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जेरूसलम का सम्पूर्ण इतिहास।The Entire History of Jerusalem | Full Documentary

यरूशलेम का 5000 सालों का इतिहास, धार्मिक संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत का विस्तृत दस्तावेज।

Key Takeaways

  • यरूशलेम धार्मिक आस्था और संघर्ष का केंद्र रहा है।
  • शहर ने कई साम्राज्यों के अधीन होकर अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाई।
  • यहूदी, ईसाई और मुस्लिम धर्मों के लिए यह पवित्र स्थल है।
  • इतिहास में कई बार युद्ध और पुनर्निर्माण के दौर देखे गए।
  • धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों ने शहर की वर्तमान स्थिति को आकार दिया।

What the video covers

  • यरूशलेम का इतिहास 5000 साल पुराना है, जो कई सभ्यताओं और धर्मों का केंद्र रहा है।
  • शहर ने कई बार कब्जा बदला, उजाड़ा गया और पुनर्निर्माण हुआ।
  • राजा डेविड और राजा सुलेमान के समय यहूदी साम्राज्य की राजधानी बनी।
  • सोलोमन के मंदिर का निर्माण हुआ जो यहूदी धर्म का पवित्र केंद्र था।
  • बेबिलोन के नबूक दनेजर द्वितीय ने यरूशलेम पर हमला कर मंदिर को ध्वस्त किया।
  • साइरस द ग्रेट ने यहूदियों को वापस लौटने और मंदिर पुनर्निर्माण की अनुमति दी।
  • सिकंदर महान के बाद यूनानी और रोमन शासन के अधीन आया।
  • मक्काबी बगावत ने यहूदी रीति-रिवाजों की रक्षा की।
  • रोमन साम्राज्य के अधीन यरूशलेम में ईसाई धर्म का उदय हुआ।
  • रोमन सेना ने 70 ईस्वी में शहर और मंदिर को तबाह कर दिया, जिससे यहूदी विस्थापन हुआ।

Answers

Questions about this video

यरूशलेम का इतिहास कब शुरू हुआ?

यरूशलेम का इतिहास लगभग 5000 साल पहले ईसा पूर्व 3000 में शुरू हुआ था, जब यह गिहोन नाम के पानी के झरने के पास एक छोटा ठिकाना था।

सोलोमन का मंदिर क्यों महत्वपूर्ण है?

सोलोमन का मंदिर यहूदी धर्म का सबसे बड़ा और पवित्र केंद्र था, जिसे राजा सुलेमान ने बनाया था। यह मंदिर सोने और बेशकीमती पत्थरों से चमकता था।

रोमन साम्राज्य ने यरूशलेम पर क्या प्रभाव डाला?

रोमन साम्राज्य ने यरूशलेम को अपने अधीन कर लिया, ईसा मसीह के जीवन के बाद ईसाई धर्म का उदय हुआ, और 70 ईस्वी में रोमन सेना ने शहर और दूसरे यहूदी मंदिर को तबाह कर दिया।

