डीमॉननेटाइजेशन के असली सच और ₹15 लाख करोड़ की करेंसी अचानक बंद होने के प्रभावों की पूरी कहानी।
Key Takeaways
- डीमॉननेटाइजेशन का उद्देश्य ब्लैक मनी खत्म करना था, लेकिन अधिकांश नोट वापस आ गए।
- इस नीति ने देश की कैश आधारित अर्थव्यवस्था को भारी झटका दिया।
- गुप्तता और जल्दबाजी के कारण योजना के क्रियान्वयन में कई समस्याएं आईं।
- गरीब और मध्यम वर्ग को सबसे अधिक नुकसान हुआ।
- ब्लैक मनी के खिलाफ कार्रवाई के बजाय कुछ भ्रष्ट लोग नए नोटों का दुरुपयोग कर गए।
What the video covers
- 8 नवंबर 2016 को ₹500 और ₹1000 के नोट अचानक बंद कर दिए गए, जिससे ₹15 लाख करोड़ की करेंसी बेकार हो गई।
- डीमॉननेटाइजेशन का उद्देश्य ब्लैक मनी को पकड़ना था, लेकिन 99.3% नोट्स बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए।
- प्रधानमंत्री मोदी ने यह बड़ा फैसला बेहद गुप्त तरीके से लिया, आरबीआई को केवल 2-3 हफ्ते पहले जानकारी दी गई।
- नए ₹2000 के नोट सीक्रेटली प्रिंट किए गए, जो पुराने एटीएम में फिट नहीं होते थे, जिससे कैश संकट गहरा गया।
- डीमॉननेटाइजेशन के बाद अस्पतालों, किसानों, और आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, और कई मौतें हुईं।
- सरकार ने इसे शॉर्ट टर्म पेन और लॉन्ग टर्म गेन बताया, लेकिन असली फायदा विवादित रहा।
- ब्लैक मनी वाले नए नोटों के जरिए जुगाड़ कर पाए, गरीबों के जनधन खातों का दुरुपयोग हुआ।
- हवाला नेटवर्क, ज्वेलर्स और प्रॉपर्टी डीलर्स ने नए नोटों का इस्तेमाल कर काला धन सफेद किया।
- आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के टर्म खत्म होने के बाद उर्जित पटेल ने डीमॉननेटाइजेशन को संभाला।
- यह भारत की सबसे बड़ी और सबसे रिस्की वित्तीय नीति थी, जिसका प्रभाव आज भी विवादित है।
Full Transcript — Download SRT & Markdown
Speaker A
8 नवंबर 2016 रात के 8:00 बज रहे थे। पूरा देश अपने घर में था। कोई डिनर कर रहा था, कोई टीवी देख रहा था, और कोई अपनी बेटी की शादी की तैयारी में लगा था। तभी टेलीविजन स्क्रीन पर एक चेहरा आया जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का था। उनकी आवाज में वही सीरियसनेस थी जो सिर्फ बड़े फैसले से पहले होती है, और बोले, "आज रात 12:00 बजे से ₹500 और ₹1000 के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे।" एक पल के लिए पूरे देश में खामोशी छा गई। और फिर ₹15 लाख करोड़ की करेंसी जो लोगों के घर में थी, दुकान की कैश ट्रॉस में थी, अलमारी के नीचे छुपाई गई थी, एक झटके में बेकार हो गई। एटीएम के बाहर लाइंस लगने लगी जो किलोमीटर लंबी थी। हॉस्पिटल्स में पेशेंट्स मर रहे थे क्योंकि नए नोट नहीं थे। किसान अपनी फसल नहीं बेच पाए। शादियों की मिठाइयां सूख गईं और सबसे बड़ा सवाल यह सब क्या था? ब्लैक मनी पकड़ने का मास्टर प्लान या इंडिया की इकॉनमी को हिला देने वाली सबसे बड़ी गेंद। दुनिया के सातवें सबसे बड़े इकॉनमी ने एक रात में अपनी 86% करेंसी बंद कर दी। लेकिन जब आरबीआई की रिपोर्ट आई तो उसने सब बदल दिया। 99.3% बंद नोट्स वापस आ गए। मतलब ऑलमोस्ट सारा काला धन वापस आ गया बैंकिंग सिस्टम में लेजिटिमेटली। तो सवाल यह है क्या डीमॉननेटाइजेशन एक्चुअली सक्सेसफुल थी? या यह मॉडर्न इंडिया की सबसे बड़ी पॉलिसी डिजास्टर थी? आज की कहानी में हम जानेंगे पहली बार यह डिसीजन कैसे लिया गया? किसने लिया? कितने लोगों को पता था और असली सच क्या है जो डाटा बोल रहा है। इस कहानी की शुरुआत होती है 2014 से। नरेंद्र दामोदर दास मोदी गुजरात के चीफ मिनिस्टर से प्रधानमंत्री बनने का सफर। जब मोदी पीएम बने तब इंडिया एक बड़े प्रॉब्लम से जूझ रहा था। ब्लैक मनी हर चाय की दुकान पे, हर ड्राइंग रूम में, हर इलेक्शन स्पीच में एक ही बात, काला धन वापस लाओ। मोदी ने अपने इलेक्शन कैंपेन में बोला था बाहर के देशों में इतना ब्लैक मनी है कि अगर वापस लाया जाए तो हर इंडियन के अकाउंट में ₹15 लाख आ जाएंगे। यह फिगर लोगों के दिमाग में बैठ गई थी। ₹15 लाख पर पर्सन फ्री। अब यह होना तो मुश्किल था लेकिन मोदी को पता था कि ब्लैक मनी पर एक्शन तो लेना पड़ेगा। पब्लिक ने प्रॉमिस याद रखा था। 