्री को प्राइम मिनिस्टर बनाओ। हां, आप सही सुन रहे हो। लोग चाहते थे कि रतन खत्री पीएम बने। यह दिखाता है कितना पॉपुलर था वह आदमी। लेकिन यह नारे इंदिरा गांधी को और गुस्सा दिला रहे थे। और रतन
11:42
Speaker A
को नहीं पता था कि उसकी जिंदगी अब पूरी तरह से बदलने वाली है। 1975 इमरजेंसी के दौरान एक दिन पुलिस रतन खत्री के टाड़दियों वाले घर पे आई। वो उसी वक्त अरेस्ट कर लिया गया। केस था इललीगल गैंबलिंग ब्लैक
11:57
Speaker A
मनी। रतन को जेल भेज दिया गया। 19 महीने। पूरे 19 महीने रतन खत्री जेल में रहा। वो आदमी जो ₹1 करोड़ डेली घुमाता था। अब जेल की छोटी सी सेल में बंद था। और इस दौरान सबसे बड़ा धोखा किसने दिया? कल्याण जी
12:14
Speaker A
भगत। वही कल्याण जी जिसके साथ रतन ने काम सीखा था। जब रतन जेल में था कल्याण जी ने उसकी कोई मदद नहीं की। कोई लॉयर अरेंज नहीं किया। कोई पॉलिटिकल कनेक्शन नहीं लगाया। बस चुपचाप अपना मटका चलाता रहा।
12:30
Speaker A
रतन ने कभी यह धोखा माफ [संगीत] नहीं किया। 1977 में जब इमरजेंसी खत्म हुई रतन जेल से बाहर आया और उसने अपना मटका फिर से [संगीत] शुरू किया लेकिन चीजें बदल गई थी। पुलिस अब ज्यादा स्ट्रिक्ट थी। हर जगह
12:44
Speaker A
रेड्स होने लगी और सबसे बड़ी प्रॉब्लम माफिया आ गया था इस बिजनेस में। 1980 के दशक से 90 के दशक में मटका बिजनेस अपने पीक पे था। हर महीने ₹500 करोड़ का बेट लगता था। लेकिन अब वायलेंस भी आ गया था।
13:00
Speaker A
बुकीज़ यानी वो लोग मटका का गैंबलिंग करते [संगीत] थे। एक दूसरे के अगेंस्ट हो रहे थे। पुलिस का प्रेशर बढ़ रहा था। कई बुकीज़ गुजरात राजस्थान भाग गए। कुछ को जेल हो गई। कुछ को माफिया ने फिनिश कर दिया। रतन
13:14
Speaker A
समझ गया अब यह बिजनेस पहले जैसा नहीं रहा। 1993 रतन अपनी फैमिली के साथ छुट्टियों पर जाने वाला था। एयरपोर्ट पर उसका नाम एक लिस्ट में आ गया। नो फ्लाई लिस्ट। मतलब गवर्नमेंट ने उसका नाम उस लिस्ट में डाल
13:29
Speaker A
दिया था [संगीत] जिसको प्लेन पर बैठने की परमिशन नहीं है। यह एक बड़ा इंसल्ट था। रतन के लिए यह एक साइन था। उसने उसी दिन डिसाइड कर लिया। बस खत्म। रतन खत्री ने 1993 में मटका बिजनेस से रिटायर हो गया।
13:44
Speaker A
31 साल चलने के बाद इंडिया का मटका किंग साइड लाइन पर चला गया। लेकिन उसके जाने के बाद जो हुआ, वह और भी डार्क था। कल्याण जी भगत 1990 के दशक में मर गया। उसका बेटा सुरेश भगत बिजनेस संभालने लगा। सुरेश बहुत
14:00
Speaker A
सक्सेसफुल था। मंथली ₹1000 करोड़ का टर्नओवर था। लेकिन 2008 में सुरेश को किसी ने कार में बम डालकर उड़ा दिया। जानते हो किसने? उसकी अपनी बीवी जया भगत और उसका अपना बेटा हितेश भगत ने। अपनी ही फैमिली ने उसे मरवाया पैसों के लिए। कोर्ट केस
14:18
Speaker A
हुआ। दोनों को जेल हो गया। यह था वह मटका वर्ल्ड जो रतन के जाने के बाद बन गया था। एक टाइम पर 2000 से ज्यादा बुकीज़ थे मुंबई में। अब सिर्फ 300 बचे थे। मटका खत्म होने लग गया। उसकी जगह अब क्रिकेट
14:33
Speaker A
बैटिंग आ गई थी। रतन खत्री ने अपनी बाकी जिंदगी बिल्कुल चुपचाप बिताई। वो तारदियों के अपने घर में रहता था। कभी-कभी उसको महालक्ष्मी रेस कोर्स पर देखा जाता था। हॉर्स रेसिंग पर छोटे-छोटे बेड लगाते हुए सोचिए एक आदमी जिसने ₹1 करोड़ डेली का
