ऑस्ट्रेलिया का इतिहास कैदियों की जेल से विकसित समृद्ध राष्ट्र बनने तक का सफर है।
Key Takeaways
- ऑस्ट्रेलिया का इतिहास कैदियों की जेल से विकसित समृद्ध राष्ट्र बनने का प्रेरणादायक सफर है।
- मूल निवासी एबो रीजनल लोगों की सांस्कृतिक विरासत और संघर्ष महत्वपूर्ण हैं।
- ब्रिटेन की कॉलोनियल नीतियों ने देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया।
- गोल्ड रश और युद्धों ने ऑस्ट्रेलिया के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई।
- आधुनिक ऑस्ट्रेलिया ने अपने अतीत के काले पहलुओं को समझते हुए एक विकसित लोकतांत्रिक राष्ट्र का रूप लिया।
What the video covers
- 150 साल पहले ऑस्ट्रेलिया में औसत जीवनकाल केवल 35 साल था, आज यह दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक है।
- 65,000 साल पहले एशिया से आए आदिवासी ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी बने, जिनकी अलग-अलग भाषाएं और संस्कृतियां थीं।
- 1606 में डच नाविक विलियम जासूम ने ऑस्ट्रेलिया के तट पर पहली नजर डाली, लेकिन डचों ने बस्तियां नहीं बसाईं।
- 18वीं सदी में ब्रिटिश नाविक कैप्टन जेम्स कुक ने ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट का नक्शा बनाया और ब्रिटेन को दावा दिया।
- 1775 में अमेरिका की स्वतंत्रता के बाद ब्रिटेन ने कैदियों को भेजने के लिए ऑस्ट्रेलिया को चुना।
- 1788 में ब्रिटिश फर्स्ट फ्लट ऑस्ट्रेलिया पहुंचा और सिडनी की स्थापना हुई, जहां कैदियों को कठोर श्रम कराया गया।
- 1804 में कैसल हिल में कैदियों ने पहली बड़ी बगावत की, और 1808 में रम बगावत हुई।
- ब्रिटिश शासन के दौरान एबो रीजनल लोगों की आबादी और जीवन पर भारी प्रभाव पड़ा।
- 19वीं सदी में गोल्ड रश ने ऑस्ट्रेलिया की आबादी और आर्थिक स्थिति को तेजी से बढ़ाया।
- 20वीं सदी में ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिटेन से दोस्ती बदलकर अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाए और आधुनिक राष्ट्र बना।
Chapters
- 00:00ऑस्ट्रेलिया का प्रारंभिक इतिहास और जीवन स्तर
- 01:08कैदियों की जेल से विकसित राष्ट्र बनने की शुरुआत
- 02:21डच नाविकों की खोज और न्यू हॉलैंड का नामकरण
- 03:35ब्रिटिश नाविक कैप्टन जेम्स कुक का आगमन
- 05:00ब्रिटेन की अमेरिका में हार और नई कॉलोनी की तलाश
- 07:32फर्स्ट फ्लट का आगमन और सिडनी की स्थापना
- 09:52कैदियों की बगावतें और ब्रिटिश शासन की चुनौतियां
- 11:07गोल्ड रश और ऑस्ट्रेलिया की तेजी से बढ़ती आबादी
- 13:3020वीं सदी में ऑस्ट्रेलिया का आधुनिकरण और युद्धों में भूमिका
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Speaker A
सोचो जरा, क्या कोई ऐसा देश हो सकता है जहां आज से सिर्फ 150 साल पहले एक नए जन्मे बच्चे की औसत उम्र सिर्फ 35 साल हुआ करती थी, लेकिन आज वही देश पूरी दुनिया के लिए ऐशो आराम और बेहतर जिंदगी का सबसे बड़ा पैमाना बन चुका है।
Speaker A
जी हां, हम बात कर रहे हैं ऑस्ट्रेलिया की। आज के दौर में ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे अमीर और विकसित देशों में गिना जाता है। वहां की पढ़ाई, वहां का इलाज और वहां मिलने वाली सैलरी इतनी शानदार है कि हर कोई बस वहां बसने के सपने देखता है।
Speaker A
सिडनी, मेलबर्न, ब्रिसबेन, पर्थ और एडिलेड यह पांचों शहर हर साल दुनिया के सबसे बेहतरीन शहरों के लिस्ट में टॉप पर आते हैं। आज वहां पुरुष औसतन 81 साल और महिलाएं 85 साल तक जीती हैं।
Speaker A
लेकिन क्या ऑस्ट्रेलिया हमेशा से ऐसा ही था? बिल्कुल नहीं। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटे, तो आज से कुछ सदियों पहले का ऑस्ट्रेलिया किसी खौफनाक सपने जैसा था।
