₹24,000 करोड़ के हर्षद मेहता स्टॉक मार्केट स्कैम की कहानी, बैंक रिसीप्ट धोखाधड़ी और सुचेता दलाल की जांच।
Key Takeaways
- हर्षद मेहता ने बैंक रिसीप्ट के फर्जी इस्तेमाल से ₹24,000 करोड़ का स्कैम किया।
- बैंक अधिकारी और पॉलिटिशियन भी इस घोटाले में शामिल थे।
- सुचेता दलाल की जांच ने इस बड़े वित्तीय धोखाधड़ी को उजागर किया।
- हर्षद की रणनीति ने पूरे देश के शेयर बाजार को प्रभावित किया।
- यह स्कैम भारत के वित्तीय इतिहास का एक बड़ा काला अध्याय है।
What the video covers
- 23 अप्रैल 1992 को बॉम्बे स्टॉक मार्केट में हर्षद मेहता के ₹24,000 करोड़ के स्कैम का खुलासा हुआ।
- हर्षद मेहता ने बैंक रिसीप्ट (बीआर) का फर्जी इस्तेमाल कर बिना सिक्योरिटीज के पैसे उधार लिए।
- बीआर सिस्टम में कई बैंक अधिकारी, चेयरमैन और पॉलिटिशियन शामिल थे।
- हर्षद ने स्टॉक मार्केट में एक ही शेयर (जैसे एसीसी सीमेंट) की कीमत बढ़ाकर करोड़ों कमाए।
- सुचेता दलाल ने इस घोटाले की जांच शुरू की और बैंक फाइल्स से फर्जीवाड़ा पकड़ा।
- हर्षद मेहता का छोटा ऑफिस से बड़ा ब्रोकरेज हाउस बनने का सफर और उसकी लाइफस्टाइल में बदलाव।
- बैंक ऑफ कराड और मेट्रोपॉलिटन कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन हर्षद के साथ थे।
- बीआर के जरिए पैसे का फर्जी लेनदेन और शेयर बाजार में कीमतों का मनमाना नियंत्रण।
- समाचार पत्रों में हर्षद की छवि और मीडिया में उसकी लोकप्रियता।
- 23 अप्रैल 1992 को टाइम्स ऑफ इंडिया में स्कैम का खुलासा और बाजार का हिल जाना।
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Speaker A
23 अप्रैल 1992 बॉम्बे स्टॉक मार्केट में आज भी हंगामा मचा हुआ था। शेयर की कीमत आसमान छू रही थी। दलाल स्ट्रीट की गलियों में सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा था और वो नाम था हर्षद मेहता। पर किसी को नहीं पता था कि इस रात सब खत्म होने वाला है। 24,000 करोड़। इतना बड़ा नंबर कि आप सोच भी नहीं सकते। उस जमाने में यह पूरा इंडिया का एक साल का बजट था और यह पैसा था ही नहीं सिर्फ कागज पर था। आपने स्कैम 1992 वेब सीरीज देखी होगी। प्रतीक गांधी ने हर्षद का रोल किया था। पर वो पूरी कहानी नहीं थी। असली खेल कुछ और ही था। बैंक रिसीप्ट सिर्फ एक कागज का टुकड़ा। इसी कागज ने ₹24,000 करोड़ का स्कैम पॉसिबल बनाया। और सबसे बड़ी बात, हर्षद अकेला नहीं था। बैंक के चेयरमैन, बड़े अफसर, पॉलिटिशियन सब मिले हुए थे। लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह ताश का घर कितनी जल्दी गिरने वाला है। इस कहानी की शुरुआत होती है 1954 से। राजकोट गुजरात एक मिडिल क्लास गुजराती फैमिली में हर्षद मेहता पैदा हुआ। बच्चे थे चार भाई घर की हालत खराब नहीं थी पर अमीर भी नहीं थे। छोटी सी दुकान थी। हर्षद पढ़ाई में एवरेज था। कॉलेज में ग्रेजुएशन किया बस नाम के लिए। उसका दिमाग पढ़ाई में कम पैसा कमाने में ज्यादा लगता था। 1970 के दशक में पूरा फैमिली मुंबई शिफ्ट हो गई। तब मुंबई को बॉम्बे कहते थे। हर्षद ने छोटी सी नौकरी शुरू की। शेयर मार्केट के एक ऑफिस में। वहां का काम था फाइल्स कैरी करना, ब्रोकर के लिए छोटी-मोटी काम करना। पर हर्षद को एक चीज समझ आ गई। यह ब्रोकर लोग सुबह गाड़ी में आते थे Mercedes में। बड़े घर में रहते थे। और करते क्या थे? सिर्फ कागज का खेल। शेयर्स खरीदते, बेचते और पैसा बरसता था। एक दिन हर्षद ने अपने भाई अश्विन से कहा, "भाई, यह ब्रोकर लोगों को देख। पढ़े-लिखे ज्यादा नहीं, पर पैसा देख इनका। हम भी कर सकते हैं यह सब। 