Full Transcript — Download SRT & Markdown

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Speaker A
एक ऐसी जगह जिसके लिए इंसान पिछले 5000 सालों से एक दूसरे का खून बहा रहा है। जहां की मिट्टी में इतिहास की सबसे बड़ी सभ्यताओं के कंकाल दफन हैं और जिसे आज भी दुनिया का सबसे पवित्र लेकिन सबसे खतरनाक
00:15
Speaker A
शहर माना जाता है। सोचो जरा सूखी चट्टानों के बीच बहने वाला एक छोटा सा पानी का झरना कैसे दुनिया के तीन सबसे बड़े धर्मों की साख और सदियों पुरानी जंग का अखाड़ा बन गया। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटे तो
00:28
Speaker A
यरूशलेम की कहानी किसी चमत्कार और डरावने ख्वाब के बीच झूलती नजर आती है। यह एक ऐसे शहर की दास्तान है जो पिछले 5000 सालों में 40 से भी ज्यादा बार एक हाथ से दूसरे हाथ गया, उजाड़ा गया और फिर अपनी ही राख
00:42
Speaker A
से उठ खड़ा हुआ। इस अंतहीन सिलसिले की शुरुआत आज से करीब 5000 साल पहले ईसा पूर्व 3000 में हुई थी। उस वक्त यह कोई आलीशान शहर नहीं था। बल्कि गिहोन नाम के एक पानी के झरने के पास बसा एक छोटा सा
00:56
Speaker A
ठिकाना था। इस तपते और सूखे इलाके में पानी का होना किसी वरदान से कम नहीं था। इसलिए लोग यहां खींचे चले आए। समय बीता और ईसा पूर्व 2000 के आसपास मिस्र के प्राचीन दस्तावेजों में पहली बार इस जगह का नाम
01:10
Speaker A
मिलता है। रुशालीमा। उस दौर में यहां कनानी नाम के लोग रहा करते थे। उन्होंने इस कीमती पानी के स्रोत को बाहरी दुनिया से बचाने के लिए इसके चारों तरफ पत्थर की एक विशाल और ऊंची दीवार खड़ी कर दी थी।
01:23
Speaker A
लेकिन इस दीवार के भीतर जो पानी बह रहा था वो आने वाले समय में पानी नहीं बल्कि बारूद बनने वाला था। समय का पहिया घूमा और ईसा पूर्व 1500 के आसपास यह इलाका मिस्र के नए साम्राज्य के अधीन आ गया। सब कुछ
01:38
Speaker A
ठीक चल रहा था। लेकिन ईसा पूर्व 12वीं सदी में इतिहास की एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया जिसे इतिहासकार कांस्य युग का पतन कहते हैं। देखते ही देखते भूमध्य सागर के आसपास के बड़े-बड़े साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
01:54
Speaker A
चारों तरफ हिंसा और अराजकता का माहौल था और इसी मलवे में से जन्म हुआ कुछ छोटे और आजाद राज्यों का जिनमें से एक थे इजराइली लोग। पुरानी मान्यताओं के अनुसार ईसा पूर्व 1000 के आसपास राजा डेविड के नेतृत्व में इन लोगों ने यरूशलेम पर अपना
02:10
Speaker A
अधिकार कर लिया और इसे अपनी राज्य की राजधानी बनाया। राजा डेविड के बाद उनके बेटे राजा सुलेमान यानी कि किंग सुलमन ने इस शहर की तकदीर बदल दी। उन्होंने यरूशलेम के भीतर एक बेहद भव्य और आलीशान मंदिर का
02:23
Speaker A
निर्माण कराया जिसे आज सोलोमन का मंदिर कहा जाता है। सोने और बेशकीमती पत्थरों से चमकता यह मंदिर यहूदी धर्म का सबसे बड़ा और पवित्र केंद्र बन गया। लेकिन सुख के दिन ज्यादा दिन नहीं टिकते। एक सदी के भीतर ही यह साम्राज्य दो हिस्सों में बट
02:39
Speaker A
गया। उत्तरी हिस्सा इजराइल कहलाया और दक्षिणी हिस्सा बना यहूदा जिसकी राजधानी यरूशलेम ही रही। अगले 400 सालों तक यह शहर यहूदी संस्कृति का दिल बना रहा। लेकिन मिस्र और असीरिया जैसे शक्तिशाली पड़ोसी साम्राज्य इस सोने की चिड़िया पर लगातार
02:56
Speaker A
हमला करते रहे। और फिर आई ईसा पूर्व छठी सदी। जब यरूशलेम ने अपने इतिहास का सबसे भयानक मंजर देखा। असीरिया के बाद इस इलाके में बाबुल यानी कि बेबिलोन साम्राज्य का उदय हुआ। जिसके राजा थे नबूक दनेजर द्वितीय। उसने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए
03:13
Speaker A
ईसा पूर्व 597 में यरूशलम को चारों तरफ से घेर लिया। शहर के लोगों ने कड़ा मुकाबला किया। लेकिन 10 साल बाद ईसा पूर्व 587 में नबूक दनेजर की सेना ने शहर पर दोबारा ऐसा खूनी हमला बोला जिसने सब कुछ तहस-नहस कर
03:30
Speaker A
दिया। सोचो जरा वो मंजर कितना खौफनाक रहा होगा। रात के अंधेरे में आसमान आग की लपटों से लाल हो चुका था। राजा सुलेमान का वो पवित्र मंदिर जो यहूदियों की जान था उसे बेरहमी से ढहा दिया गया। सैनिकों ने
03:44
Speaker A
मासूमों का कत्लेआम किया और जो बच गए उन्हें बेड़ियों में जकड़ कर पूर्व की तरफ बेबिलोन की जेलों में सड़ने के लिए भेज दिया गया। यरूशलेम अब एक उजाड़ कब्रिस्तान बन चुका था। जहां सिर्फ चीखें और सन्नाटा बचा हुआ था। लगभग 40 सालों तक यह शहर इसी
04:00
Speaker A
तरह बेजान पड़ा रहा। लेकिन तभी पूर्व से एक और महाशक्ति उठी। हखामनी साम्राज्य जिसके राजा थे साइरस द ग्रेट। साइरस ने बेबिलोन को हरा दिया और एक दरियादिल राजा की तरह यहूदियों को वापस अपने वतन यरूशलेम जाने और अपना मंदिर दोबारा बनाने की इजाजत
04:16
Speaker A
दे दी। आने वाले 200 सालों में यहूदी वापस लौटे। शहर फिर से गुलजार हुआ। लेकिन अफसोस वो अब भी इस शहर के मालिक नहीं थे। तारीख थी ईसा पूर्व 332 जब दूर यूनान से एक ऐसा तूफान चला जिसने पूरी दुनिया को जीतने की
04:32
Speaker A
कसम खाई थी। सिकंदर महान यानी एलेक्जेंडर द ग्रेट। सिकंदर ने एक ही झटके में फारसी साम्राज्य को उखाड़ फेंका और यरूशलेम की चाबी अब उनके हाथों में थी। लेकिन सिकंदर की यह बादशाहत बहुत छोटी थी। 323 ईसा पूर्व में उसकी अचानक मौत ने इस विशाल
04:48
Speaker A
साम्राज्य को उसके जनरलों के बीच बांट दिया और यरूशलेम एक बार फिर जंग के मैदान में तब्दील हो गया। अब सोचिए जरा यूनानी संस्कृति के इस नए प्रभाव ने यरूशलेम के लोगों के भीतर किस तरह से विद्रोह की आग
05:01
Speaker A
सुलकाई होगी और क्या यहूदी अपने इस सबसे पवित्र शहर को विदेशों के चंगुल से आजाद करा पाए या फिर किस्मत उन्हें किसी नए और इससे भी बड़े साम्राज्य के पैरों तले कुचलने वाली थी। सिकंदर की मौत के बाद यरूशलेम कभी मिस्र
05:23
Speaker A
के टोलेमी राजाओं के हाथ गया तो कभी सीरिया के सेलुसिड राजाओं के पाले में आया। सदियों तक चली इसी मारकाट के बीच यरूशलेम के कई यहूदी धीरे-धीरे यूनानी रहन-सहन और उनकी संस्कृति को अपनाने लगे। लेकिन यह बदलाव पारंपरिक यहूदियों को अंदर
05:38
Speaker A
ही अंदर चुभ रहा था। और यह गुस्सा तब एक ज्वालामुखी की तरह फटा जब ईसा पूर्व 160 के दशक में सेलुसिड राजाओं ने यहूदी रीति-रिवाजों पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी। और यही वो मोमेंट था जब इतिहास में दर्ज
05:51
Speaker A
हुई मक्काबी बगावत। यहूदियों के एक बागी गुट जिसे मक्काबी कहा जाता था। उन्होंने अपनी परंपराओं को बचाने के लिए तलवारें उठा लीं। ईसा पूर्व 164 में इस जांबाज गुट ने ना सिर्फ यरूशलेम पर कब्जा किया बल्कि अपने पवित्र मंदिर में फिर से अपनी पूजा
06:08
Speaker A
पद्धति को बहाल किया। सोचो जरा इसी जीत की खुशी को आज भी यहूदी लोग हनुका के त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस बगावत के बाद यरूशलेम एक आजाद हश्मोनी साम्राज्य की राजधानी बना और लगभग एक सदी तक यहूदियों
06:23
Speaker A
ने यहां चैन की सांस ली। लेकिन यह आजादी भी ज्यादा दिन नहीं टिकने वाली थी। क्योंकि पश्चिम के क्षितिज पर एक ऐसा खूंखार शिकारी बड़ा हो रहा था जिससे पूरी दुनिया कांपने वाली थी। रोमन साम्राज्य ईसा पूर्व 37 में हेरोद द ग्रेट ने रोम की
06:39
Speaker A
मदद से यरूशलेम पर हमला करके उसे जीत लिया और रोमन गणराज्य के इशारों पर नाचने वाला एक कठपुतली राजा बन गया। इसके ठीक 30 साल बाद रोम ने सारी औपचारिकताएं खत्म कर दी और यरूशलेम को सीधे अपने जुदेव प्रांत में
06:53
Speaker A
मिलाकर वहां अपना क्रूर शासन लागू कर दिया। जब पहली सदी की शुरुआत में यरूशलेम रोम के अधीन था, तब वहां की आबादी करीब 70,000 से 1 लाख के बीच पहुंच चुकी थी। इनमें से ज्यादातर यहूदी थे। लेकिन इसी
07:07
Speaker A
शहर की तंग गलियों में एक नया इतिहास करवट ले रहा था। ईसा मसीह यानी कि जीसस क्राइस्ट के जीवन, उनकी शिक्षाओं और सूली पर चढ़ाए जाने के बाद यरूशलेम के भीतर ही यहूदी धर्म से निकलकर एक नया संप्रदाय
07:20
Speaker A