Speaker A
यह एक ऐसा बेरहम और सूखा इलाका था जहां अंग्रेजों द्वारा उन कैदियों को भेजा जाता था जिन्हें सबसे कड़ी सजा देनी होती थी। यानी जिसे आज लोग स्वर्ग समझते हैं, वो कभी ब्रिटेन की एक ऐसी जेल थी जहां पैर रखते ही इंसान अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठता था।
Speaker A
तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि कैदियों को सजा देने वाली यह काल कोठरी आज दुनिया का सबसे आलीशान देश बन गई। इस हैरान कर देने वाले सफर की शुरुआत आज से करीब 65,000 साल पहले हुई थी।
Speaker A
आखिरी हिमयुग के खत्म होने के समय एशिया के रास्ते कुछ इंसानों ने पहली बार इस विशाल और अनजान जमीन पर कदम रखा। यह वो शुरुआती खोजी थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया को अपना पहला घर बनाया। धीरे-धीरे यह लोग उत्तर के द्वीपों से लेकर दक्षिण के तस्मानिया तक फैल गए।
Speaker A
यही लोग आगे चलकर ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी यानी एबो रीजनल कहलाए। सोचो जरा, यूरोपियन लोगों के आने से पहले तक यहां ऐसे 500 से भी ज्यादा अलग-अलग आदिवासी कबीले रहा करते थे, जिनकी अपनी अनोखी भाषाएं और अपनी जमीनें थीं।
Speaker A
हजारों सालों तक इन कबीलों की जिंदगी बिना किसी बाहरी दखल के प्रकृति की गोद में बेहद शांति से चल रही थी। लेकिन फिर आई 17वीं सदी की शुरुआत, जिसने इन मूल निवासियों की तकदीर को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया।
Speaker A
यह वह दौर था जब यूरोप के देशों में नए समुद्री रास्तों और अनजानी जमीनों को खोजने का एक जुनून सा सवार था। उस जमाने के यूरोपीय विचारकों का मानना था कि अगर दुनिया के उत्तरी हिस्से में इतने बड़े-बड़े देश हैं, तो धरती का संतुलन बनाए रखने के लिए दक्षिणी हिस्से में भी कोई बहुत बड़ा महाद्वीप होना चाहिए।
Speaker A
इस काल्पनिक जमीन को लैटिन भाषा में नाम दिया गया टेरा ऑस्ट्रेलियस यानी दक्षिण की अनजान भूमि। इस अनजान भूमि पर पहली बार किसी यूरोपीय की नजर साल 1606 में पड़ी, जब विलियम जासूम नाम के एक डच कप्तान का जहाज ऑस्ट्रेलिया के तट पर पहुंचा।
Speaker A
उस दौर में डच यानी हॉलैंड के व्यापारी पूरी दुनिया में मसालों के कारोबार पर कब्जा जमाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहे थे। इंडोनेशिया के द्वीपों से कीमती मसालों का व्यापार करने वाली डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने नए रास्तों की तलाश में कई नाविकों को काम पर लगाया था।
Speaker A
आने वाले कुछ दशकों में डेरक हर्टोब और एवेल तस्मान जैसे डच खोजियों ने ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों और तस्मानिया जैसे द्वीपों के नक्शे तैयार किए। डच लोगों ने इस नई जमीन का नाम रखा न्यू हॉलैंड।
Speaker A
लेकिन यह सुनकर अजीब लगता है ना कि जिस देश पर डच लोगों ने सबसे पहले हक जताया, उन्होंने वहां अपनी बस्तियां बसाने से साफ इंकार कर दिया। डच ईस्ट इंडिया कंपनी को लगा कि इस बेहद दूर सूखे और बंजर दिखने वाले इलाके में इंसानों को भेजना घाटे का सौदा होगा।
Speaker A
क्योंकि उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ कीमती मसालों के व्यापार से मुनाफा कमाने पर था। नतीजा यह हुआ कि अगले 100 सालों तक यूरोप का कोई भी जहाज इस तरफ नहीं भटका।
Speaker A
लेकिन फिर आया 18वीं सदी का वो दौर जब ब्रिटेन का एक जांबाज नाविक इस ठंडे पड़े इतिहास में फिर से आग सुलगाने वाला था।
Speaker A
तो कौन था वह नाविक और कैसे उसने इस बंजर जमीन को ब्रिटिश साम्राज्य का नया ठिकाना बना दिया?