2016 तक मोदी गवर्नमेंट ने कई स्टेप्स लिए। इनकम डिक्लेरेशन स्कीम लाया। टैक्स ट्रीटी साइन किए, स्विस बैंक से इंफॉर्मेशन मांगी। लेकिन कुछ बड़ा चाहिए था। कुछ ऐसा जो दुनिया को हिला दे। कुछ ऐसा जो हिस्ट्री में याद रहे और तभी एक आईडिया आया डीमॉननेटाइजेशन। अब यह आईडिया नया नहीं था। इंडिया में पहले भी दो बार हो चुका था। 1946 में और 1978 में। दोनों बार फेल हुआ था। लेकिन स्केल छोटा था तो कोई ज्यादा याद नहीं करता। 2016 का आईडिया बिल्कुल अलग था। ₹500 और ₹1000 के नोट्स जो इंडिया की टोटल करेंसी का 86% थे, एक रात में बंद करना था। यह दुनिया की सबसे बड़ी डीमॉननेटाइजेशन होने वाली थी और शायद सबसे रिस्की भी। एक सीनियर बीजेपी लीडर ने बाद में बताया, मोदी जी ने कहा था, "या तो यह काम हो जाएगा या मेरी पॉलिटिकल करियर खत्म।" बीच का कोई रास्ता नहीं। लेकिन सवाल यह था इतना बड़ा डिसीजन सीक्रेटली कैसे लिया जाए? आरबीआई को कब बताया जाए? नोट्स कैसे प्रिंट हो? कैसे एनश्योर हो कि न्यूज़ लीक ना हो? क्योंकि अगर एक दिन पहले भी न्यूज़ लीक हो गई तो पूरा प्लान फेल। ब्लैक मनी वाले सब कैश हटा लेंगे और सरकार हाथों में सिर्फ एंबरेसमेंट होगी। इस लेवल की सीक्रेसी इंडिया में पहले कभी नहीं देखी गई थी। और यहां से शुरू होता है असली खेल। एक दिन एग्जैक्ट डेट अभी भी सीक्रेट है। प्रधानमंत्री कार्यालय में एक मीटिंग हुई। बहुत कम लोग थे। सिर्फ चार से पांच ट्रस्टेड ऑफिशियल्स। मोदी ने बोला मैं ₹500 और ₹1000 के नोट्स बंद करना चाहता हूं। रात को बिना किसी वार्निंग के। रूम में साइलेंस छा गई। समझो ऐसे। यह ऐसे था जैसे कोई बोले कि कल से ऑक्सीजन फ्री नहीं मिलेगी। क्योंकि इंडिया कैश बेस्ड इकॉनमी था। 95% ट्रांजैक्शंस कैश में होती थी और जिस करेंसी को बंद करना था वही 86% सर्कुलेशन में थी। ऑफिशियल्स ने कंसर्न्स रेज किए, "सर एटीएम्स में नए नोट्स फिट नहीं होंगे। साइज अलग है। बैंक्स को ट्रेनिंग चाहिए। लॉजिस्टिक्स नाइटमेयर होगा।" मोदी ने कहा कर लो मैनेज। डेडलाइन 8 नवंबर है। अब आरबीआई का रोल आता है। आरबीआई रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जो करेंसी प्रिंट करता है, जो मॉनिटरी पॉलिसी डिसाइड करता है। रघुराम राजन उस वक्त आरबीआई गवर्नर थे। ब्रिलियंट इकोनॉमिस्ट, आईएमएफ में काम कर चुके थे। 2008 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस प्रेडिक्ट करने वाले सिर्फ वही थे। लेकिन सितंबर 2016 में राजन का टेन्योर खत्म हो गया। उन्होंने दूसरा टर्म नहीं लिया। क्यों? ऑफिशियली उन्होंने पर्सनल रीजंस बोला। अनऑफिशियली बहुत सी थ्यरीज हैं। उनकी जगह आए उजीत पटेल। गवर्नमेंट के साथ बिल्कुल कोऑपरेटिव। उर्जित पटेल को डीमॉननेटाइजेशन के बारे में कब बताया गया? आरबीआई की इंटरनल रिकॉर्ड्स के मुताबिक सिर्फ दो से तीन हफ्ते पहले। सोचो इंडिया का सेंट्रल बैंक गवर्नर, जिसको करेंसी पॉलिसी का हेड होना चाहिए, उसे सिर्फ दो से तीन वीक्स मिला इतने बड़े डिसीजन के लिए। एक फॉर्मर आरबीआई ऑफिशियल ने अनोनिमसली बताया यह अनप्रेसिडेंटेड था। आरबीआई को बेसिकली इनफॉर्म किया गया, कंसल्ट नहीं, लेकिन काम शुरू हो गया। नए ₹2000 के नोट्स सीक्रेटली प्रिंट होने लगे। नाशिक और देवास के आरबीआई प्रिंटिंग प्रेस में सिक्योरिटी बढ़ा दी गई। वर्कर्स के फोन्स कॉन्फिसिकेट कर लिए गए। किसी को बाहर जाने नहीं दिया गया। ये ऑपरेशन क्लीन था। इंडिया की सबसे सीक्रेट फाइनेंसियल ऑपरेशन। और इंटरेस्टिंग बात नए ₹2000 के नोट्स का साइज पुराने नोट्स से डिफरेंट था। यानी एक्जिस्टिंग एटीएम मशीनों में फिट नहीं होते। ऑफिशियल्स ने बोला सर 2 लाख एटीएम्स रिकैलिब्रेट करने पड़ेंगे। टाइम लगेगा। जवाब मिला डेडलाइन मूव नहीं होगी। 