जन्म ले रहा था। जिसे आज हम ईसाई धर्म कहते हैं। ईसा मसीह के शिष्यों ने इसी शहर से उनके संदेशों को फैलाना शुरू किया। जिससे यरूशलेम शुरुआती ईसाई धर्म का भी जन्म स्थान बन गया। यह सब सुनकर अजीब लगता
07:33
Speaker A
है ना कि जो शहर पहले से ही धार्मिक आस्था का केंद्र था, वह अब दो अलग-अलग आस्थाओं के बीच पिसने लगा था। उधर रोमन हुक्मरान जो मूर्ति पूजक थे, उन्हें यहूदी और यह उभरता हुआ ईसाई धर्म दोनों ही अपनी सल्तनत
07:46
Speaker A
के लिए एक बड़ा खतरा नजर आने लगे। रोम ने इन धर्मों को कुचलने के लिए तरह-तरह के दमनकारी नियम बनाए। लोगों का सब्र टूट रहा था और आखिरकार साल 66 में यहूदियों के गुस्से का बांध टूट गया। उन्होंने रोमन
07:59
Speaker A
शासन के खिलाफ एक बहुत बड़ी बगावत कर दी जिसे महान विद्रोह कहा जाता है। यरूशलेम इस बगावत का गढ़ था। इसीलिए रोम ने इसे कुचलने के लिए अपनी सबसे क्रूर मिलिट्री टुकड़ियों को काम पर लगा दिया। साल 70 में
08:12
Speaker A
5 महीनों की खौफनाक घेराबंदी के बाद रोमन सेना ने यरूशलेम के भीतर कदम रखा। मंजर इतना भयानक था कि उसे बयां करना भी मुश्किल है। रोमन सैनिकों ने शहर की हर गली को लाशों से पाट दिया। सदियों पुराना
08:26
Speaker A
वो दूसरा यहूदी मंदिर मिट्टी में मिला दिया गया। उसकी एक-एक ईंट उखाड़ दी गई। उस आलीशान मंदिर की सिर्फ एक बाहरी दीवार का हिस्सा बच गया जिसे आज हम वेस्टर्न वॉल या रोने वाली दीवार कहते हैं। वह आज भी यहूदी
08:40
Speaker A
धर्म में सबसे पवित्र जगह मानी जाती है। यरूशलेम को पूरी तरह मलवे में तब्दील करने के बाद रोमन सम्राट हेड्रियन ने इस शहर का नाम बदलकर एलिया कैपिटोलिना रख दिया और यहूदियों के अपने ही शहर में घुसने पर
08:53
Speaker A
सख्त पाबंदी लगा दी। सिर्फ साल के कुछ गिनेचुने पवित्र दिनों में ही उन्हें यहां आने की इजाजत थी। इस बेइज्जती ने साल 132 में एक और यहूदी विद्रोह को जन्म दिया। लेकिन हेड्रियन ने उसे और भी बेरहमी से
09:07
Speaker A
कुचल दिया। उसने यहूदी मंदिर के मलबे के ऊपर अपने देवता जुपिटर का एक भव्य मंदिर बनवा दिया ताकि यहूदियों का नामोनिशान मिटाया जा सके। यहूदियों के निकाले जाने के बाद यरूशलेम धीरे-धीरे ईसाई आबादी का केंद्र बनने लगा। चौथी सदी में जब रोमन
09:23
Speaker A
सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ने खुद ईसाई धर्म अपना लिया तो उन्होंने अपनी मां हेलेना को ईसा मसीह की सूली और दफन होने वाली जगह को ढूंढने के लिए...
09:37
Speaker A
हुआ रोमन मंदिर खड़ा था। सम्राट के आदेश पर उस मंदिर को तुरंत गिरा दिया गया और साल 335 में वहां एक आलीशान चर्च बनवाया गया जिसे चर्च ऑफ द होली सेकुलर कहा जाता है। यह चर्च ईसाई जगत के लिए सबसे पवित्र
09:52
Speaker A
स्थान बन [संगीत] गया। पांचवी सदी आते-आते रोमन साम्राज्य कमजोर होने लगा। लेकिन उसका पूर्वी हिस्सा यानी बंजेंटिन एंपायर अगले 300 सालों तक यरूशलेम पर राज करता रहा और इसे ईसाई धर्म का सिरमौर बनाए रखा। लेकिन अरब के तपते रेगिस्तानों से एक ऐसी
10:07
Speaker A
नई ताकत और एक नया मजहब उठने लगा था जो यरूशलेम की तकदीर और उसकी पहचान को हमेशा हमेशा के लिए बदलने जा रहा था। तो क्या थी वो नई ताकत और कैसे इस पवित्र शहर के आसमान पर चर्च के घंटों के साथ-साथ अजान
10:22
Speaker A
की आवाजें भी गूंजने लगी थी। सातवीं सदी की शुरुआत में अरब के रेतीले मैदानों से इस्लाम की गूंज उठी। उसने देखते ही देखते पूरी दुनिया का नक्शा बदल दिया। यरूशलेम का महत्व मुसलमानों के लिए भी बेहद खास था क्योंकि मान्यता है कि
10:43
Speaker A
पैगंबर मोहम्मद साहब ने एक ही रात में मक्का से यहां तक का सफर तय किया था। साल 632 में पैगंबर साहब के दुनिया से जाने के बाद रासुद्दीन खिलाफत ने पूरे अरब को एकजुट किया और बैजेंटिन एंपायर की जमीनें
10:57
Speaker A
जीतनी शुरू कर दी और यही वो मोमेंट था जब साल 638 में खलीफा उमर इब्न अल खत्ताब अपनी मुस्लिम सेना लेकर यरूशलेम के दरवाजों पर आ खड़े हुए। सदियों तक खून बहाने वाले इस शहर ने इस बार एक अनोखा
11:11
Speaker A
मंजर देखा। खलीफा उमर ने बिना किसी कत्लेआम के बेहद शांति से शहर की चाबियां ली। मुस्लिम शासन के आते ही यरूशलेम में धार्मिक सद्भाव का एक नया दौर शुरू हुआ। बेंजेंटाइन और रोमन राजाओं ने पिछले 300 सालों से यहूदियों के यहां आने पर जो बैन
11:27
Speaker A
लगा रखा था, खलीफा उमर ने उसे तुरंत हटा दिया। यहूदियों को अपने इस सबसे पवित्र शहर में वापस लौटने और इबादत करने की पूरी आजादी मिल गई। इसके बाद आए उमयद राजवंश के दौर में। सातवीं सदी के अंत और आठवीं सदी
11:41
Speaker A
की शुरुआत में यरूशलेम की छाती पर दो ऐसी इमारतें खड़ी हुई जिन्होंने इस शहर को हमेशा के लिए बदल दिया। डोम ऑफ द रॉक और अल अक्सा मस्जिद। इन पवित्र मुकामों के बनते ही मुस्लिम जगत में यरूशलेम का रुतबा
11:55
Speaker A
मक्का और मदीना के बाद तीसरे सबसे पवित्र शहर के रूप में स्थापित हो गया। अब इस 1 वर्ग किलोमीटर के घेरे में दुनिया के तीन सबसे बड़े अब्राहमिक धर्म यहूदी, ईसाई और इस्लाम एक साथ सांस ले रहे थे। लेकिन
12:09
Speaker A
जैसे-जैसे समय नए सहस्त्राब्दी यानी कि साल 1000 के करीब बढ़ रहा था। इतिहास के पन्नों पर फिर से नफरत की स्याही बिखरने लगी। साल 969 में मिस्र के फातिमत खिलाफत ने यरूशलेम पर कब्जा कर लिया। शुरुआत में तो सब ठीक था। लेकिन समय के साथ गैर
12:26
Speaker A
मुस्लिमों पर पाबंदियां सख्त होने लगी और फिर आया साल 1009 जब सनकी खलीफा अल हाकिम बी अम्र अल्लाह ने एक ऐसा हुक्म दिया जिसने पूरे ईसाई जगत को हिला कर रख दिया। उसने ईसाइयों के सबसे पवित्र चर्च ऑफ द
12:40
Speaker A
होली सेकुलर को पूरी तरह ढहाने का आदेश दे दिया। सोचो जरा जब यूरोप के राजाओं और पोप तक यह खबर पहुंची होगी कि ईसा मसीह के दफन होने वाली पवित्र जगह को मलवे में तब्दील किया जा रहा है तो उनके दिलों में गुस्से
12:53
Speaker A
का कैसा तूफान उठा होगा। हालांकि बाद के सालों में चर्च को दोबारा बना दिया गया। लेकिन ईसाइयों के दिल में बैर की जो दीवार खड़ी हुई वो कभी ढह नहीं सकी। रही सही कसर साल 1054 के महान विभाजन ने पूरी कर दी।
13:07
Speaker A
जब ईसाई दुनिया दो हिस्सों में बंट गई। पश्चिम में रोमन कैथोलिक और पूर्व में ग्रीथ ऑर्थोडॉक्स। इस फूट के बाद यरूशलेम ऑर्थोडॉक्स चर्च के पाले में चला गया। जिससे रोम के पोप और तड़प उठे। गम और गुस्से का यह लावा अभी उबल ही रहा था कि
13:23
Speaker A
साल 1073 में मध्य एशिया से आए खूंखार सेजुक तुर्कों ने यरूशलेम पर अपना कब्जा जमा लिया। तुर्कों का राज आते ही अराजकता फैल गई। यूरोप से आने वाले ईसाई तीर्थ यात्रियों को रास्ते में लूटा जाने लगा। उनका उत्पीड़न होने लगा। अब बेंजाटाइन
13:38
Speaker A
एंपायर को भी तुर्कों से डर लगने लगा था। बेबस होकर बेंजाटाइन सम्राट एलेक्सियोस प्रथम ने पश्चिमी यूरोप के कैथोलिक राजाओं और रोम के पोप से मिलिट्री मदद मांगी। साल 1095 में फ्रांस के क्लमोट शहर में पोप अर्बन द्वितीय ने एक ऐसी तकरीर दी जिसने
13:55
Speaker A
आने वाले 200 सालों के लिए दुनिया को एक खूनी दलदल में झोंक दिया। उन्हें बेंजाटाइन की मदद के बहाने पूरी ईसाई दुनिया से यरूशलेम को मुसलमानों के चंगुल से आजाद कराने के लिए एक पवित्र धर्म युद्ध यानी कि क्रूसीड का ऐलान कर दिया।
14:10
Speaker A
स्वर्ग के लालच और मजहब के नाम पर हजारों नाइट्स 2000 मील लंबे जानलेवा सफर पर निकल पड़े। उधर फातिमा ने 1098 में तुर्कों से यरूशलेम तो छीन लिया था लेकिन उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उत्तर से मौत का एक
14:25
Speaker A
ऐसा सैलाब आ रहा है जो किसी को नहीं बखशेगा। जून 1099 में पहली क्रूसीड की फौज यरूशलेम की दीवारों के सामने पहुंच गई। कई हफ्तों की घेराबंदी के बाद 15 जुलाई 1099 को क्रूसीडरों ने शहर की दीवारों को लांक
14:40
Speaker A
दिया और इसके बाद जो हुआ वो इंसानियत के इतिहास का सबसे शर्मनाक और रूह कपा देने वाला मंजर था। शहर के भीतर घुसते ही इन तथाकथित धर्म योद्धाओं ने कत्लेआम का वो तांडव रच दिया कि यरूशलेम की गलियां