Speaker A
डच लोगों के पीछे हट जाने के बाद करीब 100 सालों तक ऑस्ट्रेलिया के तट सूने पड़े रहे। लेकिन 18वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन ने दुनिया के समुद्रों पर अपना दबदबा बनाना शुरू कर दिया।
Speaker A
और यही वह मोमेंट था जब इतिहास के पन्नों पर एंट्री हुई कैप्टन जेम्स कुक की। साल 1768 से 1779 के बीच कैप्टन कुक ने अपने जहाज एंडेवर के साथ प्रशांत महासागर की तीन ऐसी ऐतिहासिक यात्राएं की, जिसने पूरी दुनिया के भूगोल को ही बदल कर रख दिया।
Speaker A
अप्रैल 1770 में कैप्टन कुक की नजर पहली बार ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर पड़ी। जब वह और उनके साथी इस अनजान जमीन पर उतरे तो वहां के अनोखे पेड़ पौधों और जीव-जंतुओं को देखकर दंग रह गए।
Speaker A
जहाज के मुख्य वैज्ञानिक जोसेफ बैंक्स ने वहां से इतने सारे प्राकृतिक नमूने इकट्ठा किए कि कैप्टन कुक ने उस जगह का नाम ही बॉटनी वे यानी वनस्पतियों की खाड़ी रख दिया।
Speaker A
वहां एक हफ्ता बिताना और स्थानीय आदिवासियों से संपर्क की नाकाम कोशिश के बाद कुक ने लंगर उठाया और उत्तर की तरफ बढ़ गए। उन्होंने इस पूरे पूर्वी हिस्से पर ब्रिटेन का दावा ठोक दिया और इसे नाम दिया न्यू साउथ वेल्स।
Speaker A
जब कैप्टन कुक वापस ब्रिटेन लौटे तो उन्होंने सरकार को बताया कि बॉटनी बे का इलाका इंसानी बस्ती के लिए एकदम परफेक्ट है। लेकिन यह सुनकर अजीब लगता है कि दावा करने के बावजूद अंग्रेजों ने कई सालों तक वहां कोई बस्ती नहीं बसाई।
Speaker A
अगर अमेरिका में एक बहुत बड़ा धमाका ना हुआ होता तो शायद अंग्रेज कभी ऑस्ट्रेलिया का रुख भी ना करते।
Speaker A
तारीख थी साल 1775, जब अटलांटिक महासागर के उस पार अमेरिका के 13 राज्यों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हथियारों के दम पर बगावत का ऐलान कर दिया।
Speaker A
8 सालों तक चले इस भयानक युद्ध के बाद अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी और दुनिया के नक्शे पर एक नए देश का उदय हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका।
Speaker A
इस हार से ब्रिटिश साम्राज्य की कमर तो टूटी ही थी, साथ ही उसके सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया।
Speaker A
दरअसल पिछले करीब 100 सालों से ब्रिटेन अपने देश के छोटे-मोटे अपराधियों और कैदियों को अमेरिका की कॉलोनियों में भेज दिया करता था ताकि वहां मजदूरी कराई जा सके।
Speaker A
अब अमेरिका के आजाद होने के बाद यह रास्ता हमेशा के लिए उनके लिए बंद हो चुका था। ब्रिटेन की जेलें कैदियों से खचाखच भर चुकी थीं।
Speaker A
हालात इतने बदतर थे कि पुरानी और कबाड़ हो चुकी नावों को तैरती हुई जेलों में बदलकर कैदियों को ठूस-ठूस कर रखा जाने लगा था।
Speaker A
इस भयानक बीमारी और गंदगी से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार को तुरंत एक नई जगह की तलाश थी और तभी उन्हें याद आया कैप्टन कुक का वह न्यू साउथ वेल्स।