8 नवंबर फिक्स था। अब शुरू हुआ असली काउंटडाउन। अक्टूबर 2016 नए नोट्स प्रिंटिंग प्रेस से निकलने लगे। आर्मर्ड व्हीकल्स में सीक्रेटली आरबीआई ऑफिसर्स और सेलेक्ट बैंक ब्रांचेस में पहुंचाए गए। लेकिन कितने नोट्स प्रिंट हुए? यहां प्रॉब्लम थी। ₹15 लाख करोड़ की करेंसी रिप्लेस करनी थी। लेकिन प्रिंटिंग प्रॉसेस की कैपेसिटी लिमिटेड थी। एस्टीमेट था कि पूरी करेंसी रिप्लेस करने में 6 से 8 महीने लगेंगे। मतलब अनाउंसमेंट के बाद महीनों तक लोग कैश के लिए तड़पते रहेंगे। किसी ने मोदी को बताया भी होगा यह लेकिन डिसीजन नहीं बदला। नवंबर आ गया। 7 नवंबर एक दिन पहले भी आरबीआई बोर्ड को ऑफिशियल मीटिंग में नहीं बताया गया। 8 नवंबर की सुबह अनाउंसमेंट वाले दिन आरबीआई बोर्ड मीटिंग हुई। सिर्फ कुछ घंटे पहले। एक बोर्ड मेंबर ने बाद में इंटरव्यू में बताया हमें पेपर दिया गया। पढ़ा, साइन करने को बोला गया। डिस्कशन का टाइम नहीं था। हिस्ट्री का सबसे बड़ा मॉनिटरी डिसीजन बिना प्रॉपर डिबेट के सिर्फ कुछ घंटों में पास। शाम 5:00 बजे मोदी ने अपना कैबिनेट मीटिंग बुलाई। मिनिस्टर्स का फोन कॉन्फिसकेट कर लिया गया। 8:15 पर मोदी टीवी पर आए। दुनिया हिल गई। पहले 2 घंटे साइलेंस थी। लोगों को समझ नहीं आया कि हुआ क्या। फिर गेम शुरू हुआ। पेट्रोल पंप्स पर भागमभाग मची। ज्वेलरी शॉप्स पर लाइंस लग गईं। जो भी 500 से ₹1000 के नोट्स एक्सेप्ट कर रहा था लोग वहां पहुंच गए। रात 12:00 बजे ऑफिशियली नोट्स बंद और अगले दिन एटीएम्स खाली। बैंक्स में भीड़। सबको कैश चाहिए थी लेकिन कैश नहीं थी। हॉस्पिटल्स में पेशेंट्स रिजेक्ट होने लगे क्योंकि ₹500 का नोट एक्सेप्ट नहीं हो रहा था। फार्मर्स अपनी फसल मार्केट में नहीं बेच पाए। शादियों का खाना वेस्ट हुआ। डेली वेज वर्कर्स को काम मिला लेकिन पैसा नहीं मिला। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक डीमॉननेटाइजेशन के पहले 3 महीने में 100 प्लस डेथ्स डायरेक्टली लिंक्ड थीं इस पॉलिसी से। कोई एटीएम की लाइन में हार्ट अटैक से मरा। कोई हॉस्पिटल के बाहर कैश ना होने से मरा। कोई टेंशन में सुसाइड कर गया। लेकिन सरकार ने कहा शॉर्ट टर्म पेन, लॉन्ग टर्म गेन। मोदी ने बोला, "मुझे 50 दिन दो।" अगर कुछ गलत हुआ तो मुझे जो सजा देना हो दे देना। 50 दिन का डेडलाइन भी आ गया और गया। प्रॉब्लम्स कंटिन्यू रही लेकिन एक और चीज हो रही थी साइमलटेनियसली। ₹2000 के नए पिंक नोट्स सर्कुलेशन में आए और अचानक इंस्टाग्राम पर फोटो आने लगे। पॉलिटिशियंस के घर रेड्स में करोड़ के नए ₹2000 के नोट्स पकड़े गए। हवाला ऑपरेटर्स नए नोट्स के बंडल्स ले जाते दिखे। टेंपल्स के डोनेशन बॉक्सेस में नए नोट्स मिल गए। सवाल सिंपल था, अगर पुराने नोट्स बंद हुए थे ब्लैक मनी निकालने के लिए, तो यह नया ब्लैक मनी कहां से आया? आंसर अनकंफर्टेबल था। करप्ट लोगों ने जुगाड़ निकाल लिया था। कैसे? समझो जनधन अकाउंट्स यूज हुए। यह जीरो बैलेंस अकाउंट्स थे, जो गरीब लोगों के नाम पर खुले थे। ब्लैक मनी वालों ने गरीब लोगों को अप्रोच किया। बोला अपने अकाउंट में मेरा ₹ लाख डिपॉजिट करा दो वापस देना। कमीशन ₹10,000। हजारों लोगों ने यह किया। उनके लिए ₹10,000 बहुत बड़े पैसे थे। ऑफिशियली पैसा वाइट हो गया। गरीब के नाम पर डिपॉजिट फिर वापस कैश में निकाल लिया। ज्वेलर्स ने गोल्ड बेचा पुराने नोट्स में। फिर उस गोल्ड को वापस खरीद लिया नए नोट्स में। ब्लैक टू वाइट। प्रॉपर्टी डीलर्स ने बेनामी ट्रांजैक्शंस किए। हवाला नेटवर्क्स ने न्यू नोट्स अरेंज कर दिए प्रीमियम में। कमीशन 20 से 30% तक गई। लेकिन ब्लैक मनी वालों के लिए यह एक्सेप्टेब...