14:50
Speaker A
बिजनेस चलाया अब 100 से ₹200 के बेड लगा रहा है अपने शौक के लिए। लोगों को पता ही नहीं चलता था कि यह वही रतन खत्री है क्योंकि वह हमेशा सिंपल कपड़ों में रहता था। कभी भी कैमरा के सामने नहीं आया। कोई
15:04
Speaker A
इंटरव्यू नहीं दिया। बस अपनी जिंदगी क्वाइटली जी रहा था। उसके दो बेटे थे। दोनों बॉलीवुड फिल्म बिजनेस में थे। उनका एक सिनेमा हॉल भी था। रतन ने अपने पैसों का क्या किया? कितना प्रॉपर्टी बनाई, यह किसी को नहीं पता क्योंकि वह इतना सिंपल
15:20
Speaker A
जीता था कि लोगों को यकीन ही नहीं होता था कि उसके पास पैसा है। 9 मई 2020 रतन खत्री की टादियों वाले घर में कार्डियक अरेस्ट से मौत हो गई। उम्र थी 88 साल। कोविड-19 का लॉकडाउन चल रहा था इसलिए उसकी मौत पे
15:36
Speaker A
ज्यादा लोग नहीं आए। बस फैमिली और कुछ खास लोग थे। एक जमाने का मटका किंग चुपचाप चला गया। न्यूज़पेपर्स में छोटी सी खबर छपी। लेकिन जिसकी जिंदगी में लाखों लोग इनवॉल्व थे, उसकी डेथ पर कोई बड़ा हंगामा नहीं
15:51
Speaker A
हुआ। आज मटका गैंबलिंग इंडिया में इललीगल है। पब्लिक गैंबलिंग एक्ट 1867 के अकॉर्डिंग यह क्राइम है। लेकिन आज भी छोटी जगहों पर यह चलता है और ज्यादातर इललीगल बैटिंग अब क्रिकेट पर हो रहा है। आईपीएल मैच, इंटरनेशनल मैच सब पर बैटिंग होती है।
16:10
Speaker A
वो पूरा नेटवर्क रतन खत्री के मटका से ही इंस्पायर हुआ था। कई स्टेट गवर्नमेंट्स ने लीगल लॉटरी शुरू की। केरला, महाराष्ट्र ताकि लोग लीगल तरीके से खेल सकें। रतन खत्री की जिंदगी पर तीन फिल्म्स बन चुकी हैं। 1975 में धर्मात्मा।
16:28
Speaker A
2024 में तेलुगु फिल्म मटका और 2026 में Amazon प्राइम पर एक सीरीज आई मटका किंग। विजय वर्मा ने रतन का कैरेक्टर का रोल किया। एक रेफ्यूजी लड़का जो मुंबई की गलियों में भटकता था वो इंडिया का सबसे पावरफुल गैंबलिंग किंग बन गया। लेकिन जिस
16:46
Speaker A
गेम से वह ऊपर आया वही गेम उसके बाद वालों को खत्म कर गया। वायलेंस, मर्डर, धोखा सब कुछ आया। रतन समझ गया था कि सही वक्त पर छोड़ना चाहिए और इसलिए वह 88 साल तक जीता रहा शांति से। बाकी जो इसमें फंसे वो या
17:04
Speaker A
तो जेल में हैं या मर गए। यह था मटका किंग रतन खत्री का असली सच। दोस्तों, अगर यह कहानी आपको पसंद आई हो, तो एक लाइक जरूर करो। चैनल को सब्सक्राइब करो ताकि ऐसे फाइनेंस और मनी की इंटरेस्टिंग कहानियां
17:19
Speaker A
आप तक पहुंचती रहे और वीडियो को हाइप जरूर करो ताकि यह वीडियो उन लोगों तक जल्द से जल्द पहुंच पाए जो आज भी ऐसे गैंबलिंग में जुड़े हैं। हम हर हफ्ते नई कहानी लाते हैं। स्कैम्स, बिजनेस वॉारर्स और इंडिया
17:33
Speaker A
के छुपे हुए हीरोज़ की स्टोरीज। कमेंट में बताइए आपको रतन खत्री के बारे में क्या लगता है? हीरो था या विलन? तब तक के लिए अपना पैसा संभाल के रखना। और हां मटका मत खेलना वो इललीगल है।
Topics:रतन खत्रीमटकासट्टामुंबईरेफ्यूजी1970 दशकइमरजेंसीगैम्बलिंगधोखाबॉलीवुड

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