1980 में हर्षद ने अपना खुद का ऑफिस खोला। जगह थी घाट कोपर। मुंबई का एक मिडिल क्लास एरिया। ऑफिस भी कुछ खास नहीं था। एक छोटा सा कमरा। टेबल, कुर्सी, फोन, बस। शुरुआत में स्ट्रगल था। छोटे-छोटे क्लाइंट्स, ₹500, ₹1000 का शेयर खरीदना बेचना। पर हर्षद के पास था एक चीज भरोसा। लोग कहते थे हर्षद भाई का काम सॉलिड है। पहली बार जब उसने किसी क्लाइंट को ₹10,000 का प्रॉफिट दिया उस दिन हर्षद को लगा हां यह मेरा रास्ता है। 1985 तक हर्षद का नाम थोड़ा फैलने लगा था दलाल स्ट्रीट में। पर वो बड़ा नहीं था। अभी भी छोटा ब्रोकर ही था। लेकिन हर्षद का सपना छोटा नहीं था। वो देखता था बड़े ब्रोकर्स को। उनकी लाइफ स्टाइल, उनकी इज्जत और उसने डिसाइड किया मैं भी वही बनूंगा। चाहे कुछ भी करना पड़े। उसे नहीं पता था कि यह फैसला आगे चलकर पूरे देश को हिला देगा। 1986 से 87 के आसपास हर्षद ने एक चीज नोटिस की। बैंक्स के पास बहुत सारा पैसा होता है कस्टमर्स का, डिपॉजिटर्स का। अब यह पैसा बैंक्स ऐसे ही नहीं रखते। उन्हें इस पैसे को लगाना होता है ताकि इंटरेस्ट मिल सके। तो बैंक्स एक चीज करते हैं रेडी फॉरवर्ड डील। मतलब क्या? समझो ऐसे। मान लो एक बैंक के पास ₹10 करोड़ एक्स्ट्रा पड़े हैं कुछ दिन के लिए। तो वह दूसरे बैंक को कहती है भाई मेरे पास ₹10 करोड़ हैं। मैं तुझे दे देता हूं 15 दिन के लिए। तू मुझे थोड़ा इंटरेस्ट दे देना। सिंपल सा ट्रांजैक्शन बैंक ए बैंक बी को पैसा देता है। और 15 दिन बाद वापस ले लेता है थोड़े ज्यादा पैसे के साथ। पर इसमें एक प्रॉब्लम थी। बैंक्स को यह पैसा सीधा-सीधा नहीं दे सकते थे। कानून कहता था पैसा किसी गारंटी के साथ जाना चाहिए। तो बैंक्स क्या करते थे? वह सिक्योरिटीज देते थे। यानी गवर्नमेंट बॉन्ड्स, शेयर्स या कागज जो कहते थे कि पैसा सेफ है। अब यह सिक्योरिटीज एक बैंक से दूसरे बैंक तक फिजिकली जाने में टाइम लगता था। फाइल्स हैं, कूरियर है, क्लीयरेंस है 2 से 3 दिन लग जाते थे। तो क्या सलूशन निकाला? बैंक रिसीप्ट यानी बीआर। यह एक छोटा सा कागज होता था जिसमें लिखा होता था हां भाई सिक्योरिटीज आ गई हैं। मैं रख रहा हूं सेफ। समझो एक तरह का रिसीट जैसे दुकान पर सामान खरीदने पर मिलता है। अब इधर वो सिक्योरिटीज फिजिकली आती नहीं थी तुरंत पर बीआर मिल जाता था तो डील हो जाती थी। हर्षद को यह समझ आ गया और उसने देखा एक लूप होल एक छेद। अगर कोई ब्रोकर बीच में आ जाए और वो फेक बीआर बना दे तो [गहरी सांस लेने की आवाज़] हर्षद ने पहली बार छोटी सी टेस्टिंग की। उसने एक बैंक से बात की। नाम था बैंक ऑफ कराड। [संगीत] छोटा सा कोऑपरेटिव बैंक। हर्षद ने कहा, "साहब, मैं आपके लिए सिक्योरिटीज़ लाता हूं। आप मुझे बीआर दे दो। मैं यूज़ दूसरे बैंक को दिखाकर पैसा ले आऊंगा। फिर वापस कर दूंगा।" बैंक के चेयरमैन ने सोचा, हर्षद तो जाना पहचाना बंदा है। कोई दिक्कत नहीं।" बीआर बन गया। हर्षद ने वह बीआर ले जाके दूसरे बैंक को दिखाया और ₹5 करोड़ निकाल लिए। सिक्योरिटीज थी नहीं। पर कागज पर दिखा हां है। हर्षद ने वह ₹5 करोड़ स्टॉक मार्केट में लगा दिए। शेयर खरीदे कीमत बढ़ी। प्रॉफिट हुआ। 15 दिन बाद पैसा वापस कर दिया। इंटरेस्ट के साथ सब खुश। हर्षद को यकीन हो गया। यह फार्मूला काम करता है। अब शुरू होने वाला था असली खेल। 