Speaker A
मिनिस्टर नरेंद्र मोदी का था। उनकी आवाज में वही सीरियसनेस थी जो सिर्फ बड़े फैसले से पहले होती है और बोलते हैं आज रात 12:00 बजे से ₹500 और ₹1000 के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे। एक पल के लिए पूरे देश
Speaker A
में खामोशी छा गई। और फिर ₹15 लाख करोड़ की करेंसी जो लोगों के घर में थी, दुकान की कैश ट्रॉस में थी, अलमारी के नीचे छुपाई गई थी, एक झटके [संगीत] में बेकार हो गई। एटीएम के बाहर लाइंस लगने लगी जो
Speaker A
किलोमीटर लंबी थी। हॉस्पिटल्स में पेशेंट्स मर रहे थे क्योंकि नए नोट नहीं थे। किसान अपनी फसल नहीं बेच पाए। शादियों की मिठाइयां सूख गई और सबसे बड़ा सवाल यह सब क्या था? ब्लैक मनी पकड़ने का मास्टर प्लान या इंडिया की इकॉनमी को हिला देने
Speaker A
वाली सबसे बड़ी गेंद। दुनिया के सातवें सबसे बड़े इकॉनमी ने एक रात में अपनी 86% करेंसी बंद कर दी। लेकिन जब आरबीआई की रिपोर्ट आई तो उसने सब बदल दिया। 99.3% बैंड नोट्स वापस आ गए। मतलब ऑलमोस्ट सारा
Speaker A
काला धन वापस आ गया बैंकिंग सिस्टम में लेजिटमेटली। तो सवाल यह है क्या डीमॉननेटाइजेशन एक्चुअली सक्सेसफुल थी? या यह मॉडर्न इंडिया की सबसे बड़ी पॉलिसी डिजास्टर थी? आज की कहानी में हम जानेंगे पहली बार यह डिसीजन कैसे लिया गया? किसने
Speaker A
लिया? कितने लोगों को पता [संगीत] था और असली सच क्या है जो डाटा बोल रहा है। इस कहानी की शुरुआत होती है 2014 से। नरेंद्र दामोदर दास मोदी गुजरात के चीफ मिनिस्टर से प्राइम मिनिस्टर बनने का सफर। जब मोदी
Speaker A
पीएम बने तब इंडिया एक बड़े प्रॉब्लम से जूझ रहा था। ब्लैक मनी हर चाय की दुकान पे हर ड्राइंग रूम में हर इलेक्शन स्पीच में एक ही बात काला धन वापस लाओ। मोदी ने अपने इलेक्शन कैंपेन में बोला था बाहर के देशों
Speaker A
में इतना ब्लैक मनी है कि अगर वापस लाया जाए तो हर इंडियन के अकाउंट में ₹15 लाख आ जाएंगे। यह फिगर लोगों के दिमाग में बैठ गई थी। ₹15 लाख पर पर्सन फ्री। अब यह होना तो मुश्किल था लेकिन मोदी को पता था कि
Speaker A
ब्लैक मनी पर एक्शन तो लेना पड़ेगा। पब्लिक ने प्रॉमिस [संगीत] याद रखा था। 2016 तक मोदी गवर्नमेंट ने कई स्टेप्स लिए। इनकम डिक्लेरेशन स्कीम लाया। टैक्स ट्रीटी साइन किए, स्विस बैंक से इंफॉर्मेशन मांगी। लेकिन कुछ बड़ा चाहिए था। कुछ ऐसा जो दुनिया को हिला दे। कुछ
Speaker A
ऐसा जो हिस्ट्री में याद रहे और तभी एक आईडिया आया डीमोनेटाइजेशन। अब यह आईडिया नया नहीं था। इंडिया में पहले भी दो बार हो चुका था। 1946 में और 1978 में। दोनों बार फेल हुआ था। लेकिन स्केल छोटा था तो
Speaker A
कोई ज्यादा याद नहीं करता। 2016 का आईडिया बिल्कुल अलग था। ₹500 और ₹1000 के नोट्स जो इंडिया की टोटल करेंसी का 86% थे, एक रात में बंद करना था। यह दुनिया की सबसे बड़ी डीमॉननेटाइजेशन होने वाली थी और शायद
Speaker A
सबसे रिस्की भी। एक सीनियर बीजेपी लीडर ने बाद में बताया, मोदी जी ने कहा था, या तो यह काम हो जाएगा या मेरी पॉलिटिकल करियर खत्म। बीच का कोई रास्ता नहीं। लेकिन सवाल यह था इतना बड़ा डिसीजन सीक्रेटली कैसे
Speaker A
लिया जाए? आरबीआई को कब बताया जाए? नोट्स कैसे प्रिंट हो? कैसे एनश्योर हो [संगीत] कि न्यूज़ लीक ना हो? क्योंकि अगर एक दिन पहले भी न्यूज़ लीक हो गई तो पूरा प्लान फेल। ब्लैक मनी वाले सब कैश हटा लेंगे और
Speaker A