Speaker A
आखिरकार साल 1787 के मई महीने में फर्स्ट फ्लट यानी 11 जहाजों का एक बेड़ा ब्रिटेन के तट से रवाना हुआ। इस बेड़े में करीब 1400 लोग सवार थे, जिनमें से आधे से ज्यादा खूंखार और छोटे-मोटे कैदी थे।
Speaker A
जिन्हें दुनिया के दूसरे कोने पर हमेशा के लिए डिपोर्ट किया जा रहा था। अब सोचो जरा, 7 महीनों के जानलेवा समुद्री सफर भूख और बीमारियों का सामना करते हुए जनवरी 1788 में यह बेड़ा बॉटनी वे पहुंचा।
Speaker A
लेकिन वहां कदम रखते ही कप्तान आर्थर फिलिप को समझ आ गया कि कैप्टन कुक ने जो रिपोर्ट दी थी, असलियत उससे कोसों दूर थी।
Speaker A
वहां ना तो पीने के साफ पानी का अच्छा स्रोत था और ना ही खेती के लायक जमीन। वक्त कम था और चुनौतियां पहाड़ जैसी।
Speaker A
कप्तान फिलिप ने बिना वक्त गवाए उत्तर की तरफ रुख किया और कुछ ही मील दूर उन्हें कुदरत का बनाया एक बेहद खूबसूरत और सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाह मिल गया।
Speaker A
26 जनवरी 1788 को उन्होंने इसी जगह पर ब्रिटिश झंडा गाड़ दिया, जिसे आज पूरी दुनिया सिडनी के नाम से जानती है।
Speaker A
गवर्नर फिलिप के कड़े अनुशासन में कैदियों से दिन-रात पत्थरों को तोड़ने और बंजर जमीन को खोदने का कड़ा काम दिया जाने लगा।
Speaker A
अगले कुछ सालों में सेकंड फ्लट और थर्ड फ्लट भी सिडनी के तट पर आ पहुंची, जिससे कैदियों की तादाद रातोंरात बढ़ गई।
Speaker A
लेकिन जहां इतने सारे मुजरिम और उन्हें काबू करने वाले क्रूर सैनिक एक साथ रहेंगे, वहां शांति भला कैसे रह सकती थी।
Speaker A
साल 1804 में सिडनी के पास कैसल हिल नाम के एक इलाके में कैदियों ने अपनी बेड़ियों को पिघलाकर हथियार बना लिए और ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की पहली बड़ी बगावत कर दी।
Speaker A
हालांकि ब्रिटिश फौज ने इस विद्रोह को बेहद बेरहमी से कुचल दिया। मगर ट्विस्ट तो अभी आना बाकी था।
Speaker A
इस बगावत के ठीक 4 साल बाद यानी 1808 में खुद ब्रिटिश सेना के एक टुकड़े ने अपने ही गवर्नर विलियम ब्लाई का तख्ता पलट कर दिया।
Speaker A
यह इतिहास में रम बगावत यानी कि रम रेबेलियन के नाम से कुख्यात है, क्योंकि यह सैनिक वहां शराब यानी रम के अवैध झंडे में डूबे हुए थे और गवर्नर उनके आड़े आ रहा था।
Speaker A
ऑस्ट्रेलिया के पूरे इतिहास में हथियारों के बल पर सरकार का तख्तापलट करने की यह पहली और आखिरी घटना थी।
Speaker A
इस अराजकता को खत्म करने के लिए ब्रिटेन से एक नए गवर्नर लेचरल मैक्वरी को भेजा गया, जिन्होंने सिडनी की सूरत बदल दी।
Speaker A
लेकिन जैसे-जैसे अंग्रेजों का यह सिडनी शहर बड़ा हो रहा था, वैसे-वैसे वहां के मूल निवासियों यानी एबो रीजनल लोगों की जिंदगी पर मौत का साया मंडराने लगा था।
Speaker A
तो आखिर ऐसा क्या था जो अंग्रेजों के जहाजों में छिप कर आया था और जिसने इन आदिवासियों की आधी आबादी को पलक झपकते ही खत्म कर दिया?