14:54
Speaker A
इंसानी खून से लाल हो गई। अल अा मस्जिद के भीतर हजारों मुसलमानों को गाजर मूली की तरह काट दिया गया। यहूदियों को उनके सिनेगॉग के भीतर बंद करके जिंदा जला दिया गया। बच्चे, बूढ़े, औरतें जो भी सामने आया
15:08
Speaker A
उसे मार दिया गया। तो अब सोचिए जरा खून के इस दरिया पर जिस यरूशलेम के ईसाई साम्राज्य की नींव रखी गई, वो कितने ही दिन टिकने वाला था? और जब इस कत्लेआम की खबर मुस्लिम दुनिया के दिल को चीरती हुई
15:20
Speaker A
गुजरी तो क्या वहां कोई ऐसा सुल्तान उठने वाला था जो स्वीडरों को उनकी ही भाषा में जवाब दे सके। कत्लेआम के इस खौफनाक मंजर के बाद ज्यादातर क्रूसेडर वापस यूरोप लौट गए। लेकिन वहीं कुछ रुक गए और उन्होंने
15:40
Speaker A
यरूशलेम के ईसाई साम्राज्य की नींव रखी। मुसलमानों की अल अक्सा मस्जिद और डोम ऑफ रक्स को चर्च और महलों में बदल दिया गया। यूरोप से आने वाले ईसाई तीर्थ यात्रियों की संख्या रातोंरात बढ़ गई। अब इन तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा और सेवा के लिए
15:55
Speaker A
इतिहास के सबसे मशहूर और रहस्यमई सैन्य गुटों का जन्म हुआ। जैसे नाइट्स टेंपलर और नाइट्स हॉस्पिटलर। नाइट्स टेंपलर ने अल अा मस्जिद को अपना हेड क्वार्टर बनाया। अगले करीब 100 सालों तक इन बख्तरबंद शूरवीरों की तलवारों के साए में यरूशलेम पर ईसाइयों
16:11
Speaker A
का राज रहा। लेकिन मुस्लिम दुनिया इस बेइज्जती को भूल नहीं पाई। उन्हें इंतजार था एक ऐसे रहनुमा का जो बिखरी हुई मुस्लिम रियासतों को एक कर सके और आखिरकार इतिहास के रंगमंच पर एंट्री हुई एक ऐसे नाम की
16:25
Speaker A
जिसकी बहादुरी और इंसाफ की कसमें आज भी खाई जाती हैं। सुल्तान सलाहाउद्दीन अयूब भी। अयूबीड राजवंश के सलाहाउद्दीन ने कसम खाई थी कि वह यरूशलेम को वापस लेकर रहेंगे। जुलाई 1187 में हाथीन की ऐतिहासिक जंग में सलाहाउद्दीन की फौज ने क्रूसेडरों
16:42
Speaker A
की रीड की हड्डी तोड़ दी। उनके राजा को बंदी बना लिया गया और नाइट्स के घमंड को मिट्टी में मिला दिया गया। इस बड़ी जीत के बाद सलाहाउद्दीन ने अपनी फौज का रुख सीधे यरूशलेम की तरफ मोड़ लिया। सिर्फ एक हफ्ते
16:54
Speaker A
की घेराबंदी के बाद ईसाइयों ने घुटने टेक दिए। अब सोचिए जरा जब मुस्लिम सेना यरूशलेम के भीतर घुस रही थी तब ईसाइयों के दिलों में क्या खौफ रहा होगा। उन्हें लगा कि 88 साल पहले उनके पुरखों ने जो कत्लेआम
17:08
Speaker A
मचाया था, सुल्तान की फौज उसका बदला उनकी खाल उधेड़ कर लेगी। लेकिन सलाहाउद्दीन ने जो किया, उसने इतिहास को हैरान कर दिया। उसने किसी मासूम को हाथ तक नहीं लगाया। बूढ़े, बच्चों और औरतों को ससम्मान शहर छोड़ने की इजाजत दी गई और जो लोग फिरौती
17:24
Speaker A
नहीं दे सकते थे, सुल्तान ने अपने पास से पैसे देकर उन्हें आजाद करवाया। चर्च ऑफ द होली सेुलर को तोड़ा नहीं गया बल्कि उसे स्थानीय ईसाइयों को सौंप दिया गया। यरूशलेम के इस तरह मुसलमानों के पास जाने की खबर जब यूरोप पहुंची तो वहां हड़कंप मच
17:40
Speaker A
गया। रोम के पोप के बुलावे पर शुरू हुआ तीसरा क्रूसेड यानी कि तीसरा धर्म युद्ध। इस बार कमान संभाली खुद इंग्लैंड के सबसे खूंखार राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने। रिचर्ड और सलाहाउद्दीन के बीच कई भयानक जंगे हुई। दोनों ने एक दूसरे की बहादुरी
17:55
Speaker A
को तस्लीम किया। लेकिन रिचर्ड तमाम कोशिशों के बावजूद यरूशलेम को सलाहाउद्दीन से वापस नहीं छीन सका। आखिरकार एक संधि के साथ रिचर्ड को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। 13वीं सदी में भी यरूशलेम को लेकर यह खूनी खेल जारी रहा। साल 1219 में इस शहर की
18:11
Speaker A
किलाबंदी को जानबूझकर ढहा दिया गया ताकि मिलिट्री के लिहाज से इसका महत्व कम हो सके और जंग रुक जाए। बीच में कुछ सालों के लिए यानी कि 1229 से 1244 तक ईसाइयों ने चालाकी से यरूशलेम पर दोबारा कब्जा भी कर
18:26
Speaker A
लिया। लेकिन उनकी यह कोशिशें आखिरी बार साबित हुई। साल 1291 तक आते-आते मिस्र के खूंखार ममलूक सुल्तानों ने ईसाइयों के आखिरी ठिकानों को भी इस पावन धरती से उखाड़ फेंका। ममलूकों के 300 सालों के शासन के बाद साल 1516 में यरूशलेम ऑटोमन
18:43
Speaker A
साम्राज्य का हिस्सा बन गया। सुल्तान सुलेमान द मैग्निफिसेंट के दौर में यरूशलेम की उन खूबसूरत और विशाल दीवारों को दोबारा बनाया गया जो आज भी हमें दिखाई देती है। ऑटोमन काल में यहां एक बार फिर से शांति और धार्मिक सद्भाव का दौर लौटा।
18:57
Speaker A
एक ही दीवार के साए में चर्च की घंटियां, सिनेगॉग की प्रार्थनाएं और मस्जिदों की आजान एक साथ गूंजने लगी। लेकिन वक्त के साथ ऑटोमन साम्राज्य कमजोर होने लगा और 18वीं और 19वीं सदी तक आते-आते यरूशलेम दुनिया के नक्शे पर एक पिछड़ा और भूला
19:14
Speaker A
बिरा शहर बनकर रह गया जिसकी आबादी मुश्किल से 8000 थी। पूरा शहर 1 वर्ग किलोमीटर के भीतर चार हिस्सों में बंटा हुआ था। मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और अरमेनियाई लोग अपनी-अपनी सीमाओं में शांति से रह रहे थे। लेकिन यह शांति एक बहुत बड़े तूफान से
19:31
Speaker A
पहले का सन्नाटा थी। 19वीं सदी के अंत में जब ऑटोमन साम्राज्य के पतन की उल्टी गिनती शुरू हुई, तो यूरोप की महाशक्तियों की गिद्ध जैसी नजरें एक बार फिर यरूशलेम पर टिक गई। सिर्फ ईसाई देश ही नहीं बल्कि
19:43
Speaker A
यूरोप में जुल्म और नफरत का शिकार हो रहे हजारों यहूदी भी चुपके-चुपके वापस अपनी इन पूर्वजों की भूमि पर लौटने लगे थे। तो अब सोचिए जरा सदियों बाद जब हजारों यहूदी वापस यरूशलेम की सरजमी पर कदम रख रहे थे
19:57
Speaker A
और उधर सदियों से रह रहे अरब मुसलमान वहां पहले से मौजूद थे तो इन दो संस्कृतियों के टकराने से कौन सी नई जंग का आगाज होने वाला था और कैसे 20वीं सदी की शुरुआत में इस पवित्र शहर की किस्मत एक ऐसी आग में
20:10
Speaker A
झुलसने वाली थी जो आज तक नहीं बुझ पाई है। 19वीं सदी के ढलते ढलते यरूशलेम की वो पुरानी दीवारें छोटी पड़ने लगी थी। आबादी इस कदर बढ़ चुकी थी कि लोग प्राचीन शहर से बाहर निकलकर नया यरूशलेम बसाने लगे। रूस
20:33
Speaker A
ने अपने तीर्थ यात्रियों के लिए आलीशान परिसर बनवाया। तो वहीं सर मोसेस मंटिफियर जैसे अमीर और रसूखदार यहूदियों ने अपने लोगों को वापस वहां आकर बसने के लिए मोटी रकम पानी की तरह बहा दिया। साल 1882 तक आते-आते 25,000 से ज्यादा यहूदी प्रवासी
20:50
Speaker A
यरूशलेम पहुंच चुके थे। जिससे शहर का पूरा ताना-बाना बदलने लगा था और फिर आया साल 1917 जब पहले विश्व युद्ध की तपीश ने सदियों पुराने ऑटोमन साम्राज्य को हमेशा के लिए खाक में मिला दिया। ब्रिटिश जनरल एडममंड एलनबी ने अपनी फौज के साथ यरूशलेम
21:06
Speaker A
में कदम रखा और शहर सीधे ब्रिटिश मिलिट्री के कंट्रोल में आ गया। लेकिन अंग्रेजों ने यहां एक ऐसा जाल बुना जिसकी उलझन आज 21वीं सदी में भी सुलझ नहीं पाई है। यह सुनकर अजीब लगता है ना कि अंग्रेजों ने एक ही
21:19
Speaker A
जमीन के लिए दो अलग-अलग लोगों से दो बड़े-बड़े वादे कर दिए। एक तरफ उन्होंने बारफोर घोषणा के जरिए दुनिया भर के यहूदियों से वादा किया कि वह फिलिस्तीन की धरती पर यहूदियों के लिए एक नया देश बनाएंगे। वहीं दूसरी तरफ विश्व युद्ध में
21:34
Speaker A
तुर्कों के खिलाफ मदद के लिए उन्होंने अरब के मुसलमानों से भी एक आजाद मुल्क का वादा रख दिया था। इन दो विरोधी वादों के बीच साल 1922 में ब्रिटिश मैंडेट की शुरुआत हुई। अगले 25 सालों में यरूशलेम की आबादी
21:47
Speaker A
52,000 से छलांग लगाकर 1,65,000 के पार पहुंच गई। अब इस शहर में 1/3 अरब मुसलमान थे और दो तिहाई यहूदी जो यूरोप में हिटलर के जुल्मों से बचकर भाग रहे थे। दो ऐसी कौमों के बीच तनाव चरम पर था जो दोनों ही
22:02
Speaker A
एक ही जमीन को अपनी विरासत मानती थी। साल 1920 और 30 के दशक में हर गली हर चौराहे पर दंगे होने लगे। यरूशलेम की पवित्र हवा में अब बारूद और नफरत की गंध घुल चुकी थी। आखिरकार इस खूनी दलदल से तंग आकर