1988 से लेकर 1991 तक 3 साल हर्षद मेहता छोटे ब्रोकर से बिग बुल बन गया। कैसे? हर्षद ने एक सिस्टम बना लिया था। वो एक बैंक से बीआर ले लेता। सिक्योरिटीज नहीं होती। वो बीआर दूसरे बैंक को दिखाकर पैसा ले आता। फिर उस पैसे से स्टॉक मार्केट में शेयर खरीदता और सिर्फ एक दो शेयर नहीं एसीसी सीमेंट को फोकस किया। एक ही शेयर को खरीदता गया। डिमांड बढ़ी प्राइस बढ़ा। ₹200 का शेयर ₹9000 तक पहुंच गया। हर्षद के पास अब करोड़ थे। वह पैसा वापस बैंक्स को दे देता। इंटरेस्ट के साथ सब खुश और दोबारा सेम चीज रिपीट। स्केल बढ़ता गया। ₹1 करोड़ से ₹50 करोड़। ₹50 करोड़ से ₹500 करोड़ और एक दिन ₹2,000 करोड़ का गेम। हर्षद की लाइफस्ट बदल गई। पहले घाटकोपर का छोटा सा ऑफिस था। अब वरली में सीवू बंगलो 15 करोड़ का घर। पहले बस में जाता था। अब गाड़ी Toyota Lexus। उस टाइम इंडिया में यह गाड़ी सिर्फ अमिताभ बच्चन और हर्षद के पास थी। डिजाइनर सूट्स, RX घड़ी, पार्टी में एंट्री सब खड़े हो जाते थे। मीडिया ने टाइटल दिया बिग बुल ऑफ दल स्ट्रीट न्यूज़ पेपर्स में फोटो टीवी पर इंटरव्यू हर कोई पूछता हर्षद भाई सीक्रेट क्या है हर्षद मुस्कुराता मेहनत और थोड़ा दिमाग पर असली सीक्रेट किसी को नहीं पता था अब दिक्कत यह थी हर्षद अकेला यह सब नहीं कर सकता था उसे चाहिए थे पार्टनर्स बैंक्स के अंदर बैंक ऑफ कराड का चेयरमैन हितेन दलाल वो देता था बीआर बिना सिक्योरिटीज के मेट्रो मेट्रोपॉलिटन कोऑपरेटिव बैंक का चेयरमैन उसे भी हाथ मिलाया हर्षद ने। नेशनल हाउसिंग बैंक के कुछ अफसर इनवॉल्वड थे। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के एक एंप्लई पल्लव परोलकर। उसके बिना तो बीआर सिस्टम ही नहीं चलता था। वो बनाता था फेक एंट्रीज, फेक सिग्नेचर्स सब मिले हुए थे। सबको पैसा मिल रहा था। पर एक आदमी था जो चुपचाप सब देख रहा था। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक जर्नलिस्ट सुचेता दलाल वो समझ गई थी कुछ तो गड़बड़ है। मार्केट इतनी तेजी से नहीं बढ़ता। हर्षद इतना पैसा कैसे कमा रहा है? उसने फाइल्स खरीदनी शुरू की। लोगों से बात की। चुपचाप इन्वेस्टिगेशन शुरू हो गई। पर हर्षद को क्या पता? वो तो अपने लेक्सस में घूम रहा था। उसको लगता था अब मुझे कोई नहीं रोक सकता। एक बार उसने इंटरव्यू में कहा था रिस्क लेने से डरते हो तो शेयर मार्केट में मत आओ। लेकिन वो नहीं जानता था कि जिस चीज ने उसे ऊपर उठाया था वही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बनने वाली थी। 1991 का एंड 1992 की शुरुआत हर्षद मेहता उस वक्त इंडिया का सबसे पावरफुल आदमी था। कम से कम दलाल स्ट्रीट पर तो जरूर। एक दिन में उसका टर्नओवर होता था ₹500 करोड़ का। समझो एक दिन में इतना पैसा घूम रहा था जितना छोटे शहर का पूरा साल का बजट होता है। एसीसी के शेयर्स ₹9000 वीडियो ₹7000 अपोलो टायर्स सब आसमान छू रहे थे। रिटेल इन्वेस्टर्स मतलब छोटे लोग जो ₹10 से ₹2000 लगाते थे उन्हें लग रहा था कि उनका सपना सच हो रहा है। शेयर खरीदो 2 महीने में डबल। न्यूज़पेपर्स में हर्षद का फोटो, हेडलाइंस, द मैन हु मूव्ड मार्केट्स, टीवी पे इंटरव्यूज। सूट पहन के मुस्कुराते हुए हर्षद कहता मार्केट में साइकिल होती है। समझो साइकिल को तब कमा सकते हो। पर कोई नहीं जानता था कि यह साइकिल असली नहीं थी, नकली थी। उसकी बीवी, ज्योति, बच्चे, बड़ा घर, स्टाफ सब कुछ था। हर्षद के पास पावर थी। वो जिस शेयर को छूता वो बढ़ता। जिसे बोलना बंद करता वो गिरता। मार्केट उसकी उंगलियों पर नाचता था। लेकिन उधर सुचेता दलाल अपना काम कर रही थी। उसने एक बैंक एंप्लई से बात की सीक्रेटली। उसने बताया मैडम बीआर के नंबर्स मैच नहीं हो रहे। सिक्योरिटीज फिजिकली आ ही नहीं रही। सब कागज पे है। सुचेता को समझ आ गया। यह स्कैम है। बड़ा