Speaker A
सिडनी अब सिर्फ कैदियों का ठिकाना नहीं रह गया था, बल्कि एक शहर की शक्ल ले चुका था।
Speaker A
अंग्रेजों की कामयाबी देखकर फ्रांसीसी ख...
Speaker A
फैलते ही पूरी दुनिया में गोल्ड रश यानी सोना पाने का एक अंधा पागलपन शुरू हो गया। सोचो जरा सिर्फ 10 सालों के भीतर ऑस्ट्रेलिया की आबादी 4 लाख से बढ़कर 11 लाख के पार पहुंच गई। ब्रिटेन, अमेरिका और
Speaker A
यहां तक कि चीन से भी हजारों मजदूर अपनी किस्मत चमकाने के लिए इन सोने की खदानों की तरफ दौड़ पड़े। लेकिन जल्द ही आसानी से मिलने वाला सोना खत्म हो गया। जो लोग अमीर नहीं बन पाए उन पर ब्रिटिश प्रशासन ने
Speaker A
भारी टैक्स लगा दिया। इस जुल्म के खिलाफ दिसंबर 1854 में खादान [संगीत] मजदूरों ने खुला विद्रोह कर दिया जिसे यूरो का स्टॉकड की लड़ाई कहा जाता है। हालांकि सरकारी फौज ने इस विद्रोह को कुचल दिया और बागियों को
Speaker A
गिरफ्तार कर लिया। लेकिन जब अदालत में मुकदमा चला तो ऑस्ट्रेलिया की जनता बागियों के समर्थन में खड़ी हो गई। अदालत को मजबूरन सबको बरी करना पड़ा और यही वह ऐतिहासिक पल था जब ऑस्ट्रेलियाियाई समाज में बराबरी और इंसाफ की भावना की नीव
Speaker A
पड़ी। 19वीं सदी के खत्म होते-होते ऑस्ट्रेलिया आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया। बेरोजगारी बढ़ गई और मजदूर यूनियनों का जन्म हुआ। लेकिन इस मुश्किल दौर ने वहां के लोगों के भीतर एक नई पहचान को जन्म दिया। वह अब खुद को ब्रिटिश उपनिवेश
Speaker A
नहीं बल्कि एक आजाद देश के रूप में देखने लगे थे। तो क्या छह अलग-अलग हिस्सों में बंटा यह महाद्वीप एक हो पाया और 20वीं सदी की शुरुआत में इस देश ने ऐसा कौन सा काला कानून बनाया जिसने इंसानियत के चेहरे पर
Speaker A
काली पोत दी। 20वीं सदी की सुबह ऑस्ट्रेलिया के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई। अलग-अलग टुकड़ों में बंटी छह कॉलोनियों के लोगों को अब समझ आ चुका था कि अगर दुनिया के नक्शे पर सिर उठाकर जीना है तो एक होना पड़ेगा। सालों
Speaker A
की लंबी बातचीत और बहसों के बाद आखिरकार लंदन की ब्रिटिश संसद ने एक बिल पास किया और फिर आई तारीख 1 जनवरी 1901 जब गवर्नर जनरल लॉर्ड होपटाउन ने कॉमनव्थ ऑफ ऑस्ट्रेलिया यानी एक नए आजाद मुल्क का ऐलान किया। सर एडममंड बार्टन इस नए देश के
Speaker A
पहले प्रधानमंत्री बने। लेकिन यह सुनकर ही अजीब लगता है कि जिस देश की बुनियाद ही बराबरी और इंसाफ के वादों पर रखी गई थी, उसने आजाद होते ही सबसे पहला काम क्या किया? अपनी हुकूमत संभालते ही इस नई सरकार
Speaker A
ने एक ऐसा कानून पास किया जिसे इतिहास वाइट ऑस्ट्रेलिया पॉलिसी के काले [संगीत] नाम से जानता है। इस कानून के तहत किसी भी गैर यूरोपीय शख्स खासकर एशिया के लोगों के ऑस्ट्रेलिया में घुसने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई। अब सोचो जरा यह एक तरह का ऐसा
Speaker A