22:16
Speaker A
अंग्रेजों ने हाथ खड़े कर दिए और मामला पहुंचा संयुक्त राष्ट्र के पास। 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने इस जमीन को हमेशा हमेशा के लिए जख्मी कर दिया। उन्होंने फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव रखा।
22:31
Speaker A
एक यहूदियों के लिए यानी कि इजराइलियों के लिए और दूसरा अरबों के लिए। लेकिन यरूशलेम का क्या? धार्मिक भावनाओं को देखते हुए यरूशलेम को किसी एक को नहीं दिया गया। बल्कि इसे इंटरनेशनल कंट्रोल में एक न्यूट्रल ज़ोन बनाने का फैसला हुआ। लेकिन
22:46
Speaker A
कागज पर खींची यह लकीर जमीन पर बहते खून को नहीं रोक सकी। दोनों पक्षों ने इस बंटवारे को मानने से इंकार कर दिया। और 1947 के अंत तक आते-आते यरूशलेम एक भयंकर युद्ध का मैदान बन गया। 1948 में जैसे ही
23:00
Speaker A
ब्रिटिश सेना यहां से निकली, यहूदियों ने अपने नए देश इजराइल का ऐलान कर दिया। [संगीत] इसके तुरंत बाद आसपास के अरब देशों ने इजराइल पर हमला बोल दिया और छिड़ गई पहली अरब इजराइली जंग। 9 महीनों की भीषण और दर्दनाक मारकाट के बाद जब तोपें
23:16
Speaker A
शांत हुई तो यरूशलेम का दिल दो टुकड़ों में चीर दिया गया था। शहर के बीचों-बीच कटीले तारों की एक खूनी दीवार खड़ी कर दी गई थी। पश्चिमी यरूशलेम पर इजराइल का कब्जा हुआ जबकि प्राचीन ऐतिहासिक शहर समेत पूर्वी यरूशलेम जॉर्डन के हिस्से में चला
23:32
Speaker A
गया। यहूदी अपने ही देश में अपनी सबसे पवित्र वेस्टर्न वॉल से दूर कर दिए गए। यह बंटवारा कोई अंत नहीं था बल्कि आने वाली अनगिनत जंगों की एक खौफनाक शुरुआत थी। आज सदियां गुजर चुकी हैं। दुनिया कहां से
23:45
Speaker A
कहां पहुंच गई? लेकिन 1 वर्ग किलोमीटर के पवित्र टुकड़े पर किसका हक है? यह सवाल आज भी यरूशलेम की गलियों में गूंजता रहता है। मंदिर, मस्जिद और चर्च के साए में आज भी बंदूकें तनी रहती हैं। और इतिहास का यह
23:59
Speaker A
सबसे पवित्र शहर आज भी इंसानियत के सबसे बड़े इम्तिहान की तरह हमारे सामने खड़ा है। तो दोस्तों, क्या इस पवित्र शहर की मिट्टी को कभी मुकम्मल शांति नसीब होगी?
24:09
Speaker A
क्या कोई ऐसा रास्ता है जिससे तीन अलग-अलग धर्मों के लोग इस जमीन पर बिना डर और नफरत के एक साथ रह सकें? अपनी राय मुझे कमेंट सेक्शन में लिखकर ज़रूर बताइए। और हां, अगर यरूशलेम के इतिहास का यह सफर आपको पसंद
24:22
Speaker A
आया हो, तो अपने इस दोस्त के चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करना ना भूलें। मिलेंगे ऐसे ही एक और दिलचस्प और अनसुनी इतिहास की कहानी के साथ। तब तक के लिए नमस्कार। एक ऐसी जगह जिसके लिए इंसान पिछले 5000 सालों
24:36
Speaker A
से एक दूसरे का खून बहा रहा है। जहां की मिट्टी में इतिहास की सबसे बड़ी सभ्यताओं के कंकाल दफन है और जिसे आज भी दुनिया का सबसे पवित्र लेकिन सबसे खतरनाक शहर माना जाता है। सोचो जरा सूखी चट्टानों के बीच
24:50
Speaker A
बहने वाला एक छोटा सा पानी का झरना कैसे दुनिया के तीन सबसे बड़े धर्मों की साख और सदियों पुरानी जंग का अखाड़ा बन गया। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटे तो यरूशलेम की कहानी किसी चमत्कार और डरावने ख्वाब के बीच झूलती नजर आती है। यह एक ऐसे
25:06
Speaker A
शहर की दास्तान है जो पिछले 5000 सालों में 40 से भी ज्यादा बार एक हाथ से दूसरे हाथ गया, उजाड़ा गया और फिर अपनी ही राख से उठ खड़ा हुआ। इस अंतहीन सिलसिले की शुरुआत आज से करीब 5000 साल पहले ईसा
25:20
Speaker A
पूर्व 3000 में हुई थी। उस वक्त यह कोई आलीशान शहर नहीं था। बल्कि गिहोन नाम के एक पानी के झरने के पास बसा एक छोटा सा ठिकाना था। इस तपते और सूखे इलाके में पानी का होना किसी वरदान से कम नहीं था।
25:33
Speaker A
इसलिए लोग यहां खींचे चले आए। समय बीता और ईसा पूर्व 2000 के आसपास मिस्र के प्राचीन दस्तावेजों में पहली बार इस जगह का नाम मिलता है। रुशालीमाम। उस दौर में यहां कनानी नाम के लोग रहा करते थे। उन्होंने
25:47
Speaker A
इस कीमती पानी के स्रोत को बाहरी दुनिया से बचाने के लिए इसके चारों तरफ पत्थर की एक विशाल और ऊंची दीवार खड़ी कर दी थी। लेकिन इस दीवार के भीतर जो पानी बह रहा था वो आने वाले समय में पानी नहीं बल्कि
26:01
Speaker A
बारूद बनने वाला था। समय का पहिया घूमा और ईसा पूर्व 1500 के आसपास यह इलाका मिस्र के नए साम्राज्य के अधीन आ गया। सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन ईसा पूर्व 12वीं सदी में इतिहास की एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी
26:16
Speaker A
दुनिया को हिला दिया जिसे इतिहासकार कांस्य युग का पतन कहते हैं। देखते ही देखते भूमध्य सागर के आसपास के बड़े-बड़े साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गए। चारों तरफ हिंसा और अराजकता का माव था और इसी मलबे में से जन्म हुआ कुछ छोटे और
26:32
Speaker A
आजाद राज्यों का जिनमें से एक थे इजराइली लोग। पुरानी मान्यताओं के अनुसार [संगीत] ईसा पूर्व 1000 के आसपास राजा डेविड के नेतृत्व में इन लोगों ने यरूशलेम पर अपना अधिकार कर लिया और इसे अपनी राज्य की राजधानी बनाया। राजा डेविड के बाद उनके
26:46
Speaker A
बेटे राजा सुलेमान यानी कि किंग सोलमन ने इस शहर की तकदीर बदल दी। उन्होंने यरूशलेम के भीतर एक बेहद भव्य और आलीशान मंदिर का निर्माण कराया जिसे आज सोलोमन का मंदिर कहा जाता है। सोने और बेशकीमती पत्थरों से
27:01
Speaker A
चमकता यह मंदिर यहूदी धर्म का सबसे बड़ा और पवित्र केंद्र बन गया। लेकिन सुख के दिन ज्यादा दिन नहीं टिकते। एक सदी के भीतर ही यह साम्राज्य दो हिस्सों में बट गया। उत्तरी हिस्सा इजराइल कहलाया और दक्षिणी हिस्सा बना यहूदा जिसकी राजधानी
27:16
Speaker A
यरूशलेम ही रही। अगले 400 सालों तक यह शहर यहूदी संस्कृति का दिल बना रहा। लेकिन मिस्र और असीरिया जैसे शक्तिशाली पड़ोसी साम्राज्य इस सोने की चिड़िया पर लगातार हमला करते रहे। और फिर आई ईसा पूर्व छठी सदी। जब यरूशलेम ने अपने इतिहास का सबसे
27:34
Speaker A
भयानक मंजर देखा। असीरिया के बाद इस इलाके में बाबुल यानी कि बेबिलोन साम्राज्य का उदय हुआ। जिसके राजा थे नबूक दनेजर द्वितीय। उसने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ईसा पूर्व 597 में यरूशलम को चारों तरफ से घेर लिया। शहर के लोगों ने कड़ा मुकाबला
27:51
Speaker A
किया। लेकिन 10 साल बाद ईसा पूर्व 587 में नबूक दनेजर की सेना ने शहर पर दोबारा ऐसा खूनी हमला बोला जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। सोचो जरा वो मंजर कितना खौफनाक रहा होगा। रात के अंधेरे में आसमान आग की
28:07
Speaker A
लपटों से लाल हो चुका था। राजा सुलेमान का वो पवित्र मंदिर जो यहूदियों की जान था उसे बेरहमी से ढहा दिया गया। सैनिकों ने मासूमों का कत्लेआम किया और जो बच गए उन्हें बेड़ियों में जकड़ कर पूर्व की तरफ
28:21
Speaker A
बेबिलोन की जेलों में सड़ने के लिए भेज दिया गया। यरूशलेम अब एक उजाड़ कब्रिस्तान बन चुका था। जहां सिर्फ चीखें और सन्नाटा बचा हुआ था। लगभग 40 सालों तक यह शहर इसी तरह बेजान पड़ा रहा। लेकिन तभी पूर्व से
28:35
Speaker A
एक और महाशक्ति उठी। हखामनी साम्राज्य जिसके राजा थे साइरस द ग्रेट। साइरस ने बेबिलोन को हरा दिया और एक दरियादिल राजा की तरह यहूदियों को वापस अपने वतन यरूशलेम जाने और अपना मंदिर दोबारा बनाने की इजाजत दे दी। आने वाले 200 सालों में यहूदी वापस
28:51
Speaker A
लौटे। शहर फिर से गुलजार हुआ। लेकिन अफसोस वो अब भी इस शहर के मालिक नहीं थे। तारीख थी ईसा पूर्व 332 जब दूर यूनान से एक ऐसा तूफान चला जिसने पूरी दुनिया को जीतने की कसम खाई थी। सिकंदर महान यानी एलेक्जेंडर
29:06
Speaker A
द ग्रेट। सिकंदर ने एक ही झटके में फारसी साम्राज्य को उखाड़ फेंका और यरूशलेम की चाबी अब उनके हाथों में थी। लेकिन सिकंदर की यह बादशाहत बहुत छोटी थी। 323 ईसा पूर्व में उसकी अचानक मौत ने इस विशाल
29:20
Speaker A