स्कैम। उसने और इन्वेस्टिगेशन की। फाइल्स खरीद के देखी, बैंक्स के अंदर के सोर्सेज से बात की और फाइनली एक दिन उसने डिसीजन लिया 23 अप्रैल 1992 टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा एक आर्टिकल हेडलाइन था बिलियंस वैनिश इन स्टॉक मार्केट स्कैम। उसमें हर्षद का नाम था। बीआर का पूरा सिस्टम एक्सप्लेन किया था। बैंक्स के नाम थे, नंबर्स थे। बॉम्बे उस दिन हिल गया। सुबह 9:00 बजे जब न्यूज़ पेपर आया, लोगों के हाथ कांपने लगे। स्टॉक एक्सचेंज के बाहर भीड़ लग गई। लोग चिल्ला रहे थे। हमारा पैसा डूब गया। हर्षद उस वक्त अपने वरली के बंगलों में सो रहा था। उसके पीए ने फोन किया। सर बड़ी प्रॉब्लम है। न्यूज़पेपर देखो। हर्षद ने
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था कि इस रात सब खत्म होने वाला है। 24,000 करोड़। इतना बड़ा नंबर कि आप सोच भी नहीं सकते। उस जमाने में यह पूरा इंडिया का एक साल का बजट था और यह पैसा था ही नहीं सिर्फ कागज पर था। आपने स्कैम
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1992 वेब सीरीज देखी होगी। प्रतीक गांधी ने हर्षद का रोल किया था। पर वो पूरी कहानी नहीं थी। असली खेल कुछ और ही था। बैंक रिसीप्ट सिर्फ एक कागज का टुकड़ा। इसी कागज ने ₹24,000 करोड़ का स्कैम पॉसिबल बनाया। और सबसे बड़ी बात, हर्षद
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अकेला नहीं था। बैंक के चेयरमैन, बड़े अफसर, पॉलिटिशियन सब मिले हुए थे। लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह ताश का घर कितनी जल्दी गिरने वाला है। इस कहानी की शुरुआत होती है 1954 से। राजकोट गुजरात एक मिडिल क्लास गुजराती
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फैमिली में हर्षद मेहता पैदा हुआ। बच्चे थे चार भाई घर की हालत खराब नहीं थी पर अमीर भी नहीं थे। छोटी सी दुकान थी। हर्षद पढ़ाई में एवरेज था। कॉलेज में ग्रेजुएशन किया बस नाम के लिए। उसका दिमाग पढ़ाई में
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कम पैसा कमाने में ज्यादा लगता था। 1970 के दशक में पूरा फैमिली मुंबई शिफ्ट हो गई। तब मुंबई को बॉम्बे कहते थे। हर्षद ने छोटी सी नौकरी शुरू की। शेयर मार्केट के एक ऑफिस में। वहां का काम था फाइल्स कैरी
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करना, ब्रोकर के लिए छोटी-मोटी काम करना। पर हर्षद को एक चीज समझ आ गई। यह ब्रोकर लोग सुबह गाड़ी में आते थे Mercedes में। बड़े घर में रहते थे। और करते क्या थे?
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सिर्फ कागज का खेल। शेयर्स खरीदते, बेचते और पैसा बरसता था। एक दिन हर्षद ने अपने भाई अश्विन से कहा, "भाई, यह ब्रोकर लोगों को देख। पढ़े-लिखे ज्यादा नहीं, पर पैसा देख इनका। हम भी कर सकते हैं यह सब। 1980
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में हर्षद ने अपना खुद का ऑफिस खोला। जगह थी घाट कोपर। मुंबई का एक मिडिल क्लास एरिया। ऑफिस भी कुछ खास नहीं था। एक छोटा सा कमरा। टेबल, कुर्सी, फोन, बस। शुरुआत में स्ट्रगल था। छोटे-छोटे क्लाइंट्स, ₹500, ₹1000 का शेयर खरीदना बेचना। पर
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हर्षद के पास था एक चीज भरोसा। लोग कहते थे हर्षद भाई का काम सॉलिड है। पहली बार जब उसने किसी क्लाइंट को ₹10,000 का प्रॉफिट दिया उस दिन हर्षद को लगा हां यह मेरा रास्ता है। 1985 तक हर्षद का नाम