सरकार हाथों में सिर्फ एंबरेसमेंट होगी। इस लेवल की सीक्रेसी इंडिया में पहले कभी नहीं देखी गई थी। और यहां से शुरू होता है असली खेल। एक दिन एग्जैक्ट डेट अभी भी सीक्रेट है। प्राइम मिनिस्टरर्स ऑफिस में एक मीटिंग हुई। बहुत कम लोग थे। सिर्फ चार
Speaker A
से पांच ट्रस्टेड ऑफिशियल्स। मोदी ने बोला मैं ₹500 और ₹1000 के नोट्स बंद करना चाहता हूं। रात को बिना किसी वार्निंग के। रूम में साइलेंस छा गई। समझो ऐसे। यह ऐसे था जैसे कोई बोले कि कल से ऑक्सीजन फ्री
Speaker A
नहीं मिलेगी। क्योंकि इंडिया कैश बेस्ड इकॉनमी था। 95% ट्रांजैक्शंस कैश में होती थी और जिस करेंसी को बंद करना था वही 86% सर्कुलेशन में थी। ऑफिशियल्स ने कंसर्न्स रेज किए सर एटीएम्स में नए नोट्स फिट नहीं होंगे। साइज अलग है। बैंक्स को ट्रेनिंग
Speaker A
चाहिए। लॉजिस्टिक्स नाइट मेयर होगा। मोदी ने कहा कर लो मैनेज। डेडलाइन 8 नवंबर है। अब आरबीआई का रोल आता है। आरबीआई रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जो करेंसी प्रिंट करता है जो मॉनिटरी पॉलिसी डिसाइड करता है। रघुराम राजन उस वक्त आरबीआई गवर्नर थे। ब्रिलियंट
Speaker A
इकोनॉमिस्ट आईएमएफ में काम कर चुके थे। 2008 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस प्रेडिक्ट करने वाले सिर्फ वही थे। लेकिन सितंबर 2016 में राजन का टेन्योर खत्म हो गया। उन्होंने दूसरा टर्म नहीं लिया। क्यों? ऑफिशियली उन्होंने पर्सनल रीजंस बोला। अनऑफिशियली बहुत सी थ्यरीज हैं।
Speaker A
उनकी जगह आए उजीत पटेल। गवर्नमेंट के साथ बिल्कुल कोऑपरेटिव। उर्जित पटेल को डीमोनेटाइजेशन के बारे में कब बताया गया?
Speaker A
आरबीआई की इंटरनल रिकॉर्ड्स के मुताबिक सिर्फ दो से तीन हफ्ते पहले। सोचो इंडिया का सेंट्रल बैंक गवर्नर जिसको करेंसी पॉलिसी का हेड होना चाहिए। उसे सिर्फ दो से तीन वीक्स मिला इतने बड़े डिसीजन के लिए। एक फॉर्मर आरबीआई ऑफिशियल ने
Speaker A
अनोनिमसली बताया यह अनप्रेसिडेंटेड था। आरबीआई को बेसिकली इनफॉर्म किया गया कंसल्ट नहीं लेकिन काम शुरू हो गया। नए ₹2000 के नोट्स सीक्रेटली प्रिंट होने लगे। नाशिक और देवास के आरबीआई प्रिंटिंग प्रेस में सिक्योरिटी बढ़ा दी गई। वर्कर्स के फोंस कॉन्फिसिकेट कर लिए गए। किसी को
Speaker A
बाहर जाने नहीं दिया गया। ये ऑपरेशन क्लीन था। इंडिया की सबसे सीक्रेट फाइनेंसियल ऑपरेशन। और इंटरेस्टिंग बात नए ₹2000 के नोट्स का साइज पुराने नोट्स से डिफरेंट था। यानी एकिस्टिंग एटीएम मशीनंस में फिट नहीं होते। ऑफिशियल्स ने बोला सर 2 लाख
Speaker A
एटीएम्स रिकैलिब्रेट करने पड़ेंगे। टाइम लगेगा। जवाब मिला डेडलाइन मूव नहीं होगी। 8 नवंबर फिक्स था। अब शुरू हुआ असली काउंटडाउन। अक्टूबर 2016 नए नोट्स प्रिंटिंग प्रेस से निकलने लगे। आर्मर्ड व्हीकल्स में सीक्रेटली आरबीआई ऑफिसिसेस और सेलेक्ट बैंक ब्रांचेस में पहुंचाए गए।
Speaker A
लेकिन कितने नोट्स प्रिंट हुए? यहां प्रॉब्लम थी। ₹15 लाख करोड़ की करेंसी रिप्लेस करनी थी। लेकिन प्रिंटिंग प्रेसेस की कैपेसिटी लिमिटेड थी। एस्टीमेट था कि पूरी करेंसी रिप्लेस करने में 6 से 8 महीने लगेंगे। मतलब अनाउंसमेंट के बाद
Speaker A
मंथ्स तक लोग कैश के लिए तड़पते रहेंगे। किसी ने मोदी को बताया भी होगा यह लेकिन डिसीजन नहीं बदला। नवंबर आ गया। 7 नवंबर एक दिन पहले भी आरबीआई बोर्ड को ऑफिशियल मीटिंग में नहीं बताया गया। 8 नवंबर की