साम्राज्य को उसके जनरलों के बीच बांट दिया और यरूशलेम एक बार फिर जंग के मैदान में तब्दील हो गया। अब सोचिए जरा यूनानी संस्कृति के इस नए प्रभाव ने यरूशलेम के लोगों के भीतर किस तरह से विद्रोह की आग
29:33
Speaker A
सुलकाई होगी और क्या यहूदी अपने इस सबसे पवित्र शहर को विदेशों के चंगुल से आजाद करा पाए या फिर किस्मत उन्हें किसी नए और इससे भी बड़े साम्राज्य के पैरों तले कुचलने वाली थी। सिकंदर की मौत के बाद यरूशलेम कभी मिस्र
29:55
Speaker A
के टोलेमी राजाओं के हाथ गया तो कभी सीरिया के सेलुसिड राजाओं के पाले में आया। सदियों तक चली इसी मारकाट के बीच यरूशलेम के कई यहूदी धीरे-धीरे यूनानी रहन-सहन और उनकी संस्कृति को अपनाने लगे। लेकिन यह बदलाव पारंपरिक यहूदियों को अंदर
30:10
Speaker A
ही अंदर चुभ रहा था। और यह गुस्सा तब एक ज्वालामुखी की तरह हटा जब ईसा पूर्व 160 के दशक में सेलुसिड राजाओं ने यहूदी रीति-रिवाजों पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी। और यही वो मोमेंट था जब इतिहास में दर्ज
30:23
Speaker A
हुई मक्काबी बगावत। यहूदियों के एक बागी गुट जिसे मक्काबी कहा जाता था। उन्होंने अपनी परंपराओं को बचाने के लिए तलवारें उठा ली। ईसा पूर्व 164 में इस जांबाज गुट ने ना सिर्फ यरूशलेम पर कब्जा किया बल्कि अपने पवित्र मंदिर में फिर से अपनी पूजा
30:40
Speaker A
पद्धति को बहाल किया। सोचो जरा इसी जीत की खुशी को आज भी यहूदी लोग हनुका के त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इस बगावत के बाद यरूशलेम एक आजाद हश्मोनी साम्राज्य की राजधानी बना और लगभग एक सदी तक यहूदियों
30:55
Speaker A
ने यहां चैन की सांस ली। लेकिन यह आजादी भी ज्यादा दिन नहीं टिकने वाली थी। क्योंकि पश्चिम के क्षितज पर एक ऐसा खूंखार शिकारी बड़ा हो रहा था जिससे पूरी दुनिया कांपने वाली थी। रोमन साम्राज्य ईसा पूर्व 37 में हेरोद द ग्रेट ने रोम की
31:11
Speaker A
मदद से यरूशलेम पर हमला करके उसे जीत लिया और रोमन गणराज्य के इशारों पर नाचने वाला एक कठपुतली राजा बन गया। इसके ठीक 30 साल बाद रोम ने सारी औपचारिकताएं खत्म कर दी और यरूशलेम को सीधे अपने जुदेव प्रांत में
31:25
Speaker A
मिलाकर वहां अपना क्रूर शासन लागू कर दिया। जब पहली सदी की शुरुआत में यरूशलेम रोम के अधीन था, तब वहां की आबादी करीब 70,000 से 1 लाख के बीच पहुंच चुकी थी। इनमें से ज्यादातर यहूदी थे। लेकिन इसी
31:39
Speaker A
शहर की तंग गलियों में एक नया इतिहास करवट ले रहा था। ईसा मसीह यानी कि जीसस क्राइस्ट के जीवन, उनकी शिक्षाओं और सूली पर चढ़ाए जाने के बाद यरूशलेम के भीतर ही यहूदी धर्म से निकलकर एक नया संप्रदाय
31:52
Speaker A
जन्म ले रहा था। जिसे आज हम ईसाई धर्म कहते हैं। ईसा मसीह के शिष्यों ने इसी शहर से उनके संदेशों को फैलाना शुरू किया। जिससे यरूशलेम शुरुआती ईसाई धर्म का भी जन्म स्थान बन गया। यह सब सुनकर अजीब लगता
32:05
Speaker A
है ना कि जो शहर पहले से ही धार्मिक आस्था का केंद्र था, वह अब दो अलग-अलग आस्थाओं के बीच पिसने लगा था। उधर रोमन हुक्मरा जो मूर्ति पूजक थे, उन्हें यहूदी और यह उभरता हुआ ईसाई धर्म दोनों ही अपनी सल्तनत के
32:19
Speaker A
लिए एक बड़ा खतरा नजर आने लगे। रोम ने इन धर्मों को कुचलने के लिए तरह-तरह के दमनकारी नियम बनाए। लोगों का सब्र टूट रहा था और आखिरकार साल 66 में यहूदियों के गुस्से का बांध टूट गया। उन्होंने रोमन
32:31
Speaker A
शासन के खिलाफ एक बहुत बड़ी बगावत कर दी जिसे महान विद्रोह कहा जाता है। यरूशलेम इस बगावत का गढ़ था। इसीलिए रोम ने इसे कुचलने के लिए अपनी सबसे क्रूर मिलिट्री टुकड़ियों को काम पर लगा दिया। साल 70 में
32:44
Speaker A
5 महीनों की खौफनाक घेराबंदी के बाद रोमन सेना ने यरूशलेम के भीतर कदम रखा। मंजर इतना भयानक था कि उसे बयां करना भी मुश्किल है। रोमन सैनिकों ने शहर की हर गली को लाशों से बांट दिया। सदियों पुराना
32:58
Speaker A
वो दूसरा यहूदी मंदिर मिट्टी में मिला दिया गया। उसकी एक-एक ईंट उखाड़ दी गई। उस आलीशान मंदिर की सिर्फ एक बाहरी दीवार का हिस्सा बच गया जिसे आज हम वेस्टर्न वॉल या रोने वाली दीवार कहते हैं। वह आज भी यहूदी
33:12
Speaker A
धर्म में सबसे पवित्र जगह मानी जाती है। यरूशलेम को पूरी तरह मलवे में तब्दील करने के बाद रोमन सम्राट हेड्रियन ने इस शहर का नाम बदलकर एलिया कैपिटोलिना रख दिया और यहूदियों के अपने ही शहर में घुसने पर
33:25
Speaker A
सख्त पाबंदी लगा दी। सिर्फ साल के कुछ गिनेचुने पवित्र दिनों में ही उन्हें यहां आने की इजाजत थी। इस बेइज्जती ने साल 132 में एक और यहूदी विद्रोह को जन्म दिया। लेकिन हेड्रियन ने उसे और भी बेरहमी से
33:39
Speaker A
कुचल दिया। उसने यहूदी मंदिर के मलबे के ऊपर अपने देवता जुपिटर का एक भव्य मंदिर बनवा दिया ताकि यहूदियों का नामोनिशान मिटाया जा सके। यहूदियों के निकाले जाने के बाद यरूशलेम धीरे-धीरे ईसाई आबादी का केंद्र बनने लगा। चौथी सदी में जब रोमन
33:55
Speaker A
सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ने खुद ईसाई धर्म अपना लिया तो उन्होंने अपनी मां हेलेना को ईसा मसीह की सूली और दफन होने वाली जगह को ढूंढने के लिए यरूशलेम भेजा। हेलेना ने इस जगह की पहचान की। वहां हेड्रियन का बनाया
34:09
Speaker A
हुआ रोमन मंदिर खड़ा था। सम्राट के आदेश पर उस मंदिर को तुरंत गिरा दिया गया और साल 335 में वहां एक आलीशान चर्च बनवाया गया जिसे चर्च ऑफ द होली सेकुलर कहा जाता है। यह चर्च ईसाई जगत के लिए सबसे पवित्र
34:24
Speaker A
स्थान बन गया। पांचवी सदी आते-आते रोमन साम्राज्य कमजोर होने लगा। लेकिन उसका पूर्वी हिस्सा यानी बंजेंटिन एंपायर अगले 300 सालों तक यरूशलेम पर राज करता रहा और इसे ईसाई धर्म का सिरमौर बनाए रखा। लेकिन अरब के तपते रेगिस्तानों से एक ऐसी नई
34:40
Speaker A
ताकत और एक नया मजहब उठने लगा था जो यरूशलेम की तकदीर और उसकी पहचान को हमेशा हमेशा के लिए बदलने जा रहा था। तो क्या थी वो नई ताकत और कैसे इस पवित्र शहर के आसमान पर चर्च के घंटों के साथ-साथ अजान
34:54
Speaker A
की आवाजें भी गूंजने लगी थी। सातवीं सदी की शुरुआत में अरब के रेतीले मैदानों से इस्लाम की गूंज उठी। उसने देखते ही देखते पूरी दुनिया का नक्शा बदल दिया। यरूशलेम का महत्व मुसलमानों के लिए भी बेहद खास था क्योंकि मान्यता है कि
35:15
Speaker A
पैगंबर मोहम्मद साहब ने एक ही रात में मक्का से यहां तक का सफर तय किया था। साल 632 में पैगंबर साहब के दुनिया से जाने के बाद रासुद्दीन खिलाफत ने पूरे अरब को एकजुट किया और बैजेंटिन एंपायर की जमीनें
35:29
Speaker A
जीतनी शुरू कर दी और यही वो मोमेंट था जब साल 638 में खलीफा उमर इब्न अल खत्ताब अपनी मुस्लिम सेना लेकर यरूशलेम के दरवाजों पर आ खड़े हुए। सदियों तक खून बहाने वाले इस शहर ने इस बार एक अनोखा
35:43
Speaker A
मंजर देखा। खलीफा उमर ने बिना किसी कत्लेआम के बेहद शांति से शहर की चाबियां ली। मुस्लिम शासन के आते ही यरूशलेम में धार्मिक सद्भाव का एक नया दौर शुरू हुआ। वेंजटाइन और रोमन राजाओं ने पिछले 300 सालों से यहूदियों के यहां आने पर जो बैन
35:59
Speaker A
लगा रखा था, खलीफा उमर ने उसे तुरंत हटा दिया। यहूदियों को अपने इस सबसे पवित्र शहर में वापस लौटने और इबादत करने की पूरी आजादी मिल गई। इसके बाद आए उमयद राजवंश के दौर में। सातवीं सदी के अंत और आठवीं सदी
36:13
Speaker A
की शुरुआत में यरूशलेम की छाती पर दो ऐसी इमारतें खड़ी हुई जिन्होंने इस शहर को हमेशा के लिए बदल दिया। डोम ऑफ द रॉक और अल अक्सा मस्जिद। इन पवित्र मुकामों के बनते ही मुस्लिम जगत में यरूशलेम का रुतबा
36:27
Speaker A
मक्का और मदीना के बाद तीसरे सबसे पवित्र शहर के रूप में स्थापित हो गया। अब इस 1 वर्ग किलोमीटर के घेरे में दुनिया के तीन सबसे बड़े अब्राहमिक धर्म यहूदी, ईसाई और इस्लाम एक साथ सांस ले रहे थे। लेकिन
36:41
Speaker A
जैसे-जैसे समय नए सहस्त्राब्दी यानी कि साल 1000 के करीब बढ़ रहा था इतिहास के पन्नों पर फिर से नफरत की स्याही बिखरने लगी। साल 969 में मिस्र के फातिमत खिलाफत ने यरूशलेम पर कब्जा कर लिया। शुरुआत में तो सब ठीक था। लेकिन समय के साथ गैर