सरकारी नस्लवाद था जिसका मकसद सिर्फ यह था कि ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर सिर्फ गोरे लोग ही राज कर सके और तरक्की के सारे मौके सिर्फ उनके पास रहे। इसके लिए वहां के मूल निवासियों यानी एबो रीजनल लोगों को तो
Speaker A
उनके बुनियादी हकों से भी महरूम कर दिया गया। ऑस्ट्रेलिया अभी अपनी इस नई और विवादित पहचान को संभाल ही रहा था कि साल 1914 में दुनिया के शतेज पर प्रथम विश्व युद्ध के काले बादल छा गए। हालांकि युद्ध
Speaker A
यूरोप की जमीन पर लड़ा जा रहा था। लेकिन ऑस्ट्रेलिया अपनी मातृभूमि ब्रिटेन को कैसे अकेला छोड़ सकता था। इस नए देश के हजारों नौजवानों ने जोश में आकर फौज का दामन थाम लिया। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के इन जांबाज सैनिकों को मिलाकर एक खास
Speaker A
टुकड़ी बनाई गई जिसे नाम मिला एनजेक और यही वो मोमेंट था जब साल 1915 में इन सैनिकों को तुर्की के गैलीपॉली तट पर एक बेहद खतरनाक मिशन पर भेजा गया। मिशन था ऑटोमन तुर्की की सेना को हराकर उस समुद्री
Speaker A
रास्ते पर कब्जा करना। लेकिन वहां पहुंचते ही पासा पलट गया। तुर्की की फौज चट्टानों के ऊपर मशीन गन लेकर बैठी थी और ऑस्ट्रेलियाई सैनिक नीचे खुले मैदान और समुंदर के किनारे फंस गए। अब सोचो वो मंजर कितना खौफनाक रहा होगा। महीनों तक चली इस
Speaker A
घेराबंदी में आसमान से गोलियों और तोपों के गोलों की बारिश हो रही थी। चारों तरफ लाशें, खून की दरिया और तड़पते हुए सैनिकों की चीखें थी। इस जानलेवा जंग में ब्रिटेन और फ्रांस की बड़ी योजनाएं बुरी तरह फेल हो गई और उन्हें भारी नुकसान
Speaker A
उठाकर पीछे हटना पड़ा। हालांकि यह अभियान एक बड़ी हार के साथ खत्म हुआ। लेकिन गैलीपॉली की इस तबाही ने ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों को पूरी दुनिया में एक नई पहचान दी। एक ऐसी पहचान जो अपनी बहादुरी, वफादारी और हर मुश्किल हालात में
Speaker A
मुस्कुराते हुए जान न्योछावर करने के लिए जानी जाती थी। साल 1918 में जब विश्व युद्ध खत्म हुआ, तो इस छोटे से देश ने अपनी आजादी के हिसाब से सबसे बड़ी कीमत चुकाई थी। 3,24,000 से भी ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों ने समंदर पार जाकर
Speaker A
जंग लड़ी थी। जिनमें से 60,000 कभी वापस लौट कर अपने घर नहीं आए और 1.5 लाख से ज्यादा बुरी तरह जख्मी हो गए। युद्ध के बाद के साल ऑस्ट्रेलिया के लिए मिलेजुले रहे। 1931 में उसे ब्रिटेन से और ज्यादा
Speaker A
आजादी यानी कि डोमिनियन स्टेट का दर्जा मिल गया। लेकिन तभी पूरी दुनिया महान आर्थिक मंदी की चपेट में आ गई। फैक्ट्रियां बंद हो गई, नौकरियां चली गई और लोग दाने-दाने को तरसने लगे। लेकिन इस घोर निराशा के दौर में भी कुछ ऐसी चीजें
Speaker A
[संगीत] हुई जिन्होंने ऑस्ट्रेलियाई लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी। साल 1920 में क्वांट्स नाम की उनकी राष्ट्रीय एयरलाइन की शुरुआत हुई और 1927 में सर चार्ल्स किंग्स फोर्ड स्मिथ ने हवाई जहाज से पूरे ऑस्ट्रेलिया का चक्कर लगाकर