Speaker A
सुबह अनाउंसमेंट वाले दिन आरबीआई बोर्ड मीटिंग हुई। सिर्फ कुछ घंटे पहले। एक बोर्ड मेंबर ने बाद में इंटरव्यू में बताया हमें पेपर दिया गया। पढ़ा, साइन करने को बोला गया। डिस्कशन का टाइम नहीं था। हिस्ट्री का सबसे बड़ा मॉनिटरी डिसीजन
Speaker A
बिना प्रॉपर डिबेट के सिर्फ कुछ घंटों में पास। शाम 5:00 बजे मोदी ने अपना कैबिनेट मीटिंग बुलाई। मिनिस्टर्स का फोन कॉन्फिसकेट कर लिया गया। 8:15 पे मोदी टीवी पे आए। दुनिया हिल गई। पहले 2 घंटे साइलेंस थी। लोगों को समझ नहीं आया कि हुआ
Speaker A
क्या। फिर गेम शुरू हुआ। पेट्रोल पंप्स पे भागमभाग मची। ज्वेलरी शॉप्स पे लाइंस लग गई। जो भी 500 से ₹1000 के नोट्स एक्सेप्ट कर रहा था लोग वहां पहुंच गए। रात 12:00 बजे ऑफिशियली नोट्स बंद और अगले दिन
Speaker A
एटीएम्स खाली। बैंक्स में भीड़। सबको कैश चाहिए थी लेकिन कैश नहीं थी। हॉस्पिटल्स में पेशेंट्स रिजेक्ट होने लगे क्योंकि ₹500 का नोट एक्सेप्ट नहीं हो रहा था। फार्मर्स अपनी फसल मार्केट में नहीं बेच पाए। शादियों का खाना वेस्ट हुआ। डेली वेज
Speaker A
वर्कर्स को काम मिला लेकिन पैसा नहीं मिला। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक डीमैननेटाइजेशन के पहले 3 महीने में 100 प्लस डेथ्स डायरेक्टली लिंक्ड थी इस पॉलिसी से। कोई एटीएम की लाइन में हार्ट अटैक से मरा। कोई हॉस्पिटल के बाहर कैश ना
Speaker A
होने से मरा। कोई टेंशन में सुसाइड कर गया। लेकिन सरकार ने कहा शॉर्ट टर्म पेन, लॉन्ग टर्म गेन। मोदी ने बोला, "मुझे 50 दिन दो।" अगर कुछ गलत हुआ तो मुझे जो सजा देना हो दे देना। 50 दिन का डेडलाइन भी आ
Speaker A
गया और गया। प्रॉब्लम्स कंटिन्यू रही लेकिन एक और चीज हो रही थी साइमलटेनियसली। ₹2000 के नए पिंक नोट्स सर्कुलेशन में आए और अचानक Instagram पे फोटो आने लगे। पॉलिटिशियंस के घर रेड्स में करोड़ के नए ₹2000 के नोट्स पकड़े गए। हवाला ऑपरेटर्स
Speaker A
नए नोट्स के बंडल्स ले जाते दिखे। टेंपल्स के डोनेशन बॉक्सेस में नए नोट्स मिल गए। सवाल सिंपल था, अगर पुराने नोट्स बंद हुए थे ब्लैक मनी [संगीत] निकालने के लिए, तो यह नया ब्लैक मनी कहां से आया? आंसर
Speaker A
अनकंफर्टेबल था। करप्ट लोगों ने जुगाड़ निकाल लिया था। कैसे? समझो जनधन अकाउंट्स यूज हुए। यह जीरो बैलेंस अकाउंट्स थे, जो गरीब लोगों के नाम पर खुले थे। ब्लैक मनी वालों ने गरीब लोगों को अप्रोच किया। बोला अपने अकाउंट में मेरा ₹ लाख डिपॉजिट करा
Speaker A
दो वापस देना। कमीशन ₹10,000 हजारों लोगों ने यह किया। उनके लिए ₹10,000 बहुत बड़े पैसे थे। ऑफिशियली पैसा वाइट हो गया। गरीब के नाम पर डिपॉजिट फिर वापस कैश में निकाल लिया। ज्वेलर्स ने गोल्ड बेचा पुराने नोट्स में। फिर उस गोल्ड को वापस खरीद
Speaker A
लिया नए नोट्स में। ब्लैक टू वाइट। प्रॉपर्टी डीलर्स ने बेनामी ट्रांजैक्शंस किए। हवाला नेटवर्क्स ने न्यू नोट्स अरेंज कर दिए प्रीमियम में। कमीशन 20 से 30% तक गई। लेकिन ब्लैक मनी वालों के लिए यह एक्सेप्टेबल था। ₹100 करोड़ का 70 करोड़
Speaker A
बच गया तो भी प्रॉफिट था। एक इनकम टैक्स ऑफिसर ने अनोनिमसली बताया। हमने देखा कि विदिन दो वीक्स सिस्टम अडप्ट हो गया था। जो लोग सीरियसली करप्ट थे उनके पास रिसोर्सेज थे एस्केप करने के। और जो आम आदमी था वो लाइन में खड़ा था। वो अपनी
Speaker A