36:58
Speaker A
मुस्लिमों पर पाबंदियां सख्त होने लगी और फिर आया साल 1009 जब सनकी खलीफा अल हाकिम बी अम्र अल्लाह ने एक ऐसा हुक्म दिया जिसने पूरे ईसाई जगत को हिला कर रख दिया। उसने ईसाइयों के सबसे पवित्र चर्च ऑफ द
37:12
Speaker A
होली सेुलर को पूरी तरह ढहाने का आदेश दे दिया। सोचो जरा जब यूरोप के राजाओं और पोप तक यह खबर पहुंची होगी कि ईसा मसीह के दफन होने वाली पवित्र जगह को मलवे में तब्दील किया जा रहा है तो उनके दिलों में गुस्से
37:25
Speaker A
का कैसा तूफान उठा होगा। हालांकि बाद के सालों में चर्च को दोबारा बना दिया गया। लेकिन ईसाइयों के दिल में बैर की जो दीवार खड़ी हुई वो कभी ढह नहीं सकी। रही सही कसर साल 1054 के महान विभाजन ने पूरी कर दी।
37:39
Speaker A
जब ईसाई दुनिया दो हिस्सों में बंट गई। पश्चिम में रोमन कैथोलिक और पूर्व में ग्रीथ ऑर्थोडॉक्स। इस फूट के बाद यरूशलेम ऑर्थोडॉक्स चर्च के पाले में चला गया। जिससे रोम के पोप और तड़प उठे। गम और गुस्से का यह लावा अभी उबल ही रहा था कि
37:54
Speaker A
साल 1073 में मध्य एशिया से आए खूंखार सेजुक तुर्कों ने यरूशलेम पर अपना कब्जा जमा लिया। तुर्कों का राज आते ही अराजकता फैल गई। यूरोप से आने वाले ईसाई तीर्थ यात्रियों को रास्ते में लूटा जाने लगा। उनका उत्पीड़न होने लगा। अब बेंजाटाइन
38:10
Speaker A
एंपायर को भी तुर्कों से डर लगने लगा था। बेबस होकर बेंजाटाइन सम्राट एलेक्सियोस प्रथम ने पश्चिमी यूरोप के कैथोलिक राजाओं और रोम के पोप से मिलिट्री मदद मांगी। साल 1095 में फ्रांस के क्लमोट शहर में पोप अर्बन द्वितीय ने एक ऐसी तकरीर दी जिसने
38:27
Speaker A
आने वाले 200 सालों के लिए दुनिया को एक खूनी दलदल में झोंक दिया। उन्हें बेंजाटाइन की मदद के बहाने पूरी ईसाई दुनिया से यरूशलेम को मुसलमानों के चंगुल से आजाद कराने के लिए एक पवित्र धर्म युद्ध यानी कि क्रूसीड का ऐलान कर दिया।
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Speaker A
स्वर्ग के लालच और मजहब के नाम पर हजारों नाइट्स 2000 मील लंबे जानलेवा सफर पर निकल पड़े। उधर फातिमा दो ने 1098 में तुर्कों से यरूशलेम तो छीन लिया था लेकिन उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उत्तर से मौत का एक
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Speaker A
ऐसा सैलाब आ रहा है जो किसी को नहीं बखशेगा। जून 1099 में पहली क्रूसीड की फौज यरूशलेम की दीवारों के सामने पहुंच गई। कई हफ्तों की घेराबंदी के बाद 15 जुलाई 1099 को क्रूसीडरों ने शहर की दीवारों को लांघ
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Speaker A
दिया और इसके बाद जो हुआ वो इंसानियत के इतिहास का सबसे शर्मनाक और रूह कपा देने वाला मंजर था। शहर के भीतर घुसते ही इन तथाकथित धर्म योद्धाओं ने कत्लेआम का वो तांडव रच दिया कि यरूशलेम की गलियां
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Speaker A
इंसानी खून से लाल हो गई। अल अा मस्जिद के भीतर हजारों मुसलमानों को गाजर मूली की तरह काट दिया गया। यहूदियों को उनके सिनेगॉग के भीतर बंद करके जिंदा जला दिया गया। बच्चे, बूढ़े, औरतें जो भी सामने आया
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Speaker A
उसे मार दिया गया। तो अब सोचिए जरा खून के इस दरिया पर जिस यरूशलेम के ईसाई साम्राज्य की नींव रखी गई, वो कितने ही दिन टिकने वाला था? और जब इस कत्लेआम की खबर मुस्लिम दुनिया के दिल को चीरती हुई
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Speaker A
गुजरी तो क्या वहां कोई ऐसा सुल्तान उठने वाला था जो कुसडरों को उनकी ही भाषा में जवाब दे सके। [संगीत] कत्लेआम के इस खौफनाक मंजर के बाद ज्यादातर क्रूसेडर वापस यूरोप लौट गए। लेकिन वहीं कुछ रुक गए और उन्होंने
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Speaker A
यरूशलेम के ईसाई साम्राज्य की नींव रखी। मुसलमानों की अल अक्सा मस्जिद और डोम ऑफ रक्स को चर्च और महलों में बदल दिया गया। यूरोप से आने वाले ईसाई तीर्थ यात्रियों की संख्या रातोंरात बढ़ गई। अब इन तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा और सेवा के लिए
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Speaker A
इतिहास के सबसे मशहूर और रहस्यमई सैन्य गुटों का जन्म हुआ। जैसे नाइट्स टैंपलर और नाइट्स हॉस्पिटलर। नाइट्स टेंपलर ने अल अा मस्जिद को अपना हेड क्वार्टर बनाया। अगले करीब 100 सालों तक इन बख्तरबंद शूरवीरों की तलवारों के साए में यरूशलेम पर ईसाइयों
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Speaker A
का राज रहा। लेकिन मुस्लिम दुनिया इस बेइज्जती को भूल नहीं पाई। उन्हें इंतजार था एक ऐसे रहनुमा का जो बिखरी हुई मुस्लिम रियासतों को एक कर सके और आखिरकार इतिहास के रंगमंच पर एंट्री हुई एक ऐसे नाम की
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Speaker A
जिसकी बहादुरी और इंसाफ की कसमें आज भी खाई जाती हैं। सुल्तान सलाहाउद्दीन अयूब भी। अयूबीड राजवंश के सलाहाउद्दीन ने कसम खाई थी कि वह यरूशलेम को वापस लेकर रहेंगे। जुलाई 1187 में हातीन की ऐतिहासिक जंग में सलाहाउद्दीन की फौज ने क्रूसेडरों
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Speaker A
की रीड की हड्डी तोड़ दी। उनके राजा को बंदी बना लिया गया और नाइट्स के घमंड को मिट्टी में मिला दिया गया। इस बड़ी जीत के बाद सलाहाउद्दीन ने अपनी फौज का रुख सीधे यरूशलेम की तरफ मोड़ लिया। सिर्फ एक हफ्ते
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Speaker A
की घेराबंदी के बाद ईसाइयों ने घुटने टेक दिए। अब सोचिए जरा जब मुस्लिम सेना यरूशलेम के भीतर घुस रही थी तब ईसाइयों के दिलों में क्या खौफ रहा होगा। उन्हें लगा कि 88 साल पहले उनके पुरखों ने जो कत्लेआम
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Speaker A
मचाया था, सुल्तान की फौज उसका बदला उनकी खाल उधेड़ कर लेगी। लेकिन सलाहाउद्दीन ने जो किया, उसने इतिहास को हैरान कर दिया। उसने किसी मासूम को हाथ तक नहीं लगाया। बूढ़े, बच्चों और औरतों को ससम्मान शहर छोड़ने की इजाजत दी गई और जो लोग फिरौती
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Speaker A
नहीं दे सकते थे, सुल्तान ने अपने पास से पैसे देकर उन्हें आजाद करवाया। चर्च ऑफ द होली सेपुलर को तोड़ा नहीं गया बल्कि उसे स्थानीय ईसाइयों को सौंप दिया गया। यरूशलेम के इस तरह मुसलमानों के पास जाने की खबर जब यूरोप पहुंची तो वहां हड़कंप मच
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Speaker A
गया। रोम के पोप के बुलावे पर शुरू हुआ तीसरा क्रूसेड यानी कि तीसरा धर्म युद्ध। इस बार कमान संभाली खुद इंग्लैंड के सबसे खूंखार राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने। रिचर्ड और सलाहाउद्दीन के बीच कई भयानक जंग हुई। दोनों ने एक दूसरे की बहादुरी को
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Speaker A
तस्लीम किया। लेकिन रिचर्ड तमाम कोशिशों के बावजूद यरूशलेम को सलाहाउद्दीन से वापस नहीं छीन सका। आखिरकार एक संधि के साथ रिचर्ड को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। 13वीं सदी में भी यरूशलेम को लेकर यह खूनी खेल जारी रहा। साल 1219 में इस शहर की
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Speaker A
किलाबंदी को जानबूझकर ढहा दिया गया ताकि मिलिट्री के लिहाज से इसका महत्व कम हो सके और जंग रुक जाए। बीच में कुछ सालों के लिए यानी कि 1229 से 1244 तक ईसाइयों ने चालाकी से यरूशलेम पर दोबारा कब्जा भी कर
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Speaker A
लिया। लेकिन उनकी यह कोशिशें आखिरी बार साबित हुई। साल 1291 तक आते-आते मिस्र के खूंखार ममलूक सुल्तानों ने ईसाइयों के आखिरी ठिकानों को भी इस पावन धरती से उखाड़ फेंका। ममलूकों के 300 सालों के शासन के बाद साल 1516 में यरूशलेम ऑटोमन