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थोड़ा फैलने लगा था दलाल स्ट्रीट में। पर वो बड़ा नहीं था। अभी भी छोटा ब्रोकर ही था। लेकिन हर्षद का सपना छोटा नहीं था। वो देखता था बड़े ब्रोकर्स को। उनकी लाइफ स्टाइल, उनकी इज्जत और उसने डिसाइड किया
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मैं भी वही बनूंगा। चाहे कुछ भी करना पड़े। उसे नहीं पता था कि यह फैसला आगे चलकर पूरे देश को हिला देगा। 1986 से 87 के आसपास हर्षद ने एक चीज नोटिस की। बैंक्स के पास बहुत सारा पैसा होता है
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कस्टमर्स का, डिपॉजिटर्स का। अब यह पैसा बैंक्स ऐसे ही नहीं रखते। उन्हें इस पैसे को लगाना होता है ताकि इंटरेस्ट मिल सके। तो बैंक्स एक चीज करते हैं रेडी फॉरवर्ड डील। मतलब क्या? समझो ऐसे। मान लो एक बैंक
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के पास ₹10 करोड़ एक्स्ट्रा पड़े हैं कुछ दिन के लिए। तो वह दूसरे बैंक को कहती है भाई मेरे पास ₹10 करोड़ हैं। मैं तुझे दे देता हूं 15 दिन के लिए। तू मुझे थोड़ा इंटरेस्ट दे देना। सिंपल सा ट्रांजैक्शन
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बैंक ए बैंक बी को पैसा देता है। और 15 दिन बाद वापस ले लेता है थोड़े ज्यादा पैसे के साथ। पर इसमें एक प्रॉब्लम थी। बैंक्स को यह पैसा सीधा-सीधा नहीं दे सकते थे। कानून कहता था पैसा किसी गारंटी के
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साथ जाना चाहिए। तो बैंक्स क्या करते थे? वह सिक्योरिटीज देते थे। यानी गवर्नमेंट बॉन्ड्स, शेयर्स या कागज जो कहते थे कि पैसा सेफ है। अब यह सिक्योरिटीज एक बैंक से दूसरे बैंक तक फिजिकली जाने में टाइम लगता था। फाइल्स हैं, कूरियर है,
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क्लीयरेंस है 2 से 3 दिन लग जाते थे। तो क्या सलूशन निकाला? बैंक रिसीप्ट यानी बीआर। यह एक छोटा सा कागज होता था जिसमें लिखा होता था हां भाई सिक्योरिटीज आ गई हैं। मैं रख रहा हूं सेफ। समझो एक तरह का
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रिसीट जैसे दुकान पर सामान खरीदने पर मिलता है। अब इधर वो सिक्योरिटीज फिजिकली आती नहीं थी तुरंत पर बीआर मिल जाता था तो डील हो जाती थी। हर्षद को यह समझ आ गया और उसने देखा एक लूप होल एक छेद। अगर कोई
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ब्रोकर बीच में आ जाए और वो फेक बीआर बना दे तो [गहरी सांस लेने की आवाज़] हर्षद ने पहली बार छोटी सी टेस्टिंग की। उसने एक बैंक से बात की। नाम था बैंक ऑफ कराड। [संगीत] छोटा सा कोऑपरेटिव बैंक। हर्षद ने कहा,
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"साहब, मैं आपके लिए सिक्योरिटीज़ लाता हूं। आप मुझे बीआर दे दो। मैं यूज़ दूसरे बैंक को दिखाकर पैसा ले आऊंगा। फिर वापस कर दूंगा।" बैंक के चेयरमैन ने सोचा, हर्षद तो जाना पहचाना बंदा है। कोई दिक्कत नहीं।" बीआर बन गया। हर्षद ने वह बीआर ले
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जाके दूसरे बैंक को दिखाया और ₹5 करोड़ निकाल लिए। सिक्योरिटीज थी नहीं। पर कागज पर दिखा हां है। हर्षद ने वह ₹5 करोड़ स्टॉक मार्केट में लगा दिए। शेयर खरीदे कीमत बढ़ी। प्रॉफिट हुआ। 15 दिन बाद पैसा वापस कर दिया। इंटरेस्ट के साथ सब खुश।
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हर्षद को यकीन हो गया। यह फार्मूला काम करता है। अब शुरू होने वाला था असली खेल। 1988 से लेकर 1991 तक 3 साल हर्षद मेहता छोटे ब्रोकर से बिग बुल बन गया। कैसे?