₹10,000 की सेविंग्स के लिए 4 से 5 घंटे एटीएम के बाहर वेट कर रहा था। उसकी बेटी की शादी पोस्टपोन हो गई। उसके बिजनेस का कैश फ्लो रुक गया लेकिन उसने वेट किया क्योंकि मोदी ने बोला था देश के लिए
Speaker A
करेंगे। उसी पेट्रियोटिज्म ने देश को चुप करवा दिया। 50 दिन गुजर गए, 100 दिन गुजर गए, साल बीत गया और फिर आई आरबीआई की फाइनल रिपोर्ट जो सब बदलने वाली थी थी अगस्त 2018। आरबीआई ने अपनी एनुअल रिपोर्ट
Speaker A
रिलीज की। उसमें एक नंबर था जो सबको शॉक्ड कर गया। 15.31 लाख करोड़ की बैंड करेंसी में से 15.28 लाख करोड़ वापस आ गए। ₹9.3% रुको। फिर से समझो। डीमोनेटाइजेशन का मेन पॉइंट था ब्लैक मनी डिस्ट्रॉय करना। करेंसी बंद करो तो ब्लैक मनी वाले अपना
Speaker A
कैश बैंक में डिपॉजिट नहीं कर पाएंगे क्योंकि उन्हें इनकम सोर्स प्रूफ करना पड़ेगा। लेकिन 99.3% वापस आ गई। मतलब या तो इंडिया में ब्लैक मनी थी ही नहीं या फिर ब्लैक मनी वालों ने सिस्टम बीट कर लिया। दोनों में से जो भी
Speaker A
हो डीमोनेटाइजेशन का कोर ऑब्जेक्टिव फेल हुआ। ऑपोजिशन ने बोला वी टोल्ड यू सो एक्सपीएम मनमोहन सिंह जो खुद इकोनॉमिस्ट है ने पार्लियामेंट में बोला था ये ऑर्गनाइज्ड लूट है लीगलाइज्ड प्लंडर है। रघुराम राजन ने एक इंटरव्यू में कहा
Speaker A
डीममोनेटाइजेशन के लॉन्ग टर्म कॉस्ट्स बेनिफिट से ज्यादा है। इंडिपेंडेंट इकोनॉमिस्ट्स ने एस्टीिमेट किया कि जीडीपी ग्रोथ एक से 2% स्लो हुई। स्मॉल बिजनेसेस स्पेशली इनफॉर्मल सेक्टर डेवस्टेटेड हो गया। मिलियंस ऑफ जॉब्स लॉस्ट। लेकिन गवर्नमेंट का स्टांस डिफरेंट था। उन्होंने
Speaker A
बोला ब्लैक मनी डिस्ट्रॉय करना सिर्फ एक ऑब्जेक्टिव था। एक्चुअल गोल्स थे डिजिटल पेमेंट्स बढ़ाना, टैक्स बेस बढ़ाना, काउंटरफाइड करेंसी खत्म करना, टेरर फंडिंग रोकना। फेयर पॉइंट थी क्या यह? देखते हैं डाटा क्या बोलता है। डिजिटल पेमेंट्स हां, बढ़े। यूपीआई ट्रांजैक्शंस 2016 में
Speaker A
ऑलमोस्ट जीरो थे। आज मंथली 15 प्लस लाख करोड़ है। लेकिन एक्सपर्ट्स कहते हैं यह ट्रेंड वैसे भी होता। Jio और स्मार्टफोनस की वजह से टैक्स बेस इनकम टैक्स रिटर्न्स फाइल करने वालों की संख्या बढ़ी। 2016 में 4.36 करोड़ थे। 2019 में 6.78 करोड़।
Speaker A
लेकिन एक्चुअल टैक्स कलेक्शन में ड्रामेटिक इनक्रीस नहीं हुआ। काउंटर फीट करेंसी। ₹400 करोड़ की फेक करेंसी थी सर्कुलेशन। ₹15 लाख करोड़ की इकॉनमी डिसररप्ट की ₹400 करोड़ के लिए। टेरर फंडिंग स्टोन पेल्टिंग कश्मीर में टेंपरेरीली रुकी फिर वापस शुरू हो गई। तो
Speaker A
फाइनल वर्डिक क्या है? यह वो सवाल है जो आज भी डिवाइड करता है इंडियंस को। कुछ कहते हैं मोदी ने बोल्ड डिसीजन लिया। करप्शन के खिलाफ मैसेज गया। लॉन्ग टर्म में डिजिटल इंडिया बना। कुछ कहते हैं यह पॉलिसी डिजास्टर थी। 100 प्लस लोग मरे।
Speaker A
इकॉनमी स्लो हुई। ब्लैक मनी वापस आ गई। कुछ अचीव नहीं हुआ। सच शायद बीच में है। इंटेंट शायद सही था। एग्जीक्यूशन डेफिनेटली प्रॉब्लमैटिक था और जो प्राइस पे किया कॉमन मैन ने किया। ब्लैक मनी वाले तो बच गए। हजारों कहानियां है जो ऑफिशियल
Speaker A
रिपोर्ट्स में नहीं आती। महाराष्ट्र के यवतमल में एक फार्मर बपूराव तजने ने ₹60,000 की कॉटन बेच के ₹500 के नोट्स लिए थे। डीमॉननेटाइजेशन [संगीत] के बाद वो नोट्स बेकार हो गए। बैंक्स में लाइन में खड़े होने की हिम्मत नहीं थी। 2
Speaker A