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Speaker A
साम्राज्य का हिस्सा बन गया। सुल्तान सुलेमान द मैग्निफिसेंट के दौर में यरूशलेम की उन खूबसूरत और विशाल दीवारों को दोबारा बनाया गया जो आज भी हमें दिखाई देती है। ऑटोमन काल में यहां एक बार फिर से शांति और धार्मिक [संगीत] सद्भाव का
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Speaker A
दौर लौटा। एक ही दीवार के साए में चर्च की घंटियां, सिनेगॉग की प्रार्थनाएं और मस्जिदों की आज एक साथ गूंजने लगी। लेकिन वक्त के साथ ऑटोमन साम्राज्य कमजोर होने लगा और 18वीं और 19वीं सदी तक आते-आते यरूशलेम दुनिया के नक्शे पर एक पिछड़ा और
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Speaker A
भूला बिसरा शहर बनकर रह गया जिसकी आबादी मुश्किल से 8000 थी। पूरा शहर 1 वर्ग किलोमीटर के भीतर चार हिस्सों में बंटा हुआ था। मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और अरर्मेनियाई लोग अपनी-अपनी सीमाओं में शांति से रह रहे थे। लेकिन यह शांति एक
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Speaker A
बहुत बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा थी। 19वीं सदी के अंत में जब ऑटोमन साम्राज्य के पतन की उल्टी गिनती शुरू हुई, तो यूरोप की महाशक्तियों की गिद्ध जैसी नजरें एक बार फिर यरूशलेम पर टिक गई। सिर्फ ईसाई
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Speaker A
देश ही नहीं बल्कि यूरोप में जुल्म और नफरत का शिकार हो रहे हजारों यहूदी भी चुपके-चपके वापस अपनी इन पूर्वजों की भूमि पर लौटने लगे थे। तो अब सोचिए जरा सदियों बाद जब हजारों यहूदी वापस यरूशलेम की सरजमी पर कदम रख रहे थे और उधर सदियों से
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Speaker A
रह रहे अरब मुसलमान वहां पहले से मौजूद थे तो इन दो संस्कृतियों के टकराने से कौन सी नई जंग का आगाज होने वाला था और कैसे 20वीं सदी की शुरुआत में इस पवित्र शहर की किस्मत एक ऐसी आग में झुलसने वाली थी जो
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Speaker A
आज तक नहीं बुझ पाई है। 19वीं सदी के ढलते ढलते यरूशलेम की वो पुरानी दीवारें छोटी पड़ने लगी थी। आबादी इस कदर बढ़ चुकी थी कि लोग प्राचीन शहर से बाहर निकलकर नया यरूशलेम बसाने लगे। रूस ने अपने तीर्थ यात्रियों के लिए आलीशान
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Speaker A
परिसर बनवाया। तो वहीं सर मोसेस मंटिफियर जैसे अमीर और रसूखदार यहूदियों ने अपने लोगों को वापस वहां आकर बसने के लिए मोटी रकम पानी की तरह बहा दिया। साल 1882 तक आते-आते 25,000 से ज्यादा यहूदी प्रवासी यरूशलेम पहुंच चुके थे। जिससे शहर का पूरा
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Speaker A
ताना-बाना बदलने लगा था और फिर आया साल 1917 जब पहले विश्व युद्ध की तपीश ने सदियों पुराने ऑटोमन साम्राज्य को हमेशा के लिए खाक में मिला दिया। ब्रिटिश जनरल एडममंड एलनबी ने अपनी फौज के साथ यरूशलेम में कदम रखा और शहर सीधे ब्रिटिश मिलिट्री
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Speaker A
के कंट्रोल में आ गया। लेकिन अंग्रेजों ने यहां एक ऐसा जाल बुना जिसकी उलझन आज 21वीं सदी में भी सुलझ नहीं पाई है। यह सुनके अजीब लगता है ना कि अंग्रेजों ने एक ही जमीन के लिए दो अलग-अलग लोगों से दो
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Speaker A
बड़े-बड़े वादे कर दिए। एक तरफ उन्होंने बारफोर घोषणा के जरिए दुनिया भर के यहूदियों से वादा किया कि वह फिलिस्तीन की धरती पर यहूदियों के लिए एक नया देश बनाएंगे। वहीं दूसरी तरफ विश्व युद्ध में तुर्कों के खिलाफ मदद के लिए उन्होंने अरब
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Speaker A
के मुसलमानों से भी एक आजाद मुल्क का वादा रख दिया था। इन दो विरोधी वादों के बीच साल 1922 में ब्रिटिश मैंडेट की शुरुआत हुई। अगले 25 सालों में यरूशलेम की आबादी 52,000 से छलांग लगाकर 1,65,000 के पार
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Speaker A
पहुंच गई। अब इस शहर में 1/3 अरब मुसलमान थे और दो तिहाई यहूदी जो यूरोप में हिटलर के जुल्मों से बचकर भाग रहे थे। दो ऐसी कौमों के बीच तनाव चरम पर था जो दोनों ही एक ही जमीन को अपनी विरासत मानती थी। साल
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Speaker A
1920 और 30 के दशक में हर गली हर चौराहे पर दंगे होने लगे। यरूशलेम की पवित्र हवा में अब बारूद और नफरत की गंध घुल चुकी थी। आखिरकार इस खूनी दलदल से तंग आकर अंग्रेजों ने हाथ खड़े कर दिए और मामला
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Speaker A
पहुंचा संयुक्त राष्ट्र के पास। 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने इस जमीन को हमेशा हमेशा के लिए जख्मी कर दिया। उन्होंने फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव रखा। एक यहूदियों के लिए यानी कि इसराइलियों के
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Speaker A
लिए और दूसरा अरबों के लिए। लेकिन यरूशलेम का क्या? धार्मिक भावनाओं को देखते हुए यरूशलेम को किसी एक को नहीं दिया गया। बल्कि इसे इंटरनेशनल कंट्रोल में एक न्यूट्रल ज़ोन बनाने का फैसला हुआ। लेकिन कागज पर खींची यह लकीर जमीन पर बहते खून
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Speaker A
को नहीं रोक सकी। दोनों पक्षों ने इस बंटवारे को मानने से इंकार कर दिया। और 1947 के अंत तक आते-आते यरूशलेम एक भयंकर युद्ध का मैदान बन गया। 1948 में जैसे ही ब्रिटिश सेना यहां से निकली, यहूदियों ने
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Speaker A
अपने नए देश इजराइल का ऐलान कर दिया। इसके तुरंत बाद आसपास के अरब देशों ने इजराइल पर हमला बोल दिया और छिड़ गई पहली अरब इजराइली जंग। 9 महीनों की भीषण और दर्दनाक मारकाट के बाद जब तोपें शांत हुई तो
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Speaker A
यरूशलेम का दिल दो टुकड़ों में चीर दिया गया था। शहर के बीचोंबीच कटीले तारों की एक खूनी दीवार खड़ी कर दी गई थी। पश्चिमी यरूशलेम पर इजराइल का कब्जा हुआ जबकि प्राचीन ऐतिहासिक शहर समेत पूर्वी यरूशलेम जॉर्डन के हिस्से में चला गया। यहूदी अपने
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Speaker A
ही देश में अपनी सबसे पवित्र वेस्टर्न वॉल से दूर कर दिए गए। यह बंटवारा कोई अंत नहीं था बल्कि आने वाली अनगिनत जंगों की एक खौफनाक शुरुआत थी। आज सदियां गुजर चुकी हैं। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई? लेकिन
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Speaker A
1 वर्ग किलोमीटर के पवित्र टुकड़े पर किसका हक है? यह सवाल आज भी यरूशलेम की गलियों में गूंजता रहता है। मंदिर, मस्जिद और चर्च के साए में आज भी बंदूकें तनी रहती है और इतिहास का यह सबसे पवित्र शहर
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Speaker A
आज भी इंसानियत के सबसे बड़े इम्तिहान की तरह हमारे सामने खड़ा है। तो दोस्तों, क्या इस पवित्र शहर की मिट्टी को कभी मुकम्मल शांति नसीब होगी? क्या कोई ऐसा रास्ता है जिससे तीन अलग-अलग धर्मों के लोग इस जमीन पर बिना डर और नफरत के एक साथ
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Speaker A
रह सकें? अपनी राय मुझे कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताइए। और हां, अगर यरूशलेम के इतिहास का यह सफर आपको पसंद आया हो, तो अपने इस दोस्त के चैनल को लाइक और [संगीत] सब्सक्राइब करना ना भूलें। मिलेंगे ऐसे ही
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Speaker A
एक और दिलचस्प और अनसुनी इतिहास की कहानी के साथ। तब तक के लिए नमस्कार।
Topics:यरूशलेमइतिहासयहूदी धर्मईसाई धर्ममुस्लिम धर्मसोलोमन का मंदिररोमन साम्राज्यमक्काबी बगावतनबूक दनेजरसाइरस द ग्रेट

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