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हर्षद ने एक सिस्टम बना लिया था। वो एक बैंक से बीआर ले लेता। सिक्योरिटीज नहीं होती। वो बीआर दूसरे बैंक को दिखाकर पैसा ले आता। फिर उस पैसे से स्टॉक मार्केट में शेयर खरीदता और सिर्फ एक दो शेयर नहीं
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एसीसी सीमेंट को फोकस किया। एक ही शेयर को खरीदता गया। डिमांड बढ़ी प्राइस बढ़ा। ₹200 का शेयर ₹9000 तक पहुंच गया। हर्षद के पास अब करोड़ थे। वह पैसा वापस बैंक्स को दे देता। इंटरेस्ट के साथ सब खुश और
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दोबारा सेम चीज रिपीट। स्केल बढ़ता गया। ₹1 करोड़ से ₹50 करोड़। ₹50 करोड़ से ₹500 करोड़ और एक दिन ₹2,000 करोड़ का गेम। हर्षद की लाइफस्ट बदल गई। पहले घाटकोपर का छोटा सा ऑफिस था। अब वरली में सीवू बंगलो
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15 करोड़ का घर। पहले बस में जाता था। अब गाड़ी Toyota lexus। उस टाइम इंडिया में यह गाड़ी सिर्फ अमिताभ बच्चन और हर्षद के पास थी। डिजाइनर सूट्स, RX घड़ी, पार्टी में एंट्री सब खड़े हो जाते थे। मीडिया ने
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टाइटल दिया बिग बुल ऑफ दल स्ट्रीट न्यूज़ पेपर्स में फोटो टीवी पर इंटरव्यू हर कोई पूछता हर्षद भाई सीक्रेट क्या है हर्षद मुस्कुराता मेहनत और थोड़ा दिमाग पर असली सीक्रेट किसी को नहीं पता था अब दिक्कत यह थी हर्षद अकेला यह सब नहीं कर सकता था उसे
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चाहिए थे पार्टनर्स बैंक्स के अंदर बैंक ऑफ कराड का चेयरमैन हितेन दलाल वो देता था बीआर बिना सिक्योरिटीज के मेट्रो मेट्रोपॉलिटन कोऑपरेटिव बैंक का चेयरमैन उसे भी हाथ मिलाया हर्षद ने। नेशनल हाउसिंग बैंक के कुछ अफसर इनवॉल्वड थे।
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स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के एक एंप्लई पल्लव परोलकर। उसके बिना तो बीआर सिस्टम ही नहीं चलता था। वो बनाता था फेक एंट्रीज, फेक सिग्नेचर्स सब मिले हुए थे। सबको पैसा मिल रहा था। पर एक आदमी था जो चुपचाप सब देख रहा था। टाइम्स ऑफ इंडिया
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की एक जर्नलिस्ट सुचेता दलाल वो समझ गई थी कुछ तो गड़बड़ है। मार्केट इतनी तेजी से नहीं बढ़ता। हर्षद इतना पैसा कैसे कमा रहा है? उसने फाइल्स खरीदनी शुरू की। लोगों से बात की। चुपचाप इन्वेस्टिगेशन शुरू हो गई।
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पर हर्षद को क्या पता? वो तो अपने लेक्सस में घूम रहा था। उसको लगता था अब मुझे कोई नहीं रोक सकता। एक बार उसने इंटरव्यू में कहा था रिस्क लेने से डरते हो तो शेयर मार्केट में मत आओ। लेकिन वो नहीं जानता
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था कि जिस चीज ने उसे ऊपर उठाया था वही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बनने वाली थी। 1991 का एंड 1992 की शुरुआत हर्षद मेहता उस वक्त इंडिया का सबसे पावरफुल आदमी था। कम से कम दलाल स्ट्रीट पर तो जरूर। एक दिन
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में उसका टर्नओवर होता था ₹500 करोड़ का। समझो एक दिन में इतना पैसा घूम रहा था जितना छोटे शहर का पूरा साल का बजट होता है। एसीसी के शेयर्स ₹9000 वीडियो ₹7000 अपोलो टायर्स सब आसमान छू रहे थे। रिटेल
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इन्वेस्टर्स मतलब छोटे लोग जो ₹10 से ₹2000 लगाते थे उन्हें लग रहा था कि उनका सपना सच हो रहा है। शेयर खरीदो 2 महीने में डबल। न्यूज़पेपर्स में हर्षद का फोटो, हेडलाइंस, द मैन हु मूव्ड मार्केट्स, टीवी पे इंटरव्यूज। सूट पहन के मुस्कुराते हुए
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हर्षद कहता मार्केट में साइकिल होती है। समझो साइकिल को तब कमा सकते हो। पर कोई नहीं जानता था कि यह साइकिल असली नहीं थी, नकली थी। उसकी बीवी, ज्योति, बच्चे, बड़ा घर, स्टाफ सब कुछ था। हर्षद के पास पावर
Speaker A
थी। वो जिस शेयर को छूता वो बढ़ता। जिसे बोलना बंद करता वो गिरता। मार्केट उसकी उंगलियों पर नाचता था। लेकिन उधर सुचेता दलाल अपना काम कर रही थी। उसने एक बैंक एंप्लई से बात की सीक्रेटली। उसने बताया मैडम बीआर के नंबर्स मैच नहीं हो रहे।