हफ्ते बाद उसने सुई कर लिया। चेन्नई में एक 72 साल की विडो अपनी पूरी सेविंग्स 1.5 लाख ओल्ड नोट्स में रखती थी। बैंक अकाउंट नहीं था। डेडलाइन में एक्सचेंज नहीं करवा पाई। पैसा डूब गया। दिल्ली के सरोजनी नगर
Speaker A
में एक स्मॉल शॉपकीपर ने अपनी दुकान बंद कर दी। कैश फ्लो रुक गया था। लोन नहीं मिला। बिजनेस वापस खड़ा नहीं हुआ। यह वो लोग हैं जिनके लिए ₹500 का नोट लाइफ और डेथ का फर्द था। यह वो लोग हैं जिन्हें
Speaker A
शॉर्ट टर्म पेन झेला लेकिन लॉन्ग टर्म गेन कभी नहीं मिला। और दूसरी तरफ उर्जित पटेल 2018 में आरबीआई गवर्नर का पोस्ट छोड़ के चले गए। पर्सनल रीज़ंस। उन्होंने कभी अपना व्यू नहीं दिया। रघुराम राजन अमेरिका वापस चले गए। शिकागो यूनिवर्सिटी में पढ़ाते
Speaker A
हैं। कभी-कभी टीवी पर डीमोनेटाइजेशन की क्रिटिसिज्म करते हैं। मोदी 2019 में फिर से पीएम बने मैसिव मेजॉरिटी से। डीमनेटाइजेशन इलेक्शन इशू नहीं बनी। लोगों ने माफ कर दिया या भूल गए या फिर जेनुइनली सपोर्ट किया। सुप्रीम कोर्ट में केस गया।
Speaker A
क्या डीममनेटाइजेशन कॉन्स्टिट्यूशनल थी? 2023 में वर्डिक्ट आया। चार को एक मेजॉरिटी [संगीत] से गवर्नमेंट जीत गई। लेकिन डिसेंडिंग जज जस्टिस बी वी नगरत्ना ने लिखा प्रोसेस फ्लॉट था। आरबीआई इंडिपेंडेंट बॉडी है। इसको रबर स्टैंप नहीं बनाना चाहिए था। यह एक जज की राय थी।
Speaker A
लेकिन बहुत लोगों की फीलिंग्स रिप्रेजेंट करती थी। तो इस कहानी से हम क्या सीखें?
Speaker A
यह कहानी सिर्फ डीममोनेटाइजेशन की नहीं है। यह कहानी है इस बात की कि एक गवर्नमेंट का एक डिसीजन लिटरली एक रात में तुम्हारी जिंदगी बदल सकता है। तुम्हारी सेविंग्स जो तुमने 20 साल में जमा की थी, एक अनाउंसमेंट से खत्म हो सकती है।
Speaker A
तुम्हारा बिजनेस जो तुमने खून पसीने से खड़ा किया एक पॉलिसी से बंद हो सकता है और तुम कुछ नहीं कर सकते। इसलिए एक चीज याद रखना कैश पर डिपेंडेंट मत रहो। अपना पैसा डायवर्सिफाई करो। बैंक में रखो लेकिन
Speaker A
सिर्फ बैंक पर डिपेंड मत रहो। डिजिटल पेमेंट सीखो लेकिन सिर्फ डिजिटल पे भी मत रहो। गोल्ड रखो, प्रॉपर्टी समझो, स्टॉक [संगीत] सीखो, एफडी करो। क्योंकि कल अगर सरकार कुछ और अनाउंस कर दे, तुम्हें रेडी रहना चाहिए। हर्षद मेहता स्कैम के बाद
Speaker A
सेबी स्ट्रांग हुआ। 2008 क्रैश के बाद बैंकिंग रूल्स बदल गए। डीनोटिफिकेशन के बाद डिजिटल पेमेंट्स मैंडेटरी होने लगे। हर क्राइसिस के बाद सिस्टम बदलता है। जो लोग अडप्ट करते हैं वो सर्वाइव करते हैं। जो नहीं करते वो यवतमल के बापूराव बन जाते
Speaker A
हैं। और शायद यही डीमोनेटाइजेशन का सबसे बड़ा सबक है। गवर्नमेंट राइट हो या रॉन्ग तुम्हें अपना पैसा खुद संभालना आता होना चाहिए। कोई नहीं आएगा तुम्हें बचाने। दोस्तों अगर यह वीडियो पसंद आया हो तो एक लाइक जरूर करो। यह चैनल फाइनेंसियल
Speaker A
स्टोरीज लाता है। स्कैम्स, क्रैशेस, जीनियस मूव्स सब कुछ। सब्सक्राइब करो ताकि हर हफ्ते यह कहानियां तुम्हारे फील्ड में आए। कमेंट में बताओ तुम्हें क्या लगता है?
Speaker A
[संगीत] डीमोनेटाइजेशन सही थी या गलत। डाटा क्या बोलता है वह तो मैंने बता दिया। अब तुम्हारी राय सुननी है। तब तक के लिए अपना ख्याल रखना। ओम
Topics:डीमॉननेटाइजेशनब्लैक मनीनरेंद्र मोदी₹15 लाख करोड़₹500 और ₹1000 नोट बंदभारतीय अर्थव्यवस्थाआरबीआईनए ₹2000 नोटकैश संकटजनधन योजना