Speaker A
दुनिया को हैरान कर दिया। खेल के मैदान पर भी एक नया जादूगर चमका जिसका नाम था सर डॉन ब्रडमैन। क्रिकेट की पिच पर ब्रैडमैन जब बल्ला घुमाते थे तो मंदी का सारा गम भूलकर पूरा ऑस्ट्रेलिया जश्न मनाने लगता
Speaker A
था। इसी के साथ फायर लैप नाम के एक रेस के घोड़े ने लगातार रेस जीतकर देश के लोगों में एक नया जोश भर दिया। साल 1939 तक आते-आते ऑस्ट्रेलिया मंदी के इस दलदल से बाहर निकल ही रहा था कि अचानक यूरोप से
Speaker A
फिर दूसरे विश्व युद्ध का सायरन गूंज उठा। लेकिन इस बार खतरा सिर्फ यूरोप में नहीं था बल्कि इस बार मौत का एक खूंखार साया खुद ऑस्ट्रेलिया की सरहदों के बिल्कुल करीब मंडरा रहा था। यानी जापान का साम्राज्य। तो अब सोचिए जरा जब जापान की
Speaker A
वायुसेना ने खुद ऑस्ट्रेलिया की धरती पर बम बरसाने शुरू किए तब पहली बार अंग्रेजों के भरोसे रहने वाले इस देश को क्या एहसास हुआ होगा और कैसे इस महायुद्ध ने ऑस्ट्रेलिया को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। साल 1939 में जब दूसरा विश्व युद्ध
Speaker A
शुरू हुआ तो ऑस्ट्रेलिया ने एक बार फिर अपनी वफादारी निभाते हुए ब्रिटेन का साथ देने का फैसला किया। उनके हजारों जांबाज सैनिक यूरोप के मैदानों से लेकर उत्तरी अफ्रीका के तपते रेगिस्तानों तक मोर्चे पर डटे रहे। लेकिन इस बार कहानी पिछली जंग
Speaker A
जैसी नहीं थी। इस बार एक ऐसा खूंखार दुश्मन खड़ा था जिसकी नजरें सीधे ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर टिकी थी। वह था जापान का साम्राज्य और यही वह मोमेंट था जब ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में पहली बार युद्ध की आग खुद उसकी अपनी सरजमी तक पहुंच
Speaker A
गई। फरवरी 1942 में जापान की वायुसेना ने ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी शहर डार्विन पर ताबड़तोड़ बम बरसाने शुरू किए। सोचो जरा वो मंजर कितना खौफनाक रहा होगा। आसमान से बरसते गोलों ने बंदरगाहों को मलबे में तब्दील कर दिया। जहाज धू-धू कर जलने लगे
Speaker A
और चारों तरफ चीखपकार मच गई। बात यहीं नहीं रुकी। जापानी और जर्मन पनडुब्बियों ने ऑस्ट्रेलिया के समुद्री रास्तों में घुसकर उनके मालवाहक जहाजों को डूबाना शुरू कर दिया और जून 1942 में सिडनी के बंदरगाहों पर भी हमला बोल दिया। इस बड़े
Speaker A
संकट के बीच ऑस्ट्रेलिया को एक कड़वा सच समझ में आ गया। उसे एहसास हो गया कि दुनिया के दूसरे कोने पर बैठा ब्रिटेन अब खुद इतना कमजोर हो चुका है कि वो उनकी रक्षा नहीं कर सकता। अपनी जान बचाने के
Speaker A
लिए ऑस्ट्रेलिया ने इतिहास में पहली बार अपनी कूटनीति बदली और लंदन का हाथ छोड़कर वाशिंगटन यानी अमेरिका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाियाई फौजों ने मिलकर प्रशांत महासागरों के जंगलों और द्वीपों में जापानी सेना का
Speaker A