Speaker A
सिक्योरिटीज फिजिकली आ ही नहीं रही। सब कागज पे है। सुचेता को समझ आ गया। यह स्कैम है। बड़ा स्कैम। उसने और इन्वेस्टिगेशन की। फाइल्स खरीद के देखी, बैंक्स के अंदर के सोर्सेज से बात की और फाइनली एक दिन उसने डिसीजन लिया 23 अप्रैल
Speaker A
1992 टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा एक आर्टिकल हेडलाइन था बिलियंस वैनिश इन स्टॉक मार्केट स्कैम। उसमें हर्षद का नाम था। बीआर का पूरा सिस्टम एक्सप्लेन किया था। बैंक्स के नाम थे, नंबर्स थे। बॉम्बे उस दिन हिल गया। सुबह 9:00 बजे जब न्यूज़
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पेपर आया, लोगों के हाथ कांपने लगे। स्टॉक एक्सचेंज के बाहर भीड़ लग गई। लोग चिल्ला रहे थे। हमारा पैसा डूब गया। हर्षद उस वक्त अपने वरली के बंगलों में सो रहा था। उसके पीए ने फोन किया। सर बड़ी प्रॉब्लम
Speaker A
है। न्यूज़पेपर देखो। हर्षद ने पेपर खोला। अपनी फोटो देखी। आर्टिकल पढ़ा। पहली बार हर्षद मेहता के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई। ताश का घर गिरने वाला था। 23 अप्रैल 1992 के बाद स्टॉक मार्केट क्रैश हो गया। एक दिन में ₹1000 करोड़ का पैसा डूब गया।
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एसीसी जो ₹9000 पे था ₹3000 पे आ गया। आरबीआई यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने तुरंत इन्वेस्टिगेशन शुरू की। सीबीआई को बुलाया गया। बैंक्स पर रेड हुई। हर्षद ने पहले तो कोशिश की छुपने की। उसने अपने लॉयर को बुलाया। कुछ करो। यह आर्टिकल झूठ
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है। डेफमेशन केस डालो। पर अब बहुत देर हो चुकी थी। बैंक्स के चेयरमैन जो पहले हर्षद के दोस्त थे, अब उसका नाम लेने से डर रहे थे। हितेंद्र दलाल पकड़ा गया। पल्लव परुलकर अरेस्ट हुआ। एक-एक करके सब गिरने
Speaker A
लगे। 6 नवंबर 1992 हर्षद मेहता को थाने जेल में बंद कर दिया गया। एक बंदा जो लेक्सस में घूमता था, अब जेल की 8 * 10 की छोटी सी सेल में। पर कहानी यहां खत्म नहीं हुई। हर्षद ने जेल से एक धमाका किया। उसने
Speaker A
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस दी जेल के अंदर से। उसने कहा मैं अकेला नहीं था। सब मिलके खेल रहे थे। पॉलिटिशियंस, मिनिस्टर्स सबको पता था और फिर उसने सबसे बड़ा बॉम्ब फोड़ा। मैंने प्राइम मिनिस्टर नरसिम्हा राव को ₹1 करोड़ दिया है सूटकेस में। पूरा देश हिल
Speaker A
गया। पीएम के पास ₹1 करोड़ सूटकेस में। क्या बात कर रहा है यह? हर्षद ने कहा मेरे पास डायरी है। उसमें सब लिखा है। किसने कब कितना लिया। नरसिम्हा राव ने तुरंत डिनाई किया। यह सब झूठ है। यह आदमी अपनी गलती
Speaker A
छुपाने के लिए कुछ भी बोल रहा है। पर हर्षद के पास वो डायरी थी और फिर वो डायरी गायब हो गई। कैसे? कब? किसी को नहीं पता। हर्षद का कहना था कि किसी ने चुराई। गवर्नमेंट का कहना था डायरी थी ही नहीं।
Speaker A
सच क्या था? आज भी राज है। इसके बाद हर्षद पे केस पर केस आने लगे। टोटल 72 क्रिमिनल केसेस फाइल हुए। हर एक केस में लंबा ट्रायल, कोर्ट के चक्कर, लॉयर, बेल, जेल, बेल, जेल। पर एक ट्विस्ट और था। इन 72
Speaker A
केसेस में से 27 में हर्षद को एक्विट कर दिया गया। यानी कोर्ट ने कहा, इस केस में यह गिल्टी नहीं है। मतलब क्या? मतलब हर्षद अकेला विलेन नहीं था। बैंक के चेयरमैन थे, अफसर थे। सिस्टम करप्ट था पर सब ने ब्लेम
Speaker A
किया एक आदमी को और वो थे हर्षद मेहता वो जेल में चिल्लाते रहे उनकी हेल्थ खराब होने लगी स्ट्रेस डिप्रेशन जेल कोर्ट जेल कोर्ट और फिर 31 दिसंबर 2001 को हर्षद मेहता की डेथ हो गई ठाणे जेल में रीजन
Speaker A
बताया गया कार्डियाक अरेस्ट लेकिन सवाल यह है कि 47 साल की उम्र हेल्दी आदमी अचानक कार्डियाक अरेस्ट कैसे उसकी फैमिली फैमिली का कहना है ट्रीटमेंट में गलती हुई। हॉस्पिटल लेट ले गए। ध्यान नहीं दिया। कुछ लोग कहते हैं जेल में हर्षद को इंटेंशनली
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नेगलेक्ट किया गया। सच क्या है किसी को नहीं पता। हर्षद मेहता गया पर उसकी कहानी खत्म नहीं हुई। जब स्कैम टूटा हजारों लोग बर्बाद हो गए। छोटे इन्वेस्टर्स, मिडिल क्लास फैमिलीज जिनके सपने थे कि शेयर मार्केट से पैसा कमाएंगे। एक आदमी था नाम
Speaker A
था रमेश शाह। उसने अपनी पूरी लाइफ सेविंग्स ₹8 लाख एसीसी के शेयर्स में लगाए थे। उसकी बेटी की शादी का पैसा था वो। जब एसीसी गिरी सब डूब गया। रमेश ने सुसाइड कर लिया। ऐसी हजारों कहानियां हैं। लोग जिनके
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घर उजड़ गए। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। लोन डूब [संगीत] गया। पर क्या हर्षद को सजा मिली पूरी? 72 केसेस थे। कन्विक्शंस हुई कुछ में पर 27 में इक्विट। मतलब सिस्टम में इतना करप्शन था कि साफ-साफ नहीं पता
Speaker A
चल पाया कि गलती किसकी थी। आज हर्षद के भाई अश्विन मेहता जिंदा है। वो आज भी कहते हैं मेरा भाई अकेला नहीं था। सब ने मिलकर खेला पर ब्लेम सिर्फ उसको मिला। अश्विन आज भी कोर्ट्स में जाते हैं। केसेस लड़ते
Speaker A
हैं। कहते हैं हर्षद की डेथ नेचुरल नहीं थी। पर सच क्या है? शायद कभी पता नहीं चलेगा। इस स्कैम के बाद इंडिया ने सीखा सेबी यानी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया को ज्यादा पावर मिली। नए रूल्स बने। बीआर सिस्टम खत्म हुआ। डीममेट
Speaker A
अकाउंट्स आए। मतलब अब शेयर्स फिजिकल नहीं कंप्यूटर पर होते हैं। बैंक्स को मॉनिटरिंग बढ़ाई गई। रेडी फॉरवर्ड डील्स पे टाइट रूल्स। हर्षद मेहता स्कैम ने एक चीज अच्छी की। सिस्टम को झटका दिया। लोगों को बोला सुधर जाओ नहीं तो और हर्षद आएंगे।
Speaker A
पर क्या इनफ था? नहीं। क्योंकि आगे आए केतन पारेक। फिर सत्यम स्कैम, फिर नीरव मोदी जो 14,000 करोड़ लेके भाग गया। मतलब लूप होल्स अभी भी है। सिस्टम अभी भी वीक स्पॉट्स हैं। हर्षद के घर पर आज कोई नहीं
Speaker A
रहता। वो वरली वाला बंगला बैंक ने ले लिया। नीलाम हो गया। लेक्सस गाड़ी वो भी बिक गई। ज्योति मेहता हर्षद की बीवी आज एक छोटी सी जगह पर रहती है। मीडिया से दूर किसी से बात नहीं करती। एक वक्त था जब
Speaker A
हर्षद मेहता का नाम सुनते ही [संगीत] लोग सिर झुका देते थे। आज उसका नाम सुनकर लोग कहते हैं स्कैमर था। पर क्या वही सच [संगीत] है या उसके पीछे एक सिस्टम था जो टूटना चाहिए था। यह सोच के देखना। यह
Speaker A
कहानी सिर्फ हर्षद मेहता की नहीं थी। यह कहानी थी उस लालच [संगीत] की जो इंसान को इतना अंधा कर देता है कि उसे सही गलत का फर्क ही नहीं रहता। यह कहानी थी उस सिस्टम की जो इतना कमजोर था कि एक आदमी ने पूरे
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देश को हिला दिया। और यह कहानी थी उन हजारों छोटे लोगों की जो सपने देख के शेयर मार्केट में आए और सब कुछ खो दिए। इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? पहला सबक जब कोई तुमसे कहे कि मैं तुम्हारा
Speaker A
पैसा 2 महीने में डबल कर दूंगा भाग जाओ वहां से। शेयर मार्केट में गारंटीड रिटर्न्स नहीं होते। जो बोलता है वो या तो बेवकूफ है या चोर। दूसरा सबक जब फाइनेंशियल सिस्टम में फ्रॉड होता है तो [संगीत] ब्लेम सिर्फ एक आदमी को नहीं देना
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चाहिए। सिस्टम को फिक्स करो। बैंक्स के रूल्स, [संगीत] गवर्नमेंट की मॉनिटरिंग, सेबी का काम सबको इंप्रूव करो। तीसरा सबक लालच में कभी अंधे मत बनो। हर्षद ने सोचा था वो सबसे चालाक है। पर अंत में वह भी जेल में मर गया। 47 साल की उम्र में और
Speaker A
दलाल स्ट्रीट की वो दीवारें [संगीत] वो आज भी याद करती होंगी उस आदमी को जो एक वक्त बिग बुल था। और आखिर में सिर्फ एक कैदी बनके रह गया। दोस्तों अगर यह वीडियो पसंद आया हो तो एक लाइक जरूर करो और अगर आप
Speaker A
फाइनेंस की और भी कहानियां सुनना चाहते हो स्कैम्स, बिजनेस वॉर्स, जीनियस मूव्स तो चैनल को सब्सक्राइब कर लो और बेल आइकन दबा दो। हम हर हफ्ते एक नई कहानी लाते हैं। ऐसी कहानियां जो आपको सिखाएं सोचने पर मजबूर करें [संगीत] और थोड़ा एंटरटेन भी
Speaker A
करें। नेक्स्ट वीडियो में बात करेंगे नीरव मोदी की जो 14,000 करोड़ लेके लंदन भाग गया। वह कहानी भी कुछ कम नहीं है। तब तक के लिए अपना पैसा संभाल के रखना और लालच से बचना। [संगीत] मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। टेक केयर।
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