मुकाबला किया और आखिरकार 1954 में इस महायुद्ध का अंत हुआ। युद्ध खत्म होने के बाद ऑस्ट्रेलिया की तकदीर पूरी तरह बदल गई। देश को समझ आ चुका था कि अगर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है और अपनी जमीन की रक्षा करनी है तो आबादी [संगीत]
Speaker A
बढ़ानी होगी। इसी सोच के साथ शुरू हुआ पॉपुलेट और पेरिश यानी आबादी बढ़ाओ या मिट जाओ का दौर। युद्ध से तबाह हो चुके यूरोप खासकर इटली, ग्रीस और जर्मनी से हजारों लोग एक बेहतर जिंदगी की तलाश में ऑस्ट्रेलिया आने लगे। यह सुनकर अजीब लगता
Speaker A
है ना कि जो देश कभी सिर्फ गोरों के लिए वाइट ऑस्ट्रेलिया की रट लगाता था, उसे आर्थिक और राजनीतिक हकीकत के सामने घुटने टेकने पड़े। प्रवासियों की इस भारी आमद के कारण उस नस्लवादी नीति को हमेशा के लिए
Speaker A
कचरे के डब्बे में फेंक दिया गया। इन नए प्रवासियों ने ऑस्ट्रेलिया की फैक्ट्रियों, सड़कों और बड़े-बड़े सिविल प्रोजेक्ट्स में जमकर काम किया। जिससे देश में एक नया आर्थिक उछाल आया। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में ऑस्ट्रेलिया दुनिया से बिल्कुल अलग-थलग और शांत रहने वाला देश बन
Speaker A
चुका था। हालांकि अमेरिका से अपनी दोस्ती के कारण उसने 60 और 70 के दशक में वियतनाम युद्ध में भी हिस्सा लिया। लेकिन इस आधुनिक दौर ने ऑस्ट्रेलिया को अपने अतीत के कालेपनों को देखने पर भी मजबूर कर दिया। सदियों से अपने ही देश में जुल्म सह
Speaker A
रहे एबो रीजनल आदिवासियों के साथ जो अन्याय हुआ था उसे सुधारने की कोशिशें शुरू हुई। सरकार ने उनकी जमीनों के हक को माना और इतिहास की गलतियों के लिए माफी मांगने का सिलसिला शुरू हुआ। बदलाव और आधुनिकता का यह नया ऑस्ट्रेलिया साल 1973
Speaker A
में पूरी दुनिया [संगीत] के सामने चमका जब सिडनी हारबर के किनारे पर आलीशान सिडनी ओपेरा हाउस का उद्घाटन हुआ। और फिर साल 2000 में जब सिडनी ने ओलंपिक खेलों की मेजबानी की, तो पूरी दुनिया ने इस बहुंस्कृतिक और खूबसूरत देश का लोहा माना।
Speaker A
दोस्तों, कैदियों की एक बदहाल जेल से शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया के सबसे विकसित और अमीर देश पर आकर रुका है। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान अगर ठान ले तो सबसे मुश्किल और बंजर माहौल को भी अपनी मेहनत
Speaker A
से स्वर्ग बना सकता है। तो दोस्तों, आज का हमारा यह खास सफर यहीं खत्म होता है। क्या आपको लगता है कि ऑस्ट्रेलिया ने अपने मूल निवासियों के साथ जो इतिहास में जुल्म किया, उसकी भरपाई आज का आधुनिक समाज कर
Speaker A
पाया है? अपनी राय मुझे कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताइए। और हां अगर ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की यह अनोखी दास्तान आपको पसंद आई हो तो इस वीडियो को लाइक और अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें और ऐसे ही
Speaker A
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